Opening the text

Book 3 operationalizes the king’s role as the state’s adjudicatory nerve-center: it converts dharma into enforceable schedules, so private disputes do not become public disorder. Chapter 17, in particular, treats interest (vyājī) not as a moral abstraction but as a rate-governed instrument of credit that can either lubricate commerce or metastasize into exploitation. The cited sūtras set a ceiling/recognition-rule for interest at higher principal thresholds and then introduce a diagnostic: when excessive or disguised forms proliferate, the cause lies either in the population’s fault-density (doṣa-bāhulya) or in the ruler’s/administration’s own defects (bhāva-doṣa). This is a Kautilyan feedback loop—market pathology is also a governance audit. By distinguishing dharmya prakṛti (legitimate ‘natural’ dealing) from adharmic rūpa-vyājya (camouflaged usury), the Vijigīṣu strengthens kośa through predictable collections and strengthens svāmin through legitimacy: coercion (daṇḍa) becomes credible because it is rule-bound rather than whimsical.
Sutra 1
साहसमन्वयवत्प्रसभकर्म ॥ कZ_०३.१७.०१ ॥
साहस मतलब ज़बरदस्ती का काम है। जैसे कोई लूट मारे या हाथ पैर तोड़के छीन ले। और पकड़ में आना भी ज़रूरी है, सीधा कनेक्शन मिलना चाहिए कि यह आदमी ने किया।
Sutra 2
निरन्वये स्तेयमपव्ययने च ॥ कZ_०३.१७.०२ ॥
चोरी अलग है। चोरी में ट्रेस नहीं होता कि किसने किया, चुपके से माल उठा लिया। अपव्ययन भी ऐसा ही है, जैसे किसी ने हमें संभालने को दिया और वो उसे खर्च कर दिया या गायब कर दिया।
Sutra 3
रत्नसारफल्गुकुप्यानां साहसे मूल्यसमो दण्डः इति मानवाः ॥ कZ_०३.१७.०३ ॥
मानव कहते हैं, अगर किसी ने ज़बरदस्ती छीन लिया, तो जुर्माना उतना होगा जितना उस चीज़ की कीमत है। यह सब पहले लगता है, हीरे मोती, कीमत वाला माल, सस्ती चीज़ें, या काम की चीज़ें।
Sutra 4
मूल्यद्विगुणः इत्यौशनसाः ॥ कZ_०३.१७.०४ ॥
लेकिन औशनस कहते हैं नहीं, जुर्माना डबल लगाना। जो चीज़ ली है, उसकी कीमत का दुगना।
Sutra 5
यथापराध इति कौटिल्यः ॥ कZ_०३.१७.०५ ॥
कौटिल्य कहते हैं, जो करेगा, वही भुगतेगा। गलती जितनी बड़ी, सज़ा उतनी बड़ी।
Sutra 6
पुष्पफलशाकमूलकन्दपक्वान्नचर्मवेणुमृद्भाण्डादीनां क्षुद्रकद्रव्याणां द्वाद्शपणावरश्चतुर्विंशतिपणपरो दण्डः ॥ कZ_०३.१७.०६ ॥
छोटी चीज़ें जैसे फूल, फल, सब्ज़ी, जड़, पक्का खाना, चमड़ा, बाँस, मिट्टी के बर्तन, इन सब के लिए जुर्माना 12 पण से 24 पण तक लगता है।
Sutra 7
कालायसकाष्ठरज्जुद्रव्यक्षुद्रपशुपटादीनां स्थूलकद्रव्याणां चतुर्विंशतिपणावरोऽष्टचत्वारिंशत्पणपरो दण्डः ॥ कZ_०३.१७.०७ ॥
बड़ी चीज़ें जैसे लोहा, लकड़ी, रस्सी, माल, छोटे जानवर, कपड़ा, इन सब के लिए जुर्माना 24 पण से 48 पण तक होता है।
Sutra 8
