Adhyaya 15
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 1536 Verses

Adhyaya 15

Kṛṣṇa–Arjuna Saṃvāda in Indraprastha: Consolation, Legitimation, and Leave for Dvārakā (आश्वमेधिकपर्व, अध्याय १५)

Upa-parva: Indraprastha-vihāra and Dvārakā-gamana-saṃkalpa (Kṛṣṇa–Arjuna dialogue unit)

Janamejaya asks what Vāsudeva and Dhanaṃjaya did after the Pāṇḍavas’ victory and the realm’s pacification. Vaiśaṃpāyana describes the pair moving joyfully through forests, mountains, rivers, and then Indraprastha’s splendid sabhā, engaging in extended conversation: recollections of conflict and hardship, and genealogical accounts of ṛṣis and devas. Kṛṣṇa uses structured, sweet, and reasoned discourse to calm Arjuna’s grief over losses, shifting the focus toward the achieved political settlement. He affirms that the entire earth is now won and peacefully enjoyed by Dharmarāja Yudhiṣṭhira—uncontested—through the combined prowess of the brothers, and that the Dhārtarāṣṭras, characterized as ethically wayward, have been decisively removed along with their adherents. Kṛṣṇa then articulates his personal attachment to the Pāṇḍavas and their courtly spaces, yet notes the long time since seeing Balarāma and the Vṛṣṇi leaders; therefore he intends to go to Dvārakā. He insists he would not act against Yudhiṣṭhira even at the cost of life, and asks Arjuna to accompany him to request formal leave from the king. Arjuna, honoring Janārdana, assents with difficulty, indicating the emotional weight of separation despite political closure.

Chapter Arc: पाण्डव-विजय के बाद राज्य शांत है; इन्द्रप्रस्थ में श्रीकृष्ण और अर्जुन का पुनर्मिलन ऐसा लगता है मानो स्वर्ग के दो देवेश्वर पृथ्वी पर विहार कर रहे हों। → वन-प्रवास और सभा-प्रवेश के प्रसंगों के बीच गोविन्द अर्जुन को सान्त्वना देते हुए एक गम्भीर प्रस्ताव रखते हैं—द्वारका चलने का; यह प्रस्ताव मित्रता का निमन्त्रण भी है और भविष्य की अनिवार्यताओं का संकेत भी। → कृष्ण का हेतुयुक्त, शलक्ष्ण वचन—‘त्वदृते मे निवासकारणे प्रयोजनं न विद्यते’—अर्जुन के हृदय को बाँध देता है: वे स्पष्ट करते हैं कि युधिष्ठिर के धर्ममय शासन में पृथ्वी स्थिर है, अतः अब अर्जुन के साथ द्वारका जाना ही उनका प्रयोजन है। → अर्जुन, जनार्दन का सम्मान कर, ‘तथेति’ कहकर सहमति देता है; राज्य-व्यवस्था धर्मराज युधिष्ठिर के हाथों सुरक्षित मानी जाती है और कृष्ण-अर्जुन की यात्रा-रेखा निश्चित होती है। → द्वारका-गमन का निश्चय हो चुका है—पर यह गमन किन आगामी घटनाओं (यादव-प्रसंग/अन्तकालीन संकेत) की भूमिका बनेगा, यह अभी अनकहा रह जाता है।

Shlokas

Verse 1

/ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३०६३ श्लोक मिलाकर कुल ४७३ श्लोक हैं) नफमशा< (0) अमन न पजञ्चदशो<् ध्याय: भगवान्‌ श्रीकृष्णका अर्जुनसे द्वारका जानेका प्रस्ताव करना जनमेजय उवाच विजिते पाण्डवेयैस्तु प्रशान्ते च द्विजोत्तम | राष्ट्र कि चक्रतुर्वीरी वासुदेवधनंजयौ,जनमेजयने पूछा--द्विजश्रेष्ठ, जब पाण्डवोंने अपने राष्ट्रपप विजय पा ली और राज्यमें सब ओर शान्ति स्थापित हो गयी, उसके बाद श्रीकृष्ण और अर्जुन इन दोनों वीरोंने क्या किया?

ଜନମେଜୟ କହିଲେ—ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ପାଣ୍ଡବମାନେ ରାଜ୍ୟ ଜୟ କରି ସର୍ବତ୍ର ଶାନ୍ତି ସ୍ଥାପନ କରିଦେଲା ପରେ, ସେଇ ଦୁଇ ବୀର—ବାସୁଦେବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ଓ ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ)—ତାପରେ କ’ଣ କଲେ?

Verse 2

वैशम्पायन उवाच विजिते पाण्डवै राजन्‌ प्रशान्ते च विशाम्पते । राष्ट्र बभूवतुर्हष्टो वासुदेवधनंजयौ,वैशम्पायनजीने कहा--प्रजानाथ! नरेश्वर! जब पाण्डवोंने राष्ट्रपर विजय पा ली और सर्वत्र शान्ति स्थापित हो गयी, तब भगवान्‌ श्रीकृष्ण और अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍, ପ୍ରଜାନାଥ! ପାଣ୍ଡବମାନେ ରାଜ୍ୟ ଜୟ କରି ସର୍ବତ୍ର ଶାନ୍ତି ସ୍ଥାପନ କରିଦେଲା ପରେ, ବାସୁଦେବ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ଓ ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ଦୁହେଁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲେ।

