Adhyaya 284
Shanti ParvaAdhyaya 284146 Verses

Adhyaya 284

Adhyāya 284: Tapas as a Corrective to Household Attachment (Parāśara’s Instruction)

Upa-parva: Mokṣa-dharma (Liberation-Oriented Instruction) — Tapas, Vairāgya, and the Moral Psychology of Attachment

Parāśara transitions from outlining the householder’s dharma to explaining the discipline of tapas. He describes a common psychological sequence in gṛhastha life: identification with possessions and relations (mamatva) leads to intensified rāga-dveṣa (desire/aversion), which then supports moha (delusion), rati (pleasure-seeking), and lobha (greed). This attachment-momentum can prompt ethically compromised actions for gain, followed by regret, status-protection behaviors, and eventual decline. Against this, Parāśara defines tapas for the discerning as a stable means toward brahma-darśana (higher insight), typically arising when losses, illness, and life-pressure generate nirveda (disenchantment). From nirveda comes self-awareness, then scriptural vision, culminating in a commitment to tapas. He frames tapas as widely applicable (even for the “lesser” person) when paired with sense-control, and presents it as causally efficacious: cosmic beings and social excellence are attributed to tapas as a formative power. The chapter warns that dissatisfaction and greed erode judgment, and urges disciplined practice when pleasures diminish. It also offers a measured stance for householders: enjoy sense-objects that come without excessive striving, while pursuing svadharma with diligence; all āśramas are said to find their stability through the gṛhastha, as rivers converge into the ocean.

Chapter Arc: देवगुरु बृहस्पति महादेव को वेद का ‘मखाध्याय’ सुनाते हैं; उसी क्षण प्रजापति दक्ष भय, शंका और आँसुओं के साथ हाथ जोड़कर शिव के सम्मुख खड़े होते हैं। → दक्ष की दीन-प्रार्थना और क्षमा-याचना के साथ शिव-तत्त्व का विराट स्तवन फैलता जाता है—शिव को होता, मन्त्र, यज्ञ, काल-चक्र (संवत्सर से निमेष तक), ग्रह-नक्षत्र, और असंख्य नाम-रूपों में व्याप्त बताया जाता है; यह विस्तार मानवीय अहंकार को क्रमशः गलाकर समर्पण में बदल देता है। → स्तुति अपने चरम पर पहुँचकर शिव को सर्वव्यापक, सर्वरूप, और यज्ञ-स्वरूप घोषित करती है—जहाँ देवता, काल, कर्म और जगत एक ही महादेव में लीन दिखते हैं; इसी चरम पर ‘भयभीत-आँसूभरे’ दक्ष का आत्मसमर्पण निर्णायक बनता है। → व्यास का उपदेश-स्वर (नियम, शौच-संतोष, इन्द्रिय-निग्रह) और विधिपूर्वक शिव, कार्तिकेय, पार्वती तथा नन्दिकेश्वर-पूजन का निर्देश कथा को साधना-मार्ग में स्थिर करता है; स्तवन का फल और आचरण का विधान स्पष्ट होता है।

Shlokas

Verse 60

उस समय देवगुरु बृहस्पतिने महादेवजीको वेदका मखाध्याय पढ़कर सुनाया। तत्पश्चात्‌ प्रजापति दक्ष दोनों नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाते हुए हाथ जोड़कर भय और शंकासे सहमे हुए-से बोले--“भगवन्‌! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, यदि मैं आपका प्रिय हूँ, आपके अनुग्रहका पात्र हूँ अथवा यदि आप मुझे वर देनेको उद्यत हैं तो मैं यही वर माँगता हूँ कि मैंने दीर्घकालसे महान्‌ प्रयत्न करके जो ऐसा यज्ञ-सम्भार जुटा रखा था, उसमेंसे जो चला दिया गया, खा-पी लिया गया, नष्ट किया गया अथवा चूर-चूर करके फेंक दिया गया, वह सब मेरे लिये व्यर्थ न हो”

At that time, the preceptor of the gods, Bṛhaspati, recited and explained to Mahādeva the Vedic section concerning the sacrificial rite. Thereafter Prajāpati Dakṣa—his eyes streaming with tears—joined his palms and, trembling with fear and doubt, spoke: “O Lord! If you are pleased with me—if I am dear to you, worthy of your grace, or if you are ready to grant me a boon—then I ask only this: may the sacrificial preparations that I gathered over a long time with great effort not become futile, even though some of them were carried off, eaten and drunk, destroyed, or crushed and scattered.”

Verse 61

तमुवाचाग्जलिं कृत्वा दक्षो देवं प्रजापति: । भीतशड्कितवित्रस्त: सबाष्पवदनेक्षण:,उस समय देवगुरु बृहस्पतिने महादेवजीको वेदका मखाध्याय पढ़कर सुनाया। तत्पश्चात्‌ प्रजापति दक्ष दोनों नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाते हुए हाथ जोड़कर भय और शंकासे सहमे हुए-से बोले--“भगवन्‌! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, यदि मैं आपका प्रिय हूँ, आपके अनुग्रहका पात्र हूँ अथवा यदि आप मुझे वर देनेको उद्यत हैं तो मैं यही वर माँगता हूँ कि मैंने दीर्घकालसे महान्‌ प्रयत्न करके जो ऐसा यज्ञ-सम्भार जुटा रखा था, उसमेंसे जो चला दिया गया, खा-पी लिया गया, नष्ट किया गया अथवा चूर-चूर करके फेंक दिया गया, वह सब मेरे लिये व्यर्थ न हो”

With palms joined in reverence, Dakṣa—the divine Prajāpati—addressed the god. Overcome by fear, suspicion, and trembling, his face and eyes filled with tears. In the ethical frame of the episode, the proud sacrificer is brought to humility: he approaches not with entitlement but with supplication, acknowledging divine authority and seeking that his long-prepared sacrificial undertaking not be rendered futile despite the devastation that has occurred.

