
Phala of Vrata, Niyama, Svādhyāya, Dama, Satya, Brahmacarya, and Service (व्रत-नियम-स्वाध्याय-दम-सत्य-ब्रह्मचर्य-शुश्रूषा-फलप्रश्नः)
Upa-parva: Dharma-Phala Praśna–Uttara (Inquiry into the Fruits of Vows, Discipline, Truth, and Service)
Yudhiṣṭhira opens with a structured inquiry into comparative phala: the outcomes of vows, disciplines, self-study, restraint, Vedic memorization and teaching, giving without receiving, courageous adherence to one’s duty, truthfulness, celibate conduct, and service to parents and teachers. Bhīṣma replies in a sequence that blends pragmatic and soteriological registers. He states that properly undertaken vows yield enduring “worlds” (sanātanāḥ lokāḥ). Niyama bears visible results in the present life, implicitly validated by Yudhiṣṭhira’s own attainments. Svādhyāya yields benefit both here and beyond, culminating in joy in brahmaloka. Dama is elaborated as a superior preservative of merit: the self-controlled are content and effective, obtaining aims without the corrosive effects of anger; anger is said to destroy the value of giving, hence restraint surpasses gift-making when gifts are tainted by hostility. Teaching (adhyāpana) is described as producing imperishable fruit, aligned with correct ritual procedure. The chapter broadens to enumerate multiple modes of “heroism” (śaurya) including sacrifice, truth, discipline, giving, intellect, forgiveness, simplicity, tranquility, study, teaching, and service—each leading to elevated destinations through one’s own karmic fruit. A culminating valuation compares truth with large-scale ritual (aśvamedha), declaring truth superior and cosmically foundational: the sun, fire, wind, and social-religious satisfaction of gods, ancestors, and Brahmins are all grounded in satya. Finally, brahmacarya is praised as a purifier that burns sins, with exemplary ascetic potency; service to parents, guru, and ācārya is affirmed as leading to an excellent station in heaven and avoidance of naraka.
Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं—दानधर्म के विषय में एक प्राचीन इतिहास सुनो: उद्दालक ऋषि और उनके पुत्र नाचिकेत के प्रसंग में स्वयं धर्मराज (यम) के वचन हैं। → उद्दालक यज्ञ-दीक्षा लेकर पुत्र को सेवा-नियम, स्वाध्याय और शुद्ध आचरण में लगाते हैं। कथा का दबाव इस ओर बढ़ता है कि दान केवल ‘देना’ नहीं, बल्कि पात्र-देश-काल, शुद्धता और न्यायार्जित धन से जुड़ा कठोर अनुशासन है; अभाव की स्थिति में कौन-सा दान कैसे किया जाए—यह प्रश्न तीखा होता जाता है। → धर्मराज के निर्णायक उपदेश: ‘धर्म को तुच्छ न समझो; पात्र में, देश-काल के अनुरूप, शुद्ध और न्याय से प्राप्त वस्तु का दान करो; विशेषतः गौ-दान नित्य करो—इसमें संशय न रखो।’ साथ ही अभाव में विकल्प-दान (घृत न हो तो तिलधेनु, तिल न हो तो जलधेनु) का फल-श्रुति देकर दान-मार्ग को अडिग बनाते हैं। → उपदेश का निष्कर्ष स्पष्ट होता है—दान का मूल्य वस्तु की मात्रा से नहीं, शुद्धता, न्यायार्जन, नियमनिष्ठा और विवेकपूर्ण पात्र-चयन से है। वक्ता (कथानक का ‘मैं’) धर्मराज को प्रणाम कर उनकी अनुमति से लौटकर गुरु/भगवत्पाद के चरणों में उपस्थित होता है, और भीष्म इस उपाख्यान को युधिष्ठिर के लिए दानधर्म की कसौटी बना देते हैं।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें नृगका उपाख्यानविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ७० ॥। अपन क्रात छा अर: एकसप्ततितमो<् ध्याय: पिताके शापसे नाचिकेतका यमराजके पास जाना और यमराजका नाचिकेतको गोदानकी महिमा बताना युधिछिर उवाच दत्तानां फलसम्प्राप्तिं गवां प्रब्रूहि मेडनघ । विस्तरेण महाबाहो न हि तृप्पामि कथ्यताम्,युधिष्ठिरने पूछा--निष्पाप महाबाहो! गौओंके दानसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह मुझे विस्तारके साथ बताइये। मुझे आपके वचनामृतोंको सुनते-सुनते तृप्ति नहीं होती है, इसलिये अभी और कहिये
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ନିଷ୍ପାପ, ହେ ମହାବାହୋ! ଗୋଦାନ କଲେ ଯେଉଁ ଫଳ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ, ତାହା ମୋତେ ବିସ୍ତାରରେ କହ। ଶୁଣିଲେ ମଧ୍ୟ ମୋର ତୃପ୍ତି ହୁଏ ନାହିଁ; ତେଣୁ ଆଉ କହ।
Verse 2
भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । ऋषेरुद्दालकेर्वाक्यं नाचिकेतस्य चो भयो:,भीष्मजीने कहा--राजन्! इस विषयमें विज्ञ पुरुष उद्दालक ऋषि और नाचिकेत दोनोंके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ରାଜନ୍! ଏହି ବିଷୟରେ ମଧ୍ୟ ପଣ୍ଡିତମାନେ ଏକ ପୁରାତନ ଇତିହାସକୁ ଉଦାହରଣ ଭାବେ ଉଦ୍ଧୃତ କରନ୍ତି—ଋଷି ଉଦ୍ଦାଲକ ଓ ନାଚିକେତ, ଉଭୟଙ୍କ ବାକ୍ୟସମ୍ପନ୍ନ ସେହି ସଂବାଦ।
Verse 3
ऋषिरुद्दालकिर्दीक्षामुपगम्य तत: सुतम् । त्वं मामुपचरस्वेति नाचिकेतमभाषत,एक समय उद्दालक ऋषिने यज्ञकी दीक्षा लेकर अपने पुत्र नाचिकेतसे कहा--“तुम मेरी सेवामें रहो।”
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଏକ ସମୟରେ ଋଷି ଉଦ୍ଦାଲକ ଯଜ୍ଞଦୀକ୍ଷା ଗ୍ରହଣ କରି, ପରେ ନିଜ ପୁତ୍ର ନାଚିକେତକୁ କହିଲେ—“ତୁମେ ମୋର ସେବା କର; ମୋ ପାଖରେ ରୁହ।”
Verse 4
