
Dāna-Śreṣṭhatā: Abhaya, Anugraha, and the Ethics of Honoring the Worthy (दानश्रेष्ठता: अभय-अनुग्रह-विप्रपूजा)
Upa-parva: Dāna-Dharma Anuśāsana (Charity and Merit Discourse)
Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to identify which form of giving is superior among commonly discussed external gifts, motivated by the principle that a gift ‘follows’ the giver. Bhīṣma answers by elevating abhaya (granting fearlessness/safety) to all beings and anugraha (aid in adversity) as exemplary gifts, alongside the practice of giving what is genuinely desired or valued, especially to a thirsty or needy petitioner. He states that the ‘best gift’ is that after which the giver experiences the settled conviction of having truly given; such a gift is said to accompany the donor. He lists purifying gifts—gold, cows, and land—and urges regular giving to sādhus, asserting that charity releases one from sin. He further instructs that one should honor petitioners according to capacity, assist even an adversary who comes seeking refuge, and remove hunger from the emaciated and ashamed. A key administrative ethic follows: invite and support restrained, self-controlled brāhmaṇas—especially those who do not solicit—through lodging and provisions, treating such support as a distributed sacrifice (vitata-yajña) superior to many ritual offerings. The chapter concludes with a strong emphasis on honoring brāhmaṇas as stabilizers of kṣatriya power and as an anchor of social legitimacy, framed as Bhīṣma’s sworn truth about the spiritual consequences of his own conduct toward them.
Chapter Arc: राजर्षि कुशिक, अपने गृह में ठहरे मुनिपुंगव च्यवन से विनयपूर्वक पूछते हैं—“भगवन्, यदि आप प्रसन्न हैं तो बताइए, मेरे घर में आपके निवास का कारण क्या है?” → च्यवन अपने विचित्र आचरणों का संकेत देते हैं—इक्कीस-इक्कीस दिनों तक एक करवट सोना, उठकर बिना कुछ कहे बाहर जाना, सहसा अन्तर्धान होना और फिर पुनः दर्शन देना—और कुशिक की सहनशीलता व धैर्य की परीक्षा लेते हैं। धीरे-धीरे स्पष्ट होता है कि यह केवल तपस्वी का स्वभाव नहीं, बल्कि एक उद्देश्यपूर्ण ‘परीक्षा’ है। → च्यवन सत्य उद्घाटित करते हैं: “मैं तुम्हारे कुल-नाश के हेतु आया था—कुशिकोच्छेद का संकल्प लेकर।” परंतु कुशिक की अविचल क्षमा, सेवा और क्रोध-रहित धैर्य ने उस संकल्प को पलट दिया; विनाश का हेतु वरदान में रूपान्तरित हो जाता है। → प्रसन्न होकर च्यवन कहते हैं—“राजर्षे, जो वर तुम्हारे मन में है, मांग लो; मैं तीर्थयात्रा को जाऊँगा।” कुशिक की निःशंक निष्ठा और अतिथि-धर्म के पालन से ऋषि संतुष्ट होते हैं और उसे कल्याणकारी फल का आश्वासन देते हैं। → वरदान का द्वार खुलता है—कुशिक क्या मांगेगा, और यह वर उसके वंश व राज्य-धर्म को किस दिशा में मोड़ेगा?
Verse 1
अफ्-४-णका+ पञ्चपञज्चाशत्तमो<् ध्याय: च्यवनका कुशिकके पूछनेपर उनके घरमें अपने निवासका कारण बताना और उन्हें वरदान देना च्यवन उवाच वरश्न गृह्मतां मत्तो यश्न ते संशयो हृदि । त॑ प्रब्रूहि नरश्रेष्ठ सर्व सम्पादयामि ते,च्यवन बोले--नरश्रेष्ठ! तुम मुझसे वर भी माँग लो और तुम्हारे मनमें जो संदेह हो, उसे भी कहो। मैं तुम्हारा सब कार्य पूर्ण कर दूँगा
Cyavana berkata: “Wahai insan terbaik, pilihlah satu anugerah dariku; dan katakan pula keraguan apa pun yang ada di hatimu. Aku akan menuntaskan segala tujuanmu.”
