Adhyāya 32: Rājasūya-Dīkṣā and Appointment of Court Offices (राजसूयदीक्षा तथा अधिकारविनियोगः)
पह्ववान् बर्बरांश्नैव किरातान् यवनाञछ्छकान् । ततो रत्नान्युपादाय वशे कृत्वा च पार्थिवान् | न्यवर्तत कुरुश्रेष्ठो नकुलश्रित्रमार्गवित्,तदनन्तर समुद्री टापुओंमें रहनेवाले अत्यन्त भयंकर म्लेच्छ, पह्नव, बर्बर, किरात, यवन और शकोंको जीतकर उनसे रत्नोंकी भेंट ले विजयके विचित्र उपायोंके जाननेवाले कुरुश्रेष्ठ नकुल इन्द्रप्रसथ्थकी ओर लौटे
pahlavān barbarāṃś caiva kirātān yavanān śakān | tato ratnāny upādāya vaśe kṛtvā ca pārthivān | nyavartata kuruśreṣṭho nakulaḥ citramārgavit ||
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ନକୁଳ, ବିଭିନ୍ନ ବିଜୟୋପାୟରେ ପାରଙ୍ଗତ, ସମୁଦ୍ରଦ୍ୱୀପବାସୀ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭୟଙ୍କର ମ୍ଲେଚ୍ଛ—ପହ୍ଲବ, ବର୍ବର, କିରାତ, ଯବନ ଓ ଶକ—ଏମାନଙ୍କୁ ଜୟ କରି ବଶ କଲେ। ପରେ ସେହି ରାଜାମାନଙ୍କଠାରୁ ରତ୍ନର ଭେଟି ଗ୍ରହଣ କରି ଇନ୍ଦ୍ରପ୍ରସ୍ଥ ଦିଗକୁ ପ୍ରତ୍ୟାବର୍ତ୍ତନ କଲେ।
वैशम्पायन उवाच