Adhyaya 87
Vana ParvaAdhyaya 8731 Verses

Adhyaya 87

Avanti–Narmadā–Puṣkara Tīrtha-Kathana (धौम्यकथितं तीर्थवर्णनम्)

Upa-parva: Tīrtha-yātrā / Tīrtha-kathana (Pilgrimage Topography within Āraṇyaka-parva)

Dhauṃya enumerates sacred sites in the western (pratīcī) direction, beginning with Avanti and the auspicious Narmadā, described with fertile groves and a reverse-flowing (pratyaksrotā) characterization. The discourse then marks a holy ‘Niketa’ associated with the sage Viśravas and the birth of Kubera, indexing mythic genealogy to place. It introduces Vaiḍūryaśikhara, a meritorious mountain with divine flora, and a lotus-filled lake frequented by devas and gandharvas, emphasizing the site’s wondrous, heaven-like qualities. Additional tīrthas include a river connected with Viśvāmitra and the narrative of Yayāti’s fall and recovery of worlds through adherence to enduring dharmas. The chapter lists further landmarks—Puṇya-hrada, Maināka, Asita, and renowned āśramas (Kakṣasena, Cyavana, Jambūmārga)—where tapas is said to succeed with comparatively little effort. It proceeds to Ketumālā, Medhyā, Gaṅgāraṇya, and Saindhavāraṇya, culminating in Puṣkara (Pitāmaha-saras), beloved of Vaikhānasa sages; a phalaśruti-style claim follows: even mental intention toward Puṣkara is portrayed as sin-diminishing and conducive to heavenly joy.

Chapter Arc: जनमेजय के समक्ष वैशम्पायन पाण्डवों की उस व्याकुलता का चित्र खींचते हैं—अर्जुन के वियोग से उनका मन दीन है, और वे उससे मिलने को आतुर हैं; इसी बेचैनी के बीच धौम्य उन्हें पूर्वदिशा के तीर्थों का मार्ग बताने लगते हैं। → धौम्य एक-एक कर पुण्याश्रमों, नदियों और सरोवरों का वर्णन करते हैं—गोमती जैसे देवर्षि-सेवित तीर्थ, देवताओं की यज्ञभूमियाँ, और ऐसे स्थल जहाँ तप, दान, व्रत तथा यज्ञ से पितृ-ऋण और कुल-उद्धार का विधान बताया गया है; तीर्थों की महिमा जितनी बढ़ती है, उतना ही पाण्डवों का ‘उद्धार’ और ‘आश्वासन’ पाने का आग्रह तीव्र होता जाता है। → तीर्थ-महात्म्य का शिखर उन वचनों में आता है जहाँ धौम्य ‘गया’ आदि स्थलों के फल का प्रतिपादन करते हैं—अश्वमेध/वृषोत्सर्ग जैसे कर्मों द्वारा ‘दश पूर्वान् दशावरान्’ तक संतति-उद्धार का कथन; साथ ही विश्वामित्र के कान्यकुब्ज प्रसंग जैसे आख्यान-बीज तीर्थों को केवल भूगोल नहीं, धर्म-इतिहास बना देते हैं। → वर्णन पूर्वदिशा के पवित्र स्थलों की एक सुसंगत माला बनकर स्थिर होता है—भागीरथी-सम्बद्ध सरोवर/‘ब्रह्मशाला’ जैसे स्थानों का स्मरण और देववन जैसे तपोवनों का संकेत पाण्डवों को यह बोध कराता है कि वनवास केवल दण्ड नहीं, शुद्धि और संबल का पथ है। → धौम्य की तीर्थ-सूची आगे भी विस्तृत होने का संकेत देती है—पाण्डव अभी मार्ग पर हैं, और अर्जुन-वियोग की पीड़ा के बीच अगला तीर्थ-क्रम तथा उससे जुड़ी कथाएँ शेष हैं।

