
शान्ति पर्व (अध्याय 38): युधिष्ठिरस्य राजधर्म-जिज्ञासा तथा भीष्मोपसर्पण-प्रस्तावना | Shanti Parva Chapter 38: Yudhishthira’s Inquiry into Rajadharma and the Prelude to Approaching Bhishma
Upa-parva: Rājadharmānuśāsana (राजधर्मानुशासन) — Introductory Movement toward Bhīṣma’s Instruction
Chapter 38 opens with Yudhiṣṭhira’s formal request for detailed instruction on rājadharma, the complete duty-structure associated with the four social orders (cāturvarṇya), crisis-governance (āpatsu nīti), and expiatory reasoning that troubles his conscience. He explicitly names the friction between dharma-practice and the necessities of rule as a persistent cognitive burden. Vaiśaṃpāyana reports Vyāsa’s response: the sage identifies Bhīṣma as the decisive authority capable of resolving Yudhiṣṭhira’s doubts, praising Bhīṣma’s learning from divine and human teachers and his mastery of subtle dharma and statecraft. The chapter then transitions to Yudhiṣṭhira’s reluctance and guilt, followed by encouragement from Kṛṣṇa and others who emphasize the expectations of Brahmins, surviving rulers, and the assembled populace. The narrative concludes with Yudhiṣṭhira’s composure returning and a ceremonially described movement into the capital, including offerings, a public procession with companions, and civic decoration—marking the epic’s shift from war’s aftermath to the institutional rebuilding of kingship through instruction.
Chapter Arc: युधिष्ठिर का नगर-प्रवेश—सजा हुआ राजमार्ग, चौराहों की शोभा और जनसमुदाय का उमड़ता सागर, मानो चन्द्रोदय पर महासागर का ज्वार। → नगरवासी, जनपदवासी और ‘प्रकृतिवर्ग’ (मंत्री, सेनापति आदि) मधुर वचनों से राजा का स्वागत करते हैं; तपोनियम-सम्पन्न ब्राह्मण आशीर्वाद देने को घेर लेते हैं—पर इसी पवित्र घड़ी में एक असंगत स्वर भीतर से विष घोलने आता है। → चार्वाक ब्राह्मण-वेष में सभा/समूह के बीच खड़ा होकर युधिष्ठिर को ‘ज्ञातिघाती’ कहकर धिक्कारता है और ब्राह्मणों पर आरोप मढ़ता है; तब वेदवेत्ता, तपसा-निर्मल ब्राह्मण ‘ज्ञानचक्षु’ से उसकी असलियत पहचान लेते हैं और शाप/तेज से उसका विनाश होता है। → चार्वाक का वध होते ही अपवाद का बादल छँटता है; ब्राह्मण सम्मानित होकर विदा होते हैं और युधिष्ठिर अपने सुहृदों सहित हर्ष/आश्वस्ति पाते हैं—राज्य में पुनः मर्यादा और विश्वास की स्थापना होती है। → युद्धोत्तर शासन में ‘राजधर्म’ का वास्तविक भार अब आरम्भ होता है—युधिष्ठिर के भीतर शोक और धर्मचिन्ता का समाधान आगे के उपदेशों में खोजा जाएगा।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वनें युधिष्ठिरका नगरप्रवेशविषयक सैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ३७ ॥ ऑपन-- मा बछ। अप ऋाल जा अष्टात्रिशो5 ध्याय: नगर-प्रवेशके समय पुरवासियों तथा ब्राह्मणोंद्वारा राजा युधिष्ठिरका सत्कार और उनपर आक्षेप करनेवाले चार्वाकका ब्राह्माणोंद्वारा वध वैशम्पायन उवाच प्रवेशने तु पार्थानां जनानां पुरवासिनाम् । दिदृक्षूणां सहस्रनाणि समाजग्मु: सहस्रश:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कुन्ती-पुत्रोंके हस्तिनापुरमें प्रवेश करते समय उन्हें देखनेके लिये दस लाख नगरनिवासी सड़कोंपर एकत्र हो गये
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पाण्डवों के नगर-प्रवेश के समय उन्हें देखने की उत्कंठा से नगरवासी हजारों-हजारों की संख्या में एकत्र हो गए।
Verse 2
स राजमार्ग: शुशुभे समलंकृतचत्वर: । यथा चन्द्रोदये राजन् वर्धमानो महोदधि:,राजन! जैसे चन्द्रोदय होनेपर महासागर उमड़ने लगता है, उसी प्रकार जिसके चौराहे खूब सजाये गये थे, वह राजमार्ग मनुष्योंकी उमड़ती हुई भीड़से बड़ी शोभा पा रहा था
वह राजमार्ग, जिसके चौराहे भली-भाँति अलंकृत थे, अत्यन्त शोभायमान हो उठा। राजन्! जैसे चन्द्रमा के उदय होते ही महासागर उमड़ने लगता है, वैसे ही मनुष्यों की उमड़ती भीड़ से उस मार्ग की शोभा बढ़ गई।
Verse 3
गृहाणि राजमार्गेषु रत्नवन्ति महान्ति च । प्राकम्पन्तेव भारेण स्त्रीणां पूर्णानि भारत,भरतनन्दन! सड़कोंके आस-पास जो रत्नविभूषित विशाल भवन थे, वे स्त्रियोंसे भरे होने के कारण उनके भारी भारसे काँपते हुए-से जान पड़ते थे
भरतनन्दन! राजमार्गों के किनारे रत्नों से विभूषित विशाल भवन थे। वे स्त्रियों से भर जाने के कारण उनके भार से मानो काँपते हुए प्रतीत होते थे।
Verse 4
ता: शनैरिव सव्रीडं प्रशशंसुर्युधिष्ठिरम् । भीमसेनार्जुनौ चैव माद्रीपुत्रो च पाण्डवौ,वे नारियाँ लजाती हुई-सी धीरे-धीरे युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा पाए्डुपुत्र माद्रीकुमार नकुल सहदेवकी प्रशंसा करने लगीं
वे नारियाँ मानो लज्जा से झुकती हुई धीरे-धीरे युधिष्ठिर की, तथा भीमसेन और अर्जुन की, और माद्री के पुत्र पाण्डवों की भी प्रशंसा करने लगीं।
Verse 5
धन्या त्वमसि पाज्चालि या त्वं पुरुषसत्तमान् | उपतिष्ठसि कल्याणि महर्षीनिव गौतमी
हे पाञ्चाली! तुम धन्य हो, कल्याणी! क्योंकि तुम पुरुषोत्तमों की वैसे ही श्रद्धापूर्वक सेवा-उपासना करती हो, जैसे गौतमी ने महर्षियों की की थी।
Verse 6
इति कृष्णां महाराज प्रशशंसुस्तदा स्त्रिय:,महाराज! इस प्रकार उस समय सारी स्त्रियाँ ट्रपदकुमारी कृष्णाकी प्रशंसा करती थीं। भारत! एक दूसरीके प्रति कहे जानेवाले उनके प्रशंसा-वचनों और प्रीतिजनित शब्दोंसे उस समय सारा नगर व्याप्त हो रहा था
महाराज! उस समय स्त्रियाँ इस प्रकार कृष्णा (द्रौपदी) की प्रशंसा कर रही थीं। हे भारत! एक-दूसरे से कहे गए उनके प्रशंसा-वचनों और स्नेहपूर्ण शब्दों से उस समय सारा नगर व्याप्त हो गया था।
Verse 7
