
Sukta 7.83
Vasiṣṭha
Indra–Varuṇa (dual)
Triṣṭubh
This hymn invokes Indra–Varuṇa as a united power of victory and right order, praising their aid to Sudās and the Tṛtsus in the famed battle against the Ten Kings. It remembers how they break Vṛtra-like obstructions and Dāsa resistances, then turns the historical victory into a prayer for inner and outer prosperity, truth-guided light, and wide peace.
Mantra 1
युवां नरा पश्यमानास आप्यं प्राचा गव्यन्तः पृथुपर्शवो ययुः । दासा च वृत्रा हतमार्याणि च सुदासमिन्द्रावरुणावसावतम् ॥
आप दोनों बलवान, सही पानी देख के आगे बढ़े। किरणों की तलाश में चले, बड़ी ताकत लेकर। दुश्मनों की रुकावटें तोड़ डाली, वृत्र जैसी बाधाएँ हटा दी। सुदास के लिए मदद की, और अच्छे लोगों के लिए सहायता दी।
Mantra 2
यत्रा नरः समयन्ते कृतध्वजो यस्मिन्नाजा भवति किं चन प्रियम् । यत्रा भयन्ते भुवना स्वर्दृशस्तत्रा न इन्द्रावरुणाधि वोचतम् ॥
जहाँ लड़ने वाले लोग अपने झंडे ले कर इकट्ठे होते हैं, वहाँ किसी को भी यह पसंद नहीं आता। वहाँ दुनिया भी काँप जाती है जो आसमान को देख सकती है। वहाँ से ऊपर बैठ के इंद्र और वरुण हमारे लिए सही रास्ता बताना। हमें ऐसा शब्द दो जो हमें ठीक करके चलाए।
Mantra 3
सं भूम्या अन्ता ध्वसिरा अदृक्षतेन्द्रावरुणा दिवि घोष आरुहत् । अस्थुर्जनानामुप मामरातयोऽर्वागवसा हवनश्रुता गतम् ॥
ज़मीन के किनारे हिलने लगे जैसे सब एक हो गया हो। इंद्र और वरुण, तुम्हारी आवाज़ आसमान तक पहुँच गई। लोगों में से दुश्मन लोग मेरे खिलाफ उठ खड़े हुए। तुम लोग जल्दी आओ और मदद करो, तुम जो पुकार सुनते हो। हमें अंदर से ठीक करके बना दो।
Mantra 4
इन्द्रावरुणा वधनाभिरप्रति भेदं वन्वन्ता प्र सुदासमावतम् । ब्रह्माण्येषां शृणुतं हवीमनि सत्या तृत्सूनामभवत्पुरोहितिः ॥
इंद्र और वरुण, तुमने अपनी ताकत से दुश्मन की दीवार तोड़ दी जो कोई नहीं तोड़ सकता था। तुमने सुदास की मदद की और उसे आगे बढ़ाया। इन लोगों के मंत्रो को सुनो जब वो हवन कर रहे हैं। तृत्सु के लिए सच्चा मार्ग दर्शक बन गया जो आगे चलके उन्हे ले गया।
Mantra 5
इन्द्रावरुणावभ्या तपन्ति माघान्यर्यो वनुषामरातयः । युवं हि वस्व उभयस्य राजथोऽध स्मा नोऽवतं पार्ये दिवि ॥
इंद्र और वरुण, दुश्मन लोग हमारी कमाई और हमारी अच्छी ग्रोथ को जला रहे हैं। तुम दोनों तरफ के धन के राजा हो, अंदर और बाहर दोनों की। इसलिए हमारी रक्षा करो ऊपर वाली दुनिया में जहाँ सच्चा धन रखा है।
Mantra 6
युवां हवन्त उभयास आजिष्विन्द्रं च वस्वो वरुणं च सातये । यत्र राजभिर्दशभिर्निबाधितं प्र सुदासमावतं तृत्सुभिः सह ॥
दोनों तरफ के लोग तुम्हे पुकारते हैं लड़ाई में, इंद्र और वरुण, धन के मालिक। दस राजाओं ने मिल कर सुदास को दबाने की कोशिश की। तुमने तृत्सु के साथ मिल कर उसे आगे निकाला। तुमने दबाव के बीच में आत्मा की ताकत उठा दी।
Mantra 7
दश राजानः समिता अयज्यवः सुदासमिन्द्रावरुणा न युयुधुः । सत्या नृणामद्मसदामुपस्तुतिर्देवा एषामभवन्देवहूतिषु ॥
