Adhyaya 12
Anushasana ParvaAdhyaya 1258 Verses

Adhyaya 12

Bhaṅgāśvanopākhyāna — On comparative affection in strī–puruṣa union (भङ्गाश्वनोपाख्यानम्)

Upa-parva: Anuśāsana (Didactic Dialogues) — Itihāsa of Bhaṅgāśvana and Śakra (Indra)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to resolve a doubt: in the physical union of woman and man, whose “touch/affective impact” is greater. Bhīṣma responds by citing an ancient narrative about King Bhaṅgāśvana, a highly dharmic ruler who, being without heirs, performs a sacrifice for sons. Śakra (Indra), portrayed as antagonized by the king’s ritual stance, seeks an opportunity to disrupt him; during a hunting excursion the king becomes disoriented, reaches a beautiful lake, and upon bathing is transformed into a woman. Returning in this altered state, the king confronts social and political complications, installs his sons to rule, and retreats to the forest. In an āśrama context, the transformed king bears another hundred sons. Later, Śakra—disguised as a brāhmaṇa—provokes division between the two sets of sons, leading to conflict and grief. When Śakra reveals himself, he grants a boon: which sons should live, those born when the ruler was male or those born when transformed. The transformed ruler chooses the latter, asserting that a woman’s affection is greater than a man’s; Śakra, pleased, restores life broadly and offers a further choice of gender-state. The ruler elects to remain female, citing greater pleasure and satisfaction in that condition. Bhīṣma closes by deriving the general proposition: in this frame, a woman’s prīti is described as greater.

Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि कृतघ्नता की गति और प्रायश्चित्त के विषय में एक प्राचीन इतिहास सुनो—जहाँ स्वयं इन्द्र का वैर और एक राजर्षि का विचित्र रूपान्तरण धर्म-चर्चा को तीखा बना देता है। → अत्यन्त धर्मात्मा, पर अपुत्र, राजर्षि भंगास्वन पुत्रार्थ यज्ञ करते हैं और कालक्रम से उनके दो सौ पुत्रों का विनाश हो जाता है। शोक में डूबी अवस्था में इन्द्र प्रकट होकर कठोर वचन कहता है—पुराने अपमान/दुःख का स्मरण कराकर वैर को जाग्रत करता है और राजा के सामने असाधारण विकल्प रखता है: पुरुषत्व या स्त्रीत्व में से एक चुनो। → इन्द्र के वर-प्रस्ताव के बाद भंगास्वन का स्त्रीरूप में परिणत होना और उसी रूप में नगर में लौटना—जहाँ पुत्र, स्त्रियाँ, सेवक और प्रजा विस्मय से भर उठते हैं—कथा का शिखर है; पहचान, कर्तव्य और सामाजिक दृष्टि एक साथ टकराते हैं। → स्त्रीभूत भंगास्वन अपने जीवन के नाम-गोत्र, दार, मन्त्रियों और राज्य-व्यवस्था के बीच स्वयं को स्थापित करने का प्रयत्न करते हैं; अंततः इन्द्र के चरणों में शरण लेकर क्षमा-याचना करते हैं और वैर-प्रसंग का शमन/प्रायश्चित्त की दिशा स्पष्ट होती है। → इन्द्र की प्रसन्नता और भंगास्वन के लिए अंतिम व्यवस्था (स्थायी रूप, पुत्रों/राज्य का भविष्य) किस प्रकार निश्चित होती है—यह आगे की कथा-धारा में पूर्ण रूप से खुलती है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २३ श्लोक हैं) ऑपन--#रू< बक। है २ >> द्ादशोड् ध्याय: कृतघ्नकी गति और प्रायश्षित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान (युधिष्ठिर उदाच प्रायक्षित्तं कृतघ्नानां प्रतिब्रूहि पितामह । बगिलिक [ गुरूंश्वैव येडवमन्यन्ति मोहिता: ।। पूछा--पितामह! जो मोहवश माता-पिता तथा गुरुजनोंका अपमान करते हैं उन कृतघ्नोंके लिये कया प्रायश्चित्त है? यह बताइये ।। ये चाप्यन्ये परे तात कृतघ्ना निरपत्रपा: । तेषां गति महाबाहो श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।। तात! महाबाहो! दूसरे भी जो निर्लज्ज एवं कृतघ्न हैं उनकी गति कैसी होती है? यह सब मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ।। भीष्म उवाच कृतघ्नानां गतिस्तात नरके शाश्वती: समा: । मातापितृगुरूणां च ये न तिष्ठन्ति शासने ।। कृमिकीटपिपीलेषु जायन्ते स्थावरेषु च । दुर्लभो हि पुनस्तेषां मानुष्ये पुनरुद्‌भव: ।। भीष्मजीने कहा--तात! कृतघ्नोंकी एक ही गति है, सदाके लिये नरकमें पड़े रहना। जो माता-पिता तथा गुरुजनोंकी आज्ञाके अधीन नहीं रहते हैं वे कृमि, कीट, पिपीलिका और वृक्ष आदिकी योनियोंमें जन्म लेते हैं। मनुष्ययोनिमें फिर जन्म होना उनके लिये दुर्लभ हो जाता है ।। अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ | वत्सनाभो महाप्राज्ञों महर्षि: संशितव्रत: ।॥ वल्मीकभूतो ब्रद्वार्षिस्तप्यते सुमहत्तप: । इस विषयमें जानकार मनुष्य इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण देते हैं। वत्सनाभ नामवाले एक परम बुद्धिमान्‌ महर्षि कठोर व्रतके पालनमें लगे थे। उनके शरीरपर दीमकोंने घर बना लिया था; अतः वे ब्रह्मर्षि बाँबीरूप हो गये थे और उसी अवस्थामें वे बड़ी भारी तपस्या करते थे ।। तस्मिंश्न॒ तप्पति तपो वासवो भरतर्षभ ।। ववर्ष सुमहद्‌ वर्ष सविद्युत्स्तनयित्नुमान्‌ । भरतश्रेष्ठ] उनके तप करते समय इन्द्रनें बिजलीकी चमक और मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके साथ बड़ी भारी वर्षा आरम्भ कर दी ।। तत्र सप्ताहवर्ष तु मुमुचे पाकशासन: । निमीलिताक्षस्तद्वर्ष प्रत्यगृह्नीत वै द्विज: ।। पाकशासन इन्द्रने लगातार एक सप्ताहतक वहाँ जल बरसाया और वे ब्राह्मण वत्सनाभ आँख मूँदकर चुपचाप उस वर्षाका आघात सहन करते रहे ।। तस्मिन्‌ पतति वर्षे तु शीतवातसमन्विते । विशीर्णध्वस्तशिखरो वल्मीको5शनिताडित: ।। सर्दी और हवासे युक्त वह वर्षा हो ही रही थी कि बिजलीसे आहत हो उस वल्मीक (बाँबी)-का शिखर टूटकर बिखर गया ।। ताड्यमाने ततस्तस्मिन्‌ वत्सनाभे महात्मनि । कारुण्यात्‌ तस्य धर्म: स्वमानृशंस्थमथाकरोत्‌ ।। अब महामना वत्सनाभपर उस वर्षाकी चोट पड़ने लगी। यह देख धर्मके हृदयमें करुणा भर आयी और उन्होंने वत्सनाभपर अपनी सहज दया प्रकट की ।। चिन्तयानस्य ब्रह्मूर्षि तपन्तमधिथधार्मिकम्‌ | अनुरूपा मति: क्षिप्रमुपजाता स्वभावजा ।। तपस्यामें लगे हुए उन अत्यन्त धार्मिक ब्रह्मर्षिकी चिन्ता करते हुए धर्मके हृदयमें शीघ्र ही स्वाभाविक सुबुद्धिका उदय हुआ, जो उन्हींके अनुरूप थी ।। स्वं रूप॑ माहिषं कृत्वा सुमहान्तं मनोहरम्‌ | त्राणार्थ वत्सनाभस्य चतुष्पादुपरि स्थित: ।। वे विशाल और मनोहर भैंसेका-सा अपना स्वरूप बनाकर वत्सनाभकी रक्षाके लिये उनके चारों ओर अपने चारों पैर जमाकर उनके ऊपर खड़े हो गये ।। यदा त्वपगतं वर्ष शीतवातसमन्वितम्‌ । ततो महिषरूपी स धर्मो धर्मभृतां वर ।। शनैर्वल्मीकमुत्सृज्य प्राद्रवद्‌ भरतर्षभ । स्थिते5स्मिन्‌ वृष्टिसम्पाते रक्षित: स महातपा: ।। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भरतभूषण युधिष्ठिर! जब शीतल हवासे युक्त वह वर्षा बंद हो गयी तब भैंसेका रूप धारण करनेवाले धर्म धीरेसे उस वल्मीकको छोड़कर वहाँसे दूर खिसक गये। उस मूसलाधार वर्षामें महिषरूपधारी धर्मके खड़े हो जानेसे महातपस्वी वत्सनाभकी रक्षा हो गयी ।। दिश: सुविपुलास्तत्र गिरीणां शिखराणि च ।। दृष्टवा च पृथिवीं सर्वां सलिलेन परिप्लुताम्‌ । जलाशयानू स तानू्‌ दृष्ट्वा विप्र: प्रमुदितो5भवत्‌ ।। तदनन्तर वहाँ सुविस्तृत दिशाओं, पर्वतोंके शिखरों, जलमें डूबी हुई सारी पृथ्वी और जलाशयोंको देखकर ब्राह्मण वत्सनाभ बहुत प्रसन्न हुए ।। अचिन्तयद्‌ विस्मितश्न वर्षात्‌ केनाभिरक्षित: । ततो<पश्यत्‌ त॑ महिषमवस्थितमदूरत: ।। फिर वे विस्मित होकर सोचने लगे कि “इस वर्षासे किसने मेरी रक्षा की है। इतनेहीमें पास ही खड़े हुए उस भैंसेपर उनकी दृष्टि पड़ी ।। तिर्यग्योनावपि कथं दृश्यते धर्मवत्सल: । अतो नु भद्रे महिष: शिलापट्ट इव स्थित: । पीवरश्नैव शूल्यश्व बहुमांसो भवेदयम्‌ ।। “अहो! पशुयोनिमें पैदा होकर भी यह कैसा धर्मवत्सल दिखायी देता है? निश्चय ही यह भैंसा मेरे ऊपर शिलापट्टके समान खड़ा हो गया था। इसीलिये मेरा भला हुआ है। यह बड़ा मोटा और बहुत मांसल है' ।। तस्य बुद्धिरियं जाता धर्मसंसक्तिजा मुने: । कृतघ्ना नरकं यान्ति ये तु विश्वासघातिन: ।। तदनन्तर धर्ममें अनुराग होनेके कारण मुनिके हृदयमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि “जो विश्वासघाती एवं कृतघ्न मनुष्य हैं, वे नरकमें पड़ते हैं ।। निष्कृतिं नैव पश्यामि कृतघ्नानां कथंचन । ऋते प्राणपरित्यागं धर्मज्ञानां वचो यथा ।। “मैं प्राण-त्यागके सिवा कृतघ्नोंके उद्धारका दूसरा कोई उपाय किसी तरह नहीं देख पाता। धर्मज्ञ पुरुषोंका कथन भी ऐसा ही है ।। अकृत्वा भरणं पित्रोरदत्त्वा गुरुदक्षिणाम्‌ । कृतघ्नतां च सम्प्राप्प मरणान्ता च निष्कृति: ।। 'पिता-माताका भरण-पोषण न करके तथा गुरुदक्षिणा न देकर मैं कृतघ्नभावको प्राप्त हो गया हूँ। इस कृतघ्नताका प्रायश्षित्त है स्वेच्छासे मृत्युको वरण कर लेना ।। आकाड्ुक्षायामुपेक्षायां चोपपातकमुत्तमम्‌ । तस्मात्‌ प्राणान्‌ परित्यक्ष्ये प्रायश्षित्तार्थमित्युत ।। “अपने कृतघ्न जीवनकी आकांक्षा और प्रायश्चित्तकी उपेक्षा करनेपर भी भारी उपपातक भी बढ़ता रहेगा। अतः मैं प्रायश्षित्तके लिये अपने प्राणोंका परित्याग करूँगा” ।। स मेरुशिखरं गत्वा निस्सज्लेनान्तरात्मना । प्रायश्षित्तं कर्तुकाम: शरीर त्यक्तुमुद्यत: ।। निगृहीतश्च धर्मात्मा हस्ते धर्मेण धर्मवित्‌ ।। अनासक्त चित्तसे मेरु पर्वतके शिखरपर जाकर प्रायश्चित्त करनेकी इच्छासे अपने शरीरको त्याग देनेके लिये उद्यत हो गये। इसी समय धर्मने आकर उन थधर्मज्ञ, धर्मात्मा वत्सनाभका हाथ पकड़ लिया ।। धर्म उवाच वत्सनाभ महाप्राज्ञ बहुवर्षशतायुष: । परितुष्टो5स्मि त्यागेन नि:ःसड्रेन तथा55त्मन: ।। धर्मने कहा--महाप्राज्ञ वत्सनाभ! तुम्हारी आयु कई सौ वर्षोकी है। तुम्हारे इस आसक्तिरहित आत्मत्यागके विचारसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ ।। एवं धर्मभूत: सर्वे विमृशन्ति तथा कृतम्‌ । नस कक्रिद्‌ वत्सनाभ यस्य नोपहतं मनः ।। यश्चानवद्यश्नरति शक्तो धर्म तु सर्वशः | निवर्तस्व महाप्राज्ञ भूतात्मा हासि शाश्वत: ।।) इसी प्रकार सभी धर्मात्मा पुरुष अपने किये हुए कर्मकी आलोचना करते हैं। वत्सनाभ! जगत्‌में कोई ऐसा पुरुष नहीं है जिसका मन कभी दूषित न हुआ हो। जो मनुष्य निन्द्य कर्मोंसे दूर रहकर सब तरहसे धर्मका आचरण करता है वही शक्तिशाली है। महाप्राज्ञ! अब तुम प्राणत्यागके संकल्पसे निवृत्त हो जाओ, क्योंकि तुम सनातन (अजर- अमर) आत्मा हो ।। युधिछिर उवाच स्त्रीपुंसयो: सम्प्रयोगे स्पर्श: कस्याधिको भवेत्‌ । एतस्मिन्‌ संशये राजन्‌ यथावद्‌ वक्तुमहसि,युधिष्ठिरने पूछा--राजन्‌! स्त्री और पुरुषके संयोगमें विषयसुखकी अनुभूति किसको अधिक होती है (स्त्रीको या पुरुषको)? इस संशयके विषयमें आप यथावत्‌्रूपसे बतानेकी कृपा करें

युधिष्ठिर म्हणाला— “पितामह! जे मूढपणाने माता-पिता आणि गुरूजनांचा अपमान करतात, त्या कृतघ्नांचे प्रायश्चित्त मला सांगा. आणि हे तात, जे इतरही निर्लज्ज व कृतघ्न आहेत—महाबाहो, त्यांची गती नेमकी कशी होते, ते मी तत्त्वतः ऐकू इच्छितो.”

