
Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि इस विषय पर एक प्राचीन आख्यान सुनाया जाता है—पवन और कार्तवीर्य अर्जुन का संवाद, जिसमें ब्राह्मण-माहात्म्य प्रकट होता है। → माहिष्मती का सहस्रबाहु, महाबली कार्तवीर्य अर्जुन क्षत्रधर्म, विनय और श्रुति-आज्ञा के साथ दत्तात्रेय मुनि की आराधना करता है और वरदान पाता है; पर उसी वैभव के साथ उसके भीतर ‘श्रेष्ठता’ का गर्व भी उभरता है, जिससे वर्ण-श्रेष्ठता का विवाद तीखा होने लगता है। → आकाशवाणी/अशरीरिणी वाणी और दिव्य ‘गायत्री’ कन्या का प्रकट कथन—‘मूर्ख! तू नहीं जानता कि ब्राह्मण क्षत्रिय से श्रेष्ठ है’—और यह उद्घोष कि तीनों लोकों में कोई देव या मनुष्य ब्राह्मण-श्रेष्ठता को डिगा नहीं सकता; यही क्षत्र-तेज बनाम ब्रह्म-तेज का निर्णायक क्षण बनता है। → कथा का निष्कर्ष ब्राह्मणों की महिमा, ब्रह्मतेज की अजेयता, और क्षत्रिय के लिए विनय-युक्त धर्मपालन की अनिवार्यता पर टिकता है—राजा का पराक्रम भी ब्राह्मण-आश्रय और मर्यादा के अधीन है।
Verse 1
अत्-#-र- द्विपज्चाशर्दाधिकशततमो< ध्याय: कार्तवीर्य ० अब प2 ९ दत्तात्रेयजीसे चार वरदान प्राप्त होनेका एवं उनमें उत्पत्तिका वर्णन तथा ब्राह्मणोंकी महिमाके विषयमें कार्तवीर्य अर्जुन और वायुदेवताके संवादका उल्लेख युधिछिर उवाच कां तु ब्राह्मणपूजायां व्युष्टिं दृष्टवा जनाधिप । क॑ वा कर्मोदयं मत्वा तानर्चसि महामते,युधिष्ठिरने कहा--जनेश्वर! आप कौन-सा फल देखकर ब्राह्मणपूजामें लगे रहते हैं? महामते! अथवा किस कर्मका उदय सोचकर आप जन ब्राह्मणोंकी पूजा-अर्चा करते हैं?
युधिष्ठिर म्हणाला—हे जनाधिप! ब्राह्मणपूजेत तुम्ही कोणते फळ पाहून सतत रत राहता? हे महामते! किंवा कोणत्या कर्माच्या उदयाचा विचार करून तुम्ही त्यांची पूजा-अर्चा करता?
Verse 2
भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । पवनस्य च संवादमर्जुनस्य च भारत,भीष्मजीने कहा--भरतनन्दन! इस विषयमें विज्ञपुरुष कार्तवीर्य अर्जुन और वायुदेवताके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं
भीष्म म्हणाले—हे भारत! या विषयातही ज्ञानीजन एक प्राचीन इतिहासाचे उदाहरण देतात—पवनदेव आणि अर्जुन यांचा संवाद।
Verse 3
सहस्रभुजभच्छीमान् कार्तवीर्यो5भवत् प्रभु: । अस्य लोकस्य सर्वस्य माहिष्मत्यां महाबल:,पूर्वकालकी बात है--माहिष्मती नगरीमें सहस्र-भुजधारी परम कान्तिमान् कार्तवीर्य अर्जुन नामवाला एक हैहयवंशी राजा समस्त भूमण्डलका शासन करता था। वह महान् बलवान् और सत्यपराक्रमी था। इस लोकमें सर्वत्र उसीका आधिपत्य था
