Atharva Veda Sukta 2
Kanda 14Anuvaka 1Sukta 275 Mantras

Sukta 2

Rishi: Traditionally associated with marriage-hymn seers (Atharvanic transmission; specific r̥ṣi attribution varies by anukramaṇī)

Devata: Soma, Gandharva, Agni, and the human husband as ritual agents

Chandas: Anuṣṭubh (predominant marriage-meter in AV/ṚV parallels)

AV 14.2 is the Atharvavedic marriage-liturgy that ritually transfers the bride from divine/liminal guardianship into lawful human wedlock, installing her safely in the husband’s house. It secures social legitimacy, protection from illicit or demonic claims, and the classic domestic goods of gṛhya life—harmony, cattle-prosperity, and fertile, heroic offspring. Its power works by sequencing spouses/guardians (Soma–Gandharva–Agni–man), binding the bride to the Gārhapatya fire, and blessing the couple’s reproductive and household order.

Kind of charm

Shantika (pacifying)
Recitation with translationAtharva Veda 14.2

Mantras

Mantra 1

विवाह-प्रकरणम्। ६९ त्र्यवसाना षट् पदाऽतिशक्वरी,७१ बृहती। तुभ्य॒मग्रे॒ पर्य॑वहन्त्सू॒र्यां व॑ह॒तुना॑ स॒ह। स नः॒ पति॑भ्यो जा॒यां दा अग्ने॑ प्र॒जया॑ स॒ह

शुरू में सूर्या को बारात के साथ घुमा के लाए थे। अग्नि, तुम भी हमारे पतियों को एक अच्छी बीवी दे। बच्चे भी उसके साथ हों।

Mantra 2

पुनः॒ पत्नी॑म॒ग्निर॑दा॒दायु॑षा स॒ह वर्च॑सा । दी॒र्घायु॑रस्या॒ यः पति॒र्जीवा॑ति श॒रदः॑ श॒तम्

अग्नि ने फिर से बीवी को दिया है, साथ में ज़िन्दगी और चमक भी। जिसका पति है वो लंबी ज़िन्दगी जीता है, सौ साल तक जी रहा है।

Mantra 3

सोम॑स्य जा॒या प्र॑थ॒मं ग॑न्ध॒र्वस्तेऽप॑रः॒ पतिः॑ । तृ॒तीयो॑ अ॒ग्निष्टे॒ पति॑स्तु॒रीय॑स्ते मनुष्य॒जाः

पहले सोम तुम्हारा पति था। उसके बाद गंधर्व तुम्हारा पति बना। तीसरा पति अग्नि है। और चौथा पति कोई इंसान है जो पैदा हुआ है।

Mantra 4

सोमो॑ ददद् गन्ध॒र्वाय॑ गन्ध॒र्वो द॑दद॒ग्नये॑ । र॒यिं च पु॒त्रांस्चा॑दाद॒ग्निर्मह्य॒मथो॑ इ॒माम्

सोम ने तुम्हे गंधर्व को दिया। गंधर्व ने तुम्हे अग्नि को दिया। अग्नि ने तुम्हे मेरे हवाले किया। उसने धन भी दिया, बेटा भी दिया, और यह दुलहन भी दी।

Mantra 5

आ वा॑मगन्त्सुम॒तिर्वा॑जिनीवसू॒ न्यश्विना हृ॒त्सु कामा॑ अरंसत । अभू॑तं गो॒पा मि॑थु॒ना शु॑भस्पती प्रि॒या अ॑र्य॒म्णो दुर्यां॑ अशीमहि

अश्विन भाइयों, तुम्हारे ऊपर बड़ा प्यार है। तुम दोनों धन देने वाले हो। हमारे दिल में अब प्यार भरा है। तुम दोनों हमारी रक्षा करो। अर्यमन के घर में हमें सुख मिले।

Mantra 6

सा म॑न्दसा॒ना मन॑सा शि॒वेन॑ र॒यिं धे॑हि॒ सर्व॑वीरं वच॒स्यऽम्। सु॒गं ती॒र्थं सु॑प्रपा॒णं शु॑भस्पती स्था॒णुं पथि॑ष्ठा॒मप॑ दुर्म॒तिं ह॑तम्

खुशी से अपना मन रख के हमें धन दे दो। वो धन ऐसा हो जिससे हम तेज़ हो जाएँ। रास्ता आसान करो, पानी साफ मिले। बुरी सोच को दूर कर दो, जो रास्ते में खड़ी है उसे हटा दो।

Mantra 7

या ओष॑धयो॒ या न॒द्यो॒३ यानि॒ क्षेत्रा॑णि॒ या वना॑ । तास्त्वा॑ वधु प्र॒जाव॑तीं॒ पत्ये॑ रक्षन्तु र॒क्षसः॑

जितनी भी जड़ी-बूटियाँ हैं, जितनी नदियाँ, खेत और जंगल हैं, वो सब तुम्हारी रक्षा करें। तुम दुल्हन हो, तुम्हारे पति के लिए तुम्हे बच्चों से भरा रखें। राक्षस जैसे बुरे लोग तुम्हे न पकड़ पाएँ।

Mantra 8

एमं पन्था॑मरुक्षाम सु॒गं स्व॑स्ति॒वाह॑नम्। यस्मि॑न् वी॒रो न रिष्य॑त्य॒न्येषां॑ वि॒न्दते॒ वसु॑

हम इस रास्ते को साफ बना रहे हैं, आसान चलने वाला, खुशियों वाला। इस रास्ते पे चलने वाला आदमी दुख नहीं पाता। और दूसरों से धन कमाता है।

Mantra 9

इ॒दं सु मे॑ नरः शृणुत॒ यया॒शिषा॒ दंप॑ती वा॒मम॑श्नु॒तः । ये ग॑न्ध॒र्वा अ॑प्स॒रस॑श्च दे॒वीरे॒षु वा॑नस्प॒त्येषु॒ येऽधि॑ त॒स्थुः । स्यो॒नास्ते॑ अ॒स्यै व॒ध्वै भ॑वन्तु॒ मा हिं॑सिषुर्वह॒तुमु॒ह्यमा॑नम्

लोगों, मेरी बात सुनो। इस से दूल्हा-दुल्हन को अच्छी दुआ मिलती है। गंधर्व और अप्सरा, यह सब देवियाँ, जो पेड़ों पे रहती हैं, वो दुल्हन के लिए अच्छे बन जाएँ। दुल्हन को लेकर जाते वक़्त उसे दुख न पहुँचे।

