Adhyaya 131
Anushasana ParvaAdhyaya 13157 Verses

Adhyaya 131

Umā–Maheśvara-saṃvāda: Varṇa-bhraṃśa, Ācāra (Vṛtta), and Karmic Ascent/Decline

Upa-parva: Varṇa-Dharma Anuśāsana (Discourse on Varṇa, Conduct, and Karmic Consequence)

Chapter 131 presents Umā’s inquiry to Maheśvara regarding how karmic outcomes are described as producing movement across varṇas (e.g., a Vaiśya becoming a Śūdra, or a Brāhmaṇa falling into lower birth) and how “pratiloma” (role-reversal/contrary practice) is evaluated. Maheśvara replies that brāhmaṇya is portrayed as difficult to attain and must be protected; unethical action (duṣkṛta) and abandonment of svadharma are said to cause decline. The chapter enumerates behaviors associated with falling from brāhmaṇya (including neglect of study, impure conduct, and prohibited consumption), and contrasts them with disciplined practices (truthfulness, restraint, hospitality, regulated diet, ritual observance, service, and study) said to enable ascent for those in lower status. A key doctrinal thesis is articulated: the decisive cause of “dvijatva” is not merely birth, learning, or formal rites, but vṛtta (ethical conduct). The passage therefore functions as a normative ethics-and-identity statement, combining karmic causality, purity discourse, and a conduct-centered criterion for esteem.

Chapter Arc: भीष्म ‘धर्म के गूढ़ रहस्य’ का द्वार खोलते हैं—विष्णु, बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, गोसमुदाय और ब्रह्मा के वचनों से यह बताया जाता है कि देवता और पितर किन सूक्ष्म आचरणों से तृप्त होते हैं। → विष्णु इन्द्र को चेताते हैं कि ब्राह्मण-निन्दा स्वयं विष्णु-द्वेष के समान है; ब्राह्मणों का नित्य अभिवादन, चरण-स्पर्श/पाद-सेवा और आदर-पूजा को धर्म-रक्षा का आधार बताया जाता है। फिर बलदेव ‘परम गुह्य’ कहकर उन कर्म-विधियों का संकेत करते हैं जिन्हें न जानकर मनुष्य क्लेश भोगते हैं—व्रत, उपवास-संकल्प, पूजा-उपचार, दान-पात्र आदि की शुद्धता तक। → धर्म और अग्नि के उपदेशों में निषेध-धर्म तीखा हो उठता है—राज-सेवा/वेतन-आश्रित ब्राह्मण, गौ-अपमान, ब्राह्मण-अपमान और अग्नि का अनादर जैसे कर्म पितृ-तर्पण को निष्फल कर देते हैं; ‘पिण्ड’ देने पर भी पितर तृप्त नहीं होते—यह चेतावनी अध्याय का नैतिक शिखर बनती है। → विधि का ‘गुह्य’ स्पष्ट किया जाता है—उपवास-संकल्प और पूजा-उपचार में उचित पात्र (ताम्रपात्र) आदि का विधान, तथा ब्राह्मण-गौ-अग्नि के प्रति श्रद्धा-रक्षा को देव-पितृ-तृप्ति का सुनिश्चित मार्ग बताया जाता है। → तदनन्तर वसिष्ठ आदि सप्तर्षियों के प्रदक्षिणा-क्रम और सभा-स्थित होने का दृश्य उभरता है, मानो अगले प्रसंग में ऋषि-मण्डल से और भी निर्णायक रहस्य-वचन प्रकट होने वाले हों।

Shlokas

Verse 1

षड्विशवत्याधेकशततमो< ध्याय: विष्णु, बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, गोसमुदाय और ब्रद्माजीके द्वारा धर्मके गूढ़ रहस्यका वर्णन भीष्म उवाच केन ते च भवेत्‌ प्रीति: कथं तुष्टिं तु गच्छसि । इति पृष्ट: सुरेन्द्रेण प्रोवाच हरिरी श्वर:,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! प्राचीन कालकी बात है, एक बार देवराज इन्द्रने भगवान्‌ विष्णुसे पूछा--“भगवन्‌! आप किस कर्मसे प्रसन्न होते हैं? किस प्रकार आपको संतुष्ट किया जा सकता है?' सुरेन्द्रके इस प्रकार पूछनेपर जगदीश्वर श्रीहरिने कहा

भीष्म म्हणाले—“आपण कोणत्या कर्माने प्रसन्न होता आणि कशा प्रकारे पूर्ण तुष्ट होता?” असे देवराज इंद्राने विचारताच जगदीश्वर श्रीहरिने उत्तर दिले.

Verse 2

विष्णुरुवाच ब्राह्मणानां परीवादो मम विद्वेषणं महत्‌ । ब्राह्मणै: पूजितैर्नित्यं पूजितो5हं न संशय:,भगवान्‌ विष्णु बोले--इन्द्र! ब्राह्मणोंकी निन्दा करना मेरे साथ महान्‌ द्वेष करनेके समान है तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे सदा मेरी भी पूजा हो जाती हैं--इसमें संशय नहीं है

भगवान विष्णु म्हणाले—इंद्रा! ब्राह्मणांची निंदा करणे म्हणजे माझ्याशी महान् द्वेष करणेच होय. आणि ब्राह्मणांची नित्य पूजा केली असता माझीही पूजा होते—यात संशय नाही.

Verse 3

नित्याभिवाद्या विप्रेन्द्रा भुक्‍त्वा पादौ तथात्मन: । तेषां तुष्यामि मर्त्यानां यश्षक्रे च बलिं हरेत्‌,श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकोी प्रतिदिन प्रणाम करना चाहिये। भोजनके पश्चात्‌ अपने दोनों पैरोंकी भी सेवा करे अर्थात्‌ पैरोंको भलीभाँति धो ले तथा तीर्थकी मृत्तिकासे सुदर्शन चक्र बनाकर उसपर मेरी पूजा करे और नाना प्रकारकी भेंट चढ़ावे। जो ऐसा करते हैं, उन मनुष्योंपर मैं सन्तुष्ट होता हूँ

श्रेष्ठ ब्राह्मणांना दररोज भक्तिभावाने अभिवादन करावे. भोजनानंतर आपल्या दोन्ही पायांचीही सेवा करावी—म्हणजे ते नीट धुवावेत. जो मनुष्य अशा नियमबद्ध श्रद्धेने शक्र (इंद्र) यासही यथोचित बलि अर्पित करतो, त्याच्यावर मी प्रसन्न होतो.