समाप्ते नियमे तस्मिन् महर्षि: पुत्रमब्रवीत् | उपस्पर्शनसक्तस्य स्वाध्यायाभिरतस्य च,उस यज्ञका नियम पूरा हो जानेपर महर्षिने अपने पुत्रसे कहा--“बेटा! मैंने समिधा, कुशा, फूल, जलका घड़ा और प्रचुर भोजन-सामग्री (फल-फूल आदि)--इन सबका संग्रह करके नदीके किनारे रख दिया और स्नान तथा वेदपाठ करने लगा। फिर उन सब वस्तुओंको भूलकर मैं यहाँ चला आया। अब तुम जाकर नदीतटसे वह सब सामान यहाँ ले आओ'
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ସେହି ନିୟମ ସମାପ୍ତ ହେବା ପରେ ମହର୍ଷି ପୁତ୍ରକୁ କହିଲେ—“ବତ୍ସ! ମୁଁ ସ୍ନାନ-ଆଚମନରେ ଲଗ୍ନ ଓ ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟରେ ନିମଗ୍ନ ଥିବାବେଳେ ସମିଧା, କୁଶ, ପୁଷ୍ପ, ଜଳକୁମ୍ଭ ଏବଂ ପ୍ରଚୁର ଭୋଜନସାମଗ୍ରୀ ନଦୀତୀରେ ରଖିଥିଲି। ପରେ ସେସବୁକୁ ଭୁଲି ମୁଁ ଏଠାକୁ ଆସିଗଲି। ଏବେ ତୁମେ ସେଠାକୁ ଯାଇ ନଦୀତୀରରୁ ସେ ସମସ୍ତ ସାମଗ୍ରୀ ନେଇ ଆସ।”
Verse 5
इध्मा दर्भा: सुमनस: कलशश्लातिभोजनम् | विस्मृतं मे तदादाय नदीतीरादिहाव्रज,उस यज्ञका नियम पूरा हो जानेपर महर्षिने अपने पुत्रसे कहा--“बेटा! मैंने समिधा, कुशा, फूल, जलका घड़ा और प्रचुर भोजन-सामग्री (फल-फूल आदि)--इन सबका संग्रह करके नदीके किनारे रख दिया और स्नान तथा वेदपाठ करने लगा। फिर उन सब वस्तुओंको भूलकर मैं यहाँ चला आया। अब तुम जाकर नदीतटसे वह सब सामान यहाँ ले आओ'
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— “ଯଜ୍ଞ ପାଇଁ ସମିଧା, ଦର୍ଭାକୁଶ, ପୁଷ୍ପ, ଜଳକଳଶ ଓ ପ୍ରଚୁର ଭୋଜନସାମଗ୍ରୀ—ଏ ସବୁ ମୁଁ ସଂଗ୍ରହ କରି ନଦୀତଟରେ ରଖିଥିଲି ଏବଂ ସ୍ନାନ ଓ ବେଦପାଠ କରିବାକୁ ଗଲି। ସେଗୁଡ଼ିକୁ ଭୁଲି ମୁଁ ଏଠାକୁ ଫେରିଆସିଛି। ଏବେ ତୁମେ ନଦୀକୂଳକୁ ଯାଇ ସେ ସବୁ ଜିନିଷ ନେଇ ଏଠାକୁ ଆଣ।”
Verse 6
गत्वानवाप्य तत् सर्व नदीवेगसमाप्लुतम् | न पश्यामि तदित्येवं पितरं सोडब्रवीन्मुनि:,नाचिकेत जब वहाँ गया, तब उसे कुछ न मिला। सारा सामान नदीके वेगमें बह गया था। नाचिकेत मुनि लौट आया और पितासे बोला--'मुझे तो वहाँ वह सब सामान नहीं दिखायी दिया”
ସେ ଯାଇ ଦେଖିଲା—କିଛି ମଧ୍ୟ ମିଳିଲା ନାହିଁ; ନଦୀର ପ୍ରବଳ ବେଗରେ ସବୁ ଭାସି ଯାଇଥିଲା। ମୁନି ଫେରି ଆସି ପିତାଙ୍କୁ କହିଲା— “ମୁଁ ସେଠାରେ ସେ ସବୁ ଦେଖୁନାହିଁ।”
Verse 7
क्षुत्पिपासाश्रमाविष्टो मुनिरुद्दा लकिस्तदा । यम॑ पश्येति त॑ पुत्रमशपत् स महातपा:,महातपस्वी उद्दालक मुनि उस समय भूख-प्याससे कष्ट पा रहे थे, अतः रुष्ट होकर बोले--'अरे वह सब तुम्हें क्यों दिखायी देगा? जाओ यमराजको देखो।” इस प्रकार उन्होंने उसे शाप दे दिया
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— ସେ ସମୟରେ ମହାତପସ୍ବୀ ଉଦ୍ଦାଳକ ମୁନି ଭୁଖ, ପିଆସ ଓ ଶ୍ରମରେ ଆକ୍ରାନ୍ତ ଥିଲେ। କ୍ରୋଧିତ ହୋଇ ପୁତ୍ରକୁ ଶାପ ଦେଇ କହିଲେ— “ସେ ସବୁ ତୁମକୁ କାହିଁକି ଦେଖାଯିବ? ଯାଅ, ଯମଙ୍କୁ ଦେଖ।”
Verse 8
तथा स पित्राभिहतो वाग्वज्रेण कृताञज्जलि: । प्रसीदेति ब्रुवन्नेव गतसत्त्वोडपतद् भुवि,पिताके वाग्वज़्से पीड़ित हुआ नाचिकेत हाथ जोड़कर बोला--'प्रभो! प्रसन्न होइये।' इतना ही कहते-कहते वह निष्प्राण होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा
ପିତାଙ୍କ ବଜ୍ରସମ ବାକ୍ୟରେ ଆହତ ହୋଇ ସେ ହାତ ଯୋଡ଼ି କହିଲା— “ପ୍ରଭୋ, ପ୍ରସନ୍ନ ହୁଅନ୍ତୁ।” ଏତିକି କହୁ କହୁ ତାହାର ପ୍ରାଣଶକ୍ତି ନିଶ୍ଶେଷ ହୋଇ ସେ ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଗଲା।
Verse 9
नाचिकेतं पिता दृष्टवा पतितं दुःखमूर्च्छित: । कि मया कृतमित्युक्त्वा निपषात महीतले,नाचिकेतको गिरा देख उसके पिता भी दु:खसे मूर्च्छित हो गये और “अरे, यह मैंने क्या कर डाला!” ऐसा कहकर पृथ्वीपर गिर पड़े
ନାଚିକେତ ପଡ଼ିଥିବାକୁ ଦେଖି ତାଙ୍କ ପିତା ମଧ୍ୟ ଦୁଃଖରେ ମୂର୍ଛିତ ହୋଇ— “ହାୟ! ମୁଁ କ’ଣ କରିଦେଲି!” ବୋଲି କହି ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଗଲେ।
Verse 10
तस्य दुःखपरीतस्य स्वं पुत्रमनुशोचत: । व्यतीतं तदहःशेषं सा चोग्रा तत्र शर्वरी,दुःखमें डूबे और बारंबार अपने पुत्रके लिये शोक करते हुए ही महर्षिका वह शेष दिन व्यतीत हो गया और भयानक रात्रि भी आकर समाप्त हो गयी
ଦୁଃଖରେ ଆବୃତ ହୋଇ ନିଜ ପୁତ୍ର ପାଇଁ ପୁନଃପୁନଃ ଶୋକ କରୁଥିବା ସେ ମହର୍ଷିଙ୍କର ସେ ଦିନର ଅବଶିଷ୍ଟ ଭାଗ ବିତିଗଲା; ଏବଂ ସେଠାରେ ସେ ଭୟଙ୍କର ରାତି ମଧ୍ୟ ଆସି ଅତୀତ ହୋଇଗଲା।
Verse 11
पित्र्येणा श्रुप्रषातेन नाचिकेत: कुरूद्गवह । प्रास्पन्दच्छयने कौश्ये वृष्टया सस्यमिवाप्लुतम्,कुरुश्रेष्ठ! कुशकी चटाईपर पड़ा हुआ नाचिकेत पिताके आँसुओंकी धारासे भीगकर कुछ हिलने-डुलने लगा, मानो वर्षसे सिंचकर अनाजकी सूखी खेती हरी हो गयी हो
କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ! କୁଶର ଚଟାଇ ଉପରେ ପଡ଼ିଥିବା ନାଚିକେତ ପିତାଙ୍କ ଅଶ୍ରୁଧାରାରେ ଭିଜି ଅଳ୍ପ କମ୍ପିତ ହେବାକୁ ଲାଗିଲା—ଯେପରି ବର୍ଷାଜଳରେ ସିଞ୍ଚିତ ହୋଇ ଶୁଷ୍କ ଶସ୍ୟକ୍ଷେତ୍ର ପୁନଃ ସଜୀବ ହୋଇଉଠେ।
Verse 12
स पर्यपृच्छत् त॑ पुत्र क्षीणं पर्यागतं पुन: । दिव्यैर्गन्धै: समादिग्ध॑ क्षीणस्वप्नमिवोत्थितम्,महर्षिका वह पुत्र मरकर पुन: लौट आया, मानो नींद टूट जानेसे जाग उठा हो। उसका शरीर दिव्य सुगन्धसे व्याप्त हो रहा था। उस समय उद्दालकने उससे पूछा--
ମହର୍ଷିଙ୍କ ସେ ପୁତ୍ର ମରି ପୁନଃ ଫେରିଆସିଲା—ଯେପରି ନିଦ୍ରା ଭଙ୍ଗ ହେଲେ ଜାଗିଉଠେ। ତାହାର ଶରୀର ଦିବ୍ୟ ସୁଗନ୍ଧରେ ବ୍ୟାପ୍ତ ଥିଲା। ସେତେବେଳେ ଉଦ୍ଦାଲକ ତାକୁ ପଚାରିଲେ—
Verse 13
अपि पुत्र जिता लोका: शुभास्ते स्वेन कर्मणा | दिष्ट्या चासि पुन: प्राप्तो न हि ते मानुषं वपु:,बेटा! क्या तुमने अपने कर्मसे शुभ लोकोंपर विजय पायी है? मेरे सौभाग्यसे ही तुम पुनः यहाँ चले आये हो। तुम्हारा यह शरीर मनुष्योंका-सा नहीं है--दिव्य भावको प्राप्त हो गया है”
