
अक्षद्यूतप्रवेशः — Kali’s Entry and the Initiation of the Dice-Contest
Upa-parva: Nala–Damayantī Upākhyāna (Episode of Nala and Damayantī)
Bṛhadaśva narrates how Kali, having made a pact with Dvāpara, seeks an opening to enter King Nala of Niṣadha. After years of watchfulness, Kali finds a minor lapse in ritual cleanliness: Nala performs ablutions and sits for twilight observance but neglects cleansing of the feet, enabling Kali to ‘enter’ him. Kali then approaches Puṣkara and repeatedly urges him to challenge Nala to dice, promising assistance for victory. Puṣkara confronts Nala and insists on gambling; Nala, unable to tolerate the summons—especially under Damayantī’s gaze—consents and treats it as a formal wager. Under Kali’s influence, Nala is defeated in stakes of gold, wealth, vehicles, and garments; his companions cannot restrain him despite recognizing the intoxication of play. Ministers and citizens gather at the door seeking to intervene; a charioteer informs Damayantī, who tearfully urges Nala to meet them, but the king remains unresponsive. The assembly withdraws in distress and shame, while the prolonged dice-contest continues for many months, during which Nala repeatedly loses.
Chapter Arc: देवताओं के दूत-रूप में पहुँचा नल दमयन्ती के अंतःपुर में संवाद आरम्भ करता है—एक ओर स्वयंबर की घड़ी निकट, दूसरी ओर लोकपालों की अदृश्य उपस्थिति का भय। → नल, देवताओं की ओर से, दमयन्ती को लोकपालों का वरण करने का संकेत देता है; दमयन्ती अपने सर्वस्व-समर्पण और हंसों के वचनों से जगी प्रेमाग्नि का उल्लेख कर नल के प्रति अपनी अडिग निष्ठा प्रकट करती है। → दमयन्ती अश्रुपूरित नेत्रों और काँपती वाणी से निर्णायक प्रतिज्ञा करती है कि वह लोकपालों के सामने ही नल का वरण करेगी—ताकि देवताओं का अपमान भी न हो और उसका धर्म-संकल्प भी न टूटे। → नल दमयन्ती के निश्चय और उसके धर्मयुक्त उपाय को सुनकर संदेश को यथावत देवताओं तक पहुँचाने का वचन देता है; फिर लौटकर त्रिदशों के समक्ष दमयन्ती का वृत्तान्त निवेदित करता है। → स्वयंबर में जब लोकपाल भी उपस्थित होंगे और नल भी—दमयन्ती नल को कैसे पहचानकर वरण करेगी?
Verse 1
/ छः “+(9) #ल्दिम #औ2४22 षट्पज्चाशत्तमो< ध्याय: नलका दमयन्तीसे वार्तालाप करना और लौटकर देवताओंको उसका संदेश सुनाना बृहदश्व उवाच सा नमस्कृत्य देवेभ्य: प्रहस्य नलमब्रवीत् । प्रणयस्व यथाश्रद्धं राजन् कि करवाणि ते,बृहदश्व मुनि कहते हैं--राजन्! दमयन्तीने अपनी श्रद्धाके अनुसार देवताओंको नमस्कार करके नलसे हँसकर कहा--“महाराज! आप ही मेरा पाणिग्रहण कीजिये और बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ
Bṛhadaśva berkata: Setelah bersujud kepada para dewa, Damayantī tersenyum dan berkata kepada Nala, “Wahai raja, terimalah aku sebagai istri sesuai keyakinanmu; katakan, apa yang harus kulakukan untukmu?”
Verse 2
अहं चैव हि यच्चान्यन्ममास्ति वसु किंचन । तत् सर्व तव विश्रब्धं कुरु प्रणयमी श्वर,“नरेश्वर! मैं तथा मेरा जो कुछ दूसरा धन है, वह सब आपका है। आप पूर्ण विश्वस्त होकर मेरे साथ विवाह कीजिये
“Wahai raja manusia, diriku sendiri—dan segala harta yang kumiliki—sepenuhnya milikmu. Tenanglah dan percayalah; terimalah ikatan kasih dan persekutuan denganku, wahai tuan.”
