Adhyaya 44
PlanetsNakshatrasCosmography40 Shlokas

Adhyaya 44: Subahu’s Counsel to the King of Kashi and Alarka’s Renunciation through Yoga

अलर्कवैराग्य-योगोपदेश (Alarka-vairāgya-yogopadeśa)

Planetary System

इस अध्याय में सुभाहु काशी के राजा को राजधर्म, प्रजा-पालन, इन्द्रिय-निग्रह, दान और क्षमा का उपदेश देता है। उसके वचनों से अलर्क योग के द्वारा मन को वश में कर विषय-भोग से विरक्त होता है और वैराग्य पाकर राज्य का त्याग कर मोक्ष-पथ की ओर अग्रसर होता है।

Celestial Realms

ब्रह्म (Brahman) as the soteriological goal (not a locale but the chapter’s transcendental referent)निर्वाण (Nirvāṇa) as the final state attained

Key Content Points

Subāhu explains his intervention against Alarka as compassionate pedagogy: engineered defeat is meant to generate vairāgya and spiritual awakening.Ethical-psychological critique of gārhasthya-moha: attachment to kinship and bodily identity produces suffering and distorted vision.Concise ātma-vicāra instruction: abandon ‘mine/I’ notions, analyze inner and outer experience, and understand the unmanifest/manifest to avoid ‘non-self as self’ delusion.Narrative resolution: Alarka installs his eldest son, renounces all ties, practices yoga, attains siddhi and final nirvāṇa.Frame-voice transition: birds articulate the exemplary value of yoga over ritual acts, reinforcing renunciation and liberation as the chapter’s telos.

Focus Keywords

Markandeya Purana Adhyaya 44Alarka renunciationSubahu counsel to Kashirajavairagya in Markandeya Puranaatma vichara unmanifest manifestyoga siddhi nirvanaPuranic ethics of kingshipdetachment from household life

Shlokas in Adhyaya 44

Verse 1

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे अरिष्टकथनं नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः । चतुःचत्वारिंशोऽध्यायः । सुबाहुरुवाच— यदर्थं नृपशार्दूल ! त्वामहं शरणं गतः । तन्मया सकलं प्राप्तं यास्यामि त्वं सुखी भव ॥

श्रीमार्कण्डेय पुराण में ‘अरिष्ट-वृत्तान्त’ नामक तैंतालीसवाँ अध्याय इस प्रकार समाप्त हुआ। अब चवालीसवाँ अध्याय आरम्भ होता है। सुभाहु ने कहा—हे राजसिंह! जिस प्रयोजन से मैं आपकी शरण में आया था, वह समस्त उद्देश्य मुझे प्राप्त हो गया। अब मैं जाता हूँ; आप सुखी रहें।

Verse 2

काखिराज उवाच— किं निमित्तं भवान् प्राप्तो निष्पन्नोऽर्थश्च कस्तव । सुबाहो ! तन्ममाचक्ष्व परं कौतूहलं हि मे ॥

काशिराज ने कहा—तुम किस कारण से आए हो, और तुम्हारा कौन-सा प्रयोजन सिद्ध हुआ है? हे सुभाहु, वह मुझे बताओ; क्योंकि मुझे बड़ा कौतूहल है।

Verse 3

समाक्रान्तमलर्केण पितृपैतामहं महत् । राज्यं देहीति निर्जित्य त्वयाहमभिचोदितः ॥

मेरे पिता और पितामहों का महान पैतृक राज्य अलर्क ने छीन लिया था। जब आपने उसे जीत लिया, तब आपने ही मुझसे कहा—‘राज्य उसे दे दो।’

Verse 4

ततो मया समाक्रम्य राज्यमस्यानुजस्य ते । एतत्ते बलमानितं तद्भुङ्क्ष्वस्वकुलोचितम् ॥

तब मैंने आपके इस छोटे भाई का राज्य छीन लिया। यह सेना और बल मैं आपके पास ले आया हूँ; अपने कुल के अनुरूप, जैसा उचित हो, इसका उपभोग कीजिए।