भीष्म म्हणाले—प्राचीन काळी माहिष्मती नगरीत सहस्रभुज, तेजस्वी व महाबलवान् कार्तवीर्य नावाचा एक प्रभू राजा झाला; या समस्त लोकावर त्याचेच आधिपत्य होते।
Verse 4
स तु रत्नाकरवतीं सद्दीपां सागराम्बराम् । शशास पृथिवीं सर्वा हैहय: सत्यविक्रम:,पूर्वकालकी बात है--माहिष्मती नगरीमें सहस्र-भुजधारी परम कान्तिमान् कार्तवीर्य अर्जुन नामवाला एक हैहयवंशी राजा समस्त भूमण्डलका शासन करता था। वह महान् बलवान् और सत्यपराक्रमी था। इस लोकमें सर्वत्र उसीका आधिपत्य था
भीष्म म्हणाले—तो हैहयवंशी सत्यपराक्रमी राजा रत्नाकरांनी समृद्ध, द्वीपांसह आणि सागराला वस्त्रासारखी धारण करणारी ही सर्व पृथ्वी शासत असे।
Verse 5
स्ववित्तं तेन दत्तं तु दत्तात्रेयाय कारणे । क्षत्रधर्म पुरस्कृत्य विनयं श्रुतमेव च
भीष्म म्हणाले—त्या कारणासाठी त्याने आपलेच धन दत्तात्रेयांना अर्पण केले; क्षात्रधर्म अग्रस्थानी ठेवून, तसेच विनय व श्रुत-उपदेशानुसार आचरण करून।
Verse 6
न्यमन्त्रयत संतुष्टो द्विजश्नैनं वरैस्त्रिभि:,विप्रवर दत्तात्रेय उसके ऊपर बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने उसे तीन वर माँगनेकी आज्ञा दी। उनके द्वारा वर माँगनेकी आज्ञा मिलनेपर राजाने कहा--“भगवन! मैं युद्धमें तो हजार भुजाओंसे युक्त रहूँ; किन्तु घरपर मेरी दो ही बाँहें रहें। रणभूमिमें सभी सैनिक मेरी एक हजार भुजाएँ देखें। कठोर व्रतका पालन करनेवाले गुरुदेव! मैं अपने पराक्रमसे सम्पूर्ण पृथ्वीको जीत लूँ। इस प्रकार पृथ्वीको धर्मके अनुसार प्राप्तकर मैं आलस्यरहित हो उसका पालन करूँ। द्विजश्रेष्ठ] इन तीन वरोंके सिवा एक चौथा वर भी मैं आपसे माँगता हूँ। अनिन्द्य महर्षे! मुझपर कृपा करनेके लिये आप वह वर भी अवश्य प्रदान करें। मैं आपका आश्रित भक्त हूँ। यदि कभी मैं सन्मार्गका परित्याग करके असत्य मार्गका आश्रय लूँ तो श्रेष्ठ पुरुष मुझे राहपर लानेके लिये शिक्षा दें”
भीष्म म्हणाले—त्याच्यावर संतुष्ट होऊन द्विजश्रेष्ठ दत्तात्रेयांनी त्याला तीन वर मागण्याची आज्ञा दिली. तेव्हा राजा म्हणाला—“भगवन्! रणात, सैन्याच्या मध्यभागी, मी सहस्रबाहू होऊ दे; पण घरी माझ्या केवळ दोनच भुजा राहोत. रणभूमीवर सर्व सैनिकांनी माझ्या हजार भुजा पाहाव्यात. कठोर व्रतांचे गुरुदेव! माझ्या पराक्रमाने मी संपूर्ण पृथ्वी जिंकू दे. धर्मानुसार पृथ्वी मिळवून मी आळस न करता तिचे पालन करीन. द्विजसत्तम! या तीन वरांखेरीज मी आपल्याकडे चौथा वरही मागतो. अनिंद्य महर्षे! कृपा करून तोही द्या; मी आपला शरणागत भक्त आहे. कधी मी सन्मार्ग सोडून असन्मार्ग धरला, तर श्रेष्ठ पुरुषांनी मला शिकवून पुन्हा योग्य मार्गावर आणावे।”
