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सोपान-प्रवेश: ‘श्रवण-श्रद्धा’ से ‘दर्शन-लालसा’ तक। बालकाण्ड में भक्ति का बीज (कथा-श्रवण) अंकुरित होता है—हरि की अनंत लीला का आश्रय लेकर साधक माया-मोह की पहचान करता है और सगुण-दर्शन की आकांक्षा जगाता है। यह चरण ‘कथा’ को साधना बनाकर हृदय को शुद्ध करता है, जिससे आगे के काण्डों में त्याग, मर्यादा और प्रेम-भक्ति का भवन खड़ा हो सके।
यह प्रकरण ‘सोपान-प्रवेश’ का प्रतीक है—श्रवण-श्रद्धा से दर्शन-लालसा तक की यात्रा। हरि-चरित की ‘अनंतता’ साधक को सीमित बुद्धि के अहं से मुक्त करती है: कथा कभी समाप्त नहीं, इसलिए साधना भी निरंतर। ‘कल्प-कल्प अवतरण’ समय-चक्र में करुणा की पुनरावृत्ति का संकेत है—ईश्वर दूर नहीं, युग-युग में निकट आते हैं। ‘माया’ यहाँ शत्रु-रूप नहीं, परीक्षा-रूप है: ज्ञान, तप, पद—सब पर पर्दा पड़ सकता है; अतः एकमात्र सुरक्षित आश्रय हरिकथा/नाम। निर्गुण (अज, अगुण, अरूप) का कथन ‘नेति-नेति’ द्वारा मन को निरहंकार करता है, और वही तत्त्व भक्त-हित हेतु सगुण-लीलातनु धारण करता है—यही मनस की रीढ़ ‘सिद्धान्त-संगति’ है। मनु–शतरूपा की तपस्या ‘दर्शन’ को पुरस्कार नहीं, ‘अनुग्रह’ बनाती है: साधक की पात्रता श्रवण-मनन-तप/निष्ठा से पकती है और अंततः सगुण-दर्शन की आकांक्षा जागती है।
Verse 298 (दोहा/सोरठा)
सो मैं तुम्ह सन कहउँ सबु सुनु मुनीस मन लाई। राम कथा कलि मल हरनि मंगल करनि सुहाइ।।141।।
so maiṁ tumha sana kahauṁ sabu sunu munīsa mana lāī. rāma kathā kali mala harani maṅgala karani suhāī ||141||
तो मैं तुम्हे पूरा बताता हूँ। ध्यान से सुनो। राम की कहानी सुनने में अच्छी लगती है। यह कलि युग के पाप धोलती है और भला करती है।
Verse 299 (चौपाई)
स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा।। दंपति धरम आचरन नीका। अजहुँ गाव श्रुति जिन्ह कै लीका।। नृप उत्तानपाद सुत तासू। ध्रुव हरि भगत भयउ सुत जासू।। लघु सुत नाम प्रिय्रब्रत ताही। बेद पुरान प्रसंसहि जाही।। देवहूति पुनि तासु कुमारी। जो मुनि कर्दम कै प्रिय नारी।। आदिदेव प्रभु दीनदयाला। जठर धरेउ जेहिं कपिल कृपाला।। सांख्य सास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना। तत्व बिचार निपुन भगवाना।। तेहिं मनु राज कीन्ह बहु काला। प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला।।
svāyaṃbhū manu aru śatarūpā | jinha teṃ bhai nara-sṛṣṭi anūpā || daṃpati dharama ācarana nīkā | ajahũ gāva śruti jinha kai līkā || nṛpa uttānapāda suta tāsū | dhruva hari-bhagata bhayau suta jāsū || laghu suta nāma priyrabrata tāhī | beda purāna prasaṃsahi jāhī || devahūti puni tāsū kumārī | jo muni kardama kai priya nārī || ādi-deva prabhu dīna-dayālā | jaṭhara dhareu jehĩ kapila kṛpālā || sāṃkhya sāstra jinha pragaṭa bakhānā | tatva bicāra nipuna bhagavānā || tehĩ manu rāja kīnha bahu kālā | prabhu āyasu saba bidhi pratipālā ||
