Rig Veda Sukta 70
Mandala 10Sukta 7011 Mantras

Sukta 70

Sukta 10.70

Rishi

Traditionally attributed to Vādhryaśva (continuation into RV 10.70 opening Agni-invocation)

Devata

Agni (with Ila as associated power of inspired offering)

Chandas

Triṣṭubh

This Triṣṭubh hymn opens by kindling Agni and placing the ghee-bright offering upon the seat of Ilā, asking the fire to rise on Earth as the force of right intelligence that carries worship upward. It then widens into a threshold-liturgical vision—Dawn and Night are invoked to seat the gods in the ordered “womb” of the rite—culminating in Agni’s role as summoner who brings Varuṇa, Indra, the Maruts, and the All-Gods to the sacrificial seat for inner and outer fulfillment.

Recitation with translationRig Veda 10.70

Mantras

Mantra 1

इमां मे अग्ने समिधं जुषस्वेळस्पदे प्रति हर्या घृताचीम् । वर्ष्मन्पृथिव्याः सुदिनत्वे अह्नामूर्ध्वो भव सुक्रतो देवयज्या ॥

अग्नि, मेरी तरफ से दी हुई आग को अपना ले। यह घी से चमक रही है, इला की जगह पे तुझे पसंद आनी चाहिए। धरती के ऊपर, अच्छे दिन की रोशनी में, तू ऊपर उठ। तू समझदार है, भगवान की पूजा की तरफ जा।

Mantra 2

आ देवानामग्रयावेह यातु नराशंसो विश्वरूपेभिरश्वैः । ऋतस्य पथा नमसा मियेधो देवेभ्यो देवतमः सुषूदत् ॥

नराशंस आए, वो भगवानों के आगे चलने वाला है। उसके पास हर तरह के घोड़े हैं। वो सही रास्ते से आए, झुक के, और भगवानों को हमारे पास बिठा दे। वो सबसे बड़ा भगवान है।

Mantra 3

शश्वत्तममीळते दूत्याय हविष्मन्तो मनुष्यासो अग्निम् । वहिष्ठैरश्वैः सुवृता रथेना देवान्वक्षि नि षदेह होता ॥

लोग पुराने समय से अग्नि की पूजा करते हैं, क्योंकि वो भगवानों तक पैग्याम ले जाता है। लोग अपना समर्पित करके आते हैं। अग्नि, अपने सबसे तेज घोड़ो और अच्छी गाड़ी से भगवानों को हमारे पास ला। तू यहाँ बैठ जा, हमारे लिए पूजा करने वाला बन जा।

Mantra 4

वि प्रथतां देवजुष्टं तिरश्चा दीर्घं द्राघ्मा सुरभि भूत्वस्मे । अहेळता मनसा देव बर्हिरिन्द्रज्येष्ठाँ उशतो यक्षि देवान् ॥

यह पूजा की जगह फैल जाए, भगवानों को पसंद आनी चाहिए। चारों तरफ फैल जाए, लंबी और चौड़ी, और खुशबू आनी चाहिए। बुरा मन्न छोड़ के, भगवानों की पूजा करो। इंद्र सबसे पहले आना चाहिए, वो सबसे बड़ा है।

Mantra 5

दिवो वा सानु स्पृशता वरीयः पृथिव्या वा मात्रया वि श्रयध्वम् । उशतीर्द्वारो महिना महद्भिर्देवं रथं रथयुर्धारयध्वम् ॥

आसमान की ऊँची चोटी को छूना, या ज़मीन के नाप के हिसाब से फैल जाओ। हे सुबह के दरवाज़े, तुम्हारी खूबसूरती और ताकत बड़ी है। जो यह रथ चलाता है, उसके लिए भगवान का रथ पकड़ के रखो।

Mantra 6

देवी दिवो दुहितरा सुशिल्पे उषासानक्ता सदतां नि योनौ । आ वां देवास उशती उशन्त उरौ सीदन्तु सुभगे उपस्थे ॥

हे आसमान की बेटियाँ, तुम दोनों बहुत खूबसूरत हो, सुबह और रात। अपने जगह पर बैठ जाओ। भगवान तुम्हें चाहते हैं, इसलिए वो भी आके तुम्हारे पास बैठें।

Mantra 7

ऊर्ध्वो ग्रावा बृहदग्निः समिद्धः प्रिया धामान्यदितेरुपस्थे । पुरोहितावृत्विजा यज्ञे अस्मिन्विदुष्टरा द्रविणमा यजेथाम् ॥

यह पत्थर उठ गया है और बड़ा आग जल रहा है। अदिति के पास अच्छी जगह बना ली गई है। दोनों पंडित जो आगे बैठे हैं, वो समझते हैं कैसे यज्ञ करना है। यहाँ यज्ञ करो और हमें धन दो।

Mantra 8

तिस्रो देवीर्बर्हिरिदं वरीय आ सीदत चकृमा वः स्योनम् । मनुष्वद्यज्ञं सुधिता हवींषीळा देवी घृतपदी जुषन्त ॥

हे तीन देवियाँ, इस बड़ी जगह पर बैठो। हमने तुम्हारे लिए अच्छी जगह बना रखी है। इला देवी, जिसके पाँव घी जैसे चमकते हैं, वो इस यज्ञ को पसंद करें। यह यज्ञ इंसान की तरह किया गया है और सामग्री सही लगाई गई है।

Mantra 9

देव त्वष्टर्यद्ध चारुत्वमानड्यदङ्गिरसामभवः सचाभूः । स देवानां पाथ उप प्र विद्वाँ उशन्यक्षि द्रविणोदः सुरत्नः ॥

हे त्वष्ट्र भगवान, जब तुमने अच्छा बनाया, तब तुम अंगिरस रिशियों के साथ हो गए। भगवानों का रास्ता तुम्हे पता है। उनकी पूजा करो। तुम जो देते हो वो पूरा देता है, और तुम्हारे पास अच्छे रत्न हैं।

Mantra 10

वनस्पते रशनया नियूया देवानां पाथ उप वक्षि विद्वान् । स्वदाति देवः कृणवद्धवींष्यवतां द्यावापृथिवी हवं मे ॥

यह पेड़-पौधों का स्वामी है, रस्सी से बंधा हुआ। यह जानता है भगवानों का रास्ता, इसलिए हमे उस रास्ते पर ले चल। भगवन यह हवन को अच्छा बना दे, मन को पसंद आए ऐसा। आसमान और धरती दोनों मेरी पूजा की रक्षा करें।

Mantra 11

आग्ने वह वरुणमिष्टये न इन्द्रं दिवो मरुतो अन्तरिक्षात् । सीदन्तु बर्हिर्विश्व आ यजत्राः स्वाहा देवा अमृता मादयन्ताम् ॥

अग्नि, तू वरुण को ले आ, हमारे काम के लिए। इंद्र को आसमान से ले आ, मरुत को हवा में से। सब भगवान यहाँ आके बैठ जाएं, पूजा के जगह पर। स्वाहा, अमृत वाले देवता इस हवन से खुश हों।

Frequently Asked Questions

Its purpose is to kindle Agni correctly, place the ghee-offering in the inspired seat of Ilā, and have Agni summon the gods so the rite becomes fruitful and auspicious.

Dawn and Night mark the daily thresholds of time; invoking them stabilizes the ritual order (ṛta) so the gods can “sit” in the rite in a harmonious, well-timed way.

It means Agni is the power of right intelligence and effective will—both the ritual priestly skill that makes offerings reach the gods and the inner clarity that lifts the worshipper upward.

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