
Chapter Arc: वनवास की सीमा पर खड़े पाण्डव—अब ‘अज्ञातवास’ का कठिन व्रत सामने है। युधिष्ठिर तपस्वियों और आचार्य धौम्य से अनुमति माँगते हुए शोक से भर उठते हैं। → आश्रमवासी विद्वान तपस्वी, जो पाण्डवों के भक्त हैं, युधिष्ठिर की आज्ञा पाकर उन्हें विदा देने को खड़े होते हैं। पाण्डव अपनी योजना रखते हैं—इस वर्ष छिपकर रहना है, क्योंकि सुयोधन, कर्ण और शकुनि जैसे दुष्टात्मा शत्रु अवसर खोज रहे हैं। युधिष्ठिर का मन कर्तव्य और भय के बीच डगमगाता है। → अज्ञातवास की अनुमति माँगते-माँगते युधिष्ठिर दुःख-शोक से विह्वल होकर मूर्छित हो जाते हैं—कण्ठ आँसुओं से भर जाता है और राजधर्म का धैर्य क्षणभर को टूटता दिखता है। → धौम्य युधिष्ठिर को समझाते हैं—आप विद्वान, दान्त, सत्यसंध, जितेन्द्रिय हैं; ऐसी आपदा में भी महापुरुष मोह नहीं करते। उदाहरण देकर वे बताते हैं कि इन्द्र ने भी शत्रुदमन हेतु निषध देश में गुप्तरूप से रहकर कार्य सिद्ध किया; अतः छिपकर रहना अधर्म नहीं, नीति है। फिर भीमसेन उत्साहवर्धन करते हैं, राजा के भीतर साहस जगाते हैं और अज्ञातवास के लिए मन स्थिर होता है। → पाण्डवों के अज्ञातवास-प्रवेश का निर्णय पक्का हो जाता है—अब प्रश्न केवल यह है कि वे कहाँ और किस रूप में छिपेंगे, और क्या शत्रु उनकी पहचान कर पाएँगे।
Verse 1
हि >> न (0) हि 7 आम पञ्चदशाधिकंत्रेशततमो< ध्याय: अज्ञातवासके लिये अनुमति लेते समय शोकाकुल हुए युधिष्ठिरको महर्षि धौम्यका समझाना, भीमसेनका उत्साह देना तथा आश्रमसे दूर जाकर पाण्डवोंका परस्पर परामर्शके लिये बैठना वैशम्पायन उवाच धर्मेण ते5भ्यनुज्ञाता: पाण्डवा: सत्यविक्रमा: । अज्ञातवासं वत्स्यन्त$छज्ना वर्ष त्रयोदशम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराजकी अनुमति पाकर सत्यपराक्रमी पाण्डव तेरहवें वर्षमें छिपकर अज्ञातवास करनेकी इच्छासे एकत्र हो विचार-विमर्शके लिये आस-पास बैठे। वे सब-के-सब उत्तम व्रतका पालन करनेवाले और विद्वान थे। वनवासके समय जो तपस्वी ब्राह्मण पाण्डवोंके प्रति स्नेह होनेके कारण उनके साथ रहते थे, उनसे अज्ञातवासके हेतु आज्ञा लेनेके लिये व्रतधारी महात्मा पाण्डव हाथ जोड़कर खड़े हो इस प्रकार बोले--- / ५ 8 । (/) १ /€+। कर
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ ដោយបានទទួលអនុញ្ញាតតាមធម៌ ពួកបណ្ឌវទាំងឡាយ—អ្នកមានវីរភាពស្មោះត្រង់តាមពាក្យ—បានសម្រេចចិត្តចូលឆ្នាំទីដប់បី ដោយលាក់ខ្លួនរស់នៅអនាមិក។ ដោយគោលបំណងនោះ ពួកគេបានប្រមូលផ្តុំគ្នានៅជិតៗ ហើយអង្គុយពិភាក្សា ដើម្បីត្រៀមទៅសុំការអនុញ្ញាតពីពួកតាបសី ដែលដោយសេចក្តីស្រឡាញ់ បានស្នាក់នៅជាមួយពួកគេក្នុងពេលនិរទេសនៅព្រៃ។
Verse 2
