Adhyaya 32
Sabha ParvaAdhyaya 3225 Versesकुरु-पाण्डव महायुद्ध नहीं; यह राजसूय-पूर्व दिग्विजय में पाण्डव-पक्ष का स्पष्ट वर्चस्व और संसाधन-संचय है।

Adhyaya 32

Adhyāya 32: Rājasūya-Dīkṣā and Appointment of Court Offices (राजसूयदीक्षा तथा अधिकारविनियोगः)

Upa-parva: Rājasūya-Yajña (Consecration and Court Administration Episode)

Vaiśaṃpāyana reports that Yudhiṣṭhira, after respectfully approaching and saluting elders and teachers (including Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, Aśvatthāman, and the Kaurava princes), requests their comprehensive support in the ongoing sacrifice. He declares his person and wealth as available for the ritual’s requirements and invites them to be satisfied according to their wish, without constraint, thereby framing the yajña as a collective institutional undertaking. Having been initiated (dīkṣita), he immediately assigns responsibilities: Duḥśāsana is placed over provisioning of foods and delicacies; Aśvatthāman is tasked with managing brāhmaṇa requisitions and allocations; Saṃjaya is appointed for receiving and honoring visiting kings; Bhīṣma and Droṇa are positioned to evaluate what has been done and what remains (kṛtākṛta-parijñāna), functioning as senior auditors and supervisors. Kṛpa is assigned oversight of gold, precious metals, gems, and the distribution of dakṣiṇā, while other ‘men of prowess’ are placed in further roles as needed. The narrative then describes the influx of rulers and populations eager to witness the sabhā and the Dharmarāja, the competitive gifting of jewels and wealth, and the construction of splendid residences and brāhmaṇa lodgings. The sacrifice is depicted as abundantly provisioned, ritually complete with homa offerings and mantra discipline, satisfying deities, sages, brāhmaṇas, and all social orders through food, gifts, and orderly hospitality.

Chapter Arc: खाण्डवप्रस्थ/इन्द्रप्रस्थ की राजसभा में युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ हेतु दिग्विजय का संकल्प—और माद्रीपुत्र नकुल का पश्चिमाभिमुख प्रस्थान, विशाल सेना के साथ धरती को रथ-नेमि-निनाद और सिंहनाद से कंपाता हुआ। → नकुल की यात्रा ‘प्रतीची’ दिशा में दूर-दूर तक फैलती है—पञ्चनद, अमरपर्वत, उत्तरज्योतिष, दिव्यकट-पुर जैसे प्रदेशों का उल्लेख; फिर समुद्र-कुक्षि-स्थित द्वीपों के ‘म्लेच्छ’ समुदायों (पह्नव, बर्बर, किरात, यवन, शक) से सामना, जिनकी ‘परमदारुण’ प्रकृति विजय को कठिन बनाती है। → समुद्री द्वीपों के कठोर जनों पर नकुल का निर्णायक पराक्रम—उन्हें वश में कर रत्न-संपदा का संग्रह; आगे दशार्ण आदि जनपदों तथा ‘उत्सवसंकेत’ नामक गणों पर विजय, जिससे पश्चिम-दिग्विजय की धुरी स्थिर हो जाती है। → विजय-रत्नों सहित नकुल का इन्द्रप्रस्थ लौटना और युधिष्ठिर को धन-समर्पण; मार्ग में शल्य द्वारा नकुल का यथावत् सत्कार और भेंट-स्वरूप बहु-रत्न प्रदान—राजसूय के लिए आवश्यक वैभव का संचित होना। → राजसूय-यज्ञ की तैयारी अब निर्णायक चरण में—अन्य दिशाओं के विजयों और समर्पित धन-रत्नों के साथ सभा में बढ़ती प्रतिष्ठा आगे किसको असह्य होगी?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १०० श्लोक मिलाकर कुल १७८ श्लोक हैं) पम्प छा अड्-कााज - यह इक्ष्वाकुवंशीय दुर्जयका पुत्र था। इसका दूसरा नाम दुर्योधन था। यह राजा बड़ा धर्मात्मा था। इसकी कथा अनुशासनपर्वके दूसरे अध्यायमें आती है। > जो अपने कानोंसे ही शरीरको ढक लें उन्हें “कर्णप्रावरण' कहते हैं। प्राचीन कालमें ऐसी जातिके लोग थे, जिनके कान पैरोंतक लटकते थे। द्वात्रिशोडध्याय: नकुलके द्वारा पश्चिम दिशाकी विजय वैशम्पायन उवाच नकुलस्य तु वक्ष्यामि कर्माणि विजयं तथा । वासुदेवजितामाशां यथासावजयतू प्रभु:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! अब मैं नकुलके पराक्रम और विजयका वर्णन करूँगा। शक्तिशाली नकुलने जिस प्रकार भगवान्‌ वासुदेवद्वारा अधिकृत पश्चिम दिशापर विजय पायी थी, वह सुनो

