Mahabharata Adhyaya 116
Bhishma ParvaAdhyaya 11662 Versesभीम के प्रचण्ड प्रतिरोध और पाण्डव-भाइयों के एकत्र होने से कौरव-पक्ष की विजय-आशा डगमगाती; पलड़ा पाण्डवों की ओर झुकता है।

Adhyaya 116

भीष्मस्य जलप्रार्थना — अर्जुनस्य पर्जन्यास्त्रप्रयोगः — दुर्योधनं प्रति सन्ध्युपदेशः (Bhīṣma’s request for water; Arjuna’s Parjanya-astra; counsel to Duryodhana on reconciliation)

Upa-parva: Śaraśayyā-upāsanā (Bhīṣma on the arrow-bed) Episode

Sañjaya reports that, at dawn, rulers from both camps approach Bhīṣma lying on the vīra-śayana (arrow-bed). A large assembly forms, including women, elders, and performers, indicating a pause in direct hostilities and a shift to public witnessing of Bhīṣma’s condition. Bhīṣma, enduring pain with composure, asks for water, but declines ordinary refreshments, stating he awaits an appointed time and cannot partake in human enjoyments while on the arrow-bed. He calls Arjuna forward and requests a cooling stream, asserting Arjuna’s capability to provide water by proper means. Arjuna mounts his chariot, draws the Gāṇḍīva, and—before all—invokes the Parjanya-astra, striking the earth near Bhīṣma so that a pure, cool, fragrant stream rises; Bhīṣma is refreshed and the assembly expresses astonishment. Bhīṣma interprets the act as consistent with Arjuna’s known mastery (and the enabling support of Vāsudeva), then turns to Duryodhana: he states that counsel from multiple advisors had been ignored, warns of destructive outcomes, and urges a negotiated settlement while time remains. He recommends restoring a share of sovereignty to the Pāṇḍavas (including Indraprastha under Yudhiṣṭhira), abandoning anger, and prioritizing peace and kinship concord, concluding with a sober, archival tone as he restrains his own suffering and falls silent.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को बताता है कि कौरव-पक्ष के दस प्रमुख महारथी—विविध देशों से आई विशाल सेना के साथ—भीमसेन को घेरकर यश की कामना से रण में उतरते हैं। → चित्रसेन, विकर्ण, दुर्मर्षण आदि के साथ भगदत्त, कृपाचार्य, शल्य, कृतवर्मा और अन्य महारथी एक साथ भीम पर टूट पड़ते हैं; भीम अकेले ही उन ‘सर्वलोक-प्रवीर’ रथियों को पृथक्-पृथक् लक्ष्य कर काटने लगता है, जिससे कौरव-सेना में घबराहट फैलती है। → शल्य भीम के विक्रम को सह नहीं पाता और तीक्ष्ण बाणों से प्रहार बढ़ाता है; प्रत्युत्तर में भीम लोहे के बाणों से रथों को बेधता, अस्त्रों को छिन्न-भिन्न करता और भगदत्त की प्रेरित शक्ति/शक्ति-प्रहार को भी रण में सहसा काट देता है—भीम का प्रतिरोध कौरवों की संयुक्त धुरी को तोड़ देता है। → भीम शत्रुओं का संहार करते हुए आगे बढ़ता है; अंततः जब पाण्डव-पक्ष के दो महाबली भाई (भीम और उसका सहायक/अन्य पाण्डव बन्धु) एकत्र दिखाई देते हैं, कौरव-श्रेष्ठ पुरुष वहीं विजय की आशा छोड़ देते हैं और युद्ध का पलड़ा पाण्डवों की ओर झुकता है। → भीम के उभार से कौरव-पक्ष की पंक्तियाँ डगमगाती हैं—अब प्रश्न यह है कि भीष्म/कौरव-सेनापति इस टूटती आशा को कैसे संभालेंगे।

Shlokas

Verse 1

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ ६ श्लोक मिलाकर कुल ४२ ६ “लोक हैं।] भीसस्न्प्नास्े | नी नत्च्ज्स त्रयोदशाधिकशततमो< ध्याय: कौरवपक्षके दस प्रमुख महारथियोंके साथ अकेले घोर युद्ध करते हुए भीमसेनका अद्भुत पराक्रम संजय उवाच भगदत्त: कृप: शल्य: कृतवर्मा तथैव च | विन्दानुविन्दावावन्त्यौ सैन्धवश्च जयद्रथ:

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ଭଗଦତ୍ତ, କୃପ, ଶଲ୍ୟ, କୃତବର୍ମା; ଏବଂ ଅବନ୍ତୀର ରାଜକୁମାର ବିନ୍ଦ ଓ ଅନୁବିନ୍ଦ; ସିନ୍ଧୁର ଅଧିପତି ଜୟଦ୍ରଥ—ଏହି ପ୍ରମୁଖ ମହାରଥୀମାନେ କୌରବପକ୍ଷରେ ସଜ୍ଜିତ ହୋଇ ରଣରେ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ଚାରିଦିଗରୁ ଚାପି ଧରିଥିଲେ।

Verse 2

चित्रसेनो विकर्णश्व तथा दुर्मर्षणादय: । दशैते तावका योधा भीमसेनमयोधयन्‌

ଚିତ୍ରସେନ, ବିକର୍ଣ୍ଣ ଏବଂ ଦୁର୍ମର୍ଷଣ ଆଦି—ତୁମର ଏହି ଦଶ ଯୋଦ୍ଧା ଭୀମସେନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିଲେ।

Verse 3

महत्या सेनया युक्ता नानादेशसमुत्थया । भीष्मस्य समरे राजन्‌ प्रार्थयाना महद्‌ यश:,नरेश्वर! इनके साथ अनेक देशोंसे आयी हुई विशाल सेना मौजूद थी। ये समरभूमिमें भीष्मके महान्‌ यशकी रक्षा करना चाहते थे

ହେ ନରେଶ୍ୱର! ସେମାନଙ୍କ ସହ ନାନା ଦେଶରୁ ଆସିଥିବା ବିଶାଳ ସେନା ମଧ୍ୟ ଥିଲା। ହେ ରାଜନ୍! ସେହି ସମରରେ ସେମାନେ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ମହାନ୍ ଯଶକୁ ରକ୍ଷା କରିବାକୁ ଚାହୁଁଥିଲେ।