स्वयंभूव मनु और शतरूपा से इंसानी दुनिया शुरू हुई। दोनों पत्नी-पति थे, धरम अच्छे से पालते थे। वेद अभी तक उनकी बात करते हैं। राजा उत्तानपाद उनका बेटा था। उसका बेटा ध्रुव हुआ, जो हरि का भक्त बना। छोटा बेटा प्रियव्रत था, जिसको वेद और पुरान गाते हैं। देवहूति उनकी बेटी थी। वो रिशि कर्दम की पत्नी थी। उसके पेट में भगवान ने कपिल रूप लिया। उन्होंने सांख्य शास्त्र बताया। वो तत्व समझने में माहिर थे। मनु ने बहुत देर तक राज किया। प्रभु की आज्ञा के हिसाब से सब संभाला।
Verse 300 (दोहा/सोरठा)
होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन। हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु।।142।।
hoi na biṣaya birāga bhavana basata bhā cautʰapana. hṛdayã bahuta dukha lāga janama gayau haribhagati binu ||142||
दुनिया के सुख से मेरा मन नहीं लगता। घर में रह के भी वैराग्य नहीं आया। उम्र हो गई है। दिल में बहुत दुख है। हरि की भक्ति के बिना जनम बर्बाद हो गया।
Verse 301 (चौपाई)
बरबस राज सुतहि तब दीन्हा। नारि समेत गवन बन कीन्हा।। तीरथ बर नैमिष बिख्याता। अति पुनीत साधक सिधि दाता।। बसहिं तहाँ मुनि सिद्ध समाजा। तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा।। पंथ जात सोहहिं मतिधीरा। ग्यान भगति जनु धरें सरीरा।। पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा। हरषि नहाने निरमल नीरा।। आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी। धरम धुरंधर नृपरिषि जानी।। जहँ जँह तीरथ रहे सुहाए। मुनिन्ह सकल सादर करवाए।। कृस सरीर मुनिपट परिधाना। सत समाज नित सुनहिं पुराना।।
barabasa rāja sutahi taba dīnhā | nāri sameta gavana bana kīnhā || tīratha bara naimiṣa bikhyātā | ati punīta sādhaka sidhi dātā || basahiṁ tahāṁ muni siddha samājā | tahaṁ hiyaṁ haraṣi caleu manu rājā || pantha jāta sohahiṁ mati-dhīrā | gyāna bhagati janu dhareṁ sarīrā || pahuṁce jāi dhenumati tīrā | haraṣi nahāne niramala nīrā || āe milana siddha muni gyānī | dharama dhuraṁdhara nṛpa-ṛṣi jānī || jahaṁ-jahaṁ tīratha rahe suhāe | muninha sakala sādara karavāe || kṛsa sarīra muni-paṭa paridhānā | sata samāja nita sunahiṁ purānā ||
राजा ने राजकुमार को मजबूरी में वन भेज दिया। वो अपनी पत्नी के साथ चले गए। नैमिष एक बड़ा तीरथ है, सब जानते हैं। यहाँ तप करने वालों को सिधि मिलती है। वहाँ बहुत सारे रिशि और सिद्ध लोग रहते थे। राजा मनु खुशी से वहाँ चले गए। रास्ते में वो लोग चमक रहे थे, जैसे ज्ञान और भक्ति इंसान बन के चल रहे हो। धेनुमति नदी के किनारे पहुँच के वो खुशी से नहाए। वहाँ का पानी बिल्कुल साफ था। सिद्ध, रिशि और ज्ञान वाले लोग मिलने आए। उन्होंने राजा को धरम का बड़ा आदमी जाना। जहाँ-जहाँ अच्छे तीरथ थे, रिशियों ने सब दिखाया। वो लोग पतले थे, रिशियों जैसे कपड़े पहने थे। रोज़ सत संग सुनते थे और पुराण सुनते थे।
Verse 302 (दोहा/सोरठा)
द्वादस अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग। बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग।।143।।
dvādasa acchara mantra puni japahiṃ sahita anurāga | bāsudeva pada paṅkaruha daṃpati mana ati lāga ||143||
वो दोनों बारह अक्षर वाला मंत्र जपते थे, दिल से। बासुदेव के चरणों में उनका मन पूरा लगा था।
Verse 303 (चौपाई)