Verse 3

विजद्दाते मुदा युक्तौ दिवि देवेश्वराविव । तौ वनेषु विचित्रेषु पर्वतेषु ससानुषु,स्वर्गलोकमें विहार करनेवाले दो देवेश्वरोंकी भाँति वे दोनों मित्र आनन्दमग्न हो विचित्र- विचित्र वनोंमें और पर्वतोंके सुरम्य शिखरोंपर विचरने लगे

ଆନନ୍ଦରେ ଯୁକ୍ତ ସେଇ ଦୁଇ ସଖା ସ୍ୱର୍ଗରେ ବିହାର କରୁଥିବା ଦୁଇ ଦେବେଶ୍ୱରଙ୍କ ପରି, ବିଚିତ୍ର ବିଚିତ୍ର ବନମାନେ ଓ ସୁନ୍ଦର ଶିଖରଯୁକ୍ତ ପର୍ବତମାନେ ମଧ୍ୟରେ ବିଚରଣ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।

Verse 4

तीर्थेषु चैव पुण्येषु पल्वलेषु नदीषु च । चड्क्रम्यमाणौ संहृष्टावश्विनाविव नन्दने,पवित्र तीर्थों, छोटे तालाबों और नदियोंके तटोंपर विचरण करते हुए वे दोनों नन्दन- वनमें विहार करनेवाले अश्विनीकुमारोंके समान हर्षका अनुभव करते थे

ପୁଣ୍ୟ ତୀର୍ଥମାନେ, ଛୋଟ ଛୋଟ ପୋଖରୀମାନେ ଓ ନଦୀତଟମାନେ ଉପରେ ବିଚରଣ କରୁଥିବାବେଳେ, ସେମାନେ ଦୁହେଁ ନନ୍ଦନବନରେ ବିହାର କରୁଥିବା ଅଶ୍ୱିନୀକୁମାରଦ୍ୱୟ ପରି ହର୍ଷ ଅନୁଭବ କରୁଥିଲେ।

Verse 5

इन्द्रप्रस्थे महात्मानौ रेमतु: कृष्णपाण्डवौ । प्रविश्य तां सभां रम्यां विजहाते च भारत,भरतनन्दन! फिर इन्द्रप्रस्थमें लौटकर महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन मयनिर्मित रमणीय सभामें प्रवेश करके आनन्दपूर्वक मनोविनोद करने लगे

ହେ ଭରତନନ୍ଦନ! ଇନ୍ଦ୍ରପ୍ରସ୍ଥକୁ ପୁନର୍ବାର ଫେରି ମହାତ୍ମା ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଓ ପାଣ୍ଡବ ଅର୍ଜୁନ ମୟ-ନିର୍ମିତ ସେଇ ରମଣୀୟ ସଭାଗୃହରେ ପ୍ରବେଶ କରି, ସେଠାରେ ଆନନ୍ଦପୂର୍ବକ ମନୋବିନୋଦ ଓ ସ୍ନେହସମ୍ବାଦରେ ଲୀନ ହେଲେ।

Verse 6

तत्र युद्धकथाश्रित्रा: परिक्लेशांश्व पार्थिव । कथायोगे कथायोगे कथयामासतु: सदा,पृथ्वीनाथ! वे दोनों महात्मा पुरातन ऋषिप्रवर नर और नारायण थे तथा आपसमें बहुत प्रेम रखते थे। बातचीतके प्रसंगमें वे दोनों मित्र सदा देवताओं तथा ऋषियोंके वंशोंकी चर्चा करते थे और युद्धकी विचित्र कथाओं एवं क्लेशोंका वर्णन किया करते थे

ହେ ପୃଥ୍ୱୀନାଥ! ସେଠାରେ କଥାବାର୍ତ୍ତାର ପ୍ରସଙ୍ଗ ଉଠିଲେ ଉଠିଲେ ସେମାନେ ଦୁହେଁ ଯୁଦ୍ଧକଥା ସହ ଜଡିତ ଅନେକ କ୍ଲେଶକୁ ପୁନଃପୁନଃ ବର୍ଣ୍ଣନା କରୁଥିଲେ।

Verse 7

ऋषीणां देवतानां च वंशांस्तावाहतु: सदा । प्रीयमाणौ महात्मानौ पुराणावृषिसत्तमौ,पृथ्वीनाथ! वे दोनों महात्मा पुरातन ऋषिप्रवर नर और नारायण थे तथा आपसमें बहुत प्रेम रखते थे। बातचीतके प्रसंगमें वे दोनों मित्र सदा देवताओं तथा ऋषियोंके वंशोंकी चर्चा करते थे और युद्धकी विचित्र कथाओं एवं क्लेशोंका वर्णन किया करते थे

ହେ ପୃଥ୍ୱୀନାଥ! ସେଇ ଦୁଇ ମହାତ୍ମା—ପୁରାତନ ଋଷିଶ୍ରେଷ୍ଠ—ପରସ୍ପର ପ୍ରତି ଅତ୍ୟନ୍ତ ସ୍ନେହଶୀଳ ଥିଲେ। କଥାବାର୍ତ୍ତାରେ ସେମାନେ ସଦା ଦେବତା ଓ ଋଷିମାନଙ୍କର ବଂଶାବଳୀ କହୁଥିଲେ, ଏବଂ ସହିତ ଯୁଦ୍ଧର ବିଚିତ୍ର କଥା ଓ ତାହାରୁ ଉତ୍ପନ୍ନ କ୍ଲେଶମାନେ ମଧ୍ୟ ବର୍ଣ୍ଣନା କରୁଥିଲେ।