Verse 62

यदि प्रसन्नो भगवान्‌ यदि चाहं भवत्तप्रिय: । यदि वाहमनुग्राह्मो यदि वा वरदो मम,उस समय देवगुरु बृहस्पतिने महादेवजीको वेदका मखाध्याय पढ़कर सुनाया। तत्पश्चात्‌ प्रजापति दक्ष दोनों नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाते हुए हाथ जोड़कर भय और शंकासे सहमे हुए-से बोले--“भगवन्‌! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, यदि मैं आपका प्रिय हूँ, आपके अनुग्रहका पात्र हूँ अथवा यदि आप मुझे वर देनेको उद्यत हैं तो मैं यही वर माँगता हूँ कि मैंने दीर्घकालसे महान्‌ प्रयत्न करके जो ऐसा यज्ञ-सम्भार जुटा रखा था, उसमेंसे जो चला दिया गया, खा-पी लिया गया, नष्ट किया गया अथवा चूर-चूर करके फेंक दिया गया, वह सब मेरे लिये व्यर्थ न हो”

Dakṣa, trembling with fear and doubt and with tears streaming from both eyes, addresses the Lord: “O Blessed One—if You are pleased with me; if I am dear to You; if I am fit to receive Your grace; or if You are disposed to grant me a boon—then this is the boon I ask: may the great sacrificial preparation I assembled over a long time with immense effort not become futile, even though much of it has been driven away, eaten and drunk, destroyed, or crushed and scattered.” The passage frames a moral appeal: even amid divine wrath and the collapse of ritual order, the petitioner seeks that sincere, hard-won effort not be rendered meaningless.

Verse 63

यद्‌ दग्धं भक्षितं पीतमशितं यच्च नाशितम्‌ । चूर्णीकृतापविद्धं च यज्ञसम्भारमीदृशम्‌,उस समय देवगुरु बृहस्पतिने महादेवजीको वेदका मखाध्याय पढ़कर सुनाया। तत्पश्चात्‌ प्रजापति दक्ष दोनों नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाते हुए हाथ जोड़कर भय और शंकासे सहमे हुए-से बोले--“भगवन्‌! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, यदि मैं आपका प्रिय हूँ, आपके अनुग्रहका पात्र हूँ अथवा यदि आप मुझे वर देनेको उद्यत हैं तो मैं यही वर माँगता हूँ कि मैंने दीर्घकालसे महान्‌ प्रयत्न करके जो ऐसा यज्ञ-सम्भार जुटा रखा था, उसमेंसे जो चला दिया गया, खा-पी लिया गया, नष्ट किया गया अथवा चूर-चूर करके फेंक दिया गया, वह सब मेरे लिये व्यर्थ न हो”

जो यज्ञ-सामग्री जला दी गई, खा ली गई, पी ली गई, खप गई या नष्ट कर दी गई, और जो चूर-चूर करके फेंक दी गई—ऐसी सब सामग्री मेरे लिए व्यर्थ न हो।

Verse 64

दीर्घकालेन महता प्रयत्नेन सुसंचितम्‌ । तन्न मिथ्या भवेन्मह्ूं वरमेतमहं वृणे,उस समय देवगुरु बृहस्पतिने महादेवजीको वेदका मखाध्याय पढ़कर सुनाया। तत्पश्चात्‌ प्रजापति दक्ष दोनों नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाते हुए हाथ जोड़कर भय और शंकासे सहमे हुए-से बोले--“भगवन्‌! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, यदि मैं आपका प्रिय हूँ, आपके अनुग्रहका पात्र हूँ अथवा यदि आप मुझे वर देनेको उद्यत हैं तो मैं यही वर माँगता हूँ कि मैंने दीर्घकालसे महान्‌ प्रयत्न करके जो ऐसा यज्ञ-सम्भार जुटा रखा था, उसमेंसे जो चला दिया गया, खा-पी लिया गया, नष्ट किया गया अथवा चूर-चूर करके फेंक दिया गया, वह सब मेरे लिये व्यर्थ न हो”

मैंने दीर्घकाल तक महान् प्रयत्न करके इन सबको सावधानी से संचित किया है; यह मेरे लिए व्यर्थ न हो। यही वर मैं चुनता हूँ।

Verse 65

दक्षके यज्ञमें शिवजीका प्राकट्य तथास्त्वित्याह भगवान्‌ भगनेत्रहरो हर: । धर्माध्यक्षो विरूपाक्षसर्त्रयक्षो देव: प्रजापति:,तब धर्मके अध्यक्ष, प्रजापालक, विख्ूपाक्ष, त्रिनेत्रधारी, भगनेत्रहारी देवेश्वर भगवान्‌ हरने “तथास्तु” कहकर दक्षको मनोवांछित वर दे दिया

दक्ष के यज्ञ में शिव प्रकट हुए। भगनेत्रहारी भगवान् हर ने “तथास्तु” कहा। धर्माध्यक्ष, विरूपाक्ष, त्रिनेत्रधारी, प्रजापालक देवेश्वर हर ने दक्ष को मनोवांछित वर दे दिया।

Verse 66

जानुभ्यामवनीं गत्वा दक्षो लब्ध्या भवाद्‌ वरम्‌ | नाम्नामष्टसहस्रेण स्तुतवान्‌ वृषभध्वजम्‌,महादेवजीसे वर पाकर दक्षने धरतीपर घुटने टेककर उन्हें प्रणाम किया और एक हजार आठ नामोंद्वारा उन भगवान्‌ वृषभध्वजका स्तवन किया

महादेव से वर पाकर दक्ष घुटनों के बल पृथ्वी पर गया, प्रणाम किया और आठ हजार नामों से वृषभध्वज भगवान् का स्तवन करने लगा।

