Adhyaya 305
Shanti ParvaAdhyaya 30543 Verses

Adhyaya 305

Utkramaṇa-sthāna and Ariṣṭa-lakṣaṇa: Yājñavalkya’s Instruction on Departure Pathways and Mortality Signs

Upa-parva: Mokṣa-dharma Anuśāsana (Liberation-Doctrine Instruction)

Yājñavalkya instructs the listener (addressed as a king) on (1) utkramaṇa-sthānas—mapped ‘exit points’ of the departing life-force through bodily loci—and the corresponding cosmic destinations articulated in deva-terms: feet toward a Vaiṣṇava station; shanks toward the Vasus; knees toward the Sādhyas; anus toward a Maitra station; hips toward Earth; thighs toward Prajāpati; flanks toward the Maruts; nostrils toward the Moon; arms toward Indra; chest toward Rudra; neck toward an unsurpassed ‘Nara’ state; mouth toward the Viśvedevas; ears toward the directions; nose toward the carrier of fragrance; eyes toward the Sun; brows toward the Aśvins; forehead toward the Pitṛs; and the crown of the head toward Brahmā (the primordial). (2) ariṣṭa—foretold indicators of death within specified horizons (a year, six months, seven nights, six nights, or immediate), including altered perception of celestial markers (e.g., Arundhatī, Dhruva), seeing oneself in another’s eyes, changes in radiance or cognition, social-religious disregard, abnormal odors, bodily droop, loss of warmth or consciousness, and unusual emissions or smoke-like phenomena. The chapter concludes with prescriptive counsel: upon knowing such signs, one should yoke oneself to the paramātman day and night; through disciplined retention (dhāraṇā), sāṃkhya-informed understanding, and yoga, one ‘overcomes’ death in the sense of attaining the imperishable, unborn, stable state described as difficult for the untrained.

Chapter Arc: करालजनक (राजा जनक) एक सूक्ष्म शंका उठाते हैं—यदि जगत में स्त्री-पुरुष का संयोग ही देह-रूप की उत्पत्ति का कारण है, तो फिर ‘क्षर-अक्षर’ और ‘प्रकृति-पुरुष’ का भेद वास्तव में कैसे समझा जाए? → जनक पारस्परिक-सम्बन्ध (अन्योन्य-गुण-आश्रय) का तर्क रखते हैं—स्त्री बिना पुरुष गर्भ नहीं धारण कर सकती और पुरुष बिना स्त्री रूप नहीं रच सकता; तब कारण-कार्य की यह जटिलता आत्मा/पुरुष की स्वतंत्रता और मोक्ष की संभावना पर प्रश्नचिह्न लगाती है। → वसिष्ठ वेद-शास्त्र-सम्मत दृष्टि से निर्णायक भेद स्पष्ट करते हैं—प्रकृति के गुण-समूह और ‘पंचविंशति’ तत्त्वों की गणना (सांख्य-योग) के पार जो ‘बुद्धि से परे’ है, वही परम (अक्षर) है; अनेकत्व-परिवर्तनशीलता ‘क्षर’ है, और एकत्व-अविकार ‘अक्षर’। → वसिष्ठ जनक के तर्क को स्वीकारते हुए उसे सीमित करते हैं—देह-उत्पत्ति में प्रकृति का पारस्परिक संयोग चलता है, पर साक्षी-पुरुष/अक्षर उस परिवर्तन-धारा से अछूता है; इस प्रकार क्षर-अक्षर का निदर्शन देकर मोक्ष-मार्ग की बौद्धिक गाँठ खोलते हैं। → जनक आगे ‘पुरुष के मोक्ष का प्रत्यक्ष’ कराने वाले दृष्टान्त/अनुभव-मार्ग की याचना करते हैं—अब संवाद अगले चरण में साक्षात्कार के उपायों की ओर मुड़ने को तत्पर है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन-आ करा (_ अ-्---क्ााज पञज्चाधिकत्रिशततमोब< ध्याय: क्षर-अक्षर एवं प्रकृति-पुरुषके विषयमें राजा जनककी शंका और उसका वसिष्ठजीद्धारा उत्तर जनक उवाच अक्षरक्षरयोरेष द्वयो: सम्बन्ध इष्यते । स्त्रीपुंसोर्वापि भगवन्‌ सम्बन्धस्तद्वदुच्यते,राजा जनकने कहा--भगवन्‌! क्षर और अक्षर (प्रकृति और पुरुष) दोनोंका यह सम्बन्ध वैसा ही माना जाता है, जैसा कि नारी और पुरुषका दाम्पत्य-सम्बन्ध बताया जाता है

जनक बोले—भगवन्! क्षर और अक्षर—इन दोनों (प्रकृति और पुरुष) का जो सम्बन्ध माना जाता है, क्या वह स्त्री और पुरुष के दाम्पत्य-सम्बन्ध के समान समझा जाए?