Mantra 10

ये व॒ध्वश्च॒न्द्रं व॑ह॒तुं यक्ष्मा॒ यन्ति॒ जनाँ॒ अनु॑ । पुन॒स्तान् य॒ज्ञिया॑ दे॒वा नय॑न्तु॒ यत॒ आग॑ताः

जो बीमारियाँ दुल्हन के साथ चलती हैं, लोगों के पीछे पीछे, उनको वापस भेजो। देवियाँ उनको उस जगह ले जाएँ जहाँ से वो आई थी।

Mantra 11

मा वि॑दन् परिप॒न्थिनो॒ य आ॒सीद॑न्ति॒ दंपती । सु॒गेन॑ दु॒र्गमती॑ता॒मप॑ द्रा॒न्त्वरा॑तयः

दूल्हा-दुल्हन को कोई दुश्मन न पकड़ ले। उनको आसान रास्ते से मुश्किल रास्ता पार करवा दो। सारी बुराइयाँ भाग जाएँ।

Mantra 12

सं का॑शयामि वह॒तुं ब्रह्म॑णा गृ॒हैरघो॑रेण॒ चक्षु॑षा मि॒त्रिये॑ण । प॒र्याण॑द्धं वि॒श्वरू॑पं॒ यदस्ति॑ स्यो॒नं पति॑भ्यः सवि॒ता तत् कृ॑णोतु

मैं दुलहन को साफ दिखाता हूँ, घर ले के आता हूँ। भगवान की शक्ति से, प्यारी नज़र से, दोस्ती से। जो भी इसमें बंधा है, हर तरह का, सविता भगवान उसे पति के लिए अच्छा कर दे।

Mantra 13

शि॒वा नारी॒यमस्त॒माग॑न्नि॒मं धा॒ता लो॒कम॒स्यै दि॑देश । ताम॑र्य॒मा भगो॑ अ॒श्विनो॒भा प्र॒जाप॑तिः प्र॒जया॑ वर्धयन्तु

यह दुल्हन अब अपने नए घर आई है, और यह अच्छी बात है। भगवान ने उसके लिए यह जगह फिक्स कर दी है। अर्यमन, भग, अश्विन दोनों भाई, और प्रजापति, सब मिलकर इस दुल्हन को बच्चों से बरकरार करें।

Mantra 14

आ॒त्म॒न्वत्यु॒र्वरा॒ नारी॒यमाग॒न् तस्यां॑ नरो वपत॒ बीज॑मस्याम्। सा वः॑ प्र॒जां ज॑नयद् व॒क्षणा॑भ्यो॒ बिभ्र॑ती दु॒ग्धमृ॑ष॒भस्य॒ रेतः॑

यह दुल्हन जैसे खेत है जहाँ फल आता है। अब तुम लोग उसमें बीज बोलो। वो तुम्हारे लिए बच्चे पैदा करे, अपनी गोद से। जैसे बैल का बीज दूध जैसा होता है, वैसे ही यह भी है।

Mantra 15

प्रति॑ तिष्ठ वि॒राड॑सि॒ विष्णु॑रिवे॒ह स॑रस्वति । सिनी॑वालि॒ प्र जा॑यतां॒ भग॑स्य सुम॒ताव॑सत्

अब आगे आओ, तुम विराज हो। जैसे विष्णु यहाँ है, वैसे सरस्वती भी है। सिनिवलि, बच्चा पैदा हो, भग की मेहरबानी से। सब कुछ ठीक से हो जाए।

Mantra 16

उद् व॑ ऊ॒र्मिः शम्या॑ ह॒न्त्वापो॒ योक्त्रा॑णि मुञ्चत । मादु॑ष्कृतौ॒ व्येनसाव॒घ्न्यावशु॑न॒मार॑ताम्

पानी की लहर आगे बढ़नी चाहिए, शांति से। पानी, तुम वो बंधन खोल दो जो रोके हुए है। बुरी हरकत नहीं, पाप से दूर रहो। कुत्ते को भगाओ, और जो निर्दोष है उसको तकलीफ न हो। सब ठीक हो जाए।

Mantra 17

अघो॑रचक्षु॒रप॑तिघ्नी स्यो॒ना श॒ग्मा सु॒शेवा॑ सु॒यमा॑ गृ॒हेभ्यः॑ । वी॒रसूर्दे॒वका॑मा॒ सं त्वयै॑धिषीमहि सुमन॒स्यमा॑ना

यह स्त्री आँखों में नरम नज़र रखती है। अपने पति को तकलीफ़ नहीं देती। घर में अच्छी लगती है, सबकी मदद करती है। बच्चों को जनम देती है, भगवान का ध्यान रखती है। इसके साथ हम भी आगे बढ़ें, दिल में अच्छा सोचते हुए।

Mantra 18

अदे॑वृ॒घ्न्यप॑तिघ्नी॒हैधि॑ शि॒वा प॒शुभ्यः॑ सु॒यमा॑ सु॒वर्चाः॑ । प्र॒जाव॑ती वीर॒सूर्दे॒वका॑मा स्यो॒नेमम॒ग्निं गार्ह॑पत्यं सपर्य

तू ऐसी हो जो पति के लोगों को दुखा न दे, पति को मारे न। अच्छी रह, गाय-भैंस के साथ, सिद्धि से, चमक के साथ। बच्चों वाली, बहादुर बच्चों की मा, भगवान से प्यार वाली, इस घर की अग्नि की पूजा कर।

Mantra 19

उत् ति॑ष्ठे॒तः किमि॒च्छन्ती॒दमागा॑ अ॒हं त्वे॑डे अभि॒भूः स्वाद् गृ॒हात्। शू॒न्यै॒षी नि॑रृते॒ याज॒गन्थोत्ति॑ष्ठाराते॒ प्र प॑त॒ मेह रं॑स्थाः

उठ, उठ! क्या ढूँढ के आई है यहाँ? मैं तुझे बोलता हूँ, तुझे हटा देता हूँ, हमारे घर से बाहर। तू खाली पन ढूँढने वाली है, बुराई की तरफ गई है। उठ, दूर हो जा, यहाँ मत रह।

