Adhyaya 211
Vana ParvaAdhyaya 21124 Verses

Adhyaya 211

अग्निनाम-प्रादुर्भावः प्रायश्चित्त-विधानं च (Agni’s Epithets, Manifestations, and Expiation Procedures)

Upa-parva: Mārkaṇḍeya-saṃvāda (Discourse of Sage Mārkaṇḍeya) — Agni-nāmāni and Prāyaścitta Instructions

Mārkaṇḍeya outlines a doctrinal-ritual catalogue of Agni. The chapter first explains how specific forms of fire are named and praised according to their functions—nourishing and sustaining beings (e.g., Bharata/Puṣṭimān), granting auspiciousness and relief to the afflicted (Śiva), and appearing through intensified tapas with cosmogonic implications (including the emergence of Purandara/Indra in relation to ascetic power). It then describes Agni’s generative and classificatory roles: heat (ūṣmā) as a perceivable principle in beings; Agni’s association with Prajāpati/Manu; and the enumeration of multiple Agni-forms, including those connected with ritual occasions (darśa-paurṇamāsa, āgrayaṇa, cāturmāsya) and household governance (Vaiśvānara, Viśvapati, Sviṣṭakṛt). The discourse extends to genealogical pairings (Bhānu and Somaja lineage motifs; progeny lists) and specialized identifications (e.g., Kapila as a fire-form linked with sāṃkhya-yoga provenance in this narrative register). The latter portion becomes prescriptive: it specifies prāyaścitta iṣṭis (notably with an eight-pot offering structure) for various contingencies affecting ritual fires—accidental contact between fires, intrusion by wildfire, contact by persons in restricted states, and lapses in prescribed offerings—thereby converting cosmological naming into a practical compliance framework for restoring ritual order.

Chapter Arc: धर्मव्याध द्विजश्रेष्ठ को स्मरण कराते हैं कि मन पहले विषयों की ओर दौड़ता है; वहीं से काम, क्रोध और लोभ का चक्र आरम्भ होता है—और धर्म का मुखौटा भी उसी चक्र में बन सकता है। → वे मनोविज्ञान की सूक्ष्म शृंखला खोलते हैं: राग होने पर मनुष्य विषय पाने हेतु बड़े कर्म आरम्भ करता है, इष्ट रूप-गन्ध आदि का अभ्यास करता है; फिर लोभ और राग-द्वेष से बुद्धि धर्म में नहीं टिकती, और ‘व्याज’ से धर्माचरण करने लगता है। हितैषी मित्र और पण्डित रोकते हैं, तो वह अशास्त्रीय तर्कों से अपने पाप को भी ‘धर्म’ सिद्ध करने लगता है। → धर्मव्याध का निर्णायक प्रहार: जो धर्म की आड़ लेकर धन/लाभ चाहता है, उसकी बुद्धि वहीं रमती है और वह पाप करने को उद्यत होता है—यह ‘धर्म’ नहीं, धर्म का छल है; और जब रोकने पर भी वह श्रुति-संगत उत्तर छोड़ अश्रुति-योजित समर्थन गढ़ता है, तब उसका पतन स्पष्ट हो जाता है। → इसके प्रतिपक्ष में वे बताते हैं कि कुशल पुरुष सुख-दुःख में सम रहता है, साधुओं का उपसेवन करता है; सत्संग से बुद्धि धर्म में प्रकाशित होती है। साथ ही वे इन्द्रिय-मन-बुद्धि के विषयों और तत्त्व-गणना (चौबीस तत्त्व) की ओर संकेत कर बताते हैं कि आत्मनिरीक्षण और तत्त्वबोध से ही वृत्तियों का शोधन सम्भव है। → तत्त्वों की गणना और ‘बुद्धिरूपी गुहा’ में छिपे विषयों का संकेत आगे के अधिक विस्तृत सांख्य/आध्यात्मिक विवेचन की भूमिका बाँध देता है।