उपोपविष्टा विद्वांस: सहिता: संशितव्रता: । ये तद्भक्ता वसन्ति सम वनवासे तपस्विन:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराजकी अनुमति पाकर सत्यपराक्रमी पाण्डव तेरहवें वर्षमें छिपकर अज्ञातवास करनेकी इच्छासे एकत्र हो विचार-विमर्शके लिये आस-पास बैठे। वे सब-के-सब उत्तम व्रतका पालन करनेवाले और विद्वान थे। वनवासके समय जो तपस्वी ब्राह्मण पाण्डवोंके प्रति स्नेह होनेके कारण उनके साथ रहते थे, उनसे अज्ञातवासके हेतु आज्ञा लेनेके लिये व्रतधारी महात्मा पाण्डव हाथ जोड़कर खड़े हो इस प्रकार बोले---
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ ពួកបណ្ឌិតទាំងឡាយ បានអង្គុយជិតៗជាមួយគ្នា ដោយរួបរួម និងមាំមួនក្នុងវ្រតដ៏បានហាត់ហើយ។ ពួកតាបសីដែលដោយសេចក្តីស្មោះស្រឡាញ់ បានរស់នៅជាមួយពួកគេក្នុងពេលនិរទេសនៅព្រៃ ក៏មានវត្តមាននៅទីនោះដែរ។ ទិដ្ឋភាពនេះបង្ហាញសហគមន៍មានវិន័យ ដែលការសិក្សា ការតបស និងមិត្តភាពស្មោះត្រង់ គាំទ្រការពិគ្រោះយោបល់ត្រឹមត្រូវ នៅចំណុចបត់ដែលទាមទារសីលធម៌យ៉ាងខ្លាំង។
Verse 3
तानब्रुवन् महात्मान: स्थिता: प्राजजलयस्तदा । अभ्यनुज्ञापयिष्यन्तस्तं निवासं धृतव्रता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराजकी अनुमति पाकर सत्यपराक्रमी पाण्डव तेरहवें वर्षमें छिपकर अज्ञातवास करनेकी इच्छासे एकत्र हो विचार-विमर्शके लिये आस-पास बैठे। वे सब-के-सब उत्तम व्रतका पालन करनेवाले और विद्वान थे। वनवासके समय जो तपस्वी ब्राह्मण पाण्डवोंके प्रति स्नेह होनेके कारण उनके साथ रहते थे, उनसे अज्ञातवासके हेतु आज्ञा लेनेके लिये व्रतधारी महात्मा पाण्डव हाथ जोड़कर खड़े हो इस प्रकार बोले---
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ បន្ទាប់មក បុរសមហាត្មាទាំងនោះ ដែលមាំមួនក្នុងវ្រត និងមានចិត្តសុចរិត បានឈរដោយដាក់ដៃប្រណម្យ ហើយនិយាយ—ដើម្បីសុំការអនុញ្ញាតអំពីទីលំនៅដែលគេគ្រោងនឹងទៅស្នាក់នៅ គឺការរស់នៅលាក់ខ្លួនក្នុងឆ្នាំចុងក្រោយ។ ទិដ្ឋភាពនោះបង្ហាញពីវិន័យ ការតាំងចិត្ត និងការគោរពចំពោះការអនុម័តត្រឹមត្រូវ មុនចូលទៅក្នុងដំណាក់កាលរស់នៅដោយលាក់ឈ្មោះ។
Verse 4
विदितं भवतां सर्व धार्तराष्ट्रैयथा वयम् । छद्मना हृृतराज्याश्लानयाश्व बहुशः कृता:,“मुनिवरो! धृतराष्ट्रके पुत्रोंने जिस प्रकार छल करके हमारा राज्य हर लिया और हमपर बारंबार अत्याचार किया, वह सब आपलोगोंको विदित ही है
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «អ្វីៗទាំងនេះ លោកទាំងអស់គ្នាបានដឹងរួចហើយ—ថា ពួកកូនប្រុសរបស់ធೃತរាស្ត្រ បានប្រើល្បិចបោកបញ្ឆោត ដើម្បីដកហូតរាជ្យពីយើង ហើយបានធ្វើអំពើអយុត្តិធម៌ និងការគាបសង្កត់លើពួកយើងម្តងហើយម្តងទៀត ដល់ច្រើនលើក»។
Verse 5
, ५ (१ ' १4. 8... -- उषिताश्च वने कृच्छे वयं द्वादश वत्सरान् । अज्ञातवाससमयं शेषं वर्ष त्रयोदशम्,“हमलोग कष्टदायक वनमें बारह वर्षोतक रह लिये। अब अन्तिम तेरहवाँ वर्ष हमारे अज्ञातवासका समय है