Shlokas

Verse 1

#2:8 #:23:.0 () हि २ 7 सप्ताशीतितमो< ध्याय: धौम्यद्वारा पूर्वदिशाके तीर्थोंका वर्णन वैशम्पायन उवाच तान्‌ सर्वनित्सुकान्‌ दृष्टवा पाण्डवान्‌ दीनचेतस: । आश्चासयंस्तथा धौम्यो बृहस्पतिसमो<ब्रवीत्‌

Vaiśampāyana berkata: Melihat para Pāṇḍava senantiasa gelisah dan berhati muram, Dhaumya—tenang dan bijak laksana Bṛhaspati—menenangkan mereka lalu berkata demikian.

Verse 2

ब्राह्मणानुमतान्‌ पुण्यानाश्रमान्‌ भरतर्षभ । दिशस्तीर्थानि शैलांश्व शूणु मे वदतो5नघ

Wahai lembu di antara Bharata, wahai yang tanpa noda, dengarkanlah ketika aku menguraikan pertapaan-pertapaan suci yang disetujui para brāhmaṇa, beserta tīrtha di segala penjuru dan gunung-gunungnya.

Verse 3

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पाण्डवोंका चित्त अर्जुनके लिये अत्यन्त दीन हो रहा था। वे सब-के-सब उनसे मिलनेको उत्सुक थे। उनकी ऐसी अवस्था देखकर बृहस्पतिके समान तेजस्वी महर्षि धौम्यने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा--'पापरहित भरतकुलभूषण! ब्राह्मणलोग जिन्हें आदर देते हैं, उन पुण्य आश्रमों, दिशाओं, तीर्थों और पर्वतोंका मैं वर्णन करता हूँ, सुनो ।। याउछुत्वा गदतो राजन्‌ विशोको भवितासि ह | द्रौपद्या चानया सार्थ भ्रातृभिश्न नरेश्वर,“नरेश्वर! राजन! मेरे मुखसे उन सबका वर्णन सुनकर तुम द्रौपदी तथा भाइयोंके साथ शोकरहित हो जाओगे

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Janamejaya, hati para Pāṇḍava menjadi amat muram karena Arjuna; semuanya rindu berjumpa dengannya. Melihat keadaan itu, resi Dhaumya yang bercahaya laksana Bṛhaspati menenteramkan mereka dan berkata: ‘Wahai yang tanpa dosa, perhiasan wangsa Bharata! Akan kuuraikan bagimu pertapaan-pertapaan suci, arah-arah, tīrtha, dan gunung-gunung yang dihormati para brāhmaṇa. Dengarkanlah. Mendengar uraian ini, wahai raja, engkau akan bebas dari duka—bersama Draupadī dan saudara-saudaramu, wahai penguasa manusia.’”

Verse 4

श्रवणाच्चैव तेषां त्वं पुण्यमाप्स्यसि पाण्डव | गत्वा शतगुणं चैव तेभ्य एव नरोत्तम,“नरश्रेष्ठ पाण्डुनन्दन! उनका श्रवण करनेमात्रसे तुम्हें उनके सेवनका पुण्य प्राप्त होगा; और वहाँ जानेसे सौगुने पुण्यकी प्राप्ति होगी

Wahai Pāṇḍava, dengan sekadar mendengar tentang tempat-tempat itu pun engkau memperoleh pahala; namun, wahai insan utama, bila engkau pergi sendiri ke sana, pahala itu menjadi seratus kali lipat.

Verse 5

पूर्व प्राचीं दिशं राजन्‌ राजर्षिगणसेविताम्‌ । रम्यां ते कथयिष्यामि युधिषछ्िर यथास्मृति,“महाराज युधिष्ठिर! मैं अपनी स्मरणशक्तिके अनुसार सबसे पहले राजर्षिगणोंद्वारा सेवित रमणीय प्राची दिशाका वर्णन करूँगा

Wahai Maharaja Yudhiṣṭhira! Menurut ingatanku, mula-mula akan kuceritakan kepadamu arah timur yang elok, yang senantiasa didatangi dan dilayani para raja-ṛṣi.

