
Chapter Arc: द्यूत-अपमान और द्रौपदी-पराभव के बाद सभा में एक अप्रत्याशित मोड़ आता है—धृतराष्ट्र, वृद्ध और अंधे होते हुए भी, युधिष्ठिर को ‘सहधन’ लौटाकर कुशल-क्षेम के साथ विदा करने का आदेश देते हैं। → धृतराष्ट्र का उपदेश केवल औपचारिक नहीं रहता; वह युधिष्ठिर को कटुवचन न रखने, आर्य-मर्यादा न तोड़ने, और दुर्योधन के पारुष्य को हृदय में न बसाने की सीख देता है—पर भीतर-भीतर यह भय भी धड़कता है कि यह शांति क्षणिक है और दुर्योधन की विष-वृत्ति फिर सिर उठाएगी। → धृतराष्ट्र का निर्णायक वचन—‘अनुज्ञाता: सहधना: स्वराज्यमनुशासत’—युधिष्ठिर को धन सहित अपने राज्य का शासन करने और इन्द्रप्रस्थ लौटने की आज्ञा; साथ ही दुर्योधन के कठोर व्यवहार को क्षमा कर देने का आग्रह। → युधिष्ठिर, भ्राताओं और द्रौपदी सहित, मेघ-निनाद करते रथों पर प्रसन्न-मन से इन्द्रप्रस्थ की ओर प्रस्थान करते हैं; सभा का तत्कालिक संकट शांत होता दिखता है। → यह विदाई उपदेश की शांति में लिपटी हुई है, पर दुर्योधन के अपमान और अधर्म की स्मृति भविष्य के संघर्ष का बीज छोड़ जाती है।
Verse 1
ऑपन-माज (_) अऑ-आकऋााज त्रिसप्ततितमो< ध्याय: धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरको सारा धन लौटाकर एवं समझा- बुझाकर इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश देना युधिछिर उवाच राजन् कि करवामस्ते प्रशाध्यस्मांस्त्वमी श्वर: । नित्यं हि स्थातुमिच्छामस्तव भारत शासने,युधिष्ठिर बोले--राजन्! आप हमारे स्वामी हैं। आज्ञा दीजिये, हम कया करें। भारत! हमलोग सदा आपकी आज्ञाके अधीन रहना चाहते हैं
យុធិષ્ઠិរ បានទូលថា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! តើយើងគួរធ្វើអ្វីសម្រាប់ព្រះអង្គ? ព្រះអង្គជាម្ចាស់របស់យើង និងមានអំណាចលើពួកយើង។ ឱ ភារត! ពួកយើងប្រាថ្នានឹងស្ថិតក្រោមការគ្រប់គ្រងរបស់ព្រះអង្គជានិច្ច និងគោរពតាមព្រះបន្ទូល»។
Verse 2
धृतराष्ट्र रवाच अजाततशत्रो भद्र|ं ते अरिष्टं स्वस्ति गच्छत । अनुज्ञाता: सहधना: स्वराज्यमनुशासत,धृतराष्ट्रने कहा--अजातशत्रो! तुम्हारा कल्याण हो। तुम मेरी आज्ञासे हारे हुए धनके साथ बिना किसी विषघ्न-बाधाके कुशलपूर्वक अपनी राजधानीको जाओ और अपने राज्यका शासन करो