Shlokas

Verse 1

हि >> मय >> (_) है 7 - कर्णपर्वके उनहत्तरवें अध्यायमें छियालीसवेंसे तिरपनवें श्लोकोंमें एक कथा आती है। कौशिक नामका एक तपस्वी ब्राह्मण था। उसने यह व्रत ले लिया कि “मैं सदा सत्य बोलूँगा।/ एक दिन कुछ लोग लुटेरोंके भयसे छिपनेके लिये उसके आश्रमके पासके वनमें घुस गये। खोज करते हुए लुटेरोंने सत्यवादी कौशिकसे पूछा। उनके पूछनेपर कौशिकने सच्ची बात कह दी। पता लग जानेपर उन निर्दयी डाकुओंने उन लोगोंको पकड़कर मार डाला। इस प्रकार सत्य बोलनेके कारण लोगोंकी हिंसा हो जानेसे उस पापके फलस्वरूप कौशिकको नरक जाना पड़ा। - धर्मकी गति सूक्ष्म होनेके कारण देखनेमें विपरीतता दीखती है; किंतु वास्तवमें वह पूर्वकृत कर्मोंका फल है। दशाधिकद्विशततमो< ध्याय: विषयसेवनसे हानि, 0 और ब्राद्दी विद्याका व मार्कण्डेय उवाच एवमुक्तस्तु विप्रेण धर्मव्याधो युधिष्ठिर । प्रत्युवाच यथा विप्र॑ तच्छूणुष्व नराधिप,मार्कण्डेयजी कहते हैं--राजा युधिष्ठिर! ब्राह्मणके इस प्रकार पूछनेपर धर्मव्याधने उसे जैसा उत्तर दिया था, वह सब सुनाता हूँ, सुनो

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, ketika sang brāhmaṇa berkata demikian, Dharmavyādha menjawabnya. Wahai raja, dengarkanlah seluruh jawaban yang disampaikan kepadanya.”

Verse 2

व्याध उवाच विज्ञानार्थ मनुष्याणां मन: पूर्व प्रवर्तते । तत्‌ प्राप्य काम॑ भजते क्रोधं च द्विजसत्तम,धर्मव्याधने कहा--द्विजश्रेष्ठ! इन्द्रियोंद्रारा किसी विषयका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये सबसे पहले मनुष्योंका मन प्रवृत्त होता है। उस विषयको प्राप्त कर लेनेपर मनका उसके प्रति राग या द्वेष हो जाता है

Sang pemburu berkata: “Wahai yang terbaik di antara kaum dwija, ketika manusia hendak mengenali suatu objek melalui indra, pikiranlah yang mula-mula bergerak menuju kepadanya. Setelah objek itu diperoleh, pikiran pun memelihara hasrat terhadapnya—atau, bila berlawanan, kemarahan pula.”

Verse 3

ततस्तदर्थ यतते कर्म चारभते महत्‌ । इष्टानां रूपगन्धानामभ्यासं च निषेवते,जब किसी विषयमें राग होता है, तब मनुष्य उसे पानेके लिये प्रयत्नशील होता है और उसके लिये बड़े-बड़े कार्योका आरम्भ करता है। जब वे अभीष्ट रूप, गन्ध आदि विषय प्राप्त हो जाते हैं, तब वह उनका बारंबार सेवन करता है

Kemudian, didorong oleh keterikatan itu, seseorang berusaha meraihnya dan bahkan memulai upaya serta pekerjaan besar untuknya. Dan ketika objek-objek indra yang diidamkan—seperti rupa yang elok dan wewangian—telah didapat, ia pun berulang kali menenggelamkan diri dalam kenikmatannya.

Verse 4

ततो राग: प्रभवति द्वेषश्चन तदनन्तरम्‌ | ततो लोभ: प्रभवति मोहश्न॒ तदनन्तरम्‌,उनके सेवनसे विषयोंके प्रति उत्कट राग प्रकट होता है। फिर उसकी प्रतिकूलतामें द्वेष होता है; द्वेषके अनन्तर अभीष्ट वस्तुके प्रति लोभका प्रादुर्भाव होता है। तत्पश्चात्‌ बुद्धिपर मोह छा जाता है

Dari sana timbul keterikatan yang kian menyala; dan seketika sesudahnya, kebencian. Dari kebencian itu lahir ketamakan; dan seketika sesudahnya, delusi yang mengaburkan budi.

