Adhyaya 170
Anushasana ParvaAdhyaya 17016 Verses

Adhyaya 170

Chapter Arc: शरशय्या पर लेटे भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं—धर्म और अधर्म का प्रवर्तन मनुष्य की बुद्धि में ‘काल’ के प्रवेश से होता है; वही निग्रह और अनुग्रह का अदृश्य नियन्ता है। → भीष्म ‘काल’ की सत्ता बताते हुए एक सूक्ष्म शंका उठाते हैं: यदि सब कुछ काल के अधीन है, तो धर्म-पालन का प्रयोजन क्या? फिर वे दिखाते हैं कि काल कभी धर्म को अधर्म नहीं बना सकता; धर्म का फल देखकर बुद्धि धर्म की ओर दृढ़ होती है, और धार्मिकी आत्म-पूजा (आत्मशुद्धि) ही सच्चा ऐश्वर्य है। → अध्याय का शिखर उस निर्णायक प्रतिपादन में है—‘सर्वेषां तुल्यदेहानां… कालो धर्मेण संयुक्तः’—सबके देह-आत्मा समान हैं; काल जब धर्म से संयुक्त होता है तो वही गुरु-तत्त्व बनकर सबको धर्म की ओर ले जाता है, इसलिए धर्म-सेवन में किसी का जन्माधारित निषेध नहीं। → भीष्म निष्कर्ष देते हैं कि धर्म का कार्य है विशुद्धता और पाप-स्पर्श का अभाव; धर्म विजयावह है और तीनों लोकों के लिए प्रकाश-कारण है। ‘मैं शूद्र हूँ, मुझे अधिकार नहीं’—ऐसी आत्म-हीन मान्यता को वे अस्वीकार करते हैं: धर्म-सेवा में दोष नहीं, और सत्पुरुषों का लोक-मत ही गुरु है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--हू< बक। ] अति्शशा:< चतुःषष्ट्यधिकशततमो< ध्याय: भीष्मका शुभाशु भ कर्मोको ही सुख-दुःखकी प्राप्तिमें कारण हुए धर्मके अनुष्ठानपर जोर देना भीष्म उवाच कार्यते यच्च क्रियते सच्चासच्च कृताकृतम्‌ । तत्राश्वसीत सत्कृत्वा असत्कृत्वा न विश्वसेत्‌,भीष्मजीने कहा--बेटा! मनुष्य जो शुभ और अशुभ कर्म करता या कराता है, उन दोनों प्रकारके कर्मोमेंसे शुभ कर्मका अनुष्ठान करके उसे यह आश्वासन प्राप्त करना चाहिये कि इसका मुझे शुभ फल मिलेगा; किंतु अशुभ कर्म करनेपर उसे किसी अच्छा फल मिलनेका विश्वास नहीं करना चाहिये

Bhishma berkata: Apa pun yang seseorang suruh lakukan, dan apa pun yang ia lakukan sendiri—baik atau buruk, dilakukan atau ditinggalkan—setelah melakukan yang baik hendaknya ia teguh hati, yakin bahwa buah yang baik pasti datang. Namun setelah melakukan yang salah, janganlah ia percaya pada harapan akan hasil yang baik darinya.

Verse 2

काल एव सर्वकाले निग्रहानुग्रहौ ददत्‌ । बुद्धिमाविश्य भूतानां धर्माधर्मो प्रवर्तते,काल ही सदा निग्रह और अनुग्रह करता हुआ प्राणियोंकी बुद्धिमें प्रविष्ट हो धर्म और अधर्मका फल देता रहता है

Bhishma berkata: Waktu semata, pada setiap saat, menganugerahkan pengekangan dan kelapangan. Ia meresap ke dalam budi makhluk hidup, menggerakkan dharma dan adharma, serta terus-menerus membagikan buah keduanya.