ព្រះធೃತរाष्ट्रមានព្រះបន្ទូលថា៖ «អជាតសត្រូវ! សូមសេចក្តីមង្គលកើតមានដល់អ្នក។ ចូរអ្នកត្រឡប់ទៅរាជធានីរបស់ខ្លួនដោយសុវត្ថិភាព គ្មានឧបសគ្គអាក្រក់ណាមួយ ហើយដោយបានអនុញ្ញាតពីខ្ញុំ ចូរយកទ្រព្យដែលនៅសល់ជាមួយទៅ ហើយគ្រប់គ្រងរាជ្យរបស់អ្នកទៅ»។
Verse 3
इदं चैवावबोद्धव्यं वृद्धस्य मम शासनम् । मया निगदितं सर्व पथ्यं नि:श्रेयसं परम्,मुझ वृद्धकी यही आज्ञा है। एक बात और है, उसपर भी ध्यान देना। मेरी कही हुई सारी बातें तुम्हारे हित और परम मंगलके लिये होंगी
«ចំណុចនេះផងដែរ ត្រូវយល់ឲ្យច្បាស់ថា នេះជាបទបញ្ជារបស់ខ្ញុំ អ្នកចាស់។ អ្វីៗទាំងអស់ដែលខ្ញុំបាននិយាយ គឺជាពាក្យណែនាំដ៏ល្អ សម្រាប់ប្រយោជន៍របស់អ្នក និងសេចក្តីមង្គលដ៏ខ្ពង់ខ្ពស់បំផុត»។
Verse 4
वेत्थ त्वं तात धर्माणां गतिं सूक्ष्मां युधिष्ठिर । विनीतो$सि महाप्राज्ञ वृद्धानां पर्युपासिता
«កូនយូធិស្ឋិរា អើយ អ្នកដឹងច្បាស់អំពីដំណើរដ៏ល្អិតល្អន់ និងន័យពិតនៃធម៌។ អ្នកមានវិន័យ បានបណ្តុះបណ្តាលល្អ មានប្រាជ្ញាធំ ហើយបានគោរពបម្រើ និងថែទាំអ្នកចាស់ទុំជានិច្ច»។
Verse 5
तात युधिष्ठिर! तुम धर्मकी सूक्ष्म गतिको जानते हो। महामते! तुममें विनय है। तुमने बड़े-बूढ़ोंकी उपासना की है ।। यतो बुद्धिस्ततः शान्ति: प्रशमं गच्छ भारत । नादारुणि पतेच्छस्त्रं दारुण्येतन्निपात्यते,जहाँ बुद्धि है, वहीं शान्ति है। भारत! तुम शान्त हो जाओ। (जो कुछ हुआ है, उसे भूल जाओ।) पत्थर या लोहेपर कुल्हाड़ी नहीं पड़ती। लोग उसे लकड़ीपर ही चलाते हैं
«កូនយូធិស្ឋិរា អើយ អ្នកដឹងដំណើរដ៏ល្អិតល្អន់នៃធម៌។ មហាមតិ! ភាពទន់ភ្លន់សុភាពមាននៅក្នុងអ្នក ហើយអ្នកបានគោរពបម្រើអ្នកចាស់ទុំ។ កន្លែងណាមានប្រាជ្ញា កន្លែងនោះមានសន្តិភាព; ដូច្នេះ ឱ ភារតៈ ចូរចូលទៅក្នុងភាពស្ងប់ស្ងាត់ ឲ្យការរំភើបរបស់អ្នករលត់ទៅ។ អាវុធមិនត្រូវបានវាយលើថ្ម ឬដែកទេ; វាត្រូវបានលើកចុះលើឈើ»។
Verse 6
न वैराण्यभिजानन्ति गुणान् पश्यन्ति नागुणान् । विरोधं नाधिगच्छन्ति ये त उत्तमपूरुषा:,जो पुरुष वैरको याद नहीं रखते, गुणोंको ही देखते हैं, अवगुणोंको नहीं तथा किसीसे विरोध नहीं रखते, वे ही उत्तम पुरुष कहे गये हैं। साधु पुरुष दूसरोंके सत्कर्मों (उपकारादि)- को ही याद रखते हैं, उनके किये हुए वैरको नहीं। वे दूसरोंकी भलाई तो करते हैं; परंतु उनसे बदला लेनेकी भावना नहीं रखते
យូធិស្ឋិរាមានព្រះបន្ទូលថា៖ «បុរសល្អឥតខ្ចោះមិនកត់ចំណាំសត្រូវភាពទេ។ ពួកគេមើលឃើញតែគុណធម៌ មិនមើលឃើញទោសទេ។ ពួកគេមិនចូលទៅក្នុងការប្រឆាំងជាមួយអ្នកណាទេ; អ្នកដែលរស់បែបនេះហើយ ទើបហៅថា ‘បុរសឧត្តម’។»