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «យើងបានរស់នៅក្នុងព្រៃដ៏លំបាកអស់ដប់ពីរឆ្នាំមកហើយ។ ឥឡូវនេះ ឆ្នាំទីដប់បីដែលនៅសល់ គឺជាពេលវេលានៃការរស់នៅលាក់ខ្លួន (អជ្ញាតវាស) តាមវ្រតរបស់យើង»។
Verse 6
तद् वसामो वयं छजन्नास्तदनुज्ञातुमर्हथ । सुयोधनश्व दुष्टात्मा कर्णश्न सहसौबल:,“अतः इस वर्ष हम छिपकर रहना चाहते हैं। इसके लिये आपलोग हमें आज्ञा दें। दुष्टात्मा दुर्योधन, कर्ण और शकुनि हमसे अत्यन्त वैर रखते हैं। वे स्वयं तो हमारा पता लगानेको उद्यत हैं ही, उन्होंने गुप्तचर भी लगा रखे हैं। अतः यदि उन्हें हमारे रहनेका पता चल जायगा, तो वे हमसे सम्बन्ध रखनेवाले पुरजनों तथा स्वजनोंके साथ भी विषम (बुरा) बर्ताव कर सकते हैं
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ដូច្នេះ ក្នុងឆ្នាំនេះ យើងចង់រស់នៅដោយលាក់ខ្លួន; សូមលោកទាំងអស់គ្នាអនុញ្ញាតឲ្យយើង។ ព្រោះ សុយោធនៈ (ទុរយោធន) ដែលមានចិត្តអាក្រក់ រួមជាមួយ កರ್ಣ និង សៅបលៈ (សកុនិ) មានសត្រូវភាពខ្លាំងចំពោះយើង។ ពួកគេកំពុងខិតខំស្វែងរកទីស្នាក់របស់យើង ហើយក៏បានដាក់ចារកម្មផងដែរ។ ប្រសិនបើទីលំនៅរបស់យើងត្រូវបានដឹង ពួកគេអាចប្រព្រឹត្តយ៉ាងឃោរឃៅ និងអយុត្តិធម៌ ទៅលើមនុស្សចាស់ទុំ និងសាច់ញាតិរបស់យើង—អ្នកដែលពាក់ព័ន្ធជាមួយយើង»។
Verse 7
जानन्तो विषमं कुर्युरस्मास्वत्यन्तवैरिण: । युक्तचाराश्न युक्ताश्न पौरस्प स््वजनस्य च,“अतः इस वर्ष हम छिपकर रहना चाहते हैं। इसके लिये आपलोग हमें आज्ञा दें। दुष्टात्मा दुर्योधन, कर्ण और शकुनि हमसे अत्यन्त वैर रखते हैं। वे स्वयं तो हमारा पता लगानेको उद्यत हैं ही, उन्होंने गुप्तचर भी लगा रखे हैं। अतः यदि उन्हें हमारे रहनेका पता चल जायगा, तो वे हमसे सम्बन्ध रखनेवाले पुरजनों तथा स्वजनोंके साथ भी विषम (बुरा) बर्ताव कर सकते हैं
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «បើសត្រូវដ៏មិនអាចសម្រួលបានទាំងនោះ ដឹងទីកន្លែងរបស់យើង ពួកគេនឹងប្រព្រឹត្តយ៉ាងឃោរឃៅចំពោះយើង ហើយក៏អាចបង្កគ្រោះថ្នាក់ដល់ប្រជាជនក្នុងទីក្រុង និងសាច់ញាតិរបស់យើងផងដែរ។ ពួកគេមានភ្នាក់ងារ និងចារកម្មត្រៀមរួចហើយ; ដូច្នេះ ប្រសិនបើទីលំនៅរបស់យើងត្រូវបានបង្ហាញ អ្នកដែលពាក់ព័ន្ធជាមួយយើងអាចរងទុក្ខ។ ហេតុនេះហើយ យើងចង់នៅលាក់ខ្លួន និងសូមការអនុញ្ញាតពីលោកទាំងអស់គ្នា»។
Verse 8
अपि नस्तद् भवेद् भूयो यद् वयं ब्राह्मणैः सह | समस्ता: स्वेषु राष्ट्रेषु स्वराज्यस्था भवेमहि,“क्या हमारे सामने फिर कभी ऐसा अवसर आयेगा, जब कि हम सब भाई ब्राह्मणोंके साथ अपने राष्ट्रमें रहेंगे--अपने राज्यपर प्रतिष्ठित होंगे”
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «តើនឹងមានឡើងម្ដងទៀតសម្រាប់យើងឬទេ—ឲ្យយើងទាំងអស់គ្នា បានរស់នៅរួមគ្នានៅក្នុងនគររបស់ខ្លួន ជាមួយព្រះព្រាហ្មណ៍ទាំងឡាយ ហើយបានតាំងមាំលើអធិបតេយ្យភាពដ៏សមស្របរបស់យើង?»