Verse 7
स वरैश्छन्दितस्तेन नूपो वचनमत्रवीत् । सहस्रबाहुर्भूयां वै चमूमध्ये गृहेडन्यथा,विप्रवर दत्तात्रेय उसके ऊपर बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने उसे तीन वर माँगनेकी आज्ञा दी। उनके द्वारा वर माँगनेकी आज्ञा मिलनेपर राजाने कहा--“भगवन! मैं युद्धमें तो हजार भुजाओंसे युक्त रहूँ; किन्तु घरपर मेरी दो ही बाँहें रहें। रणभूमिमें सभी सैनिक मेरी एक हजार भुजाएँ देखें। कठोर व्रतका पालन करनेवाले गुरुदेव! मैं अपने पराक्रमसे सम्पूर्ण पृथ्वीको जीत लूँ। इस प्रकार पृथ्वीको धर्मके अनुसार प्राप्तकर मैं आलस्यरहित हो उसका पालन करूँ। द्विजश्रेष्ठ] इन तीन वरोंके सिवा एक चौथा वर भी मैं आपसे माँगता हूँ। अनिन्द्य महर्षे! मुझपर कृपा करनेके लिये आप वह वर भी अवश्य प्रदान करें। मैं आपका आश्रित भक्त हूँ। यदि कभी मैं सन्मार्गका परित्याग करके असत्य मार्गका आश्रय लूँ तो श्रेष्ठ पुरुष मुझे राहपर लानेके लिये शिक्षा दें”
भीष्म म्हणाले—त्या ऋषींनी वर मागण्यास उद्युक्त केल्यावर राजा म्हणाला—“रणात, सैन्याच्या मध्यभागी, मी सहस्रबाहू होऊ दे; पण घरी अन्यथा, म्हणजे द्विभुजच राहू दे. रणभूमीवर सर्व सैनिकांनी माझ्या हजार भुजा पाहाव्यात।”
Verse 8
मम बाहुसहसं तु पश्यतां सैनिका रणे । विक्रमेण महीं कृत्स्नां जयेयं संशितव्रत,विप्रवर दत्तात्रेय उसके ऊपर बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने उसे तीन वर माँगनेकी आज्ञा दी। उनके द्वारा वर माँगनेकी आज्ञा मिलनेपर राजाने कहा--“भगवन! मैं युद्धमें तो हजार भुजाओंसे युक्त रहूँ; किन्तु घरपर मेरी दो ही बाँहें रहें। रणभूमिमें सभी सैनिक मेरी एक हजार भुजाएँ देखें। कठोर व्रतका पालन करनेवाले गुरुदेव! मैं अपने पराक्रमसे सम्पूर्ण पृथ्वीको जीत लूँ। इस प्रकार पृथ्वीको धर्मके अनुसार प्राप्तकर मैं आलस्यरहित हो उसका पालन करूँ। द्विजश्रेष्ठ] इन तीन वरोंके सिवा एक चौथा वर भी मैं आपसे माँगता हूँ। अनिन्द्य महर्षे! मुझपर कृपा करनेके लिये आप वह वर भी अवश्य प्रदान करें। मैं आपका आश्रित भक्त हूँ। यदि कभी मैं सन्मार्गका परित्याग करके असत्य मार्गका आश्रय लूँ तो श्रेष्ठ पुरुष मुझे राहपर लानेके लिये शिक्षा दें”
“रणात सैनिकांनी माझ्या हजार भुजा पाहाव्यात. हे संशितव्रत! माझ्या पराक्रमाने मी संपूर्ण पृथ्वी जिंकू दे.”