Verse 8

मधुरास्तु कथाश्षित्राश्षित्रार्थपदनिश्चया: । निश्चयज्ञ: स पार्थाय कथयामास केशव:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେଇ କଥାମାନେ ଶୁଣିବାକୁ ମଧୁର, ବିଭିନ୍ନ ଓ ସୁନିର୍ବାଚିତ ପଦଦ୍ୱାରା ଅର୍ଥନିଶ୍ଚୟକୁ ଦୃଢ଼ କରୁଥିଲା। ନିଶ୍ଚୟଜ୍ଞ କେଶବ ସେଗୁଡ଼ିକୁ ପାର୍ଥଙ୍କୁ କହିଲେ।

Verse 9

भगवान्‌ श्रीकृष्ण सब प्रकारके सिद्धान्तोंको जाननेवाले थे। उन्होंने अर्जुनको विचित्र पद, अर्थ एवं सिद्धान्तोंसे युक्त बड़ी विलक्षण एवं मधुर कथाएँ सुनायीं ।। पुत्रशोकाभिसंतप्तं ज्ञातीनां च सहस्रश: । कथाभि: शमयामास पार्थ शौरिर्जनार्दन:,कुन्तीकुमार अर्जुन पुत्रशोकसे संतप्त थे। सहस्रों भाई-बन्धुओंके मारे जानेका भी उनके मनमें बड़ा दुःख था। वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने अनेक प्रकारकी कथाएँ सुनाकर उस समय पार्थको शान्त किया

କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଅର୍ଜୁନ ପୁତ୍ରଶୋକରେ ଦଗ୍ଧ ଥିଲେ, ଏବଂ ସହସ୍ର ସହସ୍ର ସ୍ୱଜନ ନିହତ ହୋଇଥିବା ଦୁଃଖ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ମନକୁ ଭାରାକ୍ରାନ୍ତ କରିଥିଲା। ସେତେବେଳେ ବସୁଦେବନନ୍ଦନ ଶୌରି ଜନାର୍ଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ନାନାପ୍ରକାର ମଧୁର, ବିଲକ୍ଷଣ ଓ ଉପଦେଶମୟ କଥା କହି ପାର୍ଥଙ୍କୁ ଶାନ୍ତ କଲେ।

Verse 10

स तमाथ्चवास्य विधिवद्‌ विज्ञानज्ञों महातपा: । अपदहृत्यात्मनो भारं विशश्रामेव सात्वत:,महातपस्वी विज्ञानवेत्ता श्रीकृष्णने विधिपूर्वक अर्जुनको सान्त्वना देकर अपना भार उतार दिया और वे सुखपूर्वक विश्राम-सा करने लगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାତପସ୍ବୀ, ତତ୍ତ୍ୱବିଜ୍ଞାନଜ୍ଞ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ବିଧିପୂର୍ବକ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦେଲେ। ଏପରି ନିଜେ ନେଇଥିବା ଭାର ଅପସାରଣ କରି ସେ ସାତ୍ୱତ (କୃଷ୍ଣ) ଭାରମୁକ୍ତ ହୋଇ ବିଶ୍ରାମ କରୁଥିବା ପରି ଲାଗିଲେ।

Verse 11

ततः कथान्ते गोविन्दो गुडाकेशमुवाच ह । सान्त्वयन्‌ शलक्ष्णया वाचा हेतुयुक्तमिदं वच:,बातचीतके अनन्‍्तमें गोविन्दने गुडाकेश अर्जुनको अपनी मधुर वाणीद्वारा सान्त्वना प्रदान करते हुए उनसे यह युक्तियुक्त बात कही

ତାପରେ କଥାବାର୍ତ୍ତାର ଶେଷରେ ଗୋବିନ୍ଦ ଗୁଡାକେଶ (ଅର୍ଜୁନ)ଙ୍କୁ କହିଲେ। ମୃଦୁ ଓ ସୁଶୋଭିତ ବାଣୀରେ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦେଇ ସେ ଯୁକ୍ତିଯୁକ୍ତ ଏହି କଥା କହିଲେ।

Verse 12

वायुदेव उवाच विजितेयं धरा कृत्स्ना सव्यसाचिन्‌ परंतप । त्वद्वाहुबलमाश्रित्य राज्ञा धर्मसुतेन ह

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ହେ ସବ୍ୟସାଚୀ, ପରନ୍ତପ! ତୁମ ବାହୁବଳର ଆଶ୍ରୟ ନେଇ ଧର୍ମସୁତ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଏହି ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ବିଜୟ କରିଛନ୍ତି।

Verse 13

भगवान्‌ श्रीकृष्ण बोले--शत्रुओंको संताप देनेवाले सव्यसाची अर्जुन! धर्मपुत्र युधिष्ठिरने तुम्हारे बाहुबलका सहारा लेकर इस समूची पृथ्वीपर विजय प्राप्त कर ली ।। असपलन्ां महीं भुद्क्ते धर्मराजो युधिष्ठिर: । भीमसेनानुभावेन यमयोश्व नरोत्तम,नरश्रेष्ठल भीमसेन तथा नकुल-सहदेवके प्रभावसे धर्मराज युधिष्ठिर इस पृथ्वीका निष्कण्टक राज्य भोग रहे हैं

ଭଗବାନ୍ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କହିଲେ—ହେ ଶତ୍ରୁସନ୍ତାପକ ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନ! ତୁମ ବାହୁବଳର ଆଶ୍ରୟ ନେଇ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଏହି ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ବିଜୟ କରିଛନ୍ତି। ଏବେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ନିଷ୍କଣ୍ଟକ ରାଜ୍ୟ ଭୋଗ କରୁଛନ୍ତି—ଭୀମସେନଙ୍କ ପ୍ରଭାବରେ ଏବଂ ଯମଜ ନକୁଳ-ସହଦେବଙ୍କ ଶକ୍ତିରେ ମଧ୍ୟ, ହେ ନରୋତ୍ତମ।

