Adhyaya 178
Vana ParvaAdhyaya 17825 Verses

Adhyaya 178

Nahūṣa as Ajagara: Virtue Hierarchy, Karmic Gati, and the Psychology of Mind–Intellect

Upa-parva: Ajagara–Nahūṣa Saṃvāda (Dialogue with the Python/Serpent Nahūṣa)

Chapter 178 presents a multi-part discourse between Yudhiṣṭhira and a serpent (later disclosed as Nahūṣa). The exchange begins with an ethical inquiry: which actions yield the highest destination (anuttamā gati). The serpent proposes a compact program—giving to the worthy, speaking pleasantly, speaking truth, and remaining devoted to non-violence—then elaborates a contextual hierarchy among dāna, satya, priya-vākya, and ahiṃsā based on the gravity of the task at hand. Yudhiṣṭhira next asks about the certainty of karmic results and how an embodied or disembodied agent experiences objects; the serpent outlines three primary trajectories (human, heavenly, and animal births) conditioned by conduct, contrasting ahiṃsā-aligned causes with desire–anger–violence–greed that precipitate regression. The dialogue then turns technical: perception is mediated sequentially through mind (manas), with intellect (buddhi) generating discriminations; simultaneous grasping of all sense-objects is rejected. The serpent locates the self’s operative focus ‘between the eyebrows’ as a figurative seat for cognitive coordination. Finally, Nahūṣa recounts his fall from celestial privilege through pride, Agastya’s curse, and release through Yudhiṣṭhira’s dharmic conversation; the chapter closes by affirming that ethical disciplines—not birth—are the true means, and Bhīma is declared safe as Nahūṣa returns to heaven.

Chapter Arc: गन्धमादन से आगे बढ़ते हुए पाण्डवों की दृष्टि श्वेत-मेघ-प्रभ कैलास पर पड़ती है—और वनवास की कठोरता के बीच एक दिव्य शिखर उन्हें फिर से आशा और हर्ष देता है। → कैलास-दर्शन के उल्लास के साथ यात्रा का विस्तार होता है: वे कुबेर-प्रिय प्रदेशों, चैत्ररथ-सम वन-वैभव और सरस्वती-तट की रमणीयता में प्रवेश करते हैं; पर यह सौन्दर्य केवल विश्राम नहीं—वनवास के बारहवें वर्ष की दहलीज़ पर समय का दबाव और धर्म-पालन की कसौटी भी साथ चलती है। → सरस्वती-तट के निकट वह प्रसंग स्मरण में उभरता है जहाँ वृकोदर (भीम) ग्राह से जकड़े जाते हैं और धर्मराज युधिष्ठिर अपने तेज, धैर्य और धर्म-निष्ठा से संकट का निराकरण करते हैं—वन के सौन्दर्य के बीच अचानक जीवन-मरण का तीखा मोड़। → वृषपर्वा से भेंट और सत्कार से उनका शोक-मोह दूर होता है; चैत्ररथ-प्रकाश वन में वे एक संवत्सर तक मृगया-प्रधान जीवन बिताते हैं और फिर बारहवें वर्ष के समीप आते हुए तप, श्री और संयम से युक्त होकर आगे बढ़ते हैं। → बारहवें वर्ष का वन-विहार पूर्णता की ओर है—अज्ञातवास और आगामी परीक्षा की छाया सरस्वती-तट की शान्ति पर धीरे-धीरे उतरती है।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आजगरपर्वमें गन्धमादनसे प्रस्थानविषयक एक सौ छिह्तत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १७६ ॥/ हि न हुक है सप्तसप्तत्याधेकशततमोब< ध्याय: पाण्डवोंका गन्धमादनसे ह6/26:३40 4" 88:44 और विशाखयूप वनमें होते हुए सरस्वती-तटवर्ती द्वैतवनमें प्रवेश वैशम्पायन उवाच नगोत्तमं प्रस्रवणैरुपेतं दिशां गजै: किन्नरपक्षिभिश्न सुखं निवासं जहतां हि तेषां न प्रीतिरासीद्‌ भरतर्षभाणाम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पर्वतश्रेष्ठ गन्धमादन अनेकानेक निर्डरोंसे सुशोभित तथा दिग्गजों, किन्नरों और पक्षियोंसे सुसेवित होनेके कारण भरतवंशियों-में श्रेष्ठ पाण्डवोंके लिये एक सुखदायक निवास था, उसे छोड़ते समय उनका मन प्रसन्न नहीं था