Verse 9
तां च धर्मेण सम्प्राप्प पालयेयमतन्द्रित: । चतुर्थ तु वरं याचे त्वामहं द्विजसत्तम,विप्रवर दत्तात्रेय उसके ऊपर बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने उसे तीन वर माँगनेकी आज्ञा दी। उनके द्वारा वर माँगनेकी आज्ञा मिलनेपर राजाने कहा--“भगवन! मैं युद्धमें तो हजार भुजाओंसे युक्त रहूँ; किन्तु घरपर मेरी दो ही बाँहें रहें। रणभूमिमें सभी सैनिक मेरी एक हजार भुजाएँ देखें। कठोर व्रतका पालन करनेवाले गुरुदेव! मैं अपने पराक्रमसे सम्पूर्ण पृथ्वीको जीत लूँ। इस प्रकार पृथ्वीको धर्मके अनुसार प्राप्तकर मैं आलस्यरहित हो उसका पालन करूँ। द्विजश्रेष्ठ] इन तीन वरोंके सिवा एक चौथा वर भी मैं आपसे माँगता हूँ। अनिन्द्य महर्षे! मुझपर कृपा करनेके लिये आप वह वर भी अवश्य प्रदान करें। मैं आपका आश्रित भक्त हूँ। यदि कभी मैं सन्मार्गका परित्याग करके असत्य मार्गका आश्रय लूँ तो श्रेष्ठ पुरुष मुझे राहपर लानेके लिये शिक्षा दें”
“आणि ती (पृथ्वी) धर्माने प्राप्त करून मी निष्काळजीपणा न करता तिचे पालन करीन. हे द्विजसत्तम! मी आपल्याकडे चौथा वरही मागतो.”
Verse 10
त॑ ममानुग्रहकृते दातुमर्हस्यनिन्दित । अनुशासन्तु मां सनन््तो मिथ्योद्वृत्तं त्वदाश्रयम्,विप्रवर दत्तात्रेय उसके ऊपर बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने उसे तीन वर माँगनेकी आज्ञा दी। उनके द्वारा वर माँगनेकी आज्ञा मिलनेपर राजाने कहा--“भगवन! मैं युद्धमें तो हजार भुजाओंसे युक्त रहूँ; किन्तु घरपर मेरी दो ही बाँहें रहें। रणभूमिमें सभी सैनिक मेरी एक हजार भुजाएँ देखें। कठोर व्रतका पालन करनेवाले गुरुदेव! मैं अपने पराक्रमसे सम्पूर्ण पृथ्वीको जीत लूँ। इस प्रकार पृथ्वीको धर्मके अनुसार प्राप्तकर मैं आलस्यरहित हो उसका पालन करूँ। द्विजश्रेष्ठ] इन तीन वरोंके सिवा एक चौथा वर भी मैं आपसे माँगता हूँ। अनिन्द्य महर्षे! मुझपर कृपा करनेके लिये आप वह वर भी अवश्य प्रदान करें। मैं आपका आश्रित भक्त हूँ। यदि कभी मैं सन्मार्गका परित्याग करके असत्य मार्गका आश्रय लूँ तो श्रेष्ठ पुरुष मुझे राहपर लानेके लिये शिक्षा दें”
भीष्म म्हणाला—“हे अनिंद्य! माझ्यावर कृपा करण्यासाठी हा वर देणे तुम्हास योग्य आहे. कधी मी तुमचा आश्रय घेऊन असत्य व कुटिल आचरणाकडे वळलो, तर सत्पुरुषांनी मला उपदेश करून सुधारावे व सन्मार्गावर आणावे.”
Verse 11
भगवान् दत्तात्रेयकी कार्तवीर्यपर कृपा इत्युक्त: स द्विज: प्राह तथास्त्विति नराधिपम् | एवं समभवंस्तस्य वरास्ते दीप्ततेजस:,उसके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर दत्तात्रेयजीने उस नरेशसे कहा--“तथास्तु--ऐसा ही हो।' फिर तो उस तेजस्वी राजाके लिये वे सभी वर उसी रूपमें सफल हुए
अशी प्रार्थना झाल्यावर भगवान् द्विज दत्तात्रेय त्या नरेशाला म्हणाले—“तथास्तु।” अशा रीतीने त्या दीप्ततेजस्वी राजासाठी ते सर्व वर यथावत् सिद्ध झाले.