करहिं अहार साक फल कंदा। सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा।। पुनि हरि हेतु करन तप लागे। बारि अधार मूल फल त्यागे।। उर अभिलाष निंरंतर होई। देखअ नयन परम प्रभु सोई।। अगुन अखंड अनंत अनादी। जेहि चिंतहिं परमारथबादी।। नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा।। संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना।। ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई। भगत हेतु लीलातनु गहई।। जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा। तौ हमार पूजहि अभिलाषा।।
karahiṁ ahāra sāka phala kandā | sumirahiṁ brahma saccidānandā || puni hari hetu karana tapa lāge | bāri adhāra mūla phala tyāge || ura abhilāṣa niṁratara hoī | dekha na yana parama prabhu soī || aguna akhaṇḍa anaṁta anādī | jehi ciṁtahiṁ paramārathabādī || neti neti jehi beda nirūpā | nijānanda nirupādhi anūpā || saṁbhu biraṁci biṣṇu bhagavānā | upajahiṁ jāsu aṁsa teṁ nānā || aiseu prabhu sevaka basa ahaī | bhagata hetu līlā-tanu gahaī || jauṁ yaha bacana satya śruti bhāṣā | tau hamāra pūjahi abhilāṣā ||
वो पत्ते, फल और कंद खाते थे। ब्रह्म को याद रखते थे जो सच्चिदानंद है। फिर भगवान के लिए तप किया। सिर्फ पानी पिया, फल और कंद छोड़ दिए। दिल में एक ही इच्छा थी कि भगवान को अपने आँखों से देखें। वो भगवान बिना गुण के हैं, बिना टुकड़े के, जिसका न आदि है न अंतिम। जिन्हें ज्ञान वाले लोग ध्यान करते हैं। वेद भी कहते हैं नेति नेति, मतलब यह नहीं वो नहीं। वो खुद में खुश है, किसी के बराबर नहीं। शिव, ब्रह्मा, विष्णु सब उसी के अंश से बनते हैं। फिर भी वो अपने भक्तों के काम आते हैं। भक्ति के लिए शरीर ले लेते हैं। अगर यह बात सच है तो हमारी इच्छा पूरी होगी।
Verse 304 (दोहा/सोरठा)
एहि बिधि बीतें बरष षट सहस बारि आहार। संबत सप्त सहस्त्र पुनि रहे समीर अधार।।144।।
ehi bidhi bīteṁ baraṣ ṣaṭ sahas bāri āhāra | saṁbat sapta sahastra puni rahe samīra adhāra ||144||
छह हज़ार साल सिर्फ पानी पिया। फिर सात हज़ार साल सिर्फ हवा से ज़िंदा रहा।
Verse 305 (चौपाई)
बरष सहस दस त्यागेउ सोऊ। ठाढ़े रहे एक पद दोऊ।। बिधि हरि तप देखि अपारा। मनु समीप आए बहु बारा।। मागहु बर बहु भाँति लोभाए। परम धीर नहिं चलहिं चलाए।। अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा। तदपि मनाग मनहिं नहिं पीरा।। प्रभु सर्बग्य दास निज जानी। गति अनन्य तापस नृप रानी।। मागु मागु बरु भै नभ बानी। परम गभीर कृपामृत सानी।। मृतक जिआवनि गिरा सुहाई। श्रबन रंध्र होइ उर जब आई।। ह्रष्टपुष्ट तन भए सुहाए। मानहुँ अबहिं भवन ते आए।।
baraṣa sahasa dasa tyāgeu soū. ṭhāṛhe rahe eka pada doū.. bidhi hari tapa dekhi apārā. manu samīpa āe bahu bārā.. māgahu bara bahu bhā̃ti lobhāe. parama dhīra nahĩ calahĩ calāe.. asthimātra hoi rahe sarīrā. tadapi manāga manahĩ nahĩ pīrā.. prabhu sarbagya dāsa nija jānī. gati ananya tāpasa nṛpa rānī.. māgu māgu baru bhai nabha bānī. parama gabhīra kṛpāmṛta sānī.. mṛtaka jiāvani girā suhāī. śrabana raṁdhra hoi ura jaba āī.. hraṣṭa-puṣṭa tana bhae suhāe. mānahũ abahĩ bhavana te āe..