Verse 2

ऋते तु पुरुष नेह स्त्री गर्भ धारयत्युत । ऋते स्त्रियं न पुरुषो रूप॑ निर्वर्त येत्‌ तथा,इस जगतमें न तो पुरुषके बिना स्त्री गर्भ धारण कर सकती है और न स्त्रीके बिना कोई पुरुष ही किसी शरीरको उत्पन्न कर सकता है

जनक बोले—इस जगत में पुरुष के बिना स्त्री गर्भ धारण नहीं कर सकती और स्त्री के बिना पुरुष भी किसी देह-रूप को प्रकट नहीं कर सकता। अतः देहधारी जीवन परस्पर-आश्रय से ही उत्पन्न होता है, अकेले किसी एक के बल से नहीं।

Verse 3

अन्योन्यस्याभिसम्बन्धादन्योन्यगुणसंश्रयात्‌ । रूप॑ निर्वर्तयत्येतदेवं सर्वासु योनिषु,दोनों पारस्परिक सम्बन्धसे एक दूसरेके गुणोंका आश्रय लेकर ही किसी शरीरका निर्माण होता है। प्रायः सभी योनियोंमें ऐसी ही स्थिति है

जनक बोले—परस्पर सम्बन्ध से, और एक-दूसरे के गुणों का आश्रय लेकर, देह-रूप की उत्पत्ति होती है। इसी प्रकार प्रायः समस्त योनियों में देहधारण परस्पर-निर्भर कारणों से होता है, किसी एक अकेले स्रोत से नहीं।

Verse 4

रत्यर्थमभिसम्बन्धादन्योन्यगुणसंश्रयात्‌ । ऋतोौ निर्वर्त्यते रूपं तद्‌ वक्ष्यामि निदर्शनम्‌,जब स्त्री ऋतुमती होती है, उस समय रतिके लिये पुरुषके साथ उसका सम्बन्ध होनेसे दोनोंके गुणोंका मिश्रण होनेपर शरीरकी उत्पत्ति होती है। शरीरमें पुरुष अर्थात्‌ पिताके जो गुण हैं तथा माताके जो गुण हैं, उन्हें मैं दृष्टान्तके तौरपर बता रहा हूँ। हड्डी, स्नायु और मज्जा--इन्‍्हें मैं पितासे प्राप्त हुए गुण समझता हूँ तथा त्वचा, मांस और रक्त-ये मातासे पैदा हुए गुण हैं, ऐसा मैंने सुना है। द्विजश्रेष्ठ। यही बात वेद और शास्त्रमें भी पढ़ी जाती है

जनक बोले—रति के हेतु से स्त्री-पुरुष का संयोग होने पर, और दोनों के गुणों के परस्पर आश्रय व मिश्रण से, स्त्री के ऋतुकाल में देह-रूप की उत्पत्ति होती है। इसका मैं एक दृष्टान्त देकर बताऊँगा—जैसा वेद और शास्त्रों में कहा गया है, देह में पिता और माता के गुण किस प्रकार प्रकट माने जाते हैं।

Verse 5

ये गुणा: पुरुषस्येह ये च मातृगुणास्तथा । अस्थि स्नायुश्न मज्जा च जानीम: पितृतो गुणा:,जब स्त्री ऋतुमती होती है, उस समय रतिके लिये पुरुषके साथ उसका सम्बन्ध होनेसे दोनोंके गुणोंका मिश्रण होनेपर शरीरकी उत्पत्ति होती है। शरीरमें पुरुष अर्थात्‌ पिताके जो गुण हैं तथा माताके जो गुण हैं, उन्हें मैं दृष्टान्तके तौरपर बता रहा हूँ। हड्डी, स्नायु और मज्जा--इन्‍्हें मैं पितासे प्राप्त हुए गुण समझता हूँ तथा त्वचा, मांस और रक्त-ये मातासे पैदा हुए गुण हैं, ऐसा मैंने सुना है। द्विजश्रेष्ठ। यही बात वेद और शास्त्रमें भी पढ़ी जाती है

जनक बोले—यहाँ जो गुण पिता के हैं और जो गुण माता के हैं—अस्थि, स्नायु और मज्जा—इनको हम पिता से प्राप्त गुण समझते हैं।

Verse 6

त्वड्मांसं शोणितं चेति मातृजान्यपि शुश्रुम । एवमेतद्‌ द्विजश्रेष्ठ वेदे शास्त्रे च पठ्यते,जब स्त्री ऋतुमती होती है, उस समय रतिके लिये पुरुषके साथ उसका सम्बन्ध होनेसे दोनोंके गुणोंका मिश्रण होनेपर शरीरकी उत्पत्ति होती है। शरीरमें पुरुष अर्थात्‌ पिताके जो गुण हैं तथा माताके जो गुण हैं, उन्हें मैं दृष्टान्तके तौरपर बता रहा हूँ। हड्डी, स्नायु और मज्जा--इन्‍्हें मैं पितासे प्राप्त हुए गुण समझता हूँ तथा त्वचा, मांस और रक्त-ये मातासे पैदा हुए गुण हैं, ऐसा मैंने सुना है। द्विजश्रेष्ठ। यही बात वेद और शास्त्रमें भी पढ़ी जाती है

जनक बोले—त्वचा, मांस और रक्त—ये भी मैंने सुना है कि माता से उत्पन्न होते हैं। हे द्विजश्रेष्ठ, यही सिद्धान्त वेद और शास्त्रों में भी पढ़ा जाता है।

Verse 7

प्रमाणं यत्‌ स्ववेदोक्तं शास्त्रोक्ते यच्च पठ्यते । वेदशास्त्रद्धयं चैव प्रमाणं तत्‌ सनातनम्‌,वेदोंमें जो प्रमाण बताया गया है तथा शास्त्रमें कहे हुए जिस प्रमाणको पढ़ा और सुना जाता है, वह सब ठीक है; क्योंकि वेद और शास्त्र दोनों ही सनातन प्रमाण हैं

जनक बोले—अपने वेद में जो प्रमाण कहा गया है, और शास्त्रों में जो उपदेशित होकर अध्ययन तथा श्रवण से जाना जाता है—वह सब प्रमाण है; क्योंकि वेद और शास्त्र—ये दोनों ही मिलकर सनातन प्रमाण हैं।