प्रशंसावचनैस्तासां मिथ:शब्दैश्व॒ भारत । प्रीतिजैश्न तदा शब्दै: पुरमासीत् समाकुलम्,महाराज! इस प्रकार उस समय सारी स्त्रियाँ ट्रपदकुमारी कृष्णाकी प्रशंसा करती थीं। भारत! एक दूसरीके प्रति कहे जानेवाले उनके प्रशंसा-वचनों और प्रीतिजनित शब्दोंसे उस समय सारा नगर व्याप्त हो रहा था
वैशम्पायन बोले—भारत! उस समय स्त्रियाँ परस्पर प्रेम से उत्पन्न प्रशंसा-वचन कहती हुईं, और उन्हीं मधुर शब्दों से सारा नगर हर्ष-कोलाहल से भर उठा; मानो उनके आनंदित स्वरों से पूरी पुरी व्याप्त हो गई।
Verse 8
तमतीत्य यथायुक्तं राजमार्ग युधिष्ठिर: । अलंकृतं शोभमानमुपायाद् राजवेश्म ह,राजन! उस सजे सजाये शोभासम्पन्न राजमार्गको यथोचित रूपसे लाँधकर राजा युधिष्ठिर राजभवनके समीप जा पहुँचे
वैशम्पायन बोले—राजा युधिष्ठिर यथोचित मर्यादा के साथ राजमार्ग को पार करके, सजे-धजे और शोभायमान राजभवन के निकट जा पहुँचे।
Verse 9
ततः प्रकृतय: सर्वा: पौरा जानपदास्तदा । ऊचु: कर्णसुखा वाच: समुपेत्य ततस्ततः,तदनन्तर मन्त्री-सेनापति आदि प्रकृतिवर्गके सभी लोग, नगरवासी और जनपदनिवासी मनुष्य इधर-उधरसे आकर कानोंको सुख देनेवाली बातें कहने लगे--
वैशम्पायन बोले—तदनन्तर मंत्री, सेनापति आदि प्रकृतिवर्ग के सब लोग, नगरवासी तथा जनपदवासी इधर-उधर से आकर, कानों को सुख देने वाली बातें कहने लगे।
Verse 10
दिष्ट्या जयसि राजेन्द्र शत्रून् शत्रुनिष्दन | दिष्ट्या राज्यं पुनः प्राप्त धर्मेण च बलेन च,'शत्रुओंका संहार करनेवाले राजेन्द्र! बड़े सौभाग्यकी बात है कि आप विजयी हो रहे हैं, आपने धर्मके प्रभाव तथा बलसे अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लिया--यह बड़े हर्षका विषय है
‘शत्रुनिषूदन राजेन्द्र! सौभाग्य है कि आप विजयी हुए। धर्म के प्रभाव और अपने पराक्रम से आपने अपना राज्य फिर से प्राप्त कर लिया—यह अत्यन्त हर्ष का विषय है।’
Verse 11
भव नस्त्वं महाराज राजेह शरदां शतम् | प्रजा: पालय धर्मेण यथेन्द्रस्त्रेदिवं तथा,“महाराज! आप सैकड़ों वर्षोतक हमारे राजा बने रहें। जैसे इन्द्र स्वर्गलोकका पालन करते हैं, उसी प्रकार आप भी धर्मपूर्वक अपनी प्रजाकी रक्षा करें'
‘महाराज, राजेन्द्र! आप सौ शरद् तक हमारे राजा बने रहें। जैसे इन्द्र त्रिदिव की रक्षा करते हैं, वैसे ही आप भी धर्मपूर्वक प्रजाओं का पालन करें।’
Verse 12
एवं राजकुलद्वारि मड़लैरभिपूजित: । आशीरव॑दान् द्विजैरुक्तान् प्रतिगृह्दा समन््ततः
इस प्रकार राजकुल के द्वार पर जनसमूहों द्वारा विधिपूर्वक सम्मानित होकर, राजा ने चारों ओर से द्विज ब्राह्मणों के कहे हुए आशीर्वाद ग्रहण किए।
Verse 13
प्रविश्य भवनं राजा देवराजगृहोपमम् । श्रद्धाविजयसंयुक्त रथात् पश्चादवातरत्
वैशम्पायन बोले—देवराज के गृह के समान उस राजभवन में प्रवेश करके, श्रद्धा और विजय-भाव से युक्त राजा ने तत्पश्चात् रथ से अवतरण किया।
Verse 14