ପୁତ୍ର! ତୁମେ ନିଜ କର୍ମଦ୍ୱାରା ଶୁଭ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଜୟ କରିଛ କି? ମୋର ସୌଭାଗ୍ୟରେ ତୁମେ ପୁନଃ ଏଠାକୁ ଆସିଛ। ତୁମର ଏହି ଦେହ ମାନବଦେହ ପରି ନୁହେଁ—ଏହା ଦିବ୍ୟଭାବକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୋଇଛି।
Verse 14
प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य पित्रा पृष्टो महात्मना । सतां वार्ता पितुर्मध्ये महर्षीणां न्यवेदयत्,अपने महात्मा पिताके इस प्रकार पूछनेपर परलोककी सब बातोंको प्रत्यक्ष देखनेवाला नाचिकेत महर्षियोंके बीचमें पितासे वहाँका सब वृत्तान्त निवेदन करने लगा--
ମହାତ୍ମା ପିତା ଏପରି ପଚାରିବାରୁ, ପରଲୋକର ସମସ୍ତ କଥା ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦେଖିଥିବା ନାଚିକେତ ମହର୍ଷିମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ନିଜ ପିତାଙ୍କୁ ସେଠାର ସମସ୍ତ ବୃତ୍ତାନ୍ତ ନିବେଦନ କରିବାକୁ ଲାଗିଲା।
Verse 15
कुर्वन् भवच्छासनमाशु यातो हाहं विशालां रुचिरप्रभावाम् | वैवस्वतीं प्राप्प सभामपश्यं सहस्रशो योजनहेमभासम्,“पिताजी! मैं आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये यहाँसे तुरन्त प्रस्थित हुआ और मनोहर कान्ति एवं प्रभावसे युक्त विशाल यमपुरीमें पहुँचकर मैंने वहाँकी सभा देखी, जो सुवर्णके समान सुन्दर प्रभासे प्रकाशित हो रही थी। उसका तेज सहस्रों योजन दूरतक फैला हुआ था
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— “ଆପଣଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ପାଳନ କରି ମୁଁ ତୁରନ୍ତ ଯାତ୍ରା କଲି। କାନ୍ତି ଓ ପ୍ରଭାବରେ ମନୋହର ସେଇ ବିଶାଳ ଯମପୁରୀକୁ ପହଞ୍ଚି, ମୁଁ ବୈବସ୍ୱତ ଯମଙ୍କ ସଭା ଦେଖିଲି; ସେହି ସଭା ସୁବର୍ଣ୍ଣସଦୃଶ ପ୍ରଭାରେ ଦୀପ୍ତ ଥିଲା ଏବଂ ତାହାର ତେଜ ସହସ୍ର ଯୋଜନ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସାରିତ ଥିଲା।”
Verse 16
दृष्टवैव मामभिमुखमापततन्तं देहीति स ह्वासनमादिदेश । वैवस्वतोडर्घ्यादिभिरह णैश्ष भवत्कृते पूजयामास मां सः:,“मुझे सामनेसे आते देख विवस्वानके पुत्र यमने अपने सेवकोंको आज्ञा दी कि “इनके लिये आसन दो।” उन्होंने आपके नाते अर्घ्य आदि पूजनसम्बन्धी उपचारोंसे स्वयं ही मेरा पूजन किया
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— “ମୋତେ ସମ୍ମୁଖରୁ ଆସୁଥିବା ଦେଖି ବିବସ୍ୱାନଙ୍କ ପୁତ୍ର ବୈବସ୍ୱତ ଯମ ସେବକମାନଙ୍କୁ ଆଜ୍ଞା ଦେଲେ—‘ଏହାଙ୍କୁ ଆସନ ଦିଅ।’ ପରେ ଆପଣଙ୍କ ଗୌରବରେ ସେ ନିଜେ ଅର୍ଘ୍ୟ ଆଦି ଆତିଥ୍ୟ-ବିଧିରେ ମୋତେ ସମ୍ମାନ କଲେ।”
Verse 17
ततस्त्वहं तं शनकैरवोचं वृतः सदस्यैरभिपूज्यमान: । प्राप्तो5स्मि ते विषयं धर्मराज लोकानहों यानहं तान् विधत्स्व,“तब सब सदस्योंसे घिरकर उनके द्वारा पूजित होते हुए मैंने वैवस्वत यमसे धीरेसे कहा --'धर्मराज! मैं आपके राज्यमें आया हूँ; मैं जिन लोकोंमें जानेके योग्य होऊँ, उनमें जानेके लिये मुझे आज्ञा दीजिये"
ତାପରେ ସଭାସଦମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଘିରି ତାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସମ୍ମାନିତ ହୋଇ ମୁଁ ଧୀରେ ବୈବସ୍ୱତ ଯମଙ୍କୁ କହିଲି— “ଧର୍ମରାଜ! ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ରାଜ୍ୟକୁ ଆସିଛି; ଯେଉଁ ଲୋକମାନେ ଯିବାକୁ ମୁଁ ଯୋଗ୍ୟ, ସେଠାକୁ ଯିବା ପାଇଁ ମୋତେ ନିୟୋଜିତ କରନ୍ତୁ।”
Verse 18
यमोडब्रवीन्मां न मृतोडसि सौम्य यम॑ पश्येत्याह स त्वां तपस्वी । पिता प्रदीप्ताग्निसमानतेजा न तच्छक्यमनृतं विप्र कर्तुम्,“तब यमराजने मुझसे कहा--“सौम्य! तुम मरे नहीं हो। तुम्हारे तपस्वी पिताने इतना ही कहा था कि तुम यमराजको देखो। विप्रवर! वे तुम्हारे पिता प्रजजलित अग्निके समान तेजस्वी हैं। उनकी बात झूठी नहीं की जा सकती
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— ତେବେ ଯମରାଜ ମୋତେ କହିଲେ— “ସୌମ୍ୟ! ତୁମେ ମୃତ ନୁହଁ। ତୁମ ତପସ୍ୱୀ ପିତା କେବଳ ‘ଯମଙ୍କୁ ଦେଖ’ ବୋଲି କହିଥିଲେ। ହେ ବିପ୍ର! ତୁମ ପିତା ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ ଅଗ୍ନି ସମାନ ତେଜସ୍ୱୀ; ତାଙ୍କ ବଚନକୁ ଅସତ୍ୟ କରାଯାଇପାରେ ନାହିଁ।”
Verse 19
दृष्टस्ते5हं प्रतिगच्छस्व तात शोचत्यसौ तव देहस्य कर्ता । ददानि कि चापि मन:प्रणीत॑ प्रियातिथेस्तव कामान् वृणीष्व,“तात! तुमने मुझे देख लिया। अब तुम लौट जाओ। तुम्हारे शरीरका निर्माण करनेवाले वे तुम्हारे पिताजी शोकमग्न हो रहे हैं। वत्स! तुम मेरे प्रिय अतिथि हो। तुम्हारा कौन-सा मनोरथ मैं पूर्ण करूँ। तुम्हारी जिस-जिस वस्तुके लिये इच्छा हो, उसे माँग लो”
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ— “ତାତ! ତୁମେ ମୋତେ ଦେଖିଲ; ଏବେ ଫେରିଯାଅ। ତୁମ ଦେହର ନିର୍ମାତା ତୁମ ପିତା ଶୋକରେ ମଗ୍ନ। ବତ୍ସ! ତୁମେ ମୋର ପ୍ରିୟ ଅତିଥି; ମନରେ ଯେଉଁ ଯେଉଁ କାମନା ଅଛି, ସେଗୁଡ଼ିକୁ ଚୟନ କର—ତୁମେ ଯାହା ଚାହିବ, ମୁଁ ଦେବି।”
Verse 20
तेनैवमुक्तस्तमहं प्रत्यवोचं प्राप्तोडस्मि ते विषयं दुर्निवर्त्यम् । इच्छाम्यहं पुण्यकृतां समृद्धान् लोकान द्रष्ठ॑ यदि ते5हं वराह:,“उनके ऐसा कहनेपर मैंने इस प्रकार उत्तर दिया--“भगवन्! मैं आपके उस राज्यमें आ गया हूँ, जहाँसे लौटकर जाना अत्यन्त कठिन है। यदि मैं आपकी दृष्टिमें वर पानेके योग्य होऊँ तो पुण्यात्मा पुरुषोंको मिलनेवाले समृद्धिशाली लोकोंका मैं दर्शन करना चाहता हूँ!
ସେ ଏପରି କହିଲେ ମୁଁ ପ୍ରତ୍ୟୁତ୍ତର ଦେଲି—“ଭଗବନ୍! ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ସେହି ରାଜ୍ୟରେ ପ୍ରବେଶ କରିଛି, ଯେଉଁଠାରୁ ଫେରିବା ଅତ୍ୟନ୍ତ କଠିନ। ଯଦି ଆପଣଙ୍କ ଦୃଷ୍ଟିରେ ମୁଁ ବର ପାଇବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ, ତେବେ ପୁଣ୍ୟକର୍ମ କରିଥିବାମାନେ ପ୍ରାପ୍ତ କରୁଥିବା ସମୃଦ୍ଧ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ମୁଁ ଦେଖିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି।”
Verse 21