Verse 7
स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि । सन्त: परार्थ कुर्वाणा नावेक्षन्ते प्रतिक्रियाम्,जो पुरुष वैरको याद नहीं रखते, गुणोंको ही देखते हैं, अवगुणोंको नहीं तथा किसीसे विरोध नहीं रखते, वे ही उत्तम पुरुष कहे गये हैं। साधु पुरुष दूसरोंके सत्कर्मों (उपकारादि)- को ही याद रखते हैं, उनके किये हुए वैरको नहीं। वे दूसरोंकी भलाई तो करते हैं; परंतु उनसे बदला लेनेकी भावना नहीं रखते
យុធិષ્ઠិរ បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «អ្នកសុចរិតចងចាំតែគុណកុសលដែលអ្នកដទៃបានធ្វើ មិនចងចាំសត្រូវភាពដែលបានកើតឡើងឡើយ។ ពួកអ្នកមានចិត្តខ្ពង់ខ្ពស់ ប្រព្រឹត្តដើម្បីសុខុមាលភាពរបស់អ្នកដទៃ មិនស្វែងរកការសងសឹក ឬការឆ្លើយតបដូចគ្នាទេ»។
Verse 8
संवादे परुषाण्याहुर्युधिष्ठिर नराधमा: । प्रत्याहुर्मध्यमास्त्वेतेडनुक्ता: परुषमुत्तरम्,युधिष्ठिर! नीच मनुष्य साधारण बातचीतमें भी कटुवचन बोलने लगते हैं। जो स्वयं पहले कटु वचन न कहकर प्रत्युत्तरमें कठोर बातें कहते हैं, वे मध्यम श्रेणीके पुरुष हैं। परंतु जो धीर एवं श्रेष्ठ पुरुष हैं, वे किसीके कटुवचन बोलने या न बोलनेपर भी अपने मुखसे कभी कठोर एवं अहितकर बात नहीं निकालते
យុធិષ્ઠិរ បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ក្នុងការសន្ទនាធម្មតា មនុស្សទាបជាងគេគឺអ្នកដែលចាប់ផ្តើមនិយាយពាក្យរឹងរ៉ៃ។ អ្នកដែលមិនចាប់ផ្តើមដោយពាក្យរឹងរ៉ៃ ប៉ុន្តែឆ្លើយតបដោយភាពរឹងរ៉ៃពេលត្រូវរំលោភ គឺជាមនុស្សមធ្យម។ តែអ្នកមានសេចក្តីអត់ធ្មត់ និងខ្ពង់ខ្ពស់ពិត មិនអនុញ្ញាតឲ្យពាក្យរឹងរ៉ៃ និងបង្កគ្រោះថ្នាក់ចេញពីមាត់ឡើយ—ទោះអ្នកដទៃនិយាយរឹងរ៉ៃដាក់ក៏ដោយ ឬមិននិយាយក៏ដោយ»។
Verse 9
नचोक्ता नैव चानुक्तास्त्वहिता: परुषा गिर: | प्रतिजल्पन्ति वै धीरा: सदा तूत्तमपूरुषा:,युधिष्ठिर! नीच मनुष्य साधारण बातचीतमें भी कटुवचन बोलने लगते हैं। जो स्वयं पहले कटु वचन न कहकर प्रत्युत्तरमें कठोर बातें कहते हैं, वे मध्यम श्रेणीके पुरुष हैं। परंतु जो धीर एवं श्रेष्ठ पुरुष हैं, वे किसीके कटुवचन बोलने या न बोलनेपर भी अपने मुखसे कभी कठोर एवं अहितकर बात नहीं निकालते