इस प्रकार राजकुलके द्वारपर माड्लिक द्रव्योंद्वारा पूजित हो ब्राह्मणोंके दिये हुए आशीर्वाद सब ओरसे ग्रहण करके राजा युधिष्छिर देवराज इन्द्रके महलके समान राजभवनमें प्रविष्ट हुए, जो श्रद्धा और विजयसे सम्पन्न था। वहाँ पहुँचकर वे रथसे नीचे उतरे ।। प्रविश्याभ्यन्तरं श्रीमान् दैवतान्यभिगम्य च । पूजयामास रत्नैश्व गन्धमाल्यैश्न सर्वश:,राजमहलके भीतर प्रवेश करके श्रीमान् नरेशने कुलदेवताओंका दर्शन किया और रत्न, चन्दन तथा माला आदिसे सर्वथा उनकी पूजा की
वैशम्पायन बोले—राजमहल के भीतर प्रवेश करके श्रीमान् नरेश ने कुलदेवताओं के समीप जाकर, रत्नों, सुगन्धित द्रव्यों (चन्दन आदि) और मालाओं से सर्वथा उनकी पूजा की।
Verse 15
निश्चक्राम ततः श्रीमान् पुनरेव महायशा: । ददर्श ब्राह्मणांश्वैव सो5भिरूपानवस्थितान्,इसके बाद महायशस्वी श्रीमान् राजा युधिष्ठिर महलसे बाहर निकले। वहाँ उन्हें बहुत- से ब्राह्मण खड़े दिखायी दिये, जो हाथमें मड्लद्रव्य लिये खड़े थे
तत्पश्चात् महायशस्वी श्रीमान् राजा पुनः बाहर निकले और वहाँ उन्होंने सुन्दर तथा प्रतिष्ठित ब्राह्मणों को खड़े देखा।
Verse 16
स संवृतस्तदा विप्रैराशीर्वादविवक्षुभि: । शुशुभे विमलश्नन्द्रस्तारागणवृतो यथा,जैसे तारोंसे घिरे हुए निर्मल चन्द्रमाकी शोभा होती है, उसी प्रकार आशीर्वाद देनेकी इच्छावाले ब्राह्मणोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरकी उस समय बड़ी शोभा हो रही थी
तब आशीर्वाद देने की इच्छा रखने वाले ब्राह्मणों से घिरे हुए वे वैसे ही शोभित हो रहे थे, जैसे तारागणों से घिरा निर्मल चन्द्रमा।
Verse 17
तांस्तु वै पूजयामास कौन्तेयो विधिवद् द्विजान् | धौम्यं गुरु पुरस्कृत्य ज्येष्ठं पितरमेव च,कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने गुरु धौम्य तथा ताऊ धृतराष्ट्रको आगे करके उन सभी ब्राह्मणोंका विधिपूर्वक पूजन किया
तब कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने विधि-पूर्वक उन समस्त द्विज ब्राह्मणों का पूजन किया। उन्होंने गुरु धौम्य को अग्रस्थान दिया और ज्येष्ठ पितृतुल्य पूज्य को भी विशेष मान देकर सबका यथोचित सत्कार किया।
Verse 18
सुमनोमोदके रल्नैर्हिरण्येन च भूरिणा । गोभिव्ंस्त्रिश्ष राजेन्द्र विविधैशज्ष किमिच्छकै:,राजेन्द्र! इन्होंने फूल, मिठाई, रत्न, बहुत-से सुवर्ण, गौओं, वस्त्रों तथा उनकी इच्छा पूछ-पूछ कर मँगाये हुए नाना प्रकारके मनोवाञ्छित पदार्थोद्वारा उन सबका यथोचित सत्कार किया
राजेन्द्र! उन्होंने पुष्प, मिष्ठान्न, रत्न, बहुत-सा सुवर्ण, गौएँ, वस्त्र तथा इच्छा पूछ-पूछकर मँगाए गए नाना प्रकार के मनोवाञ्छित पदार्थों से उन सबका यथोचित सत्कार किया।
Verse 19
ततः पुण्याहघोषो<भूद् दिवं स्तब्ध्वेव भारत । सुहृदां प्रीतिजनन: पुण्य: श्रुतिसुखावह:,भारत! इसके बाद पुण्याहवाचनका गम्भीर घोष होने लगा, जो आकाशको स्तब्ध-सा किये देता था। वह पवित्र शब्द कानोंको सुख देनेवाला तथा सुहृदोंको प्रसन्नता प्रदान करनेवाला था
भारत! इसके बाद पुण्याहवाचन का गम्भीर घोष होने लगा, जो मानो आकाश को स्तब्ध-सा कर देता था। वह पवित्र शब्द कानों को सुख देने वाला और सुहृदों को प्रसन्नता प्रदान करने वाला था।