Verse 4

वामनं ब्राह्म॒णं दृष्टवा वराहं च जलोत्थितम्‌ । उद्धृतां धरणीं चैव मूर्ध्ना धारयते तु यः

भीष्म म्हणाले—जो वामन ब्राह्मण आणि जलातून उदय पावलेला वराह पाहतो, तसेच भगवानांनी पृथ्वी उचलून आपल्या मस्तकावर धारण केली हे जाणतो—तो जग धारण करणाऱ्या रक्षकाचे स्मरण करतो.

Verse 5

अश्वत्थं रोचनां गां च पूजयेद्‌ यो नर: सदा

भीष्म म्हणाले—जो मनुष्य सदैव अश्वत्थ, रोचना आणि गायीची श्रद्धेने पूजा करतो.

Verse 6

तेन रूपेण तेषां च पूजां गृह्नामि तत्त्वतः

भीष्म म्हणाले—त्याच रूपाने मी त्यांच्या पूजेला तत्त्वतः, यथार्थपणे स्वीकारतो.

Verse 7

अन्यथा हि वृथा मर्त्या: पूजयन्त्यल्पबुद्धयः,अल्पबुद्धि मानव अन्य प्रकारसे मेरी व्यर्थ पूजा करते हैं। मैं उसे ग्रहण नहीं करता हूँ। वह पूजा मुझे संतोष प्रदान करनेवाली नहीं हैं

अन्यथा अल्पबुद्धी मर्त्यांची पूजा व्यर्थ ठरते. अशी भ्रमित पूजा माझ्यापर्यंत पोहोचत नाही; मी ती स्वीकारत नाही, आणि तिच्यामुळे मला संतोषही होत नाही.

Verse 8

नाहं तत्‌ प्रतिगृह्ञामि न सा तुष्टिकरी मम,अल्पबुद्धि मानव अन्य प्रकारसे मेरी व्यर्थ पूजा करते हैं। मैं उसे ग्रहण नहीं करता हूँ। वह पूजा मुझे संतोष प्रदान करनेवाली नहीं हैं

मी त्या प्रकारची अर्पण-पूजा स्वीकारत नाही, कारण ती मला संतोष देत नाही. अल्पबुद्धी लोक भ्रमाने माझी पूजा करतात; त्यांची पूजा निष्फळ ठरते.

Verse 9

इन्द्र उवाच चक्र पादौ वराहं च ब्राह्मणं चापि वामनम्‌ | उद्धृतां धरणीं चैव किमर्थ त्वं प्रशंससि,इन्द्रने पूछा--भगवन्‌! आप चक्र, दोनों पैर, बौने ब्राह्मण, वराह और उनके द्वारा उठायी हुई मिट्टीकी प्रशंसा किसलिये करते हैं?

इंद्र म्हणाला—भगवन्! आपण चक्र, दोन्ही पाय, वराह, वामन ब्राह्मण आणि उचललेली पृथ्वी—यांची स्तुती कशासाठी करता?

Verse 10

भवान्‌ सृजति भूतानि भवान्‌ संहरति प्रजा: । प्रकृति: सर्वभूतानां समर्त्यानां सनातनी

आपणच सर्व भूतांची सृष्टी करता आणि आपणच प्रजांचा संहार करता. मर्त्यांसह सर्व प्राण्यांची आपण सनातन प्रकृती आहात.

Verse 11

आप ही प्राणियोंकी सृष्टि करते हैं, आप ही समस्त प्रजाका संहार करते हैं और आप ही मनुष्योंसहित सम्पूर्ण प्राणियोंकी सनातन प्रकृति (मूल कारण) हैं ।। भीष्म उवाच सम्प्रहस्य ततो विष्णुरिदं वचनमत्रवीत्‌ । चक्रेण निहता दैत्या: पदभ्यां क्रान्ता वसुन्धरा,भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! तब भगवान्‌ विष्णुने हँसकर इस प्रकार कहा--*देवराज! मैंने चक्रसे दैत्योंको मारा है। दोनों पैरोंसे पृथ्वीको आक्रान्त किया है। वाराहरूप धारण करके हिरण्याक्ष दैत्यको धराशायी किया है और वामन ब्राह्मणका रूप ग्रहण करके मैंने राजा बलिको जीता है

भीष्म म्हणाला—तेव्हा भगवान विष्णू हसत म्हणाले—देवराज! मी चक्राने दैत्यांचा संहार केला; माझ्या दोन्ही पावलांनी पृथ्वी व्यापली. वराहरूप धारण करून मी हिरण्याक्षाला पाडले, आणि वामन ब्राह्मणरूप घेऊन मी राजा बलीला जिंकले.

Verse 12

वाराहं रूपमास्थाय हिरण्याक्षो निपातित: । वामनं रूपमास्थाय जितो राजा मया बलि:,भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! तब भगवान्‌ विष्णुने हँसकर इस प्रकार कहा--*देवराज! मैंने चक्रसे दैत्योंको मारा है। दोनों पैरोंसे पृथ्वीको आक्रान्त किया है। वाराहरूप धारण करके हिरण्याक्ष दैत्यको धराशायी किया है और वामन ब्राह्मणका रूप ग्रहण करके मैंने राजा बलिको जीता है

भीष्म म्हणाले—राजन्! वराह-रूप धारण करून मी हिरण्याक्ष दैत्याचा नाश केला; आणि वामन ब्राह्मण-रूप घेऊन मी राजा बलीला जिंकले।

Verse 13

परितुष्टो भवाम्येवं मानुषाणां महात्मनाम्‌ | तन्मां ये पूजयिष्यन्ति नास्ति तेषां पराभव:,इन्द्रका भगवान्‌ विष्णुके साथ प्रश्नोत्तर इस तरह इन सबकी पूजा करनेसे मैं महामना मनुष्योंपर संतुष्ट होता हूँ। जो मेरी पूजा करेंगे, उनका कभी पराभव नहीं होगा

अशा प्रकारे मी महात्मा मनुष्यांवर पूर्णतः प्रसन्न होतो. जे माझी पूजा करतील, त्यांचा कधीही पराभव होणार नाही.