Verse 8

अन्योन्यगुणसंरोधादन्योन्यगुणसंश्रयात्‌ । एवमेवाभिसम्बद्धौ नित्यं प्रकृतिपूरुषी

जनक बोले—एक-दूसरे के गुणों को रोकने-नियंत्रित करने से और एक-दूसरे के गुणों पर आश्रित होने से—प्रकृति और पुरुष इस प्रकार सदा परस्पर संबद्ध रहते हैं।

Verse 9

अथवानन्तरकृतं किंचिदेव निदर्शनम्‌

अथवा, जो बात अभी-अभी घटित हुई है, उसी से एक छोटा-सा दृष्टान्त दे दूँ।

Verse 10

मोक्षकामा वयं चापि काड्क्षामो यदनामयम्‌ । अदेहमजर नित्यमतीन्द्रियमनी श्वरम्‌,मैं भी मोक्षकी अभिलाषा रखता हूँ और उस परम पदको पाना चाहता हूँ, जो निर्विकार, निराकार, अजर, अमर, नित्य और इन्द्रियातीत है तथा जिसे प्राप्त हुए पुरुषका कोई शासक नहीं रहता

जनक बोले—मैं भी मोक्ष का अभिलाषी हूँ और उस निरामय पद की कामना करता हूँ—जो देह-रहित, अजर, नित्य, इन्द्रियों से परे है; और जिसे प्राप्त कर मनुष्य किसी बाह्य स्वामी के अधीन नहीं रहता।

Verse 11

वसिष्ठ उवाच यदेतदुक्तं भवता वेदशास्त्रनिदर्शनम्‌ एवमेतद्‌ यथा चैततन्निगृह्लाति तथा भवान्‌,वसिष्ठजीने कहा--राजन्‌! तुमने वेद और शास्त्रोंके दृष्टान्त देकर यह जो कुछ कहा है, वह ठीक है। तुम जैसा समझते हो, वैसी ही बात है

वसिष्ठ बोले—राजन्! वेद और शास्त्रों के दृष्टान्त देकर आपने जो कहा है, वह ठीक है। जैसा आप समझते हैं, बात वैसी ही है; और जैसे यह सिद्धान्त मन को संयमित करता है, वैसे ही आप भी उसे संयमित करते हैं।

Verse 12

धार्यते हि त्वया ग्रन्थ उभयोर्वेदशास्त्रयो: । नच ग्रन्थस्य तत्त्वज्ञो यथातत्त्व॑ नरेश्वर,नरेश्वर! इसमें संदेह नहीं कि वेद-शास्त्रोंमें जो कुछ लिखा है, वह सब तुम्हें याद है; परंतु ग्रन्थके यथार्थ तत्त्वका तुम्हें ठीक-ठीक ज्ञान नहीं है

वसिष्ठ बोले—नरेश्वर! वेद और शास्त्र—दोनों के ग्रन्थ तुम्हें कण्ठस्थ हैं; परन्तु ग्रन्थ के यथार्थ तत्त्व को तुम जैसा है वैसा नहीं जानते।

Verse 13

यो हि वेदे च शास्त्रे च ग्रन्थधारणतत्पर: । नच ग्रन्थार्थतत्त्वज्ञस्तस्य तद्धारणं वृथा,जो वेद और शास्त्रके ग्रन्थोंको तो याद रखनेमें तत्पर है, किंतु उनके यथार्थ तत्त्वको नहीं समझता, उसका वह याद रखना व्यर्थ है

वसिष्ठ बोले—जो वेद और शास्त्र के ग्रन्थों को कण्ठस्थ रखने में तत्पर है, पर उनके अर्थ-तत्त्व को नहीं जानता, उसका वह स्मरण व्यर्थ है।

Verse 14

भारं स वहते तस्य ग्रन्थस्यार्थ न वेत्ति यः । यस्तु ग्रन्थार्थतत्त्वज्ञो नास्य ग्रन्थागमो वृथा,जो ग्रन्थके अर्थको नहीं समझता, वह केवल रटकर मानो उन ग्रन्थोंका बोझ ढोता है; परंतु जो ग्रन्थके अर्थका तत्त्व समझता है, उसके लिये उस ग्रन्थका अध्ययन व्यर्थ नहीं है

जो ग्रन्थ के अर्थ को नहीं जानता, वह मानो केवल उस ग्रन्थ का बोझ ढोता है; पर जो ग्रन्थार्थ-तत्त्व को जानता है, उसके लिए उस ग्रन्थ का अध्ययन व्यर्थ नहीं होता।

Verse 15

ग्रन्थस्यार्थस्य पृष्ट: संस्तादृशो वक्तुमर्हति । यथा तत्त्वाभिगमनादर्थ तस्य स विन्दति

वसिष्ठ बोले—जब ग्रन्थ के अर्थ के विषय में प्रश्न किया जाए, तब योग्य आचार्य को श्रोता के अनुरूप वैसा ही कहना चाहिए; क्योंकि तत्त्व तक पहुँचाने से ही वह पुरुष ग्रन्थ का अभिप्रेत अर्थ वास्तव में प्राप्त करता है।

Verse 16

ऐसा पुरुष पूछनेपर तत्वज्ञानपूर्वक ग्रन्थके अर्थकों जैसा समझता है, वैसा दूसरोंको भी बता सकता है ।। न य: संसत्सु कथयेद्‌ ग्रन्थार्थ स्थूलबुद्धिमान्‌ । स कथं मन्दविज्ञानो ग्रन्थं वक्ष्यति निर्णयात्‌,जो स्थूल एवं मन्दबुद्धिसे युक्त होनेके कारण विद्वानोंकी सभामें शास्त्रग्रन्थका अर्थ नहीं बता सकता, वह निर्णयपूर्वक उस ग्रन्थका तात्पर्य कैसे कह सकता है?