Verse 2
कुशिक उवाच यदि प्रीतोडसि भगवंस्ततो मे वद भार्गव | कारणं श्रोतुमिच्छामि मद्गृहे वासकारितम्,कुशिकने कहा--भगवन्! भृगुनन्दन! यदि आप मुझपर प्रसन्न हों तो मुझे यह बताइये कि आपने इतने दिनोंतक मेरे घरपर क्यों निवास किया था? मैं इसका कारण सुनना चाहता हूँ
Kuśika berkata: “Wahai Bhagavan, wahai Bhārgava! Jika engkau berkenan kepadaku, katakanlah: apa sebabnya engkau berdiam di rumahku selama sekian hari? Aku ingin mendengar alasannya.”
Verse 3
शयनं चैकपार्श्वेन दिवसानेकविंशतिम् । अकिंचिदुक्त्वा गमनं॑ बहिश्न मुनिपुंगव
Kuśika berkata: “Selama dua puluh satu hari ia berbaring hanya pada satu sisi. Lalu, tanpa mengucapkan sepatah kata pun, sang resi utama itu pergi ke luar—melangkah pergi bagaikan seorang yang tabah dan lepas dari keterikatan.”
Verse 4
अन्तर्धानमकस्माच्च पुनरेव च दर्शनम् | पुनश्च शयनं विप्र दिवसानेकविंशतिम्
Kuśika berkata: “Tiba-tiba ia lenyap, lalu tampak kembali. Dan sekali lagi, wahai brāhmaṇa, ia berbaring (seakan tidur) selama dua puluh satu hari.”
Verse 5
तैलाभ्यक्तस्य गमनं भोजनं च गृहे मम । समुपानीय विविध॑ यद् दग्ध॑ जातवेदसा
Kuśika berkata: “Di rumahku, seseorang yang telah diurapi minyak patut diantar dan diberi santapan; dan berbagai persembahan pun dibawa serta dipersembahkan—yang telah dimasak oleh Jātavedas, api suci.”
Verse 6
निर्याणं च रथेनाशु सहसा यत् कृतं त्वया । धनानां च विसर्गस्य वनस्यापि च दर्शनम्
Kuśika berkata: “Keberangkatanmu yang cepat dengan kereta, dilakukan seketika tanpa menunda; tindakanmu melepaskan harta; bahkan pergi untuk melihat rimba—semua perbuatan ini, bila dipandang bersama, menuntut renungan tentang tekad dan maksudmu.”
Verse 7
प्रासादानां बहूनां च काउचनानां महामुने । मणिदविद्रुपादानां पर्यड्काणां च दर्शनम्
Kuśika berkata: “Wahai resi agung, tampaklah banyak istana keemasan; dan juga dipan-dipan yang kakinya bertatah permata serta vaidūrya (batu mata kucing).”
Verse 8
पुनश्चादर्शनं तस्य श्रोतुमिच्छामि कारणम् | अतीव ह्वात्र मुह्दामि चिन्तयानो भृगूद्गह
Kuśika berkata: “Sekali lagi aku ingin mendengar sebab ia lenyap dari pandangan. Wahai keturunan Bhṛgu, ketika kupikirkan hal itu, aku benar-benar diliputi kebingungan.”