Verse 5

ततो लोभाभिभूतस्य रागद्वेषहतस्य च । न धर्मे जायते बुद्धिर्व्याजाद्‌ धर्म करोति च,इस प्रकार लोभसे आक्रान्त और राग-द्वेषसे पीड़ित मनुष्यकी बुद्धि धर्ममें नहीं लगती। यदि वह धर्म करता भी है तो कोई बहाना लेकर

Maka, pada diri seseorang yang dikuasai ketamakan dan dilukai oleh keterikatan serta kebencian, budi tidak menumbuhkan pertimbangan dalam perkara dharma. Dan bila ia pun melakukan perbuatan benar, itu dilakukan di balik dalih—bukan sebagai kebajikan yang tulus.

Verse 6

व्याजेन चरते धर्ममर्थ व्याजेन रोचते । व्याजेन सिध्यमानेषु धनेषु द्विजसत्तम

Sang pemburu berkata: “Wahai yang terbaik di antara kaum dwija, ia menjalankan dharma hanya sebagai dalih; bahkan pencarian artha (kekayaan) pun ia hiasi dengan dalih. Dan ketika harta berhasil diraih lewat siasat semacam itu, tampilan kesalehan hanyalah selubung belaka.”

Verse 7

सुहृद्धिवार्यमाणश्न पण्डितैश्व द्विजोत्तम

Wahai yang terbaik di antara kaum dwija, meski ditahan dan dinasihati oleh sahabat-sahabat yang tulus serta para bijak…

Verse 8

अधर्मस्त्रिविधस्तस्य वर्तते रागदोषज:,रागरूपी दोषके कारण उसके द्वारा तीन प्रकारके अधर्म होने लगते हैं--१. वह मनसे पापका चिन्तन करता है, २. वाणीसे पापकी ही बात बोलता है और 3३. क्रियाद्वारा भी पापका ही आचरण करता है। इस प्रकार अधर्ममें लग जानेपर उसके सभी अच्छे गुण नष्ट हो जाते हैं

Sang pemburu berkata: “Dari cacat keterikatan, adharma dalam dirinya berjalan dalam tiga rupa: pertama ia memikirkan dosa dalam batin; kedua ia mengucapkan kata-kata berdosa; dan ketiga ia melakukan perbuatan dosa. Bila seseorang tenggelam dalam adharma demikian, lenyaplah segala kebajikannya.”

Verse 9

पापं चिन्तयते चैव ब्रवीति च करोति च । तस्याधर्मप्रवृत्तस्य गुणा नश्यन्ति साधव:,रागरूपी दोषके कारण उसके द्वारा तीन प्रकारके अधर्म होने लगते हैं--१. वह मनसे पापका चिन्तन करता है, २. वाणीसे पापकी ही बात बोलता है और 3३. क्रियाद्वारा भी पापका ही आचरण करता है। इस प्रकार अधर्ममें लग जानेपर उसके सभी अच्छे गुण नष्ट हो जाते हैं

Ia memikirkan dosa, membicarakannya, dan melakukannya. Bila seseorang demikian berpaling kepada adharma, lenyaplah kebajikan-kebajikan yang menjadikannya sungguh mulia.

Verse 10

एकशीलिैश्व॒ मित्रत्वं भजन्ते पापकर्मिण: । स तेन दुःखमाप्रोति परत्र च विपद्यते,वह अपने ही-जैसे स्वभाववाले पापपरायण मनुष्योंसे मित्रता स्थापित कर लेता है। उस पापसे इस लोकमें तो दुःख होता ही है, परलोकमें भी उसे बड़ी विपत्ति भोगनी पड़ती है

Orang yang bergelimang dosa menjalin persahabatan dengan mereka yang sewatak. Dari pergaulan itu ia menuai derita di dunia ini, dan setelah mati pun jatuh ke dalam malapetaka besar.