Verse 12
ततः स रथमास्थाय ज्वलनार्कसमद्युतिम् । अब्रवीद् वीर्यसम्मोहात् को वास्ति सदृशो मम
मग तो तो ज्वलंत अग्नी व सूर्याप्रमाणे दीप्तिमान रथावर आरूढ झाला. पराक्रमाच्या मदाने मोहित होऊन तो म्हणाला—“माझ्यासारखा कोण आहे?”
Verse 13
तद्वाक्यान्ते चान्तरिक्षे वागुवाचाशरीरिणी,उसकी यह बात पूरी होते ही आकाशवाणी हुई--'मूर्ख! तुझे पता नहीं है कि ब्राह्मण क्षत्रियसे भी श्रेष्ठ है। ब्राह्यगकी सहायतासे ही क्षत्रिय इस लोकमें प्रजाकी रक्षा करता है!
त्याचे वाक्य संपताच आकाशात अशरीरी वाणी झाली—“मूर्खा! तुला माहीत नाही काय की ब्राह्मण क्षत्रियापेक्षाही श्रेष्ठ आहे? ब्राह्मणाच्या सहाय्यानेच क्षत्रिय या लोकात प्रजेचे रक्षण करतो.”
Verse 14
न त्वं मूढ विजानीषिे ब्राह्मण क्षत्रियाद् वरम् । सहितो ब्राह्माणेनेह क्षत्रिय: शास्ति वै प्रजा:,उसकी यह बात पूरी होते ही आकाशवाणी हुई--'मूर्ख! तुझे पता नहीं है कि ब्राह्मण क्षत्रियसे भी श्रेष्ठ है। ब्राह्यगकी सहायतासे ही क्षत्रिय इस लोकमें प्रजाकी रक्षा करता है!
“हे मूढा! तुला कळत नाही की ब्राह्मण क्षत्रियापेक्षा श्रेष्ठ आहे. ब्राह्मणासहच क्षत्रिय या लोकात प्रजेचे शासन व रक्षण करतो.”
Verse 15
अजुन उवाच कुर्या भूतानि तुष्टो5हं क्रुद्धो नाशं तथानये । कर्मणा मनसा वाचा न मत्तो5स्ति वरो द्विज:,कार्तवीर्य अर्जुनने कहा--मैं प्रसन्न होनेपर प्राणियोंकी सृष्टि कर सकता हूँ और कुपित होनेपर उनका नाश कर सकता हूँ। मन, वाणी और क्रियाद्वारा कोई भी ब्राह्मण मुझसे श्रेष्ठ नहीं है
अर्जुन म्हणाला—मी प्रसन्न झालो तर प्राण्यांची सृष्टी करू शकतो आणि क्रुद्ध झालो तर त्यांचा नाशही घडवू शकतो. कर्म, मन आणि वाणी—या तिन्ही प्रकारांनी माझ्यापेक्षा श्रेष्ठ असा कोणताही ब्राह्मण नाही.
Verse 16
पूर्वो ब्रह्मोत्तरो वादो द्वितीय: क्षत्रियोत्तर: | त्वयोक्तौ हेतुयुक्तौ तौ विशेषस्तत्र दृश्यते,इस जगतमें ब्राह्मणकी ही प्रधानता है--यह कथन पूर्वपक्ष है, क्षत्रियकी श्रेष्ठता ही उत्तर या सिद्धान्तपक्ष है। आपने ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनोंको प्रजापालनरूपी हेतुसे युक्त बताया है; परंतु उनमें यह अन्तर देखा जाता है
अर्जुन म्हणाला—‘या जगात ब्राह्मणाचेच प्राधान्य’ हा पूर्वपक्ष आहे; आणि ‘क्षत्रियाचे श्रेष्ठत्व’ हा उत्तर किंवा सिद्धान्तपक्ष आहे. आपण दोघांनाही प्रजापालन या हेतूने युक्त म्हटले आहे; तरीही त्यांच्यातील भेद जगात दिसून येतो.