Verse 9
मुनिपुंगव! इक्कीस दिनोंतक एक करवटसे सोते रहना, फिर उठनेपर बिना कुछ बोले बाहर चल देना, सहसा अन्तर्धान हो जाना, पुनः दर्शन देना, फिर इक्कीस दिनोंतक दूसरी करवटसे सोते रहना, उठनेपर तेलकी मालिश कराना, मालिश कराकर चल देना, पुनः मेरे महलमें जाकर नाना प्रकारके भोजनको एकत्र करना और उसमें आग लगाकर जला देना, फिर सहसा रथपर सवार हो बाहर नगरकी यात्रा करना, धन लुटाना, दिव्य वनका दर्शन कराना, वहाँ बहुत-से सुवर्णमय महलोंको प्रकट करना, मणि और मूँगोंके पायेवाले पलंगोंको दिखाना और अन्तमें सबको पुनः अदृश्य कर देना--महामुने! आपके इन कार्योंका यथार्थ कारण मैं सुनना चाहता हूँ। भूगुकुलरत्न! इस बातपर जब मैं विचार करने लगता हूँ तब मुझपर अत्यन्त मोह छा जाता है ।। न चैवात्राधिगच्छामि सर्वस्यास्य विनिश्चयम् । एतदिच्छामि कार्त्स्न्येन सत्यं श्रोतुं तपोधन,तपोधन! इन सब बातोंपर विचार करके भी मैं किसी निश्चयपर नहीं पहुँच पाता हूँ, अतः इन बातोंको मैं पूर्ण एवं यथार्थ रूपसे सुनना चाहता हूँ
Kuśika berkata: “Wahai yang utama di antara para resi! Engkau berbaring dua puluh satu hari pada satu sisi; lalu bangkit, pergi ke luar tanpa sepatah kata, tiba-tiba lenyap, dan kemudian menampakkan diri kembali. Lagi, engkau berbaring dua puluh satu hari pada sisi yang lain; lalu bangkit, meminta diurut dengan minyak, dan setelah diolesi engkau berangkat. Kemudian engkau kembali ke istanaku, mengumpulkan aneka makanan, menyalakan api padanya dan membakarnya. Sesudah itu engkau mendadak menaiki kereta, berkeliling di luar kota, menghamburkan harta, memperlihatkan hutan yang ajaib; di sana engkau memunculkan banyak istana keemasan; engkau memperlihatkan dipan-dipan berkaki bertatah permata dan karang merah; dan pada akhirnya engkau membuat semuanya lenyap kembali. Mahāmuni! Aku ingin mendengar sebab sejati dari semua perbuatanmu itu. Permata garis Bhṛgu! Ketika kupikirkan, kebingungan yang dalam menimpaku. Sekalipun kupikirkan, aku tak sampai pada kesimpulan apa pun; karena itu, wahai pertapa kaya tapa, aku ingin mendengar kebenaran secara utuh.”
Verse 10
च्यवन उवाच शृणु सर्वमशेषेण यदिदं येन हेतुना । न हि शक््यमनाख्यातुमेवं पृष्टेन पार्थिव,च्यवनने कहा--भूपाल! जिस कारणसे मैंने यह सब कार्य किया था, वह सारा वृत्तान्त तुम पूर्णरूपसे सुनो। तुम्हारे इस प्रकार पूछनेपर मैं इस रहस्यको बताये बिना नहीं रह सकता
Cyavana berkata: “Wahai raja, dengarkan seluruh kisah ini dengan lengkap—apa yang terjadi dan karena sebab apa semuanya dilakukan. Engkau bertanya demikian; maka aku tak mungkin menahan penjelasan ini, perkara ini tak dapat kubiarkan tak terucap.”
Verse 11
पितामहस्य वदत: पुरा देवसमागमे । श्रुतवानस्मि यद् राज॑ंस्तन्मे निगदत: शृणु,राजन! पूर्वकालकी बात है, एक दिन देवताओंकी सभामें ब्रह्माजी एक बात कह रहे थे जिसे मैंने सुना था, उसे बता रहा हूँ, सुनो
Cyavana berkata: “Wahai raja, dahulu kala, dalam sidang para dewa, aku mendengar sabda yang diucapkan oleh Sang Kakek Agung (Brahmā). Kini dengarkan, wahai raja, ketika kuutarakan ajaran itu kepadamu.”
Verse 12
ब्रह्मक्षत्रविरोधेन भविता कुलसंकर: । पौत्रस्ते भविता राजंस्तेजोवीर्यसमन्वित:,नरेश्वर! ब्रह्माजीने कहा था कि ब्राह्मण और क्षत्रियमें विरोध होनेके कारण दोनों कुलोंमें संकरता आ जायगी। (उन्हींके मुहसे मैंने यह भी सुना था कि तुम्हारे वंशकी कन्यासे मेरे वंशमें क्षत्रिय तेजका संचार होगा और) तुम्हारा एक पौजत्र ब्राह्मण-तेजसे सम्पन्न तथा पराक्रमी होगा
Cyavana berkata: “Wahai penguasa manusia! Karena permusuhan antara Brahmana dan Kṣatriya, akan timbul kekacauan dan percampuran garis keturunan. Namun, wahai raja, akan ada seorang cucumu yang dianugerahi kilau kemuliaan serta daya kepahlawanan.”