दस हज़ार साल और तप किया, कुछ भी नहीं खाया। एक पैर उठा के खड़ा रहा। ब्रह्मा और विष्णु ने उसका तप देख के बहुत बार आया। बोले, माँग लो कोई वरद। पर वो नहीं माना। उसका शरीर सिर्फ हड्डी रह गया था। फिर भी उसको कोई तकलीफ नहीं थी। भगवान ने जाना कि यह मेरा अपना बंदा है। रानी भी उसके साथ थी, दोनों के सिर्फ एक ही मन था। आसमान से आवाज़ आई, माँग लो माँग लो वरद। वो आवाज़ बहुत प्यारी थी, दया से भरी हुई। जैसे ही उसने सुना, उसका शरीर फिर से तंदुरुस्त हो गया। जैसे अभी घर से निकला हो।
Verse 306 (दोहा/सोरठा)
श्रवन सुधा सम बचन सुनि पुलक प्रफुल्लित गात। बोले मनु करि दंडवत प्रेम न हृदयँ समात।।145।।
śravaṇa sudhā sama bacana suni pulaka praphullita gāta | bole manu kari daṇḍavat prema na hṛdayaṁ samāta ||145||
जब मनु ने वो बात सुनी, तो उसके कान को अमृत लगा। सारी बॉडी में खुशी दौड़ गई, जैसे कोई खिल गया हो। मनु ने पहले पूरा झुक के प्रणाम किया। उसके दिल में इतना प्यार था कि वो अंदर नहीं समा रहा था।
Verse 307 (चौपाई)
सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनु। बिधि हरि हर बंदित पद रेनू।। सेवत सुलभ सकल सुख दायक। प्रनतपाल सचराचर नायक।। जौं अनाथ हित हम पर नेहू। तौ प्रसन्न होइ यह बर देहू।। जो सरूप बस सिव मन माहीं। जेहि कारन मुनि जतन कराहीं।। जो भुसुंडि मन मानस हंसा। सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा।। देखहिं हम सो रूप भरि लोचन। कृपा करहु प्रनतारति मोचन।। दंपति बचन परम प्रिय लागे। मुदुल बिनीत प्रेम रस पागे।। भगत बछल प्रभु कृपानिधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना।।
sunu sevaka surataru suradhenū | bidhi hari hara bandita pada renū || sevata sulabha sakala sukha dāyaka | pranata-pāla sacarācara nāyaka || jaũ anātha hita hama para nehū | tau prasanna hoi yaha bara dehū || jo sarūpa basa siva mana māhīṁ | jehi kārana muni jatana karāhīṁ || jo bhusuṇḍi mana mānasa haṁsā | saguna aguna jehi nigama prasaṁsā || dekhahiṁ hama so rūpa bhari locana | kṛpā karahu pranatārati mocana || dampati bacana parama priya lāge | mudula binīta prema-rasa pāge || bhagata bachala prabhu kṛpānidhānā | bisvabāsa pragaṭe bhagavānā ||
सुना, भगवान के चरण की धूल इतनी पवित्र है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी उसकी पूजा करते हैं। वो सबसे सुख देने वाला है और जो उसके शरण में आता है उसकी रक्षा करता है। अगर आप अनाथ के भले के लिए प्यार रखते हैं, तो हमें भी वो रूप दिखाओ जो शिव जी के दिल में बसा है। जिसके लिए रिशि लोग भी तपस्या करते हैं। जो भूशुंडि के मन्न हंस के जैसा है, जिसे वेद भी गाते हैं। हम आँख भर के उस रूप को देखना चाहते हैं। हमें दुख से आज़ाद करो। दोनों की बातें इतनी प्यारी लगी जैसे प्यार में डूबे हुए हो। भगवान अपने भक्तों से बहुत प्यार करते हैं। वो कृपा का सागर है और पूरी दुनिया का स्वामी है।
Verse 308 (दोहा/सोरठा)
नील सरोरुह नील मनि नील नीरधर स्याम। लाजहिं तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम।।146।।