Verse 14

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपववके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ,धर्मेण राज्ञा धर्मज्ञ प्राप्त राज्यमकण्टकम्‌ | धर्मेण निहत: संख्ये स च राजा सुयोधन: धर्मज्ञ! राजा युधिष्ठिरने यह निष्कण्टक राज्य धर्मके बलसे ही प्राप्त किया है। धर्मसे ही राजा दुर्योधन युद्धमें मारा गया है

ହେ ଧର୍ମଜ୍ଞ! ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଧର୍ମବଳରେ ଏହି ନିଷ୍କଣ୍ଟକ ରାଜ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତ କରିଛନ୍ତି; ଏବଂ ଧର୍ମର ଫଳରେ ଯୁଦ୍ଧରେ ରାଜା ସୁଯୋଧନ (ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ) ନିହତ ହୋଇଛି।

Verse 15

अधर्मरुचयो लुब्धा: सदा चाप्रियवादिन: । धार्तराष्ट्रा दुरात्मान: सानुबन्धा निपातिता:,धृतराष्ट्रके पुत्र अधर्ममें रुचि रखनेवाले, लोभी, कटुवादी और दुरात्मा थे। इसलिये अपने सगे-सम्बन्धियोंसहित मार गिराये गये इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि पठचदशो<5ध्याय:

ବାୟୁ କହିଲେ—ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ଅଧର୍ମରେ ଆସକ୍ତ, ଲୋଭରେ ପ୍ରେରିତ ଏବଂ ସଦା କଠୋର ଓ ଅପ୍ରିୟ ବଚନ କହୁଥିଲେ। ଦୁଷ୍ଟ ସ୍ୱଭାବ ଥିବାରୁ ସେମାନେ ନିଜ ଅନୁଚର ଓ ସହାୟମାନଙ୍କ ସହିତ ନିହତ ହେଲେ।

Verse 16

प्रशान्तामखिलां पार्थ पृथिवीं पृथिवीपति: । भुड्क्ते धर्मसुतो राजा त्वया गुप्त: कुरूद्गवह,कुरुकुलतिलक कुन्तीकुमार! धर्मपुत्र पृथ्वीपति राजा युधिष्ठिर आज तुमसे सुरक्षित होकर सर्वथा शान्त हुई समूची पृथ्वीका राज्य भोगते हैं

ବାୟୁ କହିଲେ—ହେ ପାର୍ଥ! ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀ ଶାନ୍ତ ହୋଇଛି। ତୁମ ରକ୍ଷାରେ ପୃଥିବୀପତି, କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ଧର୍ମସୁତ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଏବେ ଧର୍ମପୂର୍ବକ ରାଜ୍ୟ ଭୋଗ କରି ଶାସନ କରୁଛନ୍ତି।

Verse 17

रमे चाहं त्वया सार्धमरण्येष्वपि पाण्डव । किमु यत्र जनो<यं वै पृथा चामित्रकर्षण,शत्रुसूदन पाण्डुकुमार! तुम्हारे साथ रहनेपर निर्जन वनमें भी मुझे सुख और आनन्द मिल सकता है। फिर जहाँ इतने लोग और मेरी बुआ कुन्ती हों, वहाँकी तो बात ही क्‍या है?

ବାୟୁ କହିଲେ—ହେ ପାଣ୍ଡବ, ଅମିତ୍ରକର୍ଷଣ! ତୁମ ସହ ଥିଲେ ନିର୍ଜନ ଅରଣ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ମୋତେ ସୁଖ ଓ ଆନନ୍ଦ ମିଳେ; ତେବେ ଯେଉଁଠାରେ ଏତେ ଲୋକ ଅଛନ୍ତି ଏବଂ ମୋ ପିଶୀ ପୃଥା (କୁନ୍ତୀ) ମଧ୍ୟ ଅଛନ୍ତି, ସେଠାରେ ତ କଥାହିଁ କ’ଣ!

Verse 18

यत्र धर्मसुतो राजा यत्र भीमो महाबल: । यत्र माद्रवतीपुत्रौ रतिस्तत्र परा मम,जहाँ धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर हों, महाबली भीमसेन और माद्रीकुमार नकुल-सहदेव हों, वहाँ मुझे परम आनन्द प्राप्त हो सकता है

ବାୟୁ କହିଲେ—ଯେଉଁଠାରେ ଧର୍ମସୁତ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଅଛନ୍ତି, ଯେଉଁଠାରେ ମହାବଳୀ ଭୀମ ଅଛନ୍ତି, ଏବଂ ଯେଉଁଠାରେ ମାଦ୍ରୀଙ୍କ ଦୁଇ ପୁତ୍ର ନକୁଳ-ସହଦେବ ଅଛନ୍ତି—ସେଠାରେ ମୋର ପରମ ରତି ଅଛି।

Verse 19

तथैव स्वर्गकल्पेषु सभोद्देशेषु कौरव । रमणीयेषु पुण्येषु सहितस्य त्वयानघ,निष्पाप कुरुनन्दन! इस सभाभवनके रमणीय एवं पवित्र स्थान स्वर्गके समान सुखद हैं। यहाँ तुम्हारे साथ रहते हुए बहुत दिन बीत गये। इतने दिनोंतक मैं अपने पिता शूरसेनकुमार वसुदेवजीका दर्शन न कर सका। भैया बलदेव तथा अन्यान्य वृष्णिवंशके श्रेष्ठ पुरुषोंके भी दर्शनसे वंचित रहा। अतः अब मैं द्वारकापुरीको जाना चाहता हूँ। पुरुषप्रवर! तुम्हें भी मेरे इस यात्रासम्बन्धी प्रस्तावको सहर्ष स्वीकार करना चाहिये