Verse 4

शल्यस्तु नवभिर्बाणैर्भीमसेनमताडयत्‌ । कृतवर्मा त्रिभिर्बाणै: कृपश्च नवशभि: शरै:,शल्यने नौ बाणोंसे भीमसेनको गहरी चोट पहुँचायी। फिर कृतवर्मने तीन और कृपाचार्यने उन्हें नौ बाण मारे

ଶଲ୍ୟ ନଅଟି ବାଣରେ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ଭାରି ଆଘାତ କଲେ। ପରେ କୃତବର୍ମା ତିନିଟି ବାଣରେ ଏବଂ କୃପ ନଅଟି ଶରରେ ତାଙ୍କୁ ଭେଦିଲେ।

Verse 5

चित्रसेनो विकर्णश्षु भगदत्तक्ष मारिष | दशभिर्दशभिर्बाणैरभीमसेनमताडयन्‌

ହେ ମାରିଷ! ଚିତ୍ରସେନ, ବିକର୍ଣ୍ଣ ଓ ଭଗଦତ୍ତ—ଏ ତିନିଜଣେ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ପ୍ରତ୍ୟେକେ ଦଶ ଦଶ ବାଣରେ ଆଘାତ କଲେ।

Verse 6

आर्य! फिर लगे हाथ चित्रसेन, विकर्ण और भगदत्तने भी दस-दस बाण मारकर भीमसेनको घायल कर दिया ।। सैन्धवश्न त्रिभि्बाणिर्भीमसेनमताडयत्‌ | विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पञठ्चभि: पठ्चभि: शरै:

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସୈନ୍ଧବ (ଜୟଦ୍ରଥ) ତିନିଟି ଶରରେ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ଆଘାତ କଲା। ଏବଂ ଅବନ୍ତିର ରାଜପୁତ୍ର ବିନ୍ଦ ଓ ଅନୁବିନ୍ଦ ଭୀମଙ୍କୁ ପାଞ୍ଚ ପାଞ୍ଚ ଶରରେ ବିଦ୍ଧ କଲେ॥

Verse 7

स तान्‌ सर्वान्‌ महाराज राजमानान्‌ पृथक्‌ पृथक्‌

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ମହାରାଜ! ତାପରେ ଶତ୍ରୁବୀର-ନାଶକ ପାଣ୍ଡୁକୁମାର ମହାବଳୀ ଭୀମସେନ ସେହି ସମସ୍ତ ଦୀପ୍ତିମାନ ରାଜାମାନଙ୍କୁ, ପ୍ରମୁଖ ବୀରମାନଙ୍କୁ ଓ ଆପଣଙ୍କ ମହାରଥୀ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଏକେକ କରି ଶରଦ୍ୱାରା ରଣଭୂମିରେ ଆହତ କଲେ॥

Verse 8

प्रवीरान्‌ सर्वलोकस्य धार्तराष्ट्रानू महारथान्‌ । जघान समरे वीर: पाण्डव: परवीरहा

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ମହାରାଜ! ପରବୀରହା ପାଣ୍ଡବ ବୀର ଭୀମସେନ ସମରରେ ସମସ୍ତ ଲୋକର ପ୍ରମୁଖ ବୀରମାନଙ୍କୁ ଓ ଆପଣଙ୍କ ଧାର୍ତ୍ତରାଷ୍ଟ୍ର ମହାରଥୀମାନଙ୍କୁ ଶରପ୍ରହାରରେ ଆହତ କଲେ॥

Verse 9

सप्तभि: शल्यमाविध्यत्‌ कृतवर्माणमष्टभि: । कृपस्य सशरं चाप॑ मध्ये चिच्छेद भारत,भारत! भीमसेनने शल्यको सात और कृतवर्माको आठ बाणोंसे बींध डाला। फिर कृपाचार्यके बाणसहित धनुषको बीचसे ही काट दिया

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ଭୀମସେନ ଶଲ୍ୟଙ୍କୁ ସାତ ଓ କୃତବର୍ମାଙ୍କୁ ଆଠ ଶରରେ ବିଦ୍ଧ କଲେ। ପରେ କୃପଙ୍କ ବାଣସହିତ ଧନୁଷକୁ ମଧ୍ୟଭାଗରୁ ଛେଦିଦେଲେ॥

Verse 10

अथैनं छिन्नथन्वानं पुनर्विव्याध सप्तभि: । विन्दानुविन्दौ च तथा त्रिभिस्त्रिेभिरताडयत्‌,धनुष कट जानेपर उन्होंने पुन: सात बाणोंसे कृपाचार्यको घायल किया। फिर विन्द और अनुविन्दको तीन-तीन बाण मारे

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଧନୁଷ ଛିନ୍ନ ହୋଇଯାଇଥିବା କୃପଙ୍କୁ ଭୀମସେନ ପୁଣି ସାତ ଶରରେ ବିଦ୍ଧ କଲେ। ଏବଂ ସେହିପରି ବିନ୍ଦ ଓ ଅନୁବିନ୍ଦଙ୍କୁ ତିନି-ତିନି ଶରରେ ଆଘାତ କଲେ॥

Verse 11

दुर्मर्षणं च विंशत्या चित्रसेनं च पञठचभि: । विकर्ण दशभिर्बाणै: पञ्चभिश्न जयद्रथम्‌

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସେ ଦୁର୍ମର୍ଷଣକୁ କୁଡ଼ିଟି ବାଣରେ, ଚିତ୍ରସେନକୁ ପାଞ୍ଚଟି ବାଣରେ, ବିକର୍ଣ୍ଣକୁ ଦଶଟି ବାଣରେ ଏବଂ ଜୟଦ୍ରଥକୁ ପାଞ୍ଚଟି ବାଣରେ ବିଦ୍ଧ କଲା।

Verse 12

अथान्यद्‌ धनुरादाय गौतमो रथिनां वर:

ତାପରେ ରଥୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଗୌତମ ଅନ୍ୟ ଏକ ଧନୁଷ ଧରିଲେ।

Verse 13

स विद्धों दशभिरणिस्तोत्रैरिव महाद्विप:

ଦଶଟି ବାଣରେ ବିଦ୍ଧ ହୋଇ ସେ ଶୂର ସମରେ, ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଅଙ୍କୁଶରେ ପୀଡ଼ିତ ମହାଗଜ ପରି ଗର୍ଜିଲା; ରଣମୁହାଁରେ ସିଂହ ସଦୃଶ ନାଦ କଲା।