Verse 3
हंसानां वचन यत् तु तन्मां दहति पार्थिव । त्वत्कृते हि मया वीर राजान: संनिपातिता:,'भूपाल! हंसोंकी जो बात मैंने सुनी" वह (मेरे हृदयमें कामाग्नि प्रजजलित करके सदा) मुझे दग्ध करती रहती है। वीर! आपहीको पानेके लिये मैंने यहाँ समस्त राजाओंका सम्मेलन कराया है
“Wahai raja, kata-kata para angsa yang pernah kudengar itu masih membakar batinku. Wahai pahlawan, demi dirimu semata aku telah menghimpunkan para raja di sini.”
Verse 4
यदि त्वं भजमानां मां प्रत्याख्यास्यसि मानद । विषमग्निं जल॑ं रज्जुमास्थास्ये तव कारणात्,“मानद! आपके चरणोंमें भक्ति रखनेवाली मुझ दासीको यदि आप स्वीकार नहीं करेंगे तो मैं आपके ही कारण विष, अग्नि, जल अथवा फाँसीको निमित्त बनाकर अपना प्राण त्याग दूँगी'
Wahai yang mulia, jika engkau menolak aku yang berbakti kepadamu, maka karena engkau aku akan menempuh racun, api, air, atau jerat tali, dan mengakhiri hidupku.
Verse 5
एवमुक्तस्तु वैदर्भ्या नलस्तां प्रत्युवाच ह | तिष्ठत्सु लोकपालेषु कथं मानुषमिच्छसि,दमयन्तीके ऐसा कहनेपर राजा नलने उससे पूछा--'(तुम्हें पानेके लिये उत्सुक) लोकपालोंके होते हुए तुम एक साधारण मनुष्यको कैसे पति बनाना चाहती हो?
Ketika putri Vidarbha (Damayantī) berkata demikian, Nala menjawabnya: “Damayantī, ketika para penjaga dunia sendiri berdiri siap, bagaimana mungkin engkau menginginkan seorang manusia biasa sebagai suami?”
Verse 6
येषामहं लोककृतामीश्व॒राणां महात्मनाम् | न पादरजसा तुल्यो मनस्ते तेषु वर्तताम्,“जिन लोकस्रष्टा महामना ईश्वरोंके चरणोंकी धूलके समान भी मैं नहीं हूँ, उन्हींकी ओर तुम्हें मन लगाना चाहिये
Di hadapan para Tuhan agung, pencipta dan penopang dunia, aku bahkan tak sebanding dengan debu di kaki mereka; maka biarlah hatimu tertuju kepada mereka.
Verse 7
विप्रियं ह्याचरन् मर्त्यों देवानां मृत्युमृच्छति । त्राहि मामनवद्याड्ि वरयस्व सुरोत्तमान्
Seorang manusia fana yang bertindak tidak menyenangkan para dewa akan menemui maut. Wahai wanita tanpa cela, selamatkanlah aku; pilihlah yang terbaik di antara para dewa.
Verse 8
“निर्दोष अंगोंवाली सुन्दरी! देवताओंके विरुद्ध चेष्टा करनेवाला मानव मृत्युको प्राप्त हो जाता है; अतः तुम मुझे बचाओ और उन श्रेष्ठ देवताओंका ही वरण करो ।। विरजांसि च वासांसि दिव्य॒ज्षित्रा: स्रजस्तथा । भूषणानि तु मुख्यानि देवान् प्राप्य तु भुड़क्ष्य वै,“तथा देवताओंको ही पाकर निर्मल वस्त्र, दिव्य एवं विचित्र पुष्पहार तथा मुख्य-मुख्य आभूषणोंका सुख भोगो
Setelah memperoleh para dewa, engkau sungguh akan menikmati pakaian yang bersih tanpa noda, rangkaian bunga yang ilahi dan menakjubkan, serta perhiasan yang paling utama.
