
Sukta 2.29
Gṛtsamada (Bhārgava)
Ādityas (especially Varuṇa and Mitra)
Triṣṭubh
In this seven-verse Triṣṭubh hymn, Gṛtsamada invokes the Ādityas—preeminently Mitra and Varuṇa—as guardians of ṛta (cosmic and moral order) to keep far away hidden fault and inner deviation. The poet seeks mercy, right guidance on the “middle path” of Truth, and continued participation in prosperity and communal speech that is “bṛhat” (the Vast), sustained by inner heroic strength.
Mantra 1
धृतव्रता आदित्या इषिरा आरे मत्कर्त रहसूरिवागः । शृण्वतो वो वरुण मित्र देवा भद्रस्य विद्वाँ अवसे हुवे वः ॥
हे आदित्य देवता, तुम लोग धरम पे चले हो। मेरे अंदर का छोटा पाप मुझसे दूर रखना। वरुण और मित्र, तुम सुन रहे हो। मैं भलाई जानता हूँ, इसलिए तुमसे मदद माँगता हूँ।
Mantra 2
यूयं देवाः प्रमतिर्यूयमोजो यूयं द्वेषांसि सनुतर्युयोत । अभिक्षत्तारो अभि च क्षमध्वमद्या च नो मृळयतापरं च ॥
देवता, तुम लोग समझदार हो, तुम में ताकत है। तुम हमारी नफरतें दूर कर देते हो। हमें माफ करो, आज और आगे भी। हमें ठीक करो।
Mantra 3
किमू नु वः कृणवामापरेण किं सनेन वसव आप्येन । यूयं नो मित्रावरुणादिते च स्वस्तिमिन्द्रामरुतो दधात ॥
हम तुम्हारे लिए और क्या करें, पैसे से क्या फायदा? मित्र, वरुण और अदिति, तुम हमें ठीक रखना। इंद्र और मरुत देवता भी हमें शांति दें।
Mantra 4
हये देवा यूयमिदापयः स्थ ते मृळत नाधमानाय मह्यम् । मा वो रथो मध्यमवाळृते भून्मा युष्मावत्स्वापिषु श्रमिष्म ॥
देवियों, तुम लोग ठंडाई जैसा पानी हो। मैं बहुत मेहनत कर रहा हूँ, थोड़ा दया करो। तुम्हारी गाड़ी सीधी राह से न हट जाए। तुम्हारे साथ जो चीज़ें मिलती हैं, उनमें हम थक न जाएँ।
Mantra 5
प्र व एको मिमय भूर्यागो यन्मा पितेव कितवं शशास । आरे पाशा आरे अघानि देवा मा माधि पुत्रे विमिव ग्रभीष्ट ॥
तुममें से एक ने मेरे लिए बहुत गलतियाँ बना दी, जैसे बाप अपने बेटे को डाँटा जो जुआ खेलता है। देवियों, तुम्हारी फाँसी और बुरी चीज़ें दूर हो जाएँ। मुझे पकड़ना मत, जैसे पक्षी पकड़ने वाला शिकार को पकड़ता है।
Mantra 6
अर्वाञ्चो अद्या भवता यजत्रा आ वो हार्दि भयमानो व्ययेयम् । त्राध्वं नो देवा निजुरो वृकस्य त्राध्वं कर्तादवपदो यजत्राः ॥
आज हमारी तरफ मुड़ के देखो, देवियों। मेरा डर रहा है, मुझे तुम्हारे पास सुकून मिले। देवियों, भेड़ियों की तरह छुप के आने वाली ताकत से बचाओ। जो गिराने वाला है, उससे भी बचाओ।
Mantra 7
माहं मघोनो वरुण प्रियस्य भूरिदाव्न आ विदं शूनमापेः । मा रायो राजन्त्सुयमादव स्थां बृहद्वदेम विदथे सुवीराः ॥
हे वरुण, मुझे वो प्यारा इंसान न मिले ऐसा न हो। जो बहुत देता है उसकी कंपनी मैं खो न जाऊँ। मैं खाली हाथ न रह जाऊँ। राजा, मैं सही राह से न हट जाऊँ। हम लोग सबके सामने बड़ी बात करें और अंदर से स्ट्रांग रहें।
The hymn praises the Ādityas, with special focus on Mitra and Varuṇa—deities who uphold ṛta (truth and right order) and oversee both social and moral law.
It asks them to keep away hidden or “secret” fault, to be gracious to one under pressure, and to guide the worshipper on the true middle path without falling into error or loss.
It means speaking with clarity and greatness in the community or ritual assembly—truthful, expansive speech that reflects alignment with ṛta and is supported by inner strength (suvīra).
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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