Verse 14

ततः क्रुद्धो महाराज भीमसेन: प्रतापवान्‌ । गौतमं ताडयामास शरैरबहुभिराहवे,महाराज! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए प्रतापी भीमसेनने रणक्षेत्रमें कृपाचार्यको अनेक बाणोंद्वारा घायल किया

ତାପରେ, ମହାରାଜ, କ୍ରୋଧାନ୍ବିତ ପ୍ରତାପୀ ଭୀମସେନ ରଣକ୍ଷେତ୍ରରେ ଗୌତମକୁ ଅନେକ ବାଣରେ ପ୍ରହାର କଲା।

Verse 15

सैन्धवस्य तथाश्रांश्व॒ सारथिं च त्रिभि: शरै: | प्राहिणोन्मृत्युलोकाय कालान्तकसमद्युति:

ତାପରେ ପ୍ରଳୟାନ୍ତକ ଯମ ସଦୃଶ ଦ୍ୟୁତିମାନ ଭୀମସେନ ତିନିଟି ବାଣରେ ସୈନ୍ଧବ ଜୟଦ୍ରଥର ଘୋଡ଼ାମାନଙ୍କୁ ଓ ସାରଥିକୁ ମୃତ୍ୟୁଲୋକକୁ ପଠାଇଦେଲା।

Verse 16

हताश्चात्‌ तु रथात्‌ तूर्णमवप्लुत्य महारथ: । शरांक्षिक्षेप निशितान्‌ भीमसेनस्य संयुगे,तब उस अश्वहीन रथसे तुरंत ही कूदकर महारथी जयद्रथने युद्धस्थलमें भीमसेनके ऊपर बहुत-से तीखे बाण चलाये

ତେବେ ହତାଶ ହୋଇ ସେ ମହାରଥୀ ରଥରୁ ଶୀଘ୍ର ଲାଫି ପଡ଼ି, ଯୁଦ୍ଧଭୂମିରେ ଭୀମସେନଙ୍କ ଉପରେ ଅନେକ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବାଣ ଛାଡ଼ିଲା।

Verse 17

तस्य भीमो भधर्नुर्मध्ये द्वाभ्यां चिच्छेद मारिष । भल्लाभ्यां भरतश्रेष्ठ सैन्धवस्य महात्मन:,माननीय भरतश्रेष्ठ; उस समय भीमसेनने दो भल्ल मारकर महामना सिन्धुराजके धनुषको बीचसे ही काट दिया

ତେବେ, ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଭୀମ ଦୁଇଟି ଭଲ୍ଲବାଣରେ ମହାତ୍ମା ସୈନ୍ଧବଙ୍କ ଧନୁଷକୁ ମଧ୍ୟଭାଗରୁ କାଟିଦେଲେ।

Verse 18

स छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथि: । चित्रसेनरथं राजन्नारुरोह त्वरान्वित:,राजन! धनुषके कटने तथा घोड़ों और सारथिके मारे जानेपर रथहीन हुआ जयद्रथ तुरंत ही चित्रसेनके रथपर जा बैठा

ରାଜନ୍! ଧନୁଷ କଟିଯିବା, ଘୋଡ଼ା ଓ ସାରଥି ନିହତ ହେବାରୁ ରଥହୀନ ହୋଇଥିବା ଜୟଦ୍ରଥ ତୁରନ୍ତ ତ୍ୱରାସହିତ ଚିତ୍ରସେନଙ୍କ ରଥରେ ଚଢ଼ିଲା।

Verse 19

अत्यद्भुतं रणे कर्म कृतवांस्तत्र पाण्डव: | महारथा>शरैरविंद्ध्वा वारयित्वा च मारिष

ମାରିଷ! ସେଠାରେ ପାଣ୍ଡବ ରଣରେ ଅତ୍ୟଦ୍ଭୁତ କର୍ମ କଲେ; ବାଣରେ ମହାରଥମାନଙ୍କୁ ବିଦ୍ଧ କରି ସେମାନଙ୍କୁ ରୋକି ରଖିଲେ।

Verse 20

तदा न ममृषे शल्यो भीमसेनस्य विक्रमम्‌,उस समय राजा शल्य भीमसेनके उस पराक्रमको न सह सके। उन्होंने लोहारके माँजे हुए पैने बाणोंका संधान करके समरभूमिमें भीमसेनको बींध डाला और कहा--'खड़ा रह, खड़ा रह”

ସେତେବେଳେ ରାଜା ଶଲ୍ୟ ଭୀମସେନଙ୍କ ସେହି ପରାକ୍ରମ ସହି ପାରିଲେ ନାହିଁ। ଲୋହାର ଘସି ଧାର କରିଥିବା ପରି ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବାଣ ସନ୍ଧାନ କରି ସମରଭୂମିରେ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ବିଦ୍ଧ କରି—“ଠିଆ ରୁହ, ଠିଆ ରୁହ!” ବୋଲି ଚିତ୍କାର କଲେ।

Verse 21

स संधाय शरांस्तीक्ष्णान्‌ कर्मारपरिमार्जितान्‌ । भीम॑ विव्याध समरे तिष्ठ तिछेति चाब्रवीत्‌

ଭୀମଙ୍କ ପରାକ୍ରମ ସହିନ ପାରି ରାଜା ଶଲ୍ୟ ଲୋହାରେ ଘସି ଧାର କରା ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଶର ସନ୍ଧାନ କରି ରଣଭୂମିରେ ଭୀମକୁ ବିଦ୍ଧ କଲେ। ପଛେ ସେ ଡାକିଲେ— “ଠିଆ ରୁହ, ଠିଆ ରୁହ!”