जो स्थूल बुद्धि वाला पुरुष विद्वानों की सभाओं में शास्त्र-ग्रन्थ का अर्थ नहीं कह सकता, वह मन्द ज्ञान वाला निर्णयपूर्वक उस ग्रन्थ का तात्पर्य कैसे बताएगा? तत्त्वज्ञान से अर्थ को जैसा समझता है, वैसा ही पूछने पर दूसरों को बताने में समर्थ वही होता है।

Verse 17

निर्णयं चापि छिद्रात्मा न तं॑ वक्ष्यति तत्त्वतः । सोपहासात्मतामेति यस्माच्चैवात्मवानपि,जिसका चित्त शास्त्रज्ञानसे शून्य है, वह ग्रन्थके तात्पर्यका ठीक-ठीक निर्णय कर ही नहीं सकता। यदि वह कुछ कहता है तो मनस्वी होनेपर भी लोगोंके उपहासका पात्र बनता है

जिसकी समझ में दोष है, वह ग्रन्थ के तात्पर्य का यथार्थ निर्णय नहीं कर सकता। शास्त्र-ज्ञान के आधार के बिना बोलने पर, मनस्वी और आत्मसंयमी होने पर भी, वह उपहास का पात्र बन जाता है—क्योंकि उसकी वाणी तत्त्व से च्युत हो जाती है।

Verse 18

तस्मात्‌ त्वं शूणु राजेन्द्र यथैतदनुदृश्यते । याथातथ्येन सांख्येषु योगेषु च महात्मसु,इसलिये राजेन्द्र! सांख्य और योगके ज्ञाता महात्मा पुरुषोंके मतमें मोक्षका जैसा स्वरूप देखा जाता है, उसे मैं तुम्हें यथार्थरूपसे बताता हूँ, सुनो

इसलिए, राजेन्द्र! सुनो। सांख्य और योग के ज्ञाता महात्मा पुरुषों के उपदेश में मोक्ष का जैसा स्वरूप यथार्थतः देखा और प्रत्यक्ष किया जाता है, उसे मैं तुम्हें सत्य रूप से बताता हूँ।

Verse 19

यदेव योगा: पश्यन्ति सांख्यैस्तदनुगम्यते । एकं सांख्यं च योगं च य: पश्यति स बुद्धिमान्‌,योगी जिस तत्त्वका साक्षात्कार करते हैं; सांख्यवेत्ता विद्वान्‌ भी उसीका ज्ञान प्राप्त करते हैं। जो सांख्य और योगको फलकी दृष्टिसे एक समझता है, वही बुद्धिमान्‌ है

योगी जिस परम तत्त्व का साक्षात्कार करते हैं, सांख्यवेत्ता भी विवेक द्वारा उसी तक पहुँचते हैं। जो फल की दृष्टि से सांख्य और योग को एक ही मानता है—विधि भिन्न, लक्ष्य एक—वही बुद्धिमान् है।

Verse 20

त्वड्मांसं रुधिरं मेद: पित्तं मज्जा च स्नायु च । अथ चैन्द्रियकं तात तद्‌ भवानिदमाह माम्‌,तात! तुम मुझसे कह चुके हो कि शरीरमें जो त्वचा, मांस, रुधिर, मेदा, पित्त, मज्जा, सस्‍्नायु और इन्द्रियसमुदाय हैं (वे सब माता-पिताके सम्बन्धसे प्रकट हुए हैं)

तात! त्वचा, मांस, रुधिर, मेदा, पित्त, मज्जा, स्नायु—और इन्द्रियसमुदाय—इन सबका उल्लेख तुम पहले ही मुझसे कर चुके हो।

Verse 21

द्रव्याद्‌ द्रव्यस्य निर्वृत्तिरिन्द्रियादिन्द्रियं तथा । देहाद्‌ देहमवाप्रोति बीजाद बीज॑ तथैव च,जैसे बीजसे बीजकी उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार द्रव्यसे द्रव्य, इन्द्रियसे इन्द्रिय तथा देहसे देहकी प्राप्ति होती है

द्रव्य से द्रव्य की उत्पत्ति होती है, इन्द्रिय से इन्द्रिय भी। देह से देह की प्राप्ति होती है, और बीज से बीज—उसी प्रकार।

Verse 22

निरिन्द्रियस्याबीजस्य निर्द्रव्यस्याप्पयदेहिन: । कथं गुणा भविष्यन्ति निर्गुणत्वान्महात्मन:,परंतु परमात्मा तो इन्द्रिय, बीज, द्रव्य और देहसे रहित तथा निर्गुण है; अतः उसमें गुण कैसे हो सकते हैं

वसिष्ठ बोले— जो परमात्मा इन्द्रियों से रहित, कारण-बीज से रहित, द्रव्य से रहित और देह से भी रहित है, वह महात्मा स्वभावतः निर्गुण है; फिर उसमें गुण कैसे हो सकते हैं?

