
Sukta 4.31
Indra (implied by śacī, maghavan context in the hymn)
This hymn is a searching invocation to Indra as the ever-growing Friend (sakhā, sadāvṛdhaḥ), asking by what luminous aid and most effective śacī (power/skill) he will choose and help the worshippers. It praises Indra’s swift generosity toward the Soma-presser and the disciplined seeker, culminating in requests for abundance, protection, and lasting renown—briefly turning to Sūrya as the visible power that “pours down” fame and light from above.
Mantra 1
कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा । कया शचिष्ठया वृता ॥
हमारा वो दोस्त जो हमेशा बढ़ता रहता है, वो कैसे आयेगा हमारे पास? कौन सी शक्ति उसे लायेगी? वो किस तरह की ज्ञान और ताकत से हमे चूज़ करेगा सही काम के लिए?
Mantra 2
कस्त्वा सत्यो मदानां मंहिष्ठो मत्सदन्धसः । दृळ्हा चिदारुजे वसु ॥
कौन ऐसा है जो सच में तुम्हारी खुशी पूरी कर सके? जो सबसे ज़्यादा देता है, वो तुम्हे इतना खुश कर दे कि पकड़ के रखे ख़ज़ाने भी खुल जाएँ। यह वो शक्ति है जो सब कुछ दे सकती है और सब बंधन तोड़ सकती है।
Mantra 3
अभी षु णः सखीनामविता जरितॄणाम् । शतं भवास्यूतिभिः ॥
हमारे दोस्तों का साथी बनो और जो लोग भजन करते हैं उनकी रक्षा करो। हमें इतनी मदद करो कि सौ गुना ज़्यादा हो जाए। जो भी हमारे काम आता है, उसको और बढ़ा दो।
Mantra 4
अभी न आ ववृत्स्व चक्रं न वृत्तमर्वतः । नियुद्भिश्चर्षणीनाम् ॥
हमारी तरफ़ मुड़ के आओ, जैसे कोई पहिया घूमे। जैसे कोई सवारी चल के आती है, वैसे ही आओ। लोगों को आगे बढ़ाने वाली शक्ति के साथ आओ ताकि सब सही से पहुँचे।
Mantra 5
प्रवता हि क्रतूनामा हा पदेव गच्छसि । अभक्षि सूर्ये सचा ॥
जब तुम इरादों को आगे बढ़ाते हो, तो क़दम क़दम बढ़ते हो। सूरज के साथ चलते हो, हम भी साथ हैं। चमक और रोशनी के साथ सफ़र करते हो जो रास्ता दिखाता है।
Mantra 6
सं यत्त इन्द्र मन्यवः सं चक्राणि दधन्विरे । अध त्वे अध सूर्ये ॥
जब इंद्र तुम्हारी ताकत और जोश एक जगह इकट्ठा हो और सब काम शुरू हो, तब तुम में और सूरज में एक बदलाव आता है। यह वो पल है जब फ़ैसला होता है और सब सही हो जाता है।
Mantra 7
उत स्मा हि त्वामाहुरिन्मघवानं शचीपते । दातारमविदीधयुम् ॥
लोग तुम्हे बुलाते हैं शक्ति के स्वामी। तुम वही हो जो खुल के देता है। तुम्हारा देना ऐसा है जो कभी कम नहीं होता। जैसे दिया बुझता नहीं, वैसे तुम्हारा बदान हमेशा चलता रहता है।
Mantra 8
उत स्मा सद्य इत्परि शशमानाय सुन्वते । पुरू चिन्मंहसे वसु ॥
जब कोई शांत हो के तुम्हे पूजा करता है, तुम उसको तुरंत देता हो। तुम उसको इतना देते हो कि उसके पास बहुत कुछ आ जाता है। जो लोग तुम्हे खुशी से भाव करते हैं, उनपे तुम खुल के मेहरबानी करते हो।
Mantra 9
नहि ष्मा ते शतं चन राधो वरन्त आमुरः । न च्यौत्नानि करिष्यतः ॥
जो लोग सोए रहते हैं और कुछ नहीं करते, उनको तुम्हारा देना नहीं मिलता। उनसे कोई बड़ा काम भी नहीं होता। सिर्फ वही लोग तुम्हारी देन लेंगे जो जाग के मेहनत करते हैं।
Mantra 10
अस्माँ अवन्तु ते शतमस्मान्त्सहस्रमूतयः । अस्मान्विश्वा अभिष्टयः ॥