Verse 22

कृपश्च कृतवर्मा च भगदत्तश्न वीर्यवान्‌ विन्दानुविन्दावावन्त्यौ चित्रसेनश्व॒ संयुगे

ସେହି ସଂଗ୍ରାମରେ କୃପ, କୃତବର୍ମା, ପରାକ୍ରମୀ ଭଗଦତ୍ତ, ଅବନ୍ତୀର ବିନ୍ଦ ଓ ଅନୁବିନ୍ଦ, ଏବଂ ଚିତ୍ରସେନ—ଏ ସମସ୍ତେ ଏକତ୍ର ହୋଇ ଶଲ୍ୟଙ୍କ ରକ୍ଷା ପାଇଁ ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ ଭୀମ ଉପରେ ଶରବର୍ଷା କଲେ।

Verse 23

दुर्मर्षणो विकर्णश्व॒ सिन्धुराजश्व वीर्यवान्‌ । भीम॑ ते विव्यधुस्तूर्ण शल्यहेतोररिंदमा:

ତାପରେ ଦୁର୍ମର୍ଷଣ, ବିକର୍ଣ୍ଣ ଓ ପରାକ୍ରମୀ ସିନ୍ଧୁରାଜ (ଜୟଦ୍ରଥ)—ଶତ୍ରୁଦମନ କରୁଥିବା ସେହି ବୀରମାନେ—ଶଲ୍ୟଙ୍କ ନିମିତ୍ତରେ ତୁରନ୍ତ ଭୀମକୁ ବିଦ୍ଧ କଲେ।

Verse 24

सच तान्‌ प्रतिविव्याध पठ्चभि: पज्चभि: शरै: । शल्यं विव्याध सप्तत्या पुनश्न दशभि: शरै:

ତେବେ ଭୀମ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କୁ ପ୍ରତ୍ୟେକଙ୍କୁ ପାଞ୍ଚଟି କରି ଶରରେ ପ୍ରତିବିଦ୍ଧ କଲେ। ପଛେ ସେ ଶଲ୍ୟଙ୍କୁ ସତରିଟି ଶରରେ, ପୁଣି ଦଶଟି ଶରରେ ବିଦ୍ଧ କଲେ।

Verse 25

तं॑ शल्यो नवभिर्भित्त्वा पुनर्विव्याध पठ्चभि: । सारथिं चास्य भल्लेन गाढं विव्याध मर्मणि

ଏହା ଦେଖି ଶଲ୍ୟ ଭୀମକୁ ପ୍ରଥମେ ନଅଟି ଶରରେ ବିଦୀର୍ଣ୍ଣ କରି, ପୁଣି ପାଞ୍ଚଟି ଶରରେ ଆଘାତ କଲେ। ଏବଂ ଗୋଟିଏ ଭଲ୍ଲ-ଶରରେ ତାଙ୍କ ସାରଥିଙ୍କୁ ମର୍ମସ୍ଥାନରେ ଗଭୀର ଆଘାତ ଦେଲେ।

Verse 26

विशोक प्रेक्ष्य निर्भिन्नं भीमसेन: प्रतापवान्‌ । मद्रराजं त्रिभिर्बाणैर्बाह्लोरुगसि चार्पयत्‌

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ନିଜ ସାରଥି ବିଶୋକଙ୍କୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଆହତ ଦେଖି ପ୍ରତାପୀ ଭୀମସେନ ମଦ୍ରରାଜ ଶଲ୍ୟଙ୍କୁ ତିନିଟି ବାଣ ଛାଡ଼ିଲେ; ସେଗୁଡ଼ିକ ତାଙ୍କର ଭୁଜା ଓ ବକ୍ଷସ୍ଥଳରେ ଗାଢ଼ ଭାବେ ବିଧିଗଲା।

Verse 27

(भगदत्तं तथा वीरं कृतवर्माणमाहवे ।) तथेतरान्‌ महेष्वासांस्त्रिभिस्त्रिभिरजिद्दागै: । ताडयामास समरे सिंहवद्‌ विननाद च

ତାପରେ ସେ ରଣଭୂମିରେ ଭଗଦତ୍ତ, ବୀର କୃତବର୍ମା ଓ ଅନ୍ୟ ମହାଧନୁର୍ଧରମାନଙ୍କୁ ତିନି-ତିନି ସିଧା ଯାଉଥିବା ବାଣରେ ଆଘାତ କଲେ; ଏବଂ ସିଂହ ପରି ଗର୍ଜନ କଲେ।

Verse 28

ते हि यत्ता महेष्वासा: पाण्डवं युद्धकोविदम्‌ | त्रिभिस्त्रिभिरकुण्ठाग्रैर्भृशं मर्मस्वताडयन्‌

ଲକ୍ଷ୍ୟରେ ଏକାଗ୍ର ହୋଇଥିବା ସେ ମହାଧନୁର୍ଧରମାନେ ଯୁଦ୍ଧକୁଶଳ ପାଣ୍ଡବଙ୍କୁ ତିନି-ତିନି ତୀକ୍ଷ୍ଣାଗ୍ର ବାଣରେ ତାଙ୍କର ମର୍ମସ୍ଥାନଗୁଡ଼ିକୁ ଭୟଙ୍କର ଭାବେ ପୁନଃପୁନଃ ଆଘାତ କଲେ।

Verse 29

तब उन सभी महाथनुर्धरोंने एक साथ प्रयत्न करके तीखे अग्रभागवाले तीन-तीन बाणोंद्वारा युद्धकुशल पाण्डुपुत्र भीमके मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचायी ।।

ତେବେ ସେ ସମସ୍ତ ମହାଧନୁର୍ଧର ଏକାସାଥି ଚେଷ୍ଟା କରି ଯୁଦ୍ଧକୁଶଳ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର ଭୀମଙ୍କର ମର୍ମସ୍ଥାନଗୁଡ଼ିକୁ ତୀକ୍ଷ୍ଣାଗ୍ର ତିନି-ତିନି ବାଣରେ ଗଭୀର ଭାବେ ଆଘାତ କଲେ। କିନ୍ତୁ ଅତ୍ୟଧିକ ବିଧ୍ଧ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ମହାଧନୁର୍ଧର ଭୀମସେନ କିଛିମାତ୍ରେ ବ୍ୟଥିତ ହେଲେ ନାହିଁ; ବର୍ଷା କରୁଥିବା ମେଘର ଜଳଧାରାରେ ମଧ୍ୟ ପର୍ବତ ଯେପରି ଅଚଳ ରହେ, ସେପରି ସେ ଅଡ଼ିଗ ରହିଲେ।

Verse 30

स तु क्रोधसमाविष्ट: पाण्डवानां महारथ: । मद्रेश्वरं त्रिभिर्बाणिर्भुशं विदूध्वा महायशा:

ରାଜନ୍, ତେବେ କ୍ରୋଧରେ ଆବିଷ୍ଟ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ମହାରଥୀ ମହାଯଶସ୍ବୀ ଭୀମସେନ ମଦ୍ରେଶ୍ୱର ଶଲ୍ୟଙ୍କୁ ତିନିଟି ବାଣରେ ଭୟଙ୍କର ଭାବେ ବିଧିଲେ।