Verse 2

भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । भंगास्वनेन शक्रस्य यथा वैरमभूत्‌ पुरा,भीष्मजीने कहा--राजन्‌! इस विषयमें भी भंगास्वनके साथ इन्द्रका पहले जो वैर हुआ था, उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है

भीष्म म्हणाले— “राजन्! या विषयातही लोक एक प्राचीन इतिहासाचा दाखला देतात—पूर्वी भंगास्वन आणि शक्र (इंद्र) यांच्यात वैर कसे उत्पन्न झाले ते।”

Verse 3

पुरा भंगास्वनो नाम राजर्षिरतिधार्मिक: । अपुत्र: पुरुषव्याघ्र पुत्रार्थ यज्ञमाहरत्‌,पुरुषसिंह! पहलेकी बात है, भंगास्वन नामसे प्रसिद्ध अत्यन्त धर्मात्मा राजर्षि पुत्रहीन होनेके कारण पुत्र-प्राप्तिके लिये यज्ञ करते थे

भीष्म म्हणाले— “पुरुषव्याघ्र! प्राचीन काळी भंगास्वन नावाचा अत्यंत धर्मनिष्ठ राजर्षी होता. तो अपुत्र होता; म्हणून पुत्रप्राप्तीसाठी त्याने यज्ञ आरंभ केला.”

Verse 4

अग्निष्ठृतं स राजर्षिरिन्द्रद्धिष्ट महाबल: । प्रायक्षित्तेषु मर्त्यानां पुत्रकामेषु चेष्यते,उन महाबली राजर्षिने अग्निष्टत नामक यज्ञका आयोजन किया था। उसमें इन्द्रकी प्रधानता न होनेके कारण इन्द्र उस यज्ञसे द्वेष रखते हैं। वह यज्ञ मनुष्योंके प्रायश्रित्तके अवसरपर अथवा पुत्रकी कामना होनेपर अभीष्ट मानकर किया जाता है

भीष्म म्हणाले— “त्या महाबली राजर्षीने ‘अग्निष्टृत’ नावाचा यज्ञ केला. त्यात इंद्राला अग्रस्थान न दिल्यामुळे इंद्र त्या यज्ञाचा द्वेष करीत होता. पण मनुष्यांमध्ये हा यज्ञ प्रायश्चित्तासाठी तसेच पुत्रकामनेसाठीही इष्ट मानला जातो.”

Verse 5

इन्द्रो ज्ञात्वा तु तं यज्ञ महाभाग: सुरेश्वर: । अन्तरं तस्य राजर्षेरन्विच्छन्नियतात्मन:,महाभाग देवराज इन्द्रकों जब उस यज्ञकी बात मालूम हुई तब वे मनको वशमें रखनेवाले राजर्षि भंगास्वनका छिठ्र ढूँढ़ने लगे

भीष्म म्हणाले— “त्या यज्ञाची वार्ता कळताच महाभाग देवेश्वर इंद्र, मनोनिग्रह असलेल्या त्या राजर्षीच्या आचरणात काही दोष—काही छिद्र—शोधू लागला.”

Verse 6

न चैवास्यान्तरं राजन्‌ स ददर्श महात्मन: । कस्यचित्त्वय कालस्य मृगयां गतवान्‌ नृप:,राजन! बहुत ढूँढ़नेपर भी वे उस महामना नरेशका कोई छिद्र न देख सके। कुछ कालके अनन्तर राजा भंगास्वन शिकार खेलनेके लिये वनमें गये

राजन्! फार शोध घेऊनही त्या महात्मा नृपामध्ये कोणताही दोष वा दुर्बल बिंदू दिसला नाही. काही काळानंतर तो राजा मृगयेसाठी वनात गेला.

Verse 7

इदमन्तरमित्येव शक्रो नृपममोहयत्‌ । एकाशथ्चैन च राजर्षि भ्रान्त इन्द्रेण मोहित:,नरेश्वर! “यही बदला लेनेका अवसर है' ऐसा निश्चय करके इन्द्रने राजाको मोहमें डाल दिया। इन्द्रद्वारा मोहित एवं भ्रान्त हुए राजर्षि भंगास्वन एकमात्र घोड़ेके साथ इधर-उधर भटकने लगे। उन्हें दिशाओंका भी पता नहीं चलता था। वे भूख-प्याससे पीड़ित तथा परिश्रम और तृष्णासे विकल हो इधर-उधर घूमते रहे

नरेश्वर! “हीच सूड घेण्याची संधी” असा निश्चय करून शक्र (इंद्र) याने राजाला मोहात पाडले. इंद्राच्या मायेमुळे भ्रमित झालेला राजर्षी भंगास्वन केवळ एका घोड्यासह दिशाहीन होऊन इकडे-तिकडे भटकू लागला; दिशांचेही भान राहिले नाही. तो भूक-तहानाने पीडित, श्रम व तृष्णेने व्याकुळ होऊन फिरत राहिला.

Verse 8

न दिशो<विन्दत नृप: क्षुत्पिपासार्दितस्तदा । इतश्रैतश्न वै राजन्‌ श्रमतृष्णान्वितो नूप,नरेश्वर! “यही बदला लेनेका अवसर है' ऐसा निश्चय करके इन्द्रने राजाको मोहमें डाल दिया। इन्द्रद्वारा मोहित एवं भ्रान्त हुए राजर्षि भंगास्वन एकमात्र घोड़ेके साथ इधर-उधर भटकने लगे। उन्हें दिशाओंका भी पता नहीं चलता था। वे भूख-प्याससे पीड़ित तथा परिश्रम और तृष्णासे विकल हो इधर-उधर घूमते रहे

त्या वेळी भूक-तहानाने पीडित झालेला राजा दिशाही ओळखू शकला नाही. राजन्! श्रम व तृष्णेने व्याकुळ होऊन तो इकडे-तिकडे भटकत राहिला.

Verse 9

सरो<पश्यत्‌ सुरुचिरं पूर्ण परमवारिणा । सो<5वगाहा सरस्तात पाययामास वाजिनम्‌,तात! घूमते-घूमते उन्होंने उत्तम जलसे भरा हुआ एक सुन्दर सरोवर देखा। उन्होंने घोड़ेको उस सरोवरमें स्नान कराकर पानी पिलाया

तात! भटकत-भटकत त्याने उत्तम पाण्याने भरलेले अतिशय सुंदर सरोवर पाहिले. त्या सरोवरात उतरून त्याने घोड्याला स्नान घातले आणि पाणी पाजले.

Verse 10

अथ पीतोदकं सोश्व॑ वृक्षे बद्ध्वा नृपोत्तम: । अवगाहा ततः स्नातत्तत्र स्त्रीत्वमवाप्तवान्‌,जब घोड़ा पानी पी चुका तब उसे एक वृक्षमें बाँधकर वे श्रेष्ठ नरेश स्वयं भी जलमें उतरे। उसमें स्नान करते ही वे राजा स्त्रीभावको प्राप्त हो गये

घोड्याने पाणी प्याल्यावर श्रेष्ठ नृपाने त्याला एका वृक्षाला बांधले. मग तो स्वतः पाण्यात उतरून स्नान करू लागला; तेथे स्नान करताच त्याला स्त्रीत्व प्राप्त झाले.