Verse 13
ततस्ते कुलनाशार्थमहं त्वां समुपागत: । चिकीर्षन् कुशिकोच्छेदं संदिधक्षु: कुलं तव,यह सुनकर मैं तुम्हारे कुलका विनाश करनेके लिये तुम्हारे यहाँ आया था। मैं कुशिकका मूलोच्छेद कर डालना चाहता था। मेरी प्रबल इच्छा थी कि तुम्हारे कुलको जलाकर भस्म कर डालूँ
Maka, dengan maksud membinasakan garis keturunanmu, aku datang kepadamu—bertekad mencabut habis wangsa Kuśika dan membakar keluargamu hingga menjadi abu.
Verse 14
ततो5हमागम्य पुरे त्वामवोचं महीपते । नियम कंचिदारप्स्ये शुश्रूषा क्रियतामिति,भूपाल! इसी उद्देश्यसे तुम्हारे नगरमें आकर मैंने तुमसे कहा कि मैं एक व्रतका आरम्भ करूँगा। तुम मेरी सेवा करो (इसी अभिप्रायसे मैं तुम्हारा दोष ढूँढ़ रहा था); किंतु तुम्हारे घरमें रहकर भी मैंने आजतक तुममें कोई दोष नहीं पाया। राजर्षे! इसीलिये तुम जीवित हो, अन्यथा तुम्हारी सत्ता मिट गयी होती
Kemudian, wahai raja, aku datang ke kotamu dan berkata kepadamu, “Aku akan menjalankan suatu tapa-niyama; layani aku.” (Sesungguhnya maksudku adalah mencari-cari cela padamu.) Namun, meski tinggal di rumahmu, hingga hari ini aku tidak menemukan satu pun kesalahan padamu. Wahai resi-rajā, karena itulah engkau masih hidup; jika tidak, kuasamu dan kedudukanmu telah lenyap.
Verse 15
नच ते दुष्कृतं किंचिदहमासादयं गृहे । तेन जीवसि राजर्षे न भवेथास्त्वमन्यथा,भूपाल! इसी उद्देश्यसे तुम्हारे नगरमें आकर मैंने तुमसे कहा कि मैं एक व्रतका आरम्भ करूँगा। तुम मेरी सेवा करो (इसी अभिप्रायसे मैं तुम्हारा दोष ढूँढ़ रहा था); किंतु तुम्हारे घरमें रहकर भी मैंने आजतक तुममें कोई दोष नहीं पाया। राजर्षे! इसीलिये तुम जीवित हो, अन्यथा तुम्हारी सत्ता मिट गयी होती
Di rumahmu aku tidak mendapati sedikit pun perbuatan jahatmu. Karena itulah engkau masih hidup, wahai resi-rajā; jika tidak, wahai pelindung bumi, engkau takkan tetap seperti sekarang—kekuasaanmu akan musnah.
Verse 16
एवं बुद्धिं समास्थाय दिवसानेकविंशतिम् । सुप्तो5स्मि यदि मां कश्चिद् बोधयेदिति पार्थिव,भूपते! यही विचार मनमें लेकर मैं इक्कीस दिनोंतक एक करवटसे सोता रहा कि कोई मुझे बीचमें आकर जगावे
Dengan niat demikian kukukuhkan dalam batin, wahai raja, aku berbaring tidur selama dua puluh satu hari, berpikir, “Jika ada seseorang datang membangunkanku.”
Verse 17
यदा त्वया सभार्येण संसुप्तो न प्रबोधित: । अहं तदैव ते प्रीतोी मनसा राजसत्तम,नृपश्रेष्ठल जब पत्नीसहित तुमने मुझे सोते समय नहीं जगाया, तभी मैं तुम्हारे ऊपर मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुआ था
Ketika engkau, bersama permaisurimu, tidak membangunkanku saat aku tertidur, pada saat itulah, wahai raja terbaik, aku menjadi berkenan kepadamu dalam hatiku.
Verse 18
उत्थाय चास्मि निष्क्रान्तो यदि मां त्वं महीपते । पृच्छे: क््व यास्यसीत्येवं शपेयं त्वामिति प्रभो,भूपते! प्रभो! जिस समय मैं उठकर घरसे बाहर जाने लगा उस समय यदि तुम मुझसे पूछ देते कि “कहाँ जाइयेगा' तो इतनेसे ही मैं तुम्हें शाप दे देता
Cyavana berkata: “Wahai raja, ketika aku bangkit dan hendak melangkah keluar, seandainya engkau sekali saja bertanya kepadaku, ‘Ke mana engkau pergi?’, niscaya karena pertanyaan itu juga, wahai tuanku, aku akan mengutukmu.”