Verse 23

गुणा गुणेषु जायन्ते तत्रैव निविशन्ति च । एवं गुणा: प्रकृतितो जायन्ते निविशन्ति च,जैसे आकाश आदि गुण सत्त्व आदि गुणोंसे उत्पन्न होते और उन्हींमें लीन हो जाते हैं; उसी प्रकार सत्त्व, रज, तम-ये तीनों गुण भी प्रकृतिसे उत्पन्न होते और उसीमें लीन होते हैं

वसिष्ठ बोले— गुण, गुणों से ही उत्पन्न होते हैं और उन्हीं में लीन हो जाते हैं। इसी प्रकार सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं और अंत में प्रकृति में ही समा जाते हैं।

Verse 24

त्वड्मांसं रुधिर मेद: पित्तं मज्जास्थि स्नायु च । अष्टौ तान्यथ शुक्रेण जानीहि प्राकृतानि वै,राजन! तुम यह जान लो कि त्वचा, मांस, रुधिर, मेदा, पित्त, मज्जा, अस्थि और स्‍्नायु-ये आठों वस्तुएँ वीर्यसे उत्पन्न हुई हैं; इसलिये प्राकृत ही हैं

वसिष्ठ बोले— हे राजन्, त्वचा, मांस, रुधिर, मेदा, पित्त, मज्जा, अस्थि और स्नायु—ये आठों शुक्र से उत्पन्न हैं; इसलिए इन्हें प्राकृत (भौतिक) ही जानो।

Verse 25

पुमांश्चैवापुमांश्चैव त्रैलिड्रयं प्राकृतं स्‍्मृतम्‌ । न वापुमान्‌ पुमांश्चैव स लिज्लीत्यभिधीयते,पुरुष और प्रकृति--ये दो तत्त्व हैं। इनके स्वरूपको व्यक्त करनेवाले जो तीन प्रकारके सात््विक, राजस और तामस चिह्न हैं, वे सब प्राकृत माने गये हैं; परंतु जो लिंगी अर्थात्‌ इन सबका आधार आत्मा है, वह न पुरुष कहा जा सकता है और न प्रकृति ही। वह इन दोनोंसे विलक्षण है

वसिष्ठ बोले— ‘पुमान्’ और ‘अपुमान्’ तथा लिंग-चिह्नों की त्रिविधता—ये सब प्राकृत माने गए हैं। पर जो इन चिह्नों का धारक और आधार आत्मा है, वह न पुरुष कहलाता है न स्त्री; वह दोनों से विलक्षण है।

Verse 26

अलिज्जत्‌ प्रकृतिर्लिज्जिरुपाल भ्यति सात्मजै: । यथा पुष्पफलैर्नित्यमृतवो 5मूर्तयस्तथा,जैसे फूलों और फलोंद्वारा सदा निराकार ऋतुओंका अनुमान हो जाता है, उसी प्रकार निराकार पुरुषका संयोग पाकर अपने द्वारा उत्पन्न किये हुए जो महत्तत्त्व आदि लिंग हैं, उन्हींके द्वारा प्रकृति अनुमानका विषय होती है

वसिष्ठ बोले— प्रकृति स्वयं अलिंग (अदृश्य) है, पर अपने ही उत्पन्न किए हुए लिंगों (महत्तत्त्व आदि) से जानी जाती है। जैसे निराकार ऋतुएँ सदा फूलों और फलों से पहचानी जाती हैं, वैसे ही अव्यक्त पुरुष के संयोग से उत्पन्न चिह्नों द्वारा प्रकृति का अनुमान होता है।

Verse 27

एवमप्यनुमानेन हालिड्रमुपल भ्यते । पजञ्चविंशतिमस्तात लिड्लेषु नियतात्मक:,इसी प्रकार लिंगसे भिन्न जो शुद्ध चेतनरूप आत्मा है, वह भी अनुमानसे बोधका विषय होता है अर्थात्‌ जैसे दृश्यको प्रकाशित करनेके कारण सूर्य दृश्यसे भिन्न हैं, उसी प्रकार ज्ञान-स्वरूप आत्मा भी ज्ञेय वस्तुओंको प्रकाशित करनेके कारण उनसे भिन्न सत्ता रखता है। तात! वही पचीसवाँ तत्त्व है, जो सभी लिंगोंमें नियतरूपसे व्याप्त है

इसी प्रकार अनुमान से लिंगों से भिन्न शुद्ध चेतनस्वरूप आत्मा का बोध होता है। जैसे दृश्य को प्रकाशित करने के कारण सूर्य दृश्य वस्तुओं से भिन्न समझा जाता है, वैसे ही ज्ञानस्वरूप आत्मा भी ज्ञेय पदार्थों को प्रकाशित करने के कारण उनसे भिन्न सत्ता रखता है। तात! वही पचीसवाँ तत्त्व है, जो सब लिंगों में नियत और नित्य रूप से व्याप्त है।

Verse 28

अनादिनिधनो<नन्त:ः सर्वदर्शी निरामय: । केवल त्वभिमानित्वाद्‌ गुणेषु गुण उच्यते

वह न आदि वाला है न अंत वाला; अनन्त, सर्वदर्शी और निरामय है। परन्तु केवल अहंकार के आत्माभिमान के कारण ही वह गुणों में ‘गुण’ कहा जाता है—मानो अभिमान के कारण बँधा हुआ प्रतीत हो।

Verse 29

आत्मा तो जन्म-मृत्युसे रहित, अनन्त, सबका द्रष्टा और निर्विकार है। वह सत्त्व आदि गुणोंमें केवल अभिमान करनेके कारण ही गुणस्वरूप कहलाता है ।। गुणा गुणवत:ः सन्ति निर्गुणस्य कुतो गुणा: । तस्मादेवं विजानन्ति ये जना गुणदर्शिन:,गुण तो गुणवानमें ही रहते हैं। निर्गुण आत्मामें गुण कैसे रह सकते हैं। अतः गुणोंके स्वरूपको जाननेवाले विद्वान्‌ पुरुषोंका यही सिद्धान्त है कि जब जीवात्मा इन गुणोंको प्रकृतिका कार्य मानकर उनमें अपनेपनका अभिमान त्याग देता है, उस समय वह देह आदिमें आत्मबुद्धिका परित्याग करके अपने विशुद्ध परमात्म-स्वरूपका साक्षात्कार करता है

