
Sukta 8.70
This hymn is a vigorous praise-invocation of Indra as the sovereign of peoples and the undefeated champion who overcomes every battle and destroys Vṛtra. It calls him as the ever-available power to be invoked in near and far places—"in the depths" and "in the reaches"—for victory, strength, and generous giving. The closing verse also preserves a patron-style remembrance (Karṇagṛhyā), linking Indra’s bounty to concrete gifts and ritual prosperity.
Mantra 1
यो राजा चर्षणीनां याता रथेभिरध्रिगुः । विश्वासां तरुता पृतनानां ज्येष्ठो यो वृत्रहा गृणे ॥
मैं उसका नाम ले रहा हूँ जो सभी लोगों का राजा है। वो रथ ले के आता है और कभी हिलता नहीं। वो हर लड़ाई जीतता है, सबसे बड़ा बलवान है। वो दुश्मन को मारता है, मैं उसी इंद्र की बात कर रहा हूँ।
Mantra 2
इन्द्रं तं शुम्भ पुरुहन्मन्नवसे यस्य द्विता विधर्तरि । हस्ताय वज्रः प्रति धायि दर्शतो महो दिवे न सूर्यः ॥
इंद्र को तैयार करो, वो बहुत दुश्मनों को मारता है। उसकी दोनों हाथों में वज्र है, बिजली जैसा हथियार। वो दिखाई देता है, बड़ा है, जैसे आसमान में सूरज चमक रहा हो। वो चमकता हुआ बलवान है।
Mantra 3
नकिष्टं कर्मणा नशद्यश्चकार सदावृधम् । इन्द्रं न यज्ञैर्विश्वगूर्तमृभ्वसमधृष्टं धृष्ण्वोजसम् ॥
कोई भी सिर्फ अपने काम से उस तक नहीं पहुँच सकता। उसने सबको बढ़ते रहने बनाया है। इंद्र को यज्ञ से डील करके नहीं मनाया जा सकता। वो सबकी तारीफ सुनता है, बलवान है, कोई उसको हरा नहीं सकता। उसमे बहुत ताकत है।
Mantra 4
अषाळ्हमुग्रं पृतनासु सासहिं यस्मिन्महीरुरुज्रयः । सं धेनवो जायमाने अनोनवुर्द्यावः क्षामो अनोनवुः ॥
जब वो पैदा होता है, वो हर लड़ाई जीतने वाला होता है। तब बड़ी ताकत एक साथ उठती है। सब शक्तियाँ मिलकर बहने लगती हैं। आसमान और धरती दोनों गूँजने लगते हैं और आगे बढ़ने लगते हैं।
Mantra 5
यद्द्याव इन्द्र ते शतं शतं भूमीरुत स्युः । न त्वा वज्रिन्त्सहस्रं सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी ॥
अगर इंद्र के लिए सौ आसमान हों, और सौ धरतियाँ भी। फिर भी, वज्र वाले इंद्र, हज़ारों सूरज भी तुम्हारे बराबर नहीं होंगे। न ही वो आठ दुनिया तुम्हारे सामने कुछ हैं।
Mantra 6
आ पप्राथ महिना वृष्ण्या वृषन्विश्वा शविष्ठ शवसा । अस्माँ अव मघवन्गोमति व्रजे वज्रिञ्चित्राभिरूतिभिः ॥
इंद्र ने अपनी बड़ी ताकत से सब जगह फैल गया है। वो सबसे ज़्यादा बलवान है। मगवन, तुम्हारा काम है हमें बचाना। हमारी गायों वाली जगह पर हमें सुरक्षित रखना। तुम्हारे पास वज्र है और तुम्हारे पास कई तरह की मदद है।
Mantra 7
न सीमदेव आपदिषं दीर्घायो मर्त्यः । एतग्वा चिद्य एतशा युयोजते हरी इन्द्रो युयोजते ॥
जो इंसान भगवान की तरफ नहीं जाता, वो लंबी ज़िन्दगी नहीं पा सकता। लेकिन जो तेज़ी से चल सकता है, वो अपनी दो ताकतों को जोड़ सकता है। इंद्र उन दोनों को साथ में चलाता है।
Mantra 8
तं वो महो महाय्यमिन्द्रं दानाय सक्षणिम् । यो गाधेषु य आरणेषु हव्यो वाजेष्वस्ति हव्यः ॥
हम इंद्र को बुला रहे हैं क्योंकि वो बड़ा है और बड़ी चीज़ें कर सकता है। वो देना जानता है और काम पूरा करता है। नदियों में भी, दूर की जगह में भी लोग उसे बुलाते हैं। जब ताकत की बात आती है, वो सबसे ऊपर है।
Mantra 9
उदू षु णो वसो महे मृशस्व शूर राधसे । उदू षु मह्यै मघवन्मघत्तय उदिन्द्र श्रवसे महे ॥
हे वसु, हमारे लिए उठो और बड़ा काम करो। हे सूरमा, हमारी ताकत बढ़ा दो। हे मगवन, हमें भी दो और बड़ा बना दो। इंद्र, तुम्हारी बड़ाई हो और तुम्हारा नाम बड़ा हो।