Verse 19
अन्तर्हितः पुनश्नास्मि पुनरेव च ते गृहे । योगमास्थाय संसुप्तो दिवसानेकविंशतिम्
Aku kembali menghilang, lalu sekali lagi hadir—bahkan di dalam rumahmu sendiri. Dengan memasuki samadhi yoga, aku terlelap dalam tidur yang dalam selama dua puluh satu hari.
Verse 20
फिर मैं अन्तर्धान हुआ और पुनः तुम्हारे घरमें आकर योगका आश्रय ले इक्कीस दिनोंतक सोया ।। क्षुधितो मामसूयेथां श्रमाद् वेति नराधिप । एवं बुद्धि समास्थाय कर्शितौ वां क्षुधा मया,नरेश्वर! मैंने सोचा था कि तुम दोनों भूखसे पीड़ित होकर या परिश्रमसे थककर मेरी निन््दा करोगे। इसी उद्देश्यसे मैंने तुमलोगोंको भूखे रखकर क्लेश पहुँचाया
Lalu aku menghilang dan kembali datang ke rumahmu; bersandar pada yoga, aku tidur selama dua puluh satu hari. Wahai raja, aku menyangka bahwa karena lapar atau karena letih oleh kerja, kalian berdua akan mencelaku; dengan maksud itulah aku membiarkan kalian tanpa makanan dan menimpakan derita.
Verse 21
न च ते<भूत् सुसूक्ष्मोडपि मन्युर्मनसि पार्थिव । सभार्यस्य नरश्रेष्ठ तेन ते प्रीतिमानहम्,भूपते! नरश्रेष्ठ) इतनेपर भी स्त्रीसहित तुम्हारे मनमें तनिक भी क्रोध नहीं हुआ। इससे मैं तुमलोगोंपर बहुत संतुष्ट हुआ
Wahai raja, bahkan setitik pun amarah tidak timbul dalam hatimu, meski engkau bersama istrimu. Wahai manusia utama, justru karena pengendalian itulah aku sangat berkenan kepadamu.
Verse 22
भोजनं च समानाय्य यत् तदा दीपितं मया । क्रुद्धयेथा यदि मात्सर्यादिति तन्मर्षितं च मे,इसके बाद जो मैंने भोजन मँगाकर जला दिया, उसमें भी यही उद्देश्य छिपा था कि तुम डाहके कारण मुझपर क्रोध करोगे; परंतु मेरे उस बर्तावको भी तुमने सह लिया
Dan ketika makanan didatangkan lalu kubakar, itu pun menyimpan maksud yang sama: agar karena iri hati engkau marah kepadaku. Namun bahkan perlakuanku itu pun engkau tanggung dengan tabah.
Verse 23
ततो<हं रथमारुह्य त्वामवोचं नराधिप । सभार्यो मां वहस्वेति तच्च त्वं कृतवांस्तथा
Lalu aku naik ke kereta perang dan berkata kepadamu, wahai raja: ‘Bawalah aku bersama istriku.’ Dan engkau melakukan tepat seperti yang kuminta.
Verse 24
धनोत्सर्गेडपि च कृते न त्वां क्रोध: प्रधर्षयत्,प्रीत्यर्थ तव चैतन्मे स्वर्गसंदर्शनं कृतम् । फिर जब मैं तुम्हारा धन लुटाने लगा, उस समय भी तुम क्रोधके वशीभूत नहीं हुए। इन सब बातोंसे मुझे तुम्हारे ऊपर बड़ी प्रसन्नता हुई। राजन! मनुजेश्वर! अतः मैंने पत्नीसहित तुम्हें संतुष्ट करनेके लिये ही इस वनमें स्वर्गका दर्शन कराया है। पुनः: यह सब कार्य करनेका उददेश्य तुम्हें प्रसन्न करना ही था, इस बातको अच्छी तरह जान लो
Bahkan ketika aku mulai merampas hartamu, amarah tidak menguasaimu. Hal itu membuatku sangat berkenan kepadamu. Karena itu, wahai raja, tuan di antara manusia, demi menyenangkanmu—bersama istrimu—aku membuatmu menyaksikan surga di hutan ini. Ketahuilah baik-baik: tujuan dari semua perbuatan ini hanyalah untuk memberimu kepuasan.