Verse 17
ब्राह्मणा: संश्रिता: क्षत्र न क्षत्रं ब्राह्मणाश्रितम् । ख्रिता ब्रह्मोपधा विप्रा: खादन्ति क्षत्रियान् भुवि,ब्राह्मण क्षत्रियोंक आश्रित रहकर जीविका चलाते हैं, किंतु क्षत्रिय कभी ब्राह्मणके आश्रयमें नहीं रहता। वेदोंके अध्ययनाध्यापनके ब्याजसे जीविका चलानेवाले ब्राह्मण इस भूतलपर क्षत्रियोंके ही सहारे भोजन पाते हैं
अर्जुन म्हणाला—हे क्षत्रिया! ब्राह्मण क्षत्रियांच्या आश्रयाने उपजीविका करतात; पण क्षत्रिय ब्राह्मणांच्या आश्रयात राहत नाही. वेदाध्ययन-अध्यापनाचा बहाणा करून उपजीविका करणारे ब्राह्मण या भूमीवर खरे तर क्षत्रियांच्या आधारानेच अन्न मिळवतात.
Verse 18
क्षत्रियेष्वाश्रितो धर्म: प्रजानां परिपालनम् । क्षत्राद् वृत्तित्राह्मिणानां तै: कथं ब्राह्मणो वर:,प्रजापालनरूपी धर्म क्षत्रियोंपर ही अवलम्बित है। क्षत्रियसे ही ब्राह्मणोंको जीविका प्राप्त होती है। फिर ब्राह्मण क्षत्रियसे श्रेष्ठ कैसे हो सकता है?
अर्जुन म्हणाला—प्रजापालनाचा धर्म क्षत्रियांवरच अवलंबून आहे. क्षत्रियांकडूनच ब्राह्मणांना उपजीविका मिळते. मग ब्राह्मण क्षत्रियापेक्षा श्रेष्ठ कसा ठरेल?
Verse 19
सर्वभूतप्रधानांस्तान् भैक्षवृत्तीनहं सदा । आत्मसम्भावितान् विप्रान् स्थापयाम्यात्मनो वशे,आजसे मैं सब प्राणियोंसे श्रेष्ठ कहे जानेवाले, सदा भीख माँगकर जीवन-निर्वाह करनेवाले और अपनेको सबसे उत्तम माननेवाले ब्राह्मणोंको अपने अधीन रखूँगा
अर्जुन म्हणाला—आजपासून ‘सर्व प्राण्यांत श्रेष्ठ’ म्हणून गौरविले जाणारे, सदैव भिक्षावृत्तीने जगणारे आणि स्वतःलाच सर्वोत्तम मानणारे त्या ब्राह्मणांना मी माझ्या अधीन ठेवीन.
Verse 20
कथितं त्वनयासत्यं गायत्रया कन्यया दिवि । विजेष्याम्यवशानू् सर्व ब्राद्मणांश्वर्मवासस:,आकाशमें स्थित हुई इस गायत्री नामक कन्याने जो ब्राह्मणोंको क्षत्रियोंसे श्रेष्ठ बतलाया है, वह बिलकुल झूठ है। मृगछाला धारण करनेवाले सभी ब्राह्मण प्रायः विवश होते हैं, मैं इन सबको जीत लूँगा। तीनों लोकोंमें कोई भी देवता या मनुष्य ऐसा नहीं है, जो मुझे राज्यसे भ्रष्ट करे। अतः मैं ब्राह्मणसे श्रेष्ठ हूँ
अर्जुन म्हणाला—आकाशात स्थित गायत्री नावाच्या कन्येने ब्राह्मण क्षत्रियांपेक्षा श्रेष्ठ आहेत असे जे सांगितले, ते असत्य आहे. मृगचर्म धारण करणारे ते ब्राह्मण बहुतेक परावलंबी व विवश असतात; मी त्या सर्वांना जिंकून टाकीन. त्रैलोक्यात असा कोणताही देव वा मनुष्य नाही जो मला माझ्या राज्यातून ढळवू शकेल; म्हणून मी ब्राह्मणापेक्षाही श्रेष्ठ आहे.