Verse 9
य इमां पृथिवीं कृत्स्नां संक्षिप्य ग्रसते पुन: । हुताशमीशं देवानां का त॑ं न वरयेत् पतिम्,“जो इस सारी पृथ्वीको संक्षिप्त करके पुनः अपना ग्रास बना लेते हैं, उन देवेश्वर अग्निको कौन नारी अपना पति न चुनेगी?
Dia yang mampu merangkum seluruh bumi ini, memampatkannya lalu menelannya kembali—siapakah perempuan yang tidak akan memilih Hutaśana Agni, penguasa para dewa, sebagai suami?
Verse 10
यस्य दण्डभयात् सर्वे भूतग्रामा: समागता: । धर्ममेवानुरुध्यन्ति का त॑ं न वरयेत् पतिम्,“जिनके दण्डके भयसे संसारमें आये हुए समस्त प्राणिसमुदाय धर्मका ही पालन करते हैं, उन यमराजको कौन अपना पति नहीं वरेगी?
Karena takut pada tongkat hukumannya, semua golongan makhluk yang hadir di dunia ini menapaki dharma semata. Siapakah perempuan yang tidak akan memilih Yama sebagai suami?
Verse 11
धर्मात्मानं महात्मानं दैत्यदानवमर्दनम् | महेन्द्र सर्वदेवानां का त॑ न वरयेत् पतिम्,'दैत्यों और दानवोंका मर्दन करनेवाले धर्मात्मा महामना सर्वदेवेश्वर महेन्द्रका कौन नारी पतिरूपमें वरण न करेगी?
Siapakah perempuan yang tidak akan memilih Mahendra sebagai suami—yang berhati dharma, berhati agung, penghancur Daitya dan Dānava, serta penguasa seluruh para dewa?
Verse 12
क्रियतामविशड्केन मनसा यदि मन्यसे । वरुणं लोकपालानां सुहृद्वाक्यमिदं शृूणु,“यदि तुम ठीक समझती हो तो लोकपालोंमें प्रसिद्ध वरुणको नि:शंक होकर अपना पति बनाओ। यह एक हितैषी सुहृदका वचन है, इसे सुनो”
Jika engkau menganggapnya patut, maka dengan hati tanpa keraguan terimalah Varuṇa—termashyur di antara para penjaga dunia—sebagai suamimu. Inilah nasihat seorang sahabat yang menghendaki kebaikan; dengarkanlah.
Verse 13
नैषधेनैवमुक्ता सा दमयन्ती वचो<ब्रवीत् । समाप्लुताभ्यां नेत्राभ्यां शोकजेनाथ वारिणा,तदनन्तर निषधराज नलके ऐसा कहनेपर दमयन्ती शोकाश्रुओंसे भरे हुए नेत्रोंद्वारा देखती हुई इस प्रकार बोली--
Setelah raja Niṣadha berkata demikian, Damayantī pun menjawab. Dengan mata yang tergenang air mata karena duka, ia memandang dan berkata demikian.
Verse 14
देवेभ्यो5हें नमस्कृत्य सर्वेभ्य: पृथिवीपते । वृणे त्वामेव भर्तारें सत्यमेतद् ब्रवीमि ते,'पृथ्वीपते! मैं सम्पूर्ण देवताओंको नमस्कार करके आपहीको अपना पति चुनती हूँ। यह मैंने आपसे सच्ची बात कही है”
Wahai penguasa bumi! Setelah bersujud hormat kepada semua dewa, aku memilih engkau saja sebagai suamiku. Inilah kebenaran—dengan tulus kukatakan kepadamu.