Verse 14

अपि वा ब्राह्माणं दृष्टवा ब्रह्मचारिणमागतम्‌ । ब्राह्मणाग्रयाहुतिं दत्त्वा अमृतं तस्य भोजनम्‌,“ब्रह्मचारी ब्राह्मगको घरपर आया देख गृहस्थ पुरुष ब्राह्मणको प्रथम भोजन कराये, तत्पश्चात्‌ स्वयं अवशिष्ट अन्नको ग्रहण करे तो उसका वह भोजन अमृतके समान माना गया है

आलेला ब्रह्मचारी ब्राह्मण पाहून गृहस्थाने प्रथम ब्राह्मणाला श्रेष्ठ अन्न अर्पण करावे आणि मग स्वतः उरलेले ग्रहण करावे; असे केल्यास त्याचे ते भोजन अमृतासमान मानले जाते.

Verse 15

ऐन्द्रीं संध्यामुपासित्वा आदित्याभिमुख: स्थित: । सर्वतीर्थेषु स स्नातो मुच्यते सर्वकिल्बिषै:,'जो प्रातःकालकी संध्या करके सूर्यके सम्मुख खड़ा होता है, उसे समस्त तीथोमें स्नानका फल मिलता है और वह सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है

जो ऐन्द्री (प्रातः) संध्या उपासून सूर्याभिमुख उभा राहतो, त्याला सर्व तीर्थांत स्नानाचे फळ मिळते आणि तो सर्व पापांपासून मुक्त होतो.

Verse 16

एतद्‌ व: कथितं गुह्ममखिलेन तपोधना: । संशयं पृच्छमानानां कि भूय: कथयाम्यहम्‌,“तपोधनो! तुमलोगोंने जो संशय पूछा है, उसके समाधानके लिये मैंने यह सारा गूढ़ रहस्य तुम्हें बताया है। बताओ और क्या कहूँ”

हे तपोधनांनो! तुम्ही विचारलेल्या संशयाच्या निरसनासाठी मी हे सर्व गूढ रहस्य पूर्णपणे सांगितले. आता मी आणखी काय सांगू?

Verse 17

बलदेव उवाच श्रूयतां परमं गुहां मानुषाणां सुखावहम्‌ । अजानन्तो यदबुधा: क्लिश्यन्ते भूतपीडिता:,बलदेवजीने कहा--जो मनुष्योंको सुख देनेवाला है तथा मूर्ख मानव जिसे न जाननेके कारण भूतोंसे पीड़ित हो नाना प्रकारके कष्ट उठाते रहते हैं, वह परम गोपनीय विषय मैं बता रहा हूँ; उसे सुनो

बलदेव म्हणाले—ऐका, मनुष्यांना सुख देणारा हा परम गुप्त विषय. ज्याचे ज्ञान नसल्यामुळे मूढ मनुष्य भूतपीडित होऊन नाना प्रकारचे क्लेश भोगतात—तोच मी सांगत आहे.

Verse 18

कल्य उत्थाय यो मर्त्य: स्पृशेद्‌ गां वै घृतं दधि । सर्षपं च प्रियज्ूं च कल्मषात्‌ प्रतिमुच्यते,जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातः:काल उठकर गाय, घी, दही, सरसों और राईका स्पर्श करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है

जो मनुष्य दररोज पहाटे उठून गाय, तूप, दही, मोहरी आणि प्रियजू यांचा स्पर्श करतो, तो कल्मष—पापातून मुक्त होतो.

Verse 19

भूतानि चैव सर्वाणि अग्रत: पृष्ठतोडपि वा । उच्छिष्ट वापि चि्छिद्रेषु वर्जयन्ति तपोधना:,तपस्वी पुरुष आगे या पीछेसे आनेवाले सभी हिंसक जन्‍्तुओंको त्याग देते--उन्हें छोड़कर दूर हट जाते हैं। इसी प्रकार संकटके समय भी वे उच्छिष्ट वस्तुका सदा परित्याग ही करते हैं

तपोधन पुरुष पुढून किंवा मागून येणाऱ्या सर्व भूत-प्राण्यांचा परिहार करतात—दूर होतात. तसेच संकटसमयीही ते उच्छिष्ट वस्तू आणि छिद्रयुक्त (अशुद्ध) ठिकाणे नेहमी टाळतात.

Verse 20

देवा ऊचु प्रगृह्मौदुम्बरं पात्र तोयपूर्णमुदड्मुख: । उपवासं तु गृह्नीयाद्‌ यद्‌ वा संकल्पयेद्‌ व्रतम्‌,देवता बोले--मनुष्य जलसे भरा हुआ ताँबेका पात्र लेकर उत्तराभिमुख हो उपवासका नियम ले अथवा और किसी व्रतका संकल्प करे

देव म्हणाले—जलाने भरलेले औदुंबर (गूलर-काष्ठ) पात्र हातात घेऊन उत्तराभिमुख होऊन उपवासाचा नियम स्वीकारावा; किंवा अन्य कोणत्याही व्रताचा संकल्प करावा.

Verse 21

देवतास्तस्य तुष्यन्ति कामिकं चापि सिध्यति । अन्यथा हि वृथा मर्त्याः कुर्वते स्वल्पबुद्धयः,जो ऐसा करता है, उसके ऊपर देवता संतुष्ट होते हैं और उसकी सारी मनोवांछा सिद्ध हो जाती है; परन्तु मंदबुद्धि मानव ऐसा न करके व्यर्थ दूसरे-दूसरे कार्य किया करते हैं

जो असे करतो, त्याच्यावर देव प्रसन्न होतात आणि त्याची योग्य इच्छा देखील पूर्ण होते. पण अल्पबुद्धी मनुष्य असे न करता व्यर्थ इतर-इतर कामांत गुंतून राहतात.

Verse 22

उपवासे बलौ चापि ताम्रपात्रं विशिष्यते । बलिकभभिक्षा तथार्घ्य च पितृणां च तिलोदकम्‌,उपवासका संकल्प लेने और पूजाका उपचार समर्पित करनेमें ताम्रपात्रको उत्तम माना गया है। पूजन-सामग्री, भिक्षा, अर्घ्य तथा पितरोंके लिये तिल-मिश्रित जल ताम्रपात्रके द्वारा देने चाहिये अन्यथा उनका फल बहुत थोड़ा होता है। यह अत्यन्त गोपनीय बात बतायी गयी है। इसके अनुसार कार्य करनेसे देवता संतुष्ट होते हैं

बलदेव म्हणाला—उपवासाचे संकल्प व बली-आदी अर्पण यांत ताम्रपात्र विशेष श्रेष्ठ मानले जाते. पूजेचे उपचार, भिक्षा, अर्घ्य तसेच पितरांसाठी तिळमिश्रित जल ताम्रपात्रातूनच द्यावे; अन्यथा त्याचे फळ अत्यल्प होते. हा अत्यंत गुप्त उपदेश सांगितला आहे. याप्रमाणे केल्यास देवता संतुष्ट होतात.