Verse 6

तस्यां देवर्षिजुष्टायां नैमिषं नाम भारत | यत्र तीर्थानि देवानां पुण्यानि च पृथक्‌ पृथक्‌,“भरतनन्दन! देवर्षिसेवित प्राची दिशामें नैमिष नामक तीर्थ है, जहाँ भिन्न- भिन्न देवताओंके अलग-अलग पुण्यतीर्थ हैं

Wahai Bhārata! Di wilayah timur itu—yang kerap didatangi para dewa-ṛṣi—terdapat tīrtha bernama Naimiṣa, tempat para dewa memiliki penyeberangan suci mereka, masing-masing terpisah dan khusus.

Verse 7

यत्र सा गोमती पुण्या रम्या देवर्षिसेविता । यज्ञभूमिश्च देवानां शामित्रं च विवस्वत:,“जहाँ देवर्षिसेवित परम रमणीय पुण्यमयी गोमती नदी है। देवताओंकी यज्ञभूमि और सूर्यका यज्ञपात्र विद्यमान है

Di sana mengalir Sungai Gomati yang suci—indah dan disucikan oleh kunjungan para dewa-ṛṣi. Di sana pula terdapat tanah yajña milik para dewa, serta bejana persembahan yang dikaitkan dengan Vivasvat (Sang Surya).

Verse 8

तस्यां गिरिवर: पुण्यो गयो राजर्षिसत्कृत: । शिवं ब्रह्मसरो यत्र सेवितं त्रिदशर्षिभि:,'प्राची दिशामें ही पुण्य पर्वतश्रेष्ठ गय है जो राजर्षि गयके द्वारा सम्मानित हुआ है। वहाँ कल्याणमय ब्रह्मसरोवर है जिसका देवर्षिगण सेवन करते हैं

Di wilayah timur itu berdiri gunung suci yang utama bernama Gayā, dimuliakan oleh para raja-ṛṣi. Di sana pula ada Brahma-sarovara yang membawa keberkahan, tempat para ṛṣi para dewa (tridaśa-ṛṣi) bersemayam dan berbakti.

Verse 9

यदर्थे पुरुषव्याप्र कीर्तयन्ति पुरातना: । एष्टव्या बहव: पुत्रा यद्येको5पि गयां व्रजेत्‌,'पुरुषसिंह! उस गयाके विषयमें ही प्राचीनलोग यह कहा करते हैं कि “बहुत-से पुत्रोंकी इच्छा करनी चाहिये; सम्भव है उनमेंसे एक भी गया जाय या अश्वमेधयज्ञ करे अथवा नीलवृषका- उत्सर्ग करे। ऐसा पुरुष अपनी संततिद्वारा दस पहलेकी और दस बादकी पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है”

Wahai insan utama! Tentang tujuan yang membuat manusia bersungguh-sungguh dan yang dipuji oleh orang-orang dahulu, dikatakan: hendaklah seseorang menginginkan banyak putra—sebab bila satu saja di antara mereka pergi ke Gayā, itu sudah bernilai besar.

Verse 10

यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सूजेत्‌ । उत्तारयति संतत्या दशपूर्वान्‌ दशावरान्‌,'पुरुषसिंह! उस गयाके विषयमें ही प्राचीनलोग यह कहा करते हैं कि “बहुत-से पुत्रोंकी इच्छा करनी चाहिये; सम्भव है उनमेंसे एक भी गया जाय या अश्वमेधयज्ञ करे अथवा नीलवृषका- उत्सर्ग करे। ऐसा पुरुष अपनी संततिद्वारा दस पहलेकी और दस बादकी पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है”

Waiśampāyana berkata: “Hendaklah seseorang melaksanakan kurban Aśvamedha, atau melepaskan seekor banteng berwarna biru-gelap sebagai persembahan suci. Dengan jasa kebajikan yang mengalir melalui garis keturunannya, ia menyelamatkan sepuluh generasi sebelum dirinya dan sepuluh generasi sesudahnya.”