Verse 11

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपरव्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें लक्ष्मी और रुक्मिणीका संवादविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ,आत्मानं स्त्रीकृतं दृष्टवा व्रीडितो नृपसत्तम: । चिन्तानुगतसर्वात्मा व्याकुलेन्द्रियचेतन:

स्वतःला स्त्रीरूप झालेला पाहून नृपश्रेष्ठ लज्जेने व्याकुळ झाला. त्याचे सर्व अंतःकरण चिंतेत बुडाले आणि इंद्रिये व चेतना अस्थिर झाली.

Verse 12

अपनेको स्त्रीरूपमें देखकर राजाको बड़ी लज्जा हुई। उनके सारे अन्तःकरणमें भारी चिन्ता व्याप्त हो गयी। उनकी इन्द्रियाँ और चेतना व्याकुल हो उठीं ।। आरोहिष्ये कथं त्वश्वं कथं यास्यामि वै पुरम्‌ । इष्टेनाग्निष्टता चापि पुत्राणां शतमौरसम्‌,वे स्त्रीरूपमें इस प्रकार सोचने लगे--अब मैं कैसे घोड़ेपर चढूँगी? कैसे नगरको जाऊँगी? मेरे अग्निष्टत यज्ञके अनुष्ठानसे मुझे सौ महाबलवान्‌ औरस पुत्र प्राप्त हुए हैं। उन सबसे क्या कहूँगी? अपनी स्त्रियों तथा नगर और जनपदके लोगोंमें कैसे जाऊँगी? इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि भज्ञास्वनोपाख्याने द्वादशोडध्याय:

स्त्रीरूपात स्वतःला पाहून राजाला मोठी लाज वाटली. त्याच्या मनात तीव्र चिंता पसरली; इंद्रिये व चेतना व्याकुळ झाली. तो विचार करू लागला—“आता मी घोड्यावर कसा चढू? नगरात कसा जाऊ? मी विधिपूर्वक अग्निष्टुत यज्ञ केला आहे; त्यातून माझ्या स्वतःच्या देहापासून जन्मलेले शंभर महाबली पुत्र मला मिळाले—त्यांना मी काय सांगू? माझ्या राण्यांमध्ये, तसेच नगर व जनपदातील लोकांमध्ये मी कसा जाऊ?”

Verse 13

जात॑ महाबलानां मे तान्‌ प्रवक्ष्यामि कि त्वहम्‌ दारेषु चात्मकीयेषु पौरजानपदेषु च,वे स्त्रीरूपमें इस प्रकार सोचने लगे--अब मैं कैसे घोड़ेपर चढूँगी? कैसे नगरको जाऊँगी? मेरे अग्निष्टत यज्ञके अनुष्ठानसे मुझे सौ महाबलवान्‌ औरस पुत्र प्राप्त हुए हैं। उन सबसे क्या कहूँगी? अपनी स्त्रियों तथा नगर और जनपदके लोगोंमें कैसे जाऊँगी?

“माझे महाबली पुत्र जन्मले आहेत—आता मी त्यांना काय सांगू? आणि माझ्याच अंतःपुरातील स्त्रियांमध्ये, तसेच नगर व जनपदातील लोकांमध्ये मी कसा परत जाऊ?”

Verse 14

मृदुत्वं च तनुत्वं च विक्लवत्वं तथैव च । स्त्रीगुणा ऋषिश्ि: प्रोक्ता धर्मतत्त्वार्थदर्शिभि:,“धर्मके तत्त्वको देखने और जाननेवाले ऋषियोंने मृदुता, कृशता और व्याकुलता--ये सत्रीके गुण बताये हैं

“मृदुता, तनुता (कृशता) आणि विकलता—धर्मतत्त्व व अर्थ जाणणाऱ्या ऋषींनी हे स्त्रीचे गुण सांगितले आहेत.”

Verse 15

व्यायामे कर्कशत्वं च वीर्य च पुरुषे गुणा: । पौरुषं विप्रणष्टं वै स्त्रीत्वं केनापि मे5भवत्‌,“परिश्रम करनेमें कठोरता और बल-पराक्रम--ये पुरुषके गुण हैं। मेरा पौरुष नष्ट हो गया और किसी अज्ञात कारणसे मुझमें स्त्रीत्व प्रकट हो गया

“परिश्रमात कठोरता आणि बल-पराक्रम—हे पुरुषाचे गुण आहेत. पण माझे पौरुष खरोखरच नष्ट झाले आहे आणि कोणत्यातरी अज्ञात कारणाने माझ्यात स्त्रीत्व प्रकट झाले आहे.”

Verse 16

स्त्रीभावात्‌ पुनरश्चं तं कथमारोदुमुत्सहे । महता त्वथ यत्नेन आरुद्माश्वं नराधिप:

त्या स्त्रीभावामुळे मी पुन्हा त्या अश्वावर कसा आरूढ होऊ? तरीही मोठ्या प्रयत्नाने अखेरीस त्या नराधिपाने अश्वारोहण केले.

Verse 17

पुत्रा दाराश्न भृत्याश्न पौरजानपदाश्न ते

तुझे पुत्र, तुझ्या पत्नी, तुझे सेवक, तसेच नगर व जनपदातील प्रजा—हे सर्व तुझ्याच उत्तरदायित्वाच्या कक्षेत येतात.

Verse 18

अथोवाच स राजर्षि: स्त्रीभूतो वदतां वर:,तब स्त्रीरूपधारी, वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजर्षि भंगास्वन बोले--“मैं अपनी सेनासे घिरकर शिकार खेलनेके लिये निकला था; परंतु दैवकी प्रेरणासे भ्रान्तचित्त होकर एक भयानक वनमें जा घुसा

तेव्हा तो राजर्षी—स्त्रीरूप प्राप्त करून, वक्त्यांमध्ये श्रेष्ठ—बोलला. तेथे स्त्रीरूपधारी राजर्षी भंगास्वन म्हणाला—“मी माझ्या सैन्याने वेढलेला शिकार करण्यास निघालो होतो; परंतु दैवाच्या प्रेरणेने चित्त भ्रमित झाले आणि मी एका घोर अरण्यात शिरलो.”

Verse 19

मृगयामस्मि निर्यातो बलै: परिवृतो दृढम्‌ । उदशभ्रान्त: प्राविशं घोरामटवीं दैवचोदित:,तब स्त्रीरूपधारी, वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजर्षि भंगास्वन बोले--“मैं अपनी सेनासे घिरकर शिकार खेलनेके लिये निकला था; परंतु दैवकी प्रेरणासे भ्रान्तचित्त होकर एक भयानक वनमें जा घुसा

मी माझ्या सैन्याने दृढपणे वेढलेला शिकार करण्यास निघालो होतो; परंतु दैवाच्या प्रेरणेने चित्त भ्रमित झाले आणि मी एका घोर अरण्यात शिरलो.

Verse 20

अटबव्यां च सुघोरायां तृष्णातों नष्टचेतन: । सर: सुरुचिरप्रख्यमपश्यं पक्षिभिवृतम्‌,उस घोर वनमें प्याससे पीड़ित एवं अचेत-सा होकर मैंने एक सरोवर देखा, जो पक्षियोंसे घिर हुआ और मनोहर शोभासे सम्पन्न था

त्या अत्यंत घोर अरण्यात तहानेने व्याकुळ व जणू चेतना हरपल्यासारखा होऊन मी एक सरोवर पाहिले—मनोहर शोभेसाठी प्रसिद्ध—जे पक्ष्यांनी वेढलेले होते.