Vaiśampāyana berkata: Wahai Janamejaya, Gandhamādana—gunung termulia—berhias banyak air terjun dan ramai didatangi gajah-gajah penjuru, para Kinnara, serta burung-burung. Bagi para Pāṇḍava, yang terbaik di garis Bharata, tempat itu adalah kediaman yang menenteramkan. Namun ketika mereka harus meninggalkan hunian damai itu, hati mereka tidak dipenuhi kegembiraan.

Verse 2

ततस्तु तेषां पुनरेव हर्ष: कैलासमालोक्य महान्‌ बभूव कुबेरकान्तं भरतर्षभाणां महीधरं वारिधरप्रकाशम्‌

Kemudian, ketika memandang Gunung Kailāsa, timbullah kembali sukacita besar dalam diri mereka. Gunung itu—yang dicintai Kubera—tampak bagi para terbaik keturunan Bharata sebagai puncak agung, berkilau laksana awan pembawa hujan.

Verse 3

तत्पश्चात्‌ कुबेरके प्रिय भूधर कैलाशको, जो श्वेत बादलोंके समान प्रकाशित हो रहा था, देखकर भरतकुलभूषण पाण्बुपुत्रोंकोी पुनः महान्‌ हर्ष प्राप्त हुआ ।। समुच्छूयान्‌ पर्वतसंनिरोधान्‌ गोष्ठान्‌ हरीणां गिरिसेतुमाला: बहून्‌ प्रपातांश्व॒ समीक्ष्य वीरा: स्थलानि निम्नानि च तत्र तत्र,नरश्रेष्ठ पाण्डव अपने हाथोंमें खड्ग और धनुष लिये हुए थे। वे ऊँचाई, पर्वतोंके सकरे स्थान, सिंहोंकी मादें, पर्वतीय नदियोंको पार करनेके लिये बने हुए पुल, बहुत-से झरने और नीची भूमियोंको जहाँ-तहाँ देखते हुए तथा मृग, पक्षी एवं हाथियोंसे सेवित दूसरे-दूसरे विशाल वनोंका अवलोकन करते हुए विश्वासपूर्वक आगे बढ़ने लगे

Sesudah itu, ketika melihat Kailāsa—gunung kesayangan Kubera—yang berkilau laksana awan putih, para putra Pāṇḍu, perhiasan garis Bharata, kembali dipenuhi sukacita besar. Dengan pedang dan busur di tangan, para kesatria utama itu maju dengan keyakinan, menatap puncak-puncak tinggi, celah-celah sempit pegunungan, kawanan rusa, rangkaian jembatan gunung untuk menyeberangi aliran, banyak air terjun, serta dataran rendah di berbagai tempat. Mereka meninjau hutan-hutan luas satu demi satu, yang ramai oleh satwa, burung, dan gajah.

Verse 4

तथैव चान्यानि महावनानि मृगद्धिजानेकपसेवितानि आलोकयन्तो$भिययु: प्रतीता- स्ते धन्विन: खड्गधरा नराग्रया:,नरश्रेष्ठ पाण्डव अपने हाथोंमें खड्ग और धनुष लिये हुए थे। वे ऊँचाई, पर्वतोंके सकरे स्थान, सिंहोंकी मादें, पर्वतीय नदियोंको पार करनेके लिये बने हुए पुल, बहुत-से झरने और नीची भूमियोंको जहाँ-तहाँ देखते हुए तथा मृग, पक्षी एवं हाथियोंसे सेवित दूसरे-दूसरे विशाल वनोंका अवलोकन करते हुए विश्वासपूर्वक आगे बढ़ने लगे

Demikian pula, para Pāṇḍava—kesatria utama yang membawa busur dan pedang—terus maju dengan tekad mantap sambil menatap hutan-hutan besar lainnya yang ramai oleh rusa, burung, dan gajah.