Verse 11

महानदी च तत्रैव तथा गयशिरो नृप । यत्रासौ कीर्त्यते विप्रैरक्षय्यकरणो वट:,'राजन्‌! वहीं महानदी और गयशीर्षतीर्थ है, जहाँ ब्राह्मणोंने अक्षयवटकी स्थिति बतायी है जिसके जड़ और शाखा आदि उपकरण कभी नष्ट नहीं होते

Waiśampāyana berkata: “Wahai raja, di sana pula mengalir sungai besar, dan di sana ada tirtha bernama Gayaśiras—tempat para brāhmaṇa menunjukkan Akṣayavaṭa, beringin ‘tak-binasa’ yang akar dan cabangnya termasyhur tak pernah lenyap.”

Verse 12

यत्र दत्त पितृभ्योऊन्नमक्षय्यं भवति प्रभो । सा च पुण्यजला तत्र फल्गुर्नाम महानदी,'प्रभो! वहाँ पितरोंके लिये दिया हुआ अन्न अक्षय होता है। भरतश्रेष्ठ! वहीं फल्गु नामवाली पुण्यसलिला महानदी है और वहीं बहुत-से फल-मूलोंवाली कौशिकी नदी प्रवाहित होती है जहाँ तपोधन विश्वामित्र ब्राह्मणत्वको प्राप्त हुए थे

Waiśampāyana berkata: “Wahai tuan, di tempat itu persembahan makanan bagi para Pitṛ menjadi tak habis-habis. Di sana pula mengalir sungai besar bernama Phalgu, berair suci.”

Verse 13

बहुमूलफला चापि कौशिकी भरतर्षभ । विश्वामित्रो5 ध्यगाद्‌ यत्र ब्राह्मणत्वं तपोधन:,'प्रभो! वहाँ पितरोंके लिये दिया हुआ अन्न अक्षय होता है। भरतश्रेष्ठ! वहीं फल्गु नामवाली पुण्यसलिला महानदी है और वहीं बहुत-से फल-मूलोंवाली कौशिकी नदी प्रवाहित होती है जहाँ तपोधन विश्वामित्र ब्राह्मणत्वको प्राप्त हुए थे

Waiśampāyana berkata: “Wahai yang terbaik di antara Bharata, sungai Kauśikī pun mengalir di sana, kaya akan umbi dan buah. Di tempat itulah sang pertapa-utama Viśvāmitra mencapai kedudukan sebagai brāhmaṇa.”

Verse 14

गड्जा यत्र नदी पुण्या यस्यास्तीरे भगीरथ: । अयजतू तत्र बहुभि: क्रतुभिर्भूरिदक्षिणै:,'पूर्वदिशामें ही पुण्यनदी गड़ा बहती है, जिसके तटपर राजा भगीरथने प्रचुर दक्षिणावाले बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान किया था

Waiśampāyana berkata: “Di wilayah timur mengalir sungai suci bernama Gaḍjā; di tepinya Raja Bhagīratha dahulu melaksanakan banyak upacara kurban, masing-masing disertai dāna (hadiah) yang melimpah.”

Verse 15

पज्चालेषु च कौरव्य कथयन्त्युत्पलावनम्‌ । विश्वामित्रोडयजद्‌ यत्र पुत्रेण सह कौशिक:,“कुरुनन्दन! पंचालदेशमें ऋषिलोग उत्पलावन बतलाते हैं, जहाँ कुशिकनन्दन विश्वामित्रने अपने पुत्रके साथ यज्ञ किया था

Waiśampāyana berkata: “Wahai keturunan Kuru, di negeri Pañcāla para resi menuturkan tentang sebuah rimba bernama Utpalāvana—di sanalah Kauśika Viśvāmitra dahulu melaksanakan yajña bersama putranya.”