तुम्हारी सौ तरह की मदद हमारे साथ रहे। तुम्हारी हज़ार तरह की सहायता हमें बचाए। तुम्हारी सारी शक्तियाँ हमारे आस-पास रहें और हमें रखें।
Mantra 11
अस्माँ इहा वृणीष्व सख्याय स्वस्तये । महो राये दिवित्मते ॥
हमें अपना दोस्त बना लो। हमारी भलाई के लिए हमारे साथ रहो। हमें वो बड़ा धन दो जो ऊपर वाली दुनिया से आता है। यह धन रोशन है और हमारे लिए है।
Mantra 12
अस्माँ अविड्ढि विश्वहेन्द्र राया परीणसा । अस्मान्विश्वाभिरूतिभिः ॥
हे इंद्र, तुम सब के मालिक हो। हमें ढूंढो और हमारे पास आओ। जो धन तुम देते हो वो पूरा है, उससे हम तक पहुंचाओ। अपनी सारी मदद से हमें घेर लो और रक्षा करो।
Mantra 13
अस्मभ्यं ताँ अपा वृधि व्रजाँ अस्तेव गोमतः । नवाभिरिन्द्रोतिभिः ॥
इंद्र, हमारे लिए वो शक्तियां बढ़ाओ। रास्ता साफ करो ताकि हम आगे बढ़ सकें। जैसे कोई अपने गांव को बड़ा करता है, वैसे ही तुम भी करो। तुम्हारी नई-नई मदद हमें चाहिए।
Mantra 14
अस्माकं धृष्णुया रथो द्युमाँ इन्द्रानपच्युतः । गव्युरश्वयुरीयते ॥
हमारा रथ बहुत ताकतवर है। यह हिलता नहीं, सीधा आगे बढ़ता है। इंद्र, तुम इसे पकड़ के रखो। यह रथ चमकता है और जल्दी चलता है। यह उजाला और ताकत ढूंढता है।
Mantra 15
अस्माकमुत्तमं कृधि श्रवो देवेषु सूर्य । वर्षिष्ठं द्यामिवोपरि ॥
हे सूर्य, हमारा नाम सबसे बड़ा बना दो। देवियों में हमारा नाम ऊपर रहे। जैसे आसमान सबसे ऊपर है, वैसे ही हमारा नाम भी ऊपर रहे। अपनी किरणें बरसाओ और हमारे ऊपर भेजो।
A questioning, intimate call: ‘By what bright help will our ever-growing Friend come?’—seeking the precise mode of Indra’s saving power (4.31.1).
Praise unfolds through Indra’s character as swift, surrounding aid and lavish giver to the Soma-presser and the disciplined seeker; the hymn links devotion, self-mastery, and divine generosity (e.g., 4.31.8).
The poet intensifies the request: immediate bestowal of many-formed riches and decisive support, portraying Indra’s grace as both abundant and timely.
The hymn settles into a final petition for highest renown and a rain-like outpouring ‘from above,’ momentarily invoking Sūrya as the seal of illumination and fame (4.31.15).
sadāvṛdhaḥ sakhā
उत स्मा सद्य इत्परि शशमानाय सुन्वते । पुरू चिन्मंहसे वसु ॥asmākam uttamaṃ kṛdhi śravaḥ
Indra is the main deity, praised as Maghavan (the generous one) and as a close friend who brings help and wealth to the Soma-offerer. The last verse briefly addresses Sūrya for illumination and fame.
It is a poetic way of seeking the right form of divine assistance—how Indra’s power (śacī) will actively choose, protect, and enable the worshippers in their work and struggles.
In Vedic ritual, Soma-offering is the key act that invites Indra. The hymn says Indra responds quickly by granting vasu—resources, well-being, and strength—especially to the sincere and disciplined sacrificer.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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