Verse 31

कृपं च नवभिर्बाणैर्भृशं विद्ध्वा समन्तत: । प्राग्ज्योतिषं शतैराजी राजन्‌ विव्याध सायकै:

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! କ୍ରୋଧରେ ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ମହାରଥୀ ମହାଯଶସ୍ବୀ ଭୀମସେନ କୃପାଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କୁ ନଅଟି ବାଣରେ ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ ଭୟଙ୍କର ଭାବେ ବିଦ୍ଧ କରି, ପରେ ରଣଭୂମିରେ ପ୍ରାଗ୍ଜ୍ୟୋତିଷର ଅଧିପତି ଭଗଦତ୍ତଙ୍କୁ ଶତଶତ ଶରରେ ଭେଦିଦେଲେ।

Verse 32

ततस्तु सशरं चाप॑ सात्वतस्य महात्मन: । क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन चिच्छेद कृतहस्तवत्‌,तत्पश्चात्‌ सिद्धहस्त पुरुषकी भाँति भीमसेनने अत्यन्त तीखे क्षुरप्रके द्वारा महामना कृतवर्माके बाणसहित धनुषको काट डाला

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ତାପରେ ଭୀମସେନ ସିଦ୍ଧହସ୍ତ ଯୋଦ୍ଧା ପରି ଅତ୍ୟନ୍ତ ତୀକ୍ଷ୍ଣ କ୍ଷୁରପ୍ର ବାଣରେ ମହାତ୍ମା ସାତ୍ୱତ କୃତବର୍ମାଙ୍କର ବାଣସହିତ ଧନୁଷକୁ କାଟିଦେଲେ।

Verse 33

तथान्यद्‌ धनुरादाय कृतवर्मा वृकोदरम्‌ | आजयपघान भ्रुवोर्मध्ये नाराचेन परंतप:,तब शत्रुओंको संताप देनेवाले कृतवर्माने दूसरा धनुष लेकर भीमसेनकी दोनों भौंहोंके मध्यभागमें नाराचके द्वारा प्रहार किया

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ତେବେ ଶତ୍ରୁସନ୍ତାପକ କୃତବର୍ମା ଅନ୍ୟ ଧନୁଷ ଧରି ରଣଭୂମିରେ ବୃକୋଦର ଭୀମଙ୍କ ଭୃକୁଟିମଧ୍ୟରେ ନାରାଚ ବାଣରେ ପ୍ରହାର କଲେ।

Verse 34

भीमस्तु समरे विद्ध्वा शल्यं नवभिरायसै: । भगदत्तं त्रिभिश्वैव कृतवर्माणमष्टभि:

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ତାପରେ ଭୀମ ରଣଭୂମିରେ ଲୋହାର ନଅଟି ବାଣରେ ରାଜା ଶଲ୍ୟଙ୍କୁ ବିଦ୍ଧ କଲେ; ଭଗଦତ୍ତଙ୍କୁ ତିନି ବାଣରେ ଓ କୃତବର୍ମାଙ୍କୁ ଆଠ ବାଣରେ ଆଘାତ କଲେ; ଏବଂ କୃପାଚାର୍ଯ୍ୟ ଆଦି ରଥୀମାନଙ୍କୁ ପ୍ରତ୍ୟେକଙ୍କୁ ଦୁଇ ଦୁଇ ବାଣରେ ବିଦ୍ଧ କଲେ।

Verse 35

द्वाभ्यां द्वाभ्यां तु विव्याध गौतमप्रभृतीन्‌ रथान्‌ । तेडपि तं समरे राजन विव्यधुर्निशितै: शरै:

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଭୀମସେନ ଗୌତମ ଆଦି ରଥୀମାନଙ୍କୁ ଦୁଇ ଦୁଇ ବାଣରେ ବିଦ୍ଧ କଲେ। ହେ ରାଜନ! ସେମାନେ ମଧ୍ୟ ସେହି ସମରରେ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଶରରେ ଭୀମଙ୍କୁ ପ୍ରତିଆଘାତ କରି ବିଦ୍ଧ କଲେ।

Verse 36

स तथा पीड्यमानोड<पि सर्वशस्त्रैर्महारथै: । मत्वा तृणेन तांस्तुल्यान्‌ विचचार गतव्यथ:

ମହାରଥୀମାନେ ନିକ୍ଷେପ କରିଥିବା ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ରରେ ପୀଡିତ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଭୀମସେନ ସେମାନଙ୍କୁ ତୃଣସମାନ ଭାବି, ବ୍ୟଥାହୀନ ହୋଇ ରଣଭୂମିରେ ବିଚରଣ କଲେ।

Verse 37

ते चापि रथिनां श्रेष्ठा भीमाय निशिताउ्छरान्‌ । प्रेषयामासुरव्यग्रा: शतशो5थ सहस्रश:,रथियोंमें श्रेष्ठ उन वीरोंने भी व्यग्रतारहित हो भीमसेनपर सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें तीखे बाण चलाये

ରଥୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେହି ବୀରମାନେ ମଧ୍ୟ ଅବ୍ୟଗ୍ର ରହି ଭୀମସେନଙ୍କ ଉପରେ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଶରଗୁଡ଼ିକୁ ଶତଶଃ, ପରେ ସହସ୍ରଶଃ ପ୍ରେଷଣ କଲେ।

Verse 38

तस्य शक्ति महावेगां भगदत्तो महारथ: । चिक्षेप समरे वीर: स्वर्णदण्डां महामते,महामते! उस समरभूमिमें वीर महारथी भगदत्तने भीमसेनपर स्वर्णमय दण्डसे विभूषित एक महावेगशालिनी शक्ति चलायी

ମହାମତେ! ସେହି ସମରରେ ବୀର ମହାରଥୀ ଭଗଦତ୍ତ ସ୍ୱର୍ଣ୍ଣଦଣ୍ଡରେ ଭୂଷିତ ମହାବେଗଶାଳୀ ଶକ୍ତିକୁ ଭୀମସେନଙ୍କ ଉପରେ ଛାଡ଼ିଲେ।