Verse 9
वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा दुःखशोकार्त: शुचिर्धर्मसुतस्तदा । सम्मूर्छितो5भवद् राजा साश्रुकण्ठो युधिछ्िर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर पवित्र अन्तःकरणवाले धर्मनन्दन राजा युधिष्ठिर दु:ख और शोकसे आतुर होकर मूर्च्छित हो गये। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह रही थी और कण्ठ अवरुद्ध हो गया था
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ បន្ទាប់ពីនិយាយដូច្នោះ ព្រះរាជា យុធិષ્ઠិរ ព្រះបុត្រនៃធម្មៈ អ្នកមានចិត្តបរិសុទ្ធ ត្រូវទុក្ខសោកគ្របដណ្ដប់ ហើយសន្លប់ទៅ។ បំពង់ករបស់ព្រះអង្គត្រូវទឹកភ្នែកបិទស្ទះ មិនអាចនិយាយបាន—ទុក្ខវេទនានោះបង្ហាញទាំងទម្ងន់នៃធម៌ដែលព្រះអង្គទទួល និងមេត្តាករុណាដ៏ជ្រាលជ្រៅ។
Verse 10
तमथाश्वासयन् सर्वे ब्राह्मणा भ्रातृभि: सह | अथ धौम्योडब्रवीद् वाक्यं महार्थ नृपतिं तदा,उस समय उनके भाइयोंसहित समस्त ब्राह्मणोंने उन्हें आश्वासन दिया। तत्पश्चात् महर्षि धौम्यने राजा युधिष्ठिरसे यह गम्भीर अर्थयुक्त वचन कहा--
បន្ទាប់មក ព្រះព្រាហ្មណ៍ទាំងអស់ រួមជាមួយបងប្អូនរបស់ព្រះអង្គ បានលួងលោមព្រះអង្គ។ បន្ទាប់ពីនោះ មហាឥសី ធោម្យៈ បានមានព្រះវាចាទៅកាន់ព្រះរាជា ដោយពាក្យដែលមានន័យជ្រាលជ្រៅ—ដើម្បីធ្វើឲ្យចិត្តព្រះអង្គស្ងប់ និងណែនាំទៅរកការតាំងចិត្តតាមធម៌។
Verse 11
“राजन्! आप विद्वान, मनको वशमें रखनेवाले, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय हैं। आप- जैसे मनुष्य किसी भी आपत्तिमें मोहित नहीं होते अर्थात् अपना धैर्य और विवेक नहीं खोते हैं
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ ព្រះរាជា! ព្រះអង្គជាអ្នកប្រាជ្ញ អាចគ្រប់គ្រងចិត្តបាន មានសច្ចាប្រតិញ្ញា និងមានការគ្រប់គ្រងអារម្មណ៍។ មនុស្សដូចព្រះអង្គ មិនត្រូវមោហៈបំភាន់ទេ ទោះជាប្រឈមមហន្តរាយ—មិនបាត់បង់សេចក្តីក្លាហាន និងការវិនិច្ឆ័យឡើយ»។
Verse 12
देवैरप्यापद: प्राप्ता#छन्नैश्व बहुशस्तथा । तत्र तत्र सपत्नानां निग्रहार्थ महात्मभि:,“महामना देवताओंको भी जहाँ-तहाँ शत्रुओंके निग्रहके लिये अनेक बार छिपकर रहना और विपत्तियोंको भोगना पड़ा है
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ សូម្បីតែទេវតាទាំងឡាយ ក៏បានជួបមហន្តរាយដែរ; ហើយជាញឹកញាប់ ដើម្បីបង្ក្រាបសត្រូវ ព្រះមហាត្មៈទាំងនោះ ត្រូវលាក់ខ្លួននៅទីនេះទីនោះ និងអត់ធ្មត់ទ្រាំទុក្ខលំបាក។ ន័យគឺ ការលំបាក និងការលាក់ខ្លួនដោយយុទ្ធសាស្ត្រ អាចជាធម៌បាន ប្រសិនបើធ្វើឡើងដើម្បីទប់ស្កាត់កម្លាំងអាក្រក់ និងថែរក្សារបៀបរបប។
Verse 13
राजन विद्वान् भवान् दान्तः सत्यसंधो जितेन्द्रिय: । नैवंविधा: प्रमुहान्ते नरा: कस्याज्चिदापदि,इन्द्रेण निषधान प्राप्य गिरिप्रस्थाश्रमे तदा । छन्नेनोष्य कृतं कर्म द्विषतां च विनिग्रहे
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ព្រះមហាក្សត្រ! ព្រះអង្គមានប្រាជ្ញា មានវិន័យខ្លួនឯង មាំមួនក្នុងសច្ចៈ និងគ្រប់គ្រងអារម្មណ៍បាន។ មនុស្សប្រភេទនេះមិនរអិលរអួលចិត្តក្នុងគ្រាអាសន្នណាមួយឡើយ។ ដោយការណែនាំរបស់ឥន្ទ្រៈ ព្រះអង្គបានទៅដល់និសធៈ ហើយនៅពេលនោះបានស្នាក់នៅលាក់ខ្លួនក្នុងអាស្រមគិរីប្រស្ថៈ ដើម្បីបំពេញកិច្ចការនោះ—ធ្វើឲ្យសត្រូវទទួលសម្របសម្រួល និងស្ថិតក្រោមការគ្រប់គ្រង»។
