Adhyaya 22
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 2229 Verses

Adhyaya 22

सप्तहोतृ-विधानम् एवं इन्द्रिय–मनःसंवादः (The Seven Hotṛs and the Debate of Senses and Mind)

Upa-parva: Indriya–Manas Saṃvāda (Dialogue of the Senses and the Mind)

A brāhmaṇa introduces an “ancient itihāsa” concerning the prescribed arrangement (vidhāna) of seven hotṛs, identified as the five sensory faculties—smell (ghrāṇa), sight (cakṣus), taste (jihvā), touch (tvak), hearing (śrotra)—together with mind (manas) and intellect (buddhi). Though co-present in a subtle locus, they do not apprehend one another’s objects, because each operates within its own guṇa-domain. The brāhmaṇa explains that each faculty fails to grasp the object-range of the others: smell alone grasps odors; taste alone grasps flavors; sight alone grasps forms; touch alone grasps tactile contacts; hearing alone grasps sounds; mind alone apprehends doubt and deliberative fluctuation; intellect alone reaches niṣṭhā (settled determination/decision). The chapter then stages a disputation: mind claims superiority by asserting that without it the senses cannot function, likening sense activity without mind to empty houses or extinguished fires. The senses respond by challenging the mind to enjoy or cognize without them, and by issuing cross-assignment tests (e.g., grasp form by smell), implying functional interdependence. The exchange concludes with a balanced thesis: each remains attached to its own capacity, lacks direct access to the others’ capacities, and yet mutual cooperation is required for lived cognition and satisfaction.

Chapter Arc: ब्राह्मण प्राचीन इतिहासनुमा उपदेश छेड़ता है—मन, बुद्धि और पाँच इन्द्रियाँ मानो ‘सप्त होता’ बनकर भीतर के यज्ञ में नियुक्त हैं; वे सूक्ष्म अवकाश में रहते हुए भी एक-दूसरे को नहीं ‘देखते’ (अर्थात् नहीं जानते)। → इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों का दावा करती हैं और परस्पर सीमाएँ खींचती हैं—घ्राण, रसना, त्वचा, श्रोत्र, मन, बुद्धि रूप-ज्ञान का अधिकार नहीं रखते; चक्षु उसे ग्रहण करता है। ‘गुण-अज्ञान’ और ‘गुण-ज्ञान’ की बहस उठती है: गुणों में रमे हुए ये होता एक-दूसरे के स्वभाव को भी ठीक से नहीं पहचानते। → संवाद तीखा होकर उलट-पुलट हो जाता है—श्रोत्र से गन्ध, घ्राण से शब्द, रसना से स्पर्श जैसे असंगत ‘विनिमय’ का प्रस्ताव रखकर यह दिखाया जाता है कि विषय-ग्रहण का अभिमान भ्रम है; इन्द्रियाँ और मन-बुद्धि वस्तुतः परस्पर-आश्रित हैं और ‘मैं ही जानता/भोगता हूँ’ का दावा टिकता नहीं। → ब्राह्मण स्वप्न-जागरण के उदाहरण से निष्कर्ष देता है: मन अनेक संकल्पों और स्वप्न-आश्रयों से प्रेरित होकर विषयों की ओर दौड़ता है; पर प्राणक्षय/क्षय की घड़ी में वही विषय-आधारित संकल्प शांत हो जाते हैं—जैसे ईंधन-क्षय पर अग्नि स्वतः बुझती है।

Shlokas

Verse 1

अपन बछ। है २ >> द्ाविशोदष्ध्याय: मन-बुद्धि और इन्द्रियरूप सप्त होताओंका, यज्ञ तथा मन- इन्द्रिय-संवादका वर्णन ब्राह्मण उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । सुभगे सप्तहोतृणां विधानमिह यादृशम्‌,ब्राह्मणने कहा--सुभगे! इसी विषयमें इस पुरातन इतिहासका भी उदाहरण दिया जाता है। सात होताओंके यज्ञका जैसा विधान है, उसे सुनो

ព្រះព្រាហ្មណ៍បានមានព្រះវាចា៖ «នៅក្នុងប្រធានបទនេះផងដែរ មានរឿងបុរាណតាមប្រពៃណីត្រូវបានលើកមកជាឧទាហរណ៍។ ឱ នារីមានសុភមង្គល ចូរស្តាប់ច្បាប់ និងរបៀបរៀបចំពិធីយជ្ញៈដូចដែលបានបង្រៀននៅទីនេះ—គឺបទបញ្ញត្តិអំពី “ហោត្រ” ទាំងប្រាំពីរ (អ្នកបម្រើពិធី)»។