Verse 67

युधिछिर उवाच यैनममधेयै: स्तुतवान्‌ दक्षो देव॑ं प्रजापति: । वक्तुमहसि मे तात श्रीतुं श्रद्धा ममानघ,युधिष्ठिरे पूछा--तात! निष्पाप पितामह! प्रजापति दक्षने जिन नामोंद्वारा महादेवजीकी स्तुति की थी, उनका मुझसे वर्णन कीजिये। उन्हें सुननेके लिये मेरे हृदयमें बड़ी श्रद्धा है

युधिष्ठिर बोले—तात! निष्पाप पितामह! प्रजापति दक्ष ने जिन नामों से देव महादेव की स्तुति की थी, वे मुझे बताने की कृपा कीजिए; उन्हें सुनने के लिए मेरे हृदय में बड़ी श्रद्धा है।

Verse 68

भीष्म उवाच श्रूयतां देवदेवस्य 42426 सडक :। गूढव्रतस्य गुह्मानि प्रकाशानि च भारत,भीष्मजी कहते हैं--भरतनन्दन! अद्भुत कर्म करनेवाले गूढ व्रतधारी देवाधिदेव महादेवजीके कुछ नाम गोपनीय हैं और कुछ प्रकाशित हैं। तुम उन सबको सुनो

भीष्मजी बोले—भरतनन्दन! सुनो। देवाधिदेव महादेव के—जिनके व्रत गूढ़ हैं और कर्म अद्भुत—कुछ नाम गुप्त हैं और कुछ प्रकट। उन सबको तुम सुनो।

Verse 69

नमस्ते देवदेवेश देवारिबलसूदन । देवेन्द्रबलविष्टम्भ देवदानवपूजित,(दक्ष बोले)--देवदेवेश्वर! आपको नमस्कार है। आप देववैरी दानवोंकी सेनाके संहारक और देवराज इन्द्रकी शक्तिको भी स्तम्भित करनेवाले हैं। देवता और दानव--सबने आपकी पूजा की है

देवदेवेश्वर! आपको नमस्कार है। आप देवों के शत्रुओं की सेनाओं के संहारक हैं, देवराज इन्द्र के बल को भी स्तम्भित करनेवाले हैं, और देवता तथा दानव—सबके द्वारा पूजित हैं।

Verse 70

सहस्राक्ष विरूपाक्ष त्र्यक्ष यक्षाधिपप्रिय । सर्वतःपाणिपादान्त सर्वतो$क्षिशिरोमुख,आप सहसों नेत्रोंसे युक्त होनेके कारण सहस्राक्ष हैं। आपकी इन्द्रियाँ सबसे विलक्षण अर्थात्‌ परोक्ष विषयको भी प्रत्यक्ष करनेवाली हैं, इसलिये आपको विरूपाक्ष कहते हैं। आप त्रिनेत्रधारी होनेके कारण त>ऋयक्ष कहलाते हैं। यक्षराज कुबेरके भी आप प्रिय (इष्टदेव) हैं। आपके सब ओर हाथ और पैर हैं तथा सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं

आप सहस्र नेत्रोंवाले हैं—इसलिए सहस्राक्ष; विलक्षण दृष्टिवाले हैं—इसलिए विरूपाक्ष; त्रिनेत्रधारी हैं—इसलिए त्र्यक्ष; और यक्षाधिप कुबेर के प्रिय हैं। आपके हाथ-पाँव सब ओर हैं, और सब ओर आपके नेत्र, मस्तक तथा मुख हैं।

Verse 71

सर्वतः:श्रुतिमँललोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि । शंकुकर्ण महाकर्ण कुम्भकर्णारणवालय

आप संसार में सर्वत्र श्रवणशक्ति से युक्त होकर, सबको आच्छादित करके स्थित हैं। हे शंकुकर्ण, हे महाकर्ण, हे कुम्भकर्ण, हे आरणवालय!

Verse 72

शतोदर शतावर्त शतजिह्द नमोस्तु ते

हे शतोदर, हे शतावर्त, हे शतजिह्व! आपको नमस्कार है।

Verse 73

गायन्ति त्वा गायत्रिणोड<र्चन्त्यर्क्मर्किण: । ब्रह्माणं त्वा शतक्रतुमूर्ध्य खमिव मेनिरे

गायत्री के जपकर्ता द्विज आपका ही गान करते हैं और सूर्य के उपासक सौर स्तोत्रों से आपकी ही स्तुति करते हैं। वे आपको ब्रह्मा ही मानते हैं और शतक्रतु इन्द्र के रूप में भी—आकाश के उच्च शिखर के समान—उत्कृष्ट और उन्नत समझते हैं।

Verse 74

आपके सैकड़ों उदर, सैकड़ों आवर्त और सैकड़ों जिह्वाएँ होनेके कारण आप क्रमशः शतोदर, शतावर्त और शतजिद्ठ नामसे प्रसिद्ध हैं। आपको प्रणाम है। गायत्री-मन्त्रका जप करनेवाले द्विज आपकी ही महिमाका गान करते हैं और सूर्योपासक सूर्यके रूपमें आपकी ही आराधना करते हैं। ऋषिगण आपको ही ब्रह्मा, शतक्रतु इन्द्र और आकाशके समान सर्वोच्च पद मानते हैं ।। मूर्ती हि ते महामूर्ते समुद्राम्बरसंनिभ । सर्वा वै देवता हास्मिन्‌ गावो गोष्ठ इवासते

आपके सैकड़ों उदर, सैकड़ों आवर्त और सैकड़ों जिह्वाएँ होने से आप क्रमशः शतोदर, शतावर्त और शतजिह्व नाम से प्रसिद्ध हैं। आपको नमस्कार है। गायत्री-मन्त्र का जप करने वाले द्विज आपकी ही महिमा का गान करते हैं और सूर्योपासक सूर्यरूप में आपकी ही आराधना करते हैं। ऋषिगण आपको ब्रह्मा, शतक्रतु इन्द्र तथा आकाश के समान सर्वोच्च पद मानते हैं। हे महामूर्ते! आपकी मूर्ति समुद्र और अम्बर के समान विशाल है; आपके भीतर समस्त देवता ऐसे निवास करते हैं जैसे गोष्ठ में गौएँ।