Verse 25
ततः प्रीतेन ते राजन् पुनरेतत् कृतं तव । सभार्यस्य वन॑ भूयस्तद् विद्धि मनुजाधिप
Kemudian, wahai Raja, karena berkenan kepadamu, aku melakukan hal ini sekali lagi untukmu. Ketahuilah, wahai penguasa manusia, bahwa hutan ini telah dipulihkan kembali bagi engkau dan istrimu.
Verse 26
यत् ते वने5स्मिन् नृपते दृष्टं दिव्यं निदर्शनम्,नरेश्वर! राजन्! इस वनमें तुमने जो दिव्य दृश्य देखे हैं, वह स्वर्गकी एक झाँकी थी। नृपश्रेष्ठट भूपाल! तुमने अपनी रानीके साथ इसी शरीरसे कुछ देरतक स्वर्गीय सुखका अनुभव किया है
Cyavana berkata: “Wahai raja, penguasa manusia! Pemandangan ilahi yang menakjubkan yang engkau saksikan di hutan ini hanyalah sekelumit kilasan surga. Wahai raja terbaik, bersama permaisurimu, dalam tubuh ini juga engkau telah mengecap kebahagiaan surgawi untuk sesaat. Anggaplah ini sebagai tanda: buah kebajikan dapat dinikmati, namun ia cepat lenyap bila tidak berakar pada dharma.”
Verse 27
स्वर्गोद्देशस्त्वया राजन् सशरीरेण पार्थिव । मुहूर्तमनु भूतो 5सौ सभार्येण नृपोत्तम,नरेश्वर! राजन्! इस वनमें तुमने जो दिव्य दृश्य देखे हैं, वह स्वर्गकी एक झाँकी थी। नृपश्रेष्ठट भूपाल! तुमने अपनी रानीके साथ इसी शरीरसे कुछ देरतक स्वर्गीय सुखका अनुभव किया है
Wahai raja, penguasa bumi! Dalam tubuh ini juga, bersama istrimu, engkau telah mengalami surga selama beberapa saat, wahai raja utama.
Verse 28
निदर्शनार्थ तपसो धर्मस्य च नराधिप । तत्र या55सीत् स्पूृहा राजंस्तच्चापि विदितं मया,नरेश्वर! यह सब मैंने तुम्हें तप और धर्मका प्रभाव दिखलानेके लिये ही किया है। राजन! इन सब बातोंको देखनेपर तुम्हारे मनमें जो इच्छा हुई है, वह भी मुझे ज्ञात हो चुकी है
Wahai penguasa manusia, semua ini kulakukan semata-mata untuk memperlihatkan kepadamu kekuatan serta ukuran sejati tapa dan dharma. Dan wahai raja, kerinduan yang bangkit di hatimu setelah menyaksikan peristiwa-peristiwa ini pun telah kuketahui, wahai penguasa manusia.
Verse 29
ब्राह्म॒ण्यं काड्क्षसे हि त्वं तपश्न पृथिवीपते । अवमन्य नरेन्द्रत्वं देवेन्द्रत्व॑ं च पार्थिव,पृथ्वीनाथ! तुम सम्राट् और देवराजके पदकी भी अवहेलना करके ब्राह्मणत्व पाना चाहते हो और तपकी भी अभिलाषा रखते हो
Wahai penguasa bumi, engkau sungguh mendambakan kedudukan sebagai brāhmaṇa dan juga merindukan tapa. Wahai raja, dengan mengesampingkan bahkan kedaulatan manusia dan kedudukan Indra, engkau mencari brahminhood.