Verse 5

सुबाहुरुवाच काशिराज ! निबोध त्वं यदर्थमयमुद्यमः । कृतो मया भवान्श्चैव कारितोऽत्यन्तमुद्यमम् ॥

सुबाहु ने कहा— हे काशी-राज! समझो कि मैंने यह प्रयत्न किस उद्देश्य से आरम्भ किया है, और क्यों मैंने तुम्हें भी परम परिश्रम में प्रवृत्त किया है।

Verse 6

भ्राता ममायं ग्राम्येषु सक्तो भोगेषु तत्त्ववित् । विमूढौ बोधवन्तौ च भ्रातरावग्रजौ मम ॥

यह मेरा भाई सत्य का ज्ञाता होकर भी ग्राम्य/सांसारिक भोगों में आसक्त है। मेरे दो बड़े भाई मोहग्रस्त हैं, फिर भी बुद्धिसम्पन्न हैं।

Verse 7

तयोर्मम च यन्मात्रा बाल्ये स्तन्यं यथा मुखे । तथावबोधो विन्यस्तः कर्णयोरवनिपते ॥

जैसे बाल्यकाल में हमारी माता ने हमारे मुख में दूध रखा, वैसे ही, हे भूमिपति, उसने हमारे कानों में बुद्धि भी रख दी।

Verse 8

तयोर्मम च विज्ञेयाः पदार्था ये मता नृभिः । प्राकाश्यं मनसो नीतास्ते मात्रा नास्य पार्थिव ॥

मनुष्य जिन-जिन ज्ञेय पदार्थों/अर्थों को जानने योग्य मानते हैं, वे सब, हे राजन्, हमारी माता ने हमारे मन में प्रकाशित कर दिए।

Verse 9

यथैकमर्थे यातानामेकस्मिन्नवसीदति । दुःखं भवति साधूनां ततास्माकं महीपते ॥

जैसे एक ही उद्देश्य के लिए निकले हुए सज्जनों में, जब कोई एक डगमगाता है, तो वह सबके लिए शोक का कारण होता है—वैसे ही, हे राजन्, हमारे लिए भी है।

Verse 10

गार्हस्थ्यमोहमापन्ने सीदत्यस्मिन्नरेश्वर । सम्बन्धिन्यस्य देहस्य बिभ्रति भ्रातृकल्पनाम् ॥

हे नराधिप! यह गृहस्थ-जीवन के मोह में पड़कर, इस देह और उसके संबंधों के विषय में ‘भाईचारा’ और रिश्तेदारी की कल्पना करता हुआ डूब जाता है।

Verse 11

ततो मया विनिश्चित्य दुःखाद्वैराग्यभावना । भविष्यतीत्यस्य भवानित्युद्योगाय संश्रितः ॥

इसलिए यह निश्चय करके कि उसके दुःख से वैराग्य की साधना उत्पन्न होगी, इस कार्य के लिए मैंने आपको (सहायक रूप में) शरण लिया।

Verse 12

तदस्य दुःखाद्वैराग्यं सम्बोधादवनिपते । समुद्भूतं कृतं कार्यं भद्रं तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ॥

हे राजन्! इस प्रकार दुःख और प्रबोधन से उसमें वैराग्य उत्पन्न हो गया है। कार्य सिद्ध हुआ। आपका कल्याण हो; मैं प्रस्थान करता हूँ।

Verse 13

उष्ट्वा मदालसागर्भे पीत्वा सत्सास्तथा स्तनम् । नान्यनारीसुतैर्यातं वर्त्म यात्विति पार्थिव ॥

हे राजन्! मदालसा के गर्भ से जन्म लेकर, उसका स्तन्य (और सत्पुरुषों का उपदेश) पीकर—तुम उस पथ पर चलो जो अन्य स्त्रियों के पुत्रों द्वारा नहीं चला गया।

Verse 14

विचार्य तन्मया सर्वं युष्मत्संश्रयपूर्वकम् । कृतं तच्चापि निष्पन्नं प्रयास्ये सिद्धये पुनः ॥

यह सब विचारकर, पहले आपका आश्रय लेकर मैंने जो किया, वह सिद्ध हो गया। अब मैं पुनः सिद्धि-प्राप्ति के लिए प्रयत्न करूँगा।