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ଏବେ ମୁଁ ନକୁଳଙ୍କ କର୍ମ ଓ ବିଜୟ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିବି। ପ୍ରଭୁ ନକୁଳ ଭଗବାନ ବାସୁଦେବଙ୍କ ଅଧିକାରଭୁକ୍ତ ପଶ୍ଚିମ ଦିଗକୁ ଯେପରି ଜୟ କରିଥିଲେ, ତାହା ଶୁଣ।

Verse 2

निर्याय खाण्डवप्रस्थात्‌ प्रतीचीमभितोदिशम्‌ । उद्दिश्य मतिमान्‌ प्रायान्महत्या सेनया सह,बुद्धिमान माद्रीकुमारने विशाल सेनाके साथ खाण्डवप्रस्थसे निकलकर पश्चिम दिशामें जानेके लिये प्रस्थान किया

ଖାଣ୍ଡବପ୍ରସ୍ଥରୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରି ବୁଦ୍ଧିମାନ ରାଜକୁମାର ମହାସେନା ସହିତ ପଶ୍ଚିମ ଦିଗକୁ ଲକ୍ଷ୍ୟ କରି ଦୃଢ଼ ସଙ୍କଳ୍ପରେ ଯାତ୍ରା କଲେ।

Verse 3

सिंहनादेन महता योधानां गर्जितिेन च । रथनेमिनिनादैश्व कम्पयन्‌ वसुधामिमाम्‌,वे अपने सैनिकोंके महान्‌ सिंहनाद, गर्जना तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटकी तुमुल ध्वनिसे इस पृथ्वीको कम्पित करते हुए जा रहे थे

ଯୋଧାମାନଙ୍କ ମହା ସିଂହନାଦ, ଗର୍ଜନା ଓ ରଥଚକ୍ରର ଘର୍ଘର ନିନାଦରେ ସେମାନେ ଏହି ପୃଥିବୀକୁ କମ୍ପିତ କରି ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।

Verse 4

ततो बहुधनं रम्यं गवाढ्यं धनधान्यवत्‌ | कार्तिकेयस्य दयितं रोहीतकमुपाद्रवत्‌,जाते-जाते वे बहुत धन-धान्यसे सम्पन्न, गौओंकी बहुलतासे युक्त तथा स्वामिकार्तिकेयके अत्यन्त प्रिय रमणीय रोहीतक- पर्वत एवं उसके समीपवर्ती देशमें जा पहुँचे

ତାପରେ ସେମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ରମଣୀୟ, ବହୁ ଧନ-ଧାନ୍ୟସମୃଦ୍ଧ, ଗୋସମ୍ପଦରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଏବଂ କାର୍ତ୍ତିକେୟଙ୍କ ପ୍ରିୟ ରୋହୀତକ ଦେଶକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ।