Verse 39

तोमरं सैन्धवो राजा पट्टिशं च महाभुज: । शतघ्नीं च कृपो राजज्छरं शल्यश्व संयुगे

ସିନ୍ଧୁଦେଶର ରାଜା ମହାବାହୁ ଜୟଦ୍ରଥ ତୋମର ଓ ପଟ୍ଟିଶ ଛାଡ଼ିଲେ। ରାଜନ୍! କୃପ ଶତଘ୍ନୀ ପ୍ରୟୋଗ କଲେ ଏବଂ ଶଲ୍ୟରାଜା ସଂଯୁଗରେ ଗୋଟିଏ ଶର ନିକ୍ଷେପ କଲେ।

Verse 40

अथेतरे महेष्वासा: पठडच पञ्च शिलीमुखान्‌ | भीमसेनं समुद्दिश्य प्रेषयामासुरोजसा,इनके सिवा दूसरे धनुर्धर वीरोंने भी भीमसेनको लक्ष्य करके बलपूर्वक पाँच-पाँच बाण चलाये

ତାପରେ ଅନ୍ୟ ମହେଷ୍ୱାସମାନେ ମଧ୍ୟ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ଲକ୍ଷ୍ୟ କରି ଓଜସା ସହ ପଞ୍ଚ ପଞ୍ଚ ଶିଳୀମୁଖ ଶର ପ୍ରେଷଣ କଲେ।

Verse 41

तोमरं च द्विधा चक्रे क्षुरप्रेणानिलात्मज: । पट्टिशं च त्रिभि्णिश्विच्छेद तिलकाण्डवत्‌

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ବାୟୁପୁତ୍ର ଭୀମସେନ କ୍ଷୁରପ୍ର ଶରରେ ତୋମରକୁ ଦୁଇ ଖଣ୍ଡ କଲେ। ପୁଣି ତିନିଟି ବାଣରେ ପଟ୍ଟିଶକୁ ତିଳକ ଗଛର ଡାଣ୍ଡ ପରି କାଟି ଟୁକୁଡ଼ା-ଟୁକୁଡ଼ା କରିଦେଲେ॥

Verse 42

स बिभेद शतघ्नीं च नवभि: कड्कपत्रिभि: | मद्रराजप्रयुक्तं च शरं छित्त्वा महारथ:

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସେ ମହାରଥୀ କଙ୍କପତ୍ରୀ ନବଟି ବାଣରେ ଶତଘ୍ନୀକୁ ମଧ୍ୟ ଭେଦି ଭାଙ୍ଗିଦେଲେ; ଏବଂ ମଦ୍ରରାଜ ପ୍ରୟୁକ୍ତ ବାଣକୁ କାଟି ଯୁଦ୍ଧରେ ଅବିଚଳ ରହିଲେ॥

Verse 43

तथेतराउछरान्‌ घोरान्‌ शरै: संनतपर्वभि:

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ତାପରେ ଅନ୍ୟ ଯୋଦ୍ଧା ପ୍ରତିଉତ୍ତରରେ ଘୋର ବାଣମାନ ଛାଡ଼ିଲା—ସୁସଂଯୁକ୍ତ ପର୍ବ ଥିବା ଶର—ହିଂସାକୁ ହିଂସାରେ ଉତ୍ତର ଦେଲା॥

Verse 44

भीमसेनो रणश्लाघी त्रिधैकैकं समाच्छिनत्‌ । तांश्व सर्वान्‌ महेष्वासांस्त्रिभिस्त्रिेभिरताडयत्‌

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ରଣଶ୍ଲାଘୀ ଭୀମସେନ ପ୍ରତ୍ୟେକକୁ ତିନି ଭାଗରେ କାଟିଦେଲେ। ପୁଣି ସେ ସମସ୍ତ ମହେଷ୍ୱାସମାନଙ୍କୁ ପୁନଃପୁନଃ ତିନି-ତିନି ବାଣରେ ଆଘାତ କଲେ॥

Verse 45

तदनन्तर झुकी हुई गाँठवाले बहुत-से बाणोंद्वारा अन्यान्य योद्धाओंके चलाये हुए भयंकर शरसमूहोंको भी युद्धकी श्लाघा रखनेवाले भीमसेनने काटकर एक-एकके तीन- तीन टुकड़े कर दिये। इस प्रकार शत्रुओंके अस्त्र-शस्त्रोंका निवारण करके भीमसेनने उन सभी महाधनुर्धर वीरोंको तीन-तीन बाणोंसे घायल कर दिया ।।

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ତାପରେ ଝୁକିଥିବା ପର୍ବ ଥିବା ଅନେକ ବାଣରେ ଅନ୍ୟ ଅନ୍ୟ ଯୋଦ୍ଧାମାନେ ଛାଡ଼ିଥିବା ଭୟଙ୍କର ଶରସମୂହକୁ ମଧ୍ୟ ରଣଶ୍ଲାଘୀ ଭୀମସେନ କାଟି, ପ୍ରତ୍ୟେକକୁ ତିନି-ତିନି ଖଣ୍ଡ କରିଦେଲେ। ଏଭଳି ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ର ନିବାରଣ କରି ସେ ସମସ୍ତ ମହାଧନୁର୍ଧର ବୀରମାନଙ୍କୁ ତିନି-ତିନି ବାଣରେ ଆହତ କଲେ। ତା’ପରେ ମହାରଣ ଚାଲିଥିବାବେଳେ ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ରଥରେ ରଣଭୂମିକୁ ଆସିଲେ; ମହାରଥୀ ଭୀମଙ୍କୁ ଦେଖି ଆଗେଇଲେ॥

Verse 46

तौ तु तत्र महात्मानौ समेतौ वीक्ष्य पाण्डवी

ସେଠାରେ ପାଣ୍ଡବୀ ସେଇ ଦୁଇ ମହାତ୍ମା ବୀରଙ୍କୁ ଏକତ୍ର ଦେଖି, ଧର୍ମଯୁଦ୍ଧର ସେଇ ଅଶୁଭ ସନ୍ଧିକ୍ଷଣରେ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଦୃଷ୍ଟିରେ ତାଙ୍କୁ ନିରୀକ୍ଷଣ କଲା—ରଣଭୂମିରେ ମହାବଳଙ୍କ ସମ୍ମିଳନ ଭାଗ୍ୟର ପରବର୍ତ୍ତୀ ମୋଡ଼ର ସଙ୍କେତ ଥିଲା।