यान॑ समारोप्य तु मां स देवो वाहैर्युक्त सुप्रभं भानुमत् तत् । संदर्शयामास तदात्मलोकान् सर्वास्तथा पुण्यकृतां द्विजेन्द्र,द्विजेन्द्र! तब यम देवताने वाहनोंसे जुते हुए उत्तम प्रकाशसे युक्त तेजस्वी रथपर मुझे बिठाकर पुण्यात्माओंको प्राप्त होनेवाले अपने यहाँके सभी लोकोंका मुझे दर्शन कराया
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—“ଦ୍ୱିଜେନ୍ଦ୍ର! ତାପରେ ଯମଦେବ ଅଶ୍ୱଯୁକ୍ତ, ଉତ୍ତମ ପ୍ରଭାରେ ଦୀପ୍ତ, ସୂର୍ଯ୍ୟସମ ତେଜସ୍ବୀ ରଥରେ ମୋତେ ବସାଇ, ପୁଣ୍ୟକର୍ମ କରିଥିବାମାନେ ପ୍ରାପ୍ତ କରୁଥିବା ନିଜର ସମସ୍ତ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ମୋତେ ଦର୍ଶନ କରାଇଲେ।”
Verse 22
अपश्यं तत्र वेश्मानि तैजसानि महात्मनाम् । नानासंस्थानरूपाणि सर्वरत्नमयानि च,“तब मैंने महामनस्वी पुरुषोंको प्राप्त होनेवाले वहाँके तेजोमय भवनोंका दर्शन किया। उनके रूप-रंग और आकार-प्रकार अनेक तरहके थे। उन भवनोंका सब प्रकारके रत्नोंद्वारा निर्माण किया गया था
ସେଠାରେ ମୁଁ ମହାତ୍ମାମାନଙ୍କୁ ପ୍ରାପ୍ତ ତେଜୋମୟ ଭବନମାନଙ୍କୁ ଦେଖିଲି; ସେମାନଙ୍କର ଆକାର-ପ୍ରକାର ଓ ରୂପ ନାନାବିଧ ଥିଲା, ଏବଂ ସବୁ ରତ୍ନମୟ ନିର୍ମିତ ଥିଲା।
Verse 23
चन्द्रमण्डलशु भ्राणि किडुकिणीजालवन्ति च । अनेकशतभौमानि सान्तर्जलवनानि च,“कोई चन्द्रमण्डलके समान उज्ज्वल थे। किन्हींपर क्षुद्रघंटियोंसे युक्त झालरें लगी थीं। उनमें सैकड़ों कक्षाएँ और मंजिलें थीं। उनके भीतर जलाशय और वन-उपवन सुशोभित थे। कितनोंका प्रकाश नीलमणिमय सूर्यके समान था। कितने ही चाँदी और सोनेके बने हुए थे। दिन्हीं-किन्हीं भवनोंके रंग प्रातःकालीन सूर्यके समान लाल थे। उनमेंसे कुछ विमान या भवन तो स्थावर थे और कुछ इच्छानुसार विचरनेवाले थे
କେତେକ ଭବନ ଚନ୍ଦ୍ରମଣ୍ଡଳ ପରି ଧବଳ-ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ଥିଲେ; କେତେକରେ ଛୋଟ ଘଣ୍ଟି ଲାଗିଥିବା ଝାଲର-ଜାଲ ଶୋଭା ପାଉଥିଲା। ଅନେକରେ ଶତଶତ କକ୍ଷ ଓ ତଳ ଥିଲା; ଭିତରେ ଜଳାଶୟ ଓ ବନ-ଉପବନ ସୁଶୋଭିତ ଥିଲା।
Verse 24
वैदूर्यार्फप्रकाशानि रूप्यरुक्ममयानि च । तरुणादित्यवर्णानि स्थावराणि चराणि च,“कोई चन्द्रमण्डलके समान उज्ज्वल थे। किन्हींपर क्षुद्रघंटियोंसे युक्त झालरें लगी थीं। उनमें सैकड़ों कक्षाएँ और मंजिलें थीं। उनके भीतर जलाशय और वन-उपवन सुशोभित थे। कितनोंका प्रकाश नीलमणिमय सूर्यके समान था। कितने ही चाँदी और सोनेके बने हुए थे। दिन्हीं-किन्हीं भवनोंके रंग प्रातःकालीन सूर्यके समान लाल थे। उनमेंसे कुछ विमान या भवन तो स्थावर थे और कुछ इच्छानुसार विचरनेवाले थे
କେତେକ ବିମାନ ବୈଦୂର୍ୟମଣି ଓ ସୂର୍ଯ୍ୟ ପରି ପ୍ରକାଶମାନ ଥିଲେ; କେତେକ ରୂପା ଓ ସୁନାରେ ନିର୍ମିତ ଥିଲେ। କେତେକର ବର୍ଣ୍ଣ ପ୍ରଭାତର ନବୋଦିତ ସୂର୍ଯ୍ୟ ପରି ଅରୁଣ ଥିଲା। ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ କେତେକ ସ୍ଥିର, ଆଉ କେତେକ ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ବିଚରଣଶୀଳ ଥିଲେ।
Verse 25
भक्ष्यभोज्यमयान् शैलान् वासांसि शयनानि च । सर्वकामफलांश्वैव वृक्षान् भवनसंस्थितान्,“उन भवनोंमें भक्ष्य और भोज्य पदार्थोंके पर्वत खड़े थे। वस्त्रों और शय्याओंके ढेर लगे थे तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंको देनेवाले बहुत-से वृक्ष उन गृहोंकी सीमाके भीतर लहलहा रहे थे
ସେହି ଭବନମାନଙ୍କ ଭିତରେ ଭକ୍ଷ୍ୟ ଓ ଭୋଜ୍ୟ ପଦାର୍ଥର ପର୍ବତସଦୃଶ ଢେର ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିଲା; ବସ୍ତ୍ର ଓ ଶୟନର ମଧ୍ୟ ଗଦାଗଦି ଥିଲା। ଏବଂ ସେହି ଗୃହସୀମାଭିତରେ ମନୋଇଚ୍ଛିତ ସମସ୍ତ ଫଳ ଦେବାକୁ ସମର୍ଥ ଅନେକ ବୃକ୍ଷ ସମୃଦ୍ଧିରେ ଲହଲହ କରୁଥିଲେ।
Verse 26
नद्यो वीथ्य: सभा वाप्यो दीर्घिकाश्वैव सर्वश: । घोषवन्ति च यानानि युक्तान्यथ सहस्रश:,“उन दिव्य लोकोंमें बहुत-सी नदियाँ, गलियाँ, सभाभवन, बावड़ियाँ, तालाब और जोतकर तैयार खड़े हुए घोषयुक्त सहस्रों रथ मैंने सब ओर देखे थे
ସେହି ଦୀପ୍ତିମାନ ଲୋକମାନଙ୍କରେ ମୁଁ ସବୁଦିଗରେ ନଦୀ, ପ୍ରଶସ୍ତ ବୀଥି, ସଭାଭବନ, କୂଆ ଓ ଜଳାଶୟ, ଏବଂ ଦୀର୍ଘ ତାଳାବ ଦେଖିଲି। ତଦୁପରି ସହସ୍ର-ସହସ୍ର ଯାନ—ଯୋତାଯାଇ ସଜା—ମଙ୍ଗଳ ଘୋଷରେ ନାଦ କରୁଥିବା ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି।
Verse 27
क्षीरस्रवा वै सरितो गिरीश्व सर्पिस्तथा विमलं चापि तोयम् । वैवस्वतस्यानुमतांश्न देशा- नदृष्टपूर्वान् सुबहूनपश्यम्,“मैंने दूध बहानेवाली नदियाँ, पर्वत, घी और निर्मल जल भी देखे तथा यमराजकी अनुमतिसे और भी बहुत-से पहलेके न देखे हुए प्रदेशोंका दर्शन किया
ମୁଁ କ୍ଷୀର ପ୍ରବାହିତ ନଦୀ, ପର୍ବତ, ଘି ଏବଂ ନିର୍ମଳ ଜଳ ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି। ଏବଂ ବୈବସ୍ୱତ (ଯମ)ଙ୍କ ଅନୁମତିରେ, ପୂର୍ବେ କେବେ ନ ଦେଖା ଅନେକ ପ୍ରଦେଶର ଦର୍ଶନ କଲି।
Verse 28
सर्वान् दृष्टवा तदहं धर्मराज- मवोचं वै प्रभविष्णुं पुराणम् क्षीरस्यैता: सर्पिषश्नैव नद्य: शश्वत्सत्रोता: कस्य भोज्या: प्रदिष्टा:,“उन सबको देखकर मैंने प्रभावशाली पुरातन देवता धर्मराजसे कहा--'प्रभो! ये जो घी और दूधकी नदियाँ बहती रहती हैं, जिनका स्रोत कभी सूखता नहीं है, किनके उपभोगमें आती हैं--इन्हें किनका भोजन नियत किया गया है?”
ସେସବୁ ଦେଖି ମୁଁ ପ୍ରଭାବଶାଳୀ ପୁରାତନ ଧର୍ମରାଜଙ୍କୁ କହିଲି—“ପ୍ରଭୋ! ଦୁଧ ଓ ଘିର ଏହି ନଦୀମାନେ ଅବିରତ ବହୁଛନ୍ତି, ଯାହାଙ୍କର ସ୍ରୋତ କେବେ ଶୁଖେ ନାହିଁ; ଏମାନଙ୍କୁ ଭୋଜ୍ୟରୂପେ ଭୋଗ କରିବାକୁ କାହା ପାଇଁ ନିୟତ କରାଯାଇଛି?”
Verse 29
यमोअब्रवीद् विद्धि भोज्यास्त्वमेता ये दातार: साधवो गोरसानाम् | अन्ये लोका: शाश्वृता वीतशोकै: समाकीर्णा गोप्रदाने रतानाम्,“यमराजने कहा--“ब्रह्मन! तुम इन नदियोंको उन श्रेष्ठ पुरुषोंका भोजन समझो, जो गोरस दान करनेवाले हैं। जो गोदानमें तत्पर हैं, उन पुण्यात्माओंके लिये दूसरे भी सनातन लोक विद्यमान हैं, जिनमें दुःख-शोकसे रहित पुण्यात्मा भरे पड़े हैं