Verse 5

तत्र युद्ध महच्चासीच्छूरैर्मत्तमयूरकै: । मरुभूमिं स कार्त्स्न्येन तथैव बहुधान्यकम्‌,वहाँ उनका मत्तमयूर नामवाले शूरवीर क्षत्रियोंके साथ घोर संग्राम हुआ। उसपर अधिकार करनेके पश्चात्‌ महान्‌ तेजस्वी नकुलने समूची मरुभूमि (मारवाड़), प्रचुर धन- धान्यपूर्ण शैरीषक और महोत्थ नामक देशोंपर अधिकार प्राप्त कर लिया। महोत्थ देशके अधिपति राजर्षि आक्रोशको भी जीत लिया। आक्रोशके साथ उनका बड़ा भारी युद्ध हुआ था

ସେଠାରେ ‘ମତ୍ତମୟୂର’ ନାମକ ଶୂର କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କ ସହ ମହାଯୁଦ୍ଧ ହେଲା; ତାପରେ ସେ ସମଗ୍ର ମରୁଭୂମି ପ୍ରଦେଶ ଓ ‘ବହୁଧାନ୍ୟକ’ ଦେଶକୁ ମଧ୍ୟ ଅଧୀନ କଲେ।

Verse 6

शैरीषकं महोत्थं च वशे चक्रे महाद्युति: । आक्रोशं चैव राजर्षि तेन युद्धमभून्महत्‌,वहाँ उनका मत्तमयूर नामवाले शूरवीर क्षत्रियोंके साथ घोर संग्राम हुआ। उसपर अधिकार करनेके पश्चात्‌ महान्‌ तेजस्वी नकुलने समूची मरुभूमि (मारवाड़), प्रचुर धन- धान्यपूर्ण शैरीषक और महोत्थ नामक देशोंपर अधिकार प्राप्त कर लिया। महोत्थ देशके अधिपति राजर्षि आक्रोशको भी जीत लिया। आक्रोशके साथ उनका बड़ा भारी युद्ध हुआ था

ମହାଦ୍ୟୁତିମାନ (ନକୁଳ) ଶୈରୀଷକ ଓ ମହୋତ୍ଥକୁ ଅଧୀନ କଲେ; ରାଜର୍ଷି ଆକ୍ରୋଶଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପରାଜିତ କଲେ—ତାଙ୍କ ସହ ମହାଯୁଦ୍ଧ ହେଲା।

Verse 7

तान्‌ दशार्णान्‌ स जित्वा च प्रतस्थे पाण्डुनन्दन: । शिबींस्त्रिगर्तानम्बष्ठानू मालवान्‌ पञज्चकर्पटान्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଦଶାର୍ଣ୍ଣମାନଙ୍କୁ ଜୟ କରି ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ ଆଗକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ; ଏବଂ କ୍ରମେ ଶିବି, ତ୍ରିଗର୍ତ୍ତ, ଅମ୍ବଷ୍ଠ, ମାଳବ ଓ ପଞ୍ଚକର୍ପଟମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପରାଜିତ କରି ଅଧୀନ କଲେ।

Verse 8

पुनश्न परिवृत्याथ पुष्करारण्यवासिन:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ସେମାନେ ପୁନର୍ବାର ଫେରି ଘୁରି, ପୁଷ୍କରାରଣ୍ୟବାସୀମାନେ ଆଗକୁ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।

Verse 9

सिन्धुकूलश्रिता ये च ग्रामणीया महाबला:,समुद्रके तटपर रहनेवाले जो महाबली ग्रामणीय (ग्राम शासकके वंशज) क्षत्रिय थे, सरस्वती नदीके किनारे निवास करनेवाले जो शूद्र आभीरगण थे, मछलियोंसे जीविका चलानेवाले जो धीवर जातिके लोग थे तथा जो पर्वतोंपर वास करनेवाले दूसरे-दूसरे मनुष्य थे, उन सबको नकुलने जीतकर अपने वशमें कर लिया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସିନ୍ଧୁତଟାଶ୍ରିତ ଗ୍ରାମଣୀୟ-ବଂଶଜ ମହାବଳ କ୍ଷତ୍ରିୟ ପ୍ରଧାନମାନେ, ସରସ୍ୱତୀତଟେ ବସୁଥିବା ଶୂଦ୍ର ଆଭୀରଗଣ, ମତ୍ସ୍ୟଜୀବିକା କରୁଥିବା ଧୀବରମାନେ, ଏବଂ ପର୍ବତବାସୀ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଜନସମୁଦାୟ—ଏ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ମହାବଳ ନକୁଳ ଜୟ କରି ନିଜ ବଶରେ କଲେ।

