Opening the text
The ‘landing’ of the staircase: bhakti as the perfected medicine (भव-भेषज) that converts metaphysical doctrine into lived liberation. In Uttar Kāṇḍa, the Manas turns from external līlā-events to interiorized sādhana—diagnosing the mind’s diseases (मानस रोग), prescribing satsanga-sraddhā as treatment, and declaring राम-भक्ति as the cintāmaṇi that makes nirguṇa truth experientially saguna. This stage seals the pilgrim’s journey by establishing eligibility (अधिकार), right audience (कथा-अधिकारी), and the seven sopānas as the path-map within the kathā itself.
यह प्रकरण ‘भव-भेषज’ (संसार-रोग की औषधि) रूपक से मनो-आध्यात्मिक चिकित्सा का विधान करता है: रोग = मोह/काम/लोभ/अहंकार; निदान = मन की अस्थिरता और विषयासक्ति; उपचार = सत्संग + श्रद्धा + हरि-भजन; परिणाम = जीवन्मुक्ति-सम शान्ति। ‘राम-भक्ति चिंतामणि’ प्रतीक बताता है कि भक्ति मूल्य-परिवर्तन की रसायन-क्रिया है—वह निर्गुण सत्य को सगुण-प्रेम में अनुभूत कराती है। ‘दीया-घृत-बाती’ संकेत करता है कि भक्ति के भीतर ज्ञान स्वतः प्रकाशमान है; अलग से बौद्धिक उपकरणों का प्रदर्शन आवश्यक नहीं—ज्ञान भक्ति का अंतर्लोक-दीपक बन जाता है। ‘सोपान’ (सीढ़ी) संरचना में कथा स्वयं साधना-पथ बनती है: अधिकार (कथा-अधिकारी), साधन (सत्संग-श्रद्धा-वैराग्य), और सिद्धि (परिपक्व भक्ति) एक ही कथात्मक वास्तु में जुड़ जाते हैं।
Verse 1 (चौपाई)
अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए। कृपासिंधु के मन अति भाए।। हनूमान भरतादिक भ्राता। संग लिए सेवक सुखदाता।। पुनि कृपाल पुर बाहेर गए। गज रथ तुरग मगावत भए।। देखि कृपा करि सकल सराहे। दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे।। हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई। गए जहाँ सीतल अवँराई।। भरत दीन्ह निज बसन डसाई। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई।। मारुतसुत तब मारूत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई।। हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी।। गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई।।
यह कह के वसिष्ठ घर चले गए। राम, जो दया के समुंदर हैं, उनका मन बहुत खुश हुआ। हनुमान, भरत और बाकी भाई, और नौकर सब राम के साथ चले। राम खुशी देने वाले हैं। फिर राम शहर से बाहर निकले। हाथी, रथ और घोड़े मंगवाए गए। सब लोग उनकी कृपा देख के तारीफ करने लगे। जिसको जो चाहिए था, वो दिया। सब की थकान दूर कर के, राम ठंडी जगह पर गए। भरत ने अपने कपड़े बिछा दिए। राम बैठ गए और सब भाई उनकी सेवा करने लगे। हनुमान ने राम को देखा। उनका जिस्म काँपने लगा और आँखों में आँसू आ गए। हनुमान जितना भाग्याशाली कोई नहीं। राम के चरणों में इतना प्यार कोई नहीं करता। गिरिजा का प्यार जो के दास जैसा था, राम ने बार बार अपने मुँह से गाया।
Verse 2 (दोहा/सोरठा)
तेहिं अवसर मुनि नारद आए करतल बीन। गावन लगे राम कल कीरति सदा नबीन।।50।।
उस वक्त रिशि नारद आए। हाथ में बीन लिए थे। वो राम के गुण गाने लगे। राम की कीर्ति हमेशा नयी है, कभी पुरानी नहीं होती।
Verse 3 (चौपाई)
मामवलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन।। नील तामरस स्याम काम अरि। हृदय कंज मकरंद मधुप हरि।। जातुधान बरूथ बल भंजन। मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन।। भूसुर ससि नव बृंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक।। भुज बल बिपुल भार महि खंडित। खर दूषन बिराध बध पंडित।। रावनारि सुखरूप भूपबर। जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर।। सुजस पुरान बिदित निगमागम। गावत सुर मुनि संत समागम।। कारुनीक ब्यलीक मद खंडन। सब बिधि कुसल कोसला मंडन।। कलि मल मथन नाम ममताहन। तुलसीदास प्रभु पाहि प्रनत जन।।
भगवान, मुझे अपने कमल जैसी आँखों से देखो। आप की कृपा की नज़र से मैं सब चिंता से आज़ाद हो जाता हूँ। आप नीले कमल जैसा श्याम रंग है, काम देव का दुश्मन। आप उस मधुप हो जो दिल के कमल का रस चखने आता है। आप राक्षसों की सेना को खत्म करने वाले हो। रिशियों और अच्छे लोगों को खुश करते हो, पाप को मिटाते हो। ब्राह्मणों के लिए आप चाँद हो, वन के लिए बादल हो। जिन्हें कोई सहारा नहीं, उनका आप सहारा हो। निर्धन लोगों को आप बचाते हो। अपने हाथों की ताकत से धरती का बोझ उठा दिया। खर, दूषण और विराध को मार के पंडित कहा गया। रावण की पत्नियों के लिए आप सुख हो, राजाओं में श्रेष्ठ हो। दशरथ के वंश के कमल को आप चाँद की तरह अमृत देते हो। आप की कीर्ति पुराणों में, वेदों में, सब जगह है। देवता और रिशि सब आप का गुण गाते हैं। आप दयालु हो, गर्व को तोड़ने वाले हो। सब काम में कुशल हो, कोसला की शान हो। कलि युग की गंदगी को आप मथ कर साफ करते हो। ममता को दूर करते हो। भगवान, तुलसीदास और भक्तों की रक्षा करो।
Verse 4 (दोहा/सोरठा)
प्रेम सहित मुनि नारद बरनि राम गुन ग्राम। सोभासिंधु हृदयँ धरि गए जहाँ बिधि धाम।।51।।
रिशि नारद ने प्यार से राम के बहुत सारे गुण बताए। राम के रूप का समुंदर अपने दिल में लिए वो ब्रह्मा के पास चले गए।
Verse 5 (चौपाई)
गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा।। राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा।। राम अनंत अनंत गुनानी। जन्म कर्म अनंत नामानी।। जल सीकर महि रज गनि जाहीं। रघुपति चरित न बरनि सिराहीं।। बिमल कथा हरि पद दायनी। भगति होइ सुनि अनपायनी।। उमा कहिउँ सब कथा सुहाई। जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई।। कछुक राम गुन कहेउँ बखानी। अब का कहौं सो कहहु भवानी।। सुनि सुभ कथा उमा हरषानी। बोली अति बिनीत मृदु बानी।। धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी। सुनेउँ राम गुन भव भय हारी।।
गिरिजा, यह पूरी कथा सुन। मैंने जो समझा सब बता दिया। राम की कथा सच है, बहुत बड़ी है, कोई एंड नहीं है। वेद और सरस्वती भी इसका पूरा वर्णन नहीं कर सकते। राम अनंत है, उनके गुण अनंत हैं। उनके जनम, करम और नाम गिनने से बाहर हैं। समुंदर के पानी की तरह, धरती की मिट्टी की तरह, यह सब गिनना मुश्किल है। रघुवर की कथा को पूरा बताना भी उतना ही मुश्किल है। यह साफ कथा हरि के चरणों तक पहुँचाती है। सुन के भक्ति मिलती है जो कभी टूटी नहीं। उमा, मैंने वह पूरी सुंदर कथा बता दी जो भुशुंडि को सुनाई गई थी। मैंने राम के कुछ गुण बताए। और क्या बताऊँ? भवानी, तुम बताओ। यह अच्छी कथा सुन के उमा बहुत खुश हुई। वो बोली, बहुत विनय से, नरम आवाज़ में। मैं धन्य हूँ, शिव भी धन्य हैं। राम के गुण सुन के मैं भव के डर से मुक्त हो गई।
Verse 6 (दोहा/सोरठा)
तुम्हरी कृपाँ कृपायतन अब कृतकृत्य न मोह। जानेउँ राम प्रताप प्रभु चिदानंद संदोह।।52(क)।। नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा रघुबीर। श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर।।52(ख)।।