Verse 23

ताम्रपात्रेण दातव्यमन्यथाल्पफलं भवेत्‌ | गुहामेतत्‌ समुद्दिष्टं यथा तुष्यन्ति देवता:,उपवासका संकल्प लेने और पूजाका उपचार समर्पित करनेमें ताम्रपात्रको उत्तम माना गया है। पूजन-सामग्री, भिक्षा, अर्घ्य तथा पितरोंके लिये तिल-मिश्रित जल ताम्रपात्रके द्वारा देने चाहिये अन्यथा उनका फल बहुत थोड़ा होता है। यह अत्यन्त गोपनीय बात बतायी गयी है। इसके अनुसार कार्य करनेसे देवता संतुष्ट होते हैं

ताम्रपात्रातूनच दान-अर्पण करावे; अन्यथा फळ अल्प होते. हा उपदेश गुप्त म्हणून सांगितला आहे—असे केल्याने देवता तृप्त होतात.

Verse 24

धर्म उवाच राजपौरुषिके विप्रे घाण्टिके परिचारिके । गोरक्षके वाणिजके तथा कारुकुशीलवे,पिण्डदास्तस्य हीयन्ते न च प्रीणाति वै पितृन्‌ । धर्मने कहा--ब्राह्मण यदि राजाका कर्मचारी हो, वेतन लेकर घण्टा बजानेका काम करता हो, दूसरोंका सेवक हो, गोरक्षा एवं वाणिज्यका व्यवसाय करता हो, शिल्पी या नट हो, मित्रद्रोही हो, वेद न पढ़ा हो अथवा शूद्र जातिकी स्त्रीका पति हो, ऐसे लोगोंको किसी तरह भी देवकार्य (यज्ञ) और पितृकार्य (श्राद्ध) का अन्न आदि नहीं देना चाहिये। जो इन्हें पिण्ड या अन्न देते हैं, उनकी अवनति होती है तथा उनके पितरोंको भी तृप्ति नहीं होती

धर्म म्हणाला—हे ब्राह्मण! जो राजसेवेत राहतो, मजुरीवर घंटा वाजवितो, परसेवा करतो, गोरक्षा, वाणिज्य, शिल्पकला किंवा नटविद्या यांवर उपजीविका करतो—अशाला पिंड देणाऱ्याचे पुण्य क्षीण होते आणि पितर तृप्त होत नाहीत.

Verse 25

मित्रद्रुह्नन धीयाने यश्व स्वाद्‌ वृषलीपति: । एतेषु दैवं पित्रयं वा न देयं स्थात्‌ कथंचन

धर्म म्हणाला—जो मित्रद्रोही आहे, जो अधर्मबुद्धी/दुष्चरित्र आहे, किंवा जो ‘वृषलीपति’ (निंद्य आचरणात रत) आहे—अशांना देवकार्य वा पितृकार्याचे द्रव्य कधीही देऊ नये.

Verse 26

अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्‌ प्रतिनिवर्तते,जिसके घरसे अतिथि निराश लौट जाता है, उसके यहाँसे अतिथिका सत्कार न होनेके कारण देवता, पितर तथा अग्नि भी निराश लौट जाते हैं

धर्म म्हणाला—ज्याच्या घरातून अतिथी निराश होऊन परत जातो, अतिथी-सत्कार न झाल्यामुळे त्याच घरातून देवता, पितर आणि अग्निही निराश होऊन परत जातात.

Verse 27

पितरस्तस्य देवाक्ष॒ अग्नयश्ष तथैव हि । निराशा: प्रतिगच्छन्ति अतिथेरप्रतिग्रहात्‌,जिसके घरसे अतिथि निराश लौट जाता है, उसके यहाँसे अतिथिका सत्कार न होनेके कारण देवता, पितर तथा अग्नि भी निराश लौट जाते हैं

ज्याच्या घरी अतिथीचा यथोचित स्वीकार व सत्कार न झाल्याने तो निराश होऊन परत जातो, त्याच्या घरातून देव, पितर आणि अग्नीही तसेच निराश होऊन निघून जातात।

Verse 28

स्त्रीघ्नैगोघ्नै: कृतध्नैश्ष ब्रह्मघ्नैर्गुरुतल्पगै: । तुल्यदोषो भवत्येभिययस्यातिथिरनर्चित:,जिसके यहाँ अतिथिका सत्कार नहीं होता, उस पुरुषको स्त्रीहत्यारों, गोघातकों, कृतघ्नों, ब्रह्मघातियों और गुरुपत्नीगामियोंके समान पाप लगता है

ज्याच्या घरी अतिथीचा सत्कार होत नाही, तो पुरुष स्त्रीहंता, गोहंता, कृतघ्न, ब्रह्महंता आणि गुरुपत्नीगामी यांच्यासमान पापाचा भागी ठरतो।

Verse 29

अग्निरुवाच पादमुद्यम्य यो मर्त्य: स्पृशेद्‌ गाश्न सुदुर्मति: । ब्राह्मणं वा महाभागं दीप्यमानं तथानलम्‌

अग्नि म्हणाला—जो दुर्मती मनुष्य पाय उचलून गायीला मारतो, किंवा अग्नीप्रमाणे तेजस्वी महाभाग ब्राह्मणावर हात उचलतो, तो घोर अपराध करतो।

Verse 30

दिवं स्पृशत्यशब्दो<स्य त्रस्यन्ति पितरश्न॒ वै,ऐसे मनुष्यकी अपकीर्ति स्वर्गतक फैल जाती है। उसके पितर भयभीत हो उठते हैं। देवताओंमें भी उसके प्रति भारी वैमनस्य हो जाता है तथा महातेजस्वी पावक उसके दिये हुए हविष्यको नहीं ग्रहण करते हैं

अशा मनुष्याची अपकीर्ती स्वर्गापर्यंत पोहोचते आणि त्याचे पितरही भयभीत होतात।

Verse 31

वैमनस्यं च देवानां कृतं भवति पुष्कलम्‌ | पावकश्च महातेजा हव्यं न प्रतिगृह्नति,ऐसे मनुष्यकी अपकीर्ति स्वर्गतक फैल जाती है। उसके पितर भयभीत हो उठते हैं। देवताओंमें भी उसके प्रति भारी वैमनस्य हो जाता है तथा महातेजस्वी पावक उसके दिये हुए हविष्यको नहीं ग्रहण करते हैं

देवांमध्ये त्याच्याविषयी प्रचंड वैमनस्य उत्पन्न होते आणि महातेजस्वी पावकही त्याने अर्पण केलेले हविष्य स्वीकारत नाही।

Verse 32

आजन्मनां शतं चैव नरके पच्यते तु सः । निष्कृतिं च न तस्यापि अनुमन्यन्ति कहिचित्‌

धर्म म्हणाला— तो पुरुष खरोखरच शंभर जन्मांपर्यंत नरकात भाजला जातो; आणि त्याच्यासाठी कोणाकडूनही कधीही प्रायश्चित्त मान्य केले जात नाही.