Verse 10

शूद्राभीरगणाश्रैव ये चाश्रित्य सरस्वतीम्‌ । वर्तयन्ति च ये मत्स्यैयें च पर्वतवासिन:,समुद्रके तटपर रहनेवाले जो महाबली ग्रामणीय (ग्राम शासकके वंशज) क्षत्रिय थे, सरस्वती नदीके किनारे निवास करनेवाले जो शूद्र आभीरगण थे, मछलियोंसे जीविका चलानेवाले जो धीवर जातिके लोग थे तथा जो पर्वतोंपर वास करनेवाले दूसरे-दूसरे मनुष्य थे, उन सबको नकुलने जीतकर अपने वशमें कर लिया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସରସ୍ୱତୀତଟେ ଆଶ୍ରୟ କରିଥିବା ଶୂଦ୍ର ଓ ଆଭୀରଗଣ, ମତ୍ସ୍ୟଜୀବିକା କରୁଥିବା ଲୋକ, ଏବଂ ପର୍ବତବାସୀମାନେ—ଏ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ମହାବଳ ନକୁଳ ଜୟ କରି ନିଜ ବଶରେ କଲେ।

Verse 11

कृत्स्नं पज्चनदं चैव तथैवामरपर्वतम्‌ | उत्तरज्योतिषं चैव तथा दिव्यकटं पुरम्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସମଗ୍ର ପଞ୍ଚନଦ ଦେଶ, ତଥା ଅମରପର୍ବତ; ଏବଂ ଉତ୍ତରଜ୍ୟୋତିଷ, ତଥା ଦିବ୍ୟକଟ ନାମକ ପୁର—ଏସବୁ ମଧ୍ୟ (ତାଙ୍କ) ଅଧିକାର/ବର୍ଣ୍ଣନାରେ ଆସିଲା।

Verse 12

द्वारपालं च तरसा वशे चक्रे महाद्युति: । फिर सम्पूर्ण पंचनददेश (पंजाब), अमरपर्वत, उत्तरज्योतिष, दिव्यकट नगर और द्वारपालपुरको अत्यन्त कान्तिमान्‌ नकुलने शीघ्र ही अपने अधिकारमें कर लिया ।। ११ $ || रामठान्‌ हारहृणांश्व प्रतीच्याश्नैव ये नृपा:,रामठ, हार, हूण तथा अन्य जो पश्चिमी नरेश थे, उन सबको पाण्डुकुमार नकुलने आज्ञामात्रसे ही अपने अधीन कर लिया। भारत! वहीं रहकर उन्होंने वसुदेवनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णके पास दूत भेजा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାଦ୍ୟୁତିମାନ୍ ନକୁଳ ତ୍ୱରାରେ ଦ୍ୱାରପାଳକୁ ମଧ୍ୟ ବଶ କଲେ। ପରେ ସେ ପଞ୍ଚନଦଦେଶ (ପଞ୍ଜାବ), ଅମରପର୍ବତ, ଉତ୍ତରଜ୍ୟୋତିଷ, ଦିବ୍ୟକଟ ନଗର ଓ ଦ୍ୱାରପାଳପୁରକୁ ଶୀଘ୍ର ନିଜ ଅଧିକାରରେ ଆଣିଲେ।

Verse 13

तान्‌ सर्वान्‌ स वशे चक्रे शासनादेव पाण्डव: । तत्रस्थ: प्रेषयामास वासुदेवाय भारत,रामठ, हार, हूण तथा अन्य जो पश्चिमी नरेश थे, उन सबको पाण्डुकुमार नकुलने आज्ञामात्रसे ही अपने अधीन कर लिया। भारत! वहीं रहकर उन्होंने वसुदेवनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णके पास दूत भेजा