आप की कृपा से, कृपा के धार, मैं अब पूरा हो गया। अब मुझे कोई मोह नहीं। राम की महिमा जान ली, भगवान जो ज्ञान और आनंद के धार हैं। नाथ, आप के चेहरे से चाँद निकलता है। रघुवर की कथा अमृत बरसाता है। कान और दिल से पिया, फिर भी मन नहीं भरता।
Verse 7 (चौपाई)
राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं।। जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहीं निरंतर तेऊ।। भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा।। बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा।। श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं।। ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती।। हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा। सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा।। तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई। कागभसुंडि गरुड़ प्रति गाई।।
जो लोग राम के चरित्र को सुनते हैं, वो कभी बोर नहीं होते। उन्हे उसका स्पेशल मज़ा समझ में नहीं आता। महान रिशि भी जो मुक्त होके जीते हैं, वो भी हरि के गुणों को बार-बार सुनते रहते हैं। जो लोग इस दुनिया के समुंदर को पार कर चुके हैं, उनके लिए राम की कथा एक मज़बूत नाव है। हरि के गुण सुनने से कान को सुकून मिलता है और मन खुश हो जाता है। क्या कोई ऐसा भी है इस दुनिया में जिसको रघु के स्वामी के कर्नामे पसंद ना आए? वो मुर्दा इंसान खुद के दुश्मन होते हैं जिनको रघु के स्वामी की कथा पसंद नहीं आती। आपने मेरे मन में हरि की कथा गाई है। सुनके मैंने, हे नाथ, बहुत ज़्यादा सुख पाया है। आपने यह खूबसूरत कथा वैसे ही कही जैसे काकभुशुंडि ने गरुड़ को सुनाई थी।
Verse 8 (दोहा/सोरठा)
बिरति ग्यान बिग्यान दृढ़ राम चरन अति नेह। बायस तन रघुपति भगति मोहि परम संदेह।।53।।
मैं वैराग्य में, ग्यान में, और विवेक में पक्का हूँ। राम के चरणों में मेरा बहुत प्यार है। लेकिन इस कौए के शरीर में, रघु के स्वामी की भक्ति मेरे लिए एक बड़ा सवाल है।
Verse 9 (चौपाई)
नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी।। धर्मसील कोटिक महँ कोई। बिषय बिमुख बिराग रत होई।। कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई। सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई।। ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ। जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ।। तिन्ह सहस्त्र महुँ सब सुख खानी। दुर्लभ ब्रह्मलीन बिग्यानी।। धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी। जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी।। सब ते सो दुर्लभ सुरराया। राम भगति रत गत मद माया।। सो हरिभगति काग किमि पाई। बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई।।
हे पुरारि, हज़ारों आदमियों में से एक ही ऐसा मिलता है जो धरम का व्रत रखता है। करोड़ों धरम वाले लोगों में से एक ही ऐसा मिलता है जो दुनिया के सुख से दूर हो और वैराग्य में लगा हो। करोड़ों वैरागी लोगों में से शास्त्र कहते हैं कि कोई एक कभी सच्चा ग्यान पाता है। करोड़ों ग्यानी लोगों में से एक ही ऐसा होता है जो जीते जी मुक्त हो। उन हज़ारों में से एक ही ऐसा ब्रह्म ग्यानी मिलता है जो ब्रह्मन में लिया रहता है, जो सब सुख का खादा है। धरम वाला, वैरागी, ग्यानी, जीते जी मुक्त, ब्रह्मन में लगा हुआ ऐसा आदमी बहुत मुश्किल से मिलता है। इन सब से भी ज़्यादा मुश्किल मिलता है, हे देवराज, वो जो राम की भक्ति में लगा हो, जिसमें अहंकार और माया दोनों खत्म हो गई हो। ऐसी हरि की भक्ति क्या कोई कौवा कैसे पा सकता है? हे विश्वनाथ, मुझे समझा के बताओ।
Verse 10 (दोहा/सोरठा)
राम परायन ग्यान रत गुनागार मति धीर। नाथ कहहु केहि कारन पायउ काक सरीर।।54।।
मैं राम में लगा हूँ, ग्यान में डूबा हूँ, गुणों का खादा हूँ, और मन में पक्का हूँ। हे नाथ, बताओ किस वजह से मुझे कौवे का शरीर मिला है?
Verse 250 (दोहा/सोरठा)
जासु नाम भव भेषज हरन घोर त्रय सूल। सो कृपालु मोहि तो पर सदा रहउ अनुकूल।।124(क)।। सुनि भुसुंडि के बचन सुभ देखि राम पद नेह। बोलेउ प्रेम सहित गिरा गरुड़ बिगत संदेह।।124(ख)।।
jāsu nāma bhava bheṣaja harana ghora traya sūla | so kṛpālu mohi to para sadā rahau anukūla ||124(ka)|| suni bhusuṇḍi ke bacana subha dekhi rāma pada neha | bolēu prema sahita girā garuṛa bigata saṁdeha ||124(kha)||
जिसका नाम भव रोग की दवाई है जो तीन तरह के बड़े दर्द को दूर करता है, वो कृपालु मुझ पर हमेशा दयालु रहे। भूषुंडि के अच्छे शब्दों को सुनके और राम के चरणों के प्यार को देखके गरुड़ ने प्यार से बात की। उसके सारे डाउट चले गए थे।
Verse 251 (चौपाई)
मै कृत्कृत्य भयउँ तव बानी। सुनि रघुबीर भगति रस सानी।। राम चरन नूतन रति भई। माया जनित बिपति सब गई।। मोह जलधि बोहित तुम्ह भए। मो कहँ नाथ बिबिध सुख दए।। मो पहिं होइ न प्रति उपकारा। बंदउँ तव पद बारहिं बारा।। पूरन काम राम अनुरागी। तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी।। संत बिटप सरिता गिरि धरनी। पर हित हेतु सबन्ह कै करनी।। संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना।। निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता।। जीवन जन्म सुफल मम भयऊ। तव प्रसाद संसय सब गयऊ।। जानेहु सदा मोहि निज किंकर। पुनि पुनि उमा कहइ बिहंगबर।।
mai kṛt-kṛtya bhayauṁ tava bānī | suni raghubīra bhagati rasa sānī || rāma carana nūtana rati bhaī | māyā janita bipati saba gaī || moha jaladhi bohita tumha bhae | mo kahaṁ nātha bibidha sukha dae || mo pahiṁ hoi na prati upakārā | bandauṁ tava pada bārahiṁ bārā || pūrana kāma rāma anurāgī | tumha sama tāta na kou baṛabhāgī || santa biṭapa saritā giri dharanī | para hita hetu sabanha kai karanī || santa hṛdaya navanīta samānā | kahā kabinha pari kahai na jānā || nija paritāpa dravai navanītā | para dukha dravahiṁ santa su-punītā || jīvana janma suphala mama bhayū | tava prasāda saṁsaya saba gayū || jānehu sadā mohi nija kiṁkara | puni puni umā kahai bihaṅgabara ||
तुम्हारी बात सुनके मेरा काम पूरा हो गया। रघुवीर की भक्ति का रस सुनके बहुत अच्छा लगा। राम के चरणों में नई प्रीति हो गई और माया से जो भी प्रॉब्लम थी वो सब गायब हो गई। तुमने माया के समुंदर से पार करने वाली नाव बन गए। नाथ, तुमने मुझे बहुत सारी खुशियां दी। मैं इस उपकार का कभी बदला नहीं कर सकता। मैं बार-बार तुम्हारे चरणों को नमस्ते करता हूं। तुम खुद में पूरे हो और राम के प्यारे हो। तुम जैसा बड़ा भाग्य वाला कोई नहीं है, दोस्त। संत पेड़, नदिया, पहाड़ और धरती जैसे हैं। सबका काम दूसरों का भला करना है। संत का दिल माखन जैसा है। कवि क्या कहें, कोई समझ ही नहीं पाता। माखन अपनी गर्मी से पिघल जाता है, संत दूसरों के दुख से पिघल जाते हैं। मेरा जनम और जीवन सफल हो गया। तुम्हारी कृपा से सारे डाउट चले गए। मुझे हमेशा अपना दासा समझो। यह बार-बार गरुड़ उमा से कहते हैं।