Verse 14
विष्णुनाश्वशिर: प्राप्प तथादित्यां निवत्स्यता | गर्भे वधार्थ दैत्यानामज्ञातेनोषितं चिरम्,“भगवान् विष्णु भी दैत्योंका वध करनेके लिये हयग्रीवस्वरूप धारण करके अज्ञातभावसे अदितिके गर्भमें दीर्घकालतक रहे हैं
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ព្រះវិស្ណុ—ព្រះអម្ចាស់ដ៏មានព្រះភាគ—បានទទួលរូបហយគ្រីវៈ (ក្បាលសេះ) ហើយចូលទៅក្នុងអទិតិ ដោយស្នាក់នៅក្នុងគភ៌របស់នាងយូរយារ ដោយលាក់ខ្លួន ដើម្បីបំផ្លាញពួកដៃត្យៈ។ ព្រឹត្តិការណ៍នេះបង្ហាញថា ការពាររបៀបរបបលោក (ធម៌) ម្តងម្កាលត្រូវការយុទ្ធសាស្ត្រលាក់លៀម និងការរៀបចំដោយអត់ធ្មត់ ទោះជាព្រះក៏ដោយ»។
Verse 15
प्राप्प वामनरूपेण प्रच्छन्न॑ ब्रह्म॒रूपिणा । बलेयथा हूतं राज्यं विक्रमैस्तच्च ते श्रुतम्
ដោយចូលទៅជិតក្នុងរូបវាមនៈ—ជាព្រាហ្មណ៍តឿ—ដោយលាក់ព្រះសភាពដ៏ទេវភាពរបស់ព្រះអង្គ ព្រះអង្គបានដកហូតអធិបតេយ្យរបស់ព្រះបាលី ដោយជំហានវាស់បីជំហាន—រឿងនេះក៏ព្រះអង្គបានឮមកហើយ។
Verse 16
“उन्होंने ही ब्राह्मणवेषमें वामनरूप धारण करके अपने तीन पगोंद्वारा जिस प्रकार छिपे तौरपर राजा बलिका राज्य हर लिया था, वह सब तो तुमने सुना ही होगा ।। हुताशनेन यच्चाप: प्रविश्यच्छन्नमासता । विबुधानां कृतं कर्म तच्च सर्व श्रुतं त्वया,'अग्निने जलमें प्रवेश करके वहीं छिपे रहकर देवताओंका कार्य जिस प्रकार सिद्ध किया, वह सब कुछ भी तुम सुन चुके हो
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ព្រះអង្គបានឮរួចហើយថា អគ្គិ (អগ্নិ) បានចូលទៅក្នុងទឹក ហើយស្នាក់នៅទីនោះដោយលាក់ខ្លួន ដើម្បីសម្រេចកិច្ចការរបស់ទេវតា។ ដូចគ្នានេះដែរ ព្រះអង្គក៏បានឮអំពីកិច្ចការមុនៗ ដែលព្រះអម្ចាស់បានទទួលរូបវាមនៈជាព្រាហ្មណ៍តឿ ហើយដោយបីជំហាន បានដកហូតអាណាចក្ររបស់ព្រះបាលីយ៉ាងលាក់លៀម—សកម្មភាពដែលបង្ហាញថា ព្រះបំណងត្រូវបានបំពេញដោយយុទ្ធសាស្ត្រ ការបន្លំ និងពេលវេលាសមស្រប មិនមែនដោយកម្លាំងបើកចំហតែប៉ុណ្ណោះ»។
Verse 17
प्रच्छन्न॑ चापि धर्मज्ञ हरिणारिविनिग्रहे । वज्ज प्रविश्य शक्रस्य यत् कृतं तच्च ते श्रुतम्,“धर्मज्ञ! भगवान् श्रीहरिने शत्रुओंके विनाशके लिये छिपे तौरपर इन्द्रके वज्॒में प्रवेश करके जो कार्य किया, वह भी तुम्हारे कानोंमें पड़ा होगा
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ អ្នកដឹងធម៌! ព្រះហរិ—ព្រះអម្ចាស់—ដើម្បីបំផ្លាញសត្រូវរបស់ព្រះអង្គ បានធ្វើកិច្ចការមួយទៀតដែលអ្នកក៏បានឮដែរ៖ ព្រះអង្គបានចូលទៅក្នុងវជ្រៈ (ព្រួញរន្ទះ) របស់ឥន្ទ្រៈដោយលាក់ខ្លួន ហើយសម្រេចបំណងរបស់ព្រះអង្គ»។
Verse 18
और्वेण वसता छन्नमूरौ ब्रह्मर्षिणा तदा । यत् कृतं तात देवेषु कर्म तत्तेडनघ श्रुतम्,“तात! निष्पाप नरेश! ब्रह्मर्षि और्वने (माताके) ऊरुमें गुप्तरूपसे निवास करते हुए जो देवकार्य सिद्ध किया था, वह भी तुम्हारे सुननेमें आया ही होगा
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «កូនអើយ ព្រះរាជាអ្នកឥតបាប! អ្នកប្រាកដជាបានឮរួចហើយអំពីកិច្ចការដែលព្រះឥសីព្រហ្ម (Brahmarṣi) អោរវៈ (Aurva) បានសម្រេចសម្រាប់ពួកទេវតា ខណៈដែលទ្រង់ស្នាក់នៅលាក់ខ្លួនក្នុងភ្លៅមួយ»។