ପାଣ୍ଡବ ନକୁଳ ଆଜ୍ଞାମାତ୍ରରେ ହିଁ ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ବଶ କଲେ। ହେ ଭାରତ! ସେଠାରେ ରହି ସେ ବାସୁଦେବନନ୍ଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ପାଖକୁ ଦୂତ ପଠାଇଲେ।

Verse 14

स चास्य गतभी राजन्‌ प्रतिजग्राह शासनम्‌ | तत: शाकलमभ्येत्य मद्राणां पुटभेदनम्‌,मातुलं प्रीतिपूर्वेण शल्यं चक्रे वशे बली । राजन! उन्होंने केवल प्रेमके कारण नकुलका शासन स्वीकार कर लिया। इसके बाद शाकलदेशको जीतकर बलवान्‌ नकुलने मद्रदेशकी राजधानीमें प्रवेश किया और वहाँके शासक अपने मामा शल्यको प्रेमसे ही वशमें कर लिया

ରାଜନ୍! ସେ ଭୟମୁକ୍ତ ହୋଇ ନକୁଳଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ଗ୍ରହଣ କଲେ। ପରେ ଶାକଲକୁ ଜୟ କରି ବଳବାନ୍ ନକୁଳ ମଦ୍ରମାନଙ୍କ ରାଜଧାନୀ ପୁଟଭେଦନରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ ଏବଂ ସେଠାରେ କେବଳ ପ୍ରୀତିବଶେ ନିଜ ମାତୁଳ ଶଲ୍ୟଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ବଶ କଲେ।

Verse 15

स तेन सत्कृतो राज्ञा सत्काराहों विशाम्पते

ହେ ବିଶାମ୍ପତେ! ସତ୍କାରଯୋଗ୍ୟ ନକୁଳଙ୍କୁ ସେ ରାଜା ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ କଲେ।

Verse 16

ततः सागरकुक्षिस्थान्‌ म्लेच्छान्‌ू परमदारुणान्‌,तदनन्तर समुद्री टापुओंमें रहनेवाले अत्यन्त भयंकर म्लेच्छ, पह्नव, बर्बर, किरात, यवन और शकोंको जीतकर उनसे रत्नोंकी भेंट ले विजयके विचित्र उपायोंके जाननेवाले कुरुश्रेष्ठ नकुल इन्द्रप्रसथ्थकी ओर लौटे

ତାପରେ ସମୁଦ୍ରକୁକ୍ଷିରେ—ଦ୍ୱୀପ ଓ ତଟଭୂମିରେ—ବସୁଥିବା ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭୟଙ୍କର ମ୍ଲେଚ୍ଛମାନଙ୍କୁ ନକୁଳ ଜୟ କଲେ। ସେମାନଙ୍କଠାରୁ ରତ୍ନ-ଉପହାର ଗ୍ରହଣ କରି, ବିଜୟର ବିଚିତ୍ର ଉପାୟ ଜାଣୁଥିବା କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ନକୁଳ ଇନ୍ଦ୍ରପ୍ରସ୍ଥ ଦିଗକୁ ପ୍ରତ୍ୟାବର୍ତ୍ତନ କଲେ।

