
अवधूत उपनिषद (अथर्ववेद से संबद्ध) संन्यासोपनिषदों में एक संक्षिप्त किन्तु अत्यन्त अर्थगर्भित ग्रंथ है। यह ‘अवधूत’—अर्थात् जिसने उपाधियाँ, सामाजिक पहचान, और कर्मकाण्डीय आसक्ति को झाड़ दिया है—उस संन्यासी-आदर्श का निरूपण करता है। इसका मुख्य प्रतिपाद्य बाह्य वेश-परिवर्तन नहीं, बल्कि अंतःकरण में कर्तृत्व-भोक्तृत्व के अभिमान का क्षय और आत्मा-ब्रह्म की एकता का प्रत्यक्ष बोध है। उपनिषद द्वन्द्वातीतता (मान-अपमान, शुचि-अशुचि, लाभ-हानि, सुख-दुःख) को अविधेय नहीं, बल्कि ज्ञानजन्य स्वाभाविक स्थिति बताती है। देह, इन्द्रियाँ और मन को ‘दृश्य’ मानकर साक्षी-चैतन्य में स्थित रहना, तथा कर्म होते हुए भी ‘मैं करता हूँ’ का भाव न रखना—यही जीवन्मुक्ति का संकेत है। अवधूत का जीवन समाज के मानदण्डों से परे दिख सकता है, पर उसका केन्द्र आत्मनिष्ठ शान्ति है। इस प्रकार यह उपनिषद वेदान्त की साधना-भाषा में संन्यास का सार देती है: वास्तविक त्याग वस्तुओं का नहीं, अहंकार और आसक्ति का है; और मुक्ति का द्वार आत्मज्ञान है।
Start Reading- Avadhūta ideal: the renouncer who has cast off ego
social identity
and ritualistic self-concern
- Jñāna over karma: liberating knowledge of Ātman-Brahman as the core of sannyāsa
- Non-duality (advaita): the Self is one
self-luminous consciousness; multiplicity is superimposition
- Transcendence of dualities: beyond honor/dishonor
purity/impurity
gain/loss
pleasure/pain
- Disidentification: body–mind–sense complex is witnessed; the seer is unattached awareness
- Jīvanmukti: freedom while living
expressed as fearlessness
non-possessiveness
and spontaneity
- Inner renunciation: external marks are secondary; true tyāga is the dropping of doership and ownership
- Natural compassion and simplicity: action may occur
but without egoic claim or binding attachment
36 verses with Sanskrit text, transliteration, and translation.
Verse 1
अथ ह सांकृतिः भगवन्तम् अवधूतं दत्तात्रेयं परिसमेत्य पप्रच्छ—भगवन्, कोऽवधूतस्य? का स्थितिः? किं लक्ष्म? किं संसरणम्? इति। तं होवाच भगवो दत्तात्रेयः परमकारुणिकः॥१॥
तब सांकृति ने भगवान् अवधूत दत्तात्रेय के पास जाकर पूछा—“भगवन्, अवधूत किसे कहते हैं? उसकी स्थिति क्या है? उसका लक्षण क्या है? और उसका विचरण/आचरण कैसा है?” तब परम करुणामय भगवान् दत्तात्रेय ने उत्तर दिया॥१॥
Avadhūta-lakṣaṇa (marks of the liberated sage) and jīvanmuktiVerse 2
अक्षरत्वाद्वरेण्यत्वाद्धृतसंसारबन्धनात् । तत्त्वमस्यादिलक्ष्यत्वादवधूत इतीर्यते॥२॥