Verse 2

घ्राणश्नक्षुश्न जिह्ना च त्वक्‌ श्रोत्रं चैव पञजचमम्‌ | मनो बुद्धिश्व सप्तैते होतार: पृथगाश्रिता:,नासिका, नेत्र, जिह्ठदा, त्वचा और पाँचवाँ कान, मन और बुद्धि--ये सात होता अलग- अलग रहते हैं। यद्यपि ये सभी सूक्ष्म शरीरमें ही निवास करते हैं तो भी एक-दूसरेको नहीं देखते हैं। शोभने! इन सात होताओंको तुम स्वभावसे ही पहचानो

ព្រះព្រាហ្មណ៍បានមានព្រះវាចា៖ «ច្រមុះ ភ្នែក អណ្តាត ស្បែក និងទីប្រាំគឺត្រចៀក—រួមទាំងចិត្ត និងបញ្ញា—ទាំងនេះជាហោត្រ (hotṛ) ទាំងប្រាំពីរ ដែលស្ថិតនៅដោយឡែកៗ។ ទោះបីពួកវាទាំងអស់ស្នាក់នៅក្នុងរាងកាយសូក្ស្មក៏ដោយ ក៏មិនអាចដឹងឃើញគ្នាទៅវិញទៅមកបានឡើយ។ ឱ នារីសោភា ចូរទទួលស្គាល់ហោត្រទាំងប្រាំពីរនេះតាមសភាពធម្មជាតិរបស់វា»។

Verse 3

सूक्ष्मेअवकाशे तिष्ठन्तो न पश्यन्तीतरेतरम्‌ । एतान्‌ वै सप्तहोतृस्त्वं स्वभावाद्‌ विद्धि शोभने,नासिका, नेत्र, जिह्ठदा, त्वचा और पाँचवाँ कान, मन और बुद्धि--ये सात होता अलग- अलग रहते हैं। यद्यपि ये सभी सूक्ष्म शरीरमें ही निवास करते हैं तो भी एक-दूसरेको नहीं देखते हैं। शोभने! इन सात होताओंको तुम स्वभावसे ही पहचानो

ពួកវាស្ថិតនៅក្នុងលំហសូក្ស្មដូចគ្នា ប៉ុន្តែមិនអាចឃើញគ្នាទៅវិញទៅមកបានឡើយ។ ឱ នារីសោភា ចូរដឹងថា ទាំងនេះហើយជាហោត្រ (hotṛ) ទាំងប្រាំពីរ តាមសភាពធម្មជាតិរបស់វា—ម្នាក់ៗបំពេញមុខងារដោយឡែក ទោះស្នាក់នៅក្នុងរាងកាយសូក្ស្មតែមួយក៏ដោយ។

Verse 4

ब्राह्मण्युवाच सूक्ष्मेअवकाशे सन्तस्ते कं नान्योन्यदर्शिन: । कथंस्वभावा भगवन्नेतदाचक्ष्व मे प्रभो,ब्राह्मणीने पूछा--भगवन्‌! जब सभी सूक्ष्म शरीरमें ही रहते हैं, तब एक-दूसरेको देख क्यों नहीं पाते? प्रभो! उनके स्वभाव कैसे हैं? यह बतानेकी कृपा करें

នារីព្រាហ្មណីបានសួរ៖ «ឱ ព្រះអម្ចាស់ដ៏មានព្រះពុទ្ធិគុណ! បើសិនពួកវាទាំងអស់ស្នាក់នៅក្នុងលំហសូក្ស្មដូចគ្នា ហេតុអ្វីបានជាមិនអាចដឹងឃើញគ្នាទៅវិញទៅមក? សូមព្រះអម្ចាស់ប្រាប់ខ្ញុំអំពីសភាពធម្មជាតិរបស់ពួកវាផង»។

Verse 5

ब्राह्मण उवाच गुणाज्ञानमविज्ञानं गुणज्ञानमभिज्ञता | परस्परं गुणानेते नाभिजानन्ति कह्िचित्‌,ब्राह्मणने कहा--प्रिये! (यहाँ देखनेका अर्थ है, जानना) गुणोंको न जानना ही गुणवानको न जानना कहलाता है और गुणोंको जानना ही गुणवान्‌को जानना है। ये नासिका आदि सात होता एक-दूसरेके गुणोंको कभी नहीं जान पाते हैं (इसीलिये कहा गया है कि ये एक-दूसरेको नहीं देखते हैं)

ព្រះព្រាហ្មណ៍បានមានព្រះវាចា៖ «ការមិនដឹងគុណលក្ខណៈ គឺអវិជ្ជា; ការដឹងគុណលក្ខណៈ គឺវិវេកដឹងច្បាស់។ ប៉ុន្តែអង្គទាំងនេះមិនអាចស្គាល់គុណលក្ខណៈរបស់គ្នាទៅវិញទៅមកបានឡើយ—មិនមានមួយណាអាចយល់ឃើញមួយផ្សេងទៀតបានពេញលេញ»។