Verse 252 (दोहा/सोरठा)
तासु चरन सिरु नाइ करि प्रेम सहित मतिधीर। गयउ गरुड़ बैकुंठ तब हृदयँ राखि रघुबीर।।125(क)।। गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन। बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान।।125(ख)।।
tāsu carana siru nāi kari prema sahita mati-dhīra | gayau garuṛa baikunṭha taba hṛdayã rāakhi raghubīra ||125(ka)|| girijā santa samāgama sama na lābha kachu āna | binu hari kṛpā na hoi so gāvahiṁ beda purāna ||125(kha)||
गरुड़ ने भूषुंडि के चरणों में सर झुकाया, प्यार और शांत दिमाग से। फिर वो वैकुंठ चले गए, दिल में रघुवीर को रखते हुए। गिरिजा, संत संगति जैसा कोई लाभ नहीं। हरि की कृपा बिना यह नहीं मिलता। यह वेद और पुराण गाते हैं।
Verse 253 (चौपाई)
कहेउँ परम पुनीत इतिहासा। सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा।। प्रनत कल्पतरु करुना पुंजा। उपजइ प्रीति राम पद कंजा।। मन क्रम बचन जनित अघ जाई। सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई।। तीर्थाटन साधन समुदाई। जोग बिराग ग्यान निपुनाई।। नाना कर्म धर्म ब्रत दाना। संजम दम जप तप मख नाना।। भूत दया द्विज गुर सेवकाई। बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई।। जहँ लगि साधन बेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी।। सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई। राम कृपाँ काहूँ एक पाई।।
kaheum̐ parama punīta itihāsā | sunata śravaṇa chūṭahiṁ bhava pāsā || praṇata kalpataru karuṇā puñjā | upajai prīti rāma pada kañjā || mana krama bacana janita agha jāī | sunahiṁ je kathā śravaṇa mana lāī || tīrthāṭana sādhana samudāī | joga birāga gyāna nipunāī || nānā karma dharma brata dānā | sañjama dama japa tapa makha nānā || bhūta dayā dvija guru sevakāī | bidyā binaya bibeka baṛāī || jahām̐ lagi sādhana beda bakhānī | saba kara phala hari bhagati bhavānī || so raghunātha bhagati śruti gāī | rāma kṛpām̐ kāhūm̐ eka pāī ||
मैंने यह बहुत पवित्र इतिहास बताया है। इससे सुनने से भव के बंधन टूट जाते हैं। जो लोग शरण आते हैं, उनके लिए वो कल्पतरु है, कृपा की ढेर है। राम के चरणों में प्रीति उठती है। मन, कर्म और बात से जो पाप हैं, वो सब चले जाते हैं जो इस कथा को दिल और कान लगाके सुनते हैं। तीर्थ यात्रा और सारी साधना, योग, वैराग्य, ज्ञान की स्किल। बहुत से करम, धरम, व्रत, दान। संयम, जप, तप, यज्ञ। जीव पर दया, ब्राह्मण और गुरु की सेवा। विद्या, विनय, विवेक और बड़ी चीज़ें। जहां तक वेद ने सारी साधना बताई है, उसका फल हरि भक्ति है, भवानी। वो रघुनाथ की भक्ति श्रुति गाती है। लेकिन राम की कृपा से ही किसी को वो मिलता है।
Verse 254 (दोहा/सोरठा)
मुनि दुर्लभ हरि भगति नर पावहिं बिनहिं प्रयास। जे यह कथा निरंतर सुनहिं मानि बिस्वास।।126।।
muni durlabha hari bhagati nara pāvahiṁ binahiṁ prayāsa | je yaha kathā nirantara sunahiṁ māni bisvāsa ||126||
हरि की भक्ति ऐसी चीज़ है कि ऋषि-मुनि भी उसे मुश्किल से पाते हैं। पर इंसान बिना कोई तकलीफ के पा लेते हैं। बस शर्त ये है कि वो यह कथा बार-बार सुनें। और दिल से मान के सुनें।
Verse 255 (चौपाई)
सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता।। धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता।। नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना।। सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा।। धन्य देस सो जहँ सुरसरी। धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी।। धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई।। सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी।। धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा।।
soi sarbagya gunī soi gyātā | soi mahi maṇḍita paṇḍita dātā || dharma parāyana soi kula trātā | rāma carana jā kara mana rātā || nīti nipuna soi parama sayānā | śruti siddhānta nīka tehiṁ jānā || soi kabi kobida soi raṇadhīrā | jo chala chāṛi bhajai raghubīrā || dhanya desa so jahām̐ surasarī | dhanya nāri patibrata anusarī || dhanya so bhūpu nīti jo karaī | dhanya so dvija nija dharma na ṭaraī || so dhana dhanya prathama gati jākī | dhanya puṇya rata mati soi pākī || dhanya gharī soi jaba satasaṅgā | dhanya janma dvija bhagati abhaṅgā ||
असली ज्ञानी और गुण वाला वो है जिसका मन राम के चरणों में डूबा है। वही असली पंडित है, वही देने वाला है जो धरम के काम करता है, अपने कुल को बचाता है। जो राम के चरणों में मस्त रहता है, वही सबसे बड़ा होशियार है। जो धोखा छोड़ के रघुबीर की भक्ति करता है, वही असली कवि है, वही रण में हिम्मत वाला है। धन्य है वो देश जहाँ गंगा बहती है। धन्य है वो औरत जो अपने पति के साथ निभाती है। धन्य है वो राजा जो सही काम करता है। धन्य है वो ब्राह्मण जो अपना धरम नहीं छोड़ता। वो पैसा अच्छा है जो पहले भगवान के काम लगता है। वही अच्छा है जो पुण्य के काम में लगा रहता है। वो वक्त अच्छा है जब सत्संग मिलता है। धन्य है वो जन्म जिसमें भक्ति कभी टूटी नहीं।
Verse 256 (दोहा/सोरठा)
सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत। श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत।।127।।
so kula dhanya umā sunu jagata pūjya supunīta | śrīraghubīra parāyana jehiṁ nara upaja binīta ||127||
उमा, सुनो, वो कुल धन्य है। सारी दुनिया उसकी इज़्ज़त करती है, वो बहुत साफ है। जिस घर में ऐसा बंदा पैदा हुआ हो जो रघुबीर के काम में लगा हो, उस घर पर क्या बात है।
Verse 257 (चौपाई)
मति अनुरूप कथा मैं भाषी। जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी।। तव मन प्रीति देखि अधिकाई। तब मैं रघुपति कथा सुनाई।। यह न कहिअ सठही हठसीलहि। जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि।। कहिअ न लोभिहि क्रोधहि कामिहि। जो न भजइ सचराचर स्वामिहि।। द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ। सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ।। राम कथा के तेइ अधिकारी। जिन्ह कें सतसंगति अति प्यारी।। गुर पद प्रीति नीति रत जेई। द्विज सेवक अधिकारी तेई।। ता कहँ यह बिसेष सुखदाई। जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई।।