आत्मा जन्म-मृत्यु से रहित, अनन्त, सबका द्रष्टा और निर्विकार है। वह सत्त्व आदि गुणों में केवल अभिमान करने के कारण ही गुणस्वरूप कहलाता है। गुण तो गुणवान में ही रहते हैं; निर्गुण आत्मा में गुण कैसे रह सकते हैं? इसलिए गुणों का यथार्थ दर्शन करने वाले विद्वानों का सिद्धान्त यही है कि जब जीवात्मा इन गुणों को प्रकृति का कार्य मानकर उनमें ‘मेरा’ का अभिमान छोड़ देता है, तब वह देह आदि में आत्मबुद्धि का परित्याग करके अपने विशुद्ध परमात्मस्वरूप का साक्षात्कार करता है।

Verse 30

यदा त्वेष गुणानेतान्‌ प्राकृतानभिमन्यते । तदा स गुणहान्यै त॑ परमेवानुपश्यति,गुण तो गुणवानमें ही रहते हैं। निर्गुण आत्मामें गुण कैसे रह सकते हैं। अतः गुणोंके स्वरूपको जाननेवाले विद्वान्‌ पुरुषोंका यही सिद्धान्त है कि जब जीवात्मा इन गुणोंको प्रकृतिका कार्य मानकर उनमें अपनेपनका अभिमान त्याग देता है, उस समय वह देह आदिमें आत्मबुद्धिका परित्याग करके अपने विशुद्ध परमात्म-स्वरूपका साक्षात्कार करता है

जब यह जीव इन गुणों को प्रकृति का कार्य मानकर उनमें ‘मैं’ और ‘मेरा’ का अभिमान छोड़ देता है, तब गुणों से तादात्म्य की निवृत्ति होते ही वह परमात्मा को ही देखता है। देह आदि में आत्मभाव त्यागकर वह अपने विशुद्ध, परम स्वरूप का साक्षात्कार करता है।

Verse 31

यत्‌ तद्‌ बुद्धेः परं प्राहु: सांख्या योगाश्व सर्वश: । बुद्धयमानं महाप्राज्ञमबुद्धपरिवर्जनात्‌,सांख्य और योगके सम्पूर्ण विद्वान्‌ जिसको बुद्धिसे परे बताते हैं, जो परम ज्ञानसम्पन्न है, अहंकार आदि जड तत्त्वोंका परित्याग (बाध) कर देनेपर शेष रहे हुए चिन्मय तत्त्वके रूपमें जिसका बोध होता है, जो अज्ञात, अव्यक्त, सगुण ईश्वर, निर्गुण ईश्वर, नित्य और अधिष्ठाता कहा गया है, वह परमात्मा ही प्रकृति और उसके गुणों (चौबीस तत्त्वों) की अपेक्षा पचीसवा तत्त्व है, ऐसा सांख्य और योगमें कुशल तथा परमतत्त्वकी खोज करनेवाले विद्वान पुरुष समझते हैं

सांख्य और योग के समस्त विद्वान जिसको बुद्धि से परे बताते हैं—जो परम प्रज्ञावान है और अहंकार आदि जड़ तत्त्वों का परित्याग कर देने पर शेष रहने वाले चिन्मय तत्त्व के रूप में जिसका बोध होता है—उसी को परमात्मा कहते हैं। उसे अज्ञात, अव्यक्त, सगुण ईश्वर और निर्गुण ईश्वर, नित्य तथा अधिष्ठाता भी कहा गया है। इसलिए सांख्य-योग में कुशल और परमतत्त्व के अन्वेषी विद्वान यह समझते हैं कि वही परमात्मा प्रकृति और उसके गुणों (चौबीस तत्त्वों) से परे पचीसवाँ तत्त्व है।

Verse 32

अप्रबुद्धमथाव्यक्तं सगुणं प्राहुरीश्वरम्‌ । निर्गुणं चेश्वर॑ नित्यमधिष्ठातारमेव च,सांख्य और योगके सम्पूर्ण विद्वान्‌ जिसको बुद्धिसे परे बताते हैं, जो परम ज्ञानसम्पन्न है, अहंकार आदि जड तत्त्वोंका परित्याग (बाध) कर देनेपर शेष रहे हुए चिन्मय तत्त्वके रूपमें जिसका बोध होता है, जो अज्ञात, अव्यक्त, सगुण ईश्वर, निर्गुण ईश्वर, नित्य और अधिष्ठाता कहा गया है, वह परमात्मा ही प्रकृति और उसके गुणों (चौबीस तत्त्वों) की अपेक्षा पचीसवा तत्त्व है, ऐसा सांख्य और योगमें कुशल तथा परमतत्त्वकी खोज करनेवाले विद्वान पुरुष समझते हैं

वसिष्ठ बोले—बुद्धिमानों ने ईश्वर को अनेक प्रकार से कहा है—अप्रबुद्ध और अव्यक्त, सगुण ईश्वर; तथा निर्गुण ईश्वर, नित्य और सबके भीतर अधिष्ठाता। सांख्य और योग में निपुण परमतत्त्व के अन्वेषी यह समझते हैं कि अहंकार आदि जड़ तत्त्वों का बाध हो जाने पर जो शुद्ध चैतन्य शेष रहता है, वही परमात्मा है; और वही प्रकृति तथा उसके गुणों (चौबीस तत्त्वों) से परे पचीसवाँ तत्त्व है।