Verse 6

जिद्दा चक्षुस्तथा श्रोत्रं वाड्मनो बुद्धिरेव च । न गन्धानधिगच्छन्ति प्राणस्तानधिगच्छति,जीभ, आँख, कान, त्वचा, मन और बुद्धि--ये गन्धोंको नहीं समझ पाते, किंतु नासिका उसका अनुभव करती है

ព្រះព្រាហ្មណ៍បានមានពាក្យថា៖ «អណ្ដាត ភ្នែក ត្រចៀក ស្បែក ចិត្ត និងបញ្ញា—ទាំងនេះមិនអាចដឹងក្លិនបានទេ; គឺព្រាណៈ (ដង្ហើមជីវិត) ដែលដំណើរការតាមអង្គងារក្លិន ទើបអាចដឹងក្លិនបាន»។

Verse 7

घ्राणं चक्षुस्तथा श्रोत्रं वाड्मनो बुद्धिरेव च । न रसानधिगच्छन्ति जिह्नला तानधिगच्छति,नासिका, कान, नेत्र, त्वचा, मन और बुद्धि--ये रसोंका आस्वादन नहीं कर सकते। केवल जिह्नला उसका स्वाद ले सकती है

ព្រះព្រាហ្មណ៍បានមានពាក្យថា៖ «ច្រមុះ ភ្នែក ត្រចៀក វាចា ចិត្ត និងបញ្ញា—ទាំងនេះមិនអាចដឹងរសជាតិបានទេ។ រសជាតិ ត្រូវបានដឹងតែដោយអណ្ដាតប៉ុណ្ណោះ»។

Verse 8

घ्राणं जिह्ना तथा श्रोत्रं वाड्मनो बुद्धिरेव च । न रूपाण्यधिगच्छन्ति चक्षुस्तान्यधिगच्छति,नासिका, जीभ, कान, त्वचा, मन और बुद्धि--ये रूपका ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते; किंतु नेत्र इनका अनुभव करते हैं

ព្រះព្រាហ្មណ៍បានមានពាក្យថា៖ «ច្រមុះ អណ្ដាត ត្រចៀក វាចា ចិត្ត និងបញ្ញា—ទាំងនេះមិនអាចដឹងរូបរាងបានទេ; គឺភ្នែកតែមួយគត់ដែលចាប់យកវាដោយផ្ទាល់»។

Verse 9

घ्राणं जिद्दा ततदश्नक्षुः श्रोत्रं बुद्धिर्मनस्तथा । न स्पर्शानधिगच्छन्ति त्वक्‌ च तानधिगच्छति,नासिका, जीभ, आँख, कान, बुद्धि और मन--ये स्पर्शका अनुभव नहीं कर सकते; किंतु त्वचाको उसका ज्ञान होता है

ព្រះព្រាហ្មណ៍បានមានពាក្យថា៖ «ច្រមុះ អណ្ដាត ភ្នែក ត្រចៀក បញ្ញា និងចិត្ត—ទាំងនេះមិនអាចដឹងការប៉ះពាល់បានទេ; គឺស្បែកតែមួយគត់ដែលដឹងការប៉ះពាល់នោះ»។

Verse 10

घ्राणं जिह्ना च चक्षुश्न॒ वाड्मनो बुद्धिरेव च । न शब्दानधिगच्छन्ति श्रोत्रं तानधिगच्छति,नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, मन और बुद्धि--इन्हें शब्दका ज्ञान नहीं होता; किंतु कानको होता है

ព្រះព្រាហ្មណ៍បានមានពាក្យថា៖ «ច្រមុះ អណ្ដាត ភ្នែក ស្បែក ចិត្ត និងបញ្ញា—ទាំងនេះមិនអាចដឹងសំឡេងបានទេ; គឺត្រចៀកតែមួយគត់ដែលដឹងសំឡេង»។

Verse 11

घ्राणं जिह्ना च चक्षुश्न त्वक्‌ श्रोत्रं बुद्धिरेव च । संशयं नाधिगच्छन्ति मनस्तमधिगच्छति,नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, कान और बुद्धि--ये संशय (संकल्प-विकल्प) नहीं कर सकते। यह काम मनका है