mati anurūpa kathā maiṁ bhāṣī | jadyapi prathama gupta kari rākhī || tava mana prīti dekhi adhikāī | taba maiṁ raghupati kathā sunāī || yaha na kahia saṭhahī haṭhasīlahi | jo mana lāi na suna hari līlahi || kahia na lobhihi krodhihi kāmihi | jo na bhajai sacarācara svāmihi || dvija drohihi na sunāia kabahūm̐ | surapati sarisa hoi nṛpa jabahūm̐ || rāma kathā ke teī adhikārī | jinha keṁ satasaṅgati ati pyārī || guru pada prīti nīti rata jeī | dvija sevaka adhikārī teī || tā kahaṁ yaha biseṣa sukhadāī | jāhi prānapriya śrīraghurāī ||
मैंने यह कथा तुम्हारी समझ के हिसाब से बोली है। पहले मैंने इसे छुपा के रखा था। पर जब मैंने देखा कि तुम्हारे मन में बहुत प्यार है, तब मैंने रघुपति की कथा सुनाई। यह कथा बुरे और ज़िद्दी लोगों को मत सुनाओ। जो लोग दिल से हरि की बात नहीं सुनते, उनको मत बताओ। ना तो लालच वाले को सुनाओ, ना गुस्से वाले को, ना कामुक लोगों को। जो भगवान की भक्ति नहीं करते, उनको यह मत सुनाओ। कभी भी ब्राह्मण के दुश्मन को यह मत सुनाओ। चाहे वो राजा हो, इंद्र जैसा बड़ा हो। राम की कथा सिर्फ वही सुन सकते हैं जिन्हें सत्संग बहुत प्यारा है। जो गुरु के चरणों से प्यार करते हैं, सही काम करते हैं, ब्राह्मण की सेवा करते हैं, वही इसके हक़दार हैं। जिसको श्री रघुराई जान से भी प्यारा है, उसके लिए यह कथा बहुत खुशी देती है।
Verse 258 (दोहा/सोरठा)
राम चरन रति जो चह अथवा पद निर्बान। भाव सहित सो यह कथा करउ श्रवन पुट पान।।128।।
rāma carana rati jo caha athavā pada nirbāna | bhāva sahita so iya kathā karauṁ śravaṇa puṭa pāna ||128||
जो कोई राम के चरणों में प्यार चाहता है, या फिर मुक्ति चाहता है, वो इस कथा को कानों से पियो। दिल लगा के सुनो, प्यार से सुनो।
Verse 259 (चौपाई)
राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल समनि मनोमल हरनी।। संसृति रोग सजीवन मूरी। राम कथा गावहिं श्रुति सूरी।। एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना। रघुपति भगति केर पंथाना।। अति हरि कृपा जाहि पर होई। पाउँ देइ एहिं मारग सोई।। मन कामना सिद्धि नर पावा। जे यह कथा कपट तजि गावा।। कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं। ते गोपद इव भवनिधि तरहीं।। सुनि सब कथा हृदयँ अति भाई। गिरिजा बोली गिरा सुहाई।। नाथ कृपाँ मम गत संदेहा। राम चरन उपजेउ नव नेहा।।
rāma kathā girijā maiṁ baranī | kali mala samanī manomala haranī || saṁsṛti roga sajīvana mūrī | rāma kathā gāvahiṁ śruti sūrī || ehi maṁ rucira sapta sopānā | raghupati bhagati kera panthānā || ati hari kṛpā jāhi para hoī | pāuṁ dei ehiṁ māraga soī || mana kāmanā siddhi nara pāvā | je yaha kathā kapaṭa taji gāvā || kahahiṁ sunahiṁ anumodana karahīṁ | te gopada iva bhavanidhi tarahīṁ || suni saba kathā hṛdayaṁ ati bhāī | girijā bolī girā suhāī || nātha kṛpāँ mama gata saṁdehā | rāma carana upajeu nava nehā ||
मैंने तुम्हे गिरिजा, राम की कथा सुना दी है। यह कथा कलि युग के दोषों को साफ करती है और मन के मैल को धो देती है। यह कथा संसार के रोग के लिए जीवन दवाई है। वेद और रिशि भी राम की कथा गाते हैं। इस कथा में सात सीढ़ियाँ हैं जो राम के भक्ति के रास्ते हैं। जिस पर हरि की बड़ी कृपा होती है, उसको यह रास्ता मिलता है। जो लोग धोखा छोड़ के यह कथा गाते हैं, उनके मन की इच्छा पूरी होती है। जो लोग यह कथा बोलते हैं, सुनते हैं और खुश होते हैं, वो संसार के समुंदर से आराम से पार हो जाते हैं। पूरी कथा सुन के गिरिजा का दिल बहुत खुश हुआ। उसने प्यार से कहा, नाथ, तुम्हारी कृपा से मेरा सब शक गया। अब राम के चरणों में नया प्यार उठा है।
Verse 260 (दोहा/सोरठा)
मैं कृतकृत्य भइउँ अब तव प्रसाद बिस्वेस। उपजी राम भगति दृढ़ बीते सकल कलेस।।129।।
maiṁ kṛta-kṛtya bhaiuँ aba tava prasāda bisvesa | upajī rāma bhagati dṛḍha bīte sakala kalesa ||129||
अब तुम्हारी कृपा से, विश्वेश्वर, मैं पूरा खुश हो गया हूँ। राम की भक्ति पक्की हो गयी है और सारे दुख दूर हो गए।
Verse 261 (चौपाई)
एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करहु अब कृपानिधाना।। बिप्रगिरा सुनि परहित सानी। एवमस्तु इति भइ नभबानी।। जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा। मैं पुनि दीन्ह कोप करि सापा।। तदपि तुम्हार साधुता देखी। करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी।। छमासील जे पर उपकारी। ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी।। मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि। जन्म सहस अवस्य यह पाइहि।। जनमत मरत दुसह दुख होई। अहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई।। कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना।। रघुपति पुरीं जन्म तब भयऊ। पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ।। पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें। राम भगति उपजिहि उर तोरें।। सुनु मम बचन सत्य अब भाई। हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई।। अब जनि करहि बिप्र अपमाना। जानेहु संत अनंत समाना।। इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला। कालदंड हरि चक्र कराला।। जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्रद्रोह पावक सो जरई।। अस बिबेक राखेहु मन माहीं। तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।। औरउ एक आसिषा मोरी। अप्रतिहत गति होइहि तोरी।।
ehi kara hoi parama kalyānā. soī karahu aba kṛpā-nidhānā.. bipra-girā suni parahita sānī. evam-astu iti bhaī nabha-bānī.. jadapi kīnha ehiṁ dāruṇa pāpā. maiṁ puni dīnha kopa kari sāpā.. tadapi tumhāra sādhutā dekhī. karihaũ ehi para kṛpā biseṣī.. kṣamā-sīla je para upakārī. te dvija mohi priya jathā kharārī.. mora śrāpa dvija byartha na jāihi. janma sahasa avasya yaha pāihi.. janamata marata dusaha dukha hoī. ahi svalpau nahiṁ byāpihi soī.. kavaneuṁ janma miṭihi nahiṁ gyānā. sunahi śūdra mama bacana pravānā.. raghupati purīṁ janma taba bhayū. puni taiṁ mama sevā̃ mana dayū.. purī prabhāva anugraha moreṁ. rāma bhagati upajihi ura toreṁ.. sunu mama bacana satya aba bhāī. hari-toṣana vrata dvija sevakāī.. aba jani karahi bipra apamānā. jānehu santa ananta samānā.. indra kuliśa mama sūla bisālā. kāla-daṇḍa hari cakra karālā.. jo inha kara mārā nahiṁ marai. bipra-droha pāvaka so jarai.. asa bibeka rākhehu mana māhīṁ. tumha kahã jaga durlabha kachu nāhīṁ.. auru eka āsiṣā morī. apratihata gati hoihi torī..