Verse 75

समुद्र और आकाशके समान अपार, अनन्त रूप धारण करनेवाले महामूर्तिधारी महेश्वर! जैसे गोशालामें गौएँ निवास करती हैं, उसी प्रकार आपकी भूमि, जल, वायु, अग्नि, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा एवं यजमानरूप आठ प्रकारकी मूर्तियोंमें सम्पूर्ण देवताओंका निवास है ।। भवच्छरीरे पश्यामि सोममन्निं जलेश्वरम्‌ । आदित्यमथ वै विष्णु ब्रह्माणं च बृहस्पतिम्‌,मैं आपके शरीरमें सोम, अग्नि, वरुण, सूर्य, विष्णु, ब्रह्मा तथा बृहस्पतिको भी देख रहा हूँ

हे महामूर्तिधारी महेश्वर! आप समुद्र और आकाश के समान अपार हैं, अनन्त रूप धारण करने वाले हैं। जैसे गोशाला में गौएँ निवास करती हैं, वैसे ही आपकी आठ प्रकार की मूर्तियों—पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा और यजमान—में समस्त देवताओं का निवास है। मैं आपके शरीर में सोम, अग्नि, जलाधिप वरुण, आदित्य (सूर्य), विष्णु, ब्रह्मा तथा बृहस्पति को भी देख रहा हूँ।

Verse 76

भगवान्‌ कारणं कार्य क्रिया करणमेव च । असतश्न सतश्वैव तथैव प्रभवाप्ययौ,आप ही कारण, कार्य, क्रिया (प्रयत्न) और करण हैं। सत्‌ और असत्‌ पदार्थोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान भी आप ही हैं

भगवान् आप ही कारण हैं, आप ही कार्य हैं, आप ही क्रिया (प्रयत्न) और आप ही करण (साधन) हैं। सत् और असत्—दोनों का प्रवाह आपसे ही उत्पन्न होता है और आपमें ही लीन हो जाता है।

Verse 77

नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय च । पशूनां पतये नित्यं नमो<स्त्वन्धकघातिने,आप सबके उद्धवका स्थान होनेसे भव, संहार करनेके कारण शर्व, “रु अर्थात्‌ पाप एवं दु:खको दूर करनेसे रुद्र, वरदाता होनेसे वरद तथा पशुओं (जीवों) के पालक होनेके कारण सदा पशुपति कहलाते हैं। आपने ही अन्धकासुरका वध किया है, इसलिये आपका नाम अन्धकघाती है। आपको बारंबार नमस्कार है

भव, शर्व, रुद्र, वरद और नित्य पशुपति—आपको नमस्कार है। अन्धक का संहार करने वाले अन्धकघाती को भी बारंबार प्रणाम है।

Verse 78

त्रिजटाय त्रिशीर्षाय त्रिशूलवरपाणिने । त्र्यम्बकाय नत्रिनेत्राय त्रिपुरघ्नाय वै नम:,आप तीन जटा और तीन मस्तक धारण करनेवाले हैं। आपके हाथमें श्रेष्ठ त्रिशूल शोभा पाता है। आप त््यम्बक, त्रिनेत्रधारी तथा त्रिपुरासुरका विनाश करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है

तीन जटाएँ और तीन मस्तक धारण करने वाले, जिनके हाथ में श्रेष्ठ त्रिशूल शोभित है—त्र्यम्बक, त्रिनेत्रधारी, त्रिपुर-विनाशक—आपको नमस्कार है।

Verse 79

नमश्नण्डाय कुण्डाय अण्डायाण्डधराय च । दण्डिने समकर्णाय दण्डिमुण्डाय वै नम:,आप दुष्टोंपर अत्यन्त क्रोध करनेके कारण चण्ड हैं। कुण्डमें जलकी भाँति आपके उदरमें सम्पूर्ण जगत्‌ स्थित है, इसलिये आपको कुण्ड कहते हैं। आप अण्ड (ब्रह्माण्ड स्वरूप) और अण्डधर (ब्रह्माण्डको धारण करनेवाले) हैं। आप दण्डधारी (सबको दण्ड देनेवाले) और समकर्ण (सबकी समान रूपसे सुननेवाले) हैं। दण्डधारण करके मूँड़ मुँड़ानेवाले संन्यासी भी आपके ही स्वरूप हैं, इसलिये आपका नाम दण्डिमुण्ड है। आपको नमस्कार है

चण्ड (अत्यन्त उग्र) रूप को, कुण्ड (जिसके उदर में जगत् कुण्ड के जल की भाँति स्थित है) को, अण्ड तथा अण्डधर को; दण्डिन, समकर्ण और दण्डिमुण्ड को—आपको नमस्कार है।

Verse 80

नमोर्ध्वदंष्टकेशाय शुक्लायावतताय च । विलोहिताय धूम्राय नीलग्रीवाय वै नम:,आपकी दाढ़ें बड़ी-बड़ी और सिरके बाल ऊपरकी ओर उठे हुए हैं, इसलिये आप ऊर्ध्वदंष्ट तथा ऊर्ध्वकेश कहलाते हैं। आप ही शुक्ल (विशुद्ध ब्रह्म) और आप ही अवतत (जगत्‌के रूपमें विस्तृत) हैं। आप रजोगुणको अपनानेपर विलोहित और तमोगुणका आश्रय लेनेपर धूम्र कहलाते हैं। आपकी ग्रीवामें नीले रंगका चिह्न है, इसलिये आपको नीलग्रीव कहते हैं। आपको नमस्कार है

ऊर्ध्वदंष्ट और ऊर्ध्वकेश, शुक्ल तथा अवतत; विलोहित और धूम्र; नीलग्रीव—आपको नमस्कार है।

Verse 81

नमो>स्त्वप्रतिरूपाय विरूपाय शिवाय च । सूर्याय सूर्यमालाय सूर्यध्वजपताकिने

अप्रतिरूप, विरूप, शिव—आपको नमस्कार है; सूर्य, सूर्यमाला से विभूषित, सूर्यध्वज-पताका धारण करने वाले—आपको नमस्कार है।