Verse 11

पापात्मा भवति होवं धर्मलाभं तु मे शृणु । यस्त्वेतान्‌ प्रज्ञया दोषान्‌ पूर्वमेवानुपश्यति,इस प्रकार मनुष्य पापात्मा हो जाता है। अब धर्मकी प्राप्ति कैसे होती है, इसको मुझसे सुनो। जो दुःख और सुखके विवेचनमें कुशल है वह अपनी बुद्धि इन विषयसम्बन्धी दोषोंको पहले ही समझ लेता है। अतः उनसे दूर हटकर श्रेष्ठ पुरुषोंका संग करता है और उस श्रेष्ठसंगसे उसकी बुद्धि धर्ममें लग जाती है

“Demikianlah seseorang menjadi berdosa dalam batin. Sekarang dengarkan dariku bagaimana dharma diperoleh. Ia yang dengan kebijaksanaan telah melihat lebih dahulu cacat-cacat ini, segera menjauhinya, mencari pergaulan para mulia; dan oleh sat-sangga itu, buddhinya pun teguh bersemayam dalam dharma.”

Verse 12

कुशल: सुखदु:खेषु साधूंश्नाप्युपसेवते । तस्य साधुसमारम्भाद्‌ बुद्धिर्धमेषु राजते,इस प्रकार मनुष्य पापात्मा हो जाता है। अब धर्मकी प्राप्ति कैसे होती है, इसको मुझसे सुनो। जो दुःख और सुखके विवेचनमें कुशल है वह अपनी बुद्धि इन विषयसम्बन्धी दोषोंको पहले ही समझ लेता है। अतः उनसे दूर हटकर श्रेष्ठ पुरुषोंका संग करता है और उस श्रेष्ठसंगसे उसकी बुद्धि धर्ममें लग जाती है

Sang pemburu berkata: “Barangsiapa arif membedakan suka dan duka, ia mencari pergaulan orang-orang saleh. Sejak awal bersandar pada pergaulan mulia itu, pengertiannya pun mulai bersinar dalam dharma.”

Verse 13

ब्राह्मण उवाच ब्रवीषि सूनृतं धर्म्य यस्य वक्ता न विद्यते | दिव्यप्रभाव: सुमहानूषिरेव मतो5सि मे,ब्राह्मण बोला--धर्मव्याध! तुम धर्मके विषयमें बड़ी मधुर और प्रिय बातें कह रहे हो। इन बातोंको बतानेवाला दूसरा कोई नहीं है। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि तुम कोई दिव्य प्रभावसे सम्पन्न महान्‌ ऋषि ही हो

Sang Brahmana berkata: “Wahai Dharma-vyādha, engkau mengucapkan kata-kata yang benar dan selaras dengan dharma; tiada guru lain yang mampu bertutur demikian. Bagiku, engkau tampak laksana resi agung yang dianugerahi daya ilahi.”

Verse 14

व्याध उवाच ब्राह्मणा वै महाभागा: पितरोडग्रभुज: सदा । तेषां सर्वात्मना कार्य प्रियं लोके मनीषिणा,धर्मव्याधने कहा--ब्रह्मन! महाभाग ब्राह्मण और पितर ये सदा प्रथम भोजनके अधिकारी माने गये हैं। अतः बुद्धिमान्‌ पुरुषको इस लोकमें सब प्रकारसे उनका प्रिय करना चाहिये

Sang pemburu berkata: “Para Brahmana dan para leluhur (pitṛ) senantiasa dipandang berhak atas hidangan pertama. Maka orang bijak hendaknya dengan segenap upaya menyenangkan mereka di dunia ini.”

Verse 15

यत्‌ तेषां च प्रियं तत्‌ ते वक्ष्यामि द्विजसत्तम । नमस्कृत्वा ब्राद्माणे भ्यो बाद्यीं विद्यां निबोध मे,विप्रवर! उन ब्राह्मणोंको नमस्कार करके उनके लिये जो प्रिय वस्तु है, उसका वर्णन करता हूँ। तुम मुझसे ब्राह्मी विद्या श्रवण करो

Wahai yang terbaik di antara kaum dwija, akan kukatakan kepadamu apa yang mereka—para Brahmana—anggap berkenan. Setelah bersujud hormat kepada para Brahmana, dengarkan dariku ajaran Brahmī yang suci.

