Opening the text

Sukta 6.48
Bharadvāja Bārhaspatya
Agni (Jātavedas)
Gāyatrī (probable for 6.48 opening; requires metrical verification)
This hymn chiefly exalts Agni Jātavedas as the ever-renewed recipient of sacrifice, praised “offering by offering” and “word by word,” who brings skill (dakṣa), harmony, and auspicious forward movement to the worshipper. Along the way it widens into a cosmic-ritual vision: inspiration that nourishes the Marut-host and a concluding reflection on the unique, once-for-all founding of heaven and earth and the primal milking of nourishment from the Mother principle (Pṛśnī). The purpose is to establish Agni as the mediating friend and immortal knower who carries the rite, protects, and aligns human action with the first ordering of the world.
Mantra 1
यज्ञायज्ञा वो अग्नये गिरागिरा च दक्षसे । प्रप्र वयममृतं जातवेदसं प्रियं मित्रं न शंसिषम् ॥
हर यज्ञ में हम अग्नि को पुकारते हैं, हर शब्द से उसकी तारीफ करते हैं। वो हमें सही काम करने की ताकत देता है। वो अमर है, सब कुछ जानता है, और दोस्त की तरह प्यारा है। हम उसकी बात आगे बढ़ाते रहते हैं।
Mantra 2
ऊर्जो नपातं स हिनायमस्मयुर्दाशेम हव्यदातये । भुवद्वाजेष्वविता भुवद्वृध उत त्राता तनूनाम् ॥
हम ताकत के बेटे अग्नि को अपना प्यार देके बुलाते हैं। वो हमारी पूजा कबूल करता है। वो हमारे काम आता है, हमारी ताकत बढ़ाता है, और हमारी जान बचाता है।
Mantra 3
वृषा ह्यग्ने अजरो महान्विभास्यर्चिषा । अजस्रेण शोचिषा शोशुचच्छुचे सुदीतिभिः सु दीदिहि ॥
अग्नि, तुम एक बड़े बलवान बैल हो। तुम कभी बूढ़े नहीं होते। तुम अपनी आग से चमक रहे हो। तुम्हारी आग कभी नहीं बुझती। तुम साफ हो और हमेशा जलते हो। हमें भी अपनी आग से रोशनी दो।
Mantra 4
महो देवान्यजसि यक्ष्यानुषक्तव क्रत्वोत दंसना । अर्वाचः सीं कृणुह्यग्नेऽवसे रास्व वाजोत वंस्व ॥
अग्नि, तुम बड़े भगवानों की पूजा करते हो। तुम उनको सही तरीके से भोग लगाते हो। अपनी शक्ति से तुम देवताओं को यहाँ बुला लाओ। हमें मदद दो और शक्ति दो। जो चाहिए वो पाने में मदद करो।
Mantra 5
यमापो अद्रयो वना गर्भमृतस्य पिप्रति । सहसा यो मथितो जायते नृभिः पृथिव्या अधि सानवि ॥
पानी, पत्थर और पेड़ इसको खिलाते हैं। यह सच का बच्चा है। जब लोग इसको हिलाते हैं तब यह पैदा होता है। यह धरती के ऊपर उगता है।
Mantra 6
आ यः पप्रौ भानुना रोदसी उभे धूमेन धावते दिवि । तिरस्तमो ददृश ऊर्म्यास्वा श्यावास्वरुषो वृषा श्यावा अरुषो वृषा ॥
उसने दुनिया और आसमान दोनों को अपनी रोशनी से भर दिया। वो धुआँ लेकर आसमान में दौड़ता है। अंधेरे के पार वो दिखता है। लहरों में, काले पानी में, वो लाल बैल चमकता है।
Mantra 7
बृहद्भिरग्ने अर्चिभिः शुक्रेण देव शोचिषा । भरद्वाजे समिधानो यविष्ठ्य रेवन्नः शुक्र दीदिहि द्युमत्पावक दीदिहि ॥