ବାୟୁ କହିଲେ—ହେ କୌରବ, ଅନଘ! ସ୍ୱର୍ଗସମାନ ସୁଖଦ, ରମଣୀୟ ଓ ପବିତ୍ର ଏହି ସଭାସ୍ଥଳମାନେ ତୁମ ସହ ରହି ଅନେକ ଦିନ କଟିଗଲା। ଏତେ ଦିନ ମୁଁ ମୋ ପିତା ଶୂରସେନକୁମାର ବସୁଦେବଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କରିପାରିଲି ନାହିଁ; ନ ଭାଇ ବଳଦେବଙ୍କୁ, ନ ଵୃଷ୍ଣିବଂଶର ଅନ୍ୟ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୀରମାନଙ୍କୁ। ତେଣୁ, ହେ ପୁରୁଷପ୍ରବର! ମୁଁ ଏବେ ଦ୍ୱାରକାନଗରୀକୁ ଯିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି। ମୋର ଏହି ଯାତ୍ରା-ପ୍ରସ୍ତାବକୁ ତୁମେ ହର୍ଷପୂର୍ବକ ଅନୁମୋଦନ କର।

Verse 20

कालो महांस्त्वतीतो मे शूरसूनुमपश्यत: । बलदेवं च कौरव्य तथान्यान्‌ वृष्णिपुज्वान्‌,निष्पाप कुरुनन्दन! इस सभाभवनके रमणीय एवं पवित्र स्थान स्वर्गके समान सुखद हैं। यहाँ तुम्हारे साथ रहते हुए बहुत दिन बीत गये। इतने दिनोंतक मैं अपने पिता शूरसेनकुमार वसुदेवजीका दर्शन न कर सका। भैया बलदेव तथा अन्यान्य वृष्णिवंशके श्रेष्ठ पुरुषोंके भी दर्शनसे वंचित रहा। अतः अब मैं द्वारकापुरीको जाना चाहता हूँ। पुरुषप्रवर! तुम्हें भी मेरे इस यात्रासम्बन्धी प्रस्तावको सहर्ष स्वीकार करना चाहिये

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ହେ କୌରବ! ଶୂରସେନପୁତ୍ର ବସୁଦେବ, ବଳଦେବ ଏବଂ ବୃଷ୍ଣିବଂଶର ଅନ୍ୟ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୀରମାନଙ୍କୁ ଦେଖିନଥାଇ ମୋ ପାଇଁ ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଅତିତ ହୋଇଗଲା। ନିଷ୍ପାପ କୁରୁନନ୍ଦନ! ଏହି ସଭାଭବନ ରମଣୀୟ ଓ ପବିତ୍ର, ସ୍ୱର୍ଗସମ ସୁଖଦ; ତୁମ ସହ ଏଠାରେ ରହି ଅନେକ ଦିନ କଟିଗଲା। ତଥାପି ଏତେ ଦିନରେ ମୁଁ ମୋ ପିତା ଶୂରସେନକୁମାର ବସୁଦେବଙ୍କ ଦର୍ଶନ ପାଇଲି ନାହିଁ; ଭାଇ ବଳଦେବ ଓ ବୃଷ୍ଣିକୁଳର ଅନ୍ୟ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ଦର୍ଶନରୁ ମଧ୍ୟ ବଞ୍ଚିତ ରହିଲି। ତେଣୁ ଏବେ ମୁଁ ଦ୍ୱାରକାନଗରୀକୁ ଯିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି। ପୁରୁଷପ୍ରବର! ମୋର ଏହି ଯାତ୍ରା-ପ୍ରସ୍ତାବକୁ ତୁମେ ମଧ୍ୟ ହର୍ଷରେ ଗ୍ରହଣ କର।

Verse 21

सो हं गन्तुमभीप्सामि पुरी द्वारावतीं प्रति । रोचतां गमनं महां तवापि पुरुषर्षभ,निष्पाप कुरुनन्दन! इस सभाभवनके रमणीय एवं पवित्र स्थान स्वर्गके समान सुखद हैं। यहाँ तुम्हारे साथ रहते हुए बहुत दिन बीत गये। इतने दिनोंतक मैं अपने पिता शूरसेनकुमार वसुदेवजीका दर्शन न कर सका। भैया बलदेव तथा अन्यान्य वृष्णिवंशके श्रेष्ठ पुरुषोंके भी दर्शनसे वंचित रहा। अतः अब मैं द्वारकापुरीको जाना चाहता हूँ। पुरुषप्रवर! तुम्हें भी मेरे इस यात्रासम्बन्धी प्रस्तावको सहर्ष स्वीकार करना चाहिये