Verse 16

इदं विश्व जगत्‌ सर्वमजय्यं चापि सर्वश: । महाभूतात्मकं ब्रह्म नात: परतरं भवेत्‌,पजञ्चमहाभूतोंसे बना हुआ यह सम्पूर्ण चराचर जगत्‌ सब प्रकारसे अजेय ब्रह्मस्वरूप है। ब्रह्मसे उत्कृष्ट दूसरी कोई वस्तु नहीं है

Seluruh jagat raya ini—yang bergerak maupun yang tak bergerak—dalam segala hal tak terkalahkan, sebab ia adalah Brahman sendiri, tersusun dari lima mahābhūta. Tiada yang lebih tinggi daripada Brahman.

Verse 17

महाभूतानि खं वायुरग्निरापस्तथा च भू: । शब्द: स्पर्शश्न॒ रूपं च रसो गन्धश्न तदगुणा:,आकाश, वायु अग्नि, जल तथा पृथिवी--ये पाँच महाभूत हैं तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध--ये क्रमश: उनके विशेष गुण हैं

Sang pemburu berkata: “Unsur-unsur agung ialah ruang, angin, api, air, dan bumi. Sifat khasnya, menurut urutan, adalah bunyi, sentuhan, rupa, rasa, dan bau.”

Verse 18

तेषामपि गुणा: सर्वे गुणवृत्ति: परस्परम्‌ | पूर्वपूर्वगुणा: सर्वे क्रमशो गुणिषु त्रिषु,उन शब्द आदि गुणोंके भी अनेक गुण-भेद हैं, क्योंकि इन गुणोंका परस्पर संक्रमण भी देखा जाता है। पहले-पहलेके सभी गुण क्रमश: बादवाले तीन गुणवान्‌ भूतों (अग्नि, जल और पृथ्वी)-में उपलब्ध होते हैं, अर्थात्‌ अग्निमें शब्द, स्पर्श और रूप; जलमें शब्द, स्पर्श, रूप और रस तथा पृथ्वीमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध पाये जाते हैं

“Bahkan di antara sifat-sifat indria itu pun ada banyak perbedaan, sebab fungsinya tampak saling meresap. Dan semua sifat yang lebih awal terdapat, menurut urutan, dalam tiga unsur ‘berkualitas’ yang kemudian—api, air, dan bumi: pada api ada bunyi, sentuhan, dan rupa; pada air ada bunyi, sentuhan, rupa, dan rasa; dan pada bumi ada bunyi, sentuhan, rupa, rasa, dan bau.”

Verse 19

षष्ठस्तु चेतना नाम मन इत्यभिधीयते । सप्तमी तु भवेद्‌ बुद्धिरहंकारस्तत: परम्‌,इन पाँच भूतोंके अतिरिक्त छठा तत्त्व है चित्त; इसीको मन कहते हैं। सातवाँ तत्त्व बुद्धि है और उसके बाद आठवाँ अहंकार है

Sang pemburu berkata: “Melampaui lima unsur agung, prinsip keenam disebut cetanā—itulah yang dikenal sebagai batin (manas). Prinsip ketujuh ialah buddhi (akal-budi), dan sesudahnya datang ahaṃkāra (rasa-aku).”

Verse 20

इन्द्रियाणि च पञ्चात्मा रज: सत्त्वं तमस्तथा । इत्येष सप्तदशको राशिरव्यक्तसंज्ञक:,इनके सिवा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, प्राण और सत्त्व, रज, तम--इन सत्रह तत्त्वोंका समूह अव्यक्त कहलाता है

“Lagi, bersama lima indria, sang diri (sebagai yang mengalami), serta tiga guna—sattva, rajas, dan tamas—terbentuklah himpunan tujuh belas prinsip. Gugusan ini disebut ‘Avyakta’ (Yang Tak-Termanifest).”