nīla saroruh nīla mani nīla nīradhar syāma | lājahin tana sobhā nirakhi koṭi koṭi sata kāma ||146||
भगवान का रंग नीला है, जैसे नीला कमल, जैसे नीला मणि, जैसे बादल जब बारिश लाता है। उनकी बॉडी इतनी सुंदर है कि देख के करोड़ करोड़ भी काम शर्मा जाते हैं। उनकी खूबसूरती के सामने सब काम भला जाता है।
Verse 309 (चौपाई)
सरद मयंक बदन छबि सींवा। चारु कपोल चिबुक दर ग्रीवा।। अधर अरुन रद सुंदर नासा। बिधु कर निकर बिनिंदक हासा।। नव अबुंज अंबक छबि नीकी। चितवनि ललित भावँती जी की।। भुकुटि मनोज चाप छबि हारी। तिलक ललाट पटल दुतिकारी।। कुंडल मकर मुकुट सिर भ्राजा। कुटिल केस जनु मधुप समाजा।। उर श्रीबत्स रुचिर बनमाला। पदिक हार भूषन मनिजाला।। केहरि कंधर चारु जनेउ। बाहु बिभूषन सुंदर तेऊ।। करि कर सरि सुभग भुजदंडा। कटि निषंग कर सर कोदंडा।।
śarada mayaṅka badana chabi sīṁvā. cāru kapola cibuka dara grīvā. adhara aruṇa rada sundara nāsā. bidhu-kara nikara binindaka hāsā. nava abuñja aṁbaka chabi nīkī. citavani lalita bhāvaṁtī jī kī. bhukuṭi manoja cāpa chabi hārī. tilaka lalāṭa paṭala dutikārī. kuṇḍala makara mukuṭa sira bhrājā. kuṭila kesa janu madhupa samājā. ura śrī-vatsa rucira bana-mālā. padika hāra bhūṣana mani-jālā. kehari kaṁdhara cāru janeū. bāhu bibhūṣana sundara teū. kari-kara sari subhaga bhuja-daṇḍā. kaṭi niṣaṅga kara sara kodaṇḍā.
उनका चेहरा ऐसे चमक रहा था जैसे सरद का चाँद। गाल, ठोड़ा और गर्दन सब सुंदर थी। होंठ लाल थे, दाँत साफ थे, नाक सुंदर थी। मुस्कान ऐसे थी जैसे चाँद की रोशनी। आँखें ताज़ा कमल जैसी थी, उनकी नज़र देख के दिल चुरा लेती थी। भौंहें काम के धनक से भी सुंदर थी। माथे पर तिलक चमक रहा था। कान में मकर जैसे कुंडल और सिर पे ताज़ सजी थी। बाल घूम रहे थे जैसे मधुमक्खियाँ। छाती पे श्रीवत्स और फूलों की माला चमक रही थी। मोती के हार और नग जैसे गहने थे। कंधे शेर जैसे थे, जनेऊ पहने थे। हाथों में सुंदर गहने थे। बाज़ू हाथी की सोंड जैसी थी। कमर पर धनुष और तीर रखे थे।
Verse 310 (दोहा/सोरठा)
तडित बिनिंदक पीत पट उदर रेख बर तीनि। नाभि मनोहर लेति जनु जमुन भवँर छबि छीनि।।147।।
taṛit binindaka pīta paṭ udara rekha bara tīni. nābhi manohara leti janu jamuna bhavaṁra chabi chīni ||147||
उनका पीला कपड़ा बिजली से भी ज़्यादा चमक रहा था। पेट पर तीन रेखा थी जो बहुत अच्छी लगती थी। नाभि इतनी सुंदर थी जैसे यमुना में पानी घूमेगा रहा हो। उसकी खूबसूरती भी उसके सामने कुछ नहीं थी।
Verse 311 (चौपाई)
पद राजीव बरनि नहि जाहीं। मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं।। बाम भाग सोभति अनुकूला। आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला।। जासु अंस उपजहिं गुनखानी। अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी।। भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम बाम दिसि सीता सोई।। छबिसमुद्र हरि रूप बिलोकी। एकटक रहे नयन पट रोकी।। चितवहिं सादर रूप अनूपा। तृप्ति न मानहिं मनु सतरूपा।। हरष बिबस तन दसा भुलानी। परे दंड इव गहि पद पानी।। सिर परसे प्रभु निज कर कंजा। तुरत उठाए करुनापुंजा।।