अक्षर (अविनाशी ब्रह्म) के साक्षात्कार से, परम वरेण्य होने से, संसार-बन्धन को त्याग देने से, तथा ‘तत्त्वमसि’ आदि महावाक्यों का लक्ष्य होने से—वह ‘अवधूत’ कहलाता है॥२॥
Akṣara/Brahman-realization and mokṣa (freedom from saṃsāra-bandha)Verse 3
यो विलङ्घ्याश्रमान्वर्णानात्मन्येव स्थितः सदा । अतिवर्णाश्रमी योगी अवधूतः स कथ्यते॥३॥
जो चारों वर्णों और चारों आश्रमों के धर्मों को लाँघकर, सदा केवल आत्मा में ही स्थित रहता है—वह वर्ण-आश्रम से परे योगी ‘अवधूत’ कहलाता है॥३॥
Ātma-niṣṭhā (abidance in the Self) and transcendence of varṇāśrama through jñānaVerse 4
तस्य प्रियं शिरः कृत्वा मोदो दक्षिणपक्षकः । प्रमोद उत्तरः पक्ष आनन्दो गोष्पदायते॥४॥
उसके लिए ‘प्रिय’ मानो शिर है, ‘मोद’ दाहिना पक्ष है, ‘प्रमोद’ बायाँ पक्ष है; और ‘आनन्द’ (भी) गो-खुर के चिह्न के समान (अत्यल्प) हो जाता है॥४॥
Ānanda-taratamya (gradation of bliss) and transcendence even of experiential bliss in Brahman-knowledgeVerse 5
गोपालसदृशां शीर्षे नापि मध्ये न चाप्यधः । ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठेति पुच्छाकारेण कारयेत्॥५॥
न ऊपर, न बीच में, न नीचे—‘ब्रह्म-पूँछ ही प्रतिष्ठा है’ ऐसा ध्यान करे; और उस भावना को पूँछ के आकार में विन्यस्त करे॥५॥
Brahman as pratiṣṭhā (ultimate ground/support) and the pañca-kośa/ānandamaya imagery of ‘brahma-puccha’Verse 6
एवं चतुष्पथं कृत्वा ते यान्ति परमां गतिम् । न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः ॥६॥
इस प्रकार चतुर्विध मार्ग को अपनाकर वे परम गति को प्राप्त होते हैं। न कर्मकाण्ड से, न संतान से, न धन से—केवल त्याग से ही कुछ जन अमरत्व को पहुँचे॥६॥
Moksha through tyāga (renunciation) rather than karma/artha/kāmaVerse 7
स्वैरं स्वैरविहरणं तत्संसरणम् । सांबरा वा दिगंबरा वा । न तेषां धर्माधर्मौ न मेध्यामेधौ । सदा सांग्रहण्येष्ट्यश्वमेधान्तयागं यजते । स महामखो महायोगः ॥७॥
उनका विचरण स्वैर है; उनका गमन स्वतःस्फूर्त भ्रमण है। वे वस्त्रधारी हों या दिगम्बर। उनके लिए न धर्म-अधर्म है, न शुद्ध-अशुद्ध। वह सदा अन्तिम आहुति तक यज्ञ करता है; वही महामख, वही महायोगी है॥७॥
Jīvanmukti; transcendence of dualities (dvandva) and ritual purity/impurityVerse 8
कृत्स्नमेतच्चित्रं कर्म । स्वैरं न विगायेत् तन्महाव्रतम् । न स मूढवल्लिप्यते ॥८॥
यह समस्त कर्म एक विचित्र प्रदर्शन मात्र है। इसे स्वेच्छा से गाकर-प्रचारित न करे—यही महाव्रत है। वह मूढ़ की भाँति लिप्त नहीं होता॥८॥
Non-doership (akartṛtva) and non-attachment to karma; māyā as displayVerse 9
यथा रविः सर्वरसान् प्रभुङ्क्ते हुताशनश्चापि हि सर्वभक्षः । तथैव योगी विषयान् प्रभुङ्क्ते न लिप्यते पुण्यपापैश्च शुद्धः ॥९॥