Mantra 20

य॒दा गार्ह॑पत्य॒मस॑पर्यै॒त् पूर्व॑म॒ग्निं व॒धूरि॒यम्। अधा॒ सर॑स्वत्यै नारि पि॒तृभ्य॑श्च॒ नम॑स्कुरु

जब दुलहन पहले घर की अग्नि की पूजा कर दे, तब औरत सरस्वती माता को और अपने पूर्वजों को प्रणाम कर दे।

Mantra 21

शर्म॒ वर्मै॒तदा ह॑रा॒स्यै नार्या॑ उप॒स्तिरे॑ । सिनी॑वालि॒ प्र जा॑यतां॒ भग॑स्य सुम॒ताव॑सत्

इस औरत के लिए सुख लाओ, बचाओ लाओ, बिस्तर बिछा दो। सिनिवाली माता, इसको बच्चे दे, भग भगवान की कृपा से, मदद से।

Mantra 22

यं बल्ब॑जं॒ न्यस्य॑थ॒ चर्म॑ चोपस्तृणी॒थन॑ । तदा रो॑हतु सुप्र॒जा या क॒न्या वि॒न्दते॒ पति॑म्

जिस बल्बजा घास तुमने बिछाया है, और जिस चमडा उसके नीचे डाला है, उससे अच्छे बच्चे पैदा हों। जिस कन्या को पति मिलता है, उसके लिए यह आशीर्वाद है।

Mantra 23

उप॑ स्तृणीहि॒ बल्ब॑ज॒मधि॒ चर्म॑णि॒ रोहि॑ते । तत्रो॑प॒विश्य॑ सुप्र॒जा इ॒मम॒ग्निं स॑पर्यतु

लाल चमड़े के ऊपर घास बिछा दो। फिर इस औरत को वहाँ बैठना है जो अच्छे बच्चे जनती है। बैठ के अग्नि भगवान की पूजा करो।

Mantra 24

आ रो॑ह॒ चर्मोप॑ सीदा॒ग्निमे॒ष दे॒वो ह॑न्ति॒ रक्षां॑सि॒ सर्वा॑ । इ॒ह प्र॒जां ज॑नय॒ पत्ये॑ अ॒स्मै सु॑ज्यै॒ष्ठ्यो भ॑वत् पु॒त्रस्त॑ ए॒षः

चमड़े पर चढ़ो और अग्नि के पास बैठ जाओ। यह अग्नि भगवान सारे बुरी आत्माओं को मार देता है। यहाँ अपने पति के लिए बच्चे पैदा करो। तेरा बेटा बड़ा हो और अच्छा हो।

Mantra 25

वि ति॑ष्ठन्तां मा॒तुर॒स्या उ॒पस्था॒न्नाना॑रूपाः प॒शवो॒ जाय॑मानाः । सु॒म॒ङ्ग॒ल्युप॑ सीदे॒मम॒ग्निं संप॑त्नी॒ प्रति॑ भूषे॒ह दे॒वान्

इस माँ के पेट से सारे जानवर पैदा हों। वो अलग-अलग रंग के हों। शुभ पत्नी, अग्नि के पास बैठ जाओ। पति की पत्नी बन के देवताओं की पूजा करो।

Mantra 26

सु॒म॒ङ्ग॒ली प्र॒तर॑णी गृ॒हाणां॑ सु॒शेवा॒ पत्ये॒ श्वशु॑राय शं॒भूः । स्यो॒ना श्व॒श्र्वै प्र गृ॒हान् वि॑शे॒मान्

मुबारक हो, घर में शांति लाने वाली। पति और ससुर के लिए अच्छी बनो। सासू माँ के साथ प्यार से रहो। हम इस घर में खुश रहें।

Mantra 27

स्यो॒ना भ॑व॒ श्वशु॑रेभ्यः स्यो॒ना पत्ये॑ गृ॒हेभ्यः॑ । स्यो॒नास्यै सर्व॑स्यै वि॒शे स्यो॒ना पु॒ष्टायै॑षां भव

यह दुआ है दुल्हन के लिए कि वो अपने ससुराल वालों के साथ प्यार से रहे। पति के घर में भी प्यार से रहे। सारे परिवार के साथ प्यार से रहे। और सबकी तरक्की के लिए भी प्यार से काम करे।

Mantra 28

सु॒म॒ङ्ग॒लीरि॒यं व॒धूरि॒मां स॒मेत॒ पश्य॑त । सौभा॑ग्यम॒स्यै द॒त्त्वा दौर्भा॑ग्यैर्वि॒परे॑तन

सब लोग आओ और इस दुलहन को देखो। यह बहुत अच्छी है। इसको अच्छा भाग्य दो और अपने बुरे भाग्य लेकर यहाँ से चले जाओ।

Mantra 29

या दु॒र्हार्दो॑ युव॒तयो॒ याश्चे॒ह ज॑रती॒रपि॑ । वर्चो॒ न्व॑स्यै सं द॒त्ताथास्तं॑ वि॒परे॑तन

जवानी में बुरी सोच वाली औरतें और बुढ़िया भी जो यहाँ हैं। इस दुलहन को चमक दो और फिर घर वापस जाओ।

Mantra 30

रु॒क्म॒प्रस्त॑रणं व॒ह्यं विश्वा॑ रू॒पाणि॒ बिभ्र॑तम्। आरो॑हत् सू॒र्या सा॑वि॒त्री बृ॑ह॒ते सौभ॑गाय॒ कम्

सोने से बिछा हुआ एक सवारी है जो हर तरह की सुंदरता ले कर आई है। सूर्या और सावित्री इस पर चढ़ी हैं ताकि बड़ा भाग्य मिले।

Mantra 31

आ रो॑ह॒ तल्पं सुमन॒स्यमा॑ने॒ह प्र॒जां ज॑नय॒ पत्ये॑ अ॒स्मै। इ॒न्द्रा॒णीव॑ सु॒बुधा॒ बुध्य॑माना॒ ज्योति॑रग्रा उ॒षसः॒ प्रति॑ जागरासि

अब बिस्तर पर चढ़ो और अच्छा मन रखो। यहाँ अपने पति के लिए बच्चे पैदा करो। इंद्राणी की तरह जाग के, सवेरे की रोशनी लेकर, तुम सुबह का इंतज़ार कर रही हो।