Verse 20
हंसवद् विदुषां राजन् द्विजानां तत्र भारती । शुश्रुवे वेदविदुषां पुष्कलार्थपदाक्षरा,राजन्! उस समय वेदवेत्ता दिद्वान् ब्राह्मणोंने हंसके समान हर्ष-गद्गद स्वरसे जो प्रचुर अर्थ, पद एवं अक्षरोंसे युक्त वाणी कही थी, वह वहाँ सबको स्पष्ट सुनायी दे रही थी
राजन्! उस समय वेदवेत्ता विद्वान् ब्राह्मणों ने हंस के समान हर्ष-गद्गद स्वर से जो प्रचुर अर्थ, पद और अक्षरों से युक्त वाणी कही, वह वहाँ सबको स्पष्ट सुनाई दे रही थी।
Verse 21
ततो दुन्दुभिनिर्घोष: शंखानां च मनोरम: । जयं प्रवदतां तत्र स्वनः प्रादुरभून्नप,नरेश्वर! तदनन्तर दुन्दुभियों और शंखोंकी मनोरम ध्वनि होने लगी, जय-जयकार करनेवालोंका गम्भीर घोष वहाँ प्रकट होने लगा
नरेश्वर! तदनन्तर दुन्दुभियों और शंखों की मनोरम ध्वनि होने लगी। वहाँ जय-जयकार करने वालों का गम्भीर घोष प्रकट हो उठा।
Verse 22
निःशब्दे च स्थिते तत्र ततो विप्रजने पुन: । राजानं ब्राह्मणच्छय््या चार्वाको राक्षसो<ब्रवीत्,जब सब ब्राह्मण चुपचाप खड़े हो गये, तब ब्राह्मणका वेष बनाकर आया हुआ चार्वाक नामक राक्षस राजा युधिष्ठिरसे कुछ कहनेको उद्यत हुआ
जब वहाँ सब ओर निस्तब्धता छा गई और ब्राह्मण-समुदाय फिर चुपचाप खड़ा हो गया, तब ब्राह्मण का वेष धारण किए हुए चार्वाक नामक राक्षस राजा युधिष्ठिर से बोलने को उद्यत हुआ।
Verse 23
तत्र दुर्योधनसखा भिक्षुरूपेण संवृत:ः । साक्ष: शिखी त्रिदण्डी च धृष्टो विगतसाध्वस:,वह दुर्योधनका मित्र था। उसने संन्यासी ब्राह्मणके वेषमें अपने असली रूपको छिपा रखा था। उसके हाथमें अक्षमाला थी और मस्तकपर शिखा। उसने त्रिदण्ड धारण कर रखा था। वह बड़ा ढीठ और निर्भय था
वह दुर्योधन का मित्र था। भिक्षु के रूप में छिपकर उसने अपना असली स्वरूप ढाँप रखा था। उसके हाथ में अक्षमाला थी, सिर पर शिखा थी, और वह त्रिदण्ड धारण किए हुए था; वह बड़ा ढीठ और निर्भय था।
Verse 24
वृतः सर्वैस्तथा विप्रैराशीर्वादविवक्षुभि: । पर:सहसे राजेन्द्र तपोनियमसंवृतै:,राजेन्द्र! तपस्या और नियममें लगे रहनेवाले और आशीर्वाद देनेके इच्छुक उन समस्त ब्राह्मणोंसे, जिनकी संख्या हजारसे भी अधिक थी, घिरा हुआ वह दुष्ट राक्षस महात्मा पाण्डवोंका विनाश चाहता था। उसने उन सब ब्राह्मणोंसे अनुमति लिये बिना ही राजा युधिष्ठिरसे कहा
राजेन्द्र! तपस्या और नियम से संयमित, आशीर्वाद देने को इच्छुक, हजार से भी अधिक ब्राह्मणों से घिरा हुआ वह दुष्ट राक्षस महात्मा पाण्डवों के विनाश का अभिलाषी था; और उन ब्राह्मणों की अनुमति लिए बिना ही उसने राजा युधिष्ठिर से कहा।
Verse 25
स दुष्ट: पापमाशंसु: पाण्डवानां महात्मनाम् | अनामन्त्र्यैव तान् विप्रांस्तमुवाच महीपतिम्,राजेन्द्र! तपस्या और नियममें लगे रहनेवाले और आशीर्वाद देनेके इच्छुक उन समस्त ब्राह्मणोंसे, जिनकी संख्या हजारसे भी अधिक थी, घिरा हुआ वह दुष्ट राक्षस महात्मा पाण्डवोंका विनाश चाहता था। उसने उन सब ब्राह्मणोंसे अनुमति लिये बिना ही राजा युधिष्ठिरसे कहा