ଯମ କହିଲେ—“ବ୍ରାହ୍ମଣ! ଏହି ନଦୀମାନେ ଗୋରସ ଦାନ କରୁଥିବା ସାଧୁଜନଙ୍କର ଭୋଜ୍ୟ ବୋଲି ଜାଣ। ଯେମାନେ ଗୋଦାନରେ ରତ, ସେମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଅନ୍ୟ ଶାଶ୍ୱତ ଲୋକମାନେ ମଧ୍ୟ ଅଛନ୍ତି—ଶୋକଦୁଃଖରହିତ—ପୁଣ୍ୟାତ୍ମାମାନଙ୍କରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ।”
Verse 30
न त्वेतासां दानमात्र प्रशस्तं पात्र कालो गोविशेषो विधिक्ष । ज्ञात्वा देयं विप्र गवान्तरं हि दुःखं ज्ञातुं पावकादित्यभूतम्,“विप्रवर! केवल इनका दानमात्र ही प्रशस्त नहीं है; सुपात्र ब्राह्मण, उत्तम समय, विशिष्ट गौ तथा दानकी सर्वोत्तम विधि--इन सब बातोंको जानकर ही गोदान करना चाहिये। गौओंका आपसमें जो तारतम्य है, उसे जानना बहुत कठिन काम है और अग्नि एवं सूर्यके समान तेजस्वी पात्रको पहचानना भी सरल नहीं है
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣଶ୍ରେଷ୍ଠ! କେବଳ ଏହି ଗାଈମାନଙ୍କୁ ଦାନ କରିବାମାତ୍ର ପ୍ରଶଂସନୀୟ ନୁହେଁ। ସୁପାତ୍ର, ଯଥୋଚିତ କାଳ, ଗୋବିଶେଷ ଓ ଦାନର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବିଧି—ଏସବୁ ଜାଣି ତବେ ଗୋଦାନ କରିବା ଉଚିତ। ଗାଈମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ତାରତମ୍ୟ ଜାଣିବା ଦୁର୍ଲଭ, ଏବଂ ଅଗ୍ନି-ସୂର୍ଯ୍ୟ ସମ ତେଜସ୍ବୀ ପାତ୍ରକୁ ଚିହ୍ନିବା ମଧ୍ୟ ସହଜ ନୁହେଁ।
Verse 31
स्वाध्यायवान् यो5तिमात्र॑ तपस्वी वैतानस्थो ब्राह्मण: पात्रमासाम् | कृच्छोत्सृष्टा: पोषणाभ्यागताश्न द्वारैरेतैगोविशेषा: प्रशस्ता:,जो ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्यायसे सम्पन्न, अत्यन्त तपस्वी तथा यज्ञके अनुष्ठानमें लगा हुआ हो, वही इन गौओंके दानका सर्वोत्तम पात्र है। इनके सिवा जो ब्राह्मण कृच्छुव्रतसे मुक्त हुए हों और परिवारकी पुष्टिके लिये गोदानके प्रार्थी होकर आये हों, वे भी दानके उत्तम पात्र हैं। इन सुयोग्य पात्रोंको निमित्त बनाकर दानमें दी गयी श्रेष्ठ गौएँ उत्तम मानी गयी हैं
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଯେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ବେଦସ୍ୱାଧ୍ୟାୟରେ ସମ୍ପନ୍ନ, ଅତ୍ୟନ୍ତ ତପସ୍ବୀ ଏବଂ ବୈତାନ (ବୈଦିକ ଯଜ୍ଞକର୍ମ) ଅନୁଷ୍ଠାନରେ ନିରତ, ସେଇ ଏହି ଗାଈମାନଙ୍କ ଦାନର ସର୍ବୋତ୍ତମ ପାତ୍ର। ତାହାଛଡ଼ା, ଯେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ କଠିନ ‘କୃଚ୍ଛ୍ର’ ବ୍ରତ ସମାପ୍ତ କରି ଗୃହପୋଷଣ ପାଇଁ ସହାୟତା ଚାହିଁ ଆସନ୍ତି, ସେମାନେ ମଧ୍ୟ ଯୋଗ୍ୟ ପାତ୍ର। ଏମିତି ସୁଯୋଗ୍ୟ ପାତ୍ରଙ୍କୁ ନିମିତ୍ତ କରି ଦାନରେ ଦିଆଯାଇଥିବା ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଗାଈମାନେ ପ୍ରଶଂସନୀୟ ମନାଯାନ୍ତି।
Verse 32
तिस्त्रो रात्र्यस्त्वद्धिरुपोष्य भूमौ तृप्ता गावस्तर्पिति भ्य: प्रदेया: । वत्सै: प्रीता: सुप्रजा: सोपचारा- स्त्र्यहं दत्त्वा गोरसैर्वर्तितव्यम्,“तीन राततक उपवासपूर्वक केवल जल पीकर धरतीपर शयन करे। तत्पश्चात् खिला- पिलाकर तृप्त की हुई गौओंका भोजन आदिसे संतुष्ट किये हुए ब्राह्मणोंको दान करे। वे गौएँ बछड़ोंके साथ रहकर प्रसन्न हों, सुन्दर बच्चे देनेवाली हों तथा अन्यान्य आवश्यक सामग्रियोंसे युक्त हों। ऐसी गौओंका दान करके तीन दिनोंतक केवल गोरसका आहार करके रहना चाहिये
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ତିନି ରାତି ଉପବାସ କରି କେବଳ ଜଳ ପାନ କରି ଭୂମିରେ ଶୟନ କରିବା ଉଚିତ। ତା’ପରେ ଭଲଭାବେ ଖୁଆଇ ତୃପ୍ତ କରାଯାଇଥିବା ଗାଈମାନଙ୍କୁ ବଛଡ଼ା ସହିତ, ଭୋଜନ ଆଦି ସତ୍କାରରେ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ କରାଯାଇଥିବା ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ଦାନ କରିବା ଉଚିତ। ସେ ଗାଈମାନେ ବଛଡ଼ା ସହ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଉନ୍ତୁ, ଉତ୍ତମ ସନ୍ତାନଦାତ୍ରୀ ହେଉନ୍ତୁ, ଏବଂ ଆବଶ୍ୟକ ପରିଚର୍ଯ୍ୟା-ସାମଗ୍ରୀ ସହିତ ଥାଉନ୍ତୁ। ଏପରି ଦାନ କରି ପରେ ତିନି ଦିନ କେବଳ ଗୋରସ (ଦୁଗ୍ଧଜାତ ଆହାର) ଗ୍ରହଣ କରି ଜୀବନ ନିର୍ବାହ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 33
दत्त्वा धेनुं सुव्रतां कांस्यदोहां कल्याणवत्सामपलायिनीं च । यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या- स्तावद् वर्षाण्यश्रुते स्वर्गलोकम्,“उत्तम शील-स्वभाववाली, भले बछड़ेवाली और भागकर न जानेवाली दुधारू गायका कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करके उस गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोतक दाता स्वर्गलोकका सुख भोगता है
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ସୁଶୀଳ, କାଂସ୍ୟ ଦୋହନପାତ୍ର ସହିତ, ଭଲ ବଛଡ଼ାଯୁକ୍ତ, ପଳାଇ ନଯାଉଥିବା ଦୁଧାରୁ ଧେନୁକୁ ଦାନ କଲେ, ସେ ଗାଈର ଶରୀରରେ ଯେତେ ରୋମ ଅଛି ସେତେ ବର୍ଷ ଦାତା ସ୍ୱର୍ଗଲୋକର ସୁଖ ଭୋଗ କରେ।
Verse 34
तथानड्वाहं ब्राह्मुणेभ्य: प्रदाय दान्तं धुर्य बलवन्तं युवानम् । कुलानुजीव्यं वीर्यवन्तं बृहन्तं भुड्क्ते लोकान् सम्मितान् थेनुदस्य,“इसी प्रकार जो शिक्षा देकर काबूमें किये हुए, बोझ ढोनेमें समर्थ, बलवान, जवान, कृषक-समुदायकी जीविका चलानेयोग्य, पराक्रमी और विशाल डील-डौलवाले बैलका ब्राह्मणोंको दान देता है, वह दुधारू गायका दान करनेवालेके तुल्य ही उत्तम लोकोंका उपभोग करता है
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଏହିପରି, ଶିକ୍ଷାଦ୍ୱାରା ବଶୀଭୂତ, ଜୁଆରେ ଯୋଗ୍ୟ, ବଳବାନ, ଯୁବ, କୃଷକ-ଗୃହସ୍ଥମାନଙ୍କ ଜୀବିକା ଧାରଣରେ ସମର୍ଥ, ପରାକ୍ରମୀ ଏବଂ ବିଶାଳ ଦେହଯୁକ୍ତ ଏକ ବଳଦକୁ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ଦାନ କରୁଥିବା ବ୍ୟକ୍ତି, ଦୁଧାରୁ ଗାଈ ଦାନକାରୀଙ୍କ ସମାନ ଉତ୍ତମ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଭୋଗ କରେ।
Verse 35