Mantra 32

दे॒वा अग्रे॒ न्यपद्यन्त॒ पत्नीः॒ सम॑स्पृशन्त त॒न्वऽस्त॒नूभिः॑ । सू॒र्येव॑ नारि वि॒श्वरू॑पा महि॒त्वा प्र॒जाव॑ती॒ पत्या॒ सं भ॑वे॒ह

पहले के देवता लोग पत्नी लेते थे। वो अपनी बॉडी से बॉडी मिलाके एक हो जाते थे। औरत, तू भी ऐसे ही अपने पति के साथ रह। जैसे सूर्य सब जगह चमकता है, वैसे ही तू बड़ी हो। तुम्हारे बच्चे हों, पति-पत्नी दोनों साथ में रहो।

Mantra 33

उत् ति॑ष्ठे॒तो वि॑श्वावसो॒ नम॑सेडामहे त्वा । जा॒मिमि॑च्छ पितृ॒षदं॒ न्यक्तां॒ स ते॑ भा॒गो ज॒नुषा॒ तस्य॑ विद्धि

विश्वावसु, अब यहाँ से उठ के चला जा। हम तुझे नमस्ते करते हैं। अपना साथी ढूँढ़ ले, वो जो अपने पूर्वज के साथ बैठी है, वही तुझे मिलनी है। यह तेरा हिस्सा है, यह जान ले।

Mantra 34

अ॒प्स॒रसः॑ सध॒मादं॑ मदन्ति हवि॒र्धान॑मन्त॒रा सूर्यं॑ च । तास्ते॑ ज॒नित्र॑म॒भि ताः परे॑हि॒ नम॑स्ते गन्धर्व॒र्तुना॑ कृणोमि

अप्सराएँ खुश हैं, नाच रही हैं, हवन के स्थान और सूरज के बीच में। तेरा अपना घर, तेरी अपनी जगह, वापस चला जा। गंधर्व, तुझे नमस्ते। अब तेरे लिए सही टाइम आ गया है।

Mantra 35

नमो॑ गन्ध॒र्वस्य॒ नम॑से॒ नमो॒ भामा॑य॒ चक्षु॑षे च कृण्मः । विश्वा॑वसो॒ ब्रह्म॑णा ते॒ नमो॒ऽभि जा॒या अ॑प्स॒रसः॒ परे॑हि

गंधर्व को नमस्ते, हम झुकते हैं। उसकी चमक को भी नमस्ते, उसकी नज़र को भी। विश्वावसु, यह मंत्र के साथ तुझे नमस्ते। अप्सराएँ, बीवी के पास से अब चली जाओ।

Mantra 36

रा॒या व॒यं सु॒मन॑सः स्या॒मोदि॒तो ग॑न्ध॒र्वमावी॑वृताम । अग॑न्त्स दे॒वः प॑र॒मं स॒धस्थ॒मग॑न्म॒ यत्र॑ प्रति॒रन्त॒ आयुः॑

भगवान हमें धन दे, हम खुश रहें। गंधर्व का रास्ता खुला है। वो भगवान अपनी सबसे बुरी जगह चला गया। हम वहीं पहुँच गए जहाँ ज़िन्दगी बड़ी होती है।

Mantra 37

सं पि॑तरा॒वृत्वि॑ये सृजेथां मा॒ता पि॒ता च॒ रेत॑सो भवाथः । मर्य॑ इव॒ योषा॒मधि॑रोहयैनां प्र॒जां कृ॑ण्वाथामि॒ह पु॑ष्यतं र॒यिम्

माँ बाप दोनों मिलकर सही वक्त पर बच्चे पैदा करें। तुम दोनों में बीज की शक्ति आए। जैसे जवान लड़का अपनी पत्नी के पास जाता है, वैसे तुम इस औरत के साथ हो। यहाँ बच्चे पैदा करो और धन को बढ़ाओ।

Mantra 38

तां पूषं॑छि॒वत॑मा॒मेर॑यस्व॒ यस्यां॒ बीजं॑ मनु॒ष्या॒३वप॑न्ति । या न॑ ऊ॒रू उ॑श॒ती वि॒श्रया॑ति॒ यस्या॑मु॒शन्तः॑ प्र॒हरे॑म॒ शेपः॑

हे पूषन, उस औरत को आगे बढ़ा, जिसमें लोग बीज बोवते हैं। वो अपनी टांगें खोलती है, हम उसमें अपना बीज डालते हैं।

Mantra 39

आ रो॑हो॒रुमुप॑ धत्स्व॒ हस्तं॒ परि॑ ष्वजस्व जा॒यां सु॑मन॒स्यमा॑नः । प्र॒जां कृ॑ण्वाथामि॒ह मोद॑मानौ दी॒र्घं वा॒मायुः॑ सवि॒ता कृ॑णोतु

टांग पर चढ़ो, हाथ रख दो। अपनी पत्नी को प्यार से गले लगा लो। बच्चे पैदा करो, खुश रहना। सविता तुम दोनों को लंबी उमर दे।

Mantra 40

आ वां॑ प्र॒जां ज॑नयतु प्र॒जाप॑तिरहोरा॒त्राभ्यां॒ सम॑नक्त्वर्य॒मा। अदु॑र्मङ्गली पतिलो॒कमा वि॑शे॒मं शं नो॑ भव द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे

प्रजापति तुम दोनों को बच्चे दे। दिन और रात के साथ अर्यमन तुम्हे आशीर्वाद दे। कोई बुरा शगुन नहीं, पति का घर अपना बना लो। हम सब पे भला हो, दो पाँव वालों पे भी, चार पाँव वालों पे भी।

Mantra 41

दे॒वैर्द॒त्तं मनु॑ना सा॒कमे॒तद् वाधू॑यं॒ वासो॑ व॒ध्वऽश्च॒ वस्त्र॑म्। यो ब्र॒ह्मणे॑ चिकि॒तुषे॒ ददा॑ति॒ स इद् रक्षां॑सि॒ तल्पा॑नि हन्ति

देवियों ने दिया है, मनु के साथ, यह दुल्हन का कपड़ा। जो ब्राह्मण को देता है जो यह जानता है, वो बुरा साया बिस्तर से हटा देता है।