जैसे सूर्य सब रसों को खींच लेता है और अग्नि सबका भक्षक है, वैसे ही योगी विषयों का उपभोग करता है; शुद्ध होकर वह पुण्य-पाप से लिप्त नहीं होता॥९॥
Non-attachment amid experience; purity of Self; karma non-binding for the knowerVerse 10
आपूर्यमाणम् अचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥१०॥
जैसे जल समुद्र में प्रवेश करते हैं—जो भरता हुआ भी अपनी प्रतिष्ठा में अचल रहता है—वैसे ही सब कामनाएँ जिसमें प्रवेश करती हैं, वही शान्ति पाता है; कामनाओं का कामी नहीं॥१०॥
Śānti through desirelessness (akāmatā); fullness (pūrṇatā) of the SelfVerse 11
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता॥११॥
न तो निरोध है, न ही उत्पत्ति; न कोई बंधा है, न साधक। न कोई मुमुक्षु है, न वास्तव में कोई मुक्त—यही परम सत्य है।
Ajātivāda / non-origination; paramārtha-sattā (absolute standpoint)Verse 12
ऐहिकामुष्मिकव्रातसिद्धै मुक्तेश्च सिद्धये । बहुकृत्यं पुरा स्यान्मे तत्सर्वमधुना कृतम्॥१२॥
इस लोक और परलोक की सिद्धियों के समूह तथा मुक्ति की सिद्धि के लिए पहले मुझे बहुत कुछ करना पड़ता; वह सब अब हो चुका है।
Kṛtakṛtyatā (accomplishedness) through Self-knowledge; sublation of sādhanā as a means once knowledge dawnsVerse 13
तदेव कृतकृत्यत्वं प्रतियोगिपुरःसरम् । अनुसन्दधदेवायमेवं तृप्यति नित्यशः॥१३॥
प्रतियोगियों (विपरीत कल्पनाओं) से पूर्वगामी वही कृतकृत्यता है; ऐसा अनुसंधान करते हुए यह पुरुष सदा तृप्त रहता है।
Kṛtakṛtyatā and tṛpti (contentment) born of jñāna; sublation of dualities (pratiyogin)Verse 14
दुःखिनोऽज्ञाः संसरन्तु कामं पुत्राद्यपेक्षया । परमानन्दपूर्णोऽहं संसरामि किमिच्छया॥१४॥
दुःखी अज्ञानी लोग पुत्र आदि पर आश्रित होकर चाहे जैसे संसार में भटकें। मैं परम आनन्द से पूर्ण हूँ—किस इच्छा से मैं संसार में भटकूँ?
Pūrṇatva (fullness) of Ātman; vairāgya; saṃsāra as desire-drivenVerse 15
अनुतिष्ठन्तु कर्माणि परलोकयियासवः । सर्वलोकात्मकः कस्मादनुतिष्ठामि किं कथम्॥१५॥
जो परलोक जाना चाहते हैं, वे कर्म करें। मैं समस्त लोकों का स्वरूप हूँ—तो मैं क्यों कर्म करूँ, किस हेतु, और कैसे?
Akartṛtva (non-doership) of the Self; karma as means for finite ends; sarvātmatvaVerse 16
व्याचक्षतां ते शास्त्राणि वेदानध्यापयन्तु वा । येऽत्राधिकारिणो मे तु नाधिकारोऽक्रियत्वतः ॥१६॥
जो यहाँ अधिकारी हैं, वे शास्त्रों का व्याख्यान करें या वेदों का अध्यापन भी करें। पर मेरे लिए, अक्रियत्व और कर्तृत्व-भाव के अभाव से, ऐसा अधिकार नहीं है॥१६॥
Akartṛtva (non-doership) / Ātman as actionless witnessVerse 17