Verse 21

उस सरोवरमें उतरकर स्नान करते ही दैवने मुझे स्त्री बना दिया। अपनी स्त्रियों और मन्त्रियोंके नाम-गोत्र बताकर उन स्त्रीरूपधारी श्रेष्ठ नरेशने अपने पुत्रोंसे कहा--'पुत्रो! तुमलोग आपसमें प्रेमपूर्वक्क रहकर राज्यका उपभोग करो। अब मैं वनको चला जाऊँगा'

त्या सरोवरात उतरून स्नान करताच दैवाने मला स्त्री केले. मग स्त्रीरूप धारण केलेल्या त्या श्रेष्ठ नृपाने आपल्या स्त्रिया व मंत्र्यांची नावे-गोत्रे सांगून पुत्रांना म्हटले— “पुत्रांनो! तुम्ही परस्पर प्रेमाने एकत्र राहून राज्याचा उपभोग घ्या. आता मी वनात जाईन.”

Verse 22

आह पुत्रांस्ततः सो5थ स्त्रीभूत: पार्थिवोत्तम: । सम्प्रीत्या भुज्यतां राज्यं वनं यास्यामि पुत्रका:,उस सरोवरमें उतरकर स्नान करते ही दैवने मुझे स्त्री बना दिया। अपनी स्त्रियों और मन्त्रियोंके नाम-गोत्र बताकर उन स्त्रीरूपधारी श्रेष्ठ नरेशने अपने पुत्रोंसे कहा--'पुत्रो! तुमलोग आपसमें प्रेमपूर्वक्क रहकर राज्यका उपभोग करो। अब मैं वनको चला जाऊँगा'

भीष्म म्हणाले— तेव्हा स्त्रीरूप झालेले ते श्रेष्ठ नृप पुत्रांना म्हणाले— “पुत्रांनो! प्रेमाने एकत्र राहून राज्याचा उपभोग घ्या; मी वनात जाईन.”

Verse 23

एवमुक्‍्त्वा पुत्रशतं वनमेव जगाम ह | गत्वा चैवाश्रमं सा तु तापसं प्रत्यपद्यत,अपने सौ पुत्रोंसे ऐसा कहकर राजा वनको चले गये। वह स्त्री किसी आश्रममें जाकर एक तापसके आश्रयमें रहने लगी

असे बोलून राजा आपल्या शंभर पुत्रांना मागे ठेवून वनात निघून गेला. ती स्त्री एका आश्रमात जाऊन एका तपस्व्याच्या आश्रयास राहू लागली.

Verse 24

तापसेनास्य पुत्राणामाश्रमेष्वभवच्छतम्‌ । अथ सा<55दाय तानू्‌ सर्वान्‌ पूर्वपुत्रानभाषत,उस तपस्वीसे आश्रममें उसके सौ पुत्र हुए। तब वह रानी अपने उन पुत्रोंको लेकर पहलेवाले पुत्रोंक पास गयी और उनसे इस प्रकार बोली--'पुत्रो! जब मैं पुरुषरूपमें थी तब तुम मेरे सौ पुत्र हुए थे और जब स्त्रीरूपमें आयी हूँ तब ये मेरे सौ पुत्र हुए हैं। तुम सब लोग एकत्र होकर साथ-साथ भ्रातृभावसे इस राज्यका उपभोग करो'

भीष्म म्हणाले— त्या तपस्व्याच्या आश्रमात तिला शंभर पुत्र झाले. मग राणी त्या सर्वांना घेऊन आपल्या पूर्वीच्या पुत्रांकडे गेली आणि म्हणाली— “पुत्रांनो! मी पुरुषरूपात असताना तुम्ही माझे शंभर पुत्र होता; आणि आता मी स्त्रीरूपात आले असता हे माझे शंभर पुत्र आहेत. तुम्ही सर्वांनी एकत्र येऊन भ्रातृभावाने हे राज्य भोगा व सांभाळा.”

Verse 25

पुरुषत्वे सुता यूय॑ स्त्रीत्वे चेमे शतं सुता: । एकत्र भूज्यतां राज्यं भ्रातृभावेन पुत्रका:,उस तपस्वीसे आश्रममें उसके सौ पुत्र हुए। तब वह रानी अपने उन पुत्रोंको लेकर पहलेवाले पुत्रोंक पास गयी और उनसे इस प्रकार बोली--'पुत्रो! जब मैं पुरुषरूपमें थी तब तुम मेरे सौ पुत्र हुए थे और जब स्त्रीरूपमें आयी हूँ तब ये मेरे सौ पुत्र हुए हैं। तुम सब लोग एकत्र होकर साथ-साथ भ्रातृभावसे इस राज्यका उपभोग करो'

भीष्म म्हणाले— “मी पुरुषरूपात असताना तुम्ही माझे पुत्र; आणि स्त्रीरूपात असताना हे माझे शंभर पुत्र. म्हणून पुत्रांनो, भ्रातृभावाने एकत्र राहून राज्याचा उपभोग घ्या.”

Verse 26

सहिता भ्रातरस्ते5थ राज्यं बुभुजिरे तदा । तान्‌ दृष्टवा भ्रातृभावेन भुज्जानान्‌ राज्यमुत्तमम्‌,तब वे सब भाई एक साथ होकर उस राज्यका उपभोग करने लगे। उन सबको भ्रातृभावसे एक साथ रहकर उस उत्तम राज्यका उपभोग करते देख क्रोधमें भरे हुए देवराज इन्द्रने सोचा कि मैंने तो इस राजर्षिका उपकार ही कर दिया, अपकार तो कुछ किया ही नहीं

भीष्म म्हणाले—मग ते सर्व भाऊ एकत्र होऊन त्या राज्याचा उपभोग घेऊ लागले आणि राज्यकारभारही करू लागले. त्यांना भ्रातृभावाने एकत्र राहून त्या उत्तम राज्याचा उपभोग घेताना पाहून देवराज इंद्र क्रोधाने भरून गेला व मनात म्हणाला—‘मी या राजर्षीचा उपकारच केला आहे; त्याचा काहीही अपकार केलेला नाही.’

Verse 27

चिन्तयामास देदवेन्द्रो मन्युनाथ परिप्लुत: । उपकारोअस्य राजर्षे: कृतो नापकृतं मया,तब वे सब भाई एक साथ होकर उस राज्यका उपभोग करने लगे। उन सबको भ्रातृभावसे एक साथ रहकर उस उत्तम राज्यका उपभोग करते देख क्रोधमें भरे हुए देवराज इन्द्रने सोचा कि मैंने तो इस राजर्षिका उपकार ही कर दिया, अपकार तो कुछ किया ही नहीं

भीष्म म्हणाले—क्रोधाने व्याकुळ झालेला देवेन्द्र इंद्र विचार करू लागला—‘मी या राजर्षीचा उपकारच केला आहे; काहीही अपकार केलेला नाही.’

Verse 28

ततो ब्राह्मणरूपेण देवराज: शतक्रतुः । भेदयामास तान्‌ गत्वा नगरं वै नृपात्मजान्‌,तब देवराज इन्द्रने ब्राह्मणका रूप धारण करके उस नगरमें जाकर उन राजकुमारोंमें फूट डाल दी

त्यानंतर देवराज शतक्रतु इंद्र ब्राह्मणाचे रूप धारण करून नगरात गेला आणि त्या राजकुमारांमध्ये फूट पाडू लागला.

Verse 29

भ्रातृणां नास्ति सौक्षात्रं येष्वेकस्य पितु: सुताः । राज्यहेतोर्विवदिता: कश्यपस्य सुरासुरा:,वे बोले--'राजकुमारो! जो एक पिताके पुत्र हैं, ऐसे भाइयोंमें भी प्राय: उत्तम भ्रातृप्रेम नहीं रहता। देवता और असुर दोनों ही कश्यपजीके पुत्र हैं तथापि राज्यके लिये परस्पर विवाद करते रहते हैं!