राजेन्द्र! वह दुष्ट पाप की अभिलाषा रखने वाला, महात्मा पाण्डवों के पतन का इच्छुक था। हजार से भी अधिक तपोनियम-परायण, आशीर्वाद देने को तत्पर ब्राह्मणों से घिरा हुआ होकर भी, उन विप्रों को बिना आमंत्रित किए ही उसने राजा युधिष्ठिर से कहा।
Verse 26
चारवक उवाच इमे प्राहुर्द्धिजा: सर्वे समारोप्य वचो मयि । धिग् भवन्तं कुनृपतिं ज्ञातिघातिनमस्तु वै,चार्वाक बोला--राजन्! ये सब ब्राह्मण मुझपर अपनी बात कहनेका भार रखकर मेरेद्वारा ही तुमसे कह रहे हैं--“कुन्तीनन्दन! तुम अपने भाई-बन्धुओंका वध करनेवाले एक दुष्ट राजा हो। तुम्हें धिक्कार है! ऐसे पुरुषके जीवनसे क्या लाभ? इस प्रकार यह बन्धु- बान्धवोंका विनाश करके गुरुजनोंकी हत्या करवाकर तो तुम्हारा मर जाना ही अच्छा है, जीवित रहना नहीं”
चार्वाक बोला—“राजन्! ये सब द्विज मुझ पर वचन का भार रखकर तुम्हें यही कहते हैं—‘धिक्कार है तुम्हें, हे नीच राजा! तुम अपने ही ज्ञाति-बंधुओं के घातक हो।’”
Verse 27
कि तेन स्याद्धि कौन्तेय कृत्वेमं ज्ञातिसंक्षयम् । घातयित्वा गुरूंश्वैव मृतं श्रेयो न जीवितम्,चार्वाक बोला--राजन्! ये सब ब्राह्मण मुझपर अपनी बात कहनेका भार रखकर मेरेद्वारा ही तुमसे कह रहे हैं--“कुन्तीनन्दन! तुम अपने भाई-बन्धुओंका वध करनेवाले एक दुष्ट राजा हो। तुम्हें धिक्कार है! ऐसे पुरुषके जीवनसे क्या लाभ? इस प्रकार यह बन्धु- बान्धवोंका विनाश करके गुरुजनोंकी हत्या करवाकर तो तुम्हारा मर जाना ही अच्छा है, जीवित रहना नहीं”
चार्वाक बोला—“कुन्तीनन्दन! इस सबका क्या फल? अपने ही कुटुम्ब का संहार कराकर और गुरुजनों तक का वध करवा कर तुम्हारे लिए जीवित रहने से तो मर जाना ही श्रेयस्कर है।”
Verse 28
इति ते वै द्विजा: श्रुत्वा तस्य दुष्टस्य रक्षस: । विव्यथुश्रुक्रुशुश्वेव तस्य वाक्यप्रधर्षिता:,वे ब्राह्मण उस दुष्ट राक्षणषकी यह बात सुनकर उसके वचनोंसे तिरस्कृत हो व्यथित हो उठे और मन-ही-मन उसके कथनकी निन्दा करने लगे
उस दुष्ट राक्षस की यह बात सुनकर वे ब्राह्मण उसके वचनों से आहत और तिरस्कृत होकर व्यथित हो उठे; वे चीत्कार कर उठे और मन-ही-मन उसके कथन की निन्दा करने लगे।
Verse 29
ततस्ते ब्राह्मणा: सर्वे स च राजा युधिष्ठिर: । व्रीडिता: परमोद्विग्नास्तृष्णीमासन् विशाम्पते,प्रजानाथ! इसके बाद वे सभी ब्राह्मण तथा राजा युधिष्ठिर अत्यन्त उद्विग्न और लज्जित हो गये। प्रतिवादके रूपमें उनके मुँहसे एक शब्द भी नहीं निकला। वे सभी कुछ देरतक चुप रहे
तदनन्तर वे सब ब्राह्मण और राजा युधिष्ठिर अत्यन्त लज्जित तथा व्याकुल हो गए; हे प्रजानाथ! प्रतिवाद में उनके मुख से एक शब्द भी न निकला और वे कुछ समय तक मौन रहे।
Verse 30
युधिछिर उवाच प्रसीदन्तु भवन्तो मे प्रणतस्याभियाचत: । प्रत्यासन्नव्यसनिनं न मां धिक्कर्तुमर्हथ,तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने कहा--ब्राह्मणो! मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करके विनीतभावसे यह प्रार्थना करता हूँ कि आपलोग मुझपर प्रसन्न हों। इस समय मुझपर सब ओरसे बड़ी भारी विपत्ति आ गयी है; अत: आपलोग मुझे थिक्कार न दें