Verse 21
नच मां च्यावयेद् राष्ट्रात् त्रिषु लोकेषु कश्नन । देवो वा मानुषो वापि तस्माज्ज्येष्ठो द्विजादहम्,आकाशमें स्थित हुई इस गायत्री नामक कन्याने जो ब्राह्मणोंको क्षत्रियोंसे श्रेष्ठ बतलाया है, वह बिलकुल झूठ है। मृगछाला धारण करनेवाले सभी ब्राह्मण प्रायः विवश होते हैं, मैं इन सबको जीत लूँगा। तीनों लोकोंमें कोई भी देवता या मनुष्य ऐसा नहीं है, जो मुझे राज्यसे भ्रष्ट करे। अतः मैं ब्राह्मणसे श्रेष्ठ हूँ
त्रैलोक्यात कोणताही—देव असो वा मनुष्य—मला माझ्या राज्यातून हटवू शकत नाही. म्हणून मी द्विजापेक्षाही श्रेष्ठ आहे.
Verse 22
अद्य ब्रहद्योत्तरं लोक॑ करिष्ये क्षत्रियोत्तरम् । न हि मे संयुगे कश्चित् सोढुमुत्सहते बलम्,संसारमें अबतक ब्राह्मण ही सबसे श्रेष्ठ माने जाते थे, किंतु आजसे मैं क्षत्रियोंकी प्रधानता स्थापित करूँगा। संग्राममें कोई भी मेरे बलको नहीं सह सकता
आजपासून मी जगात क्षत्रियांची प्रधानता प्रस्थापित करीन. रणांगणात माझे बळ सहन करण्याचे धैर्य कोणालाही नाही.
Verse 23
अर्जुनस्य वच: श्रुत्वा वित्रस्ताभून्निशाचरी । अथैनमन्तरिक्षस्थस्ततो वायुरभाषत,अर्जुनकी यह बात सुनकर निशाचरी भी भयभीत हो गयी। तदनन्तर अन्तरिक्षमें स्थित हुए वायु देवताने कहा--
अर्जुनाचे वचन ऐकून ती निशाचरी भयभीत झाली. तेव्हा अंतरिक्षात स्थित वायुदेव त्याला म्हणाले—
Verse 24
त्यजैनं कलुषं भावं ब्राह्मणेभ्यो नमस्कुरु । एतेषां कुर्वतः पापं राष्ट्रक्षो भो भविष्यति,'कार्तवीर्य! तुम इस कलुषित भावको त्याग दो और ब्राह्मणोंको नमस्कार करो। यदि इनकी बुराई करोगे तो तुम्हारे राज्यमें हलचल मच जायगी
वायुदेव म्हणाले—हा कलुषित भाव सोड आणि ब्राह्मणांना नमस्कार कर. त्यांच्या विरुद्ध पाप केलास तर तुझ्या राज्यात क्षोभ व उपद्रव माजेल.
Verse 25
अथवा त्वां महीपाल शमयिष्यन्ति वै द्विजा: । निरसिष्यन्ति ते राष्ट्रद्धतोत्साहा महाबला:,“अथवा महीपाल! महान् शक्तिशाली ब्राह्मण तुम्हें शान्त कर देंगे। यदि तुमने उनके उत्साहमें बाधा डाली तो वे तुम्हें राज्यसे बाहर निकाल देंगे”
नाहीतर, हे महीपाल! ते महाबली द्विज तुला नक्कीच आवरून शांत करतील. तू त्यांच्या धर्मोचित उत्साहात अडथळा आणलास, तर ते तुला राज्याबाहेर हाकलून देतील.
Verse 26
त॑ राजा कस्त्वमित्याह ततस्तं प्राह मारुत: । वायुर्वे देवदूतो5स्मि हित॑ त्वां प्रत्रवीम्पहम्,यह बात सुनकर कार्तवीर्यने पूछा--“महानुभाव! आप कौन हैं?” तब वायु देवताने उससे कहा--'राजन! मैं देवताओंका दूत वायु हूँ और तुम्हें हितकी बात बता रहा हूँ!
हे ऐकून राजा म्हणाला—“महानुभाव, आपण कोण?” तेव्हा मारुत म्हणाला—“राजन्! मी देवांचा दूत वायू आहे; तुझ्या हितासाठीच हे सांगत आहे.”