Verse 15

उपेक्ष्यते सीदमाणः स्वजनो बान्धवः सुहृत् । यैर्नरेन्द्र ! न तान् मन्ये सेन्द्रिया विकला हि ते ॥

हे राजन्, जो अपने स्वजनों—बंधु-बांधवों और मित्रों—को दुःख में डूबते देखकर भी उपेक्षित करते हैं, मैं उन्हें वास्तव में मनुष्य नहीं मानता; क्योंकि उनके इन्द्रिय और धर्म-विवेक विकृत हो जाते हैं।

Verse 16

सुहृदि स्वजने बन्धौ समर्थे योऽवसीदति । धर्मार्थकाममोक्षेभ्यो वाच्या स्ते तत्र न त्वसौ ॥

जो समर्थ मित्र, अपने स्वजन या किसी बंधु के प्रति कर्तव्य में चूकता है, वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का उपदेश पाने के भी योग्य नहीं; ऐसा उपदेश केवल पात्र को ही कहना चाहिए, उसे नहीं।

Verse 17

एतत् त्वत्सङ्गमाद् भू प ! मया कार्यं महत् कृतम् । स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि ज्ञानभाग्भव सत्तम ॥

हे राजन्, आपके संग से मैंने एक महान प्रयोजन सिद्ध कर लिया। आपका कल्याण हो; अब मैं प्रस्थान करता हूँ। हे नरश्रेष्ठ, आप सत्य-ज्ञान के सहभागी बनें।

Verse 18

काशिराज उवाच उपकारस्त्वया साधोः अलर्कस्य कृतो महान् । ममोपकाराय कथं न करोṣi स्वमानसम् ॥

काशी-राजा बोला: आपने साधु-स्वभाव वाले अलर्क को बड़ा उपकार किया। फिर मेरे उपकार के लिए आप उसी प्रकार अपना मन क्यों नहीं लगाते?

Verse 19

फलदायी सतां सद्भिः सङ्गमो नाफलो यतः । तस्मात् तवत्संश्रयाद् युक्ता मया प्राप्ता समुन्नतिः ॥

सज्जनों का संग फलदायी होता है; वह कभी निष्फल नहीं होता। इसलिए आपके यहाँ सम्यक् शरण लेकर मैंने उन्नति प्राप्त की है।

Verse 20

सुबाहुरुवाच धर्मार्थकाममोक्षाख्यं पुरुषार्थचतुष्टयम् । तत्र धर्मार्थकामास्ते सकला हीयतेऽपरः ॥

सुबाहु ने कहा—मनुष्य के चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष कहलाते हैं। इनमें जब धर्म, अर्थ और काम क्षीण हो जाएँ, तब शेष मोक्ष ही साध्य रहता है।

Verse 21

तत्ते संक्षेपतो वक्ष्ये तदिहैकमनाः शृणु । श्रुत्वा च सम्यगालोच्य यतेथाः श्रेयसे नृप ॥

यह मैं तुम्हें संक्षेप में बताता हूँ; एकाग्रचित्त होकर सुनो। सुनकर और सम्यक् मनन करके, हे राजन्, अपने परम कल्याण के लिए प्रयत्न करो।

Verse 22

ममेति प्रत्ययो भू प ! न कार्योऽहमिति त्वया । सम्यगालोच्य धर्मो हि धर्माभावे निराश्रयः ॥

हे राजन्, तुम्हें ‘मेरा’ की भावना नहीं पालनी चाहिए, न ही ‘मैं’ का अहंकार। सम्यक् विचार करो—धर्म के अभाव में धर्म भी आधारहीन हो जाता है।

Verse 23

कस्याहमिति संज्ञेयमित्यालोच्य त्वयात्मना । बाह्यान्तर्गतं आलॊच्य आलॊच्यापररात्रिषु ॥

अपने भीतर विचार करो—‘यह “मैं” किसका बोध है?’ बाह्य और आन्तरिक का परीक्षण करके, रात-रात भर बार-बार मनन करो।