pada rājīva barani nahi jāhīṁ | muni mana madhupa basahiṁ jenha māhīṁ || bāma bhāga sobhati anukūlā | ādiśakti chabinidhi jagamūlā || jāsu aṁsa upajahiṁ gunakhānī | aganita lacchi umā brahmānī || bhṛkuṭi bilāsa jāsu jaga hoī | rāma bāma disi sītā soī || chabi-samudra hari rūpa bilokī | eka-ṭaka rahe nayana paṭ rokī || citavahiṁ sādara rūpa anūpā | tṛpti na mānahiṁ manu satarūpā || haraṣa bibasa tana dasā bhulānī | pare daṇḍa iva gahi pada pānī || sira parase prabhu nija kara kañjā | turata uṭhāe karuṇā-puñjā ||
भगवान के चरण कमल के बारे में वर्ड्स में बताना मुश्किल है। रिशि लोग अपना मन उसमें बसा लेते हैं जैसे मखी फूल में। भगवान के लेफ्ट साइड में सीता चमक रही हैं। वोही आदि शक्ति है, जगत की जड़ है, और सुंदरता का खजाना है। उन्हीं एक हिस्से से लक्ष्मी, उमा, ब्रह्मणी पैदा होती हैं। सीता के भावों के खेल से ही पूरी दुनिया बनती है। वो सीता राम के लेफ्ट साइड में बैठी हैं। हरि के रूप को देख के, समुंदर जैसा सुंदर, लोगों की आँखें जम गई जैसे किसी ने पकड़ लिया हो। वो उस रूप को देखते रहे, इतना अच्छा लगा कि मन नहीं भरा। खुशी में पागल हो के, अपनी बॉडी की हालत भूल के, वो डंड की तरह गिर गए और उनके पाँव पकड़ लिए। भगवान ने अपना हाथ उनके सिर पर रखा और अपनी दया से उन्हें उठा दिया।
Verse 312 (दोहा/सोरठा)
बोले कृपानिधान पुनि अति प्रसन्न मोहि जानि। मागहु बर जोइ भाव मन महादानि अनुमानि।।148।।
bole kṛpānidhāna puni ati prasanna mohi jāni | māgahu bara joi bhāva mana mahādāni anumāni ||148||
फिर दया के खजाने ने बात की। उन्होंने मेरा दिल पढ़ लिया और बहुत खुश हो गए। बोले, जो भी तुम्हारा मन चाहता है वो माँग लो। वो बड़े देने वाले थे, उन्होंने मेरा इरादा समझ लिया था।
Verse 313 (चौपाई)
सुनि प्रभु बचन जोरि जुग पानी। धरि धीरजु बोली मृदु बानी।। नाथ देखि पद कमल तुम्हारे। अब पूरे सब काम हमारे।। एक लालसा बड़ि उर माही। सुगम अगम कहि जात सो नाहीं।। तुम्हहि देत अति सुगम गोसाईं। अगम लाग मोहि निज कृपनाईं।। जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई। बहु संपति मागत सकुचाई।। तासु प्रभा जान नहिं सोई। तथा हृदयँ मम संसय होई।। सो तुम्ह जानहु अंतरजामी। पुरवहु मोर मनोरथ स्वामी।। सकुच बिहाइ मागु नृप मोहि। मोरें नहिं अदेय कछु तोही।।
suni prabhu bacana jori juga pānī | dhari dhīraju bolī mṛdu bānī || nātha dekhi pada kamala tumhāre | aba pūre saba kāma hamāre || eka lālasā baṛi ura māhī | sugama agama kahi jāta so nāhīṃ || tumhahi deta ati sugama gosāīṃ | agama lāga mohi nija kṛpanāīṃ || jathā daridra bibudha-taru pāī | bahu saṃpati māgata sakucāī || tāsu prabhā jāna nahiṃ soī | tathā hṛdayã mama saṃsaya hoī || so tumha jānahu antarajāmī | puravahu mora manoratha svāmī || sakuca bihāi māgu nṛpa mohi | moreṃ nahiṃ adeya kachu tohī ||