निद्राभिक्षे स्नानशौचे नेच्छामि न करोमि च । द्रष्टारश्चेत्कल्पयन्तु किं मे स्यादन्यकल्पनात् । गुञ्जापुञ्जादि दह्येत नान्यारोपितवह्निना । नान्यारोपितसंसारधर्मा नैवमहं भजे ॥१७॥
निद्रा और भिक्षा, स्नान और शौच—मैं न तो चाहता हूँ, न करता हूँ। यदि देखने वाले कुछ कल्पना करें, तो दूसरे की कल्पना से मेरा क्या? जैसे आरोपित (कल्पित) अग्नि से गुंजा-बीजों का ढेर नहीं जलता, वैसे ही दूसरों द्वारा आरोपित संसार-धर्मों को मैं नहीं अपनाता॥१७॥
Adhyāropa (superimposition) and asaṅga/asaṃsparśa (non-contact) of ĀtmanVerse 18
शृण्वन्त्वज्ञाततत्त्वास्ते जानन्कस्माञ्छृणोम्यहम् । मन्यन्तां संशयापन्ना न मन्येऽहमसंशयः ॥१८॥
जिन्होंने तत्त्व नहीं जाना, वे सुनें; मैं जानकर क्यों सुनूँ? जो संशय में पड़े हैं, वे विचार करें; मैं तो संशयरहित हूँ—मैं विचार नहीं करता॥१८॥
Jñāna-niṣṭhā (abidance in knowledge) and nivṛtti from saṃśaya (doubt)Verse 19
विपर्यस्तो निदिध्यासे किं ध्यानमविपर्यये । देहात्मत्वविपर्यासं न कदाचिद्भजाम्यहम् ॥१९॥
विपर्यय (भ्रम) में पड़ा हुआ ही निदिध्यासन करता है; जो अविपर्यय में है, उसके लिए ध्यान क्या? देह को आत्मा मानने वाला यह विपर्यय मैं कभी नहीं अपनाता॥१९॥
Viparyaya (error) / dehātma-buddhi negation; culmination beyond practiceVerse 20
अहं मनुष्य इत्यादिव्यवहारो विनाप्यमुम् । विपर्यासं चिराभ्यस्तवासनातोऽवकल्पते ॥२०॥
इस विपर्यय के बिना भी ‘मैं मनुष्य हूँ’ आदि व्यवहार संभव है; क्योंकि विपर्यय तो चिरकाल से अभ्यासित वासनाओं से ही उत्पन्न होता है॥२०॥
Vyavahāra vs pāramārthika; vāsanā (latent tendencies) sustaining viparyayaVerse 21
आरब्धकर्मणि क्षीणे व्यवहारो निवर्तते । कर्मक्षये त्वसौ नैव शाम्येद्ध्यानसहस्रतः ॥२१॥
जब प्रारब्ध कर्म क्षीण हो जाता है, तब लौकिक व्यवहार निवृत्त हो जाता है। पर वह प्रारब्ध केवल हजारों ध्यानों से नहीं मिटता; उसका अंत कर्मक्षय से ही होता है।
Prārabdha-karma and the jñānī’s non-doership amid residual embodimentVerse 22
विरलत्वं व्यवहृतेरिष्टं चेद्ध्यानमस्तु ते । बाधिकर्मव्यवहृतिं पश्यन्ध्यायाम्यहं कुतः ॥२२॥
यदि तुम्हें व्यवहार की विरलता (कमी) प्रिय है, तो तुम्हारे लिए ध्यान हो। पर मैं—कर्मजन्य व्यवहार को बाधित (असत्) रूप में देखता हुआ—कैसे ध्यान करूँ?
Bādhita-vyavahāra (sublation of transaction) and the jñānī’s absence of doershipVerse 23
विक्षेपो नास्ति यस्मान्मे न समाधिस्ततो मम । विक्षेपो वा समाधिर्वा मनसः स्याद्विकारिणः । नित्यानुभवरूपस्य को मेऽत्रानुभवः पृथक् ॥२३॥
क्योंकि मेरे लिए विक्षेप नहीं है, इसलिए मेरे लिए समाधि भी नहीं है। विक्षेप या समाधि तो विकारी मन के धर्म हैं। जो नित्य-अनुभवस्वरूप हूँ, मेरे लिए यहाँ कोई पृथक् ‘अनुभव’ क्या हो सकता है?