Verse 15
तामुवाच ततो राजा वेपमानां कृताञ्जलिम् | दौत्येनागत्य कल्याणि तथा भद्रे विधीयताम्,ऐसा कहकर दमयन्ती दोनों हाथ जोड़े थर-थर काँपने लगी। उस अवस्थामें राजा नलने उससे कहा--“कल्याणि! मैं इस समय दूतका कार्य करनेके लिये आया हूँ; अतः भद्रे! इस समय वही करो जो मेरे स्वरूपके अनुरूप हो
Lalu sang raja berkata kepadanya, ketika ia berdiri gemetar dengan kedua tangan terkatup: “Wahai wanita mulia, aku datang dalam tugas sebagai utusan; maka, wahai lembut hati, biarlah yang dilakukan sekarang sesuai dengan kedudukanku.”
Verse 16
कथं हाहं प्रतिश्रुत्य देवतानां विशेषतः । परार्थे यत्नमारभ्य कथं स्वार्थमिहोत्सहे,“मैं देवताओंके सामने प्रतिज्ञा करके विशेषत: परोपकारके लिये प्रयत्न आरम्भ करके अब यहाँ स्वार्थ-साधनके लिये कैसे उत्साहित हो सकता हूँ?
Bagaimana mungkin aku—setelah berikrar di hadapan para dewa, dan memulai upaya terutama demi kepentingan orang lain—kini di sini terdorong mengejar kepentinganku sendiri?
Verse 17
एष धर्मो यदि स्वार्थो ममापि भविता ततः । एवं स्वार्थ करिष्यामि तथा भद्रे विधीयताम्,“यदि यह धर्म सुरक्षित रहे तो उससे मेरे स्वार्थकी भी सिद्धि हो सकती है। भद्रे! तुम ऐसा प्रयत्न करो, जिससे मैं इस प्रकार धर्मयुक्त स्वार्थकी सिद्धि करूँ:
Jika jalan ini sungguh dharma, dan darinya kepentinganku yang sah pun dapat terpenuhi, maka aku akan mengejar tujuanku dengan cara itulah. Karena itu, wahai lembut hati, aturlah sebagaimana mestinya.
Verse 18
ततो बाष्पाकुलां वाचं दमयन्ती शुचिस्मिता । प्रत्याहरन्ती शनकैर्नलं राजानमब्रवीत्,यह सुनकर पवित्र मुसकानवाली दमयन्ती राजा नलसे धीरे-धीरे अश्लुगद्गदवाणीमें बोली--“नरेश्वर! मैंने उस निर्दोष उपायको दूँढ़ निकाला है, राजन! जिससे आपको किसी प्रकार दोष नहीं लगेगा
Mendengar itu, Damayantī yang tersenyum bening, menahan suara yang sarat air mata, lalu perlahan berkata kepada Raja Nala: “Wahai penguasa manusia, wahai Raja, aku telah menemukan cara yang tak bercela, sehingga tiada noda akan melekat padamu.”
Verse 19
उपायो<यं मया दृष्टो निरपायो नरेश्वर । येन दोषो न भविता तव राजन् कथंचन,यह सुनकर पवित्र मुसकानवाली दमयन्ती राजा नलसे धीरे-धीरे अश्लुगद्गदवाणीमें बोली--“नरेश्वर! मैंने उस निर्दोष उपायको दूँढ़ निकाला है, राजन! जिससे आपको किसी प्रकार दोष नहीं लगेगा
Bṛhadaśva berkata: “Wahai penguasa manusia, telah kutemukan suatu cara yang bebas dari bahaya; wahai raja, dengan itu takkan melekat padamu cela atau kesalahan moral sedikit pun.”
Verse 20
त्वं चैव हि नरश्रेष्ठ देवाश्रैन्द्रपुरोगमा: । आयान्तु सहिता: सर्वे मम यत्र स्वयंवर:,“नरश्रेष्ठी] आप और इन्द्र आदि सब देवता एक ही साथ उस रंगमण्डपमें पधारें, जहाँ मेरा स्वयंवर होनेवाला है
Wahai yang terbaik di antara manusia, engkau pun—bersama semua dewa yang dipimpin Indra—datanglah serentak ke tempat svayaṃvara-ku akan diselenggarakan.