युधिष्ठिर बोले—“हे पूज्य ब्राह्मणो! मैं प्रणाम कर विनयपूर्वक प्रार्थना करता हूँ—आप मुझ पर प्रसन्न हों। इस समय विपत्ति मेरे निकट आ खड़ी हुई है; अतः आप मुझे धिक्कारने योग्य न समझें।”
Verse 31
वैशम्पायन उवाच ततो राजन ब्राह्मणास्ते सर्व एव विशाम्पते । ऊचुर्नैतद् वचो<स्माकं श्रीरस्तु तव पार्थिव,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! प्रजानाथ! उनकी यह बात सुनकर सब ब्राह्मण बोल उठे--“महाराज! यह हमारी बात नहीं कह रहा है। हम तो यह आशीर्वाद देते हैं कि “आपकी राजलक्ष्मी सदा बनी रहे”
वैशम्पायन बोले—“तब, हे राजन्, हे प्रजानाथ! वे सब ब्राह्मण एक साथ बोले—‘महाराज! यह कथन हमारा नहीं है। हे पृथ्वीपति, हम तो आपको यह आशीर्वाद देते हैं कि आपकी राजलक्ष्मी सदा स्थिर रहे।’”
Verse 32
जज्ञुश्वैव महात्मानस्ततस्तं ज्ञानचक्षुषा । ब्राह्मणा वेदविद्वांसस्तपोभिविमलीकृता:,उन वेदवेत्ता ब्राह्मणोंका अन्त:ःकरण तपस्यासे निर्मल हो गया था। उन महात्माओंने ज्ञानदृष्टिसे उस राक्षसको पहचान लिया
तब वेदवेत्ता और तपस्या से शुद्ध हुए उन महात्मा ब्राह्मणों ने ज्ञान-दृष्टि से उसे पहचान लिया। तप से निर्मल हुए उनके अंतःकरण ने सामने खड़े उस प्राणी का वास्तविक स्वरूप स्पष्ट कर दिया।
Verse 33
ब्राह्मणा ऊचु एष दुर्योधनसखा चार्वाको नाम राक्षस: | परिव्राजकरूपेण हित॑ तस्य चिकीर्षति,ब्राह्मण बोले--धर्मात्मन्! यह दुर्योधनका मित्र चार्वाक नामक राक्षस है, जो संन्यासीके रूपमें यहाँ आकर उसका हित करना चाहता है। हमलोग आपसे कुछ नहीं कहते हैं। आपका इस तरहका भय दूर हो जाना चाहिये। हम आशीर्वाद देते हैं कि 'भाइयोंसहित आपको कल्याणकी प्राप्ति हो”
ब्राह्मण बोले—धर्मात्मन्! यह दुर्योधन का मित्र चार्वाक नामक राक्षस है। यह परिव्राजक (संन्यासी) का रूप धारण करके यहाँ आया है और दुर्योधन का हित साधना चाहता है। इसलिए हम आपसे कुछ भी विरोध में नहीं कहते; आपका भय दूर हो। हम आशीर्वाद देते हैं कि आप भाइयों सहित कल्याण को प्राप्त हों।
Verse 34
वयं ब्रूमो न धर्मात्मन् व्येतु ते भयमीदृशम् । उपतिष्ठतु कल्याणं भवन्तं भ्रातृभि: सह,ब्राह्मण बोले--धर्मात्मन्! यह दुर्योधनका मित्र चार्वाक नामक राक्षस है, जो संन्यासीके रूपमें यहाँ आकर उसका हित करना चाहता है। हमलोग आपसे कुछ नहीं कहते हैं। आपका इस तरहका भय दूर हो जाना चाहिये। हम आशीर्वाद देते हैं कि 'भाइयोंसहित आपको कल्याणकी प्राप्ति हो”
हम कहते हैं, धर्मात्मन्—आपका ऐसा भय दूर हो जाए। भाइयों सहित आपके पास कल्याण उपस्थित हो।
Verse 35
वैशम्पायन उवाच ततस्ते ब्राह्मणा: सर्वे हुंकारै: क्रोधमूर्च्छिता: । निर्भ्त्सयन्त: शुचयो निजघ्नु: पापराक्षसम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर क्रोधसे आतुर हुए उन सभी शुद्धात्मा ब्राह्मणोंने उस पापात्मा राक्षसको बहुत फटकारा और अपने हुड्कारोंसे उसे नष्ट कर दिया