យុធិષ્ઠិរ បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ពាក្យរឹងរ៉ៃ និងបង្កគ្រោះថ្នាក់ មិនគួរនិយាយជាមុនទេ ហើយក៏មិនគួរនិយាយឆ្លើយតបដែរ។ មនុស្សខ្លះមានចិត្តទាប និយាយពាក្យជូរចត់សូម្បីតែក្នុងការសន្ទនាធម្មតា។ អ្នកដែលមិនចាប់ផ្តើមដោយពាក្យរឹងរ៉ៃ ប៉ុន្តែឆ្លើយតបដោយភាពរឹងរ៉ៃពេលត្រូវរំលោភ គឺជាមនុស្សមធ្យម។ តែអ្នកមានសេចក្តីអត់ធ្មត់ និងល្អឥតខ្ចោះ មិនអនុញ្ញាតឲ្យពាក្យសាហាវបង្ករបួសចិត្តចេញពីមាត់ឡើយ—ទោះអ្នកដទៃនិយាយរឹងរ៉ៃក៏ដោយ ឬមិននិយាយក៏ដោយ»។
Verse 10
स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि । सन्त: प्रतिविजानन्तो लब्ध्वा प्रत्ययमात्मन:,महात्मा पुरुष अपने अनुभवको सामने रखकर दूसरोंके सुख-दुःखको भी अपने समान जानते हुए उनके अच्छे बर्तावोंको ही याद रखते हैं, उनके द्वारा किये हुए वैर-विरोधको नहीं
យុធិષ્ઠិរ បានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «អ្នកខ្ពង់ខ្ពស់ចងចាំតែអំពើល្អ មិនចងចាំសត្រូវភាពដែលបានធ្វើឡើយ។ ដោយបានទទួលការប្រាកដចិត្តខាងក្នុងពីបទពិសោធន៍របស់ខ្លួន ពួកគេយល់ឃើញសុខទុក្ខរបស់អ្នកដទៃដូចជារបស់ខ្លួន ហេតុនេះហើយពួកគេចងចាំការប្រព្រឹត្តល្អរបស់មនុស្ស មិនចងចាំភាពប្រឆាំងរបស់គេ»។
Verse 11
असम्भधिन्नार्थमर्यादा: साधव: प्रियदर्शना: । तथा चरितमार्येण त्वयास्मिन् सत्समागमे,सत्पुरुष आर्यमर्यादाको कभी भंग नहीं करते। उनके दर्शनसे सभी लोग प्रसन्न हो जाते हैं। युधिष्ठि!! कौरव-पाण्डवोंके समागममें तुमने श्रेष्ठ पुरुषोंके समान ही आचरण किया है
«បុរសសាធុមិនដែលបំពានព្រំដែននៃធម៌ និងកិត្តិយសឡើយ; ការឃើញពួកគេធ្វើឲ្យមនុស្សទាំងឡាយរីករាយ។ ហើយក្នុងសមាគមដ៏ល្អនេះ រវាងកៅរវ និងបណ្ឌវៈ អ្នកបានប្រព្រឹត្តដូចបុរសអរិយៈ»។
Verse 12
दुर्योधनस्य पारुष्यं तत् तात हृदि मा कृथा: । मातरं चैव गान्धारीं मां च त्वं गुणकाड्क्षया
កូនអើយ កុំយកពាក្យរឹងរ៉ៃរបស់ទុរយោធនមកដាក់ក្នុងចិត្តឡើយ។ ដោយគោរពចំពោះធម៌ និងសុចរិត សូមអនុគ្រោះដល់មាតារបស់ខ្ញុំ គន្ធារី—ហើយដល់ខ្ញុំផងដែរ។
Verse 13
प्रेक्षापूर्व मया द्यूतमिदमासीदुपेक्षितम्
យុធិષ્ઠិរាបាននិយាយថា៖ «ល្បែងគ្រាប់ស៊ីសងនេះ ខ្ញុំបានពិចារណាជាមុនដោយការប្រុងប្រយ័ត្នហើយ; ប៉ុន្តែចុងក្រោយខ្ញុំបានមើលរំលងវា ហើយមិនបានប្រយ័ត្នចំពោះគ្រោះថ្នាក់របស់វាទេ»។
Verse 14
मित्राणि द्रष्टकामेन पुत्राणां च बलाबलम् | अशोच्या: कुरवो राजन् येषां त्वमनुशासिता
យុធិષ્ઠិរាបាននិយាយថា៖ «ព្រះមហាក្សត្រា កូនចៅកុរុទាំងនោះ មិនគួរឲ្យសោកស្តាយឡើយ—ព្រោះព្រះអង្គជាអ្នកគ្រប់គ្រង និងណែនាំពួកគេ។ មិនថាមនុស្សចង់ឃើញភាពស្មោះត្រង់របស់មិត្តភក្តិ ឬចង់សាកល្បងកម្លាំងនិងភាពខ្សោយរបស់កូនប្រុសទេ ក្រោមវិន័យរបស់ព្រះអង្គ វាសនារបស់ពួកគេដើរតាមរបៀបដែលព្រះអង្គបានកំណត់។ កន្លែងដែលការទទួលខុសត្រូវ និងការបង្រៀនបានអនុវត្តរួចហើយ ការសោកស្តាយគឺមិនសមទេ»។