Verse 3

तदा त्वस्य भवेद्‌ बुद्धिर्धर्मार्थस्य प्रदर्शनात्‌ । तदाश्वसीत धर्मात्मा दृढबुद्धिर्न विश्वसेत्‌,जब धर्मका फल देखकर मनुष्यकी बुद्धिमें धर्मकी श्रेष्ठताका निश्चय हो जाता है, तभी उसका धर्मके प्रति विश्वास बढ़ता है और तभी उसका मन धर्ममें लगता है। जबतक धर्ममें बुद्धि दृढ़ नहीं होती तबतक कोई उसपर विश्वास नहीं करता

Bhishma berkata: “Ketika tujuan sejati dan buah dharma diperlihatkan kepada seseorang, pengertiannya pun terbangun akan nilai dharma. Saat itu hati yang saleh memperoleh ketenteraman, kepercayaannya kepada dharma bertambah, dan barulah pikirannya menetap dalam dharma. Selama daya pertimbangannya belum teguh, tak seorang pun sungguh menaruh percaya pada dharma.”

Verse 4

एतावन्मात्रमेतद्धि भूतानां प्राज्ञलक्षणम्‌ | कालयुक्तो5प्युभयविच्छेषं॑ युक्त समाचरेत्‌,प्राणियोंकी बुद्धिमत्ताकी यही पहचान है कि वे धर्मके फलमें विश्वास करके उसके आचरणमें लग जायँ। जिसे कर्तव्य-अकर्तव्य दोनोंका ज्ञान है, उस पुरुषको चाहिये कि प्रतिकूल प्रारब्धसे युक्त होकर भी यथायोग्य धर्मका ही आचरण करे

Bhishma berkata: “Inilah tanda kebijaksanaan pada makhluk hidup: mempercayai buah dharma, lalu bersungguh-sungguh menjalankannya. Sekalipun terikat oleh waktu dan nasib yang tidak bersahabat, orang yang mampu membedakan yang patut dilakukan dan yang tidak patut dilakukan hendaknya tetap bertindak tepat—memilih dharma sejauh keadaan mengizinkan.”

Verse 5

यथा ह्ुपस्थितैश्वर्या: प्रजायन्ते न राजसा: । एवमेवात्मना5७त्मानं पूजयन्तीह धार्मिका:,जो अतुल ऐश्वर्यके स्वामी हैं, वे यह सोचकर कि कहीं रजोगुणी होकर पुनः जन्म- मृत्युके चक्‍्करमें न पड़ जाये, धर्मका अनुष्ठान करते हैं और इस प्रकार अपने ही प्रयत्नसे आत्माको महत्‌ पदकी प्राप्ति कराते हैं

Bhishma berkata: “Sebagaimana mereka yang telah memiliki kedaulatan yang mapan tidak mengejar kelahiran kembali melalui upaya yang rajasic (didorong nafsu dan gelora), demikian pula orang-orang saleh di dunia ini memuliakan Sang Diri oleh Sang Diri. Dengan disiplin laku dharma, melalui usaha mereka sendiri, mereka mengangkat batin menuju keadaan yang lebih luhur—berhati-hati agar tidak jatuh lagi ke dalam putaran lahir dan mati karena dominasi rajas.”

Verse 6

न हाधर्मतयाधर्म दद्यात्‌ काल: कथंचन । तस्माद्‌ विशुद्धमात्मानं जानीयाद्‌ धर्मचारिणम्‌,काल किसी तरह धर्मको अधर्म नहीं बना सकता अर्थात्‌ धर्म करनेवालेको दु:ख नहीं दे सकता। इसलिये धर्माचरण करनेवाले पुरुषको विशुद्ध आत्मा ही समझना चाहिये

Bhishma berkata: “Waktu takkan pernah, dengan cara apa pun, mengubah dharma menjadi adharma; ia pun tak mampu menodai pelaku dharma dengan penderitaan. Karena itu, kenalilah orang yang menempuh dharma sebagai pribadi yang jiwanya telah disucikan.”