Verse 5

वनानि रम्याणि नदी: सरांसि गुहा गिरीणां गिरिगह्वराणि एते निवासा: सततं बभूवु- दिवानिशं प्राप्प नरर्षभाणाम्‌,पुरुषरत्न पाण्डव कभी रमणीय वनोंमें, कभी सरोवरोंके किनारे, कभी नदियोंके तटपर और कभी पर्वतोंकी छोटी-बड़ी गुफाओंमें दिन या रातके समय ठहरते जाते थे। सदा ऐसे ही स्थानोंमें उनका निवास होता था

Vaiśampāyana berkata: Bagi para Pāṇḍava—laksana banteng di antara manusia—hutan-hutan yang elok, tepi sungai, danau, serta gua dan ceruk pegunungan menjadi tempat tinggal mereka yang tetap. Siang dan malam mereka terus bergerak, dan berulang kali berlindung di pertapaan liar semacam itu.

Verse 6

ते दुर्गवासं बहुधा निरुष्य व्यतीत्य कैलासमचिन्त्यरूपम्‌ आसेदुरत्यर्थमनोरमं ते तमाश्रमाग्रयं वृषपर्वणस्तु,अनेक बार दुर्गम स्थानोंमें निवास करके अचिन्त्यरूप कैलासपर्वतको पीछे छोड़कर वे पुनः वृषपर्वाके अत्यन्त मनोरम उस श्रेष्ठ आश्रममें आ पहुँचे

Waiśampāyana berkata: Setelah berulang kali menanggung hidup di tempat-tempat yang sukar dijangkau, dan setelah melampaui Gunung Kailāsa yang berwujud tak terbayangkan, mereka kembali tiba di pertapaan utama milik Raja Vṛṣaparvan—sungguh amat menawan.

Verse 7

समेत्य राज्ञा वृषपर्वणा ते प्रत्यर्चितास्तेन च वीतमोहा: शशंसिरे विस्तरश: प्रवासं गिरौ यथावद्‌ वृषपर्वणस्ते

Setelah bertemu Raja Vṛṣaparvan, mereka dihormati olehnya sebagaimana mestinya; dan kebingungan mereka pun sirna. Lalu mereka melaporkan dengan rinci kepada Vṛṣaparvan tentang masa tinggal mereka di gunung, persis sebagaimana terjadinya.

Verse 8

वहाँ राजा वृषपर्वासे मिलकर और उनसे भलीभाँति पूजित होकर उन सबका शोक- मोह दूर हो गया। फिर उन्होंने वृषपर्वासे गन्धमादन पर्वतपर अपने रहनेके वृत्तान्तका यथार्थरूपसे एवं विस्तारपूर्वक वर्णन किया ।। सुखोषितास्तस्य त एकरात्रं पुण्याश्रमे देवमहर्षिजुष्टे अभ्याययुस्ते बदरीं विशालां सुखेन वीरा: पुनरेव वासम्‌,उस पवित्र आश्रममें देवता और महर्षि निवास किया करते थे। वहाँ एक रात सुखपूर्वक रहकर वे वीर पाण्डव फिर विशालापुरीके बदरिकाश्रमतीर्थमें चले आये और वहाँ बड़े आनन्दसे रहे

Waiśampāyana berkata: Setelah bermalam satu malam dengan tenteram di pertapaan suci yang didatangi para dewa dan maharsi, para pahlawan itu berangkat lagi dengan mudah menuju Badarī yang luas; di sana mereka kembali tinggal dengan damai.

Verse 9

ऊषुस्ततस्तत्र महानुभावा नारायणस्थानगता: समग्रा: कुबेरकान्तां नलिनीं विशोका: सम्पश्यमाना: सुरसिद्धजुष्टाम्‌

Waiśampāyana berkata: Kemudian para luhur budi itu tinggal bersama di sana setelah mencapai tempat suci Nārāyaṇa. Bebas dari duka, mereka memandang Nalinī—telaga teratai kesayangan Kubera—yang didatangi para dewa dan makhluk-makhluk sempurna.

