Sukta 9.71
परि द्युक्षं सहसः पर्वतावृधं मध्वः सिञ्चन्ति हर्म्यस्य सक्षणिम् । आ यस्मिन्गावः सुहुताद ऊधनि मूर्धञ्छ्रीणन्त्यग्रियं वरीमभिः ॥
pári dyukṣáṁ sáhasaḥ parvatā́vṛdhaṁ mádhvaḥ siñcanti hármyasya sakṣáṇim | ā yásmin gā́vaḥ suhútāda ū́dhani mūrdhán śrīṇanty agriyáṁ várīmabhiḥ ||
चमकने वाले सोम के आस-पास वो मधुर रस डालते हैं, जो पहाड़ जैसी ताकत से बड़ा है। घर की जगह पर वो मीठा रस डालती है। उसमें गायें अपना दूध देती हैं, जो अच्छी तरह से दिया गया है। वो अपने सिर पर सबसे ऊपर वाली चमक मिला देती हैं।
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