Verse 21
ततो<5हं लोकपालानां संनिधौ त्वां नरेश्वर । वरयिष्ये नरव्यात्र नैवं दोषो भविष्यति,“नरेश्वर! नरव्याप्र! तदनन्तर मैं उन लोकपालोंके समीप ही आपका वरण कर लूँगी। ऐसा करनेसे (आपको कोई) दोष नहीं लगेगा”
Kemudian aku akan memilihmu, wahai penguasa manusia, di hadapan para Lokapāla; wahai harimau di antara manusia, dengan demikian takkan ada cela yang melekat.
Verse 22
एवमुक्तस्तु वैदर्भ्या नलो राजा विशाम्पते । आजमगाम पुनस्तत्र यत्र देवा: समागता:,युधिष्ठिर! विदर्भराजकुमारीके ऐसा कहनेपर राजा नल पुनः वहीं लौट आये, जहाँ देवताओंसे उनकी भेंट हुई थी
Setelah demikian diucapkan oleh putri Vidarbha, Raja Nala—wahai pemimpin rakyat—kembali ke tempat para dewa telah berkumpul.
Verse 23
तमपश्यंस्तथा5<5यान्तं लोकपाला महेश्वरा: । दृष्टवा चैनं ततो<पृच्छन् वृत्तान्तं सर्वमेव तम्,महान् शक्तिशाली लोकपालोंने इस प्रकार राजा नलको लौटते देखा और उन्हें देखकर उनसे सारा वृत्तान्त पूछा--
Melihat Nala kembali demikian, para Lokapāla yang mahaperkasa memperhatikannya; setelah memandangnya, mereka menanyainya tentang seluruh kejadian secara lengkap.
Verse 24
कच्चिद् दृष्टा त्वया राजन् दमयन्ती शुचिस्मिता । किमब्रवीच्च न: सर्वान् वद भूमिप तेडनघ,“राजन! क्या तुमने पवित्र मुसकानवाली दमयन्तीको देखा है? पापरहित भूपाल! हम सब लोगोंको उसने क्या संदेश दिया, बताओ”
Bṛhadaśva berkata: “Wahai Raja, apakah engkau telah melihat Damayantī, yang senyumnya suci dan lembut? Wahai penguasa bumi yang tak bercela, apa yang ia katakan kepada kami semua? Katakanlah.”
Verse 25
नल उवाच भवद्धिरहमादिष्टो दमयन्त्या निवेशनम् | प्रविष्ट: सुमहाकक्ष॑ दण्डिभि: स्थविरैर्वृतम्,नलने कहा--देवताओ! आपकी आज्ञा पाकर मैं दमयन्तीके महलमें गया। उसकी ड्योढ़ी विशाल थी और दण्डधारी बूढ़े रक्षक उसे घेरकर पहरा दे रहे थे
Nala berkata: “Wahai para dewa, atas perintah kalian aku pergi ke kediaman Damayantī. Saat masuk, kulihat pelataran depan yang amat luas, dikepung para penjaga tua yang memegang tongkat dan berjaga.”
Verse 26
प्रविशन्तं च मां तत्र न कश्निद् दृष्टवान् नर: । ऋते तां पार्थिवसुतां भवतामेव तेजसा,आपलोगोंके प्रभावसे उसमें प्रवेश करते समय मुझे वहाँ उस राजकन्या दमयन्तीके सिवा दूसरे किसी मनुष्यने नहीं देखा
Nala berkata: “Ketika aku masuk ke sana, tak seorang pun manusia melihatku—kecuali sang putri raja, Damayantī. Semua itu terjadi semata karena daya dan sinar kemuliaan kalian, para dewa.”
Verse 27
सख्यश्चास्या मया दृष्टास्ताभिश्नाप्युपलक्षित: । विस्मिताश्चा भवन् सर्वा दृष्टवा मां विबुधेश्वरा:,दमयन्तीकी सखियोंको भी मैंने देखा और उन सखियोंने भी मुझे देखा। देवेश्वरो! वे सब मुझे देखकर आश्वर्यचकित हो गयीं
Nala berkata: “Aku juga melihat para sahabatnya, dan mereka pun mengenaliku. Wahai penguasa para dewa, ketika melihatku, mereka semua terperangah oleh keheranan.”