Mantra 42

यं मे॑ द॒त्तो ब्र॑ह्मभा॒गं व॑धू॒योर्वाधू॑यं॒ वासो॑ व॒ध्वऽश्च॒ वस्त्र॑म्। यु॒वं ब्र॒ह्मणे॑ऽनुमन्य॑मानौ॒ बृह॑स्पते सा॒कमिन्द्र॑श्च द॒त्तम्

मुझे जो दान मिला है वो ब्रह्मन के हिस्से का है, दुल्हन का कपड़ा और उसकी सारी पोशाक। बड़े गुरु और इंद्र ने मिलकर यह दान दिया है। दोनों ने सोचा और फिर ब्रह्मन को दिया।

Mantra 43

स्यो॒नाद्योने॒रधि॒ बध्य॑मानौ हसामु॒दौ मह॑सा॒ मोद॑मानौ । सु॒गू सु॑पु॒त्रौ सु॑गृ॒हौ त॑राथो जी॒वावु॒षसो॑ विभा॒तीः

अच्छी जगह से, माँ के पेट से, दोनों को कस के बाँध दिया। दोनों मुस्कुरा रहे हैं, खुश हैं, बड़ी ताकत से मगन हैं। अच्छे से चले जाओ, अच्छे बेटे वाले, अच्छे घर वाले। सूरज निकलते वक़्त से गुज़रते वक़्त सेफ रहो, जीते रहो चमकते दिनों में।

Mantra 44

नवं॒ वसा॑नः सुर॒भिः सु॒वासा॑ उ॒दागां॑ जी॒व उ॒षसो॑ विभा॒तीः । आ॒ण्डात् प॑त॒त्रीवा॑मुक्षि॒ विश्व॑स्मा॒देन॑स॒स्परि॑

नए कपड़े पहन के, महकता हुआ, अच्छे से तैयार हो के, वो आगे बढ़ो। जीते रहो चमकते दिनों में। जैसे अंडे से चिड़िया निकलती है, उसकी तरह पाप से आज़ाद हो के ऊपर उठो।

Mantra 45

शुम्भ॑नी॒ द्यावा॑पृथि॒वी अन्ति॑सुम्ने॒ महि॑व्रते । आपः॑ स॒प्त सु॑स्रुवुर्दे॒वीस्ता नो॑ मुञ्च॒न्त्वंह॑सः

आसमान और धरती को सजाना, पास आ के मेहरबानी दिखाना, बड़े व्रत में स्थित रहना। सात पानी की नदियाँ देवियाँ बह निकली हैं। वो हमारे दुख और पाप से आज़ाद करें।

Mantra 46

सू॒र्यायै॑ दे॒वेभ्यो॑ मि॒त्राय॒ वरु॑णाय च । ये भू॒तस्य॒ प्रचे॑तस॒स्तेभ्य॑ इ॒दम॑करं॒ नमः॑

सूर्य के लिए, भगवान के लिए, मित्र और वरुण के लिए, जो सब कुछ होने वाला जानते हैं, उन सबके लिए मैंने यह किया है। उनको नमस्ते हो।

Mantra 47

य ऋ॒ते चि॑दभि॒श्रिषः॑ पु॒रा ज॒त्रुभ्य॑ आ॒तृदः॑ । संधा॑ता सं॒धिं म॒घवा॑ पुरू॒वसु॒र्निष्क॑र्ता॒ विह्रु॑तं॒ पुनः॑

जो बड़ा पुराना पावर है, बिना किसी हेल्प के गला पे जो भी दबाव आता था, उस्से हटा देता था। मघवन, यह उसका नाम है, बहुत सारे खजाने वाला। वो जोड़ने वाला है, जो टूटे हुए को जोड़ता है। और वो छुड़ाने वाला है, जो फंसाए हुए को निकालता है। अब जो भी बिगड़ गया है, उसे फिर से ठीक कर दे।

Mantra 48

अपा॒स्मत् तम॑ उच्छतु॒ नीलं॑ पि॒शङ्ग॑मु॒त लोहि॑तं॒ यत्। नि॒र्द॒ह॒नी या पृ॑षात॒क्य॑१स्मिन् तां स्था॒णावध्या स॑जामि

अंधेरा हमसे दूर हो जाए। जो भी नीला है, पीला है, लाल है, वो सब गायब हो। यह आग वाली शक्ति जो यहाँ है, मैं उसे लकड़ी के टुकड़े में बाँध देता हूँ। वो सब बुराई को जला देगी।

Mantra 49

याव॑तीः कृ॒त्या उ॑प॒वास॑ने॒ याव॑न्तो॒ राज्ञो॒ वरु॑णस्य॒ पाशाः॑ । व्यृद्धयो॒ या अस॑मृद्धयो॒ या अ॒स्मिन् ता स्था॒णावधि॑ सादयामि

घर में जो भी जादू-टोना है, वो सब मैं पकड़ लेता हूँ। राजा वरुण के फंदे भी मैं पकड़ लेता हूँ। जो काम बिगड़ रहे हैं, जो सफल नहीं हो रहे, वो सब मैं लकड़ी के टुकड़े पे रख देता हूँ। अब वो वहाँ जमके बैठ जाएंगे।

Mantra 50

या मे॑ प्रि॒यतमा त॒नूः सा मे॑ बिभाय॒ वास॑सः । तस्याग्रे॒ त्वं व॑नस्पते नी॒विं कृ॑णुष्व॒ मा व॒यं रि॑षाम

मेरी सबसे प्यारी बॉडी, वो डर रही है कपड़े से। वनस्पति, तुम आगे से उसकी पट्टी बाँध दो। ताकि हम किसी चीज़ से हानि ना पहुँचे।

Mantra 51

ये अन्ता॒ याव॑तीः॒ सिचो॒ य ओत॑वो॒ ये च॒ तन्त॑वः । वासो॒ यत् पत्नी॑भिरु॒तं तन्नः॑ स्यो॒नमुप॑ स्पृशात्

इस कपड़े के जो किनारे हैं, जो सिलाई है, जो धागे हैं, वो सब अच्छा काम करें। जो पत्नियाँ इस कपड़े को पहनती हैं, उनकी अच्छी एनर्जी हमारे पास आए। सब ठीक हो जाए।

Mantra 52

उ॒श॒तीः क॒न्यला॑ इ॒माः पि॑तृलो॒कात् पतिं॑ य॒तीः । अव॑ दी॒क्षाम॑सृक्षत॒ स्वाहा॑

यह लड़कियाँ अपने पुरखों के दुनिया से पति के पास आ रही हैं। वो अपनी पहचानी हुई रीत छोड़ के आ रही हैं। अब नया घर, नया ज़िन्दगी शुरू कर रही हैं। स्वाहा, यह मंत्र पूरा हुआ।

