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Sukta 4.30
Vāmadeva Gautama (traditional for Mandala 4); specific hymn attribution not provided in input
Indra
Anuṣṭubh-like cadence possible; exact meter requires scan (shorter pādas suggest non-Trishtubh)
This hymn is a forceful praise of Indra as the unrivaled Vṛtrahan—greater than all, irresistible in battle, and decisive in breaking hostile strongholds such as those of Śuṣṇa. It recalls Indra’s victorious deeds to secure protection, strength, and prosperity for the worshipper, closing with a benedictive tone that invokes allied bestowers of fortune (Ādityas) for repeated "desirable" gifts.
Mantra 1
नकिरिन्द्र त्वदुत्तरो न ज्यायाँ अस्ति वृत्रहन् । नकिरेवा यथा त्वम् ॥
इंद्र, तुझसे बड़ा कोई नहीं है। तुझसे ज़्यादा पावरफुल कोई नहीं है। तू दुश्मनों को हराता है। जैसा तू है, वैसा कोई और नहीं। तू सबसे अलग है।
Mantra 2
सत्रा ते अनु कृष्टयो विश्वा चक्रेव वावृतुः । सत्रा महाँ असि श्रुतः ॥
सब लोग तेरे पीछे लग जाते हैं। जैसे गाड़ी के चक्के में सारे पत्ते जुड़ते हैं, वैसे ही सब तेरे साथ चलते हैं। तू बहुत बड़ा है और तेरा नाम सब जानते हैं।
Mantra 3
विश्वे चनेदना त्वा देवास इन्द्र युयुधुः । यदहा नक्तमातिरः ॥
एक वक़्त था जब सारे देवता भी तुझसे टक्कर लेने आए थे। तू उस वक़्त दिन और रात दोनों से आगे निकल गया था। तू नॉर्मल हद से बाहर गया था।
Mantra 4
यत्रोत बाधितेभ्यश्चक्रं कुत्साय युध्यते । मुषाय इन्द्र सूर्यम् ॥
जब दुश्मन हमला करते हैं, तब भी तू कुत्सा के लिए लड़ता है। उस चक्कर में तू सूर्य को वापस ला देता है। तू छुपा हुआ रोशनी निकाल के देता है।
Mantra 5
यत्र देवाँ ऋघायतो विश्वाँ अयुध्य एक इत् । त्वमिन्द्र वनूँरहन् ॥
जब दुश्मन सब देवतों पर हमला कर दिए थे और उनके पास कुछ भी नहीं था। तब तू अकेला इंद्र ने सब दुश्मनों को मार दिया। तू ने उनकी ताकत तोड़ दी।
Mantra 6
यत्रोत मर्त्याय कमरिणा इन्द्र सूर्यम् । प्रावः शचीभिरेतशम् ॥
इंद्र, तुमने इंसान के लिए सूरज जीता और उसको पक्का बना दिया। अपनी ताकत से तुमने एतश को आगे बढ़ाया और संभाला।
Mantra 7
किमादुतासि वृत्रहन्मघवन्मन्युमत्तमः । अत्राह दानुमातिरः ॥
वृत्र को मारने वाले इंद्र, तू इतना गुस्सा क्यों है? तू दानवों को पार कर के चला गया।
Mantra 8
एतद्घेदुत वीर्यमिन्द्र चकर्थ पौंस्यम् । स्त्रियं यद्दुर्हणायुवं वधीर्दुहितरं दिवः ॥
इंद्र, यह तेरी हिम्मत है और तेरी ताकत है। तूने उस औरत को मारा जो आसमान की बेटी थी और बहुत ताकतवर थी। उसकी बुरी शक्ति तोड़ दी।
Mantra 9
दिवश्चिद्घा दुहितरं महान्महीयमानाम् । उषासमिन्द्र सं पिणक् ॥
आसमान की बेटी उषा, जो बहुत बड़ी थी, उसे भी इंद्र तूने तोड़ दिया। वो रास्ता रोक के खड़ी थी, तूने उसे छोड़ दिया।
Mantra 10
अपोषा अनसः सरत्सम्पिष्टादह बिभ्युषी । नि यत्सीं शिश्नथद्वृषा ॥
उषा डर के भाग गई और उसका रथ भी भाग गया। जब इंद्र ने उसे तोड़ दिया और पीछे कर दिया।
Mantra 11
एतदस्या अनः शये सुसम्पिष्टं विपाश्या । ससार सीं परावतः ॥
उसका गाड़ी वहाँ पड़ी है, कुचल के रख दी गई है। और वो औरत सब साफ देख के भाग गई है, बहुत दूर चली गई।
Mantra 12
उत सिन्धुं विबाल्यं वितस्थानामधि क्षमि । परि ष्ठा इन्द्र मायया ॥
और तूने इंद्र, अपनी शक्ति से सिंधु नदी को घेर लिया। वो इतनी फैल गई थी, धरती पर साफ दिख रही थी। तूने अपनी माया से उसे अपने कंट्रोल में कर लिया।
Mantra 13
उत शुष्णस्य धृष्णुया प्र मृक्षो अभि वेदनम् । पुरो यदस्य सम्पिणक् ॥
और शुष्ण के किले पे तूने बहुत हिम्मत से हमला किया। उसके सारे दरवाज़े तोड़ दिए, उसकी जगह को बरबाद कर दिया जहाँ वो छुपा था।
Mantra 14