Verse 82

आपके रूपकी कहीं भी समता नहीं है, इसलिये आप अप्रतिरूप हैं। विविध रूप धारण करनेके कारण आपका नाम विरूप है। आप ही परम कल्याणकारी शिव हैं। आप ही सूर्य हैं, आप ही सूर्यमण्डलके भीतर सुशोभित होते हैं। आप अपनी ध्वजा और पताकापर सूर्यका चिह्न धारण करते हैं। आपको नमस्कार है ।। नमः प्रमथनाथाय वृषस्कन्धाय धन्विने । शत्रुंदमाय दण्डाय पर्णचीरपटाय च

प्रमथनाथ, वृषस्कन्ध, धन्विन्; शत्रुंदम, दण्डस्वरूप; पर्ण-चीर-पट धारण करने वाले—आपको नमस्कार है।

Verse 83

आप प्रमथगणोंके अधीश्वर हैं। वृषभके कंधोंके समान आपके कंधे भरे हुए हैं। आप पिनाक धनुष धारण करते हैं। शत्रुओंका दमन करनेवाले और दण्डस्वरूप हैं। किरात या तपस्वीके रूपमें विचरते समय आप भोजपत्र और वल्कलवस्त्र धारण करते हैं। आपको नमस्कार है ।। नमो हिरण्यगर्भाय हिरण्यकवचाय च । हिरण्यकृतचूडाय हिरण्यपतये नम:,हिरण्य (सुवर्ण) को उत्पन्न करनेके कारण हिरण्यगर्भ कहलाते हैं। सुवर्णके ही कवच और मुकुट धारण करनेसे आपको हिरण्यकवच और हिरण्यचूड कहा गया है। आप सुवर्णके अधिपति हैं। आपको सादर नमस्कार है

आप प्रमथगणों के अधीश्वर हैं। वृषभ के कंधों के समान आपके कंधे परिपूर्ण हैं। आप पिनाक धनुष धारण करते हैं; शत्रुओं का दमन करने वाले और दण्डस्वरूप हैं। किरात या तपस्वी के रूप में विचरते समय आप भोजपत्र और वल्कल-वस्त्र धारण करते हैं। आपको नमस्कार है॥ नमो हिरण्यगर्भाय, हिरण्यकवचाय च; हिरण्यकृतचूडाय, हिरण्यपतये नमः॥

Verse 84

नम: स्तुताय स्तुत्याय स्तूयमानाय वै नमः । सर्वाय सर्वभक्षाय सर्वभूतान्तरात्मने,जिनकी स्तुति हो चुकी है, वे आप हैं। जो स्तुतिके योग्य हैं, वे भी आप हैं और जिनकी स्तुति हो रही है, वे भी आप ही हैं। आप सर्वस्वरूप, सर्वभक्षी और सम्पूर्ण भूतोंके अन्तरात्मा हैं। आपको बारंबार नमस्कार है

जिनकी स्तुति हो चुकी है, वे आप हैं; जो स्तुति के योग्य हैं, वे भी आप हैं; और जिनकी स्तुति अभी हो रही है, वे भी आप ही हैं। सर्वस्वरूप, सर्वभक्षी तथा समस्त भूतों के अन्तरात्मा—आपको बारंबार नमस्कार है॥

Verse 85

नमो होत्रेडथ मन्त्राय शुक्लध्वजपताकिने । नमो नाभाय नाभ्याय नम: कटकटाय च,आप ही होता और मन्त्र हैं। आपको नमस्कार है। आपकी ध्वजा और पताकाका रंग श्वेत है। आपको नमस्कार है। आप नाभ (नाभिमें सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करनेवाले), नाभ्य (संसार-चक्रके नाभि-स्थान) तथा कट-कट (आवरणके भी आवरण) हैं। आपको नमस्कार है

आप ही होता और मन्त्र हैं—आपको नमस्कार है। आपकी ध्वजा और पताका श्वेतवर्ण हैं—आपको नमस्कार है। आप नाभ (जिसमें समस्त जगत् धारण है), नाभ्य (संसार-चक्र का नाभि-स्थान) तथा कट-कट (आवरण के भी आवरण) हैं—आपको नमस्कार है॥

Verse 86

नमोस्तु कृशनासाय कृशाज्ञाय कृशाय च | संदह्ृष्टाय विहृष्ाय नम: किलकिलाय च,आपकी नासिका कृश (पतली) है, इसलिये आप कृशनस कहलाते हैं। आपके अवयव कृश होनेसे आपको कृशांग तथा शरीर दुबला होनेसे कृश कहते हैं। आप अत्यन्त हर्षोल्लाससे परिपूर्ण, विशेष हर्षका अनुभव करनेवाले और हर्षकी किल-किल ध्वनि हैं। आपको नमस्कार है

पतली नासिका वाले—कृशनास—आपको नमस्कार है। कृश अंगों वाले—कृशाङ्ग—और दुबले शरीर वाले—कृश—आपको नमस्कार है। अत्यन्त हर्ष से दहक उठने वाले, विशेष उल्लास से परिपूर्ण, और हर्ष की ‘किल-किल’ ध्वनि-स्वरूप—आपको नमस्कार है॥

Verse 87

नमो&स्तु शयमानाय शयितायोत्थिताय च । स्थिताय धावमानाय मुण्डाय जटिलाय च,आप समस्त प्राणियोंके भीतर शयन करनेवाले अन्तर्यामी पुरुष हैं। प्रलयकालमें योगनिद्राका आश्रय लेकर सोते और सृष्टिके प्रारम्भकालमें कल्पान्त निद्रासे जागते हैं। आप ब्रह्मरूपसे सर्वत्र स्थित और कालरूपसे सदा दौड़नेवाले हैं। मूँड़ मुँड़ानेवाले संन्यासी और जटाधारी तपस्वी भी आपके ही स्वरूप हैं। आपको नमस्कार है