Verse 16

यत्रानुवंशं भगवाञ्जामदग्न्यस्तथा जगौ । विश्वामित्रस्य तां दृष्टवा विभूतिमतिमानुषीम्‌,'उसी यज्ञमें विश्वामित्रका अलौकिक वैभव देखकर जमदग्निनन्दन परशुरामने उनके वंशके अनुरूप यशका वर्णन किया था

Di sana pula Jāmadagnya yang mulia (Paraśurāma) menuturkan silsilah itu sebagaimana mestinya; dan setelah menyaksikan kemegahan Viśvāmitra yang melampaui manusia dalam yajña tersebut, ia menguraikan kemasyhuran yang sepadan dengan leluhurnya.

Verse 17

कान्यकुब्जेडपिबत्‌ सोममिन्द्रेण सह कौशिक: । ततः क्षत्रादपाक्रामद्‌ ब्राह्मणो5स्मीति चाब्रवीत्‌,विश्वामित्रजीने कान्यकुब्जदेशमें इन्द्रके साथ सोमपान किया; वहीं वे क्षत्रियत्वसे ऊपर उठ गये और “मैं ब्राह्मण हूँ” यह बात घोषित कर दी

Di Kānyakubja, Kauśika meminum Soma bersama Indra. Sesudah itu ia melampaui kedudukan kṣatriya dan menyatakan terang-terangan, “Aku adalah brāhmaṇa.”

Verse 18

पवित्रमृषिभिर्जुष्ट पुण्यं पावनमुत्तमम्‌ । गड़्ायमुनयोववीर संगमं लोकविश्रुतम्‌,“वीरवर! गंगा और यमुनाका परम उत्तम पुण्यमय पवित्र संगम सम्पूर्ण जगत्‌में विख्यात है और बड़े-बड़े महर्षि उसका सेवन करते हैं

Wahai pahlawan terbaik, pertemuan suci Gaṅgā dan Yamunā adalah tempat yang paling menyucikan dan penuh jasa kebajikan; termasyhur di seluruh dunia, dan para maharsi pun bernaung di sana.

Verse 19

यत्रायजत भूतात्मा पूर्वमेव पितामह: । प्रयागमिति विख्यातं तस्माद्‌ भरतसत्तम

Wahai yang terbaik di antara Bharata, karena dahulu kala Pitāmaha—yang jiwanya meresap ke segala makhluk—pernah melaksanakan yajña di sana, maka tempat itu termasyhur dengan nama Prayāga.

Verse 20

“जहाँ समस्त प्राणियोंके आत्मा भगवान्‌ ब्रह्माजीने पहले ही यज्ञ किया था। भरतकुलभूषण! ब्रह्माजीके उस प्रकृष्टयागसे ही उस स्थानका नाम “प्रयाग” हो गया ।। अगस्त्यस्य तु राजेन्द्र तत्राश्रमवरो नृप । तत्‌ तथा तापसारण्यं तापसैरुपशोभितम्‌,'राजेन्द्र! वहाँ महर्षि अगस्त्यका श्रेष्ठ आश्रम है। इसी प्रकार तापसारण्य तपस्वीजनोंसे सुशोभित है

Vaiśampāyana berkata: “Di tempat itu, Brahmā yang mulia—Ātman batin bagi semua makhluk—telah melaksanakan yajña pada masa lampau. Wahai perhiasan wangsa Bharata! Dari upacara yajña Brahmā yang unggul itulah tempat itu dikenal sebagai ‘Prayāga’. Dan di sana pula, wahai raja, terdapat āśrama utama Mahārṣi Agastya; demikian pula rimba para pertapa itu dihiasi oleh para tapasvin.”