Verse 28
वर्ण्यमानेषु च मया भवत्सु रुचिरानना | मामेव गतसंकल्पा वृणीते सा सुरोत्तमा:,श्रेष्ठ देवताओ! जब मैं आपलोगोंके प्रभावका वर्णन करने लगा, उस समय सुमुखी दमयन्तीने मुझमें ही अपना मानसिक संकल्प रखकर मेरा ही वरण किया
Nala berkata: “Wahai para dewa yang utama, ketika aku menguraikan keunggulan kalian, Damayantī yang berwajah elok meneguhkan tekad dalam hatinya dan memilih aku seorang.”
Verse 29
अब्रवीच्चैव मां बाला आयान्तु सहिता: सुरा: । त्वया सह नरव्याप्र मम यत्र स्वयंवर:,उस बालाने मुझसे यह भी कहा कि “नरव्याप्र! सब देवता आपके साथ उस स्थानपर पधारें, जहाँ मेरा स्वयंवर होनेवाला है
Gadis itu juga berkata kepadaku, “Wahai harimau di antara manusia, biarlah para dewa datang bersama-sama denganmu ke tempat di mana svayaṃvara-ku akan diselenggarakan.”
Verse 30
तेषामहं संनिधौ त्वां वरयिष्यामि नैषध । एवं तव महाबाहो दोषो न भवितेति ह,“निषधराज! मैं उन देवताओंके समीप ही आपका वरण कर लूँगी। महाबाहो! ऐसा होनेपर आपको दोष नहीं लगेगा”
“Wahai raja Niṣadha, di hadapan para dewa itu jugalah aku akan memilihmu. Maka, wahai yang berlengan perkasa, tiada cela akan melekat padamu.”
Verse 31
एतावदेव विबुधा यथावृत्तमुपाह्तम् मयाइशेषे प्रमाणं तु भवन्तस्त्रिदशेश्वरा:,देवताओ! दमयन्तीके महलका इतना ही वृत्तान्त है, जिसे मैंने ठीक-ठीक निवेदन कर दिया। देवेश्वरगण! अब इस सम्पूर्ण विषयमें आप सब देवतालोग ही प्रमाण हैं, अर्थात् आप ही साक्षी हैं
Wahai para dewa yang bijaksana, inilah saja riwayat istana Damayantī sebagaimana terjadinya, yang telah kulaporkan sepenuhnya. Wahai para penguasa tiga puluh tiga, dalam perkara ini kalianlah ukuran yang menentukan—kalianlah para saksi.
Verse 55
इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलके देवदूत बनकर दमयन्तीके पास जानेसे सम्बन्ध रखनेवाला पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikian berakhir bab kelima puluh lima dalam episode Nala pada Vana Parva dari Śrī Mahābhārata, yang mengisahkan Nala pergi kepada Damayantī dengan mengambil peran sebagai utusan para dewa.
Verse 56
इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलकर्त्कदेवदौत्ये षट्पञज्चाशत्तमो<ध्याय:
Demikianlah bab kelima puluh enam dalam Vana Parva dari Śrī Mahābhārata, pada bagian Nalopākhyāna, mengenai tugas kedutaan ilahi yang dijalankan oleh Nala.
The dilemma is the conflict between royal composure and compulsive response to provocation: Nala treats the challenge as a legitimate wager while his judgment is compromised, raising the question of when a ruler must refuse socially framed ‘honor’ demands that endanger the polity.
The chapter teaches that small failures in discipline and attentiveness can become gateways for larger ethical collapse; kingship is presented as continuous self-regulation, where ritual care, restraint, and responsiveness to counsel protect both personal integrity and public welfare.
No explicit phalaśruti is stated in these verses; the meta-function is exemplum-based instruction—Bṛhadaśva’s narration implicitly frames the episode as a cautionary model for understanding suffering, vulnerability to vice, and the governance costs of impaired agency.