Verse 33

वह सौ जन्मोंतक नरकमें पकाया जाता है। ऋषिगण कभी उसके उद्धारका अनुमोदन नहीं करते हैं ।। तस्माद्‌ गावो न पादेन स्प्रष्टव्या वै कदाचन । ब्राह्मणश्व महातेजा दीप्यमानस्तथानल:,इसलिये अपना हित चाहनेवाले श्रद्धालु पुरुषको गौओंका, महातेजस्वी ब्राह्मणका तथा प्रज्वलित अग्निका भी कभी पैरसे स्पर्श नहीं करना चाहिये। जो इन तीनोंपर पैर उठाता है, उसे प्राप्त होनेवाले इन दोषोंका मैंने वर्णन किया है

धर्म म्हणाला— असा पुरुष शंभर जन्मांपर्यंत नरकात भाजला जातो; ऋषिगण कधीही त्याच्या उद्धारास अनुमोदन देत नाहीत. म्हणून जो आपले कल्याण इच्छितो व धर्मनिष्ठ आहे, त्याने कधीही पायाने गायींना, महातेजस्वी ब्राह्मणाला आणि प्रज्वलित अग्नीला स्पर्श करू नये. या तिघांवर जो पाय उचलतो, त्याला येणारे दोष मी वर्णिले आहेत.

Verse 34

श्रद्दधानेन मर्त्येन आत्मनो हितमिच्छता । एते दोषा मया प्रोक्तास्त्रिषु यः पादमुत्सूजेत्‌,इसलिये अपना हित चाहनेवाले श्रद्धालु पुरुषको गौओंका, महातेजस्वी ब्राह्मणका तथा प्रज्वलित अग्निका भी कभी पैरसे स्पर्श नहीं करना चाहिये। जो इन तीनोंपर पैर उठाता है, उसे प्राप्त होनेवाले इन दोषोंका मैंने वर्णन किया है

धर्म म्हणाला— जो मर्त्य श्रद्धावान असून आपले खरे हित इच्छितो, त्याने या तीन पवित्र वस्तूंवर—गाय, महातेजस्वी ब्राह्मण आणि प्रज्वलित अग्नी—कधीही पाय ठेवू नये. या तिघांवर पाय उचलणाऱ्यास जे दोष व परिणाम भोगावे लागतात, ते मी आधीच सांगितले आहेत.

Verse 35

विश्वामित्र उवाच श्रूयतां परम गुह्ां रहस्यं धर्मसंहितम्‌ । परमान्नेन यो दद्यात्‌ पितृणामौपहारिकम्‌,विश्वामित्र बोले--देवताओ! यह धर्मसम्बन्धी परम गोपनीय रहस्य सुनो, जब भाद्रपदमासके कृष्णपक्षमें त्रयोदशी तिथिको मघा नक्षत्रका योग हो, उस समय जो मनुष्य दक्षिणाभिमुख हो कुतप कालमें (मध्याह्नके बाद आठवें मुहूर्तमे) जब कि हाथीकी छाया पूर्व दिशाकी ओर पड़ रही हो, उस छायामें ही स्थित हो पितरोंके निमित्त उपहारके रूपमें उत्तम अन्नका दान करता है, उस दानका जैसा विस्तृत फल बताया गया है, वह सुनो। दान करनेवाले उस पुरुषने इस जगतमें तेरह वर्षोंके लिये पितरोंका महान्‌ श्राद्ध सम्पन्न कर दिया, ऐसा जानना चाहिये

विश्वामित्र म्हणाला— ऐका, धर्मसंहित असे हे परम गुप्त रहस्य. जो पुरुष पितरांसाठी उपहाररूपाने उत्तम अन्न दान करतो, त्या दानाचे फळ अत्यंत महान सांगितले गेले आहे.

Verse 36

गजच्छायायां पूर्वस्यां कुतपे दक्षिणामुख: । यदा भाद्रपदे मासि भवते बहुले मघा,विश्वामित्र बोले--देवताओ! यह धर्मसम्बन्धी परम गोपनीय रहस्य सुनो, जब भाद्रपदमासके कृष्णपक्षमें त्रयोदशी तिथिको मघा नक्षत्रका योग हो, उस समय जो मनुष्य दक्षिणाभिमुख हो कुतप कालमें (मध्याह्नके बाद आठवें मुहूर्तमे) जब कि हाथीकी छाया पूर्व दिशाकी ओर पड़ रही हो, उस छायामें ही स्थित हो पितरोंके निमित्त उपहारके रूपमें उत्तम अन्नका दान करता है, उस दानका जैसा विस्तृत फल बताया गया है, वह सुनो। दान करनेवाले उस पुरुषने इस जगतमें तेरह वर्षोंके लिये पितरोंका महान्‌ श्राद्ध सम्पन्न कर दिया, ऐसा जानना चाहिये

विश्वामित्र म्हणाला— हे देवहो, धर्मविषयक हे परम गुप्त रहस्य ऐका. भाद्रपद महिन्याच्या कृष्णपक्षात मघा नक्षत्र येते तेव्हा, जो मनुष्य दक्षिणाभिमुख होऊन कुतप काळी—जेव्हा हत्तीची छाया पूर्वेकडे पडते—त्या छायेत उभा राहून पितरांसाठी उत्तम अन्न दान करतो, त्या दानाचे विस्तीर्ण फळ मनीषींनी सांगितले आहे: त्या एकाच दानाने या लोकात पितरांसाठी तेरा वर्षांचे महान् श्राद्ध केले असे समजावे.