Verse 21

सर्वरिहेन्द्रियार्थस्तु व्यक्ताव्यक्तै: सुसंवृतैः । चतुर्विशक इत्येष व्यक्ताव्यक्तमयो गुण: । एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं कि भूय: श्रोतुमिच्छसि

Sang pemburu berkata: “Segala objek indria terliputi dengan baik oleh yang termanifest dan yang tak-termanifest. Inilah yang disebut prinsip ‘dua puluh empat’, suatu sifat yang tersusun dari keduanya. Semua ini telah kujelaskan kepadamu; apa lagi yang hendak kau dengar?”

Verse 63

तत्रैव रमते बुद्धिस्ततः पापं चिकीर्षति । जो किसी बहानेसे धर्माचरण करता है, वह वास्तवमें धर्मकी आड़ लेकर धन चाहता है। द्विजश्रेष्ठ। जब धर्मके बहानेसे धनकी प्राप्ति होने लगती है, तब उसकी बुद्धि उसीमें रम जाती है और उसके मनमें पापकी इच्छा जाग उठती है

Di situlah buddhinya terpaut, lalu hasrat untuk berbuat dosa pun bangkit. Orang yang menjalankan dharma hanya sebagai dalih, sesungguhnya menginginkan harta dengan berlindung di balik dharma, wahai yang terbaik di antara para dwija. Ketika keuntungan mulai datang melalui kedok kebajikan, akalnya bersenang di dalamnya, dan di dalam batin muncul keinginan untuk menempuh jalan yang salah.

Verse 76

उत्तरं श्रुतिसम्बद्ध ब्रवीत्यश्रुतियोजितम्‌ । विप्रवर! जब उसे हितैषी मित्र तथा विद्वान्‌ पुरुष ऐसा करनेसे रोकते हैं, तब वह उसके समर्थनमें अशास्त्रीय उत्तर देते हुए भी उसे वेद-प्रतिपादित बताता है

Ia menyusun jawabannya seolah-olah bersandar pada śruti, padahal sesungguhnya tidak terhubung dengan Veda. Wahai yang utama di antara para brāhmaṇa, ketika sahabat yang tulus atau orang bijak menahannya dari perbuatan demikian, ia tetap membela diri dengan alasan yang tidak bersandar pada śāstra—namun bersikeras menyebutnya sebagai ajaran Veda.

Verse 230

पाँच ज्ञानेन्द्रियों तथा मन और बुद्धिके जो व्यक्त और अव्यक्त विषय हैं, जो बुद्धिरूपी गुहामें छिपे रहते हैं, उन्हें सम्मिलित करनेसे चौबीस तत्त्व होते हैं। इन तत्त्वोंका समुदाय ही व्यक्त और अव्यक्तरूप गुण है। (यह सब-का-सब ब्रह्मस्वरूप है।) ब्राह्मण! इस प्रकार ये सब बातें मैंने तुम्हें बतायी हैं, अब और क्या सुनना चाहते हो? ।। इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणमाहात्म्ये दशाधिकद्वधिशततमो<ध्याय:

Lima indria pengetahuan, beserta manas (pikiran) dan buddhi (intelek), berikut objek-objeknya yang tampak dan tak-tampak—yang tersembunyi dalam gua kedalaman buddhi—bila dihimpun menjadi dua puluh empat tattva. Himpunan tattva inilah ‘guṇa’ yang berwujud sekaligus tak-berwujud. Ketahuilah dengan pasti: semuanya ini adalah Brahman semata. Wahai brāhmaṇa, semuanya telah kujelaskan kepadamu; apa lagi yang hendak kau dengar sekarang?

Frequently Asked Questions

How to interpret and maintain the integrity of Vedic fire-practice when disruptions occur: the chapter pairs Agni’s many functional identities with explicit prāyaścitta measures to restore ritual order after contamination, contact, or lapse.

Multiplicity of names signals functional plurality rather than contradiction: Agni is framed as a single sacred principle manifesting across nourishment, auspicious protection, cosmic heat, and distinct ritual stations—each requiring correspondingly precise forms of address and action.

Yes in procedural intent: the repeated specification of standardized iṣṭis for defined scenarios implies that restoration is a rule-governed duty within dharma, ensuring continuity of rite and community order rather than leaving remediation to personal preference.