Verse 30
एवमेतद् यथा<<वत्थ व्वं ब्राद्मण्यं तात दुर्लभम् | ब्राह्मणे सति चर्षित्वमृषित्वे च तपस्विता,तात! तप और ब्राह्मणत्वके सम्बन्धमें तुम जैसा उदगार प्रकट कर रहे थे, वह बिलकुल ठीक है। वास्तवमें ब्राह्मणत्व दुर्लभ है। ब्राह्मण होनेपर भी ऋषि होना और ऋषि होनेपर भी तपस्वी होना तो और भी कठिन है
Anakku, tepat seperti yang kaukatakan: brahminhood sejati sukar dicapai. Dan sekalipun seseorang telah menjadi brāhmaṇa, menjadi seorang ṛṣi lebih jarang lagi; dan sekalipun telah menjadi ṛṣi, menjadi pertapa yang sungguh berdisiplin dan menahan diri lebih jarang lagi.
Verse 31
भविष्यत्येष ते काम: कुशिकात् कौशिको द्विज: । तृतीयं पुरुष तुभ्यं ब्राह्मणत्वं गमिष्यति,तुम्हारी यह इच्छा पूर्ण होगी। कुशिकसे कौशिक नामक ब्राह्मणवंश प्रचलित होगा तथा तुम्हारी तीसरी पीढ़ी ब्राह्मण हो जायगी
Hasratmu ini akan terpenuhi. Dari Kuśika akan muncul suatu garis keturunan brāhmaṇa yang dikenal sebagai Kauśika; dan pada generasi ketigamu, keturunanmu akan mencapai brahminhood.
Verse 32
वंशस्ते पार्थिवश्रेष्ठ भूगूणामेव तेजसा । पौत्रस्ते भविता विप्रस्तपस्वी पावकद्युति:,नृपश्रेष्ठ! भूगुवंशियोंके ही तेजसे तुम्हारा वंश ब्राह्मणत्वको प्राप्त होगा। तुम्हारा पौत्र अग्निके समान तेजस्वी और तपस्वी ब्राह्मण होगा
Wahai raja terbaik, melalui kemilau dan daya suci garis Bhṛgu-lah keturunanmu akan mencapai brahminhood. Cucu laki-lakimu akan menjadi seorang brāhmaṇa—seorang pertapa—bercahaya laksana api.
Verse 33
यः स देवमनुष्याणां भयमुत्पादयिष्यति । त्रयाणामेव लोकानां सत्यमेतद् ब्रवीमि ते,तुम्हारा वह पौत्र अपने तपके प्रभावसे देवताओं, मनुष्यों तथा तीनों लोकोंके लिये भय उत्पन्न कर देगा। मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ
Cyavana berkata: “Cucumu itu, dengan daya tapa-pertapaannya, akan menjadi sumber ketakutan bagi para dewa dan manusia—bahkan bagi ketiga dunia. Inilah kebenaran yang kukatakan kepadamu.”
Verse 34
वरं गृहाण राजर्षे यत् ते मनसि वर्तते । तीर्थयात्रां गमिष्यामि पुरा कालो5भिवर्तते,राजर्षे! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसे वरके रूपमें माँग लो। मैं तीर्थयात्राको जाऊँगा। अब देर हो रही है
Cyavana berkata: “Wahai raja-ṛṣi, pilihlah sebuah anugerah—apa pun kehendak yang bersemayam di hatimu. Aku harus berangkat menempuh ziarah ke tīrtha; waktu sudah mendesak.”
Verse 35
कुशिक उवाच एष एव वरो मेडद्य यस्त्व॑ प्रीतो महामुने । भवत्वेतद् यथा5त्थ त्वं भवेत् पौत्रो ममानघ,कुशिकने कहा--महामुने! आज आप प्रसन्न हैं, यही मेरे लिये बहुत बड़ा वर है। अनघ! आप जैसा कह रहे हैं, वह सत्य हो--मेरा पौत्र ब्राह्मण हो जाय
Kuśika berkata: “Inilah satu-satunya anugerah yang kuminta hari ini: semoga engkau, wahai mahāmuni, berkenan. Wahai yang tanpa cela, jadilah tepat seperti yang engkau ucapkan—semoga cucuku menjadi seorang brāhmaṇa.”
Verse 36
ब्राह्माण्यं मे कुलस्यास्तु भगवन्नेष मे वर: । पुनश्चाख्यातुमिच्छामि भगवन् विस्तरेण वै,भगवन्! मेरा कुल ब्राह्मण हो जाय, यही मेरा अभीष्ट वर है। प्रभो! मैं इस विषयको पुनः विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ
Kuśika berkata: “Wahai Bhagavan, semoga garis keturunanku mencapai brāhmaṇya—itulah anugerah yang kuminta. Dan, wahai Tuan, aku ingin mendengar perkara ini sekali lagi, dengan uraian yang lebih luas.”