ବାୟୁ କହିଲେ—ମୁଁ ଏବେ ଦ୍ୱାରାବତୀ (ଦ୍ୱାରକା) ନଗରୀ ପ୍ରତି ଯିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି। ପୁରୁଷର୍ଷଭ! ଏହି ଗମନ ତୁମକୁ ମଧ୍ୟ ରୁଚୁ। ନିଷ୍ପାପ କୁରୁନନ୍ଦନ! ଏହି ସଭାଭବନ ରମଣୀୟ ଓ ପବିତ୍ର, ସ୍ୱର୍ଗସମ ସୁଖଦ; ତୁମ ସହ ଏଠାରେ ରହି ଅନେକ ଦିନ କଟିଗଲା। ତଥାପି ମୁଁ ପିତା ଶୂରସେନକୁମାର ବସୁଦେବ, ଭାଇ ବଳଦେବ ଓ ବୃଷ୍ଣିକୁଳର ଅନ୍ୟ ଶ୍ରେଷ୍ଠମାନଙ୍କୁ ଦେଖିପାରିଲି ନାହିଁ। ତେଣୁ ଏବେ ମୁଁ ଦ୍ୱାରକାକୁ ଯିବାକୁ ଚାହୁଁଛି; ତୁମେ ମଧ୍ୟ ହର୍ଷରେ ସମ୍ମତି ଦିଅ।

Verse 22

उक्तो बहुविध॑ राजा तत्र तत्र युधिष्ठिर: । सह भीष्मेण यद्‌ युक्तमस्माभि: शोककारिते,शोकावस्थामें मनुष्यका दुःख दूर करनेके लिये उसे जो कुछ उपदेश देना उचित है, वह भीष्मसहित हमलोगोंने विभिन्न स्थानोंमें राजा युधिष्ठिरको दिया है। उन्हें अनेक प्रकारसे समझाया है

ଶୋକାକୁଳ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଦୁଃଖ ଦୂର କରିବା ପାଇଁ ଯେଉଁ ଉପଦେଶ ଯଥୋଚିତ ଥିଲା, ସେହି ଉପଦେଶ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ସହିତ ଆମେ ନାନା ସ୍ଥାନରେ ନାନା ପ୍ରକାରେ ଦେଇଛୁ; ଏବଂ ତାଙ୍କୁ ବହୁ ଭାବେ ବୁଝାଇଛୁ।

Verse 23

शिष्टो युधिष्ठिरो5स्माभि: शास्ता सन्नपि पाण्डव: | तेन तत्‌ तु वचः सम्यग गृहीतं सुमहात्मना

ପାଣ୍ଡବ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ନିଜେ ଶାସକ ଓ ଉପଦେଷ୍ଟା ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶିଷ୍ଟ ଓ ସଂସ୍କାରବାନ; ତେଣୁ ସେହି ମହାତ୍ମା ଆମ ବଚନକୁ ଯଥାଯଥ ଭାବେ ସମ୍ୟକ୍ ଗ୍ରହଣ କଲେ।

Verse 24

यद्यपि पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर हमारे शासक और शिक्षक हैं तो भी हमलोगोंने शिक्षा दी है और जन श्रेष्ठ महात्माने हमारी उन सभी बातोंको भलीभाँति स्वीकार किया है ।। धर्मपुत्रे हि धर्मज्ञे कृतज्ञे सत्यवादिनि । सत्यं धर्मो मतिश्नाग्रया स्थितिश्ष॒ सततं स्थिरा,धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर धर्मज्ञ, कृतज्ञ और सत्यवादी हैं। उनमें सत्य, धर्म, उत्तम बुद्धि तथा ऊँची स्थिति आदि गुण सदा स्थिरभावसे रहते हैं

ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଆମର ଶାସକ ଓ ଗୁରୁ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଆମେ ତାଙ୍କୁ ଉପଦେଶ ଦେଲୁ; ଏବଂ ସେହି ଜନଶ୍ରେଷ୍ଠ ମହାତ୍ମା ଆମ ସମସ୍ତ କଥାକୁ ଯଥାଯଥ ଭାବେ ସମ୍ୟକ୍ ଗ୍ରହଣ କଲେ। କାରଣ ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଧର୍ମଜ୍ଞ, କୃତଜ୍ଞ ଓ ସତ୍ୟବାଦୀ; ତାଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସତ୍ୟ, ଧର୍ମ, ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୁଦ୍ଧି ଓ ଅଚଳ ମର୍ଯ୍ୟାଦା—ଏହି ଗୁଣଗୁଡ଼ିକ ସଦା ଦୃଢ଼ଭାବେ ଅବସ୍ଥିତ।

Verse 25

तत्र गत्वा महात्मानं यदि ते रोचते<र्जुन । अस्मद्गमनसंयुक्तं वचो ब्रूहि जनाधिपम्‌,अर्जुन! यदि तुम उचित समझो तो महात्मा राजा युधिष्ठिरके पास चलकर उनके समक्ष मेरे द्वारका जानेका प्रस्ताव उपस्थित करो

ଅର୍ଜୁନ, ଯଦି ତୋତେ ଭଲ ଲାଗେ, ତେବେ ସେଠାକୁ ଯାଇ ମହାତ୍ମା ଜନାଧିପତି ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ମୋର ଦ୍ୱାରକା-ଗମନ ଅଭିପ୍ରାୟସହିତ ବାର୍ତ୍ତା କହି, ଦ୍ୱାରକାକୁ ଯିବା ମୋର ପ୍ରସ୍ତାବ ଉପସ୍ଥାପନ କର।

Verse 26

न हि तस्याप्रियं कुर्या प्राणत्यागे5प्युपस्थिते । कुतो गन्तुं महाबाहो पुरीं द्वारावतीं प्रति

ପ୍ରାଣତ୍ୟାଗର ମୁହୂର୍ତ୍ତ ଆସିଲେ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ଅପ୍ରିୟ କାମ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ। ହେ ମହାବାହୋ, ତେବେ ତୁମେ ଦ୍ୱାରାବତୀ ପୁରୀ ପ୍ରତି କିପରି ଯିବ?