Verse 17

पह्ववान्‌ बर्बरांश्नैव किरातान्‌ यवनाञछ्छकान्‌ । ततो रत्नान्युपादाय वशे कृत्वा च पार्थिवान्‌ | न्यवर्तत कुरुश्रेष्ठो नकुलश्रित्रमार्गवित्‌,तदनन्तर समुद्री टापुओंमें रहनेवाले अत्यन्त भयंकर म्लेच्छ, पह्नव, बर्बर, किरात, यवन और शकोंको जीतकर उनसे रत्नोंकी भेंट ले विजयके विचित्र उपायोंके जाननेवाले कुरुश्रेष्ठ नकुल इन्द्रप्रसथ्थकी ओर लौटे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ନକୁଳ, ବିଭିନ୍ନ ବିଜୟୋପାୟରେ ପାରଙ୍ଗତ, ସମୁଦ୍ରଦ୍ୱୀପବାସୀ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭୟଙ୍କର ମ୍ଲେଚ୍ଛ—ପହ୍ଲବ, ବର୍ବର, କିରାତ, ଯବନ ଓ ଶକ—ଏମାନଙ୍କୁ ଜୟ କରି ବଶ କଲେ। ପରେ ସେହି ରାଜାମାନଙ୍କଠାରୁ ରତ୍ନର ଭେଟି ଗ୍ରହଣ କରି ଇନ୍ଦ୍ରପ୍ରସ୍ଥ ଦିଗକୁ ପ୍ରତ୍ୟାବର୍ତ୍ତନ କଲେ।

Verse 18

करभाणां सहस्राणि कोशं तस्य महात्मन: । ऊहुर्दश महाराज कृच्छादिव महाधनम्‌,महाराज! उन महामना नकुलके बहुमूल्य खजानेका बोझ दस हजार हाथी बड़ी कठिनाईसे ढो रहे थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ମହାରାଜ! ସେହି ମହାତ୍ମା ନକୁଳଙ୍କ ଖଜାନାକୁ ହଜାର ହଜାର ଉଠ ବହନ କରୁଥିଲେ; ଏବଂ ଦଶ ହଜାର ହାତୀ ମାନେ ଯେନେ ବହୁତ କଷ୍ଟରେ ସେଇ ଅପାର ଧନର ଭାର ଉଠାଇ ନେଉଥିଲେ।

Verse 19

इन्द्रप्रस्थगतं वीरमभ्येत्य स युधिष्ठटिरम्‌ । ततो माद्रीसुत: श्रीमान्‌ धनं तस्मै न्‍्यवेदयेत्‌,तदनन्तर श्रीमान्‌ माद्रीकुमारने इन्द्रप्रस्थमें विराजमान वीरवर राजा युधिष्ठिससे मिलकर वह सारा धन उन्हें समर्पित कर दिया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଇନ୍ଦ୍ରପ୍ରସ୍ଥରେ ବିରାଜମାନ ବୀର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ସମୀପେ ଯାଇ, ମାଦ୍ରୀସୁତ ଶ୍ରୀମାନ୍ ନକୁଳ ନିଜେ ପ୍ରାପ୍ତ କରିଥିବା ସମସ୍ତ ଧନ ତାଙ୍କୁ ଯଥାବିଧି ନିବେଦନ କଲେ।

Verse 20

एवं विजित्य नकुलो दिशं वरुणपालिताम्‌ | प्रतीचीं वासुदेवेन निर्जितां भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार भगवान्‌ वासुदेवके द्वारा अपने अधिकारमें की हुई, वरुणपालित पश्चिम दिशापर विजय पाकर नकुल इन्द्रप्रस्थ लौट आये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏହିପରି ଭାବେ ବରୁଣପାଳିତ ପଶ୍ଚିମ ଦିଗକୁ—ଯାହା ପୂର୍ବରୁ ଭଗବାନ ବାସୁଦେବଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଅଧୀନ କରାଯାଇଥିଲା—ବିଜୟ କରି କୁରୁନନ୍ଦନ ନକୁଳ ଇନ୍ଦ୍ରପ୍ରସ୍ଥକୁ ପୁନଃ ଫେରିଲେ।

Verse 31

इस प्रकार श्रीमहाभारत यभापव॑के अन्तर्गत विग्विजयपर्वमें सहदेवके द्वारा दक्षिण दिशाकी विजयसे सम्बन्ध रखनेवाला इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଦିଗ୍ବିଜୟପର୍ବରେ ସହଦେବଙ୍କ ଦକ୍ଷିଣଦିଗ୍ବିଜୟ ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ଏକତ୍ରିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 32