उत दासं कौलितरं बृहतः पर्वतादधि । अवाहन्निन्द्र शम्बरम् ॥
और इंद्र, तूने शंबर को भी गिरा दिया। वो बड़े पहाड़ पे बैठा था, तूने उसे वहाँ से नीचे गिरा दिया। यह एक दुश्मन ताकत थी जो ऊँची जगह पे चढ़ गई थी।
Mantra 15
उत दासस्य वर्चिनः सहस्राणि शतावधीः । अधि पञ्च प्रधीँरिव ॥
और तूने उस दुश्मन की हज़ारों सेना को मारा। वो चमक रहे थे लेकिन तूने उन सबको ख़त्म कर दिया। जैसे कोई पाँच किलों के ऊपर खड़ा हो, तूने उनकी पूरी लाइन तोड़ दी।
Mantra 16
उत त्यं पुत्रमग्रुवः परावृक्तं शतक्रतुः । उक्थेष्विन्द्र आभजत् ॥
एक ऐसा बेटा था जो सही रास्ते से हट गया था। उसने रास्ता बदल लिया था। इंद्र ने उसको वापस बुलाया। इंद्र के पास सौ शक्तियाँ हैं। उसने उसको फिर से सही सुनाई में ला दिया। अब वो शब्द को सही से सुन रहा है।
Mantra 17
उत त्या तुर्वशायदू अस्नातारा शचीपतिः । इन्द्रो विद्वाँ अपारयत् ॥
तुर्वशा और यदु दो लोग थे। वो पार नहीं कर पा रहे थे। रास्ता मुश्किल था। इंद्र जानता था कि कैसे जाना है। इंद्र शक्ति का मालिक है। उसने दोनों को सही तरफ ले गया। वो उनको साफ करके ले गया।
Mantra 18
उत त्या सद्य आर्या सरयोरिन्द्र पारतः । अर्णाचित्ररथावधीः ॥
आर्य लोग तेज़ी से आगे बढ़ रहे थे। वो सरयू नदी के उस पार थे। इंद्र ने अर्ण को मारा। और चित्ररथ को भी गिरा दिया। यह दोनों रास्ते में खड़े थे। इंद्र ने उनको हटा दिया।
Mantra 19
अनु द्वा जहिता नयोऽन्धं श्रोणं च वृत्रहन् । न तत्ते सुम्नमष्टवे ॥
इंद्र दुश्मन को मारता है। उसके पीछे दो रास्ते हैं जो खत्म हो गए। एक रास्ता अंधेरा है, दूसरा रास्ता लंगड़ा है। यह सही रास्ता नहीं है। जो आगे बढ़ना चाहता है, उसको सही रास्ता चाहिए। इंद्र की कृपा सही रास्ता दिखाती है।
Mantra 20
शतमश्मन्मयीनां पुरामिन्द्रो व्यास्यत् । दिवोदासाय दाशुषे ॥
इंद्र ने सौ पत्तों को तोड़ा। वो पत्ते पत्थर से बने थे। बहुत मजबूत थे। दिवोदास के लिए किया। वो देना जानता था। इंद्र ने पत्ते फाड़ दिए। अब रोशनी आ गई।
Mantra 21
अस्वापयद्दभीतये सहस्रा त्रिंशतं हथैः । दासानामिन्द्रो मायया ॥
इंद्र ने दभीति के लिए एक बड़ा काम किया। उसने दुश्मन के तीस हज़ार सैनिकों को सुला दिया। यह इंद्र की माया से हुआ, सिर्फ ताकत से नहीं। उसने उनकी हरकत बंद कर दी बिना ज़्यादा लड़ाई के।
Mantra 22
स घेदुतासि वृत्रहन्त्समान इन्द्र गोपतिः । यस्ता विश्वानि चिच्युषे ॥
तू वही इंद्र है, जो वृत्र को मारा था। तू गायों का मालिक है, रोशनी का देता है। तूने सारी शक्तियों को इकठ्ठा किया और सही जगह पे रखा। यह आत्मा की ग्रोथ के लिए है।
Mantra 23
उत नूनं यदिन्द्रियं करिष्या इन्द्र पौंस्यम् । अद्या नकिष्टदा मिनत् ॥
अब जब तू अपनी इंद्र-वाली शक्ति दिखायेगा, अपनी ताकत का काम करेगा। आज कोई भी उससे कम नहीं कर सकता। जो जीतने वाली चेतना है, वो सबसे बड़ी चीज़ के सामने भी टिक जायेगी।
Mantra 24
वामंवामं त आदुरे देवो ददात्वर्यमा । वामं पूषा वामं भगो वामं देवः करूळती ॥
भगवान अर्यमन तुम्हे बार-बार अच्छा दे। पूषन भी अच्छा लाये, भग भी अच्छा दे। और देवी करूळती भी वही खुशी दे। यह सब तुम्हारे अंदर के पूजा के लिए है।
It proclaims Indra as unequaled in power and recalls his victories over obstructing enemies to secure protection, strength, and prosperity for the worshipper.
Such names represent mythic powers of obstruction; by remembering Indra’s defeat of them, the hymn ritually invokes the same overcoming force in the present.
It is traditionally used as Indra-praise in fire and soma contexts—recited to build confidence, ask for victory over obstacles, and request well-being and abundance.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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