Verse 10

तत्पश्चात्‌ वहाँ भगवान्‌ नर-नारायणके क्षेत्रमें आकर सभी महानुभाव पाण्डवोंने सुखपूर्वक निवास किया और शोकरहित हो कुबेरकी उस प्रिय पुष्करिणीका दर्शन किया, जिसका सेवन देवता और सिद्ध पुरुष किया करते हैं ।। तां चाथ दृष्टवा नलिनीं विशोका: पाण्डो: सुता: सर्वनरप्रधाना: ते रेमिरे नन्दनवासमेत्य द्विजर्षयो वीतमला यथैव,सम्पूर्ण मनुष्योंमें श्रेष्ठ वे पाण्डुपुत्र उस पुष्करिणीका दर्शन करके शोकरहित हो वहाँ इस प्रकार आनन्दका अनुभव करने लगे, मानो निर्मल ब्रह्मर्षिगण इन्द्रके नन्दनवनमें सानन्द विचर रहे हों

Kemudian mereka tiba di wilayah suci Bhagavān Nara–Nārāyaṇa dan tinggal di sana dengan tenteram. Bebas dari duka, mereka memandang telaga kesayangan Kubera—yang didatangi para dewa dan para siddha. Setelah melihat Nalinī itu, putra-putra Pāṇḍu, yang utama di antara manusia, bersukacita tanpa kesedihan, seakan para resi suci yang tak ternoda sedang berkelana gembira di Nandana, taman Indra.

Verse 11

ततः क्रमेणोपययुर्न॒वीरा यथागतेनैव पथा समग्रा: विहृत्य मासं सुखिनो बदर्या किरातराज्ञो विषयं सुबाहो:,इसके बाद वे सारे नरवीर जिस मार्गसे आये थे, क्रमशः उसी मार्गसे चल दिये। बदरिकाश्रममें एक मासतक सुखपूर्वक विहार करके उन्होंने किरातनरेश सुबाहुके राज्यकी ओर प्रस्थान किया

Kemudian semua pahlawan itu berangkat lagi secara teratur melalui jalan yang sama seperti saat mereka datang. Setelah sebulan beristirahat dan bersukacita di Badarī, mereka melanjutkan perjalanan menuju wilayah raja Kirāta, Subāhu.

Verse 12

पीनांस्तुषारान्‌ दरदांश्व॒ सर्वान्‌ देशान्‌ कुलिन्दस्य च भूमिरत्नान्‌ अतीत्य दुर्ग हिमवत्प्रदेशं पुरं सुबाहोर्ददृशुर्नुवीरा:,कुलिन्दके तुषार, दरद आदि धन-धान्यसे युक्त और प्रचुर रत्नोंसे सम्पन्न देशोंको लाँघते हुए हिमालयके दुर्गम स्थानोंको पार करके उन नरवीरोंने राजा सुबाहुका नगर देखा

Setelah melintasi negeri-negeri makmur Tuṣāra dan Darada, serta seluruh wilayah Kulinda yang kaya akan gandum, harta, dan permata bumi, lalu menembus jalur-jalur sulit di Himālaya, para pahlawan itu akhirnya melihat kota Raja Subāhu.

Verse 13

श्रुत्वा च तान्‌ पार्थिवपुत्रपौत्रान्‌ प्राप्तान्‌ सुबाहुर्विषये समग्रान्‌ प्रत्युद्ययौ प्रीतियुत: स राजा त॑ चाभ्यनन्दन्‌ वृषभा: कुरूणाम्‌,राजा सुबाहुने जब सुना कि मेरे राज्यमें राजपुत्र पाण्डवगण पधारे हुए हैं, तब बहुत प्रसन्न होकर नगरसे बाहर आ उसने उन सबकी अगवानी की। फिर कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर आदिने भी उनका बड़ा समादर किया

Ketika Raja Subāhu mendengar bahwa para Pāṇḍava—putra dan cucu para raja—telah tiba seluruhnya di wilayahnya, ia pun dipenuhi sukacita dan keluar dari kota untuk menyambut mereka. Yudhiṣṭhira beserta para Kurus terkemuka juga menyambut dan menghormatinya sebagaimana mestinya.