भीष्म म्हणाले—एकाच पित्याचे पुत्र असलेल्या भावांमध्येही बहुधा खरे भ्रातृप्रेम टिकत नाही. कश्यपाचे पुत्र देव आणि असुरसुद्धा राज्यासाठी परस्परांशी सतत वाद घालत राहतात.

Verse 30

यूयं भड्भास्वनापत्यास्तापसस्येतरे सुता: । कश्यपस्य सुराश्चैव असुराश्च सुतास्तथा,“तुमलोग तो भंगास्वनके पुत्र हो और दूसरे सौ भाई एक तापसके लड़के हैं। फिर तुममें प्रेम कैसे रह सकता है? देवता और असुर तो कश्यपके ही पुत्र हैं, फिर भी उनमें प्रेम नहीं हो पाता है

भीष्म म्हणाले—‘तुम्ही भड्भास्वनाचे पुत्र आहात आणि इतर भाऊ एका तापसाचे पुत्र आहेत. अशी भिन्न उत्पत्ती असताना तुमच्यात परस्पर प्रेम कसे टिकेल? कश्यपाचेच पुत्र देव आणि असुर आहेत; तरीही त्यांच्यात प्रेम व एकता निर्माण होत नाही.’

Verse 31

युष्माकं पैतृकं राज्यं भुज्यते तापसात्मजै: । इन्द्रेण भेदितास्ते तु युद्धेउन्योन्यमपातयन्‌,“तुमलोगोंका जो पैतृक राज्य है, उसे तापसके लड़के आकर भोग रहे हैं।” इस प्रकार इन्द्रके द्वारा फूट डालनेपर वे आपसमें लड़ पड़े। उन्होंने युद्धमें एक-दूसरेको मार गिराया

“तुमचे पितृपरंपरागत राज्य तपस्व्याच्या पुत्रांनी येऊन उपभोगले आहे.” इंद्राने फूट पाडल्यामुळे ते परस्परांशी भिडले आणि युद्धात एकमेकांना पाडून मारू लागले.

Verse 32

तच्छुत्वा तापसी चापि संतप्ता प्ररुरोद ह । ब्राह्मणच्छटझनाभ्येत्य तामिन्द्रो5थान्वपृच्छत,यह समाचार सुनकर तापसीको बड़ा दुःख हुआ। वह फूट-फ़ूटकर रोने लगी। उस समय ब्राह्मणका वेश धारण करके इन्द्र उसके पास आये और पूछने लगे---

हे वृत्त ऐकून तापसी अत्यंत शोकाकुल झाली व धाय मोकलून रडू लागली. तेव्हा ब्राह्मणाचा वेष घेऊन इंद्र तिच्याजवळ आला आणि तिला विचारू लागला.

Verse 33

केन दुःखेन संतप्ता रोदिषि त्वं वरानने । ब्राह्मणं तं ततो दृष्टवा सा स्त्री करुणमब्रवीत्‌,'सुमुखि! तुम किस दुःखसे संतप्त होकर रो रही हो?” उस ब्राह्मणको देखकर वह स्त्री करुणस्वरमें बोली--

“सुमुखी, कोणत्या दुःखाने संतप्त होऊन तू रडतेस?” त्या ब्राह्मणाला पाहून ती स्त्री करुण स्वरात बोलली.

Verse 34

पुत्राणां द्वे शते ब्रह्मन्‌ कालेन विनिपातिते । अहूं राजाभवं विप्र तत्र पूर्व शतं मम,“ब्रह्मन! मेरे दो सौ पुत्र कालके द्वारा मारे गये। विप्रवर! मैं पहले राजा था। तब मेरे सौ पुत्र हुए थे। द्विजश्रेष्ठ! वे सभी मेरे अनुरूप थे। एक दिन मैं शिकार खेलनेके लिये गहन वनमें गया और वहाँ अकारण भ्रमित-सा होकर इधर-उधर भटकने लगा

“ब्रह्मन्, काळाने माझे दोनशे पुत्र विनष्ट केले. विप्रवर, मी पूर्वी राजा होतो; त्या काळी माझे शंभर पुत्र झाले होते.”

Verse 35

समुत्पन्नं स्वरूपाणां पुत्राणां ब्राह्मणोत्तम | कदाचिन्मृगयां यात उद्भ्रान्तो गहने वने,“ब्रह्मन! मेरे दो सौ पुत्र कालके द्वारा मारे गये। विप्रवर! मैं पहले राजा था। तब मेरे सौ पुत्र हुए थे। द्विजश्रेष्ठ! वे सभी मेरे अनुरूप थे। एक दिन मैं शिकार खेलनेके लिये गहन वनमें गया और वहाँ अकारण भ्रमित-सा होकर इधर-उधर भटकने लगा

“ब्रह्मणोत्तम, ते पुत्र माझ्याच स्वरूपासारखे होते. एकदा मी शिकारीस गेलो आणि घनदाट वनात भ्रमित होऊन वाट चुकलो.”

Verse 36

अवगादश्न सरसि स्त्रीभूतो ब्राह्मणोत्तम । पुत्रान्‌ राज्ये प्रतिष्ठाप्प वनमस्मि ततो गत:,'ब्राह्मणशिरोमणे! वहाँ एक सरोवरमें स्नान करते ही मैं पुरुषसे स्त्री हो गया और पुत्रोंकी राज्यपर बिठाकर वनमें चला आया

भीष्म म्हणाले— हे ब्राह्मणोत्तमा! एका सरोवरात उतरून स्नान करताच मी पुरुषातून स्त्री झालो. मग पुत्रांना राज्यावर प्रतिष्ठित करून मी वनात निघून गेलो.

Verse 37

स्त्रियाश्न मे पुत्रशतं तापसेन महात्मना । आश्रमे जनितं ब्रह्मन्‌ नीतं तन्नगरं मया,'सत्रीरूपमें आनेपर महामना तापसने इस आश्रममें मुझसे सौ पुत्र उत्पन्न किये। ब्रह्मन! मैं उन सब पुत्रोंको नगरमें ले गयी और उन्हें भी राज्यपर प्रतिष्ठित करायी

भीष्म म्हणाले— स्त्रीरूप प्राप्त झाल्यावर त्या महात्मा तपस्व्याने या आश्रमात माझ्यापासून शंभर पुत्र उत्पन्न केले. हे ब्राह्मणा! मी त्या सर्वांना नगरात नेऊन राज्यावरही प्रतिष्ठित केले.

Verse 38

तेषां च वैरमुत्पन्नं कालयोगेन वै द्विज । एतत्‌ शोचाम्यहं ब्रह्मन्‌ दैवेन समभिप्लुता,“विप्रवर! कालकी प्रेरणासे उन सब पुत्रोंमें वैर उत्पन्न हो गया और वे आपसमें ही लड़- भिड़कर नष्ट हो गये। इस प्रकार दैवकी मारी हुई मैं शोकमें डूब रही हूँ

भीष्म म्हणाले— हे द्विजश्रेष्ठा! काळयोगाने त्यांच्यात वैर उत्पन्न झाले. हे ब्राह्मणा! दैवाने अभिभूत झालेली मी याच कारणाने शोकात बुडाली आहे.

Verse 39

इन्द्रस्तां दु:खितां दृष्टवा अब्रवीत्‌ परुषं वच: । पुरा सुदुःसहं भद्रे मम दुःखं त्वया कृतम्‌,इन्द्रने उसे दु:खी देख कठोर वाणीमें कहा--भद्रे! जब पहले तुम राजा थीं, तब तुमने भी मुझे दुःसह दुःख दिया था

भीष्म म्हणाले— तिला दुःखी पाहून इंद्र कठोर वाणीने म्हणाला— ‘भद्रे! पूर्वी तू मला असह्य दुःख दिले होतेस.’