Verse 37

श्रूयतां तस्य दानस्य यादृशो गुणविस्तर: । कृतं तेन महच्छाद्धं वर्षाणीह त्रयोदश,विश्वामित्र बोले--देवताओ! यह धर्मसम्बन्धी परम गोपनीय रहस्य सुनो, जब भाद्रपदमासके कृष्णपक्षमें त्रयोदशी तिथिको मघा नक्षत्रका योग हो, उस समय जो मनुष्य दक्षिणाभिमुख हो कुतप कालमें (मध्याह्नके बाद आठवें मुहूर्तमे) जब कि हाथीकी छाया पूर्व दिशाकी ओर पड़ रही हो, उस छायामें ही स्थित हो पितरोंके निमित्त उपहारके रूपमें उत्तम अन्नका दान करता है, उस दानका जैसा विस्तृत फल बताया गया है, वह सुनो। दान करनेवाले उस पुरुषने इस जगतमें तेरह वर्षोंके लिये पितरोंका महान्‌ श्राद्ध सम्पन्न कर दिया, ऐसा जानना चाहिये

विश्वामित्र म्हणाले—त्या दानाचा गुणविस्तार व महिमा जसा आहे, तो ऐका. त्या दानामुळे त्या पुरुषाने याच लोकात पितरांसाठी तेरा वर्षांचे महान् श्राद्ध जणू पूर्ण केले, असे समजावे.

Verse 38

गाव ऊचु: बहुले समंगे हाकुतो5भये च क्षेमे च सख्येव हि भूयसी च । यथा पुरा ब्रह्मपुरे सवत्सा शतक्रतोर्वज्ञधरस्य यज्ञे,गौओंने कहा--पूर्वकालमें ब्रह्मलोकके भीतर वज्रधारी इन्द्रके यज्ञमें “बहुले! समंगे! अकुतोभये! क्षेमे! सखी, भूयसी” इन नामोंका उच्चारण करके बछड़ोंसहित गौओंकी स्तुति की गयी थी, फिर जो-जो गौएँ आकाशमें स्थित थीं और जो सूर्यके मार्गमें विद्यमान थीं, नारदसहित सम्पूर्ण देवताओंने उनका 'सर्वसहा” नाम रख दिया

गायी म्हणाल्या—हे बहुला, समंगा, अकुतोभया, क्षेमा, सखी आणि भूयसी! जसे पूर्वी ब्रह्मपुरात वज्रधारी शतक्रतु इंद्राच्या यज्ञात वासरांसह गायींची स्तुती याच नावांच्या उच्चाराने झाली होती.

Verse 39

भूयश्व या विष्णुपदे स्थिता या विभावसोभ्षापि पथे स्थिता या । देवाश्व॒ सर्वे सह नारदेन प्रकुर्वते सर्वसहेति नाम,गौओंने कहा--पूर्वकालमें ब्रह्मलोकके भीतर वज्रधारी इन्द्रके यज्ञमें “बहुले! समंगे! अकुतोभये! क्षेमे! सखी, भूयसी” इन नामोंका उच्चारण करके बछड़ोंसहित गौओंकी स्तुति की गयी थी, फिर जो-जो गौएँ आकाशमें स्थित थीं और जो सूर्यके मार्गमें विद्यमान थीं, नारदसहित सम्पूर्ण देवताओंने उनका 'सर्वसहा” नाम रख दिया

विश्वामित्र म्हणाले—पुन्हा, ज्या गायी विष्णुपदात स्थित आहेत आणि ज्या विभावसु (सूर्य) यांच्या मार्गावर स्थित आहेत, त्या सर्वांना नारदासह सर्व देवांनी ‘सर्वसहा’ असे नाव दिले.

Verse 40

मन्त्रेणैतेनाभिवन्देत यो वै विमुच्यते पापकृतेन कर्मणा । लोकानवाप्रोति पुरंदरस्य गवां फलं चन्द्रमसो झ्युतिं च,ये दोनों श्लोक मिलकर एक मन्त्र है। उस मन्त्रसे जो गौओंकी वन्दना करता है, वह पापकर्मसे मुक्त हो जाता है। गोसेवाके फलस्वरूप उसे इन्द्रलोककी प्राप्ति होती है तथा वह चन्द्रमाके समान कान्तिलाभ करता है

विश्वामित्र म्हणाले—जो या मंत्राने गायींना वंदन करतो, तो पापकर्मातून मुक्त होतो. गोसेवेच्या फळाने तो पुरंदर (इंद्र) यांचे लोक प्राप्त करतो आणि चंद्रासारखी कांति मिळवतो.

Verse 41

एतं हि मन्त्र त्रिदशाभिजुष्टं पठेत य: पर्वसु गोष्ठमध्ये । न तस्य पाप॑ न भयं न शोक: सहस्रनेत्रस्य च याति लोकम्‌,जो पर्वके दिन गोशालामें इस देवसेवित मन्त्रका पाठ करता है, उसे न पाप होता है, न भय होता है और न शोक ही प्राप्त होता है। वह सहस्र नेत्रधारी इन्द्रके लोकमें जाता है

जो पर्वकाळी गोठ्यामध्ये देवतांनी मान्य केलेला हा मंत्र पठण करतो, त्याला ना पाप, ना भय, ना शोक. तो सहस्रनेत्र इंद्राच्या लोकास जातो.

Verse 42

भीष्म उवाच अथ सप्त महाभागा ऋषयो लोकविश्रुता: । वसिष्ठप्रमुखा: सर्वे ब्रह्माणं पच्मसम्भवम्‌

भीष्म म्हणाले—त्यानंतर लोकप्रसिद्ध असे सात महाभाग ऋषी—वसिष्ठप्रमुख—धर्म व सदाचाराविषयी मार्गदर्शन घेण्यासाठी पद्मज ब्रह्मदेवाकडे गेले।

Verse 43

न तेषामशुभं किंचित्‌ कल्मषं चोपपद्यते । जो मनुष्य बौने ब्राह्मण और पानीसे निकले हुए वराहको देखकर नमस्कार करता और उनकी उठायी मृत्तिकाको मस्तकसे लगाता है, ऐसे लोगोंको कभी कोई अशुभ या पाप नहीं प्राप्त होता,उवाच वचन तेषां वसिष्ठो ब्रह्म॒वित्तम:

भीष्म म्हणाले—अशा लोकांना कधीही अशुभ किंवा पापाचा कल्मष लागत नाही. जो मनुष्य वामन ब्राह्मण आणि पाण्यातून प्रकट झालेला वराह पाहून नमस्कार करतो, आणि त्यांनी उचललेली मृत्तिका मस्तकी धारण करतो—त्याला कधीही अनिष्ट वा पाप प्राप्त होत नाही. हे वचन ब्रह्मवेत्त्यांतील श्रेष्ठ वसिष्ठांनी सांगितले।

Verse 44

सर्वप्राणिद्िितं प्रश्न॑ ब्रह्मक्षत्रे विशेषत: | उनमेंसे ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ वसिष्ठ मुनिने समस्त प्राणियोंके लिये हितकर तथा विशेषत: ब्राह्मण और क्षत्रियजातिके लिये लाभदायक प्रश्न उपस्थित किया-- || ४३ $ ।। द्रव्यहीना: कथं मर्त्या दरिद्रा: साधुवर्तिन:,“'भगवन! इस संसारमें सदाचारी मनुष्य प्रायः दरिद्र एवं द्रव्यहीन हैं। वे किस कर्मसे किस तरह यहाँ यज्ञका फल पा सकते हैं? उनकी यह बात सुनकर ब्रह्माजीने कहा

भीष्म म्हणाले—सर्व प्राण्यांच्या हिताचा, आणि विशेषतः ब्राह्मण व क्षत्रियांस उपकारक असा प्रश्न ब्रह्मवेत्त्यांतील श्रेष्ठ वसिष्ठ मुनींनी उपस्थित केला। ते म्हणाले—“भगवन्! या जगात सदाचारी मनुष्य बहुधा दरिद्री व द्रव्यहीन असतात; ते कोणत्या कर्माने आणि कशा प्रकारे येथे यज्ञफळ प्राप्त करू शकतील?”

Verse 45

प्राप्रुवन्तीह यज्ञस्य फलं केन च कर्मणा । एतच्छुत्वा वचस्तेषां ब्रह्मा वचनमब्रवीत्‌,“'भगवन! इस संसारमें सदाचारी मनुष्य प्रायः दरिद्र एवं द्रव्यहीन हैं। वे किस कर्मसे किस तरह यहाँ यज्ञका फल पा सकते हैं? उनकी यह बात सुनकर ब्रह्माजीने कहा

भीष्म म्हणाले—“ते लोक येथे यज्ञफळ कोणत्या कर्माने प्राप्त करतील?” त्यांचे वचन ऐकून ब्रह्मदेव उत्तर देऊ लागले।

Verse 46

ब्रह्मोवाच अहो प्रश्नो महाभागा गूढार्थ: परम: शुभ: । सूक्ष्म: श्रेयांश्व॒ मर्दानां भवद्धिः समुदाह्ृत:

ब्रह्मदेव म्हणाले—“अहो! महाभागांनो, हा प्रश्न गूढार्थयुक्त, परम शुभ आणि अत्यंत सूक्ष्म आहे. तो मर्त्यांच्या परम कल्याणास कारणीभूत आहे, आणि तुम्ही तो योग्य रीतीने मांडला आहे।”

Verse 47

ब्रह्माजी बोले--महान्‌ भाग्यशाली सप्तर्षियो! तुम लोगोंने परम शुभकारक, गूढ़ अर्थसे युक्त, सूक्ष्म एवं मनुष्योंके लिये कल्याणकारी प्रश्न सामने रखा है ।। श्रूयतां सर्वमाख्यास्थे नेखिलेन तपोधना: । यथा यज्ञफल मर्त्यो लभते नाज संशय:

ब्रह्मदेव म्हणाले—महाभाग्यवान सप्तर्षींनो! तुम्ही माझ्यासमोर परम शुभ, गूढार्थयुक्त, सूक्ष्म आणि मानवहितकारी असा प्रश्न मांडला आहे. तपोधन ऋषींनो, ऐका—मर्त्य मनुष्य यज्ञाचे फळ कसे प्राप्त करतो ते मी तुम्हाला सर्वस्वी सांगतो; यात संशय नाही.

Verse 48

तपोधनो! मनुष्य जिस प्रकार बिना किसी संशयके यज्ञका फल पाता है, वह सब पूर्णरूपसे बताऊँगा, सुनो ।। पौषमासस्य शुक्‍ले वै यदा युज्येत रोहिणी । तेन नक्षत्रयोगेन आकाशशयनो भवेत्‌,पौषमासके शुक्ल पक्षमें जिस दिन रोहिणी नक्षत्रका योग हो, उस दिनकी रातमें मनुष्य स्नान आदिसे शुद्ध हो एक वस्त्र धारण करके श्रद्धा और एकाग्रताके साथ खुले मैदानमें आकाशके नीचे शयन करे और चन्द्रमाकी किरणोंका ही पान करता रहे। ऐसा करनेसे उसको महान्‌ यज्ञका फल मिलता है

तपोधन ऋषींनो, ऐका—मनुष्य संशयरहितपणे यज्ञफळ कसे मिळवतो ते मी सर्वस्वी सांगतो. पौषमासाच्या शुक्ल पक्षात ज्या दिवशी रोहिणी नक्षत्राचा योग येईल, त्या रात्री आकाशाखाली शयन करावे.

Verse 49

एकवस्त्र: शुचि: स्नात: श्रद्धान: समाहित: । सोमस्य रश्मय: पीत्वा महायज्ञफलं लभेत्‌,पौषमासके शुक्ल पक्षमें जिस दिन रोहिणी नक्षत्रका योग हो, उस दिनकी रातमें मनुष्य स्नान आदिसे शुद्ध हो एक वस्त्र धारण करके श्रद्धा और एकाग्रताके साथ खुले मैदानमें आकाशके नीचे शयन करे और चन्द्रमाकी किरणोंका ही पान करता रहे। ऐसा करनेसे उसको महान्‌ यज्ञका फल मिलता है

एक वस्त्र परिधान करून, स्नानाने शुद्ध होऊन, श्रद्धायुक्त व एकाग्रचित्त होऊन, चंद्राच्या किरणांचे पान करावे; असे केल्याने महायज्ञाचे फळ प्राप्त होते.