इसमे तुम्हारा बड़ा भला है, अब यह करो, कृपा के देने वाले। ब्राह्मण की बात सुनी, जिसमे दूसरों के भले की बात थी। आकाश से आवाज़ आई, ठीक है। इसने बड़ा पाप किया, मैं गुस्से में श्राप दे दिया। पर तुम्हारी अच्छी बात देख के मैं इस पर खास कृपा करूँगा। जो ब्राह्मण माफ करते हैं और भला करते हैं, वो मुझे उतने प्यारे हैं जितने तुम खरे के दुश्मन हो। मेरा श्राप ब्राह्मण पर व्यर्थ नहीं जाएगा। उसको हज़ार जनम लेने पड़ेंगे। जनम लेने और मरने में बड़ा दुख होगा, थोड़ा भी नहीं बचेगा। किसी भी जनम में ज्ञान नहीं मिटाएगा, सुनो शूद्र, मेरा बोलना सच है। जब रघु पति की नगरी में जनम होगा, तब तुम्हारा मन फिर से मेरी सेवा में लगेगा। उस नगरी के प्रभाव और मेरी कृपा से तुम्हारे दिल में राम भक्ति उठेगी। सुनो मेरा सच बोलना भाई, हरि को खुश करने के लिए ब्राह्मण की सेवा करो। अब ब्राह्मण की बदनाली मत करो, समझो कि संत अनंत जैसे हैं। इंद्र की बिजली, मेरा बड़ा त्रिशूल, काल की डंडी और हरि का चक्र, इन सब से जो मारा नहीं, वो ब्राह्मण से दुश्मनी करने के आग में जलेगा। यह समझ रखो, तुम्हारे लिए दुनिया में कुछ भी मुश्किल नहीं होगा। और एक और आशीर्वाद, तुम्हारा रास्ता रोका नहीं जाएगा।
Verse 262 (दोहा/सोरठा)
सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि। मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि।।109(क)।। प्रेरित काल बिधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल। पुनि प्रयास बिनु सो तनु जजेउँ गएँ कछु काल।।109(ख)।। जोइ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान। जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान।।109(ग)।। सिवँ राखी श्रुति नीति अरु मैं नहिं पावा क्लेस। एहि बिधि धरेउँ बिबिध तनु ग्यान न गयउ खगेस।।109(घ)।।
suni siva bacana haraṣi guru evam-astu iti bhāṣi. mohi prabodhi gayau gṛha śambhu caraṇa ura rākhi..109(ka).. prerita kāla vidhi giri jāi bhayaũ maiṁ byāla. puni prayāsa binu so tanu jajaũ gaẽ kachu kāla..109(kha).. joi tanu dharaũ tajaũ puni anāyāsa hari-jāna. jimi nūtana paṭ pahirai nara pariharai purāna..109(ga).. sivã rākhī śruti nīti aru maiṁ nahiṁ pāvā kleśa. ehi bidhi dhareũ bibidha tanu gyāna na gayau khagesa..109(gha)..
शिव की बात सुन के गुरु खुश हो गए और बोले, ठीक है। मुझे समझा के शिव वापस अपने घर चले गए, पर अपने चरण मेरे दिल में रख गए। काल और विधि के चलते मैं पहाड़ गया और साँप बन गया। फिर बिना किसी तकलीफ के कुछ वक्त बाद वो शरीर छोड़ दिया। जो भी शरीर धाला, उसको आराम से छोड़ दिया, जैसे हरि को जानने वाला करता है। जैसे आदमी नया कपड़ा पहन के पुराना छोड़ देता है। शिव ने मेरे लिए वेद का रास्ता और नीति रखी, मुझे कोई तकलीफ नहीं हुई। इस तरह मैंने कई शरीर धाले, पर ज्ञान नहीं गया, पक्षियों के राजा।
Verse 263 (चौपाई)
त्रिजग देव नर जोइ तनु धरउँ। तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ।। एक सूल मोहि बिसर न काऊ। गुर कर कोमल सील सुभाऊ।। चरम देह द्विज कै मैं पाई। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई।। खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला। करउँ सकल रघुनायक लीला।। प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा। समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा।। मन ते सकल बासना भागी। केवल राम चरन लय लागी।। कहु खगेस अस कवन अभागी। खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी।। प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई। हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई।। भए कालबस जब पितु माता। मैं बन गयउँ भजन जनत्राता।। जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ। आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ।। बूझत तिन्हहि राम गुन गाहा। कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा।। सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा। अब्याहत गति संभु प्रसादा।। छूटी त्रिबिध ईषना गाढ़ी। एक लालसा उर अति बाढ़ी।। राम चरन बारिज जब देखौं। तब निज जन्म सफल करि लेखौं।। जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई। ईस्वर सर्ब भूतमय अहई।। निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई। सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई।।
trijaga deva nara joi tanu dharaũ. tahã tahã rāma bhajana anusaraũ.. eka sūla mohi bisara na kāū. guru kara komala sīla subhāū.. carama deha dvija kai maiṁ pāī. sura durlabha purāna śruti gāī.. khelaũ tahū̃ bālakanha mīlā. karaũ sakala raghunāyaka līlā.. prauṛha bhaẽ mohi pitā paṛhāvā. samajhaũ sunaũ gunaũ nahiṁ bhāvā.. mana te sakala bāsanā bhāgī. kevala rāma caraṇa laya lāgī.. kahu khagesa asa kavan abhāgī. kharī seva sura-dhenūhi tyāgī.. prema magana mohi kachu na sohāī. hāreu pitā paṛhāi paṛhāī.. bhae kāla-basa jaba pitu mātā. maiṁ bana gayaũ bhajana jana-trātā.. jahã jahã bipina munīsvara pāvaũ. āśrama jāi-jāi siru nāvaũ.. būjhat tinhahi rāma guna gāhā. kahahiṁ sunaũ haraṣita khaga-nāhā.. sunata phiraũ hari guna anubādā. avyāhata gati śambhu prasādā.. chūṭī tribidha īṣanā gāṛhī. eka lālasā ura ati bāṛhī.. rāma caraṇa bārija jaba dekhaũ. taba nija janma saphala kari lekhaũ.. jehi pū̃chhaũ soī muni asa kahai. īsvara sarba bhūta-maya ahaī.. nirguna mata nahiṁ mohi sohāī. saguna brahma rati ura adhikāī..