Verse 14

समेत्य राज्ञा तु सुबाहुना ते सूतैर्विशोकप्रमुखैश्न सर्वे सहेन्द्रसेनै: परिचारिकैश्न पौरोगवैर्ये च महानसस्था:,राजा सुबाहुसे मिलकर वे विशोक आदि अपने सारथियों, इन्द्रसेन आदि परिचारकों, अग्रगामी सेवकों तथा रसोइयोंसे भी मिले

Sesudah bertemu Raja Subāhu, mereka semua juga berjumpa dengan para sais kereta yang dipimpin Viśoka, para pelayan seperti Indrasena, para abdi terdepan, serta mereka yang bertugas di dapur istana.

Verse 15

सुखोषितास्तत्र त एकरात्र॑ सूतान्‌ समादाय रथांश्व सर्वान्‌ घटोत्कचं सानुचरं विसृज्य ततोभ्ययुर्यामुनमद्रिराजम्‌,वहाँ उन सबने एक रात बड़े सुखसे निवास किया। पाण्डवोंने अपने सारे सारथियों तथा रथोंको साथ ले लिया और अनुचरोंसहित घटोत्कचको विदा करके वहाँसे पर्वतराजको प्रस्थान किया जहाँ यमुनाका उद्गम-स्थान है

Di sana mereka bermalam satu malam dengan nyaman. Lalu mereka mengumpulkan semua sais kereta beserta kereta dan kuda-kuda mereka. Setelah melepas Ghaṭotkaca bersama para pengiringnya, mereka berangkat menuju raja gunung di dekat Yamunā—ke tempat sumber sungai itu berada.

Verse 16

तस्मिन्‌ गिरौ प्रस्नरवणोपपन्न- हिमोत्तरीयारुणपाण्डुसानौ विशाखयूपं समुपेत्य चक्ु- स्तदा निवासं पुरुषप्रवीरा:,झरनोंसे युक्त हिमराशि उस पर्वतरूपी पुरुषके लिये उत्तरीयका काम करती थी और उसका अरुण एवं श्वेत रंगका शिखर बालसूर्यकी किरणें पड़नेसे सफेद एवं लाल पगड़ीके समान शोभा पाता था। उसके ऊपर विशाखयूप नामक वनमें पहुँचकर नरवीर पाण्डवोंने उस समय निवास किया

Waiśampāyana berkata: Di gunung itu—yang senantiasa bergema oleh deru air terjun, dengan salju menyelimuti lerengnya laksana kain penutup, dan puncaknya berkilau dalam rona kemerahan serta pucat keputihan—para Pāṇḍava, insan-insan utama, mencapai rimba bernama Viśākhayūpa dan pada saat itu menetap di sana.

Verse 17

वराहनानामृगपक्षिजुष्ट महावन चैत्ररथप्रकाशम्‌ शिवेन पार्था मृगयाप्रधाना: संवत्सरं तत्र वने विजहुः,वह विशाल वन चैत्ररथ वनके समान शोभायमान था। वहाँ सूअर, नाना प्रकारके मृग तथा पक्षी निवास करते थे। उन दिनों पाण्डवोंका वहाँ हिंस्र जीवोंको मारना ही प्रधान काम था। वहाँ वे एक वर्षतक बड़े सुखसे विचरते रहे

Waiśampāyana berkata: Rimba besar itu tampak cemerlang dan elok bagaikan hutan Caitraratha; dihuni babi hutan, beragam rusa, dan burung-burung. Dalam keadaan yang dianggap mujur, pekerjaan utama para Pārtha adalah berburu; mereka menghabiskan satu tahun berkelana di hutan itu.

Verse 18

तत्राससादातिबलं भुजड़ं क्षुधार्दितं मृत्युमिवोग्ररूपम्‌ वृकोदर: पर्वतकन्दरायां विषादमोहव्यथितान्तरात्मा,उसी यात्रामें भीमसेन एक दिन पर्वतकी कन्दरामें भूखसे पीड़ित एक अजगरके पास जा पहुँचे, जो अत्यन्त बलवान होनेके साथ ही मृत्युके समान भयानक था। उस समय उनकी अनन्‍्तरात्मा विषाद एवं मोहसे व्यथित हो उठी

Waiśampāyana berkata: Di sana, dalam sebuah gua pegunungan, Vṛkodara (Bhīma) berjumpa dengan seekor ular raksasa yang amat kuat, tersiksa oleh lapar, dan mengerikan laksana Maut sendiri. Saat itu batinnya terguncang—diliputi duka dan kebingungan.