Sākṣin/Ātman as nitya-anubhava (ever-present consciousness) beyond mental statesVerse 24
कृतं कृत्यं प्रापणीयं प्राप्तमित्येव नित्यशः । व्यवहारो लौकिको वा शास्त्रीयो वान्यथापि वा । ममाकर्तुरलेपस्य यथारब्धं प्रवर्तताम् ॥२४-२५॥
‘जो करना था वह हो चुका; जो पाना था वह पा लिया’—ऐसा नित्य ही है। मेरे लिए, जो अकर्ता और अलिप्त हूँ, लौकिक, शास्त्रीय या अन्य कोई भी व्यवहार प्रारब्ध के अनुसार चलता रहे।
Akartṛtva (non-agency), alepatva (non-attachment), and prārabdha-driven continuation of conductVerse 25
कृतं कृत्यं प्रापणीयं प्राप्तमित्येव नित्यशः । व्यवहारो लौकिको वा शास्त्रीयो वान्यथापि वा । ममाकर्तुरलेपस्य यथारब्धं प्रवर्तताम् ॥२४-२५॥
‘जो करना था वह हो चुका; जो पाना था वह पा लिया’—ऐसा नित्य ही है। मेरे लिए, जो अकर्ता और अलिप्त हूँ, लौकिक, शास्त्रीय या अन्य कोई भी व्यवहार प्रारब्ध के अनुसार चलता रहे।
Jīvanmukti: fulfillment (pūrṇatā) with continued prārabdha-based appearance of actionVerse 26
अथवा कृतकृत्येऽपि लोकानुग्रहकाम्यया । शास्त्रीयेणैव मार्गेण वर्तेऽहं मम का क्षतिः ॥२६॥
अथवा, कृतकृत्य होकर भी लोक-कल्याण की कामना से मैं केवल शास्त्रीय मार्ग से ही चलता हूँ; मेरा क्या हानि है? ॥२६॥
Jīvanmukti; lokasaṅgraha (compassionate conformity) alongside akartṛtvaVerse 27
देवार्चनस्नानशौचभिक्षादौ वर्ततां वपुः । तारं जपतु वाक् तद्वत् पठत्वाम्नायमस्तकम् ॥२७॥
देव-पूजन, स्नान, शौच, भिक्षा आदि में शरीर लगा रहे। वाणी तारक-मन्त्र का जप करे; और वैसे ही वेदान्त-शिरोभाग (सार) का पाठ करे। ॥२७॥
Akartṛtva with functional embodiment; nāma-japa and śravaṇa as supports while abiding as sākṣinVerse 28
विष्णुं ध्यायतु धीः यद्वा ब्रह्मानन्दे विलीयताम् । साक्ष्यहं किंचिदप्यत्र न कुर्वे नापि कारये ॥२८॥
बुद्धि विष्णु का ध्यान करे, अथवा ब्रह्मानन्द में लीन हो जाए। मैं साक्षी हूँ; यहाँ मैं कुछ भी नहीं करता, न किसी से करवाता हूँ। ॥२८॥
Sākṣitva (witnesshood), akartṛtva (non-doership), Brahmānanda; saguna-to-nirguna assimilationVerse 29
कृतकृत्यतया तृप्तः प्राप्तप्राप्यतया पुनः । तृप्यन्नेवं स्वमनसा मन्यतेऽसौ निरन्तरम् ॥२९॥
करने योग्य को कर चुकने की अवस्था से तृप्त, और फिर पाने योग्य को पा लेने की अवस्था से भी तृप्त—ऐसे संतुष्ट होकर वह अपने मन से निरन्तर ऐसा ही मानता रहता है। ॥२९॥
Pūrṇatva (completeness), tṛpti (contentment) of the jñānī; mokṣa as ‘attained the attainable’Verse 30
धन्योऽहं धन्योऽहं नित्यं स्वात्मानमञ्जसा वेद्मि । धन्योऽहं धन्योऽहं ब्रह्मानन्दो विभाति मे स्पष्टम् ॥३०॥