तीनों दुनिया में देव या मनुष्य, जो भी शरीर धाला, वहीं वहीं राम भजन करता गया। एक बात मुझे कभी नहीं भूलनी, गुरु का नरम स्वभाव और अच्छा मन। आखिरी बार ब्राह्मण का शरीर मिला, जो देवों के लिए भी मुश्किल है, पुराण और वेद में लिखा है। वहाँ बच्चों के साथ खेला और रघु नायक की सारी लीला की। जब बड़ा हुआ तो पापा ने पढ़ाया, समझा, सुना, पर मुझे कुछ भी पसंद नहीं आया। मन की सारी इच्छाएँ भाग गईं, बस राम के चरणों में लगे रहना। बताओ पक्षियों के राजा, इतना बुरा किस्मत वाला कौन है जो अमृत देने वाली गाय को छोड़ दे। प्रेम में इतना डूबा था कि कुछ भी अच्छा नहीं लगता था, पापा थक गए पढ़ा पढ़ के। जब मम्मी पापा का वक्त आ गया, मैं जंगल चला गया भजन करने। जहाँ भी जंगल में बड़े रिशि मिले, उनके आश्रम जा के सर झुकाया। उनसे राम के गुण गाते हुए सुना, वो बोले और मैं खुशी से सुना। सुनते सुनते हरि के गुणों का गाना गया, शिव की कृपा से रास्ता टूटा नहीं। तीन तरह की इच्छाएँ छूट गईं, एक ही चाहत दिल में बड़ी हो गई। राम के चरणों के कमल जब देखूँ, तब अपना जनम सफल समझूँ। जिससे पूछा वो मुनि वही बोले, ईश्वर सब में है। निर्गुण वाली बात मुझे पसंद नहीं, सगुण ब्रह्म का प्यार दिल में ज़्यादा है।
Verse 264 (दोहा/सोरठा)
गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग। रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग।।110(क)।। मेरु सिखर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन। देखि चरन सिरु नायउँ बचन कहेउँ अति दीन।।110(ख)।। सुनि मम बचन बिनीत मृदु मुनि कृपाल खगराज। मोहि सादर पूँछत भए द्विज आयहु केहि काज।।110(ग)।। तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्बग्य सुजान। सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहहु भगवान।।110(घ)।।
gura ke bacana surati kari rāma caraṇa manu lāga. raghupati jasa gāvata phiraũ chana-chana nava anurāga..110(ka).. meru śikhara baṭa chāyā̃ muni lomasa āsīna. dekhi caraṇa siru nāyaũ bacana kaheũ ati dīna..110(kha).. suni mama bacana binīta mṛdu muni kṛpāla khaga-rāja. mohi sādar pū̃chhata bhae dvija āyahu kehi kāja..110(ga).. taba maiṁ kahā kṛpā-nidhi tumha sarbagya sujāna. saguna brahma avarādhana mohi kahahu bhagavāna..110(gha)..
गुरु के बोल याद करके मैंने राम के चरणों में मन लगा दिया। मैं रघुपति की महिमा गाता फिरता था, हर पल नयी प्रीत होती गयी। मेरु पर्वत के ऊपर, एक पेड़ की छाँव में, रिशि लोमस बैठा था। मैं उनके चरणों को देख कर सिर झुकाया और बहुत विनम्रता से बात की। मेरी नरम और विनम्रता भरी बात सुन कर वो दयालु रिशि ने पूछा, पक्षियों के राजा, तुम ब्राह्मण हो, क्या काम से आए हो? तब मैंने कहा, तुम दया के भंडार हो, सब कुछ जानते हो, मुझे सगुन भगवान की पूजा सिखाओ।
Verse 265 (चौपाई)
तब मुनिष रघुपति गुन गाथा। कहे कछुक सादर खगनाथा।। ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानि। मोहि परम अधिकारी जानी।। लागे करन ब्रह्म उपदेसा। अज अद्वेत अगुन हृदयेसा।। अकल अनीह अनाम अरुपा। अनुभव गम्य अखंड अनूपा।। मन गोतीत अमल अबिनासी। निर्बिकार निरवधि सुख रासी।। सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहि बेदा।। बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा। निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा।। पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा। सगुन उपासन कहहु मुनीसा।। राम भगति जल मम मन मीना। किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना।। सोइ उपदेस कहहु करि दाया। निज नयनन्हि देखौं रघुराया।। भरि लोचन बिलोकि अवधेसा। तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा।। मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा। खंडि सगुन मत अगुन निरूपा।। तब मैं निर्गुन मत कर दूरी। सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी।। उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा। मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा।। सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ। उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ।। अति संघरषन जौं कर कोई। अनल प्रगट चंदन ते होई।।
taba muniṣa raghupati guna gāthā. kahe kachuka sādar khaga-nāthā.. brahma-gyāna rata muni bigyānī. mohi parama adhikārī jānī.. lāge karana brahma upadesā. aja advaita aguṇa hṛdayesā.. akala anīha anāma arūpā. anubhava gamya akhaṇḍa anūpā.. mana-gotīta amala abināsī. nirbikāra niravadhi sukha rāsī.. so taiṁ tāhi tohi nahiṁ bhedā. bāri bīci iva gāvahi bedā.. bibidha bhā̃ti mohi muni samujhāvā. nirguna mata mama hṛdayã na āvā.. puni maiṁ kaheũ nāi pada sīsā. saguna upāsana kahahu munīsā.. rāma bhagati jala mama mana mīnā. kimi bilagāi munīsa prabīnā.. soī upadesa kahahu kari dāyā. nija nayananhi dekhaũ raghurāyā.. bhari locana biloki avadhesā. taba sunihaũ nirguna upadesā.. muni puni kahi hari-kathā anūpā. khaṇḍi saguna mata aguṇa nirūpā.. taba maiṁ nirguna mata kara dūrī. saguna nirūpaũ kari haṭha bhūrī.. uttara prati-uttara maiṁ kīnhā. muni tana bhae krodha ke cīnhā.. sunu prabhu bahuta avagyā kiẽ. upaja krodha gyāninha ke hiẽ.. ati saṅgharṣana jaũ kara koī. anala pragaṭa candana te hoī..
तब रिशि ने रघुपति की महिमा सुनाई, पक्षियों के राजा। वो ज्ञान में मगन रिशि ने मुझे समझदार समझा। फिर उन्होंने ब्रह्म के बारे में समझाया, जो पैदा नहीं हुआ, दूसरा नहीं, गुणों से रहित, दिल में बसने वाला। सोच से परे, इच्छा नहीं, नाम नहीं, रूप नहीं, अनुभव से जाना जाता है, टूटा नहीं, जैसा कुछ नहीं। मन से परे, साफ, नाश नहीं होने वाला, बदलाव नहीं, अनंत सुख का भंडार। वेद बोलते हैं, तू और वो अलग नहीं, जैसे पानी और लहरें। रिशि ने बहुत तरीके से समझाया, पर निर्गुण बात मेरे दिल में नहीं बिठी। फिर मैंने सिर झुका कर कहा, रिशि, मुझे सगुण भगवान की पूजा बताओ। मेरा मन राम भक्ति के पानी में मछली है, उसे कैसे अलग करोगे? दया करके वो उपदेश दो जिससे मैं अपने आँखों से रघुराया को देख सकूँ। जब मेरी आँखों में अयोध्या के स्वामी का दर्शन होगा, तब निर्गुण सुनाऊँगी। रिशि ने फिर हरि की कथा सुनाई, सगुण को हटाकर निर्गुण बताया। पर मैंने निर्गुण बात छोड़ दी, सगुण ही पकड़ा। मैं उनसे सवाल जवाब करता रहा, रिशि के बदन पर गुस्सा दिखने लगा। सुनो प्रभु, मैंने बहुत बदतमीज़ी की, ज्ञान वालों के दिल में भी गुस्सा आ सकता है। अगर कोई बहुत रगड़े, तो चंदन में भी आग निकल आती है।
Verse 266 (चौपाई)
ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा।। जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई। सो कैवल्य परम पद लहई।। अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद। राम भजत सोइ मुकुति गोसाई। अनइच्छित आवइ बरिआई।। जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भाँति कोउ करै उपाई।। तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई। रहि न सकइ हरि भगति बिहाई।। अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने।। भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अबिद्या नासा।। भोजन करिअ तृपिति हित लागी। जिमि सो असन पचवै जठरागी।। असि हरिभगति सुगम सुखदाई। को अस मूढ़ न जाहि सोहाई।।
gyāna pantha kṛpāna kai dhārā | parata khagesa hoi nahiṁ bārā || jo nirbighna pantha nirbahai | so kaivalya parama pada lahai || ati durlabha kaivalya parama pada | santa purāna nigama āgama bada || rāma bhajata soi mukuti gosāī | an-icchita āvai bariāī || jimi thala binu jala rahi na sakāī | koṭi bhāँti kou karai upāī || tathā moccha sukha sunu khagarāī | rahi na sakai hari bhagati bihāī || asa bicāri hari bhagata sayāne | mukti nirādara bhagati lubhāne || bhagati karata binu jatana prayāsā | saṁsṛti mūla abidyā nāsā || bhojana kari-a tṛpiti hita lāgī | jimi so asana pacavai jaṭharāgī || asi hari-bhagati sugama sukhadāī | ko asa mūṛha na jāhi sohāī ||
ज्ञान का रास्ता तलवार की धार जैसा है, पक्षियों के राजा, आसान नहीं है। जो बिना रुकावट इस रास्ते को पूरा करता है वो सबसे बड़ा पद पाता है। पर वो पद मिलना बहुत मुश्किल है, संत, पुरान, वेद सब यही कहते हैं। जो राम की भक्ति करता है उसको मुक्ति अपने आप मिल जाती है, माँगने की ज़रूरत नहीं। जैसे ज़मीन पानी के बिना नहीं रह सकती, चाहे कोई हज़ार तरीके ट्राई करे, वैसे ही मोक्ष का सुख हरि भक्ति के बिना नहीं रह सकता। ये सोच कर समझदार भक्त मुक्ति की परवाह नहीं करते, बस भक्ति में लगे रहते हैं। भक्ति करते रहो, कोई मेहनत नहीं, और संसार की जड़, अंधेरा, सब खत्म हो जाएगा। जैसे खाना खाने से पेट भरता है और अग्नि उसे पचाती है, वैसे हरि भक्ति आसान है और सुख देती है, कौन इतना बेवकूफ है जो इसे न चाहे?