Verse 19
एवं विवस्वता तात छतन्नेनोत्तमतेजसा । निर्दग्धा: शात्रवा: सर्वे वसता भुवि सर्वश:,“तात! इसी प्रकार महातेजस्वी भगवान् सूर्यने भी पृथ्वीपर गुप्तरूपसे निवास करके समस्त शत्रुओंको दग्ध किया है
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «ដូចគ្នានេះដែរ កូនអើយ ព្រះវិវស្វាន—ព្រះអាទិត្យមានពន្លឺលើសគេ—បានស្នាក់នៅលើផែនដីដោយលាក់រូប ហើយដោយការស្នាក់នៅលាក់នោះ បានដុតបំផ្លាញសត្រូវទាំងអស់នៅគ្រប់ទិស»។
Verse 20
विष्णुना वसता चापि गृहे दशरथस्य वै । दशग्रीवो हतश्छन्न॑ संयुगे भीमकर्मणा,“भयंकर पराक्रमी भगवान् विष्णुने भी श्रीरामरूपसे दशरथके घरमें छिपे रहकर युद्धमें दशमुख रावणका वध किया था
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «សូម្បីតែព្រះវិෂ្ណុ ក៏បានស្នាក់នៅដោយលាក់ខ្លួនក្នុងគេហដ្ឋានរបស់ទសរថៈ ហើយក្នុងសង្គ្រាមបានសម្លាប់ទសគ្រីវៈ—ដោយទ្រង់លាក់ព្រះអង្គក្នុងរូបមនុស្ស និងសម្រេចកិច្ចការដ៏គួរឱ្យខ្លាច»។
Verse 21
एवमेव महात्मान: प्रच्छन्नास्तत्र तत्र ह अजयज्छात्रवान् युद्धे तथा त्वमपि जेष्यसि,“इसी प्रकार कितने ही महामना वीर पुरुषोंने यत्र-तत्र छिपे रहकर युद्धमें शत्रुओंपर विजय पायी है। इसी प्रकार तुम भी विजयी होओगे”
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «ដូច្នេះហើយ វីរបុរសចិត្តធំជាច្រើន បានលាក់ខ្លួននៅទីនេះទីនោះ ហើយឈ្នះសត្រូវក្នុងសង្គ្រាម។ ដូចគ្នានេះដែរ អ្នកក៏នឹងទទួលជ័យជម្នះ»។
Verse 22
तथा धौम्येन धर्मज्ञो वाक्यै: सम्परितोषित: । शास्त्रबुद्धया स्वबुद्धया च न चचाल युधिछिर:,महर्षि धौम्यने जब इस प्रकार युक्तियुक्त वचनोंद्वारा धर्मज्ञ युधिष्ठिरको संतोष प्रदान किया, तब वे शास्त्रज्ञान और अपने बुद्धिबलके कारण (धर्मसे) विचलित नहीं हुए
ដូច្នេះ ព្រះឥសីធោម្យៈ ដោយពាក្យពេចន៍មានហេតុផល បានធ្វើឲ្យយុធិષ્ઠិរ អ្នកដឹងធម៌ មានចិត្តស្ងប់សុខ; ហើយយុធិષ્ઠិរ ក៏មិនរំញ័រចេញពីធម៌ឡើយ ដោយពឹងផ្អែកទាំងប្រាជ្ញាតាមសាស្រ្ត និងបញ្ញាដ៏មាំមួនរបស់ខ្លួន។
Verse 23
अथाब्रवीन्महाबाहुर्भीमसेनो महाबल: । राजानं बलिनां श्रेष्ठो गिरा सम्परिहर्षयन्,तदनन्तर बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबली महाबाहु भीमसेनने अपनी वाणीसे राजा युधिष्ठिरका हर्ष और उत्साह बढ़ाते हुए कहा--
បន្ទាប់មក ភីមសេន មហាបាហុ អ្នកមានកម្លាំងដ៏មហិមា និងជាអ្នកលើកលែងក្នុងចំណោមអ្នកមានអំណាច បានទូលព្រះរាជា។ ដោយពាក្យសម្រស់ដើម្បីធ្វើឲ្យព្រះហឫទ័យរីករាយ គាត់បានលើកទឹកចិត្តយុធិષ્ઠិរ ឲ្យក្លាហាន និងមាំមួនក្នុងមុខទុក្ខលំបាក។
Verse 24
अवेक्षया महाराज तव गाण्डीवधन्वचना । धर्मानुगतया बुद्धया न किज्चित् साहसं कृतम्,“महाराज! गाण्डीव धनुष धारण करनेवाले अर्जुनने आपके आदेशकी प्रतीक्षा तथा अपनी धर्मानुगामिनी बुद्धिके कारण ही अबतक कोई साहसका कार्य नहीं किया है
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ មហារាជ! ព្រោះតែគាត់កំពុងរង់ចាំព្រះបញ្ជារបស់ព្រះអង្គ ហើយព្រោះប្រាជ្ញារបស់គាត់ដើរតាមផ្លូវធម៌ អរជុន អ្នកកាន់ធ្នូគណ្ឌីវ មកដល់ពេលនេះមិនទាន់បានធ្វើអំពើក្លាហានប្រញាប់ប្រញាល់ណាមួយឡើយ»។