ព្រះព្រាហ្មណ៍បានមានព្រះវាចា៖ «ច្រមុះ អណ្ដាត ភ្នែក ស្បែក ត្រចៀក ហើយសូម្បីតែបញ្ញា—ទាំងនេះមិនអាចបង្កើតសង្ស័យ ឬការស្ទាក់ស្ទើរ (សង្កల్ప–វិកల్ప) ដោយខ្លួនឯងបានទេ។ ចិត្តទេដែលទៅដល់ និងបង្កើតការរវើរវាយនោះ; ដូច្នេះ សេចក្តីមាំមួនក្នុងធម៌ និងការវិនិច្ឆ័យត្រឹមត្រូវ ពឹងផ្អែកលើការគ្រប់គ្រងចិត្ត មិនមែនលើការស្តីបន្ទោសអង្គសញ្ញាទេ»។

Verse 12

घ्राणं जिह्ना च चक्षुश्न त्वक्‌ श्रोत्र मन एव च | न निष्ठामधिगच्छन्ति बुद्धिस्तामधिगच्छति,इसी प्रकार नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, कान, और मन--वे किसी बातका निश्चय नहीं कर सकते। निश्चयात्मक ज्ञान तो केवल बुद्धिको होता है

ព្រះព្រាហ្មណ៍បានមានព្រះវាចា៖ «ដូចគ្នានេះដែរ ច្រមុះ អណ្ដាត ភ្នែក ស្បែក ត្រចៀក ហើយសូម្បីតែចិត្ត—ទាំងនេះមិនអាចទៅដល់សេចក្តីដាច់ខាតនៃការសម្រេចចិត្តបានទេ។ មានតែបញ្ញា (buddhi) ប៉ុណ្ណោះដែលទៅដល់ចំណេះដឹងដាច់ខាត»។

Verse 13

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । इन्द्रियाणां च संवादं मनसश्लैव भामिनि,भामिनि! इस विषयमें इन्द्रियों और मनके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है

នៅទីនេះផងដែរ ឱ នារីសោភា មានការយករឿងព្រេងបុរាណមួយមកលើកជាឧទាហរណ៍—គឺសន្ទនារវាងអង្គសញ្ញាទាំងឡាយ និងចិត្ត—ដើម្បីបំភ្លឺប្រធានបទនេះ និងន័យធម៌របស់វា។

Verse 14

मन उवाच नाप्राति मामृते प्राणं रसं जिदह्दा न वेत्ति च । रूप॑ चक्षुर्न गृह्नाति त्वक्‌ स्पर्श नावबुध्यते,एक बार मनने इन्द्रियोंसे कहा--मेरी सहायताके बिना नासिका सूँघ नहीं सकती, जीभ रसका स्वाद नहीं ले सकती, आँख रूप नहीं देख सकती, त्वचा स्पर्शका अनुभव नहीं कर सकती और कानोंको शब्द नहीं सुनायी दे सकता। इसलिये मैं सब भूतोंमें श्रेष्ठ और सनातन हूँ

ចិត្តបាននិយាយថា៖ «បើគ្មានខ្ញុំ ដង្ហើមជីវិតមិនអាចដំណើរការត្រឹមត្រូវបានទេ; អណ្ដាតមិនអាចដឹងរសជាតិ; ភ្នែកមិនអាចចាប់យករូប; ស្បែកមិនអាចយល់ដឹងអំពីស្បর্শ»។

Verse 15

न श्षोत्रं बुध्यते शब्द मया हीन॑ कथंचन । प्रवरं सर्वभूतानामहमस्मि सनातनम्‌,एक बार मनने इन्द्रियोंसे कहा--मेरी सहायताके बिना नासिका सूँघ नहीं सकती, जीभ रसका स्वाद नहीं ले सकती, आँख रूप नहीं देख सकती, त्वचा स्पर्शका अनुभव नहीं कर सकती और कानोंको शब्द नहीं सुनायी दे सकता। इसलिये मैं सब भूतोंमें श्रेष्ठ और सनातन हूँ

ចិត្តបាននិយាយថា៖ «បើគ្មានខ្ញុំ ត្រចៀកមិនអាចយល់ដឹងអំពីសំឡេងបានឡើយ។ ដូច្នេះ ខ្ញុំជាអ្នកប្រសើរបំផុតក្នុងសត្វលោកទាំងអស់ ជាសនាតនៈ»។

Verse 16

अगाराणीव शून्यानि शान्तार्चिष इवाग्नय: । इन्द्रियाणि न भासन्ते मया हीनानि नित्यश:,“मेरे बिना समस्त इन्द्रियाँ बुझी लपटोंवाली आग और सूने घरकी भाँति सदा श्रीहीन जान पड़ती हैं

ចិត្តបាននិយាយថា៖ «គ្មានខ្ញុំ អង្គសញ្ញាទាំងឡាយមិនភ្លឺរលោងពិតប្រាកដឡើយ។ ពេលខ្វះវត្តមានខ្ញុំ វាហាក់ដូចជាខ្វះសិរីរុងរឿងជានិច្ច—ដូចផ្ទះទំនេរចោល ឬដូចភ្លើងដែលអណ្តាតភ្លើងត្រូវបានពន្លត់»។