Verse 50

एतद्‌ व: परम॑ गुह्ां कथितं द्विजसत्तमा: । यन्मां भवन्तः पृच्छन्ति सूक्ष्मतत्त्वार्थदर्शिन:,विप्रवरो! तुमलोग सूक्ष्मतत्त्व एवं अर्थके ज्ञाता हो। तुमने मुझसे जो कुछ पूछा है, उसके अनुसार मैंने तुम्हें यह परम गूढ़ रहस्य बताया है

हे द्विजश्रेष्ठांनो! तुम्ही सूक्ष्म तत्त्व व अर्थाचे द्रष्टे आहात. तुम्ही मला जे विचारले, त्यानुसार मी तुम्हाला हे परम गूढ रहस्य सांगितले आहे.

Verse 56

पूजितं च जगत्‌ तेन सदेवासुरमानुषम्‌ । जो मनुष्य अश्व॒त्थ वृक्ष, गोरोचना और गौकी सदा पूजा करता है, उसके द्वारा देवताओं, असुरों और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत्‌की पूजा हो जाती है

त्याच्याद्वारे देव, असुर आणि मनुष्यांसह संपूर्ण जगत् जणू पूजिले जाते.

Verse 63

पूजा ममैषा नास्त्यन्या यावल्‍लोका: प्रतिष्ठिता: । उस रूपमें उनके द्वारा की हुई पूजाको मैं यथार्थरूपसे अपनी पूजा मानकर ग्रहण करता हूँ। जबतक ये सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं, तबतक यह पूजा ही मेरी पूजा है। इससे भिन्न दूसरे प्रकारकी पूजा मेरी पूजा नहीं है

भीष्म म्हणाले—हीच माझी पूजा आहे; याखेरीज दुसरी नाही. जोवर हे सर्व लोक प्रतिष्ठित आहेत, तोवर त्यांनी त्याच रूपाने केलेली ही पूजा मी यथार्थपणे माझीच पूजा मानून स्वीकारतो. यापेक्षा भिन्न प्रकारची पूजा माझी पूजा नाही.

Verse 125

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पितरोंका रहस्य नामक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

अशा प्रकारे श्रीमहाभारताच्या अनुशासनपर्वातील दानधर्मपर्वात ‘पितरांचे रहस्य’ नावाचा एकशे पंचविसावा अध्याय समाप्त झाला.

Verse 126

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि देवरहस्ये षड्विंशत्यधिकशततमो<ध्याय:

इति श्रीमहाभारताच्या अनुशासनपर्वातील दानधर्मपर्वात ‘देवरहस्य’ विषयक एकशे सव्वीसावा अध्याय समाप्त.

Verse 253

पिण्डदास्तस्य हीयन्ते न च प्रीणाति वै पितृन्‌ । धर्मने कहा--ब्राह्मण यदि राजाका कर्मचारी हो, वेतन लेकर घण्टा बजानेका काम करता हो, दूसरोंका सेवक हो, गोरक्षा एवं वाणिज्यका व्यवसाय करता हो, शिल्पी या नट हो, मित्रद्रोही हो, वेद न पढ़ा हो अथवा शूद्र जातिकी स्त्रीका पति हो, ऐसे लोगोंको किसी तरह भी देवकार्य (यज्ञ) और पितृकार्य (श्राद्ध) का अन्न आदि नहीं देना चाहिये। जो इन्हें पिण्ड या अन्न देते हैं, उनकी अवनति होती है तथा उनके पितरोंको भी तृप्ति नहीं होती

धर्म म्हणाले—अशा अपात्रांना पिंडदान करणाऱ्याचे पुण्य क्षीण होते आणि पितरही तृप्त होत नाहीत. ब्राह्मण जर राजाचा कर्मचारी असेल, वेतन घेऊन घंटा वाजविण्याचे काम करीत असेल, परसेवक असेल, गोरक्षा वा वाणिज्य हा व्यवसाय करीत असेल, शिल्पी किंवा नट असेल, मित्रद्रोही असेल, वेदाध्ययन केलेले नसेल, अथवा शूद्रजातीच्या स्त्रीचा पती असेल—अशा लोकांना कोणत्याही प्रकारे देवकार्य (यज्ञ) व पितृकार्य (श्राद्ध) यांचे अन्नादी देऊ नये. जे त्यांना पिंड किंवा अन्न देतात, त्यांची अवनती होते आणि त्यांच्या पितरांनाही तृप्ती होत नाही.

Verse 293

तस्य दोषान्‌ प्रवक्ष्यामि तच्छुणुध्वं समाहिता: । अग्नि बोले--जो दुर्बुद्धि मनुष्य लात उठाकर उससे गौका, महाभाग ब्राह्मणका अथवा प्रज्वलित अग्निका स्पर्श करता है, उसके दोष बता रहा हूँ, सब लोग एकाग्रचित्त होकर सुनो

धर्म म्हणाले—त्याचे दोष मी सांगतो; तुम्ही सर्वांनी एकाग्र होऊन ऐका. जो दुर्बुद्धी मनुष्य पाय उचलून गायीला, महाभाग ब्राह्मणाला किंवा प्रज्वलित अग्नीला स्पर्श करतो, त्याचे दोष मी सांगत आहे; सर्वांनी समाहित चित्ताने ऐकावे.

Verse 423

प्रदक्षिणमभ्रिक्रम्य सर्वे प्राजजलय: स्थिता: । भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर महान्‌ सौभाग्यशाली विश्वविख्यात वसिष्ठ आदि सभी सप्तर्षियोंने कमलयोनि ब्रह्माजीकी प्रदक्षिणा की और सब-के-सब हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गये

भीष्म म्हणाले—राजन्! त्यानंतर वसिष्ठ आदि विश्वविख्यात महाभाग्यवान सप्तर्षींनी कमलयोनी ब्रह्मदेवाची प्रदक्षिणा केली; आणि मग सर्वजण हात जोडून त्यांच्या समोर नम्रतेने उभे राहिले.

Frequently Asked Questions

Umā asks how to interpret ethical and karmic responsibility when individuals are described as moving across social categories—especially whether contrary practice (pratiloma) can be reconciled with dharma and what actions cause decline or enable ascent.

The chapter’s central instruction is that ethical conduct (vṛtta/ācāra), disciplined restraint, and adherence to dharma are treated as determinative for spiritual and social recognition, while abandonment of duty and impure, harmful behaviors are framed as causes of degradation.

Yes: the discourse explicitly states that birth, rites, or learning alone are not sufficient causes; rather, vṛtta (lived conduct) is asserted as the decisive criterion by which “brāhmaṇa/dvija” status is evaluated in the world.