Verse 24

अव्यक्तादिविशेषान्तम् अविकारम् अचेतनम् । व्यक्ताव्यक्तं त्वया ज्ञेयं ज्ञाता कश्चाहमित्युत ॥

अव्यक्त से लेकर व्यक्त विशेषों तक जो अविकारि और जड़ है—उस व्यक्त-अव्यक्त को तुम समझो; तब ‘मैं’ नामक ज्ञाता वास्तव में कौन है, यह जानोगे।

Verse 25

एतस्मिन्नेव विज्ञानॆ विज्ञान्तमखिलं त्वया । अनात्मन्यात्मविज्ञानमखे खमिति मूढता ॥

इसी ज्ञान से तुम्हारे द्वारा सब कुछ जान लिया गया है, हे नृप। पर जो अनात्मा है उसमें आत्म-ज्ञान खोजना—जैसे शून्य में आकाश ढूँढ़ना—निश्चय ही केवल मोह है।

Verse 26

सोऽहं सर्वगतो भूप ! लोकसंव्यवहारतः । मयेदमुच्यते सर्वं त्वया पृष्टो व्रजाम्यहम् ॥

‘मैं वही हूँ’—सर्वव्यापी, हे राजन्—यह मैंने लोक-व्यवहार में कहा है। तुमने प्रश्न किया, अब मैं प्रस्थान करता हूँ।

Verse 27

एवमुक्त्वा ययौ धीमान् ! सुबाहुः काशिभूमिपम् । काशिराजोऽपि संपूज्य सोऽलर्कं स्वपुरं ययौ ॥

ऐसा कहकर बुद्धिमान सुभाहु काशी के राजा से विदा हो गया। और काशी के राजा ने विधिवत् उसका सम्मान करके, वह अलर्क भी अपने नगर को चला गया।

Verse 28

अलर्कोऽपि सुतं ज्येष्ठमभिषिच्य नराधिपम् । वनं जगाम सन्त्यक्तसर्वसङ्गः स्वसिद्धये ॥

अलर्क ने भी अपने ज्येष्ठ पुत्र का राज्याभिषेक करके, सब आसक्तियाँ त्यागकर, अपनी साधना-सिद्धि के लिए वन को प्रस्थान किया।

Verse 29

ततः कालेन महता निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः । प्राप्य योगर्धिमतुलां परं निर्वाणमाप्तवान् ॥

फिर बहुत समय के बाद, द्वन्द्वों से परे और निरासक्त, अनुपम योग-सिद्धि प्राप्त करके, उसने परम निर्वाण को प्राप्त किया।

Verse 30

पश्यन् जगदिदं सर्वं सदेवासुरमानुषम् । पाशैर्गुणमयैर्बद्धं बध्यमानञ्च नित्यशः ॥

उसने देव, असुर और मनुष्यों से युक्त इस समस्त जगत् को गुणों की रज्जुओं के पाशों से बँधा हुआ, और निरन्तर बार-बार बँधता हुआ देखा।

Verse 31

पुत्रादिभ्रातृपुत्रादि-स्वपारक्यादिभावितैः । आकृष्यमाणं करणैर्दुःखार्तं भिन्नदर्शनम् ॥

उसने जगत् को इन्द्रियों द्वारा घसीटा जाता हुआ, ‘पुत्र’, ‘भतीजा’, ‘अपना’ और ‘पराया’ आदि धारणाओं से संस्कारित, शोक से पीड़ित और खण्डित दृष्टि वाला देखा।

Verse 32

अज्ञानपङ्कगर्भस्थमनुद्धारं महामतिः । आत्मानञ्च समुत्तीर्णं गाथामेतामगायत ॥

महात्मा ने प्राणियों को अज्ञानरूपी कीचड़-योनि में डूबे हुए और उद्धार न पाए हुए देखा; और स्वयं को पार उतरा जानकर, उसने यह गाथा गाई।

Verse 33

अहो कष्टं यदस्माभैः पूर्वं राज्यमनुष्ठितम् । इति पश्चान्मया ज्ञातं योगान्नास्ति परं सुखम् ॥