Verse 17

काष्ठानीवार्द्रशुष्काणि यतमानैरपीन्द्रियै: । गुणार्थान्‌ नाधिगच्छन्ति मामृते सर्वजन्तव:,संसारके सभी जीव इन्द्रियोंके यत्न करते रहनेपर भी मेरे बिना उसी प्रकार विषयोंका अनुभव नहीं कर सकते, जिस प्रकार कि सूखे-गीले काष्ठ कोई अनुभव नहीं कर सकते

ចិត្តបាននិយាយថា៖ «ដូចឈើទាំងឡាយ—ទោះសើមឬស្ងួត—មិនអាច ‘ទទួលអារម្មណ៍’ អ្វីដោយខ្លួនឯងបានទេ ដូច្នេះដែរ សត្វលោកទាំងអស់ ទោះអង្គសញ្ញាខិតខំប្រឹងប្រែងយ៉ាងណា ក៏មិនអាចយល់ដឹងវត្ថុអារម្មណ៍ និងគុណលក្ខណៈរបស់វា ដោយគ្មានខ្ញុំឡើយ។ ចិត្តធ្វើឲ្យការប៉ះពាល់តាមអារម្មណ៍មានន័យ; គ្មានវា ការខិតខំ និងអង្គសញ្ញាក៏នៅតែអសកម្ម»។

Verse 18

इच्धियाण्यूचु: एवमेतद्‌ भवेत्‌ सत्यं यथैतन्मन्यते भवान्‌ | ऋते<5स्मानस्मदर्थास्त्वं भोगान्‌ भुड्क्ते भवान्‌ यदि,यह सुनकर इन्द्रियोंने कहा--महोदय! यदि आप भी हमारी सहायता लिये बिना ही विषयोंका अनुभव कर सकते तो हम आपकी इस बातको सच मान लेतीं

អង្គសញ្ញាទាំងឡាយបាននិយាយថា៖ «បាទ—វានឹងពិតដូចដែលលោកគិត ប្រសិនបើលោកអាចរីករាយនឹងវត្ថុអារម្មណ៍ដោយគ្មានយើង ដែលមានសម្រាប់ការនោះ។ តែបើគ្មានការចូលរួមរបស់យើង តើលោកអាចទទួលទានសុខសាន្តនៃភោគៈបានដូចម្តេច?»។

Verse 19

यद्यस्मासु प्रलीनेषु तर्पणं प्राणधारणम्‌ । भोगान्‌ भुद्क्ते भवान्‌ सत्यं यथैतन्मन्यते तथा,हमारा लय हो जानेपर भी आप तृप्त रह सकें, जीवन धारण कर सकें और सब प्रकारके भोग भोग सकें तो आप जैसा कहते और मानते हैं, वह सब सत्य हो सकता है

ចិត្តបាននិយាយថា៖ «ប្រសិនបើទោះយើងបានរលាយទៅក្នុងប្រភពរបស់យើងហើយ ក៏អ្នកនៅតែអាចទទួលបានការត្រេកអរ រក្សាជីវិត និងរីករាយនឹងភោគៈទាំងឡាយបាន នោះអ្វីដែលអ្នកនិយាយ និងជឿ ក៏អាចជាការពិត»។

Verse 20

अथवास्मासु लीनेषु तिष्ठत्सु विषयेषु च । यदि संकल्पमात्रेण भुद्ुक्ते भोगान्‌ यथार्थवत्‌,अथवा हम सब इन्द्रियाँ लीन हो जायँ या विषयोंमें स्थित रहें, यदि आप अपने संकल्पमात्रसे विषयोंका यथार्थ अनुभव करनेकी शक्ति रखते हैं और आपको ऐसा करनेमें सदा ही सफलता प्राप्त होती है तो जरा नाकके द्वारा रूपका तो अनुभव कीजिये, आँखसे रसका तो स्वाद लीजिये और कानके द्वारा गन्धोंको तो ग्रहण कीजिये। इसी प्रकार अपनी शक्तिसे जिह्लाके द्वारा स्पर्शका, त्वचाके द्वारा शब्दका और बुद्धिके द्वारा स्पर्शका तो अनुभव कीजिये