Mantra 10
त्वं न इन्द्र ऋतयुस्त्वानिदो नि तृम्पसि । मध्ये वसिष्व तुविनृम्णोर्वोर्नि दासं शिश्नथो हथैः ॥
इंद्र, तुम धरम के साथ चलते हो। जो लोग तुम्हारी ताकत को नहीं मानते, उनको तुम चुप कर देते हो। बीच में रहो, तुम्हारी ताकत बड़ी है। तुम अंधेरी ताकतों को मार देते हो और उनको नीचे गिरा देते हो।
Mantra 11
अन्यव्रतममानुषमयज्वानमदेवयुम् । अव स्वः सखा दुधुवीत पर्वतः सुघ्नाय दस्युं पर्वतः ॥
जो लोग अलग धरम मानते हैं, इंसान नहीं, पूजा नहीं करते, भगवान को मानते नहीं, ऐसे लोग को अपना दोस्त गिरा दे। पहाड़ जैसी ताकत उनको हटा दे, दुश्मन को मारने के लिए। पहाड़ उनको हटा दे।
Mantra 12
त्वं न इन्द्रासां हस्ते शविष्ठ दावने । धानानां न सं गृभायास्मयुर्द्विः सं गृभायास्मयुः ॥
इंद्र, तुम सबसे बलवान हो। तुम्हारा हाथ हमें देने के लिए है। जैसे अनाज एक साथ पकड़ा जाता है, वैसे ही हम सब को एक साथ जोड़ो, तुम्हे चाहते हुए। फिर से हम सब को एक साथ जोड़ो, तुम्हे चाहते हुए।
Mantra 13
सखायः क्रतुमिच्छत कथा राधाम शरस्य । उपस्तुतिं भोजः सूरिर्यो अह्रयः ॥
दोस्तों, सोचो कि क्या करना है। देखो सारा का काम कैसे पूरा करते हैं। भोजा जो है, वो अच्छा मालिक है, वो पूजा करता है, और काम में ढीला नहीं है।
Mantra 14
भूरिभिः समह ऋषिभिर्बर्हिष्मद्भिः स्तविष्यसे । यदित्थमेकमेकमिच्छर वत्सान्पराददः ॥
बहुत सारे रिशि एक जगह आएंगे, जो पूजा करते हैं, वो तुम्हारी तारीफ करेंगे। जब तुमने एक-एक करके उनको ढूंढा, सारा, तब तुमने बच्चों को ले लिया।
Mantra 15
कर्णगृह्या मघवा शौरदेव्यो वत्सं नस्त्रिभ्य आनयत् । अजां सूरिर्न धातवे ॥
कर्णगृह्य नाम का इंसान जो बड़ा दाता था, वो तीन जगह से हमारे लिए बच्चा लाया। उसने बकरी लाई, जैसे कोई अच्छा मालिक अपने लोगों के लिए कुछ लाता है।
Indra is proclaimed as king of peoples and the eldest in power, arriving with steadfast chariots and destined to conquer battles (8.70.1).
The hymn expands Indra’s invocability and reach—callable in fordable depths and far places—and ties his presence to vāja (force, plenitude) and dāna (giving) (e.g., 8.70.8).
Indra’s identity as universal battle-overcomer and Vṛtra-slayer becomes the decisive assurance: obstruction will be broken and victory secured when he is praised and invoked.
A concrete, patron-like remembrance (Karṇagṛhyā) closes the hymn by anchoring Indra’s bounty in tangible gains (calf/goat), sealing the prayer with prosperity and establishment (8.70.15).
yo vṛtrahā gṛṇe
तं वो महो महाय्यमिन्द्रं दानाय सक्षणिम् । यो गाधेषु य आरणेषु हव्यो वाजेष्वस्ति हव्यः ॥कर्णगृह्या मघवा शौरदेव्यो वत्सं नस्त्रिभ्य आनयत् । अजां सूरिर्न धातवे ॥It praises Indra as the supreme power who wins battles, breaks obstruction (Vṛtra), and grants strength, protection, and gifts to those who invoke him.
It means Indra is not limited by place or situation—he can be called in difficult, uncertain, or distant circumstances, and he brings vāja (effective power) there too.
Karṇagṛhyā appears as a patron-like figure remembered for bringing tangible gifts (like a calf and a goat). The mention links Indra’s blessing with real prosperity and successful establishment.
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