Verse 40

इन्द्रद्ध्रिन यजता मामनाहूय घिष्ठितम्‌ । इन्द्रोडहमस्मि दुर्बुद्धे वैरं ते पातितं मया,“तुमने उस यज्ञका अनुष्ठान किया जिसका मुझसे वैर है। मेरा आवाहन न करके तुमने वह यज्ञ पूरा कर लिया। खोटी बुद्धिवाली स्त्री! मैं वही इन्द्र हूँ और तुमसे मैंने ही अपने वैरका बदला लिया है”

भीष्म म्हणाले— इंद्र म्हणाला— ‘इंद्रसंबंधी यज्ञ तू केला, पण मला आवाहन न करता तो पूर्ण केलास. दुर्बुद्धे! मीच इंद्र आहे; तुझ्या वैराचा प्रतिकार मीच केला आहे.’

Verse 41

इन्द्रं दृष्टवा तु राजर्षि: पादयो: शिरसा गत: । प्रसीद त्रिदशश्रेष्ठ पुत्रकामेन स क्रतुः

इंद्रांना पाहताच राजर्षीने त्यांच्या चरणांशी मस्तक ठेवून प्रणाम केला. पुत्रकामनेने त्या यज्ञकर्ता क्रतूने विनयाने विनविले—“हे त्रिदशश्रेष्ठ, प्रसन्न व्हा.”

Verse 42

प्रणिपातेन तस्येन्द्र: परितुष्टो वरं ददौ,“इनके इस प्रकार प्रणाम करनेपर इन्द्र संतुष्ट हो गये और वर देनेके लिये उद्यत होकर बोले--राजन! तुम्हारे कौन-से पुत्र जीवित हो जाया? तुमने स्त्री होकर जिन्हें उत्पन्न किया था; वे अथवा पुरुषावस्थामें जो तुमसे उत्पन्न हुए थे?”

त्याच्या अशा प्रणिपाताने इंद्र प्रसन्न झाले व वर देण्यास उद्यत होऊन म्हणाले—“राजन्! तुझे कोणते पुत्र जिवंत व्हावेत—स्त्रीभावात तुझ्यापासून जे जन्मले ते, की पुरुषभावात तुझ्यापासून जे जन्मले ते?”

Verse 43

पुत्रास्ते कतमे राजन्‌ जीवन्त्वेतत्‌ प्रचक्ष्व मे । स्त्रीभूतस्य हि ये जाता: पुरुषस्याथ येडभवन्‌,“इनके इस प्रकार प्रणाम करनेपर इन्द्र संतुष्ट हो गये और वर देनेके लिये उद्यत होकर बोले--राजन! तुम्हारे कौन-से पुत्र जीवित हो जाया? तुमने स्त्री होकर जिन्हें उत्पन्न किया था; वे अथवा पुरुषावस्थामें जो तुमसे उत्पन्न हुए थे?”

“राजन्, मला सांग—तुझे कोणते पुत्र जिवंत व्हावेत? स्त्रीभावात तुझ्यापासून जे जन्मले, की पुरुषभावात तुझ्यापासून जे जन्मले?”

Verse 44

तापसी तु ततः शक्रमुवाच प्रयताउ्जलि: । स्त्रीभूतस्य हि ये पुत्रास्ते मे जीवन्तु वासव,तब तापसीने इन्द्रसे हाथ जोड़कर कहा--:देवेन्द्र! स्त्रीरूप हो जानेपर मुझसे जो पुत्र उत्पन्न हुए हैं, वे ही जीवित हो जायँ

तेव्हा त्या तापसीने हात जोडून शक्र (इंद्र) यांना म्हटले—“हे वासव! स्त्रीभावात माझ्यापासून जे पुत्र जन्मले, तेच जिवंत राहोत.”

Verse 45

इन्द्रस्तु विस्मितो दृष्ट्वा स्त्रियं पप्रच्छ तां पुनः । पुरुषोत्पादिता ये ते कथं द्वेष्या: सुतास्तव,तब इन्द्रने विस्मित होकर उस स्त्रीसे पूछा--“तुमने पुरुषरूपसे जिन्हें उत्पन्न किया था, वे पुत्र तुम्हारे द्वेषके पात्र क्यों हो गये? तथा स्त्रीरूप होकर तुमने जिनको जन्म दिया है, उनपर तुम्हारा अधिक स्नेह क्यों है? मैं इसका कारण सुनना चाहता हूँ। तुम्हें मुझसे यह बताना चाहिये”

तेव्हा इंद्र विस्मित होऊन त्या स्त्रीला पुन्हा विचारू लागले—“पुरुषरूपात तू जे पुत्र उत्पन्न केलेस, ते तुझे द्वेषाचे पात्र कसे झाले?”

Verse 46

स्त्रीभूतस्य हि ये जाता: स्नेहस्तेभ्योडथधिक: कथम्‌ | कारण श्रोतुमिच्छामि तन्मे वक्तुमिहाहसि,तब इन्द्रने विस्मित होकर उस स्त्रीसे पूछा--“तुमने पुरुषरूपसे जिन्हें उत्पन्न किया था, वे पुत्र तुम्हारे द्वेषके पात्र क्यों हो गये? तथा स्त्रीरूप होकर तुमने जिनको जन्म दिया है, उनपर तुम्हारा अधिक स्नेह क्यों है? मैं इसका कारण सुनना चाहता हूँ। तुम्हें मुझसे यह बताना चाहिये”

भीष्म म्हणाले— “स्त्रीरूप धारण केल्यावर ज्यांचा जन्म झाला, त्यांच्यावर तुझा स्नेह अधिक का आहे? मला त्याचे कारण ऐकायचे आहे; येथे तू मला ते सांगितले पाहिजे.”

Verse 47

रूयुवाच स्त्रियास्त्वभ्यधिक: स्नेहो न तथा पुरुषस्य वै | तस्मात्‌ ते शक्र जीवन्तु ये जाता: स्त्रीकृतस्य वै,स्‍त्रीने कहा--इन्द्र! स्त्रीका अपने पुत्रोंपर अधिक स्नेह होता है, वैसा स्नेह पुरुषका नहीं होता है। अतः इन्द्र! स्त्रीरूपमें आनेपर मुझसे जिनका जन्म हुआ है, वे ही जीवित हो जायूँ

स्त्री म्हणाली— “हे शक्र! स्त्रीचा पुत्रांवरचा स्नेह अधिक असतो; पुरुषाचा तसा नसतो. म्हणून, हे इंद्रा, मी स्त्रीरूपात असताना ज्यांचा जन्म झाला, तेच जिवंत होवोत.”

Verse 48

भीष्म उवाच एवमुक्तस्ततस्त्विन्द्र: प्रीतो वाक्यमुवाच ह । सर्व एवेह जीवन्तु पुत्रास्ते सत्यवादिनि,भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! तापसीके यों कहनेपर इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले--'सत्यवादिनि! तुम्हारे सभी पुत्र जीवित हो जायेँ

भीष्म म्हणाले— तिचे बोलणे ऐकून इंद्र प्रसन्न झाले आणि म्हणाले— “हे सत्यवादिनि! येथे तुझे सर्व पुत्र जिवंत होवोत.”