ចិត្តបាននិយាយថា៖ «មិនថាអង្គសញ្ញាទាំងឡាយរលាយចូលមកក្នុងខ្ញុំ ឬនៅតែភ្ជាប់ជាមួយវត្ថុរបស់វាក៏ដោយ—ប្រសិនបើដោយសេចក្តីសម្រេចចិត្តតែប៉ុណ្ណោះ អ្នកអាចទទួលអារម្មណ៍ភោគៈបានត្រឹមត្រូវដូចជាវាជាក់ស្តែង ហើយមិនដែលបរាជ័យ—ចូរសាកល្បងមើល៖ ឲ្យច្រមុះឃើញរូប, ឲ្យភ្នែកសាករស, ឲ្យត្រចៀកទទួលក្លិន។ ដូចគ្នានេះ ឲ្យអណ្តាតទទួលស្បর্শ, ឲ្យស្បែកទទួលសំឡេង, ហើយឲ្យបញ្ញាទទួលស្បর্শ»។

Verse 21

अथ चेन्मन्यसे सिद्धिमस्मदर्थेषु नित्यदा । प्राणेन रूपमादत्स्व रसमादत्स्व चक्षुषा,अथवा हम सब इन्द्रियाँ लीन हो जायँ या विषयोंमें स्थित रहें, यदि आप अपने संकल्पमात्रसे विषयोंका यथार्थ अनुभव करनेकी शक्ति रखते हैं और आपको ऐसा करनेमें सदा ही सफलता प्राप्त होती है तो जरा नाकके द्वारा रूपका तो अनुभव कीजिये, आँखसे रसका तो स्वाद लीजिये और कानके द्वारा गन्धोंको तो ग्रहण कीजिये। इसी प्रकार अपनी शक्तिसे जिह्लाके द्वारा स्पर्शका, त्वचाके द्वारा शब्दका और बुद्धिके द्वारा स्पर्शका तो अनुभव कीजिये

ចិត្តបាននិយាយថា៖ «បើអ្នកគិតថា អ្នកតែងតែសម្រេចបាននូវគោលបំណងរបស់យើងជានិច្ច ដូច្នោះចូរប្រែបញ្ច្រាសលំដាប់នៃអង្គសញ្ញាទាំងឡាយ៖ ចូរទទួលយករូបដោយដង្ហើម ហើយចូររសជាតិដោយភ្នែក»។ ពាក្យនេះជាការប្រកួតប្រជែងដ៏មុតមាំ ដើម្បីបង្ហាញព្រំដែនថេររបស់អង្គសញ្ញា និងបញ្ជាក់ថា ការតាំងចិត្តតែប៉ុណ្ណោះ មិនអាចលើសលប់ច្បាប់ធម្មជាតិនៃការយល់ឃើញបានទេ; ចំណេះដឹងពិត ត្រូវការវិន័យនៃការវែកញែក មិនមែនការអួតអាងអំណាចឡើយ។

Verse 22

श्रोत्रेण गन्धानादत्स्व स्पर्शानादत्स्व जिह्दया । त्वचा च शब्दमादत्स्व बुद्धया स्पर्शभथापि च,अथवा हम सब इन्द्रियाँ लीन हो जायँ या विषयोंमें स्थित रहें, यदि आप अपने संकल्पमात्रसे विषयोंका यथार्थ अनुभव करनेकी शक्ति रखते हैं और आपको ऐसा करनेमें सदा ही सफलता प्राप्त होती है तो जरा नाकके द्वारा रूपका तो अनुभव कीजिये, आँखसे रसका तो स्वाद लीजिये और कानके द्वारा गन्धोंको तो ग्रहण कीजिये। इसी प्रकार अपनी शक्तिसे जिह्लाके द्वारा स्पर्शका, त्वचाके द्वारा शब्दका और बुद्धिके द्वारा स्पर्शका तो अनुभव कीजिये इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु द्वाविंशोडध्याय:

ចិត្តបាននិយាយថា៖ «ចូរទទួលយកក្លិនដោយត្រចៀក; ចូរទទួលយកការប៉ះដោយអណ្តាត។ ហើយចូរទទួលយកសំឡេងដោយស្បែក; ទោះបីជាដោយបញ្ញាក៏ចូរទទួលយកការប៉ះផងដែរ»។ (ដោយបញ្ច្រាសមុខងារធម្មតានៃអង្គសញ្ញា ពាក្យនេះបង្ខំឲ្យពិចារណាថា ការយល់ឃើញពិតជាស្ថិតនៅក្រៅក្នុងអង្គសញ្ញា ឬត្រូវបានចិត្តអនុម័ត និងស្ថាបនាឡើងដោយសេចក្តីសម្រេច និងការយល់ដឹង។)

Verse 23

बलवन्तो हानियमा नियमा दुर्बलीयसाम्‌ । भोगानपूर्वानादत्स्व नोच्छिष्टं भोक्तुमहति,आप-जैसे बलवान्‌ लोग नियमोंके बन्धनमें नहीं रहते, नियम तो दुर्बलोंके लिये होते हैं। आप नये ढंगसे नवीन भोगोंका अनुभव कीजिये। हमलोगोंकी जूठन खाना आपको शोभा नहीं देता