Verse 37
कथमेष्यति विप्रत्वं कुलं मे भूगुनन्दन । कश्नचासौ भविता बन्धुर्मम कश्चापि सम्मतः,भगुनन्दन! मेरा कुल किस प्रकार ब्राह्मणत्वको प्राप्त होगा? मेरा वह बन्धु, वह सम्मानित पौत्र कौन होगा जो सर्वप्रथम ब्राह्मण होनेवाला है?
Kuśika berkata: “Wahai kebanggaan Bhṛgu, bagaimana garis keturunanku akan mencapai kedudukan brāhmaṇa? Dan siapakah kerabatku itu—seorang keturunan yang terhormat—yang akan menjadi brāhmaṇa pertama?”
Verse 54
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवन और कुशिकका संवादविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikian berakhir bab ke-54 dari bagian Dāna-dharma dalam Anuśāsana Parva Śrī Mahābhārata, yang membahas dialog antara Cyavana dan Kuśika.
Verse 55
इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनकुशिकसंवादो नाम पञ्चपज्चाशत्तमो<ध्याय:
Demikian, dalam Śrī Mahābhārata, pada Anuśāsana Parva—bagian Dāna-dharma—berakhir bab ke-55 yang berjudul “Dialog Cyavana dan Kuśika.”
Verse 236
अविशड्को नरपते प्रीतो5हं चापि तेन ह । नरेन्द्र! इसके बाद मैं रथपर आरूढ़ होकर बोला, तुम स्त्रीसहित आकर मेरा रथ खींचो। नरेश्वर! इस कार्यको भी तुमने नि:शंक होकर पूर्ण किया। इससे भी मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हुआ
Cyavana berkata: “Wahai raja, engkau bertindak tanpa ragu, dan aku pun berkenan karenanya. Lalu aku naik ke keretaku dan berkata, ‘Datanglah kemari bersama istrimu dan tariklah keretaku.’ Wahai penguasa manusia, tugas ini pun engkau selesaikan tanpa gentar dan tanpa bimbang; karena itu juga aku sangat puas kepadamu.”
Verse 256
प्रीत्यर्थ तव चैतन्मे स्वर्गसंदर्शनं कृतम् । फिर जब मैं तुम्हारा धन लुटाने लगा, उस समय भी तुम क्रोधके वशीभूत नहीं हुए। इन सब बातोंसे मुझे तुम्हारे ऊपर बड़ी प्रसन्नता हुई। राजन! मनुजेश्वर! अतः मैंने पत्नीसहित तुम्हें संतुष्ट करनेके लिये ही इस वनमें स्वर्गका दर्शन कराया है। पुनः: यह सब कार्य करनेका उददेश्य तुम्हें प्रसन्न करना ही था, इस बातको अच्छी तरह जान लो
Cyavana berkata: “Penglihatan surga ini kutunjukkan semata-mata untuk menyenangkanmu. Bahkan ketika aku mulai merampas hartamu, engkau tidak dikuasai amarah. Melihat semuanya itu, aku sangat berkenan kepadamu. Karena itu, wahai raja, pemuka manusia, aku membuat engkau—bersama istrimu—menyaksikan surga di hutan ini hanya demi memuaskanmu. Ketahuilah baik-baik: tujuan semua perbuatan ini hanyalah untuk menggembirakanmu.”
He seeks a principled hierarchy of gifts—among socially recognized forms of dāna—asking which is truly ‘superior’ and why certain gifts are said to remain connected to, or ‘follow,’ the donor in moral consequence.
Bhīṣma prioritizes life-protective giving: granting safety (abhaya) and providing relief in adversity, giving valued goods with sincere intent, and supporting disciplined recipients—especially those who do not ask—so that charity becomes a sustained ethical practice akin to sacrifice.
Yes in doctrinal form: it asserts that certain purifying gifts (gold, cows, land) can lift demerit, that dāna frees a person from sin, and that gifts ‘accompany’ the giver—linking intention, recipient, and act to enduring moral and spiritual outcomes.