Verse 21

हिरण्यबिन्दु: कथितो गिरी कालज्जरे महान्‌ | आगरए््त्यपर्वतो रम्य: पुण्यो गिरिवर: शिव:,“कालग्जर पर्वतपर हिरण्यबिन्दु नामसे प्रसिद्ध महान्‌ तीर्थ बताया गया है। आगर््त्यपर्वत बहुत ही रमणीय, पवित्र, श्रेष्ठ एवं कल्याणस्वरूप है

Vaiśampāyana berkata: Gunung besar bernama Kālañjara disebut pula sebagai tīrtha ‘Hiraṇyabindu’. Di sana juga ada Gunung Agastya yang elok—suci, utama di antara gunung-gunung, dan membawa śiva (kesejahteraan); termasyhur sebagai tīrtha yang menganugerahkan kebaikan.

Verse 22

महेन्द्रो नाम कौरव्य भार्गवस्य महात्मन: । अयजत्‌ तत्र कौन्तेय पूर्वमेव पितामह:,“कुरुनन्दन! महात्मा भार्गवका निवासस्थान महेन्द्र-पर्वत है। कुन्तीनन्दन! वहाँ ब्रह्माजीने पूर्वकालमें यज्ञ किया था

Vaiśampāyana berkata: “Wahai keturunan Kuru, gunung bernama Mahendra adalah tempat tinggal sang mulia Bhārgava. Wahai putra Kuntī, di sanalah dahulu Pitāmaha (Brahmā) melaksanakan yajña.”

Verse 23

यत्र भागीरथी पुण्या सरस्यासीद्‌ युधिष्ठिर । यत्र सा ब्रह्मशालेति पुण्या ख्याता विशाम्पते

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, di tempat di mana Bhāgīrathī yang suci hadir dalam sebuah telaga, di sanalah tempat itu dikenal di kalangan manusia sebagai ‘Brahmaśālā’ yang penuh jasa kebajikan.”

Verse 24

धूतपाप्मभिराकीर्णा पुण्यं तस्याश्न दर्शनम्‌ 'युधिष्ठिर! जहाँ पुण्यसलिला भागीरथी गंगा सरोवरमें स्थित थी। महाराज! जहाँपर उन्हें 'ब्रह्मशाला” यह पवित्र नाम दिया गया है। वह पुण्यतीर्थ निष्पाप मनुष्योंसे व्याप्त है; उसका दर्शन पुण्यमय बताया गया है ।। पवित्रो मड्नलीयश्व ख्यातो लोके महात्मन:

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, tīrtha itu dipenuhi oleh orang-orang yang dosanya telah tersapu; bahkan sekadar memandangnya dinyatakan membawa kebajikan. Wahai raja, di tempat Bhāgīrathī Gaṅgā—yang suci airnya—berdiam dalam sebuah telaga, di sanalah ia dikenal dengan nama murni ‘Brahmaśālā’. Tīrtha itu didatangi oleh insan tanpa noda; wahai yang berhati luhur, ia termasyhur di dunia sebagai tempat yang menyucikan sekaligus membawa keberuntungan.”

Verse 25

केदारक्ष मतड्स्य महानाश्रम उत्तम: । कुण्डोद: पर्वतो रम्यो बहुमूलफलोदक:

Vaiśampāyana berkata: “Di sana terdapat pertapaan agung Kedārakṣa (Kedāra) yang amat utama. Ada pula gunung elok bernama Kuṇḍoda, kaya akan aneka umbi dan buah, serta berlimpah air.”

Verse 26

नैषधस्तृषितो यत्र जलं शर्म च लब्धवान्‌ । “वहीं महात्मा मतंगऋषिका महान्‌ एवं उत्तम आश्रम केदारतीर्थ है। वह परम पवित्र, मंगलकारी और लोकमें विख्यात है। कुण्डोद नामक रमणीय पर्वत बहुत फल-मूल और जलसे सम्पन्न है, जहाँ प्यासे हुए निषधनरेशको जल और शान्तिकी उपलब्धि हुई थी ।। यत्र देववनं पुण्यं तापसैरुपशोभितम्‌

Vaiśampāyana berkata: Di tempat itu, raja Niṣadha yang tersiksa oleh dahaga memperoleh air, dan bersamaan dengan itu ia meraih ketenteraman serta kelegaan. Di sana pula ada hutan-dewa yang suci, diperindah oleh para pertapa—sebuah wilayah tīrtha yang amat murni, membawa berkah, dan termasyhur; kehadiran tapa dan kesucian di sana menenangkan mereka yang dilanda derita.