ចិត្តបាននិយាយថា៖ «អ្នកខ្លាំងមិនគួរត្រូវបានចងក្រងដោយវិន័យតឹងរឹងទេ; ការរឹតត្បិតទាំងនោះសម្រាប់អ្នកទន់ខ្សោយ។ ចូររករីករាយនូវសុខសម្បទាដែលមិនធ្លាប់មាន ក្នុងរបៀបថ្មីៗ។ ការរស់នៅលើអ្វីដែលអ្នកដទៃទុកសល់ មិនសមនឹងអ្នកឡើយ»។

Verse 24

यथा हि शिष्य: शास्तारं श्र॒त्यर्थमभिधावति । ततः श्रुतमुपादाय श्रुत्यर्थमुपतिछठति,जैसे शिष्य श्रुतिके अर्थको जाननेके लिये उपदेश करनेवाले गुरुके पास जाता है और उनसे श्रुतिके अर्थका ज्ञान प्राप्त करके फिर स्वयं उसका विचार और अनुसरण करता है, वैसे ही आप सोते और जागते समय हमारे ही दिखाये हुए भूत और भविष्य-विषयोंका उपभोग करते हैं

«ដូចសិស្សម្នាក់រត់ទៅរកគ្រូ ដើម្បីដឹងអត្ថន័យនៃព្រះវេដៈ ហើយក្រោយពីទទួលបានអ្វីដែលបានស្តាប់រួច ក៏ឈរលើអត្ថន័យនោះដោយការពិចារណា និងការអនុវត្ត; ដូច្នោះដែរ នៅពេលគេង និងពេលភ្ញាក់ អ្នកបានជួបប្រទះតែវត្ថុទាំងឡាយនៃអតីត និងអនាគត ដែលយើង (អង្គសមត្ថភាពខាងក្នុង) បង្ហាញឲ្យអ្នកប៉ុណ្ណោះ»។

Verse 25

विषयानेवमस्माभिर्दर्शितानभिमन्यसे । अनागतानतीतांक्ष स्वप्ने जागरणे तथा,जैसे शिष्य श्रुतिके अर्थको जाननेके लिये उपदेश करनेवाले गुरुके पास जाता है और उनसे श्रुतिके अर्थका ज्ञान प्राप्त करके फिर स्वयं उसका विचार और अनुसरण करता है, वैसे ही आप सोते और जागते समय हमारे ही दिखाये हुए भूत और भविष्य-विषयोंका उपभोग करते हैं

ចិត្តបាននិយាយថា៖ «ដូច្នេះ អ្នកយល់ថាវត្ថុបទពិសោធន៍ទាំងឡាយដែលយើងបង្ហាញឲ្យអ្នក គឺពិតប្រាកដ។ មិនថានៅក្នុងសុបិន ឬនៅពេលភ្ញាក់ឡើយ អ្នកឆ្លងកាត់ និង ‘រីករាយ’ នូវរឿងរ៉ាវនៃអនាគត និងអតីត តាមដែលយើងបង្ហាញ—ដូចសិស្សដែលទៅរកគ្រូ ដើម្បីរៀនអត្ថន័យនៃព្រះវេដៈ ទទួលបានការយល់ដឹងនោះ ហើយបន្ទាប់មកពិចារណា និងអនុវត្តដោយខ្លួនឯង»។

Verse 26

वैमनस्यं गतानां च जन्तूनामल्पचेतसाम्‌ | अस्मदर्थ कृते कार्य दृश्यते प्राणधारणम्‌,जो मनरहित हुए मन्दबुद्धि प्राणी हैं, उनमें भी हमारे लिये ही कार्य किये जानेपर प्राण- धारण देखा जाता है

សូម្បីតែសត្វមានចិត្តទាប ដែលធ្លាក់ចូលក្នុងភាពអស់សង្ឃឹម និងបាត់បង់សមតុល្យក្នុងចិត្ត ក៏នៅតែឃើញការខិតខំរក្សាជីវិត នៅពេលមានកិច្ចការណាមួយត្រូវធ្វើសម្រាប់យើង។ ចិត្តបង្ហាញសេចក្តីពិតលាក់លៀមមួយ៖ សត្វលោកអត់ធ្មត់ និងប្រឹងប្រែង មិនមែនសម្រាប់ខ្លួនឯងតែប៉ុណ្ណោះទេ ប៉ុន្តែជាញឹកញាប់ត្រូវបានទាញឲ្យរក្សាជីវិត និងកម្លាំង ដោយសារកាតព្វកិច្ច ការពឹងផ្អែក ឬតម្រូវការរបស់អ្នកដទៃ។