Mantra 53

बृह॒स्पति॒नाव॑सृष्टां॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॑धारयन्। वर्चो॒ गोषु॒ प्रवि॑ष्टं॒ यत् तेने॒मां सं सृ॑जामसि

बृहस्पति ने यह विधि शुरू की। सारे भगवान ने इसे पक्का किया। गाइयों में जो चमक डालती है, उसी शक्ति से हम इस औरत को घर में जोड़ रहे हैं।

Mantra 54

बृह॒स्पति॒नाव॑सृष्टां॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॑धारयन्। तेजो॒ गोषु॒ प्रवि॑ष्टं॒ यत् तेने॒मां सं सृ॑जामसि

बृहस्पति ने यह विधि शुरू की। सारे भगवान ने इसे पक्का किया। गाइयों में जो तेज़ ताकत डालती है, उसी शक्ति से हम इस औरत को घर में जोड़ रहे हैं।

Mantra 55

बृह॒स्पति॒नाव॑सृष्टां॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॑धारयन्। भजो॒ गोषु॒ प्रवि॑ष्टो॒ यस्तेने॒मां सं सृ॑जामसि

बृहस्पति ने यह विधि शुरू की। सारे भगवान ने इसे पक्का किया। गाइयों में जो अच्छा हिस्सा डालता है, उसी शक्ति से हम इस औरत को घर में जोड़ रहे हैं।

Mantra 56

बृह॒स्पति॒नाव॑सृष्टां॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॑धारयन्। यशो॒ गोषु॒ प्रवि॑ष्टं॒ यत् तेने॒मां सं सृ॑जामसि

बृहस्पति ने यह विधि शुरू की। सारे भगवान ने इसे पक्का किया। गाइयों में जो नाम रोशन करता है, उसी शक्ति से हम इस औरत को घर में जोड़ रहे हैं।

Mantra 57

बृह॒स्पति॒नाव॑सृष्टां॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॑धारयन्। पयो॒ गोषु॒ प्रवि॑ष्टं॒ यत् तेने॒मां सं सृ॑जामसि

बृहस्पति ने सबको भेजा, और सारे देवी-देवता ने इसको पकड़ के रखा। जो दूध गाय में गया है, उसी से हम इस औरत को अब जोड़ रहे हैं।

Mantra 58

बृह॒स्पति॒नाव॑सृष्टां॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॑धारयन्। रसो॒ गोषु॒ प्रवि॑ष्टो॒ यस्तेने॒मां सं सृ॑जामसि

बृहस्पति ने यह शक्ति निकाली थी। उसके बाद सारे देवता ने उस्से पकड़ के रखा। गाय में जो रस भरा है, उस्से हम यह और भी ठीक कर देते हैं।

Mantra 59

यदी॒मे के॒शिनो॒ जना॑ गृ॒हे ते॑ स॒मन॑र्तिषू॒ रोदे॑न कृण्व॒न्तो॒३घम्। अ॒ग्निष्ट्वा॒ तस्मा॒देन॑सः सवि॒ता च॒ प्र मु॑ञ्चताम्

अगर कोई लंबा बाल वाले लोग घर में नाच गाना करते वक़्त ज़ोर से रोते हैं और गड़बड़ करते हैं। तो अग्नि और सविता दोनों तुम्हे उस पाप से आज़ाद कर देंगे।

Mantra 60

यदी॒यं दु॑हि॒ता तव॑ विके॒श्यरु॑दद् गृ॒हे रोदे॑न कृण्व॒त्य॑१घम्। अ॒ग्निष्ट्वा॒ तस्मा॒देन॑सः सवि॒ता च॒ प्र मु॑ञ्चताम्

अगर तुम्हारी बेटी ने बाल खोले घर में रोया है। और उसकी आवाज़ से कोई प्रॉब्लम हुई है। तो अग्नि और सविता दोनों तुम्हे उस पाप से आज़ाद कर देंगे।

Mantra 61

यज्जा॒मयो॒ यद् यु॑व॒तयो॑ गृ॒हे ते॑ स॒मन॑र्तिषू॒ रोदे॑न कृण्व॒तीर॒घम्। अ॒ग्निष्ट्वा॒ तस्मा॒देन॑सः सवि॒ता च प्र मु॑ञ्चताम्

अगर घर की औरतें या जवान लड़कियाँ नाच गाना करते वक़्त रोते हैं और कोई प्रॉब्लम पैदा करते हैं। तो अग्नि और सविता दोनों तुम्हे उस पाप से आज़ाद कर देंगे।

Mantra 62

यत् ते॑ प्र॒जायां॑ प॒शुषु॒ यद् वा॑ गृ॒हेषु॒ निष्ठि॑तमघ॒कृद्भि॑र॒घं कृ॒तम्। अ॒ग्निष्ट्वा॒ तस्मा॒देनसः सवि॒ता च॒ प्र मु॑ञ्चताम्

कोई बुरा इंसान तुम्हारे बच्चों, जानवरों या घर में तकलीफ फैला दे। अग्नि और सविता दोनों तुम्हे उस बुराई से आज़ाद करेंगे। वो तुम्हारे ऊपर से पाप का बोझ उतार देंगे।

Mantra 63

इ॒यं नार्युप॑ ब्रूते॒ पूल्या॑न्यावपन्ति॒का। दी॒र्घायु॑रस्तु मे॒ पति॒र्जीवा॑ति श॒रदः॑ श॒तम्

दुल्हन कह रही है, जैसे औरतें कचरा अलग करती हैं, वैसे ही मेरा पति लंबी उमर जियेगा। वो सौ साल तक जियेगा।

Mantra 64

इ॒हेमावि॑न्द्र॒ सं नु॑द चक्रवा॒केव॒ दंप॑ती । प्र॒जयै॑नौ स्वस्त॒कौ विश्व॒मायु॒र्व्यऽश्नुताम्

इंद्र, इन दोनों को साथ लगा दे। जैसे चकवा-चकवी जोड़ी रहती है, वैसे ही यह दोनों पति-पत्नी बन के रहें। उनके बच्चे हों, खुश रहें, और पूरा जीवन जियें।