Verse 15
मन्त्री च विदुरो धीमान् सर्वशास्त्रविशारद: । मैंने सोच-समझकर भी इस जूएकी इसलिये उपेक्षा कर दी--उसे रोकनेकी चेष्टा नहीं की कि मैं मित्रों और सुहृदोंसे मिलना चाहता था और अपने पुत्रोंक बलाबलको देखना चाहता था। राजन! जिनके तुम शासक हो और सब शास्त्रोंमें निपुण परम बुद्धिमान् विदुर जिनके मन्त्री हैं, वे कुरुवंशी कदापि शोकके योग्य नहीं हैं ।। त्वयि धर्मोडर्जुने धैर्य भीमसेने पराक्रम:,तुममें धर्म है, अर्जुनमें धैर्य है, भीमसेनमें पराक्रम है और नरश्रेष्ठ नकुल-सहदेवमें श्रद्धा एवं विशुद्ध गुरुसेवाका भाव है। अजातशत्रो! तुम्हारा भला हो। अब तुम खाण्डवप्रस्थको जाओ । दुर्योधन आदि बन्धुओंके प्रति तुम्हें अच्छे भाईका-सा स्नेहभाव रहे और तुम्हारा मन सदा धर्ममें लगा रहे
យុធិષ્ઠិរាបាននិយាយថា៖ «ហើយវិទុរ—អ្នកប្រាជ្ញ មានបញ្ញាច្បាស់ និងជំនាញល្អឥតខ្ចោះក្នុងសាស្ត្រទាំងអស់—ជាមន្ត្រីរបស់យើង»។
Verse 16
श्रद्धा च गुरुशुश्रूषा यमयो: पुरुषाग्रययो: । अजाततगशत्रो भद्र|ं ते खाण्डवप्रस्थमाविश । भ्रातृभिस्ते<स्तु सौश्षात्रं धर्मे ते धीयतां मन:,तुममें धर्म है, अर्जुनमें धैर्य है, भीमसेनमें पराक्रम है और नरश्रेष्ठ नकुल-सहदेवमें श्रद्धा एवं विशुद्ध गुरुसेवाका भाव है। अजातशत्रो! तुम्हारा भला हो। अब तुम खाण्डवप्रस्थको जाओ । दुर्योधन आदि बन्धुओंके प्रति तुम्हें अच्छे भाईका-सा स्नेहभाव रहे और तुम्हारा मन सदा धर्ममें लगा रहे
យុធិષ્ઠិរាបាននិយាយថា៖ «នៅក្នុងបុរសដ៏ឧត្តមទាំងពីរ គឺកូនភ្លោះ (នកុល និងសហទេវ) មានសទ្ធា និងការឧទ្ទិសដ៏បរិសុទ្ធ ដែលបង្ហាញជាការបម្រើគ្រូដោយយកចិត្តទុកដាក់។ អជាតសត្រុ សូមឲ្យសេចក្តីល្អប្រសើរមកដល់អ្នក—ឥឡូវចូលទៅកាន់ខាណ្ឌវប្រស្ថ។ សូមឲ្យអ្នកមានសេចក្តីស្រឡាញ់ដូចបងប្អូនពិតចំពោះញាតិមិត្ត ដូចទុរយោធន និងអ្នកដទៃទៀត ហើយសូមឲ្យចិត្តអ្នកតែងតែតាំងនៅក្នុងធម៌»។
Verse 17
वैशम्पायन उवाच इत्युक्तो भरतश्रेष्ठ धर्मराजो युधिष्ठिर: । कृत्वा5<र्यसमयं सर्व प्रतस्थे भ्रातृभि: सह,वैशम्पायनजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ! राजा धृतराष्ट्रके इस प्रकार कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिर पूज्यवर धृतराष्ट्रकरे आदेशको स्वीकार करके भाइयोंके सहित वहाँसे विदा हो गये