शयन करने वाले, शयित (निद्रित) और उठने वाले—आपको नमस्कार है। स्थिर रहने वाले और निरन्तर दौड़ने वाले—आपको नमस्कार है। मुण्डित संन्यासी और जटाधारी तपस्वी—इन रूपों में भी आपको नमस्कार है। आप समस्त प्राणियों के भीतर शयन करने वाले अन्तर्यामी पुरुष हैं। प्रलय में योगनिद्रा का आश्रय लेकर शयन करते हैं और सृष्टि के आरम्भ में कल्पान्त-निद्रा से जागते हैं। ब्रह्मरूप से सर्वत्र स्थित और कालरूप से सदा गतिमान—आपको नमस्कार है॥

Verse 88

नमो नर्तनशीलाय मुखवादित्रवादिने । नाद्योपहारलुब्धाय गतिवादित्रशालिने,आपका ताण्डव-नृत्य बराबर चलता रहता है। आप मुखसे शृंगी आदि बाजे बजानेमें कुशल हैं। कमलपुष्पकी भेंट लेनेके लिये सदा उत्सुक रहते हैं। गाने और बजानेकी कलामें तत्पर रहकर आप बड़ी शोभा पाते हैं। आपको प्रणाम है

नित्य ताण्डव-नृत्य में प्रवृत्त, मुख से भी शृङ्गी आदि वाद्य बजाने में निपुण, नाद्य-उपहार (गीत-वाद्य सहित अर्पण) के प्रति सदा उत्सुक, और गति तथा वाद्य-विद्या से शोभायमान आपको नमस्कार है।

Verse 89

नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय बलप्रमथनाय च । कालनाथाय कल्याय क्षयायोपक्षयाय च,आप अवस्थामें सबसे ज्येष्ठ और गुणोंमें भी सबसे श्रेष्ठ हैं। आपने बल नामक दैत्यको इन्द्ररूपसे मथ डाला था। आप कालके भी नियन्ता और सर्वशक्तिमान्‌ हैं। महाप्रलय और अवान्तर-प्रलय भी आप ही हैं। आपको नमस्कार है

सबसे ज्येष्ठ और गुणों में श्रेष्ठ, बल नामक दैत्य का मर्दन करने वाले, काल के भी स्वामी, सर्वमंगलस्वरूप, महाप्रलय तथा अवान्तर-प्रलय—आपको नमस्कार है।

Verse 90

भीमदुन्दुभिहासाय भीमव्रतधराय च । उग्राय च नमो नित्यं नमो<स्तु दशबाहवे

जिनका हास्य भीम दुन्दुभि के समान गर्जन करता है, जो भीषण व्रत धारण करते हैं, जो उग्र हैं—उनको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ; दशभुजाधारी को नमस्कार हो।

Verse 91

प्रभो! आपका अट्टहास भयंकर शब्द करनेवाली दुन्दुभिके समान जान पड़ता है। आप भीषण व्रतको धारण करनेवाले हैं। दस भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले उग्ररूपधारी आपको मेरा नित्य बारंबार नमस्कार है ।। नमःकपालहस्ताय चितिभस्मप्रियाय च । विभीषणाय भीष्माय भीमव्रतधराय च,आपके हाथमें कपाल है। चिताका भस्म आपको बहुत प्रिय है। आप सबको भयभीत करनेवाले और स्वयं निर्भय हैं तथा शम-दम आदि तीक्ष्ण व्रतोंको धारण करते हैं। आपको नमस्कार है

प्रभो! आपका अट्टहास भयंकर शब्द करने वाली दुन्दुभि के समान प्रतीत होता है। आप भीषण व्रतधारी हैं। उग्ररूप, दशभुजाधारी आपको मेरा नित्य बारंबार नमस्कार है। कपालधारी, चिताभस्म-प्रिय, विभीषण तथा भीष्म, और भीमव्रतधारी—आपको नमस्कार है।

Verse 92

नमो विकृतवक्त्राय खड्गजिद्दाय दं्टिणे । पक्‍्वाममांसलुब्धाय तुम्बीवीणाप्रियाय च

विकृत मुख वाले, खड्ग को जीतने वाले, दंष्ट्राधारी, पके और कच्चे मांस के लोभी, तथा तुम्बी-वीणा के प्रिय—आपको नमस्कार है।

Verse 93

आपका मुख विकृत है। जिह्नला खड्गके समान है। आपका मुख दाढ़ोंसे सुशोभित होता है। आप कच्चे-पक्के फलोंके गुद्देके लिये लुभायमान रहते हैं। तुम्बी और वीणा आपको विशेष प्रिय हैं। आपको प्रणाम है ।। नमो वृषाय वृष्याय गोवृषाय वृषाय च । कटंकटाय दण्डाय नम: पचपचाय च

आपका मुख विकृत है, आपकी जिह्वा खड्ग के समान है, और आपका मुख दाढ़ों से सुशोभित है। आप कच्चे-पक्के फलों के गूदे के लिए ललायित रहते हैं। तुम्बी और वीणा आपको विशेष प्रिय हैं। आपको प्रणाम है। नमो वृषाय वृष्याय गोवृषाय वृषाय च। कटंकटाय दण्डाय नमः पचपचाय च॥

Verse 94

आप वृष ([वृष्टिकर्ता), वृष्य (धर्मकी वृद्धि करनेवाले), गोवृष (नन्दी) और वृष (धर्म) आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं। कटंकट (नित्य गतिशील), दण्ड (शासक) और पचपच (सम्पूर्ण भूतोंको पचानेवाला काल) भी आपके ही नाम हैं। आपको नमस्कार है ।। नम: सर्ववरिष्ठाय वराय वरदाय च । वरमाल्यगन्धवस्त्राय वरातिवरदे नमः:,आप सबसे श्रेष्ठ वरस्वरूप और वरदाता हैं। उत्तम वस्त्र, माल्य और गन्ध धारण करते हैं तथा भक्तको इच्छानुसार एवं उससे भी अधिक वर देनेवाले हैं। आपको प्रणाम है