गोषु क्षान्तं गोशरण्यं कृतज्ञं वृत्तिग्लानं तादृशं पात्रमाहु: । वद्धे ग्लाने सम्भ्रमे वा महार्थे कृष्यर्थ वा होम्यहेतो: प्रसूत्याम्
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଯେ ଗୋମାତାଙ୍କ ପ୍ରତି କ୍ଷମାଶୀଳ ଓ ସୌମ୍ୟ, ଗୋଶରଣ୍ୟ (ଗୋମାତାଙ୍କୁ ଆଶ୍ରୟ ଓ ରକ୍ଷା ଦେଇଥାଏ), କୃତଜ୍ଞ, ଏବଂ ଜୀବିକାଭାବରେ କ୍ଲାନ୍ତ—ସେଇ ନିଜେ ସତ୍ୟ ଦାନପାତ୍ର। ସେ ବନ୍ଧିତ ହେଉ, ଦୁର୍ବଳ ହେଉ, ହଠାତ୍ ସଙ୍କଟରେ ପଡ଼ୁ, ମହାଆବଶ୍ୟକତା ଉପସ୍ଥିତ ହେଉ, କୃଷି ପାଇଁ ସାଧନ ଦରକାର ହେଉ, ହୋମ-ଯଜ୍ଞ ପାଇଁ ହବିଷ୍ୟ ଦରକାର ହେଉ, କିମ୍ବା ପ୍ରସବ ସମୟ—ଏମିତି ଅବସରରେ ତାଙ୍କୁ ସହାୟତା କରିବା ଉଚିତ।
Verse 36
गुर्वर्थ वा बालपुष्ट्याभिषंगां गां वै दातुं देशकालो<विशिष्ट: । अन्तर्ज्ाता: सक्रयज्ञानलब्धा: प्राणक्रीता निर्जिता यौतकाश्ष
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଗୁରୁକାର୍ଯ୍ୟ ପାଇଁ, କିମ୍ବା ଶିଶୁମାନଙ୍କ ପୁଷ୍ଟି ଓ ମଙ୍ଗଳ ପ୍ରତି ସ୍ନେହବଶତଃ, ଯଥୋଚିତ ଦେଶ-କାଳ ମାନି ଗୋଦାନ କରିବା ବିଶେଷ ପ୍ରଶଂସନୀୟ। ଏମିତି ଗାଈ ନିଜ ଗୋଠରେ ଜନ୍ମିତ, ବିଧିପୂର୍ବକ କ୍ରୟ କରି ମାଲିକାନା-ଜ୍ଞାନ ସହ ପ୍ରାପ୍ତ, ପ୍ରାଣମୂଲ୍ୟରେ (ଅତ୍ୟନ୍ତ କଷ୍ଟରେ) ଅର୍ଜିତ, ବିଜୟରେ ଲାଭ, କିମ୍ବା ଯୌତକ (ବିବାହ-ଉପହାର/ଦେହେଜ) ରୂପେ ପ୍ରାପ୍ତ ହୋଇପାରେ।
Verse 37
जो गौओंके प्रति क्षमाशील, उनकी रक्षा करनेमें समर्थ, कृतज्ञ और आजीविकासे रहित है, ऐसे ब्राह्मणको गोदानका उत्तम पात्र बताया गया है। जो बूढ़ा हो, रोगी होनेके कारण पथ्य-भोजन चाहता हो, दुर्भिक्ष आदिके कारण घबराया हो, किसी महान् यज्ञका अनुष्ठान करनेवाला हो या जिसके लिये खेतीकी आवश्यकता आ पड़ी हो, होमके लिये हविष्य प्राप्त करनेकी इच्छा हो अथवा घरमें स्त्रीके बच्चा पैदा होनेवाला हो अथवा गुरुके लिये दक्षिणा देनी हो अथवा बालककी पुष्टिके लिये गोदुग्धकी आवश्यकता आ पड़ी हो, ऐसे व्यक्तियोंको ऐसे अवसरोंपर गोदानके लिये सामान्य देश-काल माना गया है (ऐसे समयमें देश-कालका विचार नहीं करना चाहिये)। जिन गौओंका विशेष भेद जाना हुआ हो, जो खरीदकर लायी गयी हों अथवा ज्ञानके पुरस्काररूपसे प्राप्त हुई हों अथवा प्राणियोंके अदला-बदलीसे खरीदी गयी हों या जीतकर लायी गयी हों अथवा दहेजमें मिली हों, ऐसी गौएँ दानके लिये उत्तम मानी गयी हैं” ।। नाचिकेत उवाच श्रुत्वा वैवस्वतवचस्तमहं पुनरब्रुवम् अभावे गोप्रदातृणां कथं लोकान् हि गच्छति
ଯେ ଗୋମାତାଙ୍କ ପ୍ରତି କ୍ଷମାଶୀଳ, ଗୋରକ୍ଷାରେ ସମର୍ଥ, କୃତଜ୍ଞ ଏବଂ ଜୀବିକାହୀନ—ଏମିତି ବ୍ରାହ୍ମଣକୁ ଗୋଦାନର ଉତ୍ତମ ପାତ୍ର କୁହାଯାଇଛି। ଯେ ବୃଦ୍ଧ, ଯେ ରୋଗୀ ହୋଇ ପଥ୍ୟ-ଭୋଜନ ଚାହେ, ଯେ ଦୁର୍ଭିକ୍ଷ ଆଦିରେ ଭୟାକ୍ରାନ୍ତ, ଯେ ମହାଯଜ୍ଞର ଅନୁଷ୍ଠାତା, କିମ୍ବା ଯାହା ପାଇଁ କୃଷିସାଧନ ଆବଶ୍ୟକ; ଯେ ହୋମ ପାଇଁ ହବିଷ୍ୟ ପାଇବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରେ; ଯାହାର ଘରେ ସ୍ତ୍ରୀ ପ୍ରସବସନ୍ନ; ଯେ ଗୁରୁଙ୍କୁ ଦକ୍ଷିଣା ଦେବାକୁ ଚାହେ; କିମ୍ବା ଶିଶୁର ପୁଷ୍ଟି ପାଇଁ ଗୋଦୁଧ ଆବଶ୍ୟକ—ଏମିତି ସମୟରେ ଗୋଦାନ ପାଇଁ ଦେଶ-କାଳ ବିଚାର କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ; ଏହାକୁ ସାଧାରଣ ଦେଶ-କାଳ ବୋଲି ଧରାଯାଇଛି। ଯେ ଗାଈମାନଙ୍କର ବିଶେଷ ପରିଚୟ ଜଣା, ଯେ କିଣି ଆଣା, ଯେ ଜ୍ଞାନ-ପୁରସ୍କାରରୂପେ ପ୍ରାପ୍ତ, ଯେ ପ୍ରାଣ-ବିନିମୟରେ କ୍ରୟ, ଯେ ଜୟରେ ଲାଭ, କିମ୍ବା ଯେ ଯୌତକ/ଦେହେଜରେ ମିଳିଥାଏ—ସେମାନେ ଦାନ ପାଇଁ ଉତ୍ତମ ମନାଯାନ୍ତି। ନଚିକେତ କହିଲା—ବୈବସ୍ୱତ ଯମଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି ମୁଁ ପୁଣି ପଚାରିଲି—“ଗୋଦାନକର୍ତ୍ତା ନଥିଲେ ମଣିଷ ସେଇ ଲୋକମାନଙ୍କୁ କିପରି ପହଞ୍ଚେ?”
Verse 38
नाचिकेत कहता है--वैवस्वत यमकी बात सुनकर मैंने पुनः उनसे पूछा--“भगवन्! यदि अभाववश गोदान न किया जा सके तो गोदान करनेवालोंको ही मिलनेवाले लोकोंमें मनुष्य कैसे जा सकता है?” ।। ततोडब्रवीद् यमो धीमान् गोप्रदानपरां गतिम् । गोप्रदानानुकल्पं तु गामृते सन्ति गोप्रदा:,तदनन्तर बुद्धिमान् यमराजने गोदानसम्बन्धी गति तथा गोदानके समान फल देनेवाले दानका वर्णन किया, जिसके अनुसार बिना गायके भी लोग गोदान करनेवाले हो सकते हैं?
ନଚିକେତ କହିଲା—ବୈବସ୍ୱତ ଯମଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି ମୁଁ ପୁଣି ପଚାରିଲି—“ଭଗବନ୍! ଅଭାବବଶତଃ ଯଦି ଗୋଦାନ କରିହେବ ନାହିଁ, ତେବେ ଗୋଦାନକର୍ତ୍ତାମାନେ ପାଉଥିବା ଲୋକମାନଙ୍କୁ ମଣିଷ କିପରି ପହଞ୍ଚିବ?” ତେବେ ବୁଦ୍ଧିମାନ ଯମ ଗୋଦାନସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ପରମ ଗତି ବର୍ଣ୍ଣନା କଲେ; ଏବଂ ଗୋଦାନ ସମାନ ଫଳ ଦେଇଥିବା ‘ଅନୁକଳ୍ପ’ (ପ୍ରତିସ୍ଥାନ) ଦାନର କଥା ମଧ୍ୟ କହିଲେ—ଯାହାନୁସାରେ ଗାଈ ନଥିଲେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରତିଦାନ ଦ୍ୱାରା ଲୋକେ ‘ଗୋପ୍ରଦା’ ହୋଇପାରନ୍ତି।
Verse 39
अलाभे यो गवां दद्याद् घृतधेनुं यतव्रत: । तस्यैता घृतवाहिन्यः भरन्ते वत्सला इव,“जो गौओंके अभावमें संयम-नियमसे युक्त हो घृतधेनुका दान करता है, उसके लिये ये घृतवाहिनी नदियाँ वत्सला गौओंकी भाँति घृत बहाती हैं
ଗାଈ ନ ମିଳିଲେ ଯେ ସଂୟମ-ନିୟମଯୁକ୍ତ, ବ୍ରତନିଷ୍ଠ ପୁରୁଷ ‘ଘୃତଧେନୁ’ ଦାନ କରେ, ତାହା ପାଇଁ ଏହି ଘୃତବାହିନୀ ନଦୀମାନେ ବତ୍ସଳା ଗାଈ ପରି ଘୃତ ପ୍ରବାହିତ କରନ୍ତି।
Verse 40
घृतालाभे तु यो दद्यात् तिलधेनुं यतव्रत: । स दुर्गात् तारितो थेन्वा क्षीरनद्यां प्रमोदते,'घीके अभावमें जो व्रत-नियमसे युक्त हो तिलमयी धेनुका दान करता है, वह उस धेनुके द्वारा संकटसे उद्धार पाकर दूधकी नदीमें आनन्दित होता है
ଘିଅ ନ ମିଳିଲେ ଯେ ଜଣେ ବ୍ରତ-ନିୟମରେ ନିଷ୍ଠ ହୋଇ ତିଳମୟୀ ଧେନୁ ଦାନ କରେ, ସେ ସେହି ଧେନୁ-ଦାନର ପୁଣ୍ୟରେ ସଙ୍କଟରୁ ଉଦ୍ଧାର ପାଇ କ୍ଷୀରନଦୀରେ ଆନନ୍ଦ କରେ।
Verse 41
तिलालाभे तु यो दद्याज्जलधेनुं यतव्रत: । स कामप्रवहां शीतां नदीमेतामुपाश्ुते,“तिलके अभावमें जो व्रतशील एवं नियमनिष्ठ होकर जलमयी धेनुका दान करता है, वह अभीष्ट वस्तुओंको बहानेवाली इस शीतल नदीके निकट रहकर सुख भोगता है!