Verse 49

वरं च वृणु राजेन्द्र यं त्वमिच्छसि सुव्रत । पुरुषत्वमथ स्त्रीत्वं मत्तो यदभिकाडुक्षते,“उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजेन्द्र! तुम मुझसे अपनी इच्छाके अनुसार दूसरा वर भी माँग लो। बोलो, फिरसे पुरुष होना चाहते हो या स्त्री ही रहनेकी इच्छा है? जो चाहो वह मुझसे ले लो”

“हे राजेंद्र, हे सुव्रत! तुझ्या इच्छेनुसार आणखी एक वर निवड. पुन्हा पुरुष व्हायचे आहे की स्त्रीच राहायचे आहे? जे अभिलाषशील आहेस ते माझ्याकडून माग.”

Verse 50

रूयुवाच स्त्रीत्वमेव वृणे शक्र पुंस्त्वं नेच्छामि वासव । एवमुक्तस्तु देवेन्द्रस्तां स्त्रियं प्रत्युवाच ह,स्‍त्रीने कहा--इन्द्र! मैं स्त्रीत्वका ही वरण करती हूँ। वासव! अब मैं पुरुष होना नहीं चाहती। उसके ऐसा कहनेपर देवराजने उस स्त्रीसे पूछा--

स्त्री म्हणाली— “हे शक्र! मी स्त्रीत्वच वरण करते; हे वासव! मला आता पुरुष व्हायचे नाही.” असे ऐकून देवराज इंद्र त्या स्त्रीशी पुढे बोलू लागले.

Verse 51

पुरुषत्वं कथं त्यक्त्वा स्त्रीत्वं चोदयसे विभो | एवमुक्त: प्रत्युवाच स्त्रीभूतो राजसत्तम:,'प्रभो! तुम्हें पुरुषत्वका त्याग करके स्त्री बने रहनेकी इच्छा क्‍यों होती है?' इन्द्रके यों पूछनेपर उन स्त्रीरूपधारी नृपश्रेष्ठने इस प्रकार उत्तर दिया--

भीष्म म्हणाले— “हे विभो! पुरुषत्व सोडून तू स्त्रीत्वाचा आग्रह का धरतोस?” असे म्हटल्यावर स्त्रीरूप प्राप्त झालेला तो राजश्रेष्ठ प्रत्युत्तर देऊ लागला।

Verse 52

स्त्रिया: पुरुषसंयोगे प्रीतिरभ्यधिका सदा । एतस्मात्‌ कारणाच्छक्र स्त्रीत्वमेव वृणोम्पहम्‌,देवेन्द्र! सत्रीका पुरुषके साथ संयोग होनेपर स्त्रीको ही पुरुषकी अपेक्षा अधिक विषयसुख प्राप्त होता है, इसी कारणसे मैं स्त्रीत्वका ही वरण करती हूँ"

“हे शक्र, देवेन्द्र! पुरुषसंयोगात स्त्रीला नेहमीच अधिक प्रीती (विषयसुख) मिळते; म्हणूनच मी स्त्रीत्वच स्वीकारते.”

Verse 53

रमिताभ्यधिकं स्त्रीत्वे सत्यं वै देवसत्तम । स्त्रीभावेन हि तुष्यामि गम्यतां त्रिदशाधिप,'देवश्रेष्ठ! सुरेश्वर! मैं सच कहती हूँ, स्त्रीरूपमें मैंने अधिक रति-सुखका अनुभव किया है, अतः स्त्रीरूपसे ही संतुष्ट हूँ। आप पधारिये”

“हे देवश्रेष्ठ! हे सत्यच आहे की स्त्रीभावात मला अधिक रति-सुख अनुभवास आले; म्हणून मी स्त्रीरूपातच संतुष्ट आहे. हे त्रिदशाधिप, आपण प्रस्थान करा.”

Verse 54

एवमस्त्विति चोक्‍्त्वा तामापृच्छ त्रिदिवं गत: । एवं स्त्रिया महाराज अधिका प्रीतिरुच्यते,महाराज! तब 'एवमस्तु” कहकर उस तापसीसे विदा ले इन्द्र स्वर्गलोकको चले गये। इस प्रकार स्त्रीको विषय-भोगमें पुरुषकी अपेक्षा अधिक सुख-प्राप्ति बतायी जाती है

“एवमस्तु (तसेच होवो)” असे म्हणून इंद्राने त्या तपस्विनीचा निरोप घेतला आणि त्रिदिव (स्वर्ग) लोकास गेला. अशा प्रकारे, हे महाराज, विषय-भोगात स्त्रीची प्रीती पुरुषापेक्षा अधिक सांगितली जाते.

Verse 163

पुनरायात्‌ पुरं तात स्त्रीकृतो नृपसत्तम: । “अब स्त्रीभाव आ जानेसे उस अश्वपर कैसे चढ़ सकूँगी?” तात! किसी-किसी तरह महान्‌ प्रयत्न करके वे स्त्रीरूपधारी नरेश घोड़ेपर चढ़कर अपने नगरमें आये

पुन्हा, हे तात, स्त्रीरूप प्राप्त झालेला तो नृपश्रेष्ठ आपल्या नगरात परत आला. तो विचार करू लागला— “आता स्त्रीभाव आल्यावर त्या घोड्यावर मी कशी चढू?” तरीही महान प्रयत्न करून, कसाबसा, स्त्रीरूपातच घोड्यावर चढून तो आपल्या राजधानीस पोहोचला.

Verse 173

किंच्विदं त्विति विज्ञाय विस्मयं परमं गता: । राजाके पुत्र, स्त्रियाँ, सेवक तथा नगर और जनपदके लोग, “यह क्‍या हुआ?'--ऐसी जिज्ञासा करते हुए बड़े आश्वर्यमें पड़ गये

“हे नेमके काय?” असे जाणताच ते परम विस्मयात पडले. राजा, त्याचे पुत्र, स्त्रिया, सेवक तसेच नगर व जनपदातील लोक—सर्वजण “काय झाले?” अशी चौकशी करीत मोठ्या आश्चर्यात बुडाले.

Verse 231

तत्रावगाढ: स्त्रीभूतो दैवेनाहं कृत: पुरा । नामगोत्राणि चाभाष्य दाराणां मन्त्रिणां तथा

तेथे मी त्या अवस्थेत पूर्णपणे गुरफटलो; दैवयोगाने पूर्वीच मला स्त्रीरूप धारण करावे लागले. आणि मी पत्नींची तसेच मंत्र्यांची नावे व गोत्रेही उच्चारली.

Verse 413

इष्टस्त्रिदशशार्टूल तत्र मे क्षन्तुमरहसि । इन्द्रको देखकर वे स्त्रीरूपधारी राजर्षि उनके चरणोंमें सिर रखकर बोले--'सुरश्रेष्ठ आप प्रसन्न हों। मैंने पुत्रकी इच्छासे वह यज्ञ किया था। देवेश्वर! उसके लिये आप मुझे क्षमा करें!

हे त्रिदशशार्दूल! या विषयात मला क्षमा करावी. पुत्रकामनेने मी तो यज्ञ केला; हे देवेश्वर! म्हणून मला अपराधातून मुक्त करून प्रसन्न व्हावे.

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira asks whose experience is ‘greater’ in strī–puruṣa union—framed as the comparative predominance of touch/affective impact (sparśa) and the resulting prīti.

Through Bhaṅgāśvana’s stated preference after transformation, the exemplum concludes that a woman’s affection (sneha/prīti) is described as greater in this narrative logic, and that experiential testimony is used to settle the question.

No explicit phalaśruti formula appears here; the chapter functions as a precedent-setting exemplum whose ‘result’ is the resolved doubt and the ethical-psychological generalization stated at the close.