भगवान की बात सुन के उसने दोनों हाथ जोड़े। धैर्य रखते हुए धीरे से बोली। नाथ, आपके चरण कमल देख के मेरा काम हो गया। लेकिन मन में एक इच्छा है जो बताना मुश्किल भी नहीं, आसान भी नहीं। आपको देने में आसान है, लेकिन मुझे अपनी वजह से मुश्किल लगता है। जैसे कोई गरीब आदमी को कल्प वृक्ष मिल जाए, तो वो माँगने में शर्माए क्योंकि उसको पता नहीं वो कितना दे सकता है। वैसे ही मेरा मन शर्म में आ गया। आप तो दिल की बात जानते हो, स्वामी। मेरा मन पूरा करो। शर्म छोड़ो और माँग लो, मैं राजा हूँ। मेरे लिए कुछ भी न-मुमकिन नहीं है।
Verse 314 (दोहा/सोरठा)
दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सतिभाउ। चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ।।149।।
dāni siromaṇi kṛpānidhi nātha kahauṁ satibhāu. cāhauṁ tumhahi samāna suta prabhu sana kavan durāu..149..
नाथ, आप देने वाले में सबसे बड़े हो, दया के समुंदर हो। मैं सच्चे दिल से कहती हूँ। मुझे आपके जैसा बेटा चाहिए। आपके सामने क्या छुपाना।
Verse 315 (चौपाई)
देखि प्रीति सुनि बचन अमोले। एवमस्तु करुनानिधि बोले।। आपु सरिस खोजौं कहँ जाई। नृप तव तनय होब मैं आई।। सतरूपहि बिलोकि कर जोरें। देबि मागु बरु जो रुचि तोरे।। जो बरु नाथ चतुर नृप मागा। सोइ कृपाल मोहि अति प्रिय लागा।। प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई। जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई।। तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी। ब्रह्म सकल उर अंतरजामी।। अस समुझत मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई।। जे निज भगत नाथ तव अहहीं। जो सुख पावहिं जो गति लहहीं।।
dekhi prīti suni bacana amole | evam-astu karuṇānidhi bole || āpu sarisa khojauṁ kahã jāī | nṛpa tava tanaya hoba maiṁ āī || satarūpahi biloki kara joreṁ | debi māgu baru jo ruci tore || jo baru nātha catura nṛpa māgā | soi kṛpāla mohi ati priya lāgā || prabhu parantu suṭhi hoti ḍhiṭhāī | jadapi bhagata hita tumhahi sohāī || tumha brahmādi janaka jaga svāmī | brahma sakala ura antarajāmī || asa samujhata mana saṁsaya hoī | kahā jo prabhu pravāna puni soī || je nija bhagata nātha tava ahāhīṁ | jo sukha pāvahiṁ jo gati lahahīṁ ||
उनकी प्यार देख के और वो कीमती बातें सुन के, दया के खजाने ने कहा, ठीक है। मैं आपके जैसा कहाँ ढूँढूँ? मैं राजा बन के आपका बेटा बनूँगा। फिर सतरूपा को देख के हाथ जोड़ के बोले, देवी, जो तुम्हें अच्छा लगे वो माँग लो। जो भी ये राजा ने माँगा है वो मुझे बहुत पसंद आया। लेकिन प्रभु, ये थोड़ा बोल्ड हो गया, भले ही भक्त के लिए अच्छा है। आप ब्रह्मा के पिता हो, जग के स्वामी हो। आप सबके दिल की बात जानते हो। ये सोच के मन में शर्म आती है। जो भी प्रभु ने हाँ कहा वो सच में होगा। जो लोग आपके भक्त हैं, वो कैसा सुख पाते हैं, कैसी गति पाते हैं।
Verse 316 (दोहा/सोरठा)
सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति सोइ निज चरन सनेहु। सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहु।।150।।
soi sukha soi gati soi bhagati soi nija carana sanehu. soi bibeka soi rahani prabhu hamahi kṛpā kari dehu..150..