Verse 7

स्प्रष्टमप्पसमर्थो हि ज्वलन्तमिव पावकम्‌ । अधर्म: संततो धर्म कालेन परिरक्षितम्‌,धर्मका स्वरूप प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी है, काल उसकी सब ओरसे रक्षा करता है। अत: अधर्ममें इतनी शक्ति नहीं है कि वह फैलकर धर्मको छू भी सके

Bhishma berkata: “Adharma bahkan tak berdaya untuk menyentuhnya—laksana mencoba menyentuh api yang menyala-nyala. Dharma senantiasa tegak dan dijaga dari segala sisi oleh Waktu (kāla); maka adharma, betapapun meluas, tak mampu menjangkau apalagi menyentuh dharma.”

Verse 8

कायवितौ हि धर्मेण धर्मो हि विजयावह: । त्रयाणामपि लोकानामालोक: कारणं भवेत्‌,विशुद्ध और पापके स्पर्शका अभाव--ये दोनों धर्मके कार्य हैं। धर्म विजयकी प्राप्ति करानेवाला और तीनों लोकोंमें प्रकाश फैलानेवाला है। वही इस लोककी रक्षाका कारण है

Bhishma berkata: Bila perilaku seseorang ditertibkan oleh dharma, maka dharma itulah yang menjadi pembawa kemenangan. Ia adalah cahaya yang menerangi ketiga dunia, dan menjadi sebab penopang perlindungan di dunia ini—melahirkan kemurnian serta mencegah sentuhan dosa.

Verse 9

नतु वक्षिन्नयेत्‌ प्राज्ञो गृहीत्वैव करे नरम्‌ । उच्यमानस्तु धर्मेण धर्मलोकभयच्छले,कोई कितना ही बुद्धिमान्‌ क्यों न हो, वह किसी मनुष्यका हाथ पकड़कर उसे बलपूर्वक धर्ममें नहीं लगा सकता; किंतु न्यायानुसार धर्ममय तथा लोकभयका बहाना लेकर उस पुरुषको धर्मके लिये कह सकता है

Bhishma berkata: Sekalipun seseorang sungguh bijaksana, ia tak dapat menggenggam tangan seorang manusia dan memaksanya menempuh jalan dharma. Namun, dengan berbicara menurut keadilan—menyebut dharma dan bahkan mengingatkan akan takut pada celaan umum—ia dapat mendorongnya menuju perilaku benar.

Verse 10

शूद्रो5हं नाधिकारो मे चातुराश्रम्यसेवने । इति विज्ञानमपरे नात्मन्युपदधत्युत,मैं शूद्र हूँ, अतः ब्रह्मचर्य आदि चारों आश्रमोंके सेवनका मुझे अधिकार नहीं है--शूद्र ऐसा सोचा करता है, परंतु साधु द्विजगण अपने भीतर छलको आश्रय नहीं देते हैं

Bhishma berkata: “Sebagian orang menaruh kebodohan ini dalam hati: ‘Aku seorang Śūdra; maka aku tidak berhak menjalankan empat āśrama seperti brahmacarya.’ Namun para dvija yang sungguh saleh tidak menampung pembatasan diri yang menipu semacam itu dalam batin mereka.”

Verse 11

विशेषेण च वक्ष्यामि चातुर्वर्ण्यस्य लिड्ल्‍भत: । पज्चभूतशरीराणां सर्वेषां सदृशात्मनाम्‌,अब मैं चारों वर्णोंका विशेषरूपसे लक्षण बता रहा हूँ। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शाद्र --इन चारों वर्णोंके शरीर पञड्च महाभूतोंसे ही बने हुए हैं और सबका आत्मा एक-सा ही है। फिर भी उनके लौकिक धर्म और विशेष धर्ममें विभिन्नता रखी गयी है। इसका उद्देश्य यही है कि सब लोग अपने-अपने धर्मका पालन करते हुए पुनः एकत्वको प्राप्त हों। इसका शास्त्रोंमें विस्तारपूर्वक वर्णन है

Bhishma berkata: “Kini akan kujelaskan secara khusus tanda-tanda tatanan empat varṇa. Tubuh semua—brāhmaṇa, kṣatriya, vaiśya, dan śūdra—tersusun dari lima mahābhūta yang sama, dan Sang Diri (Ātman) di dalamnya pun serupa. Namun perbedaan ditetapkan dalam kewajiban duniawi dan kewajiban khusus, agar dengan setia menjalankan dharma masing-masing, semua makhluk kembali mencapai kesatuan; hal ini diuraikan panjang lebar dalam śāstra.”