धन्य हूँ मैं, धन्य हूँ मैं—मैं अपने आत्मस्वरूप को सदा प्रत्यक्ष जानता हूँ। धन्य हूँ मैं, धन्य हूँ मैं—ब्रह्मानन्द मेरे लिए स्पष्ट प्रकाशित होता है। ॥३०॥
Ātma-jñāna (direct Self-knowledge), Brahmānanda, aparokṣānubhūti (immediate realization)Verse 31
धन्योऽहं धन्योऽहं दुःखं सांसारिकं न वीक्षेऽद्य । धन्योऽहं धन्योऽहं स्वस्याज्ञानं पलायितं क्वापि ॥३१॥
धन्य हूँ मैं, धन्य हूँ मैं; आज मैं सांसारिक दुःख को नहीं देखता। धन्य हूँ मैं, धन्य हूँ मैं; मेरा अपना अज्ञान कहीं दूर पलायित हो गया है॥३१॥
Moksha (liberation) through destruction of avidyāVerse 32
धन्योऽहं धन्योऽहं कर्तव्यं मे न विद्यते किंचित् । धन्योऽहं धन्योऽहं प्राप्तव्यं सर्वमत्र सम्पन्नम् ॥३२॥
धन्य हूँ मैं, धन्य हूँ मैं; मेरे लिए कोई भी कर्तव्य शेष नहीं है। धन्य हूँ मैं, धन्य हूँ मैं; जो कुछ प्राप्त करने योग्य था, वह सब यहीं सिद्ध हो गया है॥३२॥
Kṛtakṛtyatā (having accomplished what is to be accomplished) / Pūrṇatva (wholeness)Verse 33
धन्योऽहं धन्योऽहं तृप्तेर्मे कोपमा भवेल्लोके । धन्योऽहं धन्योऽहं धन्यो धन्यः पुनः पुनर्धन्यः ॥३३॥
धन्य हूँ मैं, धन्य हूँ मैं; मेरी तृप्ति की तुलना संसार में किससे हो सकती है? धन्य हूँ मैं, धन्य हूँ मैं—धन्य, धन्य, बार-बार धन्य॥३३॥
Ānanda / Tṛpti (contentment born of Self-knowledge)Verse 34
अहो पुण्यमहो पुण्यं फलितं फलितं दृढम् । अस्य पुण्यस्य सम्पत्तेरहो वयमहो वयम् ॥३४॥
अहो पुण्य! अहो पुण्य! यह दृढ़तापूर्वक फलित हो गया, फलित हो गया। इस पुण्य-सम्पत्ति की प्राप्ति पर—अहो हम! अहो हम!॥३४॥
Puṇya as preparatory merit culminating in jñāna (sādhana-catuṣṭaya maturation)Verse 35
अहो ज्ञानमहो ज्ञानमहो सुखमहो सुखम् । अहो शास्त्रमहो शास्त्रमहो गुरुरहो गुरुः ॥३५॥
अहो ज्ञान! अहो ज्ञान! अहो सुख! अहो सुख! अहो शास्त्र! अहो शास्त्र! अहो गुरु! अहो गुरु!॥३५॥
Jñāna as the means (sādhana) and ānanda as the nature (svarūpa) of Ātman; Guru-Śāstra-upadeśaVerse 36
इति य इदमधीते सोऽपि कृतकृत्यो भवति। सुरापानात्पूतो भवति। स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति। ब्रह्महत्यात्पूतो भवति। कृत्याकृत्यात्पूतो भवति। एवं विदित्वा स्वेच्छाचारपरो भूयाद् ॐ सत्यमित्युपनिषत्॥३६॥
इस प्रकार जो इस उपदेश का अध्ययन करता है, वह कृतकृत्य हो जाता है। वह सुरापान के दोष से शुद्ध होता है; स्वर्ण-चोरी के पाप से शुद्ध होता है; ब्राह्मण-हत्या के पाप से शुद्ध होता है; कृत्या (अभिचार) तथा अकरणीय कर्मों से उत्पन्न पापों से भी शुद्ध होता है। ऐसा जानकर वह स्वेच्छाचार में तत्पर हो। ॐ—सत्य; यही उपनिषद् है॥३६॥
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