अग्नि, तुम्हारी बड़ी आग चमक रही है। तुम भरद्वाज रिशियों के यहाँ जल रहे हो। तुम सबसे यंग हो। हमें रोशनी दो। तुम चमक रहे हो और साफ कर रहे हो। हमें भी रोशनी दो।
Mantra 8
विश्वासां गृहपतिर्विशामसि त्वमग्ने मानुषीणाम् । शतं पूर्भिर्यविष्ठ पाह्यंहसः समेद्धारं शतं हिमाः स्तोतृभ्यो ये च ददति ॥
अग्नि, तुम सब लोगों के घर के मालिक हो। तुम इंसानी दुनिया का मेन रक्षक हो। तुम सबसे छोटे हो, और तुम्हारे पास सौ किले हैं। जो तुम्हे जलाता है, उसको बुरी चीज़ों से बचा लो। सौ साल तक उसको सुरक्षित रखना। जो लोग गाते हैं और जो दान देते हैं, उनको भी बचाना।
Mantra 9
त्वं नश्चित्र ऊत्या वसो राधांसि चोदय । अस्य रायस्त्वमग्ने रथीरसि विदा गाधं तुचे तु नः ॥
अग्नि, तुम्हारी मदद चमकदार है। हमें आगे बढ़ने का रास्ता दिखाओ। तुम वसु हो, मतलब तुम अच्छे हो। इस धन का तुम रथ चलाने वाले हो। हमें मुश्किल से निकाल के सही रास्ता दिखाओ। हमें पक्का और सही घाट मिल जाए।
Mantra 10
पर्षि तोकं तनयं पर्तृभिष्ट्वमदब्धैरप्रयुत्वभिः । अग्ने हेळांसि दैव्या युयोधि नोऽदेवानि ह्वरांसि च ॥
हमारे बच्चों को और हमारी आने वाली पीढ़ी को साफ-साफ पहुँचा देना। तुम्हारी रक्षा कभी कम नहीं होती, कभी रुकती नहीं है। अग्नि, भगवान की तरफ से आने वाली तकलीफ हटा दो। जो बुरी ताकें देवताओं की नहीं हैं, उनको भी दूर कर दो।
Mantra 11
आ सखायः सबर्दुघां धेनुमजध्वमुप नव्यसा वचः । सृजध्वमनपस्फुराम् ॥
आओ दोस्तो, गाय को जोड़ो जो अच्छा दूध देती है। नए शब्दों के साथ पास आओ। ऐसा बोलना शुरू करो जो कभी नहीं रुके। जो बात सीधी चलती रहे, बिना रुके।
Mantra 12
या शर्धाय मारुताय स्वभानवे श्रवोऽमृत्यु धुक्षत । या मृळीके मरुतां तुराणां या सुम्नैरेवयावरी ॥
वह शक्ति मरुत के लिए है, जो खुद से चमकने वाले हैं। वह ऐसी कीर्ति निकालती है जो मौत को हराती है। मरुत जो तेज़ हैं, उनकी कृपा यही है। यह आशीर्वाद से अच्छा रास्ता लाती है। यही शक्ति बहने दो।
Mantra 13
भरद्वाजायाव धुक्षत द्विता । धेनुं च विश्वदोहसमिषं च विश्वभोजसम् ॥
भरद्वाज के लिए, एक गाय का दूध दोबारा-दोबारा निकालो। वो गाय सब चीज़ें देती है। उससे जो शक्ति मिलती है वो सबको खिलाती है। ऐसे ही दान करते रहो।
Mantra 14
तं व इन्द्रं न सुक्रतुं वरुणमिव मायिनम् । अर्यमणं न मन्द्रं सृप्रभोजसं विष्णुं न स्तुष आदिशे ॥
मैं उसकी स्तुति करता हूँ तुम्हारे लिए। वो इंद्र जैसा बलवान है, वरुण जैसा होशियार है, अर्यमन जैसा खुश रखता है, और विष्णु जैसा सब संभालता है। उसको फॉलो करो, वो रास्ता दिखाता है।
Mantra 15
त्वेषं शर्धो न मारुतं तुविष्वण्यनर्वाणं पूषणं सं यथा शता । सं सहस्रा कारिषच्चर्षणिभ्य आँ आविर्गूळ्हा वसू करत्सुवेदा नो वसू करत् ॥
पूषण इतनी ताकत वाला है जैसे मरुत सेना है। वो हमारे लिए धन इकट्ठा करे, सौ में भी, हज़ार में भी। वो छुपी हुई दौलत निकाल के लाए। वो सच्ची दौलत हमें दे।