ତିଳ ନ ମିଳିଲେ ଯେ ଜଣେ ବ୍ରତଶୀଳ ଓ ନିୟମନିଷ୍ଠ ହୋଇ ଜଳମୟୀ ଧେନୁ ଦାନ କରେ, ସେ ଇଚ୍ଛିତ ବସ୍ତୁ ବହାଇନେଇଥିବା ଏହି ଶୀତଳ ନଦୀର ସାନ୍ନିଧ୍ୟରେ ରହି ସୁଖ ଭୋଗ କରେ।
Verse 42
एवमेतानि मे तत्र धर्मराजो न्यदर्शयत् | दृष्टवा च परमं हर्षमवापमहमच्युत,धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले पूज्य पिताजी! इस प्रकार धर्मराजने मुझे वहाँ ये सब स्थान दिखाये। वह सब देखकर मुझे बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ
ହେ ଧର୍ମରୁ କେବେ ଚ୍ୟୁତ ନ ହେଉଥିବା ପୂଜ୍ୟ ପିତା! ଏହିପରି ଧର୍ମରାଜ ସେଠାରେ ମୋତେ ଏ ସମସ୍ତ ସ୍ଥାନ ଦେଖାଇଲେ। ସେଗୁଡ଼ିକୁ ଦେଖି ମୁଁ ପରମ ହର୍ଷ ପାଇଲି।
Verse 43
निवेदये चाहमिमं प्रियं ते क्रतुर्महानल्पधनप्रचार: । प्राप्तो मया तात स मत्प्रसूत: प्रपत्स्थते वेदविधिप्रवृत्त:,तात! मैं आपके लिये यह प्रिय वृत्तान्त निवेदन करता हूँ कि मैंने वहाँ थोड़े-से ही धनसे सिद्ध होनेवाला यह गोदानरूप महान् यज्ञ प्राप्त किया है। वह यहाँ वेदविधिके अनुसार मुझसे प्रकट होकर सर्वत्र प्रचलित होगा
ତାତ! ମୁଁ ତୁମ ପାଇଁ ଏହି ପ୍ରିୟ ବୃତ୍ତାନ୍ତ ନିବେଦନ କରୁଛି—ଅଳ୍ପ ଧନରେ ସିଦ୍ଧ ହେବାଯୋଗ୍ୟ ସେହି ମହାନ୍ କ୍ରତୁ (ଗୋଦାନ-ଯଜ୍ଞ) ମୁଁ ସେଠାରେ ପାଇଛି। ଏହା ମୋ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରକଟ ହୋଇ ବେଦବିଧି ଅନୁସାରେ ଏଠାରେ ପ୍ରବୃତ୍ତ ହୋଇ ସର୍ବତ୍ର ପ୍ରଚଳିତ ହେବ।
Verse 44
शापो हायं भवतोअनुग्रहाय प्राप्तो मया यत्र दृष्टो यमो वै | दानव्युष्टिं तत्र दृष्टवा महात्मन् निःसंदिग्धान् दानधर्माश्चिरिष्ये,आपके द्वारा मुझे जो शाप मिला, वह वास्तवमें मुझपर अनुग्रहके लिये ही प्राप्त हुआ था, जिससे मैंने यमलोकमें जाकर वहाँ यमराजको देखा। महात्मन्! वहाँ दानके फलको प्रत्यक्ष देखकर मैं संदेहरहित दानधर्मोका अनुष्ठान करूँगा
ମହାତ୍ମନ୍! ତୁମେ ଯେ ଶାପ ମୋତେ ଦେଇଥିଲ, ସେଟି ପ୍ରକୃତରେ ମୋ ପାଇଁ ଅନୁଗ୍ରହ ହେଲା; ତାହାରେ ମୁଁ ଯମଲୋକକୁ ପହଞ୍ଚି ସ୍ୱୟଂ ଯମଙ୍କୁ ଦେଖିଲି। ସେଠାରେ ଦାନର ଫଳ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦେଖି, ଏବେ ମୁଁ ସନ୍ଦେହହୀନ ଭାବେ ଦାନଧର୍ମ ଆଚରଣ କରିବି।
Verse 45
इदं च मामब्रवीद् धर्मराज: पुन: पुन: सम्प्रहृष्टो महर्षे । दानेन यः प्रयतो5भूत् सदैव विशेषतो गोप्रदानं च कुर्यात्,महर्षे! धर्मराजने बारंबार प्रसन्न होकर मुझसे यह भी कहा था कि “जो लोग दानसे सदा पवित्र होना चाहें" वे विशेषरूपसे गोदान करें
ମହର୍ଷେ! ଧର୍ମରାଜ ହୃଦୟରେ ଆନନ୍ଦିତ ହୋଇ ପୁନଃ ପୁନଃ ମୋତେ କହିଲେ—“ଯେ ଦାନଦ୍ୱାରା ସଦା ନିଜକୁ ପବିତ୍ର ରଖିବାକୁ ଚାହେ, ସେ ବିଶେଷତଃ ଗୋଦାନ କରୁ।”
Verse 46
शुद्धों हार्थो नावमन्यस्व धर्मान् पात्रे देयं देशकालोपपन्ने । तस्माद् गावस्ते नित्यमेव प्रदेया मा भूच्च ते संशय: कश्चिदत्र,“मुनिकुमार! धर्म निर्दोष विषय है। तुम धर्मकी अवहेलना न करना। उत्तम देश, काल प्राप्त होनेपर सुपात्रको दान देते रहना चाहिये। अतः तुम्हें सदा ही गोदान करना उचित है। इस विषयमें तुम्हारे भीतर कोई संदेह नहीं होना चाहिये
“ଧର୍ମ ନିର୍ଦୋଷ ବିଷୟ; ତାହାକୁ ଅବହେଳା କରନି। ଯଥୋଚିତ ଦେଶ-କାଳ ମିଳିଲେ ସୁପାତ୍ରକୁ ଦାନ ଦେବା ଉଚିତ। ତେଣୁ ତୁମେ ନିତ୍ୟ ଗୋଦାନ କର; ଏଥିରେ ତୁମ ମନରେ କୌଣସି ସନ୍ଦେହ ରହୁ ନାହିଁ।”
Verse 47
एता: पुरा हाददन्नित्यमेव शान्तात्मानो दानपथे निविष्टा: तपांस्युग्राण्यप्रतिशड्कमाना- स्ते वै दान॑ प्रददुश्चैव शक्त्या,'पूर्वकालमें शान्तचित्तवाले पुरुषोंने दानके मार्ममें स्थित हो नित्य ही गौओंका दान किया था। वे अपनी उग्र तपस्याके विषयमें संदेह न रखते हुए भी यथाशक्ति दान देते ही रहते थे
ପୂର୍ବକାଳରେ ଶାନ୍ତଚିତ୍ତ ପୁରୁଷମାନେ ଦାନପଥରେ ନିଷ୍ଠିତ ହୋଇ ନିତ୍ୟ ଏହି ଗାଈମାନଙ୍କୁ ଦାନ କରୁଥିଲେ। ତୀବ୍ର ତପସ୍ୟା କରୁଥିଲେ ମଧ୍ୟ ତାହାରେ କୌଣସି ସନ୍ଦେହ ନ ରଖି, ଯଥାଶକ୍ତି ଦାନ ଦେଇ ଯାଉଥିଲେ।
Verse 48
काले च शक््त्या मत्सरं वर्जयित्वा शुद्धात्मान: श्रद्धिन: पुण्यशीला: । दत्त्वा गा वै लोकममुं प्रपन्ना देदीप्यन्ते पुण्यशीलास्तु नाके,'कितने ही शुद्धचित्त, श्रद्धालु एवं पुण्यात्मा पुरुष ईर्ष्याका त्याग करके समयपर यथाशक्ति गोदान करके परलोकमें पहुँचकर अपने पुण्यमय शील-स्वभावके कारण स्वर्गलोकमें प्रकाशित होते हैं
ଯେମାନେ ଶୁଦ୍ଧଚିତ୍ତ, ଶ୍ରଦ୍ଧାଳୁ ଓ ପୁଣ୍ୟଶୀଳ—ଇର୍ଷ୍ୟାକୁ ତ୍ୟାଗ କରି ଯଥାକାଳେ ଯଥାଶକ୍ତି ଗୋଦାନ କରନ୍ତି, ସେମାନେ ପରଲୋକକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଅନ୍ତି ଏବଂ ନିଜ ପୁଣ୍ୟଶୀଳ ସ୍ୱଭାବରେ ସ୍ୱର୍ଗରେ ଦୀପ୍ତିମାନ ହୁଅନ୍ତି।
Verse 49
एतद् दानं न्यायलब्धं द्विजेभ्य: पात्रे दत्त प्रापणीयं परीक्ष्य । काम्याष्टम्या वर्तितव्यं दशाहं रसैर्गवां शकृता प्रस्नवैर्वा,“न्यायपूर्वक उपार्जित किये हुए इस गोधनका ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये तथा पात्रकी परीक्षा करके सुपात्रको दी हुई गाय उसके घर पहुँचा देना चाहिये और किसी भी शुभ अष्टमीसे आरम्भ करके दस दिनोंतक मनुष्यको गोरस, गोबर अथवा गोमूत्रका आहार करके रहना चाहिये
ଏହି ଦାନ—ନ୍ୟାୟରେ ଲାଭ କରାଯାଇଥିବା ଗୋଧନ—ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କୁ ଦେବା ଉଚିତ। ପାତ୍ରର ଯୋଗ୍ୟତା ପରୀକ୍ଷା କରି ସୁପାତ୍ରକୁ ଦିଆଯାଇଥିବା ଗାଈଟିକୁ ତାଙ୍କ ଘରକୁ ଯଥାବିଧି ପହଞ୍ଚାଇବା ଦରକାର। ପୁଣି ଯେକୌଣସି ଶୁଭ ଅଷ୍ଟମୀରୁ ଆରମ୍ଭ କରି ଦଶ ଦିନ ଗୋରସ (ଦୁଧାଦି) କିମ୍ବା ଗୋମୟ କିମ୍ବା ଗୋମୂତ୍ର ଆହାର କରି ନିୟମ ପାଳନ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 50
देवव्रती स्याद् वृषभप्रदानै- वेंदावाप्तिगोयुगस्य प्रदाने । तीर्थावाप्तिगों प्रयुक्तप्रदाने पापोत्सर्ग: कपिलाया: प्रदाने,“एक बैलका दान करनेसे मनुष्य देवताओंका सेवक होता है। दो बैलोंका दान करनेपर उसे वेद-विद्याकी प्राप्ति होती है। उन बैलोंसे जुते हुए छकड़ेका दान करनेसे तीर्थसेवनका फल प्राप्त होता है और कपिला गायके दानसे समस्त पापोंका परित्याग हो जाता है
ନଚିକେତା କହିଲେ— ଗୋଟିଏ ବଳଦ ଦାନ କଲେ ମନୁଷ୍ୟ ଦେବସେବାରେ ନିଷ୍ଠ ହୁଏ। ଦୁଇ ବଳଦ ଦାନ କଲେ ବେଦବିଦ୍ୟା ପ୍ରାପ୍ତି ହୁଏ। ସେହି ବଳଦଦ୍ୱୟରେ ଯୋତା ଗାଡ଼ି ଦାନ କଲେ ତୀର୍ଥସେବନର ପୁଣ୍ୟ ମିଳେ। ଏବଂ କପିଳା ଗାଈ ଦାନ କଲେ ସମସ୍ତ ପାପ ନଶ୍ଟ ହୁଏ।
Verse 51
गामप्येकां कपिलां सम्प्रदाय न्यायोपेतां कलुषाद् विप्रमुच्येत् । गवां रसात् परम॑ नास्ति किंचिद् गवां प्रदानं सुमहद् वदन्ति,“मनुष्य न्यायतः प्राप्त हुई एक भी कपिला गायका दान करके सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। गोरससे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है; इसीलिये विद्वान् पुरुष गोदानको महादान बतलाते हैं