Verse 19

दीपो5भवद्‌ यत्र वृकोदरस्य युधिष्ठिरो धर्मभृतां वरिष्ठ: अमोक्षयद्‌ यस्तमनन्ततेजा ग्राहेण संवेष्टितसर्वगात्रम्‌,उस अवसरपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ अत्यन्त तेजस्वी युधिष्ठिर भीमसेनके लिये द्वीपकी भाँति अवलम्ब हो गये। अजगरने भीमसेनके सम्पूर्ण शरीरको लपेट लिया था, परंतु युधिष्ठिरने (अजगरको उसके प्रश्नोंके उत्तरद्वारा संतुष्ट करके) उन्हें छुड़ा दिया

Waiśampāyana berkata: Dalam krisis itu, Yudhiṣṭhira—yang utama di antara para penegak dharma—menjadi laksana pelita di sebuah pulau perlindungan bagi Vṛkodara. Sebab ketika ular itu telah melilit seluruh tubuh Bhīma, Yudhiṣṭhira yang bercahaya tanpa batas membebaskannya—dengan keteguhan pada dharma dan dengan memuaskan sang penawan melalui jawaban yang benar, bukan dengan kekerasan.

Verse 20

ते द्वादशं वर्षमुपोपयातं वने विहर्तु कुरव: प्रतीता: तस्माद्‌ वनाच्चैत्ररथप्रकाशात्‌ श्रिया ज्वलन्तस्तपसा च युक्ता:

Waiśampāyana berkata: Ketika tahun kedua belas tiba, para Kuru—yang telah berketetapan untuk menjalani hari-hari mereka di rimba—berangkat dari hutan yang bercahaya bagaikan Citraratha, bersinar oleh kemuliaan dan diteguhkan oleh tapa.

Verse 21

ततश्न यात्वा मरुधन्वपारश्व सदा भरनुर्वेदरतिप्रधाना: सरस्वतीमेत्य निवासकामा: सरस्ततो द्वैतवनं प्रतीयु:

Waiśampāyana berkata: Kemudian mereka pergi ke wilayah yang bersebelahan dengan Marudhanva. Para kesatria yang unggul—yang bersukacita dalam Veda dan mahir memanggul beban ilmu memanah—dengan hasrat mencari tempat tinggal, tiba di Sungai Sarasvatī; dan dari telaga itu mereka melanjutkan perjalanan menuju hutan Dvaitavana.

Verse 22

अब इन पाण्डवोंके वनवासका बारहवाँ वर्ष आ पहुँचा था। उसे भी वनमें सानन्द व्यतीत करनेके लिये उनके मनमें बड़ा उत्साह था। अपनी अद्भुत कान्तिसे प्रकाशित होते हुए तपस्वी पाण्डव चैत्ररथ वनके समान शोभा पानेवाले उस वनसे निकलकर मरुभूमिके पास सरस्वतीके तटपर गये और वहीं निवास करनेकी इच्छासे द्वैतवनके द्वैत सरोवरके समीप गये। उस समय पाण्डवोंका विशेष प्रेम सदा धनुर्वेदमें ही लक्षित होता था ।। समीक्ष्य तान्‌ द्वैतवने निविष्टान्‌ निवासिनस्तत्र ततो5भिजग्मु: तपोदमाचारसमाधियुक्ता- स्तृणोदपात्रावरणाश्मकुट्टा:,उन्हें द्वैतववनमें आया देख वहाँके निवासी उनके दर्शनके लिये निकट आये। वे सब-के- सब तपस्या, इन्द्रिय-संयम, सदाचार और समाधिमें तत्पर रहनेवाले थे। तिनकेकी चटाई, जलपात्र, ओढ़नेका कपड़ा और सिल-लोढ़े--यही उनके पास सामग्री थी

