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Sukta 10.77
Maruts (storm-host) / their gaṇa
Trishtubh (probable)
This hymn praises the Maruts as a radiant storm-host whose “showers” are both rain and blessings, moving with purposeful order like well-guided sacrifices. Through vivid comparisons—cloud-spray, sun-rays, falcons, and far-ranging coursers—it invokes their protective power to remove harm, strengthen inspired thought, and make the yajña shine. The closing petition asks these most “yajña-worthy” powers to guard chariot-swift inspiration and the greatness that grows through the rite.
Mantra 1
अभ्रप्रुषो न वाचा प्रुषा वसु हविष्मन्तो न यज्ञा विजानुषः । सुमारुतं न ब्रह्माणमर्हसे गणमस्तोष्येषां न शोभसे ॥
जैसे बादल से पानी बरसता है, वैसे ही शब्द से तुम धन बनते हो। यह जानते हैं कैसे यज्ञ करना है। इनकी बात में ताकत है। मैं इनकी टीम की तारीफ करता हूँ। यह चमक के सामने आओ।
Mantra 2
श्रिये मर्यासो अञ्जीँरकृण्वत सुमारुतं न पूर्वीरति क्षपः । दिवस्पुत्रास एता न येतिर आदित्यासस्ते अक्रा न वावृधुः ॥
यह जवान वीर चमक-दमक बनाते हैं सुंदरता के लिए। रात के अंधेरे को पीछे छोड़ देते हैं। यह आसमान के बेटे हैं। अपना रास्ता चलते हैं। आदित्य जैसे मज़बूत हैं। बढ़ रहे हैं ताकत में।
Mantra 3
प्र ये दिवः पृथिव्या न बर्हणा त्मना रिरिच्रे अभ्रान्न सूर्यः । पाजस्वन्तो न वीराः पनस्यवो रिशादसो न मर्या अभिद्यवः ॥
यह आसमान और धरती से निकलते हैं। अपने आप को फैलाते हैं जैसे सूरज बादल से निकलता है। यह चमकते हैं जैसे बहादुर लोग। जीत के लिए तैयार हैं। रास्ते में जो रुकावतें हैं, उनको खत्म करते हैं। आगे बढ़ते हैं रोशनी की तरफ।
Mantra 4
युष्माकं बुध्ने अपां न यामनि विथुर्यति न मही श्रथर्यति । विश्वप्सुर्यज्ञो अर्वागयं सु वः प्रयस्वन्तो न सत्राच आ गत ॥
तुम्हारी गहराई में धरती हिलता नहीं। मज़बूत है सब। यह यज्ञ सब ताकत लेकर तुम्हारे पास आ रहा है। तैयार लोगों की तरह मिलकर आओ। यहाँ पहुँच जाओ।
Mantra 5
यूयं धूर्षु प्रयुजो न रश्मिभिर्ज्योतिष्मन्तो न भासा व्युष्टिषु । श्येनासो न स्वयशसो रिशादसः प्रवासो न प्रसितासः परिप्रुषः ॥
मरुत देवता गाड़ी में जुड़े हैं, जैसे सूरज की किरण होती है। सुबह की रोशनी में चमकते हैं। बाज़ की तरह तेज़ हैं, अपनी शान खुद बनाते हैं। बुराई को खा जाते हैं। दूर तक जाते हैं, अपना काम करते हैं। अपनी बारिश चारों तरफ बहा देते हैं।
Mantra 6
प्र यद्वहध्वे मरुतः पराकाद्यूयं महः संवरणस्य वस्वः । विदानासो वसवो राध्यस्याराच्चिद्द्वेषः सनुतर्युयोत ॥
जब मरुत दूर से आते हैं, वो बड़ी संपत्ति ले कर आते हैं। सही फायदा जानते हैं, वसु कहते हैं इनको। दुश्मनी को दूर से भगा देते हैं। हमारे रास्ते से बहुत दूर कर देते हैं।
Mantra 7
य उदृचि यज्ञे अध्वरेष्ठा मरुद्भ्यो न मानुषो ददाशत् । रेवत्स वयो दधते सुवीरं स देवानामपि गोपीथे अस्तु ॥
जो इंसान यज्ञ में सीधा खड़ा होता है, मरुत देवता को भोग लगाता है, वो सच्चा इंसान होता है। उसे धन मिलता है, बल मिलता है। भगवान की सुरक्षा में रहता है।
Mantra 8
ते हि यज्ञेषु यज्ञियास ऊमा आदित्येन नाम्ना शम्भविष्ठाः । ते नोऽवन्तु रथतूर्मनीषां महश्च यामन्नध्वरे चकानाः ॥
यज्ञ में सबसे बड़े हैं, आदित्य नाम से जाने जाते हैं। भगवान की सुरक्षा देते हैं, हमारे इरादों को रथ की तरह तेज़ करते हैं। बड़ी बड़ाई और साफ रास्तों में खुश रहते हैं।
They are a many-membered storm-host—radiant, swift, and powerful—praised for bringing rain, driving away harm, and strengthening the sacrifice through their energy.
The comparisons highlight speed, brilliance, and purposeful movement: like rays they illumine the dawn, and like falcons they strike down dangers and range far, scattering showers.
The hymn asks them to protect the sacrificer’s inspired thought (manīṣā) that moves like a chariot, and to safeguard the greatness and success of the flawless offering (adhvara).
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