Verse 27
अजुन उवाच अहो त्वयायं विप्रेषु भक्तिराग: प्रदर्शित: । यादृशं पृथिवीभूतं तादृशं ब्रूहि मे द्विजम्,कार्तवीर्य अर्जुनने कहा--वायुदेव! ऐसी बात कहकर आपने ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति और अनुरागका परिचय दिया है। अच्छा आपकी जानकारीमें यदि पृथ्वीके समान क्षमाशील ब्राह्मण हो तो ऐसे द्विजको मुझे बताइये
अर्जुन म्हणाला—“वायुदेवा! या वचनांनी तू ब्राह्मणांप्रतीची भक्ती व अनुराग स्पष्ट दाखविलास. आता तुझ्या जाणिवेत पृथ्वीप्रमाणे क्षमाशील असा एखादा ब्राह्मण असेल, तर त्या द्विजाविषयी मला सांग.”
Verse 28
वायोर्वा सदृशं किंचिद् ब्रूहि त्वं ब्राह्मणोत्तमम् । अपां वै सदृशं वद्लेः सूर्यस्य नभसो5पि वा,अथवा यदि कोई जल, अग्नि, सूर्य, वायु एवं आकाशके समान श्रेष्ठ ब्राह्मण हो तो उसको भी बताइये
“हे ब्राह्मणोत्तम! वायूसारखा स्वभाव असलेला कोणी असेल तर सांग; किंवा जलासारखा, अग्नीसारखा, सूर्यसारखा, अथवा आकाशासारखा—असा एखादा श्रेष्ठ ब्राह्मण असेल तर त्याचाही मला परिचय करून दे.”
Verse 56
आराधयामास च तं कृतवीर्यात्मजो मुनिम् | एक समय कृतवीर्यकुमार अर्जुनने क्षत्रिय-धर्मको सामने रखते हुए विनय और शास्त्रज्ञाकेक अनुसार बहुत दिनोंतक मुनिवर दत्तात्रेयकी आराधना की तथा किसी कारणवश अपना सारा धन उनकी सेवामें समर्पित कर दिया
भीष्म म्हणाले—कृतवीर्याचा पुत्र अर्जुन त्या मुनिवराची आराधना करीत असे. एकदा, क्षत्रियधर्म अग्रस्थानी ठेवून आणि शास्त्रविधीनुसार विनयाने, त्याने महर्षी दत्तात्रेयांची अनेक दिवस सेवा-पूजा केली; आणि काही कारणाने आपले सर्व धनही त्यांच्या सेवेत अर्पण केले.
Verse 126
धर्यवीर्यर्यश:शौर्यर्विक्रमेणीौजसापि वा । तदनन्तर राजा कार्तवीर्य अर्जुन सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी रथपर बैठकर (सम्पूर्ण पृथ्वीपर विजय पानेके पश्चात्) बलके अभिमानसे मोहित हो कहने लगा--'बैर्य, वीर्य, यश, शूरता, पराक्रम और ओजमें मेरे समान कौन है?”
भीष्म म्हणाले—त्यानंतर राजा कार्तवीर्य अर्जुन सूर्य व अग्नीप्रमाणे तेजस्वी होऊन रथावर आरूढ झाला. संपूर्ण पृथ्वी जिंकल्यानंतर तो आपल्या बळाच्या अभिमानाने मोहित होऊन म्हणाला—“धैर्य, वीर्य, यश, शौर्य, पराक्रम आणि ओज यांत माझ्यासमान कोण आहे?”
Verse 152
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादे ब्राह्मणमाहात्म्ये द्विपज्चाशदधिकशततमोड<्ध्याय:
अशा प्रकारे श्रीमहाभारताच्या अनुशासनपर्वातील दानधर्मपर्वात पवन व अर्जुन यांच्या संवादांतर्गत ब्राह्मण-माहात्म्य विषयक एकशे अठ्ठावन्नावा अध्याय समाप्त झाला.