दस राजा मिल के भी सुदास से नहीं लड़ सकते थे। इंद्र और वरुण सुदास के साथ खड़े थे। जो लोग सच बोलते हैं और घर बैठे हैं, उनकी बात का असर होता है। भगवान उनकी पूजा में आते हैं। सच्चाई भगवान को बुलाती है।
Mantra 8
दाशराज्ञे परियत्ताय विश्वतः सुदास इन्द्रावरुणावशिक्षतम् । श्वित्यञ्चो यत्र नमसा कपर्दिनो धिया धीवन्तो असपन्त तृत्सवः ॥
दस राजा चारों तरफ से घेर के मारना चाहते थे। लेकिन इंद्र और वरुण ने सुदास को सीख दी और ताकत भी। जहाँ त्रित्सु रिशि झुक के पूजा करते हैं, वहाँ अंदर की ताकत बाहर आती है। उनके दिमाग में जो सोच है, वो काम आती है।
Mantra 9
वृत्राण्यन्यः समिथेषु जिघ्नते व्रतान्यन्यो अभि रक्षते सदा । हवामहे वां वृषणा सुवृक्तिभिरस्मे इन्द्रावरुणा शर्म यच्छतम् ॥
इंद्र दुश्मन को तोड़ देता है लड़ाई में। वरुण धरम की रक्षा करता है। हम दोनों को बुलाते हैं अच्छे शब्दों से। हमें शांति और सुरक्षा दो। जहाँ हम मन शांत रख के आगे बढ़ सकें।
Mantra 10
अस्मे इन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा द्युम्नं यच्छन्तु महि शर्म सप्रथः । अवध्रं ज्योतिरदितेॠतावृधो देवस्य श्लोकं सवितुर्मनामहे ॥
इंद्र, वरुण, मित्र और अर्यमान हमें बरकत दें। बड़ी शांति और खुशी दें। अदिति का जो उजाला है, वो सच से बढ़ता है। हम सविता भगवान के बारे में सोचते हैं जो हमें सही रास्ता दिखाते हैं।
Indra–Varuṇa are praised as strong, forward-moving powers who perceive and restore the ‘right waters’ and strike down obstructing forces.
The hymn links cosmic victory (over Vṛtra-like coverings) with historical remembrance: their decisive aid to Sudās and the Tṛtsus amid intense pressure and rivalry.
The turning point is the rescue and ‘bringing forward’ of Sudās when hemmed in by the Ten Kings—victory granted by the dual gods in the heart of constraint.
It widens into a universal benediction: Indra–Varuṇa with Mitra and Aryaman grant luminous plenitude and vast peace, while Aditi’s unfallen light and Savitṛ’s inspired utterance are contemplated.
युवां नरा पश्यमानास आप्यं प्राचा गव्यन्तः पृथुपर्शवो ययुः । दासा च वृत्रा हतमार्याणि च सुदासमिन्द्रावरुणावसावतम् ॥युवां हवन्त उभयास आजिष्विन्द्रं च वस्वो वरुणं च सातये । यत्र राजभिर्दशभिर्निबाधितं प्र सुदासमावतं तृत्सुभिः सह ॥avadhraṃ jyotir aditeḥ
It praises Indra–Varuṇa as powers of victory and right order, remembering how they helped Sudās and the Tṛtsus in the conflict with the Ten Kings, and it ends with a prayer for light, prosperity, and peace.
Indra represents conquering force that breaks obstacles, while Varuṇa represents ṛta—truth and lawful order. Together they signify victory that is guided by righteousness, not mere aggression.
Beyond history, the battle can be read as an inner struggle: Indra–Varuṇa help the seeker overcome constriction and confusion while staying aligned with truth, leading to ‘unfallen light’ and a broad peace.
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