Verse 33

प्रकृतेश्व गुणानां च पठचविंशतिकं बुधा: । सांख्ययोगे च कुशला बुध्यन्ते परमैषिण:,सांख्य और योगके सम्पूर्ण विद्वान्‌ जिसको बुद्धिसे परे बताते हैं, जो परम ज्ञानसम्पन्न है, अहंकार आदि जड तत्त्वोंका परित्याग (बाध) कर देनेपर शेष रहे हुए चिन्मय तत्त्वके रूपमें जिसका बोध होता है, जो अज्ञात, अव्यक्त, सगुण ईश्वर, निर्गुण ईश्वर, नित्य और अधिष्ठाता कहा गया है, वह परमात्मा ही प्रकृति और उसके गुणों (चौबीस तत्त्वों) की अपेक्षा पचीसवा तत्त्व है, ऐसा सांख्य और योगमें कुशल तथा परमतत्त्वकी खोज करनेवाले विद्वान पुरुष समझते हैं

सांख्य-योग में कुशल परमतत्त्व के अन्वेषी बुद्धिमान यह जानते हैं कि प्रकृति और उसके गुणों के चौबीस तत्त्वों से भिन्न परमात्मा पचीसवाँ तत्त्व है। अहंकार आदि जड़ तत्त्वों का बाध हो जाने पर जो शुद्ध चैतन्य शेष रहता है, वही अव्यक्त-अज्ञात, सगुण-निर्गुण, नित्य और अंतःस्थ अधिष्ठाता के नाम से कहा जाता है। इस प्रकार ज्ञाता पुरुष आत्मा को प्रकृति के चौबीस घटकों से परे घोषित करते हैं।

Verse 34

यदा प्रबुद्धा हव्यक्तमवस्थाजन्मभीरव: । बुध्यमान प्रबुध्यन्ति गमयन्ति समं तदा,जिस समय बाल्य, यौवन और वृद्धावस्था अथवा जन्म-मरणसे भयभीत हुए विवेकी पुरुष चेतन-स्वरूप अव्यक्त परमात्माके तत्त्वको ठीक-ठीक समझ लेते हैं, उस समय उन्हें परब्रह्म परमात्माके स्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है

जब विवेकी पुरुष बाल्य, यौवन और वृद्धावस्था के परिवर्तन से तथा जन्म-मरण के भय से व्याकुल होकर अव्यक्त, चैतन्यस्वरूप परम ब्रह्म के तत्त्व को यथार्थ रूप से जान लेते हैं, तब उनकी बुद्धि पूर्णतः प्रकाशित हो जाती है। उसी समय वे समत्व की अवस्था में प्रविष्ट होकर परब्रह्म परमात्मा के स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं।

Verse 35

एतन्निदर्शनं सम्यगसम्यगनिदर्शनम्‌ । बुध्यमानाप्रबुद्धानां पृथग्पृथगरिंदम,शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश! ज्ञानी पुरुषोंका यह ज्ञान युक्तियुक्त होनेके कारण उत्तम और (अज्ञानियोंकी धारणासे) पृथक्‌ है। इसके विपरीत अज्ञानी पुरुषोंका जो अप्रामाणिक ज्ञान है, वह युक्तियुक्त न होनेके कारण ठीक नहीं है। यह पूर्वोक्त सम्यक्‌ ज्ञानसे पृथक है

यह सम्यक् ज्ञान और असम्यक् ज्ञान का उदाहरण है। हे शत्रुदमन! जो लोग समझ तो रहे हैं पर अभी पूर्णतः जाग्रत नहीं हुए, उन्हें ये दोनों पृथक्-पृथक् प्रतीत होते हैं। ज्ञानी पुरुषों का ज्ञान युक्तियुक्त और प्रमाणसमर्थ होने से श्रेष्ठ तथा (अज्ञानियों की धारणाओं से) भिन्न है; पर अज्ञानियों का तथाकथित ज्ञान अप्रामाणिक और तर्कहीन होने से ठीक नहीं—वह पूर्वोक्त सम्यक् ज्ञान से सर्वथा अलग है।

Verse 36

परस्परेणैतदुक्तं क्षराक्षरनिदर्शनम्‌ । एकत्वमक्षरं प्राहुननिात्व॑ क्षरमुच्यते,क्षर और अक्षरके तत्त्वका प्रतिपादन करनेवाला यह दर्शन मैंने तुम्हें बताया है। क्षर और अक्षरमें परस्पर क्या अन्तर है? इसे इस प्रकार समझो--सदा एकरूपमें रहनेवाले परमात्मतत्त्वको अक्षर बताया गया है और नाना रूपोंमें प्रतीत होनेवाला यह प्राकृत प्रपंच क्षर कहलाता है

वसिष्ठ बोले—क्षर और अक्षर के तत्त्व का यह दृष्टान्त परस्पर संबंध से कहा गया है। जो एकरूप, नित्य और अविकार है, उसे मुनि ‘अक्षर’ कहते हैं; और जो नाना रूपों में विविध होकर प्रतीत होता है, उसे ‘क्षर’ कहा जाता है।

Verse 37

पजञ्चविंशतिनिष्ठो5यं यदा सम्यक्‌ प्रवर्तते । एकत्वं दर्शन चास्य नानात्वं चाप्यदर्शनम्‌

जब पच्चीस तत्त्वों पर स्थित यह साधना ठीक प्रकार से प्रवृत्त होती है, तब उसे एकत्व का दर्शन होता है और नानात्व का दर्शन नहीं रहता।