ताम्रवृत्तकंसकाचदन्तभाण्डादीनां स्थूलकद्रव्याणामष्टचत्वारिंशत्पणावरः षण्णवतिपरः पूर्वः साहसदण्डः ॥ कZ_०३.१७.०८ ॥
भारी चीज़ें जैसे ताँबा, काँसी, शीशे के बर्तन, हाथी के दाँत से बने बर्तन, इन सब के लिए पहला जुर्माना 48 पण से 96 पण तक है।
Sutra 9
महापशुमनुष्यक्षेत्रगृहहिरण्यसुवर्णसूक्ष्मवस्त्रादीनां स्थूलकद्रव्याणां द्विशतावरः पञ्चशतपरो मध्यमः साहसदण्डः ॥ कZ_०३.१७.०९ ॥
बड़े जानवर, इंसान, खेत, घर, चाँदी, सोना, अच्छी कपड़ी, जैसी बड़ी चीज़ें, इन सब के लिए बीच का जुर्माना 200 पण से 500 पण तक लगता है।
Sutra 10
स्त्रियं पुरुषं वाभिषह्य बध्नतो बन्धयतो बन्धं वा मोक्षयतः पञ्चशतावरः सहस्रपर उत्तमः साहसदण्डः । इत्याचार्याः ॥ कZ_०३.१७.१० ॥
आचार्यों ने कहा है, कोई औरत या आदमी को ज़बरदस्ती पकड़ के बाँध दे, या किसी को जेल से भगा दे, तो सबसे बड़ा जुर्माना 500 पण से 1000 पण तक होगा।
Sutra 11
यः साहसं प्रतिपत्ता इति कारयति स द्विगुणं दद्यात् ॥ कZ_०३.१७.११ ॥
जो किसी को जबरदस्ती मानने पे दबाए कि मैं यह काम मानता हूँ, उसको डबल जुर्माना देना पड़ेगा।
Sutra 12
यावद्द् हिरण्यमुपयोक्ष्यते तावद्दास्यामि इति स चतुर्गुणं दण्डं दद्यात् ॥ कZ_०३.१७.१२ ॥
अगर किसी को गुलाम बनने पे मजबूर करे कि जब तक पैसा चुका नहीं होता मैं नौकर रहूँगा, उसको चार गुना जुर्माना लगेगा।
Sutra 13
यः एतावद्द् हिरण्यं दास्यामि इति प्रमाणमुद्दिश्य कारयति स यथोक्तं हिरण्यं दण्डं च दद्यात् इति बार्हस्पत्याः ॥ कZ_०३.१७.१३ ॥
बर्हस्पत्य लोग कहते हैं जो किसी से पूरा हिसाब दिखाके लिखवा ले इतना पैसा दूँगा, उसको वो पैसा और जुर्माना दोनों देना पड़ेगा।
Sutra 14
स चेत्कोपं मदं मोहं वापदिशेद् यथोक्तवद्दण्डमेनं कुर्यादिति कौटिल्यः ॥ कZ_०३.१७.१४ ॥
कौटिल्य कहते हैं बड़े में गुस्सा आया था, नशे में था या दिमाग घूम रहा था, फिर भी सज़ा वही मिलेगी जो लिखी है।
Sutra 15
शतात्परेषु व्याजीं च विद्यात्पञ्चपणं शतम् ॥ कZ_०३.१७.१५च्द् ॥
जब भी कोई जुर्म हो और उसमे दंड या फाइन लगे, तो स्टैंडर्ड १०० पण लगता है। उसके ऊपर से और ८ पण अलग से चार्ज लगता है।
Sutra 16
रूपव्याज्यावधर्मिष्ठे धर्म्या तु प्रकृतिः स्मृता ॥ कZ_०३.१७.१६च्द् ॥
गलतियाँ दो तरह से होती हैं। कभी लोगों में बुरी आदतें होती हैं, कभी राजा का नेचर ही खराब होता है।
Credit remains available yet non-predatory; disputes reduce, commercial confidence rises, and the king’s courts gain legitimacy—supporting stable revenue and social order.
Disguised or unlawful interest (rūpa-vyājya/adharmya vyājī) is treated as punishable in adjudication—typically via enforced restitution and fines under the court’s vyavahāra procedures, with severity scaled to proven wrongdoing and harm.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.
Read Arthashastra in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.