Verse 27

महाबाहो! मेरे प्राणोंपर संकट आ जाय तब भी मैं धर्मराजका अप्रिय नहीं कर सकता; फिर द्वारका जानेके लिये उनका दिल दुखाऊँ, यह तो हो ही कैसे सकता है? ।। सर्व त्विदमहं पार्थ त्वत्प्रीतिहितकाम्यया । ब्रवीमि सत्यं कौरव्य न मिथ्यैतत्‌ कथंचन,कुरुनन्दन! कुन्तीकुमार! मैं सच्ची बात बता रहा हूँ, मैंने जो कुछ किया या कहा है, वह सब तुम्हारी प्रसन्नताके लिये और तुम्हारे ही हितकी दृष्टिसे किया है। यह किसी तरह मिथ्या नहीं है

ହେ ମହାବାହୋ! ମୋ ପ୍ରାଣ ଉପରେ ସଙ୍କଟ ଆସିଲେ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଅପ୍ରିୟ କରିପାରିବି ନାହିଁ। ତେବେ କେବଳ ଦ୍ୱାରକାକୁ ଯିବା ପାଇଁ ମୁଁ ତାଙ୍କ ହୃଦୟକୁ କିପରି ବ୍ୟଥିତ କରିବି? ହେ ପାର୍ଥ, ହେ କୌରବ୍ୟ! ମୁଁ ସତ୍ୟ କହୁଛି—ମୁଁ ଯାହା କହୁଛି, ସେ ସବୁ ତୋର ପ୍ରୀତି ଓ ହିତ କାମନାରୁ; ଏହା କେବେ ମିଥ୍ୟା ନୁହେଁ।

Verse 28

प्रयोजन च निर्वत्तमिह वासे ममार्जुन । धार्तराष्ट्रो हतो राजा सबल: सपदानुग:,अर्जुन! यहाँ मेरे रहनेका जो प्रयोजन था, वह पूरा हो गया है। धृतराष्ट्रका पुत्र राजा दुर्योधन अपनी सेना और सेवकोंके साथ मारा गया

ଅର୍ଜୁନ! ଏଠାରେ ମୋର ବାସର ଯେ ପ୍ରୟୋଜନ ଥିଲା, ସେ ଏବେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇଗଲା। ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ନିଜ ସେନା ଓ ଅନୁଚରମାନଙ୍କ ସହିତ ହତ ହୋଇଛି।

Verse 29

पृथिवी च वशे तात धर्मपुत्रस्य धीमत: । स्थिता समुद्रवलया सशैलवनकानना

ତାତ! ସମୁଦ୍ର-ବଳୟରେ ଘେରା, ପର୍ବତ-ବନ-କାନନ ସହିତ ଏହି ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀ ବୁଦ୍ଧିମାନ ଧର୍ମପୁତ୍ରଙ୍କ ବଶରେ ଅବସ୍ଥିତ।

Verse 30

धर्मेण राजा धर्मज्ञ: पातु सर्वा वसुन्धराम्‌,भरतश्रेष्ठ! बहुत-से सिद्ध महात्माओंके संगसे सुशोभित तथा वन्दीजनोंके द्वारा सदा ही प्रशंसित होते हुए धर्मज्ञ राजा युधिष्ठिर अब धर्मपूर्वक सारी पृथ्वीका पालन करें

ଧର୍ମଜ୍ଞ ରାଜା ଧର୍ମଦ୍ୱାରା ସମଗ୍ର ବସୁନ୍ଧରାକୁ ରକ୍ଷା କରୁନ୍ତୁ। ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଅନେକ ସିଦ୍ଧ ମହାତ୍ମାଙ୍କ ସଙ୍ଗରେ ଶୋଭିତ ଏବଂ ବନ୍ଦୀଜନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସଦା ପ୍ରଶଂସିତ ଧର୍ମଜ୍ଞ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଏବେ ଧର୍ମପୂର୍ବକ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ପାଳନ କରୁନ୍ତୁ।

Verse 31

उपास्यमानो बहुभि: सिद्धैश्चवापि महात्मभि: । स्तूयमानश्न सततं वन्दिभिर्भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! बहुत-से सिद्ध महात्माओंके संगसे सुशोभित तथा वन्दीजनोंके द्वारा सदा ही प्रशंसित होते हुए धर्मज्ञ राजा युधिष्ठिर अब धर्मपूर्वक सारी पृथ्वीका पालन करें

ହେ ଭରତବୃଷଭ! ଅନେକ ସିଦ୍ଧ ଓ ମହାତ୍ମାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଉପାସିତ ଏବଂ ବନ୍ଦୀଜନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସଦା ସ୍ତୁତ ଧର୍ମଜ୍ଞ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଏବେ ଧର୍ମପୂର୍ବକ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ପାଳନ କରୁନ୍ତୁ।

Verse 32

त॑ मया सह गत्वाद्य राजानं कुरु वर्धनम्‌ | आपूृच्छ कुरुशार्दूल गमन द्वारकां प्रति,कुरुश्रेष्ठ॒ अब तुम मेरे साथ चलकर राजाको बधाई दो और मेरे द्वारका जानेके विषयमें उनसे पूछकर आज्ञा दिला दो