Mantra 16
आ मा पूषन्नुप द्रव शंसिषं नु ते अपिकर्ण आघृणे । अघा अर्यो अरातयः ॥
हे पूषण, मेरे पास आ जा, जल्दी आ। मैं तुम्हारी तारीफ करना चाहता हूँ। तुम ध्यान से सुनो, चमकते हो। जो लोग बुराई करते हैं वो गलत हैं।
Mantra 17
मा काकम्बीरमुद्वृहो वनस्पतिमशस्तीर्वि हि नीनशः । मोत सूरो अह एवा चन ग्रीवा आदधते वेः ॥
उस पेड़ को मत काटो, वो ज़रूरी है। बुरी ताकतें लोगों को बिखेर देती हैं। कोई यह न कहे कि दिन है और फाँसी डाल दे। झूठी बात से मत फंसो।
Mantra 18
दृतेरिव तेऽवृकमस्तु सख्यम् । अच्छिद्रस्य दधन्वतः सुपूर्णस्य दधन्वतः ॥
पूषन से दुआ है कि तुम्हारी दोस्ती कभी ना टूटे। जैसे कोई पक्का दोस्त होता है, बिल्कुल साफ दिल से, वैसे ही यह रिश्ता हो। कोई दाग ना हो, कोई टूट ना हो। ऐसा दोस्त जो पक्का हो, जिसका दिल भरा हो, उसकी तरह यह साथ भी पक्का रहे। यह साथ रास्ते में साथ देगा।
Mantra 19
परो हि मर्त्यैरसि समो देवैरुत श्रिया । अभि ख्यः पूषन्पृतनासु नस्त्वमवा नूनं यथा पुरा ॥
हे पूषन, तू इंसान के पल्ले से बहुत आगे है। तू देवताओं के बराबर है, और तेरी चमक भी अलग है। हमें देख, हम पे नज़र रख। जब भी लड़ाई होती है, हमारा साथ दे। जैसे पहले करता था, वैसे ही अब भी करो।
Mantra 20
वामी वामस्य धूतयः प्रणीतिरस्तु सूनृता । देवस्य वा मरुतो मर्त्यस्य वेजानस्य प्रयज्यवः ॥
हे मरुत, तुम्हारी हरकतें हमें सही रास्ता दिखाएं। जो बात तुम कहो वो सच हो, जैसे रोशनी हो। चाहे देवता हो या इंसान जो आगे बढ़ रहा हो, तुम उसकी पूजा के लायक हो। उसको पक्का करो।
Mantra 21
सद्यश्चिद्यस्य चर्कृतिः परि द्यां देवो नैति सूर्यः । त्वेषं शवो दधिरे नाम यज्ञियं मरुतो वृत्रहं शवो ज्येष्ठं वृत्रहं शवः ॥
जल्दी चलता है वो शक्ति, जैसे सूरज आसमान में घूमे बिना रुके। मरुत लोग ने अपने में एक ताकत रखी है। यह ताकत बड़ी है, यज्ञ के लायक है। यह दुश्मन को मारनेवाली ताकत है, सबसे बड़ी ताकत है।
Mantra 22
सकृद्ध द्यौरजायत सकृद्भूमिरजायत । पृश्न्या दुग्धं सकृत्पयस्तदन्यो नानु जायते ॥
एक बार आसमान बना, एक बार धरती बनी। पृश्नि माता से एक बार दूध निकला, जैसे किसी माता से दूध मिलता है। वो पहली बार जब बना, वो दोबारा नहीं होता। वही एक बार की बात सबसे बड़ी है।
The hymn mainly addresses Agni as Jātavedas, the sacred fire who knows all beings and carries offerings to the gods.
It teaches that steady sacrifice and steady speech—offering by offering, word by word—awaken Agni’s help: skill in action, protection, and harmony in life and ritual.
The closing lines recall a unique, primal founding of the world (heaven, earth, and nourishing ‘milk’ from Pṛśnī). It underscores that the sacrifice reconnects us to that original cosmic order rather than creating it anew.
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