Verse 47

अथार्जुनो रणे भीम॑ योधयन्तं महारथान्‌,भरतनन्दन! उस रणक्षेत्रमें भीम जिनके साथ युद्ध कर रहे थे, आपके पक्षके उन दस महारथी वीरोंके सामने भीष्मके वधकी इच्छा रखनेवाले अर्जुन भी शिखण्डीको आगे किये आ पहुँचे

ତାପରେ, ଭରତନନ୍ଦନ! ରଣରେ ଭୀମ ଯେଉଁମହାରଥୀମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିଲେ, ତୁମ ପକ୍ଷର ସେଇ ଦଶ ମହାରଥୀ ବୀରଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ, ଭୀଷ୍ମବଧର ଇଚ୍ଛାରେ ଅର୍ଜୁନ ଶିଖଣ୍ଡୀକୁ ଆଗରେ ରଖି ଅଗ୍ରସର ହୋଇ ଆସିଲେ।

Verse 48

भीष्मस्य निधनाकाडुश्षी पुरस्कृत्य शिखण्डिनम्‌ । आससाद रणे वीरांस्तावकान्‌ दश भारत

ହେ ଭାରତ! ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ନିଧନକୁ ଆକାଙ୍କ୍ଷା କରୁଥିବା ଅର୍ଜୁନ ଶିଖଣ୍ଡୀକୁ ଆଗରେ ରଖି ରଣରେ ତୁମ ପକ୍ଷର ସେଇ ଦଶ ବୀରଙ୍କୁ ସମ୍ମୁଖୀନ ହେଲେ—ଯେଉଁମାନଙ୍କ ସହ ସେତେବେଳେ ଭୀମ ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିଲେ।

Verse 49

ये सम भीम॑ रणे राजन्‌ योधयन्तो व्यवस्थिता: । बीभत्सुस्तानथाविध्यद्‌ भीमस्य प्रियकाम्यया

ହେ ରାଜନ! ରଣରେ ଭୀମସେନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ଦୃଢ଼ ଭାବେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିବା ସେମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତଙ୍କୁ, ଭୀମଙ୍କ ପ୍ରିୟ କରିବା ଇଚ୍ଛାରେ, ବୀଭତ୍ସୁ ଅର୍ଜୁନ ଭଲଭାବେ ବାଣରେ ବିଦ୍ଧ କରି ଆହତ କଲେ।

Verse 50

ततो दुर्योधनो राजा सुशर्माणमचोदयत््‌ | अर्जुनस्य वधार्थाय भीमसेनस्य चो भयो:,तब राजा दुर्योधनने अर्जुन और भीमसेन दोनोंके वधके लिये सुशर्माको भेजा

ତାପରେ ରାଜା ଦୁର୍ୟୋଧନ ଅର୍ଜୁନ ଓ ଭୀମସେନ—ଉଭୟଙ୍କ ବଧ ପାଇଁ ସୁଶର୍ମାକୁ ପ୍ରେରିତ କଲେ।

Verse 51

सुशर्मन्‌ गच्छ शीघ्र त्वं बलौचै: परिवारित: । जहि पाण्डुसुतावेतोी धनंजयवृकोदरी,भेजते समय उसने कहा--'सुशर्मन्‌! तुम विशाल सेनाके साथ शीघ्र जाओ और अर्जुन तथा भीमसेन इन दोनों पाण्डुकुमारोंको मार डालो”

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— “ହେ ସୁଶର୍ମନ! ମହାବଳ ସେନାରେ ପରିବୃତ ହୋଇ ଶୀଘ୍ର ଯାଅ; ପାଣ୍ଡୁଙ୍କ ଏହି ଦୁଇ ପୁତ୍ର—ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ଓ ବୃକୋଦର (ଭୀମ)—କୁ ନିହତ କର।”

Verse 52

तच्छुत्वा वचन तस्य त्रैगर्त: प्रस्थलाधिप: । अभिद्र॒ुत्य रणे भीममर्जुनं चैव धन्विनौ

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ତାଙ୍କ କଥା ଶୁଣି ପ୍ରସ୍ଥଳାଧିପ ତ୍ରିଗର୍ତ୍ତରାଜ ସୁଶର୍ମନ ରଣକ୍ଷେତ୍ରକୁ ଧାଉଁଥିଲେ ଏବଂ ଧନୁର୍ଧର ଭୀମ ଓ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ଆକ୍ରମଣ କଲେ।

Verse 53

रथैरनेकसाहसै: समन्तात्‌ पर्यवारयत्‌ | ततः प्रववृते युद्धमर्जुनस्य परै: सह

ଅନେକ ସହସ୍ର ରଥଦ୍ୱାରା ସେମାନେ ତାଙ୍କୁ ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ ଘେରିଲେ; ତାପରେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ସହ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଘୋର ଯୁଦ୍ଧ ଆରମ୍ଭ ହେଲା।

Verse 66

दुर्मर्षणस्तु विंशत्या पाण्डवं निशितै: शरै: । फिर सिन्धुराज जयद्रथने तीन, अवन्तीके विन्द और अनुविन्दने पाँच-पाँच तथा दुर्मर्षणने बीस तीखे बाणोंद्वारा पाण्डुनन्दन भीमसेनको चोट पहुँचायी

ତେବେ ଦୁର୍ମର୍ଷଣ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବିଶଟି ବାଣରେ ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ ମହାବଳୀ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ବିଦ୍ଧ କଲେ।

Verse 112

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें द्रोण और अश्वत्थामाका संवादविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय प्रा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଭୀଷ୍ମପର୍ବର ଅନ୍ତର୍ଗତ ଭୀଷ୍ମବଧପର୍ବରେ ଦ୍ରୋଣ ଓ ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମାଙ୍କ ସଂବାଦବିଷୟକ ଏକଶେ ବାରତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 113

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीमपराक्रमे त्रयोदशाधिकशततमो<्ध्याय:

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଭୀଷ୍ମପର୍ବରେ, ଭୀଷ୍ମବଧପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ, ଭୀମଙ୍କ ପରାକ୍ରମ ବର୍ଣ୍ଣନାକାରୀ ଏକଶତ ତେରତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 116