आप वृष (वृष्टि करनेवाले), वृष्य (धर्म की वृद्धि करनेवाले), गोवृष (नन्दी) और वृष (धर्म) आदि नामों से प्रसिद्ध हैं। कटंकट (नित्य गतिशील), दण्ड (शासक) और पचपच (समस्त भूतों को पचानेवाला काल) भी आपके ही नाम हैं। आपको नमस्कार है। नमः सर्ववरिष्ठाय वराय वरदाय च। वरमाल्यगन्धवस्त्राय वरातिवरदे नमः॥

Verse 95

नमो रक्तविरक्ताय भावनायाक्षमालिने । सम्भिन्नाय विभिन्नाय छायायातपनाय च

नमो रक्तविरक्ताय भावनायाक्षमालिने। सम्भिन्नाय विभिन्नाय छायायातपनाय च॥

Verse 96

रागी और विरागी-दोनों जिनके स्वरूप हैं, जो ध्यानपरायण, रुद्राक्षकी माला धारण करनेवाले, कारण-रूपसे सबमें व्याप्त और कार्यरूपसे पृथक्‌-पृथक्‌ दिखायी देनेवाले हैं तथा जो सम्पूर्ण जगत्‌को छाया और धूप प्रदान करते हैं, उन भगवान्‌ शंकरको नमस्कार है ।। अघोरघोररूपाय घोरघोरतराय च । नम: शिवाय शान्ताय नमः शान्ततमाय च,जो अघोर, घोर और घोरसे भी घोरतर रूप धारण करनेवाले हैं तथा जो शिव, शान्त एवं परमशान्तरूप हैं, उन भगवान्‌ शंकरको मेरा बारंबार नमस्कार है

रागी और विरागी—दोनों जिनके स्वरूप हैं, जो ध्यानपरायण, रुद्राक्ष की माला धारण करनेवाले, कारणरूप से सबमें व्याप्त और कार्यरूप से पृथक्-पृथक् दिखायी देनेवाले हैं तथा जो सम्पूर्ण जगत् को छाया और धूप प्रदान करते हैं—उन भगवान् शंकर को नमस्कार है। अघोरघोररूपाय घोरघोरतराय च। नमः शिवाय शान्ताय नमः शान्ततमाय च॥

Verse 97

एकपाद्वहुनेत्राय एकशीष्णें नमोस्तु ते । रुद्राय क्षुद्रलुब्धाय संविभागप्रियाय च,एक पाद, अनेक नेत्र और एक मस्तकवाले आपको प्रणाम है। भक्तोंकी दी हुई छोटी- से-छोटी वस्तुके लिये भी लालायित रहनेवाले और उसके बदलेमें उन्हें अपार धनराशि बाँट देनेकी रुचि रखनेवाले आप भगवान्‌ रुद्रको नमस्कार है

एक पाद, अनेक नेत्र और एक मस्तकवाले आपको प्रणाम है। भक्तों की दी हुई छोटी-से-छोटी वस्तु के लिये भी लालायित रहनेवाले और उसके बदले में उन्हें अपार धनराशि बाँट देने की रुचि रखनेवाले आप भगवान् रुद्र को नमस्कार है। एकपादबहुनेत्राय एकशीर्ष्णे नमोऽस्तु ते। रुद्राय क्षुद्रलुब्धाय संविभागप्रियाय च॥

Verse 98

पञ्चालाय सिताड्राय नमः: शमशमाय च । नमश्नण्डिकघण्टाय घण्टायाघण्टघण्टिने,जो इस विश्वका निर्माण करनेवाले कारीगर, गौरवर्णके शरीरवाले तथा सदा शान्तरूपसे रहनेवाले हैं, जिनकी घण्टाध्वनि शत्रुओंको भयभीत कर देती है तथा जो स्वयं ही घण्टानाद और अनाहतध्वनिके रूपमें श्रवण्गोचर होते हैं उन महेश्वरको प्रणाम है

पाञ्चाल में पूजित, श्वेत-पर्वत पर विराजमान, सदा शान्त-मङ्गलस्वरूप महादेव को नमस्कार है। नन्दी की घण्टा-ध्वनि के स्वामी, जिनकी घण्टानाद शत्रुओं को भयभीत कर देती है, और जो स्वयं ही घण्टानाद तथा अनाहत (अन्तः) ध्वनि के रूप में श्रवणगम्य हैं—उन महेश्वर को बार-बार प्रणाम है।

Verse 99

सहस्राध्मातघण्टाय घण्टामालाप्रियाय च । प्राणघण्टाय गन्धाय नम: कलकलाय च

हज़ार बार फूँकी हुई-सी गूँजने वाली घण्टा-ध्वनि वाले को नमस्कार; घण्टों की माला जिन्हें प्रिय है उन्हें नमस्कार; जो प्राण-घण्टा (अन्तःप्राण की नाद-ध्वनि) हैं उन्हें नमस्कार; सुगन्धस्वरूप को नमस्कार; और मधुर कलकल-नादस्वरूप को भी नमस्कार।

Verse 100

जिनके मन्दिरमें लगे हुए घण्टोंको सहस्रों आदमी बजाते हैं, घण्टोंकी माला जिन्हें प्रिय है, जिनके प्राण ही घण्टाके समान ध्वनि करते हैं, जो ग्रन्थ और कोलाहलरूप हैं, उन भगवान्‌ शिवको नमस्कार है ।। हूंहूंहूंकारपाराय हूंहूंकारप्रियाय च । नम: शमशभमे नित्यं गिरिवृक्षालयाय च,आप हूं (क्रोध), हूं (हिंकार), हूं (आकाश, सूर्य और ईश्वर)--इन सबसे परे विद्यमान शान्तस्वरूप पखह् हैं, 'हूं' हूं' करना आपको प्रिय लगता है, आप “शान्त रहो” शान्त रहो! ऐसा कहकर सदा सबको आश्रासन देनेवाले हैं तथा पर्वतोंपर और वृक्षोंके नीचे निवास करते हैं। आपको प्रणाम है