‘हाय, कितना दुःखद है कि मैंने पहले राजधर्म किया!’—ऐसा कहकर मैंने बाद में जाना कि योग से बढ़कर कोई सुख नहीं।

Verse 34

जड उवाच तातैनं त्वं समातिष्ठ मुक्तये योगमुत्तमम् । प्राप्स्यसे येन तद् ब्रह्म यत्र गत्वा न शोचसि ॥

जड़ ने कहा—प्रिय, मोक्ष के लिए इस परम योग का आचरण करो। इसके द्वारा तुम उस ब्रह्म को प्राप्त करोगे, जिसे पाकर शोक नहीं रहता।

Verse 35

ततोऽहमपि यास्यामि किं यज्ञैः किं जपेन मे । कृतकृत्यस्य करणं ब्रह्मभावाय कल्पते ॥

अतः मैं भी संन्यास-मार्ग पर प्रस्थान करूँगा। यज्ञों से क्या प्रयोजन, जप से क्या प्रयोजन? जिसने कर्तव्य कर लिया है, उसके लिए आगे का ‘कर्म’ केवल ब्रह्म-स्वभाव में प्रतिष्ठा के लिए ही होता है।

Verse 36

त्वत्तोऽनुज्ञामवाप्याहं निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः । प्रयतिष्ये तथा मुक्तौ यथा यास्यामि निर्वृतिम् ॥

आपकी अनुमति पाकर मैं—द्वन्द्वों से परे और निरासक्त—मोक्ष के लिए ऐसा प्रयत्न करूँगा कि परम शान्ति, निर्वाण-सदृश निस्तब्धता, प्राप्त हो।

Verse 37

पक्षिण ऊचुः एवमुक्त्वा स पितरं प्राप्यानुज्ञां ततश्च सः । ब्रह्मन् ! जगाम मेधावी परित्यक्तपरिग्रहः ॥

पक्षियों ने कहा—हे ब्राह्मण! ऐसा कहकर और पिता की अनुमति पाकर वह बुद्धिमान पुरुष, सम्पत्ति का त्याग करके, प्रस्थान कर गया।

Verse 38

सोऽपि तस्य पिता तद्वत् क्रमेण सुमहामतिः । वानप्रस्थं समास्थाय चतुर्थाश्रममभ्यगात् ॥

उसका पिता भी उसी प्रकार क्रम से—महाबुद्धिमान होकर—वानप्रस्थ आश्रम में प्रविष्ट हुआ, और फिर चौथे आश्रम, अर्थात् संन्यास, को प्राप्त हुआ।

Verse 39

तत्रात्मजं समासाद्य हित्वा बन्धं गुणादिकम् । प्राप सिद्धिं परां प्राज्ञस्तत्कालोपात्तसंमतिः ॥

वहाँ पुत्र से मिलकर और गुणों आदि से आरम्भ होने वाले बन्धन को त्यागकर, वह बुद्धिमान पुरुष—समय पर दृढ़ निश्चय उत्पन्न होने से—परम सिद्धि को प्राप्त हुआ।

Verse 40

एतत्ते कथितं ब्रह्मन् ! यत्पृष्टा भवता वयम् । सुविस्तरं यथावच्च किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥

हे ब्राह्मण, जो कुछ तुमने पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें पूर्णतः और यथावत् ठीक-ठीक कह दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो?

Frequently Asked Questions

The chapter centers on how suffering arises from misidentification with body, kinship, and possessive notions (‘I’/‘mine’), and it proposes ātma-vicāra (self-inquiry) and vairāgya as the corrective path culminating in yoga-based liberation.

This Adhyaya is not structured as a Manvantara chronicle; it functions within the Alarka exemplum, emphasizing ethical kingship, engineered disillusionment, renunciation, and yogic soteriology rather than Manu-lineages or cosmic time cycles.

Adhyaya 44 lies outside the Devi Mahatmyam section (traditionally Adhyayas 81–93). Its contribution is instead a liberation-oriented teaching: the superiority of yoga and self-knowledge over ritual action, illustrated through Alarka’s abdication and nirvāṇa.