Verse 25
सहदेवो मया नित्यं नकुलश्न निवारितौ । शक्तौ विध्वंसने तेषां शत्रूणां भीमविक्रमौ,“भयंकर पराक्रमी नकुल और सहदेव उन सब शत्रुओंका विध्वंस करनेमें समर्थ हैं। इन दोनोंको मैं ही सदा रोकता आया हूँ
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ណកុល និងសហទេវ—ទាំងពីរនេះមានវីរភាពគួរឲ្យខ្លាច—អាចបំផ្លាញសត្រូវទាំងនោះបានទាំងស្រុង។ ប៉ុន្តែជាខ្ញុំឯងដែលតែងតែទប់ស្កាត់ពួកគេមកជានិច្ច»។
Verse 26
न वयं तत् प्रहास्यामो यस्मिन् योक्ष्यति नो भवान् | भवान् विधत्तां तत् सर्व क्षिप्रं जेष्यामहे रिपून्,“आप हमें जिस कार्यमें लगा देंगे, उसे हमलोग पूरा किये बिना नहीं छोड़ेंगे। अतः आप युद्धकी सारी व्यवस्था कीजिये। हम शत्रुओंपर शीघ्र ही विजय पायेंगे”
«ព្រះអង្គនឹងដាក់ឲ្យយើងចូលរួមក្នុងកិច្ចការណាដែរ យើងមិននឹងបោះបង់មុនពេលបំពេញឲ្យសម្រេចឡើយ។ ដូច្នេះ សូមព្រះអង្គរៀបចំការប្រយុទ្ធទាំងអស់ចុះ—យើងនឹងឈ្នះសត្រូវដោយឆាប់រហ័ស»។
Verse 27
इत्युक्ते भीमसेनेन ब्राह्मणा: परमाशिषा । उक्त्वा चापच्छय भरतान्यथास्वान्स्वान्ययुग्गृहान्,भीमसेनके ऐसा कहनेपर सब ब्राह्मण पाण्डवोंको उत्तम आशीर्वाद देकर और उन भरतवंशियोंसे अनुमति लेकर अपने-अपने घरोंको चले गये
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ ភីមសេននិយាយដូច្នេះហើយ ព្រះព្រាហ្មណ៍ទាំងឡាយបានប្រទានពរដ៏ប្រសើរបំផុតដល់បណ្ឌវៈ ហើយសុំអនុញ្ញាតពីវីរបុរសវង្សភារតៈទាំងនោះ រួចចាកចេញទៅផ្ទះរបស់ខ្លួនៗ។
Verse 28
सर्वे वेदविदो मुख्या यतयो मुनयस्तथा । आसेदुस्ते यथान्यायं पुनर्दर्शनकाड्क्षया,वेदोंके ज्ञाता समस्त प्रधान-प्रधान संन्यासी तथा मुनिलोग पाण्डवोंसे फिर मिलनेकी इच्छा रखकर न्यायानुसार अपने योग्य स्थानोंमें रहने लगे
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ អ្នកដឹងវេទទាំងអស់ដែលជាអ្នកដ៏ប្រសើរ—ព្រះសង្ឃបួស និងមុនីទាំងឡាយផងដែរ—បានអង្គុយតាមលំដាប់ត្រឹមត្រូវ តាមទីកន្លែងសមរម្យរបស់ខ្លួន ដោយមានចិត្តប្រាថ្នាចង់បានការជួបឃើញបណ្ឌវទាំងឡាយម្តងទៀត។
Verse 29
सह धौम्येन विद्वांसस्तथा पञ्च च पाण्डवा: । उत्थाय प्रययुर्वीरा: कृष्णामादाय धन्विन:,धौम्यसहित विद्वान् एवं वीर पाँचों पाण्डव द्रौपदीको साथ लिये धनुष धारण किये वहाँसे उठकर चल दिये
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ បន្ទាប់មក បណ្ឌវបងប្អូនទាំងប្រាំ—ទាំងមានប្រាជ្ញា ទាំងក្លាហាន—បានក្រោកឡើង ហើយចេញដំណើរជាមួយធោម្យៈ ដោយនាំក្រឹෂ្ណា (ទ្រោបទី) ទៅជាមួយ កាន់ធ្នូក្នុងដៃ។
Verse 30
क्रोशमात्रमुपागम्य तस्माद् देशान्निमित्तत: । श्वोभूते मनुजव्याप्राश्छन्नवासार्थमुद्यता:,किसी कारणवश उस स्थानसे एक कोस दूर जाकर वे नरश्रेष्ठ ठहर गये और आगामी दूसरे दिनसे अज्ञातवास आरम्भ करनेके लिये उद्यत हो परस्पर सलाह करनेके निमित्त आस-पास बैठ गये। वे सभी पृथक्-पृथक् शास्त्रोंके ज्ञाता, मन्त्रणा करनेमें कुशल तथा संधि-विग्रह आदिके अवसरको जाननेवाले थे