Pada saat itu tibalah tahun kedua belas pembuangan Pāṇḍava di rimba. Untuk menjalani tahun itu pun dengan sukacita di hutan, semangat besar memenuhi hati mereka. Para Pāṇḍava yang bertapa, bercahaya oleh keelokan yang menakjubkan, keluar dari rimba yang semarak laksana Hutan Caitraratha, lalu menuju tepi Sarasvatī dekat tanah gersang; dan dengan hasrat menetap, mereka sampai di dekat Telaga Dvaita di Hutan Dvaitavana. Pada masa itu, kecintaan mereka yang menonjol senantiasa tampak pada dhanuḥveda—ilmu memanah. Melihat Pāṇḍava telah menetap di Hutan Dvaita, para penghuni setempat datang menyongsong untuk berjumpa. Mereka semua tekun dalam tapa, pengendalian diri, perilaku benar, dan samādhi; harta sederhana mereka hanyalah tikar rumput, bejana air, sehelai kain penutup, serta alat batu untuk menumbuk dan menggiling.

Verse 23

प्लक्षाक्षरोहीतकवेतसाश्र तथा बदर्य: खदिरा: शिरीषा: बिल्वेड्गुदा: पीलुशमीकरीरा: सरस्वतीतीररुहा बभूवु:,सरस्वतीके तटपर पाकड़, बहेड़ा, रोहितक, बेंत, बेर, खैर, सिरस, बेल, इंगुदी, पीलु, शमी और करीर आदिके वृक्ष खड़े थे। वह नदी यक्ष, गन्धर्व और महर्षियोंको प्रिय थी। देवताओंकी तो वह मानो बस्ती ही थी। राजपुत्र पाण्डव बड़ी प्रसन्नता और सुखसे वहाँ विचरने और निवास करने लगे

Waiśampāyana berkata: Di tepi Sarasvatī berdiri rapat aneka pohon—plakṣa, akṣa, rohītaka, vetasa; juga badarī, khadira, dan śirīṣa; serta bilva, iṅgudī, pīlu, śamī, dan karīra—tumbuh lebat di pinggir sungai. Sungai itu dicintai para Yakṣa, Gandharva, dan mahārṣi; bagi para dewa seakan-akan itulah sebuah permukiman. Para pangeran Pāṇḍava pun, dengan hati gembira, berkelana dan menetap di sana dengan tenteram.

Verse 24

तां यक्षगन्धर्वमहर्षिकान्ता- मागारभूतामिव देवतानाम्‌ सरस्वती प्रीतियुता श्चरन्त: सुखं विजहुर्नरदेवपुत्रा:,सरस्वतीके तटपर पाकड़, बहेड़ा, रोहितक, बेंत, बेर, खैर, सिरस, बेल, इंगुदी, पीलु, शमी और करीर आदिके वृक्ष खड़े थे। वह नदी यक्ष, गन्धर्व और महर्षियोंको प्रिय थी। देवताओंकी तो वह मानो बस्ती ही थी। राजपुत्र पाण्डव बड़ी प्रसन्नता और सुखसे वहाँ विचरने और निवास करने लगे

Waiśampāyana berkata: Dengan penuh kasih mereka berkelana di Sarasvatī—yang dicintai Yakṣa, Gandharva, dan para mahārṣi, dan tampak laksana kediaman para dewa—maka putra-putra raja (Pāṇḍava) menikmati hari-hari mereka dalam kebahagiaan.

Verse 177

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आजगरपर्वणि पुनर्द्धतवनप्रवेशे सप्तसप्तत्यधिकशततमो<ध्याय:

Demikian berakhir bab ke-178 dari Vana Parva dalam Śrī Mahābhārata, pada bagian Ājagara-parva, mengenai masuk kembali ke Hutan Dvaitavana.

Frequently Asked Questions

How to prioritize competing virtues—dāna, satya, pleasing speech, and ahiṃsā—when each is commendable, yet real situations demand a ranked choice based on consequences and moral weight.

Experience is mediated through instruments: the mind moves through objects in sequence, while intellect forms discriminations; therefore, ‘simultaneous’ grasp of all sense-objects is not supported within this model.

Yes: Nahūṣa’s narrative functions as exemplum—pride causes decline, while disciplined virtues (satya, dama, tapas, yoga, ahiṃsā, dāna) enable restoration; moral attainment is presented as conduct-based rather than birth-based.