Verse 27

बहूनपि हि संकल्पान्‌ मत्वा स्वप्लानुपास्य च बुभुक्षया पीड्यमानो विषयानेव धावति,बहुत-से संकल्पोंका मनन और स्वप्लोंका आश्रय लेकर भोग भोगनेकी इच्छासे पीड़ित हुआ प्राणी विषयोंकी ओर ही दौड़ता है

ព្រោះមនុស្សម្នាក់—ក្រោយពេលគិតគូរចេតនាជាច្រើន និងពឹងផ្អែកលើសុបិន—ត្រូវបានទារុណដោយក្តីឃ្លានចង់រីករាយ ហើយរត់តែទៅរកវត្ថុអារម្មណ៍ប៉ុណ្ណោះ។ ចិត្តបង្ហាញថា ក្តីប្រាថ្នា ដែលត្រូវបានចិញ្ចឹមដោយផែនការស្រមៃ និងការប៉ាន់ប្រមាណដូចសុបិន នាំមនុស្សឲ្យឆ្ងាយពីភាពមាំមួន ទៅរកសេចក្តីរីករាយឆាប់រលាយ។

Verse 28

अगारमद्वारमिव प्रविश्य संकल्पभोगान्‌ विषये निबद्धान्‌ | प्राणक्षये शान्तिमुपैति नित्यं दारुक्षयेडग्निज्वलितो यथैव,विषय-वासनासे अनुविद्ध संकल्पजनित भोगोंका उपभोग करके प्राणशक्तिके क्षीण होनेपर मनुष्य बिना दरवाजेके घरमें घुसे हुए मनुष्यकी भाँति उसी तरह शान्त हो जाता है, जैसे समिधाओंके जल जानेपर प्रज्वलित अग्नि स्वयं ही बुझ जाती है

ចិត្តបាននិយាយថា៖ «ដូចមនុស្សម្នាក់លួចចូលផ្ទះដែលគ្មានទ្វារ មនុស្សក៏ចូលទៅក្នុងពិភពអារម្មណ៍ ហើយបន្តស៊ីសង្ស័យនូវសេចក្តីរីករាយ ដែលកើតពីសង្កల్ప និងចងភ្ជាប់នឹងវត្ថុរបស់វា។ ប៉ុន្តែពេលកម្លាំងជីវិតស្ដើងអស់ គាត់ចាំបាច់ទៅដល់ភាពស្ងប់—ដូចភ្លើងដែលឆេះរលោង ក៏រលត់ដោយខ្លួនឯង នៅពេលឈើឥន្ធនៈត្រូវបានឆេះអស់»។

Verse 29

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मण-गीताविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,काम तु नः स्वेषु गुणेषु सड़: काम च नान्योन्यगुणोपलब्धि: । अस्मान्‌ विना नास्ति तवोपलब्धि- स्तावदते त्वां न भजेत्‌ प्रहर्ष:. भले ही हमलोगोंकी अपने-अपने गुणोंके प्रति आसक्ति हो और भले ही हम परस्पर एक-दूसरेके गुणोंको न जान सकें; किंतु यह बात सत्य है कि आप हमारी सहायताके बिना किसी भी विषयका अनुभव नहीं कर सकते। आपके बिना तो हमें केवल हर्षसे ही वंचित होना पड़ता है

ព្រះព្រាហ្មណ៍បាននិយាយថា៖ «ទោះបីយើងទាំងឡាយភ្ជាប់ចិត្តនឹងគុណលក្ខណៈរបស់ខ្លួនៗ ហើយទោះបីយើងមិនអាចស្គាល់គុណលក្ខណៈរបស់គ្នាទៅវិញទៅមកបានពេញលេញក៏ដោយ; ក៏សេចក្តីនេះជាការពិតថា ដោយគ្មានយើង អ្នកមិនអាចដឹងឬទទួលបទពិសោធន៍វត្ថុណាមួយបានឡើយ។ ហើយដោយគ្មានអ្នក យើងត្រូវខ្វះតែ ‘សេចក្តីរីករាយ’ ប៉ុណ្ណោះ—សម្រាប់យើង មិនអាចមានភាពរីករាយបានទេ»។

Frequently Asked Questions

It addresses misattribution of agency and knowledge: whether mind can claim independent supremacy, or whether ethical self-governance requires acknowledging the bounded authority and necessary cooperation of each cognitive faculty.

Cognition is modular yet coordinated: each sense apprehends only its own object-field, mind mediates doubt and intention, intellect stabilizes decision, and practical clarity arises when no faculty overreaches its proper scope.

No explicit phalaśruti appears in this excerpt; the meta-function is pedagogical—clarifying the architecture of perception and inner governance to support disciplined conduct and sound judgment.