Verse 267 (दोहा/सोरठा)
सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि।। भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि।।119(क)।। जो चेतन कहँ ज़ड़ करइ ज़ड़हि करइ चैतन्य। अस समर्थ रघुनायकहिं भजहिं जीव ते धन्य।।119(ख)।।
sevaka sebyā bhāva binu bhava na tari-a uragāri | bhajahu rāma pada paṅkaja asa siddhānta bicāri ||119(ka)|| jo cetana kahaँ jaṛa karai jaṛahi karai caitanya | asa samartha raghunāyakahiṁ bhajahiṁ jīva te dhanya ||119(kha)||
जब तक दिल में सेवक और स्वामी का भाव नहीं होता, तब तक संसार समुंदर से पार नहीं होता, नागरों के दुश्मन। राम के चरणों की भक्ति करो, यही सही बात है। जो चेतन को जड़ बना दे और जड़ में भी चेतना ला दे, ऐसी शक्ति वाले रघुनायक की भक्ति करते हैं वो जीव धन्य हैं।
Verse 268 (चौपाई)
कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई। सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई।। राम भगति चिंतामनि सुंदर। बसइ गरुड़ जाके उर अंतर। परम प्रकास रूप दिन राती। नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती। मोह दरिद्र निकट नहिं आवा। लोभ बात नहिं ताहि बुझावा। प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई। हारहिं सकल सलभ समुदाई। खल कामादि निकट नहिं जाहीं। बसइ भगति जाके उर माहीं। गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई। ब्यापहिं मानस रोग न भारी। जिन्ह के बस सब जीव दुखारी। राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें। चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं। जे मनि लागि सुजतन कराहीं। सो मनि जदपि प्रगट जग अहई। राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई। सुगम उपाय पाइबे केरे। नर हतभाग्य देहिं भटमेरे। पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना। मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी। भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी। मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा। राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा। सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई। अस बिचारि जोइ कर सतसंगा। राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा।।
kaheūँ gyāna siddhānta bujhāī | sunahu bhagati mani kai prabhutāī || rāma bhagati cintāmaṇi sundara | basai garuṛa jāke ura antara || parama prakāsa rūpa dina rātī | nahiṁ kachu cahi-a diā ghṛta bātī || moha daridra nikaṭa nahiṁ āvā | lobha bāta nahiṁ tāhi bujhāvā || prabala abidyā tama miṭi jāī | hārahiṁ sakala salabha samudāī || khala kāmādi nikaṭa nahiṁ jāhīṁ | basai bhagati jāke ura māhīṁ || garala sudhā-sama ari hita hoī | tehi mani binu sukha pāva na koī || byāpahiṁ mānasa roga na bhārī | jinh ke basa saba jīva dukhārī || rāma bhagati mani ura basa jākeṁ | dukha lava-lesa na sapanehuँ tākeṁ || catura siromaṇi teī jaga māhīṁ | je mani lāgi sujatana karāhīṁ || so mani jadapi pragaṭa jaga ahaī | rāma kṛpā binu nahiṁ kou lahaī || sugama upāya pāibe kere | nara hatabhāgya dehiṁ bhaṭamere || pāvana parbata beda purānā | rāma kathā rucirākara nānā || marmī sajjana sumati kudārī | gyāna birāga nayana uragārī || bhāva sahita khojai jo prānī | pāva bhagati mani saba sukha khānī || moreṁ mana prabhu asa bisvāsā | rāma te adhika rāma kara dāsā || rāma sindhu ghana sajjana dhīrā | candana taru hari santa samīrā || saba kara phala hari bhagati suhāī | so binu santa na kāhūँ pāī || asa bicāri joi kara satasaṅgā | rāma bhagati tehi sulabha bihangā ||
मैंने ज्ञान की बात समझा दी, अब भक्ति मणि की ताकत सुनो। राम भक्ति एक सुंदर चिंतामणि है, गरुड़, जिसके दिल में यह रहती है। यह रोशनी है, दिन रात चमकती है, दिया या तेल की ज़रूरत नहीं। मोह और गरीबी पास नहीं आती, लोभ की हवा इसे बुझा नहीं सकती। अंधेरा मिट जाता है, काम और दोष पास नहीं आते जहाँ भक्ति दिल में है। ज़हर भी अमृत बन जाता है, दुश्मन भी अपना बन जाता है, बिना इस मणि के कोई सच्चा सुख नहीं पाता। मन के बड़े रोग नहीं सताते, जिनके दिल में यह मणि हो। दुख का नाम नहीं, सपने में भी नहीं। जो लोग इस मणि के लिए कोशिश करते हैं वो दुनिया में समझदार हैं। यह मणि दुनिया में है, पर राम की कृपा बिना कोई नहीं पाता। रास्ता आसान है, पर किस्मत वाले ही पाते हैं। पवित्र पर्वत, वेद, पुरान, राम की कथा, समझदार संत, अच्छा ज्ञान, ये सब मदद करते हैं। जो दिल से ढूंढ़ता है वो भक्ति मणि पाता है, जो सब सुख का खानी है। मेरे मन का यह विश्वास है, राम का दास राम से भी बड़ा है। राम समुंदर है, बारिश का बादल, संत हवा की तरह हैं। सब का फल हरि भक्ति है, संत के बिना कोई नहीं पाता। ये सोच कर जो सत्संग करता है, उसे राम भक्ति आसान मिल जाती है।
Verse 269 (दोहा/सोरठा)
ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं। कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं।।120(क)।। बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि। जय पाइअ सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि।।120(ख)।।
brahma payonidhi mandara gyāna santa sura āhiṁ | kathā sudhā mathi kāḍhahiṁ bhagati madhuratā jāhiṁ ||120(ka)|| birati carma asi gyāna mada lobha moha ripu māri | jaya pāi-a so hari bhagati dekhu khagesa bicāri ||120(kha)||
ब्रह्मा एक समुंदर है, और ज्ञान मंदरा पर्वत है। संत और देवता सब उसमें हैं। यह कथा अमृत जैसे है, उससे भक्ति निकालते हैं, जो सबसे मीठी चीज़ है। विरति एक चमड़ा पट्टी है, और ज्ञान की तलवार से अहंकार, लोभ और मोह को मारते हैं, यह सब दुश्मन हैं। जो जीत मिलती है वो हरि की भक्ति है, गरुड़, तुम भी यह सोचो।
Verse 270 (चौपाई)
पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ।। नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न कहहु बखानी।। प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा।। बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी।। संत असंत मरम तुम्ह जानहु। तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु।। कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला। कहहु कवन अघ परम कराला।। मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई।। तात सुनहु सादर अति प्रीती। मैं संछेप कहउँ यह नीती।। नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही।। नरग स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी।। सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर।। काँच किरिच बदलें ते लेही। कर ते डारि परस मनि देहीं।। नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं।। पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया।। संत सहहिं दुख परहित लागी। परदुख हेतु असंत अभागी।। भूर्ज तरू सम संत कृपाला। परहित निति सह बिपति बिसाला।। सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई।। खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहि मूषक इव सुनु उरगारी।। पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं।। दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू।। संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी।। परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। पर निंदा सम अघ न गरीसा।। हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्त्र पाव तन सोई।। द्विज निंदक बहु नरक भोग करि। जग जनमइ बायस सरीर धरि।। सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी।। होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत।। सब के निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं।। सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा।। मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।। काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा।। प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई।। बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना।। ममता दादु कंडु इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई।। पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई।। अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ।। तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी। त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी।। जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहँ लागि कहौं कुरोग अनेका।।
puni sa-prema boleu khagarāū | jauṁ kṛpāla mohi ūpara bhāū || nātha mohi nija sevaka jānī | sapta prasna kahahu bakhānī || prathamahiṁ kahahu nātha matidhīrā | saba te durlabha kavan sarīrā || baṛa dukha kavan kavan sukha bhārī | sou saṅkṣepahiṁ kahahu bicārī || santa asanta marama tumha jānahu | tinh kara sahaja subhāva bakhānahu || kavan punya śruti bidita bisālā | kahahu kavan agha parama karālā || mānasa roga kahahu samujhāī | tumha sarbagya kṛpā adhikāī || ... (remaining chaupais as given)
फिर गरुड़ ने प्यार से कहा, अगर आप मुझपे कृपा करते हैं, तो मुझे अपना सेवक मान के सात सवाल बताएं। पहला सवाल, सबसे मुश्किल कौनसा शरीर मिलता है? सबसे बड़ा दुख क्या है, और सबसे बड़ा सुख क्या है, थोड़ा समझ के बताएं। आप संत और असंत के बारे में जानते हैं, उनका असली स्वभाव बताइए। वेदों में कौनसा पुण्य सबसे बड़ा है, और कौनसा पाप सबसे भयानक है? मन के रोग क्या हैं, आप सब जानते हैं और बहुत कृपा करते हैं। भूषुंडि ने कहा, बेटा, प्यार से सुनो, मैं यह बात थोड़ी में बताता हूं। कोई भी शरीर इंसान के शरीर जैसा नहीं, सब जीव इसके लिए तरसते हैं। यह नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है, इससे ज्ञान, विरक्ति और अच्छी भक्ति मिलती है। जो यह शरीर पाके भी हरि को नहीं भजते, वो संसार में फंसे रहते हैं, जैसे कोई कांच की तलवार लेके छोड़ो दे, और हाथ में मणि रख के फेंक दे। दुनिया में गरीबी जैसा दुख नहीं, और संत से मिलने जैसा सुख नहीं। दूसरों का भलाई करना, बोल में, मन में, काम में, यह संत का स्वभाव है। संत दूसरों के लिए दुख सहते हैं, असंत दूसरों को दुख देते हैं। जैसे भोज ट्री बहुत सहन करता है, वैसे संत लोगों की भलाई के लिए बड़ी मुसीबत सहते हैं। लेकिन बुरे लोग दूसरों को बांधते हैं जैसे सन, और फिर भी मर जाते हैं। बुरे लोग बिना अपना फायदा के दूसरों का नुकसान करते हैं, जैसे सांप या चूहा। दूसरों की खुशी को बरबाद करते हैं जैसे पाला चांद की रोशनी को खत्म करता है। बुरे लोग उठने से दुनिया दुखी होती है, जैसे केतु ग्रह। संत लोग उठने से दुनिया खुश होती है, जैसे चांद अंधेरा दूर करता है। सबसे बड़ा धरम जो वेद बताते हैं वो अहिंसा है, किसी का बुरा मत कहो। जो हरि या गुरु की बुराई करते हैं वो मेंढक बनते हैं, हजारों जनम तक। जो ब्राह्मण की बुराई करते हैं वो बहुत नरक झेलेंगे, फिर कौवे बनते हैं। जो वेद की बुराई करते हैं वो रौरव नरक में जाते हैं। जो संत की बुराई करते हैं वो उल्लू बनते हैं, अंधेरे में रहते हैं, ज्ञान का सूरज नहीं। जो सबकी बुराई करते हैं वो चमगादर बनते हैं। अब सुनो बेटा, मन के रोग क्या हैं, जिससे सब दुखी हैं। मोह सब रोग की जड़ है, उससे बहुत तकलीफ होती है। काम हवा है, लोभ कफ है, और गुस्सा पित्त है जो हमेशा सीना जलाता है। जब यह तीन मिल जाते हैं, बड़ा बीमारी होती है। संसार की इच्छा, यह सब दर्द हैं। ममता खुजली है, ईर्ष्या भी खुजली है, खुशी, दुख, और बहुत चीज़ें। दूसरों की खुशी देख के जलना, यह क्षय रोग है। बुरा मन का टेढ़ापन है। अहंकार ढोल है जो दुख बजाता है, दंभ, कपट, नशा और अभिमान जाल हैं। इच्छा पेट फूलना है, तीन तरह की इच्छा बंधन है। ईर्ष्या, बुरा बीमारी, कहां तक बताएं, बहुत हैं।
In this Uttar Kāṇḍa passage the rasa is predominantly Śānta, thickened by Karuṇā and uplifted by Adbhuta: the wonder is not a battlefield miracle but the miracle of transformation—‘राम भगति चिंतामनि सुंदर।’ Tulasidas’ theological architecture here is explicitly sopānic: the kathā itself becomes a staircase whose steps are faith, satsanga, vairāgya, jñāna, and perfected devotion. The discourse moves by didactic crescendos: first bhakti’s sovereignty (it repels moha, lobha, kāma), then the ethics of audience (who deserves kathā), then the medical metaphor of मानस-रोग and the single panacea of Hari-bhajan. The nirguṇa/saguṇa synthesis is achieved by placing ‘श्रुति सिद्धांत’ (neti-neti knowledge) inside the heart’s affective certainty: jñāna without bhakti is sterile, while bhakti carries jñāna as its inner lamp—‘नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती।’ Thus the Uttar Kāṇḍa functions as Manas’ seal and key: it authorizes the entire poem as liberation-practice.
Traditional Manas-belief: hearing this kathā with faith destroys ‘भव-पासा’ and ‘मन-क्रम-बचन जनित अघ’ (cf. ‘सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा’), cures the मानस-रोग of moha/kāma/lobha, and plants ‘राम चरन उपजेउ नव नेह’—steadfast devotion that outlasts all kleshas.
Common satsang practice (regional): ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ as nāma-samput; and in bhakti-catechism passages many add ‘राम नाम’/‘सियाराम’ between doha-cadences. (Exact samput varies by maṭh/sampradāy; the text itself foregrounds nāma as ‘भव भेषज’.)
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