ଆଜି ତୁମେ ମୋ ସହ ଯାଇ କୁରୁବଂଶ-ବର୍ଧକ ରାଜାଙ୍କୁ ଅଭିନନ୍ଦନ ଜଣାଅ। ତାପରେ, ହେ କୁରୁଶାର୍ଦ୍ଦୂଳ! ଦ୍ୱାରକାକୁ ଯିବା ପାଇଁ ତାଙ୍କଠାରୁ ବିଦାୟ ମାଗି ମୋ ଯାତ୍ରାର ଅନୁମତି ଆଣିଦିଅ।

Verse 33

इदं शरीरं वसु यच्च मे गृहे निवेदितं पार्थ सदा युधिष्ठिरे । प्रियश्न मान्यश्न हि मे युधिष्ठिर: सदा कुरूणामधिपो महामति:,पार्थ! मेरे घरमें जो कुछ धन-सम्पत्ति है, वह और मेरा यह शरीर सदा धर्मराज युधिष्ठिरकी सेवामें समर्पित है। परम बुद्धिमान्‌ कुरुराज युधिष्छिर सर्वदा मेरे प्रिय और माननीय हैं

ହେ ପାର୍ଥ! ମୋର ଏହି ଶରୀର ଓ ମୋ ଘରରେ ଥିବା ସମସ୍ତ ଧନ-ସମ୍ପତ୍ତି ସଦା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସେବାରେ ନିବେଦିତ। କୁରୁମାନଙ୍କ ମହାମତି ଅଧିପତି ଯୁଧିଷ୍ଠିର ମୋ ପାଇଁ ସଦା ପ୍ରିୟ ଓ ପୂଜ୍ୟ।

Verse 34

प्रयोजनं चापि निवासकारणे न विद्यते मे त्वदृते नृपात्मज । स्थिता हि पृथ्वी तव पार्थ शासने गुरो: सुवृत्तस्य युधिष्ठिरस्य च,राजकुमार! अब तुम्हारे साथ मन बहलानेके सिवा यहाँ मेरे रहनेका और कोई प्रयोजन नहीं रह गया है। पार्थ! यह सारी पृथ्वी तुम्हारे और सदाचारी गुरु युधिष्ठिरके शासनमें पूर्णतः: स्थित है

ହେ ରାଜକୁମାର! ତୁମ ସହ ସଙ୍ଗ ଦେବା ଛଡ଼ା ଏଠାରେ ମୋ ରହିବାର ଅନ୍ୟ କୌଣସି ପ୍ରୟୋଜନ ନାହିଁ। ହେ ପାର୍ଥ! ଏହି ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀ ତୁମ ଶାସନରେ ଏବଂ ସୁବୃତ୍ତ ଗୁରୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଶାସନରେ ଦୃଢ଼ଭାବେ ସ୍ଥିତ।

Verse 35

इतीदमुक्त: स तदा महात्मना जनार्दनेनामितविक्रमो<र्जुन: । तथेति दुःखादिव वाक्यमैरय- ज्जनार्दन॑ सम्प्रतिपूज्य पार्थिव,पृथ्वीनाथ! उस समय महात्मा भगवान्‌ श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर अमित पराक्रमी अर्जुनने उनकी बातका आदर करते हुए बड़े दुःखके साथ “तथास्तु” कहकर उनके जानेका प्रस्ताव स्वीकार किया

ମହାତ୍ମା ଜନାର୍ଦ୍ଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଏପରି କହିବା ପରେ, ଅମିତ ପରାକ୍ରମୀ ଅର୍ଜୁନ ତାଙ୍କ ବଚନକୁ ସମ୍ମାନ କରି, ଦୁଃଖରେ ଭାରାକ୍ରାନ୍ତ ହୋଇଥିବା ପରି ‘ତଥାସ୍ତୁ’ କହି ତାଙ୍କ ପ୍ରସ୍ଥାନ ପ୍ରସ୍ତାବକୁ ଗ୍ରହଣ କଲା। ପରେ ଜନାର୍ଦ୍ଦନଙ୍କୁ ଯଥାବିଧି ପ୍ରଣାମ କରି ପୃଥାପୁତ୍ର ପାର୍ଥ ତାଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ମାନିଲା।

Verse 296

चिता रल्नैर्बहुविधे: कुरुराजस्य पाण्डव । तात! पाण्डुनन्दन! नाना प्रकारके रत्नोंके संचयसे सम्पन्न, समुद्रसे घिरी हुई, पर्वत, वन और काननोंसहित यह सारी पृथ्वी भी बुद्धिमान्‌ धर्मपुत्र कुरुराज युधिष्ठिरके अधीन हो गयी

ବାୟୁ କହିଲେ—ହେ ପାଣ୍ଡବ, ତାତ! ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ! ନାନାପ୍ରକାର ରତ୍ନସଞ୍ଚୟରେ ସମୃଦ୍ଧ, ସମୁଦ୍ରଦ୍ୱାରା ପରିବେଷ୍ଟିତ, ପର୍ବତ-ବନ-କାନନ ସହିତ ଏହି ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀ ବୁଦ୍ଧିମାନ ଧର୍ମପୁତ୍ର କୁରୁରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଅଧୀନକୁ ଆସିଛି।

Frequently Asked Questions

How to balance personal bonds and obligations (Kṛṣṇa’s return to his own polity and kin) with loyalty to the newly established sovereign order—resolved through seeking formal leave and prioritizing institutional propriety.

Narrative and reasoned speech can function as ethical therapy: grief is not denied but redirected toward dharmic responsibility, recognition of achieved stability, and disciplined action within rightful authority.

No explicit phalaśruti is stated in this passage; the meta-function is practical—establishing post-war legitimacy and modeling counsel as a stabilizing instrument within the epic’s governance arc.