विद्ध्वा भीमो$नदद्धृष्ट: सैन्धवं च पुनस्त्रिभि: । तत्पश्चात्‌ दुर्मर्षणको बीस

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଅଚଳଦୃଷ୍ଟି ଭୀମ (ଶତ୍ରୁଦ୍ୱାରା) ବିଦ୍ଧ ହେଲେ; କିନ୍ତୁ ଭୀମ ମଧ୍ୟ ସୈନ୍ଧବ ଜୟଦ୍ରଥକୁ ପୁନଃ ତିନିଟି ବାଣରେ ବିଦ୍ଧ କଲେ। ତାପରେ ଭୀମସେନ ଦୁର୍ମର୍ଷଣକୁ କୁଡ଼ି, ଚିତ୍ରସେନକୁ ପାଞ୍ଚ, ବିକର୍ଣ୍ଣକୁ ଦଶ ଏବଂ ଜୟଦ୍ରଥକୁ ପାଞ୍ଚ ବାଣରେ ଆହତ କଲେ। ମହାହର୍ଷରେ ସିଂହନାଦ କରି ସେ ପୁନଃ ଜୟଦ୍ରଥକୁ ତିନି ବାଣରେ ଭେଦିଦେଲେ।

Verse 126

भीम॑ विव्याध संरब्धो दशभिरनर्निशितै: शरै: । तदनन्तर रथियोंमें श्रेष्ठ कृपाचार्यने दूसरा धनुष लेकर क्रोधपूर्वक चलाये हुए दस तीखे बाणोंद्वारा भीमसेनको बींध डाला

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—କ୍ରୋଧାବେଶରେ ସେ ଭୀମକୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଦଶଟି ବାଣରେ ବିଦ୍ଧ କଲା। ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ ରଥୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ କୃପାଚାର୍ଯ୍ୟ ଦ୍ୱିତୀୟ ଧନୁଷ ଧରି, କ୍ରୋଧପୂର୍ବକ ଛାଡ଼ା ଦଶଟି ଧାରାଳ ବାଣରେ ଭୀମସେନକୁ ପୁନଃ ବିଦ୍ଧ କଲେ।

Verse 196

विरथ॑ सैन्धवं चक्रे सर्वलोकस्य पश्यत: । आर्य! वहाँ पाण्डुनन्दन भीमसेनने रणक्षेत्रमें यह अद्भुत कर्म किया कि सब महारथियोंको बाणोंसे घायल करके रोक दिया और सब लोगोंके देखते-देखते सिन्धुराजको रथहीन कर दिया

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସମସ୍ତ ଲୋକ ଦେଖୁଥିବାବେଳେ ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ ଭୀମସେନ ରଣକ୍ଷେତ୍ରରେ ଏକ ଅଦ୍ଭୁତ କାର୍ଯ୍ୟ କଲେ। ସେ ମହାରଥୀମାନଙ୍କୁ ବାଣରେ ଆହତ କରି ରୋକିଦେଲେ ଏବଂ ସମସ୍ତଙ୍କ ସାମ୍ନାରେ ସୈନ୍ଧବରାଜ ଜୟଦ୍ରଥକୁ ରଥହୀନ କରିଦେଲେ।

Verse 426

शक्ति चिच्छेद सहसा भगदत्तेरितां रणे । तत्पश्चात्‌ कंकपत्रयुक्त नौ बाणोंद्वारा शतघ्नीको छिन्न-भिन्न कर दिया। इसके बाद महारथी भीमसेनने मद्रराज शल्यके चलाये हुए बाणको काटकर रणक्षेत्रमें भगदत्तकी चलायी हुई शक्तिके भी सहसा टुकड़े-टुकड़े कर डाले

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ରଣରେ ଭଗଦତ୍ତ ଛାଡ଼ିଥିବା ଶକ୍ତିକୁ ସେ ହଠାତ୍ ଛେଦିଦେଲେ। ତାପରେ କଙ୍କପତ୍ରଯୁକ୍ତ ନଅଟି ବାଣରେ ଶତଘ୍ନୀକୁ ଛିନ୍ନଭିନ୍ନ କରିଦେଲେ। ପରେ ମହାରଥୀ ଭୀମସେନ ମଦ୍ରରାଜ ଶଲ୍ୟ ଛାଡ଼ିଥିବା ବାଣକୁ କାଟି, ରଣକ୍ଷେତ୍ରରେ ଭଗଦତ୍ତ ନିକ୍ଷେପିତ ଶକ୍ତିକୁ ମଧ୍ୟ ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ ଖଣ୍ଡଖଣ୍ଡ କରିଦେଲେ।

Verse 456

निध्नन्तं समरे शत्रून्‌ योधयानं च सायकै: । तब उस महासमरमें महारथी भीमसेनको, जो समरभूमिमें सायकोंद्वारा शत्रुओंका संहार करते हुए उनके साथ युद्ध कर रहे थे, देखकर रथके द्वारा अर्जुन भी वहीं आ पहुँचे

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସେଇ ମହାସମରରେ ରଣଭୂମିରେ ବାଣବର୍ଷାରେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ନିଧନ କରି ସେମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିବା ମହାରଥୀ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ଦେଖି, ଅର୍ଜୁନ ମଧ୍ୟ ନିଜ ରଥରେ ସେଇ ସ୍ଥାନକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ।

Verse 463

न शशंसुर्जयं तत्र तावका: पुरुषर्षभा: । उन दोनों महामनस्वी पाण्डव बन्धुओंको एकत्र हुआ देख आपकी सेनाके श्रेष्ठ पुरुषोंने वहाँ अपनी विजयकी आशा त्याग दी

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସେଠାରେ ଆପଣଙ୍କ ପକ୍ଷର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୀରମାନେ ଆଉ ବିଜୟ ଘୋଷଣା କଲେ ନାହିଁ। ସେଇ ଦୁଇ ମହାମନସ୍କ ପାଣ୍ଡବ ଭ୍ରାତାଙ୍କୁ ଏକତ୍ର ଦେଖି ସେମାନେ ସେଠାରେ ଜୟର ଆଶା ତ୍ୟାଗ କଲେ।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether continued escalation in pursuit of dominance can be justified when it predictably produces broad social harm; Bhīṣma frames reconciliation as the ethically safer policy given foreseeable consequences and kinship obligations.

Competence and power should be subordinated to restraint and stability: when outcomes are asymmetrical and losses compounding, prudent governance favors settlement, reputation-preservation, and the protection of the wider community.

No explicit phalaśruti is stated; the chapter’s meta-function is evidentiary—publicly demonstrating Arjuna’s extraordinary capability and using that demonstration as a rhetorical basis for policy advice advocating peace within the broader epic’s ethical architecture.

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