ନଚିକେତା କହିଲେ— ନ୍ୟାୟରେ ପ୍ରାପ୍ତ ଗୋଟିଏ କପିଳା ଗାଈକୁ ମଧ୍ୟ ଦାନ କଲେ ମନୁଷ୍ୟ କଲୁଷ (ପାପ) ଠାରୁ ମୁକ୍ତ ହୁଏ। ଗୋରସଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ କିଛି ନାହିଁ; ତେଣୁ ଜ୍ଞାନୀମାନେ ଗୋଦାନକୁ ମହାଦାନ କହନ୍ତି।
Verse 52
गावो लोकांस्तारयन्ति क्षरन्त्यो गावश्षान्नं संजनयन्ति लोके । यस्तं जानन्न गवां हार्दमेति स वै गन्ता निरयं पापचेता:,गौएँ दूध देकर सम्पूर्ण लोकोंका भूखके कष्टसे उद्धार करती हैं। ये लोकमें सबके लिये अन्न पैदा करती हैं। इस बातको जानकर भी जो गौओंके प्रति सौहार्दका भाव नहीं रखता, वह पापात्मा मनुष्य नरकमें पड़ता है
ଗାଈମାନେ ଦୁଧ ଦେଇ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଭୁଖର କଷ୍ଟରୁ ଉଦ୍ଧାର କରନ୍ତି; ଏହି ଲୋକରେ ସମସ୍ତଙ୍କ ପାଇଁ ଅନ୍ନ-ପୋଷଣ ଉତ୍ପନ୍ନ କରନ୍ତି। ଏହା ଜାଣି ସୁଦ୍ଧା ଯେ ଗାଈମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ସୌହାର୍ଦ୍ୟ ରଖେ ନାହିଁ, ସେ ପାପଚେତା ନରକକୁ ଯାଏ।
Verse 53
यैस्तद् दत्तं गोसहस््रं शतं वा दशार्थ वा दश वा साधुवत्सम् | अप्येका वै साधवे ब्राह्म॒णाय सास्यामुष्मिन् पुण्यतीर्था नदी वै,“जो मनुष्य किसी श्रेष्ठ ब्राह्यणको सहस्र, शत, दस अथवा पाँच गौओंका उनके अच्छे बछड़ोंसहित दान करता है अथवा एक ही गाय देता है, उसके लिये वह गौ परलोकमें पवित्र तीर्थोवाली नदी बन जाती है
ନଚିକେତା କହିଲେ— ଯେ ଯୋଗ୍ୟ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ ଯଥାଶକ୍ତି ସହସ୍ର, ଶତ, ଦଶ କିମ୍ବା (କିଛି) ଗାଈ ଭଲ ବଛା ସହିତ ଦାନ କରେ, କିମ୍ବା ଗୋଟିଏ ଗାଈ ମଧ୍ୟ ଦେଇଥାଏ—ସେଇ ଗାଈ ପରଲୋକରେ ତାହା ପାଇଁ ପୁଣ୍ୟତୀର୍ଥଯୁକ୍ତ ନଦୀ ହୋଇଯାଏ।
Verse 54
प्राप्त्या पुष्टया लोकसंरक्षणेन गावस्तुल्या: सूर्यपादै: पृथिव्याम् शब्दश्नैक: संततिश्नोपभोगा- स्तस्माद् गोद: सूर्य इवावभाति,'प्राप्ति, पुष्टि तथा लोकरक्षा करनेके द्वारा गौएँ इस पृथ्वीपर सूर्यकी किरणोंके समान मानी गयी हैं। एक ही “गो” शब्द धेनु और सूर्य-किरणोंका बोधक है। गौओंसे ही संतति और उपभोग प्राप्त होते हैं; अतः गोदान करनेवाला मनुष्य किरणोंका दान करनेवाले सूर्यके ही समान माना जाता है
ପ୍ରାପ୍ତି, ପୁଷ୍ଟି ଓ ଲୋକରକ୍ଷା ଦ୍ୱାରା ପୃଥିବୀରେ ଗାଈମାନେ ସୂର୍ଯ୍ୟକିରଣ ସମାନ ବୋଲି ମନାଯାଇଛି। ‘ଗୋ’ ଶବ୍ଦ ଏକେଇ—ଧେନୁକୁ ମଧ୍ୟ, ସୂର୍ଯ୍ୟରଶ୍ମିକୁ ମଧ୍ୟ ବୋଧ କରାଏ। ଗାଈଠାରୁ ହିଁ ସନ୍ତାନ ଓ ଭୋଗ-ଜୀବନୋପଯୋଗୀ ସାଧନ ଜନ୍ମେ; ତେଣୁ ଗୋଦାନକାରୀ ସୂର୍ଯ୍ୟ ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ—ମାନୋ କିରଣ ଦାନ କରୁଛି।
Verse 55
गुरुं शिष्यो वरयेद् गोप्रदाने स वै गन्ता नियतं स्वर्गमेव । विधिज्ञानां सुमहान् धर्म एष विधिं ह्याद्यं विधय: संविशन्ति,“शिष्य जब गोदान करने लगे, तब उसे ग्रहण करनेके लिये गुरुको चुने। यदि गुरुने वह गोदान स्वीकार कर लिया तो शिष्य निश्चय ही स्वर्गलोकमें जाता है। विधिके जाननेवाले पुरुषोंके लिये यह गोदान महान् धर्म है। अन्य सब विधियाँ इस आदि विधिमें ही अन्तर्भूत हो जाती हैं
ଶିଷ୍ୟ ଯେତେବେଳେ ଗୋଦାନ କରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ହୁଏ, ସେତେବେଳେ ତାହା ଗ୍ରହଣ କରିବା ପାଇଁ ଯୋଗ୍ୟ ଗୁରୁଙ୍କୁ ବାଛିବା ଉଚିତ। ଗୁରୁ ଯଦି ସେଇ ଗୋଦାନ ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତି, ତେବେ ଶିଷ୍ୟ ନିଶ୍ଚୟ ସ୍ୱର୍ଗଲୋକ ପ୍ରାପ୍ତ କରେ। ବିଧି-ଧର୍ମ ଜାଣୁଥିବାମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଏହି ଗୋଦାନ ମହାଧର୍ମ; ପ୍ରକୃତରେ ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ବିଧି ଏହି ଆଦ୍ୟ ବିଧିରେ ଅନ୍ତର୍ଭୁକ୍ତ।
Verse 56
इदं दान॑ न््यायलब्धं द्विजेभ्य: पात्रे दत्त्वा प्रापयेथा: परीक्ष्य । त्वय्याशंसन्त्यमरा मानवाश्नर वयं चापि प्रसृते पुण्यशीले,“तुम न््यायके अनुसार गोधन प्राप्त करके पात्रकी परीक्षा करनेके पश्चात् श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उनका दान कर देना और दी हुई वस्तुको ब्राह्मणके घर पहुँचा देना। तुम पुण्यात्मा और पुण्यकार्यमें प्रवृत्त रहनेवाले हो; अतः देवता, मनुष्य तथा हमलोग तुमसे धर्मकी ही आशा रखते हैं'
ଏହି ଦାନ ନ୍ୟାୟସମ୍ମତ ଭାବେ ଲାଭ କରି, ପାତ୍ରଙ୍କୁ ପରୀକ୍ଷା କରି, ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କୁ ଦାନ କର; ଏବଂ ଦିଆଯାଇଥିବା ବସ୍ତୁ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଘରକୁ ପହଞ୍ଚିବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ବ୍ୟବସ୍ଥା କର। ତୁମେ ପୁଣ୍ୟଶୀଳ ଓ ପୁଣ୍ୟକର୍ମରେ ନିତ୍ୟ ପ୍ରବୃତ୍ତ; ତେଣୁ ଦେବତା, ମନୁଷ୍ୟ ଏବଂ ଆମେ ମଧ୍ୟ ତୁମଠାରୁ କେବଳ ଧର୍ମକୁ ହିଁ ଆଶା କରୁ।
Verse 57
इत्युक्तोडहं धर्मराजं द्विजर्षे धर्मात्मानं शिरसाभिप्रणम्य । अनुज्ञातस्तेन वैवस्वतेन प्रत्यागमं भगवत्पादमूलम्,ब्रह्मर्ष! धर्मराजके ऐसा कहनेपर मैंने उन धर्मात्मा देवताको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और फिर उनकी आज्ञा लेकर मैं आपके चरणोंके समीप लौट आया
ଦ୍ୱିଜର୍ଷେ! ଧର୍ମରାଜ ଏପରି କହିବା ପରେ ମୁଁ ସେଇ ଧର୍ମାତ୍ମା ଦେବତାଙ୍କୁ ଶିର ନମାଇ ପ୍ରଣାମ କଲି; ଏବଂ ବୈବସ୍ୱତ ଯମଙ୍କ ଅନୁମତି ପାଇ ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ଭଗବତ୍ ପାଦମୂଳକୁ ପ୍ରତ୍ୟାଗମନ କଲି।
Verse 73
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि यमवाक््यं नाम एकसप्ततितमो<ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଅନୁଶାସନପର୍ବର ଦାନଧର୍ମପର୍ବରେ ‘ଯମବାକ୍ୟ’ ନାମକ ଏକସପ୍ତତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Yudhiṣṭhira asks for a comparative account of the fruits of multiple disciplines—vows, rules, study, restraint, Vedic practice, giving, truthfulness, celibacy, and service—seeking a ranked understanding of merit and its outcomes.
Bhīṣma frames dama as merit-preserving and often superior to dāna when giving is compromised by anger; anger is described as destroying the value of the act, while self-control stabilizes both conduct and its results.
Yes: it explicitly elevates satya above even large-scale ritual comparison (aśvamedha), presenting truth as cosmically foundational and as a decisive basis for auspicious post-mortem states (svarga/brahmaloka).