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि नकुलप्रतीचीविजये द्वात्रिंशो 5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें नकुलके द्वारा पश्चिम दिशाकी विजयसे सम्बन्ध रखनेवाला बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଦିଗ୍ବିଜୟପର୍ବରେ ନକୁଳଙ୍କ ପଶ୍ଚିମଦିଗ୍ବିଜୟ-ବିଷୟକ ବତ୍ତିସତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 76

तथा माध्यमिकांश्चैव वाटधानान्‌ द्विजानथ । तत्पश्चात्‌ दशार्णदेशपर विजय प्राप्त करके पाण्डुनन्दन नकुलने शिबि, त्रिगर्त, अम्बष्ठ, मालव, पंचकर्पट एवं माध्यमिक देशोंको प्रस्थान किया और उन सबको जीतकर वाटधानदेशीय क्षत्रियोंको भी हराया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେହିପରି ସେ ମାଧ୍ୟମିକମାନଙ୍କୁ ଏବଂ ପରେ ବାଟଧାନମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ବଶ କଲେ। ତାପରେ ଦଶାର୍ଣ୍ଣଦେଶ ଜୟ କରି ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ ନକୁଳ ଶିବି, ତ୍ରିଗର୍ତ୍ତ, ଅମ୍ବଷ୍ଠ, ମାଳବ, ପଞ୍ଚକର୍ପଟ ଓ ମାଧ୍ୟମିକ ଦେଶମାନଙ୍କ ଉପରେ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ; ସେମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଜୟ କରି ବାଟଧାନଦେଶୀୟ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପରାଜିତ କଲେ।

Verse 86

गणानुत्सवसंकेतान्‌ व्यजयत्‌ पुरुषर्षभ: । पुनः उधरसे लौटकर नरश्रेष्ठ नकुलने पुष्करारण्य-निवासी उत्सवसंकेत नामक गणोंको परास्त किया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପୁରୁଷର୍ଷଭ ସେ ‘ଉତ୍ସବସଂକେତ’ ନାମକ ଗଣମାନଙ୍କୁ ଜୟ କଲେ। ପୁନଃ ଉଧରସାରୁ ଫେରି ଆସି ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ନକୁଳ ପୁଷ୍କରାରଣ୍ୟ-ନିବାସୀ ସେହି ଉତ୍ସବସଂକେତ ଗଣମାନଙ୍କୁ ପରାଜିତ କଲେ।

Verse 153

रत्नानि भूरीण्यादाय सम्प्रतस्थे युधाम्पति: । राजन! राजा शल्यने सत्कारके योग्य नकुलका यथावत्‌ सत्कार किया। शल्यसे भेंटमें बहुत-से रत्न लेकर योद्धाओंके अधिपति माद्रीकुमार आगे बढ़ गये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବହୁ ରତ୍ନ ନେଇ ଯୋଧମାନଙ୍କ ଅଧିପତି ଆଗକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ। ରାଜନ, ରାଜା ଶଲ୍ୟ ସତ୍କାରଯୋଗ୍ୟ ନକୁଳଙ୍କୁ ଯଥାବିଧି ସତ୍କାର କଲେ। ତାପରେ ଶଲ୍ୟଙ୍କ ପାଇଁ ଭେଟ ସ୍ୱରୂପ ଅନେକ ରତ୍ନ ନେଇ ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର, ଯୋଧମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅଗ୍ରଣୀ, ଆଗେଇ ଗଲେ।

Frequently Asked Questions

The chapter foregrounds ethical governance through delegation: authority is distributed to prevent disorder, bias, and waste, implying that ritual and public legitimacy depend on transparent roles and supervision rather than personal will alone.

Effective leadership is shown as the capacity to align respected elders, skilled agents, and clear procedures—provisioning, honoring guests, auditing progress, and regulating wealth—so that collective aims are achieved without coercive micromanagement.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-commentary is implicit in the narrative logic: orderly administration and principled giving are presented as the enabling conditions for ritual completion and broad social satisfaction.