Verse 27

तीर्थानि सरित: शैला: पुण्यान्यायतनानि च,“महाराज! पूर्वदिशामें जो बहुत-से तीर्थ, नदियाँ, पर्वत और पुण्य मन्दिर आदि हैं, उनका मैंने तुमसे (संक्षेपमें) वर्णन किया है। अब शेष तीन दिशाओंके सरिताओं, पर्वतों और पुण्यस्थानोंका वर्णन करता हूँ, सुनो"

Vaiśampāyana berkata: “Wahai raja agung, telah kusingkatkan bagimu banyak tīrtha, sungai, gunung, dan tempat suci yang berada di arah timur. Kini dengarkan ketika kuuraikan sungai, gunung, dan kawasan-kawasan suci yang tersisa di tiga arah lainnya.”

Verse 28

प्राच्यां देशि महाराज कीर्तितानि मया तव । तिसृष्वन्यानि पुण्यानि दिक्षु तीर्थानि मे शृणु । सरितः: पर्वतांश्चैव पुण्यान्यायतनानि च,“महाराज! पूर्वदिशामें जो बहुत-से तीर्थ, नदियाँ, पर्वत और पुण्य मन्दिर आदि हैं, उनका मैंने तुमसे (संक्षेपमें) वर्णन किया है। अब शेष तीन दिशाओंके सरिताओं, पर्वतों और पुण्यस्थानोंका वर्णन करता हूँ, सुनो"

Vaiśampāyana berkata: “Wahai raja agung, tīrtha-tīrtha di arah timur telah kuceritakan kepadamu. Kini dengarkan tīrtha-tīrtha yang berpahala di tiga arah yang tersisa—beserta sungai, gunung, dan tempat-tempat sucinya.”

Verse 86

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें धौम्यकी तीर्थयात्राविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikianlah berakhir bab ke-86 dalam bagian Tīrthayātrā pada Vana Parva dari Śrī Mahābhārata, yang mengisahkan ziarah suci (tīrtha-yātrā) Dhaumya.

Verse 87

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रायां सप्ताशीतितमो<ध्याय:

Demikianlah, dalam Mahābhārata yang mulia, pada Vana Parva—khususnya bagian Tīrthayātrā Parva (ziarah ke tirtha suci), dalam kisah ziarah Dhaumya—berakhirlah bab ke-87.

Verse 263

बाहुदा च नदी यत्र नन्दा च गिरिमूर्थनि । “वहीं तपस्वीजनोंसे सुशोभित पवित्र देववन नामक पुण्यक्षेत्र है, जहाँ पर्वतके शिखरपर बाहुदा और नन्दा नदी बहती हैं

Vaiśampāyana berkata: “Ada sebuah wilayah suci bernama Devavana, bercahaya oleh para pertapa. Di sana, di puncak gunung, mengalirlah sungai Bāhudā dan Nandā—menandai tempat itu sebagai tirtha yang murni dan penuh jasa kebajikan.”

Frequently Asked Questions

Rather than a conflict between agents, the chapter frames an instructional choice: cultivating dharma through pilgrimage, reverence for sacred sites, and disciplined attention to exempla attached to geography.

Moral and spiritual formation is presented as achievable through tīrtha-oriented practice—listening, remembering, and visiting places associated with ṛṣis and dharmic precedents—where tapas and purification are emphasized.

Yes. The Puṣkara passage asserts that even mental orientation or intention toward Puṣkara can diminish pāpa (demerit) and is associated with enjoyment in a heavenly state, functioning as a motivational meta-commentary.