Verse 12

लोकथर्मे च धर्मे च विशेषकरणं कृतम्‌ । यथैकत्वं पुनर्यान्ति प्राणिनस्तत्र विस्तर:,अब मैं चारों वर्णोंका विशेषरूपसे लक्षण बता रहा हूँ। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शाद्र --इन चारों वर्णोंके शरीर पञड्च महाभूतोंसे ही बने हुए हैं और सबका आत्मा एक-सा ही है। फिर भी उनके लौकिक धर्म और विशेष धर्ममें विभिन्नता रखी गयी है। इसका उद्देश्य यही है कि सब लोग अपने-अपने धर्मका पालन करते हुए पुनः एकत्वको प्राप्त हों। इसका शास्त्रोंमें विस्तारपूर्वक वर्णन है

Bhishma berkata: Telah ditetapkan pembedaan antara dharma duniawi dan dharma suci. Tujuannya ialah agar makhluk hidup, dengan menunaikan dharma masing-masing, kembali mencapai kesatuan; tentang hal ini śāstra berbicara panjang lebar.

Verse 13

अध्रुवो हि कथं लोक: स्मृतो धर्म: कथं ध्रुव: । यत्र कालो ध्रुवस्तात तत्र धर्म: सनातन:,तात! यदि कहो, धर्म तो नित्य माना गया है, फिर उससे स्वर्ग आदि अनित्य लोकोंकी प्राप्ति कैसे होती है? और यदि होती है तो वह नित्य कैसे है? तो इसका उत्तर यह है कि जब धर्मका संकल्प नित्य होता है अर्थात्‌ अनित्य कामनाओंका त्याग करके निष्कामभावसे धर्मका अनुष्ठान किया जाता है, उस समय किये हुए धर्मसे सनातन लोक [नित्य परमात्मा)-की ही प्राप्ति होती है

Jika dunia-dunia dikenang sebagai tidak kekal, bagaimana dharma disebut kekal? Namun, wahai anakku, di mana Kala (Waktu) sendiri adalah kenyataan yang teguh dan tak meleset, di sanalah dharma bersifat sanātana (abadi).

Verse 14

सर्वेषां तुल्यदेहानां सर्वेषां सदृशात्मनाम्‌ । कालो धर्मेण संयुक्त: शेष एव स्वयं गुरु:,सब मनुष्योंके शरीर एक-से होते हैं और सबका आत्मा भी समान ही है; किंतु धर्मयुक्त संकल्प ही यहाँ शेष रहता है, दूसरा नहीं। वह स्वयं ही गुरु है अर्थात्‌ धर्मबलसे स्वयं ही उदित होता है

Tubuh semua makhluk serupa, dan ātman mereka pun sepadan; namun yang tersisa di sini hanyalah tekad yang bersatu dengan dharma—itulah guru itu sendiri.

Verse 15

एवं सति न दोषो<स्ति भूतानां धर्मसेवने । तिर्यग्योनावषि सतां लोक एव मतो गुरु:,ऐसी दशामें समस्त प्राणियोंके लिये पृथक्‌-पृथक्‌ धर्म-सेवनमें कोई दोष नहीं है। तिर्यग्योनिमें पड़े हुए पशु-पक्षी आदि योनियोंके लिये भी यह लोक ही गुरु (कर्तव्याकर्तव्यका निर्देशक) है

Dalam keadaan demikian, tidak ada cela bagi makhluk-makhluk dalam menjalankan pelayanan dharma masing-masing. Bahkan bagi makhluk baik yang berada dalam kelahiran tiryak (binatang), dunia inilah yang dipandang sebagai guru.

Verse 164

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि धर्मप्रशंसायां चतुःषष्ट्यधिकशततमो<ध्याय:

Demikian berakhir bab ke-164, berjudul “Pujian atas Dharma,” dalam bagian Dāna-dharma pada Anuśāsana Parva dari Śrī Mahābhārata.