ដោយហេតុផលមួយ ពួកគេបានចាកចេញពីទីនោះប្រហែលមួយក្រូស ហើយឈប់សម្រាកនៅទីនោះ។ ដោយគិតដល់ថ្ងៃបន្ទាប់ ពួកគេបានត្រៀមចាប់ផ្តើមការរស់នៅដោយលាក់អត្តសញ្ញាណ ហើយអង្គុយជិតៗគ្នា ដើម្បីពិគ្រោះយោបល់អំពីផ្លូវដំណើររបស់ខ្លួន—ជាបុរសមានការយល់ឃើញ ជំនាញក្នុងការប្រឹក្សា និងដឹងពេលសមស្របសម្រាប់សម្ព័ន្ធភាព និងការប្រឆាំង។
Verse 31
पृथक्छास्त्रविद: सर्वे सर्वे मन्त्रविशारदा: । संधिविग्रहकालज्ञा मन्त्राय समुपाविशन्,किसी कारणवश उस स्थानसे एक कोस दूर जाकर वे नरश्रेष्ठ ठहर गये और आगामी दूसरे दिनसे अज्ञातवास आरम्भ करनेके लिये उद्यत हो परस्पर सलाह करनेके निमित्त आस-पास बैठ गये। वे सभी पृथक्-पृथक् शास्त्रोंके ज्ञाता, मन्त्रणा करनेमें कुशल तथा संधि-विग्रह आदिके अवसरको जाननेवाले थे
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ ពួកគេទាំងអស់សុទ្ធតែជាអ្នកចេះដឹងសាស្ត្រផ្សេងៗដោយឡែកៗ គ្រប់គ្នាជំនាញក្នុងការប្រឹក្សា និងគ្រប់គ្នាដឹងពេលសមស្របសម្រាប់សម្ព័ន្ធភាព និងការប្រឆាំង។ ដូច្នេះ ពួកគេបានអង្គុយរួមគ្នា ដើម្បីពិគ្រោះយោបល់—ដោយបានដកថយទៅចម្ងាយដែលមានសុវត្ថិភាព និងត្រៀមចាប់ផ្តើមអញ្ញាតវាសពីថ្ងៃបន្ទាប់។
Verse 53
“देवराज इन्द्र शत्रुओंका दमन करनेके लिये गुप्तरूपसे निषधदेशमें गये और गिरिप्रस्थाश्रममें छिपे रहकर उन्होंने अपना कार्य सिद्ध किया
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយ៖ ដើម្បីបង្ក្រាបសត្រូវរបស់ព្រះអង្គ ព្រះឥន្ទ្រា ព្រះរាជានៃទេវតា បានទៅដល់ដែននិសធៈដោយលាក់រូប។ ដោយលាក់ខ្លួននៅអាស្រមគិរិប្រស្ថៈ ព្រះអង្គបានសម្រេចកិច្ចការដែលប៉ងប្រាថ្នា—បង្ហាញថា សូម្បីអំណាចទេវតាក៏អាចប្រើភាពសម្ងាត់ និងយុទ្ធសាស្ត្រ ដើម្បីទប់ស្កាត់កម្លាំងអរិសត្រូវ មិនមែនដើម្បីបង្ហាញអំណាចតែប៉ុណ្ណោះទេ។
Verse 314
इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें नकल आदिके जीवित होने आदि वरोंकी प्राप्तिविषयक तीन सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ
ដូច្នេះ ក្នុង «មហាភារត» ដ៏បរិសុទ្ធ ផ្នែក វនបរវ (Vana Parva) នៅក្នុងអារṇេយបរវ (Āraṇeya) ជំពូកទី ៣១៤ ដែលពោលអំពីការទទួលពរ ដូចជា ការស្ដារជីវិតឲ្យ នកុល និងអ្នកដទៃៗ បានបញ្ចប់។ ការបិទបញ្ចប់នេះបញ្ជាក់ថា ព្រះពរមានទម្ងន់ធម៌យ៉ាងខ្លាំង៖ ជីវិតមិនត្រូវបានយកមកវិញដោយកម្លាំងទេ ប៉ុន្តែដោយសេចក្តីប្រព្រឹត្តត្រឹមត្រូវ និងដោយព្រះគុណដែលត្រូវបានប្រទាន។
Verse 315
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्रयां संहितायां वैयासिक्यां वनपर्वणि आरणेयपर्वणि अज्ञातवासमन्त्रणे पज्चदशाधिकत्रिशततमो<5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत--व्यासनिर्मित शतयाहसी संहिताके वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें अज्ञातवासके लिये मन्त्रणाविषयक तीन सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ
វៃសម្បាយនៈ បានមានព្រះវាចា៖ ដូច្នេះ ក្នុង «មហាភារត» ដ៏បរិសុទ្ធ—សង្ខេបមហាកាព្យមួយសែនស្លោក ដែលព្រះវ្យាសបានរៀបរាប់—ក្នុង វនបរវ (Vana Parva) នៅក្នុង អារṇេយបរវ (Āraṇeya) ជំពូកអំពីការពិគ្រោះយោបល់សម្រាប់ការរស់នៅដោយលាក់អត្តសញ្ញាណ បានបញ្ចប់ហើយ គឺជំពូកទី ៣១៥ (ហើយក្នុងប្រពៃណីខ្លះ រាប់ជាលំដាប់សរុបទី ៣៣០)។