
Sukta 9.71
Traditionally attributed in Book 9 to Soma-Pavamāna seers; specific r̥ṣi for 9.71 varies by Anukramaṇī tradition (often listed under Pavitra/Āṅgirasa lineages).
Soma Pavamāna (the self-purifying Soma), with associated powers of Dakṣiṇā and Brahman (mantric force).
Likely Jagatī (common in Soma Pavamāna hymns), pending pada-count verification for this specific mantra.
This Soma-Pavamāna hymn celebrates Soma as he is pressed and filtered, becoming a vigilant, luminous power that protects the rite from distortion (druḥ) and hostile forces (rakṣas). It links Soma’s purification with Dakṣiṇā (right offering/skill) and Brahman (mantric potency), portraying the clarified Soma as clothing himself in radiance and moving toward a secret, divinely prepared “step” or station of light.
Mantra 1
आ दक्षिणा सृज्यते शुष्म्यासदं वेति द्रुहो रक्षसः पाति जागृविः । हरिरोपशं कृणुते नभस्पय उपस्तिरे चम्वोर्ब्रह्म निर्णिजे ॥
दक्षिणा की ताकत चलती है, और वो मज़बूत बनके अपना काम पूरा करने आता है। वो जाग रहा है, और बुरी ताकतों से हमें बचा रहा है। सोम अपनी चमक बनाता है, आसमान जैसी चमक फैला रहा है। दो प्यालों के लिए वो मंत्र की ताकत बिछा रहा है जो सब साफ कर दे।
Mantra 2
प्र कृष्टिहेव शूष एति रोरुवदसुर्यं वर्णं नि रिणीते अस्य तम् । जहाति वव्रिं पितुरेति निष्कृतमुपप्रुतं कृणुते निर्णिजं तना ॥
वो आगे बढ़ता है जैसे कोई जीतने वाला खिलाड़ी, और ज़ोर से आवाज़ करके अंधेरा हटा देता है। वो पुरानी पिछड़ी हुई चीज़ छोड़ देता है, और पिता के घर की तरफ जाता है। अपनी ताकत से वो अपना नया रूप बनाता है, और साफ चमकदार कपड़ा पहन लेता है।
Mantra 3
अद्रिभिः सुतः पवते गभस्त्योर्वृषायते नभसा वेपते मती । स मोदते नसते साधते गिरा नेनिक्ते अप्सु यजते परीमणि ॥
पत्थरों से निचोड़ा हुआ सोम हाथों में बहता है। वो मज़बूत होता जाता है, और आसमान जैसी ताकत से सोच को जाग उठाता है। वो खुश होता है, पास आता है, और शब्दों से काम पूरा करता है। पानी में नहाके वो अपनी पूजा करता है।
Mantra 4
परि द्युक्षं सहसः पर्वतावृधं मध्वः सिञ्चन्ति हर्म्यस्य सक्षणिम् । आ यस्मिन्गावः सुहुताद ऊधनि मूर्धञ्छ्रीणन्त्यग्रियं वरीमभिः ॥
चमकने वाले सोम के आस-पास वो मधुर रस डालते हैं, जो पहाड़ जैसी ताकत से बड़ा है। घर की जगह पर वो मीठा रस डालती है। उसमें गायें अपना दूध देती हैं, जो अच्छी तरह से दिया गया है। वो अपने सिर पर सबसे ऊपर वाली चमक मिला देती हैं।
Mantra 5
समी रथं न भुरिजोरहेषत दश स्वसारो अदितेरुपस्थ आ । जिगादुप ज्रयति गोरपीच्यं पदं यदस्य मतुथा अजीजनन् ॥
दस बहन मिलकर उसे आगे बढ़ा रहे हैं, जैसे कोई बड़ा रथ चलाया जा रहा हो। यह दस बहन अदिति की गोद में हैं। वो आता है और आगे बढ़ता है, चमक की छुपी जगह तक। रिशियों ने उसके लिए वो रास्ता बनाया है जो छुपा था।
Mantra 6
श्येनो न योनिं सदनं धिया कृतं हिरण्ययमासदं देव एषति । ए रिणन्ति बर्हिषि प्रियं गिराश्वो न देवाँ अप्येति यज्ञियः ॥
वो बाज़ की तरह अपना आशियाना ढूंढ़ता है, जो सोच से बनाया गया है। वो सोना जैसी जगह चाहता है। लोग उसे पूजा के घास पर बिठा देते हैं और प्यारे शब्द बोलते हैं। वो तेज़ घोड़े की तरह भगवान के पास जाता है, क्योंकि यह बलि के लायक है।
Mantra 7
परा व्यक्तो अरुषो दिवः कविर्वृषा त्रिपृष्ठो अनविष्ट गा अभि । सहस्रणीतिर्यतिः परायती रेभो न पूर्वीरुषसो वि राजति ॥
वो दिखने लगता है, आसमान का जो चमकता है और बड़ा बलवान है। वो तीन पीठ वाला है, किरणों को ढूंढ़ता हुआ। वो हज़ार रास्तों से आगे बढ़ता है। गाने वाले की तरह वो सारी सुबहों में चमकता है जो पहले गुज़र चुकी हैं।
Mantra 8
त्वेषं रूपं कृणुते वर्णो अस्य स यत्राशयत्समृता सेधति स्रिधः । अप्सा याति स्वधया दैव्यं जनं सं सुष्टुती नसते सं गोअग्रया ॥
वो अपना रूप चमकदार बनाता है, उसका रंग तेज़ हो जाता है। जहाँ वो लेटा है, वहाँ से बुराई को भगाता है। वो पानी में अपने नियम से भगवान के लोगों के पास जाता है। अच्छी तारीफ के साथ आता है और सबसे पहले किरणों के साथ मिल जाता है।
Mantra 9
उक्षेव यूथा परियन्नरावीदधि त्विषीरधित सूर्यस्य । दिव्यः सुपर्णोऽव चक्षत क्षां सोमः परि क्रतुना पश्यते जाः ॥
वो बैल की तरह झुंड के साथ चलता है और आवाज़ निकालता है। उसकी चमक सूरज पर चमकने लगती है। एक उड़ने वाली शक्ति धरती को देखती है। सोम अपनी इच्छा से देखता है कि सब जानवर और लोग कैसे पैदा हो रहे हैं।
It praises Soma while he is being purified through the filter, describing him as a bright, powerful force that protects the ritual and turns the offering into divine strength and clarity.
Dakṣiṇā represents the right, effective act of offering (and the sacred fee that completes the rite), while Brahman is the mantra-power. The hymn says Soma’s purification works through both: correct action and potent speech.
In ritual terms it is Soma’s destined station reached through proper pressing and filtering. In inner terms it suggests a secret level of clarity or light that becomes accessible when the mind and speech are purified.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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