वही सच्चा सुख है, वही मंज़िल, वही भक्ति, वही प्यार आपके चरणों का। वही समझ, वही सही रास्ता, प्रभु, आप कृपा करके मुझे यह दे दो।
Verse 317 (चौपाई)
सुनु मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना।। जो कछु रुचि तुम्हेर मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं।। मातु बिबेक अलोकिक तोरें। कबहुँ न मिटिहि अनुग्रह मोरें।। बंदि चरन मनु कहेउ बहोरी। अवर एक बिनति प्रभु मोरी।। सुत बिषइक तव पद रति होऊ। मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ।। मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना।। अस बरु मागि चरन गहि रहेऊ। एवमस्तु करुनानिधि कहेऊ।। अब तुम्ह मम अनुसासन मानी। बसहु जाइ सुरपति रजधानी।।
sunu mṛdu gūṛha rucira bara racanā. kṛpāsiṃdhu bole mṛdu bacanā.. jo kachu ruci tumhera mana māhīṃ. maiṃ so dīnh saba saṃsaya nāhīṃ.. mātu bibeka alokika toreṃ. kabahuṃ na miṭihi anugraha moreṃ. baṃdi carana manu kaheu bahorī. avara eka binati prabhu morī.. suta biṣaika tava pada rati hoū. mohi baṛa mūṛha kahai kina koū.. mani binu phani jimi jala binu mīnā. mama jīvana timi tumhahi adhīnā.. asa baru māgi carana gahi raheū. evamastu karuṇānidhi kaheū.. aba tumha mama anuśāsana mānī. basahu jāi surapati rajadhānī..
ब्रह्मा ने कहा, सुनो यह बात जो मैं कह रहा हूँ, यह बहुत अच्छी बात है। जो भी तुम्हारे दिल में इच्छा थी, मैंने वो दे दी, कोई शक मत करो। माँ, तुम्हारी समझ अलग है, और मेरी कृपा कभी नहीं हटी। मन ने फिर चरणों को नमस्कार करके कहा, प्रभु, एक और बात है। मैं आपका बेटा बनके आपके चरणों में प्यार रखूँ, कोई मुझे पागल न कहे। जैसे साँप के पास मणि नहीं होती, जैसे मछली के पानी नहीं, वैसे मेरा जीवन आपके बिना अधूरा है। ऐसा वरद माँगके मैंने चरणों को पकड़ लिया, और ब्रह्मा ने कहा, ठीक है, यह होगा। अब तुम मेरी बात मानो, और जाके इंद्र की राजधानी में रहो।
परंपरागत मान्यता में यह अंश ‘राम कथा कलि मल हरनि मंगल करनि’ (दोहा 141) के अनुसार कलियुग के मल का हरण, मन की शुद्धि, और सगुण-दर्शन की रुचि जगाकर भक्ति में स्थिरता देता है; विशेषतः ‘श्रवण-सुधा’ रूप वाणी से हृदय में वैराग्य और विश्वास बढ़ता है।
सामान्य पाठ-परंपरा में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ का नाम-संपुट, तथा शिव-उमा संवाद में ‘हर हर महादेव’ का संक्षिप्त उच्चारण/अनुस्मरण (राग-भेदानुसार) जोड़ा जाता है; कुछ मानस-परायणों में ‘राम राम’ का द्वि-अक्षर संपुट भी प्रचलित है।
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