Mantra 65

यदा॑स॒न्द्यामु॑प॒धाने॒ यद् वो॑प॒वास॑ने कृ॒तम्। वि॒वा॒हे कृ॒त्यां यां च॒क्रुरा॒स्नाने॒ तां नि द॑ध्मसि

जो भी गलत काम हुआ, बिस्तर पर, तकिए पर, कपड़े में, सब छोड़ दो। शादी में या नहाते वक्त जो बुरी हरकत हुई, उसको अब मिटा दो।

Mantra 66

यद् दु॑ष्कृ॒तं यच्छम॑लं विवा॒हे व॑ह॒तौ च॒ यत्। तत् सं॑भ॒लस्य॑ कम्ब॒ले मृ॒ज्महे॑ दुरि॒तं व॒यम्

शादी में जो गलती हुई, जो दाग लगा, सब कंबल से पोंछा दो। जो भी बुरा काम हुआ, हम उसे साफ़ कर देते हैं।

Mantra 67

सं॒भ॒ले मलं॑ सादयित्वा क॑म्बले दु॑रितं व॒यम्। अभू॑म य॒ज्ञियाः॑ शु॒द्धाः प्र ण॒ आयूं॑षि तारिषत्

जब मैला बैठ जाता है और बुरी बातें खत्म हो जाती हैं, तब हम साफ हो जाते हैं और भगवान की पूजा के लायक हो जाते हैं। भगवान हमारी उम्र लंबी करे और हम सेफ रहें।

Mantra 68

कृ॒त्रिमः॒ कण्ट॑कः श॒तद॒न् य ए॒षः । अपा॒स्याः केश्यं॒ मल॒मप॑ शीर्ष॒ण्यं लिखात्

यह काँटा जैसा टूल है, सौ दाँतो वाला। इस्से बालों का जो गंधा मिल गया है, वो साफ हो जाए। सर पे जो भी मैला है, वो भी झाड़ के साफ हो जाए।

Mantra 69

अङ्गा॑द॒ङ्गाद् व॒यम॒स्या अप॒ यक्ष्मं॒ नि द॑ध्मसि । तन्मा प्राप॑त् पृथि॒वीं मोत दे॒वान् दिवं॒ मा प्राप॑दु॒र्व॑१न्तरि॑क्षम्। अ॒पो मा प्राप॒न्मल॑मे॒तद॑ग्ने य॒मं मा प्राप॑त् पि॒तॄंश्च॒ सर्वा॑न्

इसके हर हिस्से से हम बिमारी को निकाल के दूर फेंक देते हैं। यह बिमारी मुझे न लगे। न ज़मीन तक पहुँचे, न भगवान लोगों तक। न आसमान तक जाए, न हवा में। पानी से यह मैला दूर रहे। अग्नि, तू देख ले। यह यमराज के पास न जाए, न पूर्वजों के पास।

Mantra 70

सं त्वा॑ नह्यामि॒ पय॑सा पृथि॒व्याः सं त्वा॑ नह्यामि॒ पय॒सौष॑धीनाम्। सं त्वा॑ नह्यामि प्र॒जया॒ धने॑न॒ सा संन॑द्धा सनुहि॒ वाज॒मेमम्

मैं तुम्हे ज़मीन के दूध से बाँध देता हूँ। घास-पत्ती के दूध से भी बाँध देता हूँ। बच्चों और धन के साथ तुम्हे कस के बाँध देता हूँ। अब तुम मज़बूत हो के यह जीत पा लो।

Mantra 71

अमो॒ऽहम॑स्मि॒ सा त्वं सामा॒हम॒स्म्यृक् त्वं द्यौर॒हं पृ॑थि॒वी त्वम्। तावि॒ह सं भ॑वाव प्र॒जामा ज॑नयावहै

मैं ताकत हूँ, तुम वो औरत हो। मैं रिक हूँ, तुम साम हो। मैं आसमान हूँ, तुम ज़मीन हो। अब हम दोनों मिलकर एक हो जाएँ। साथ मिलकर बच्चे पैदा करें।

Mantra 72

ज॒नि॒यन्ति॑ ना॒वग्र॑वः पुत्रि॒यन्ति॑ सु॒दान॑वः । अरि॑ष्टासू सचेवहि बृह॒ते वाज॑सातये

जो लोग रोते रहते हैं, उनके घर बच्चे नहीं होते। जो लोग खुले हाथ देते हैं, वो बच्चे के लिए तरसते हैं। औरतें सेफ रहें, किसी चीज़ से चोट न आए। तभी बड़ी ताकत मिल सकती है।

Mantra 73

ये पि॒तरो॑ वधूद॒र्शा इमं व॑ह॒तुमाग॑मन्। ते अ॒स्यै व॒ध्वै संप॑त्न्यै प्र॒जाव॒च्छर्म॑ यच्छन्तु

पिताजी लोग आए थे दुल्हन को देखने। अब वो इस दुल्हन को आशीर्वाद दें। वो उसे घर बसाए, बच्चे हो, और पति के साथ खुश रहे।

Mantra 74

येदं पूर्वाग॑न् रशना॒यमा॑ना प्र॒जाम॒स्यै द्रवि॑णं चे॒ह द॒त्त्वा। तां व॑ह॒न्त्वग॑त॒स्यानु॒ पन्थां॑ वि॒राडि॒यं सु॑प्र॒जा अत्य॑जैषीत्

जो लोग पहले से चले थे, उन्होंने इस लड़की को पैसा और बच्चे दिए। अब वो उसे उस रास्ते पे ले जाएं जहां पति जा चुका है। यह घर बच्चों के साथ जीत गया।

Mantra 75

प्र बु॑ध्यस्व सु॒बुधा॒ बुध्य॑माना दीर्घायु॒त्वाय॑ श॒तशा॑रदाय । गृ॒हान् ग॑च्छ गृ॒हप॑त्नी॒ यथासो॑ दी॒र्घं त॒ आयुः॑ सवि॒ता कृ॑णोतु

अब जागो, अच्छे से जागो। तुम्हारी उम्र लंबी हो, सौ साल तक तुम जीतो। घर जाओ, घर की मालिक बन के रहो। भगवान तुम्हारी उम्र लंबी करे।

Inside Sukta 2

How it unfolds

  1. How it opens

    The hymn opens by placing marriage within a sacred economy of guardianship and witness—divine powers preside over the bride’s transition and render it legitimate.