वैशम्पायन बोले—तब वे सब ब्राह्मण क्रोध से उन्मत्त होकर हुंकार करने लगे। शुद्धाचारी होते हुए भी उन्होंने कठोर धिक्कारों से उस पापी राक्षस का संहार कर दिया।
Verse 36
स पपात विनिर्दग्धस्तेजसा ब्रह्म॒वादिनाम् महेन्द्राशनिनिर्दग्ध: पादपो5ड्कुरवानिव,ब्रह्मवादी महात्माओंके तेजसे दग्ध होकर वह राक्षस गिर पड़ा, मानो इन्द्रके वज्ञसे जलकर कोई अंकुरयुक्त वृक्ष धराशायी हो गया हो
ब्रह्मवादी महात्माओं के तेज से दग्ध होकर वह राक्षस गिर पड़ा—मानो महेन्द्र के वज्र से जलकर अंकुरों से युक्त कोई वृक्ष धराशायी हो गया हो।
Verse 37
पूजिताश्च ययुर्विप्रा राजानमभिनन्द्य तम् । राजा च हर्षमापेदे पाण्डव: ससुहृज्जन:,तत्पश्चात् राजाद्वारा पूजित हुए वे ब्राह्मण उनका अभिनन्दन करके चले गये और पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर अपने सुहृदोंसहित बड़े हर्षको प्राप्त हुए
पूजित होकर वे विप्रगण राजा का अभिनन्दन करके चले गए। तब पाण्डव राजा युधिष्ठिर अपने सुहृदों और मित्रों सहित महान् हर्ष को प्राप्त हुए।
Verse 38
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि चार्वाकवधेडष्टात्रिंशो 5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्या भारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधमानुशासनपर्वमें चार्वाकका वधविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्व में चार्वाक-वधविषयक अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 56
तव कर्माण्यमोघानि व्रतचर्या च भाविनि । वे बोलीं--“कल्याणि! पाञज्चालराजकुमारी! तुम धन्य हो, जो इन पाँच महान् पुरुषोंकी सेवामें उसी प्रकार उपस्थित रहती हो, जैसे गौतमवंशमें उत्पन्न हुई जटिला अनेक महर्षियोंकी सेवा करती हैं। भाविनि! तुम्हारे सभी पुण्यकर्म अमोघ हैं और समस्त व्रतचर्या सफल है'
वे बोलीं—“भाविनि! तुम्हारे कर्म अमोघ हैं; और तुम्हारी व्रतचर्या भी निश्चय ही सफल होगी।”
Yudhiṣṭhira’s dilemma is the apparent incompatibility between ethical self-cultivation (dharma-caryā) and the coercive, consequence-laden obligations of kingship, intensified by guilt over large-scale harm and the need for legitimate rule.
The chapter establishes an epistemic discipline: when dharma appears conflicted, one should seek instruction from a recognized authority (here, Bhīṣma) and approach governance as a contextual science balancing ideals, emergency ethics, and social obligations.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-commentary is structural—this chapter functions as a narrative hinge that legitimizes Bhīṣma’s forthcoming teachings as the authoritative resolution-path for Yudhiṣṭhira’s doubts.