Verse 38

जब यह पुरुष पचीसतवें तत्त्वस्वरूप परमात्मामें स्थित हो जाता है, तब उसकी स्थिति उत्तम बतायी जाती है--वह ठीक बर्ताव करता है, ऐसा माना जाता है। एकत्वका बोध ही ज्ञान है और नानात्वका बोध ही अज्ञान है ।। तत्त्वनिस्तत्त्वयोरेतत्‌ पृथगेव निदर्शनम्‌ । पज्चविंशतिसर्ग तु तत्त्वमाहुर्मनीषिण:,तत्त्व (क्षर और निस्तत्त्व (अक्षर) का यह पृथकृ-पृथक्‌ लक्षण समझना चाहिये। कुछ मनीषी पुरुष पचीस तत्त्वोंको ही तत्त्व कहते हैं; परंतु दूसरे विद्वानोंने चौबीस जड तत्त्वोंको तो तत्त्व कहा है और पचीसवें चेतन परमात्माको निस्तत्त्व (तत्त्वसे भिन्न) बताया है। यह चैतन्य ही परमात्माका लक्षण है। महत्तत््व आदि जो विकार हैं, वे क्षरतत्त्व हैं और परम पुरुष परमात्मा उन “क्षर” तत्त्वोंसे भिन्न उनका सनातन आधार है

एकत्व का बोध ही ज्ञान है और नानात्व का बोध ही अज्ञान। ‘तत्त्व’ और ‘निस्तत्त्व’ का यह पृथक् लक्षण समझो। कुछ मनीषी पच्चीस तत्त्वों के समूह को ही तत्त्व कहते हैं; अन्य विद्वान चौबीस जड़ तत्त्वों को तत्त्व मानते हैं और पच्चीसवें—चेतन परमात्मा—को निस्तत्त्व, अर्थात् क्षर श्रेणियों से परे, बताते हैं। जब पुरुष उस पच्चीसवें तत्त्व में स्थित हो जाता है, तब उसकी अवस्था उत्तम कही जाती है और उसका आचरण सम्यक् माना जाता है।

Verse 39

निस्तत्त्वं पज्चविंशस्य परमाहुर्निंदर्शनम्‌ । सर्गस्य वर्गमाधारं तत्त्वं तत्वात्‌ू सनातनम्‌,तत्त्व (क्षर और निस्तत्त्व (अक्षर) का यह पृथकृ-पृथक्‌ लक्षण समझना चाहिये। कुछ मनीषी पुरुष पचीस तत्त्वोंको ही तत्त्व कहते हैं; परंतु दूसरे विद्वानोंने चौबीस जड तत्त्वोंको तो तत्त्व कहा है और पचीसवें चेतन परमात्माको निस्तत्त्व (तत्त्वसे भिन्न) बताया है। यह चैतन्य ही परमात्माका लक्षण है। महत्तत््व आदि जो विकार हैं, वे क्षरतत्त्व हैं और परम पुरुष परमात्मा उन “क्षर” तत्त्वोंसे भिन्न उनका सनातन आधार है

वसिष्ठ बोले—कुछ लोग कहते हैं कि पच्चीसवाँ तत्त्व ही परम संकेत है, जो सृष्टि के प्रकट वर्गों से परे है। वही समस्त सर्ग-समूह का सनातन आधार है, जो परिवर्तनशील तत्त्वों से भिन्न होकर भी उन्हें धारण करता है।

Verse 83

पश्यामि भगवंस्तस्मान्मोक्षधर्मो न विद्यते । भगवन्‌! इस प्रकार प्रकृति और पुरुष दोनों ही एक दूसरेके गुणोंकों आच्छादित करके एक दूसरेके गुणोंका आश्रयः लेते हुए सृष्टि करते हैं। इस तरह मैं इन दोनोंको सदा एक दूसरेसे सम्बद्ध देखता हूँ। अतः पुरुषके लिये मोक्षधर्मकी सिद्धि असम्भव जान पड़ती है

जनक बोले—भगवन्, इसलिए मुझे मोक्षधर्म का अस्तित्व नहीं दिखता। क्योंकि, हे पूज्य, इस प्रकार प्रकृति और पुरुष—एक-दूसरे के गुणों को आच्छादित करके और एक-दूसरे के गुणों का आश्रय लेकर—सृष्टि करते हैं। मैं इन दोनों को सदा परस्पर सम्बद्ध ही देखता हूँ; अतः पुरुष के लिए मोक्षमार्ग की सिद्धि असम्भव-सी प्रतीत होती है।

Verse 96

तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन प्रत्यक्षो ह्सि सर्वदा । अथवा पुरुषके मोक्षका साक्षात्कार करानेवाला कोई दृष्टान्त हो तो आप उसे बताइये और मुझे ठीक-ठीक समझा दीजिये; क्योंकि आपको सदा सब कुछ प्रत्यक्ष है

जनक बोले—उस सत्य को मुझे तत्त्वतः कहिये, क्योंकि वह आपको सदा प्रत्यक्ष है। अथवा यदि पुरुष के मोक्ष का साक्षात्कार कराने वाला कोई दृष्टान्त हो, तो उसे बताकर मुझे ठीक-ठीक समझा दीजिये।

Verse 304

इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें वसिष्ठ और करालजनकका संवादविषयक तीन सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में वसिष्ठ और करालजनक के संवाद-विषयक तीन सौ चौथा अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 305

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वसिष्ठकरालजनकसंवादे पज्चाधिकत्रिशततमो<ध्याय:

इति श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व में मोक्षधर्मपर्व के अन्तर्गत वसिष्ठ-कराल-जनक संवाद में तीन सौ पाँचवाँ अध्याय समाप्त।

Frequently Asked Questions

How a person should interpret bodily and perceptual change near death and respond appropriately: not with panic or fatalism, but with disciplined inward practice oriented toward liberation.

Mortality-awareness is converted into method: recognizing impermanence should intensify dhāraṇā, sāṃkhya-like discernment, and yoga so the practitioner seeks the imperishable state rather than clinging to transient conditions.

Yes in doctrinal form: it asserts that through yogic integration and inner alignment with the paramātman, one attains an ‘akṣaya/avyaya’ (imperishable) station—framed as difficult to reach for the undisciplined.