  2. What it asks

    That the bride be safely transferred to the human husband, become auspicious in the new home, honor the Gārhapatya fire, and bring prosperity, cattle-welfare, and abundant offspring.

  3. Where its power lies

    By stating the ordered succession of spouses/guardians (Soma–Gandharva–Agni–man) and by naming the bride’s desired qualities (adevr̥ghnī, apatighnī, prajāvatī, vīrasū), the mantra itself is presented as the effective instrument that ‘makes it so’.

  4. How it closes

    The hymn seals the rite with prosperity-and-progeny orientation—safe women (ariṣṭā) and successful begetting/strength (vāja) as the culminating household goal.

Famous verses

somasya jāyā… tūrīyas te manuṣyajāḥ
Verse 14.2.3Programmatic ‘transfer formula’ that maps the bride’s passage through divine custody into lawful human marriage; it functions as the theological/legal backbone of the sukta.Read verse 14.2.3 →
adevr̥ghnī apatighnī… agniṃ gārhapatyaṃ saparya
Verse 14.2.18Core household-installation blessing: defines the ideal wife as non-harmful to husband/kin, auspicious to cattle, radiant, fertile, and devoted to the Gārhapatya fire—central to gṛhya domestic stability.Read verse 14.2.18 →
ariṣṭāsū sacevahi bṛhate vājasātaye
Verse 14.2.72Condenses the sukta’s paustika aim: legitimate union with ‘unharmed’ auspicious women leads to the ‘mighty prize’ of strength and successful begetting; often cited for offspring-prosperity intent.Read verse 14.2.72 →

Kind of hymn

Strikarmani (Women's Rites) / Vivaha (Marriage)

What it is for

A safe, ritually validated marriage: the bride is installed as an auspicious householder-wife (śivā), free from harmful influences, beneficial to cattle and wealth, and fruitful in offspring; the couple’s household is anchored in the Gārhapatya fire.

Who it is for

Householders and officiants in a Vedic-style marriage (bride, groom, families, and the domestic priest/ṛtvij or gṛhya specialist).

Also used as

  • Paustika
  • Strīkarmāṇi (Women’s Rites)
  • Vivāha (Marriage)
  • Gṛhya (Domestic liturgy)

The deity

A graded chain of guardianship: Soma sanctifies the bride’s first, celestial ‘estate’; the Gandharva represents the liminal keeper of maidenhood and sexuality; Agni is the ritual witness and domestic installer; the human husband receives the bride in lawful, socially recognized marriage.

Powers of the deity

  • Sanctify and legalize the marital bond through divine witness (Soma/Agni)
  • Guard the bride’s liminal transition and prevent non-human/illicit possession (Gandharva)
  • Establish the Gārhapatya hearth as the stable center of the new household (Agni)
  • Bestow prosperity and reproductive success—offspring, especially ‘heroic’ sons (praja, vīrasū)
  • Secure harmony with husband’s kin and protection of cattle/wealth (paśu, śrī)

Why the deity is called

They are invoked to move the bride step-by-step from sacred custody to human marriage, to make Agni the enduring witness of her new status, and to ensure that sexuality, lineage, and household prosperity remain protected and auspicious.

The seer

  • Vivāha-sūkta seers (anukramaṇī-varied; Atharvanic gṛhya transmission)Atharvan. Gṛhya and strīkarmāṇi charms: marriage-transfer, household installation, fertility/offspring (putrakāma), protection of the bride from hostile/illicit influences, and establishment of the domestic fire-cult (Gārhapatya).

Other hymns of this seer

  • AV 14.1 (Vivāha / Sūryā-bride hymns, parallel complex)
  • AV 6.81 (Putrakāma / offspring-seeking charm; tradition-dependent grouping)
  • AV 3.30 (Household concord / domestic harmony; common gṛhya recitation cluster)

Preparing for the rite

  • Kindle and steady the Gārhapatya (domestic) fire; prepare a clean ritual space in the house/nuptial area.
  • Seat bride and groom according to gṛhya custom; ensure consent and public witnesses (social ‘seal’ of marriage).
  • Arrange offerings for Agni (ghee/ājya; optionally samidh fuel-sticks) and water for purification/sprinkling.
  • Mentally ‘frame’ the rite as a transfer of guardianship: from Soma → Gandharva → Agni → human husband (as the hymn itself articulates).

The rite

  • Recite the sukta in the marriage sequence: (1) consecration/transfer verses, (2) installation at the hearth, (3) prosperity and offspring blessings.
  • Offer ājya into the fire at Agni-directed verses; honor the Gārhapatya as the household’s enduring witness.
  • Bless the bride explicitly as non-harmful to husband/kin and auspicious to cattle and wealth (cf. 14.2.18).
  • Conclude with verses that press toward fertility and ‘mighty prize’ (vāja) through safe, intact womanhood (ariṣṭā) and legitimate union (cf. 14.2.72).

What it needs

  • Gārhapatya fire (marriage hearth)
  • Ghee/ājya for offerings
  • Samidh (fuel-sticks)
  • Purifying water (for sprinkling/ācaman)
  • Optional: grains/food for household prosperity offerings (regional gṛhya practice)

When

Performed during the vivāha sequence—especially at bride-transfer, hearth-installation, and household-entry moments; traditionally on an auspicious day/night per family/gṛhya rule.

The main substance

Gārhapatya fire (with ājya/ghee offerings)

How it is prepared

Maintain a steady domestic hearth-fire; prepare ājya for oblations and keep purifying water ready. Offer ghee at Agni-centered verses and treat the hearth as the enduring witness of the marriage.

Frequently Asked Questions

It expresses a ritual sequence of guardianship. Soma sanctifies, the Gandharva guards the liminal sexuality of maidenhood, Agni witnesses and installs the bride in the household, and only then does the human husband receive her in lawful marriage.

The Gārhapatya is the stable domestic hearth that ‘holds’ the household. Honoring it makes the marriage socially and ritually anchored, and it becomes the ongoing witness for prosperity, harmony, and fertility.

Both: its shāntika force protects the bride and marriage from harmful/illicit influences, and its paustika aim seeks prosperity—cattle, radiance, household order—and abundant offspring (praja), ideally ‘heroic’ children (vīrasū).

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