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ អ្នកប្រសើរបំផុតក្នុងវង្សភារត! ពេលត្រូវបានព្រះរាជា ធ្រឹតរាស្ត្រ មានព្រះបន្ទូលដូច្នោះ ធម្មរាជ យុធិષ્ઠិរៈ បានទទួលយក និងបំពេញតាមកិច្ចគោរពដែលគួរធ្វើចំពោះព្រះអង្គចាស់ជរាដ៏គួរគោរព ហើយបានចាកចេញពីទីនោះជាមួយបងប្អូនទាំងឡាយ។»
Verse 18
ते रथान् मेघसंकाशानास्थाय सह कृष्णया । प्रययुहष्टमनस इन्द्रप्रस्थं पुरोत्तमम्
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ ពួកគេឡើងជិះលើរថដែលមានរូបរាងដូចពពកភ្លៀងកកកុញ ហើយមានក្រឹෂ್ಣា (ដ្រោបទី) រួមដំណើរ ដោយចិត្តរីករាយ បានធ្វើដំណើរទៅកាន់ឥន្ទ្រប្រស្ថ—ទីក្រុងប្រសើរបំផុត។
Verse 72
इस प्रकार श्रीमह्ााभारत सभापव॑के अन्तर्गत झ्यूतपर्वमें भीमसेनका क्रोधविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
ដូច្នេះ បានបញ្ចប់ជំពូកទី៧២ ដែលពាក់ព័ន្ធនឹងកំហឹងរបស់ភីមសេន ក្នុងផ្នែក ឌ្យូត (ល្បែងស៊ីសង) នៃ សភាបរវៈ នៃ «ស្រីមហាភារត»។
Verse 73
वे मेघके समान शब्द करनेवाले रथोंपर द्रौपदीके साथ बैठकर प्रसन्नमनसे नगरोंमें उत्तम इन्द्रप्रसथ्थको चल दिये ।। इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि धृतराष्ट्रवरप्रदानपूर्वकमिन्द्रप्रस्थं प्रति युधिष्ठिरगमने त्रिसप्ततितमो5ध्याय:
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ បន្ទាប់មក ពួកគេអង្គុយជាមួយដ្រោបទីលើរថដែលមានសំឡេងរំញ័រដូចផ្គរលាន់នៃពពក ហើយដោយចិត្តរីករាយ បានចេញដំណើរទៅកាន់ឥន្ទ្រប្រស្ថ—ទីក្រុងប្រសើរបំផុត។ ដូច្នេះ ក្នុង «មហាភារត» សភាបរវៈ ផ្នែកឌ្យូត ជំពូកទី៧៣ បានបញ្ចប់ ដោយពិពណ៌នាអំពីការចេញដំណើររបស់យុធិષ્ઠិរៈទៅឥន្ទ្រប្រស្ថ បន្ទាប់ពីធ្រឹតរាស្ត្រ បានប្រទានពរ។
Verse 126
उपस्थितं वृद्धमन्धं पितरं पश्य भारत । तात! दुर्योधनने जो कठोर बर्ताव किया है, उसे तुम अपने हृदयमें मत लाना। भारत! तुम तो उत्तम गुण ग्रहण करनेकी इच्छासे अपनी माता गान्धारी तथा यहाँ बैठे हुए मुझ अंधे बूढ़े ताऊकी ओर देखो
«ឱ ភារត! ចូរមើលឪពុករបស់អ្នក ដែលចាស់ជរា និងខ្វាក់ភ្នែក ឈរនៅមុខអ្នក។ កូនអើយ! កុំយកការប្រព្រឹត្តដ៏រឹងរ៉ៃដែលទុរយោធនបានធ្វើ មកដាក់ក្នុងចិត្តឡើយ។ ឱ ភារត! ដោយបំណងចង់ទទួលយកគុណធម៌ដ៏ប្រសើរ ចូរអ្នកបង្វែរភ្នែកទៅកាន់មាតា កាន្ធារី និងមកកាន់ខ្ញុំ—ពូចាស់ខ្វាក់ភ្នែក—ដែលអង្គុយនៅទីនេះ។»