जिनके मन्दिरों में सहस्रों जन घण्टे बजाते हैं, जिन्हें घण्टों की माला प्रिय है, जिनके प्राण ही घण्टा-ध्वनि के समान नाद करते हैं, जो ग्रन्थ और कोलाहलरूप भी हैं—उन भगवान् शिव को नमस्कार है। जो ‘हूँ-हूँ-हूँ’ के पार स्थित हैं, जिन्हें ‘हूँ-हूँ’ का नाद प्रिय है; जो नित्य “शान्त रहो, शान्त रहो” कहकर सबको आश्वासन देते हैं, और जो पर्वतों पर तथा वृक्षों के नीचे निवास करते हैं—उनको बार-बार प्रणाम है।

Verse 101

गर्भमांससूगालाय तारकाय तराय च । नमो यज्ञाय यजिने हुताय प्रहुताय च,आप फलके भीतरके गुद्देरूप मांसके प्रलोभी शृगालरूप हैं। आप ही सबको तारनेवाले तथा तरण-तारणके साधन हैं। आप ही यज्ञ और आप ही यजमान हैं। आप ही हुत (हवन) और आप ही प्रहुत (अग्नि) हैं। आपको नमस्कार है

फल के भीतर के गूदे-मांस के लोभी शृगालरूप को नमस्कार; तारने वाले तथा तरण-तारण के साधनस्वरूप को नमस्कार। यज्ञस्वरूप को नमस्कार, यजमानस्वरूप को नमस्कार; हुत (आहुति) को नमस्कार, और प्रहुत (अग्नि/जिसमें आहुति दी जाती है) को भी नमस्कार।

Verse 102

यज्ञवाहाय दान्ताय तप्यायातपनाय च | नमस्तटाय तट्याय तटानां पतये नमः

यज्ञ को वहन करने वाले, दान्त (संयमी) को, तप्य (तपःस्वरूप) तथा आतपन (तप-उष्णता सहने वाले) को नमस्कार। तट को नमस्कार, तटसम्बन्धी को नमस्कार; और समस्त तटों के स्वामी को भी नमस्कार।

Verse 103

आप ही यज्ञके निर्वाहक अथवा उसे सब देवताओंतक पहुँचानेवाले अग्निदेव हैं। आप मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले हैं। आप ही भक्तोंका कष्ट देखकर संतप्त होनेवाले तथा शत्रुओंको संताप देनेवाले हैं। आप ही तट हैं। आप ही तटवर्ती नदी आदि हैं तथा आप ही तटोंके पालक हैं। आपको नमस्कार है ।। अन्नदायान्नपतये नमस्त्वन्नभुजे तथा । नमः सहस््रशीर्षाय सहस्रचरणाय च,आप ही अन्नदाता, अन्नपति और अन्नके भोक्ता हैं। आपके सहस्रों मस्तक और सहस्रों चरण हैं। आपको बारंबार प्रणाम है

भीष्म बोले— आप ही यज्ञ के निर्वाहक हैं; आप ही अग्निदेव हैं जो हवि को सब देवताओं तक पहुँचाते हैं। आप मन और इन्द्रियों को वश में रखने वाले हैं। भक्तों का दुःख देखकर आप करुणा से संतप्त होते हैं और शत्रुओं को अपने तेज से संताप देते हैं। आप ही तट हैं; आप ही तटवर्ती नदी आदि हैं और आप ही तटों के पालक हैं। आपको नमस्कार है। आप ही अन्नदाता, अन्नपति और अन्न के भोक्ता हैं। आपके सहस्रों मस्तक और सहस्रों चरण हैं—आपको बारंबार प्रणाम है।

Verse 104

सहस्रोद्यतशूलाय सहस्रनयनाय च । नमो बालार्कवर्णाय बालरूपधराय च,आप अपने सहसौरों हाथोंमें सहस्रों शूल लिये रहते हैं। आपके सहसों नेत्र हैं। आपकी अंगकान्ति प्रात:कालीन सूर्यके समान देदीप्यमान है। आप बालकरूप धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है

भीष्म बोले— सहस्रों उठे हुए शूल धारण करने वाले और सहस्र नेत्रों वाले आपको नमस्कार है। आपकी कान्ति प्रातःकालीन सूर्य के समान दीप्तिमान है, और आप बालक-रूप धारण करते हैं—आपको प्रणाम है।

Verse 105

बालानुचरगोप्ताय बालक्रीडनकाय च । नमो वृद्धाय लुब्धाय क्षुब्धाय क्षोभणाय च,आप श्रीकृष्णरूपसे संगी-साथी बालकोंके रक्षक तथा बालकोंके साथ खेल करनेवाले हैं। आप सबकी अपेक्षा वृद्ध हैं। भक्ति और प्रेमके लोभी हैं। दुष्टोंके पापाचारसे क्षुब्ध हो उठते है और दुराचारियोंको क्षोभमें डालनेवाले हैं। आपको नमस्कार है

भीष्म बोले— बालकों और उनके संगियों के रक्षक तथा बालकों के साथ क्रीड़ा करने वाले आपको नमस्कार है। सबमें श्रेष्ठ-वृद्ध, भक्ति और प्रेम के लोभी, दुष्टों के पापाचार से क्षुब्ध होने वाले और दुराचारियों को क्षोभ में डालने वाले आपको प्रणाम है।

Verse 106

तरड्राड़कितकेशाय मुज्जकेशाय वै नमः । नम: षट्कर्मतुष्टाय त्रिकर्मनिरताय च

भीष्म बोले— जिनके केश रूखे-उलझे हुए हैं, जिनकी जटाएँ मुञ्ज के समान हैं—उन्हें नमस्कार है। जो षट्कर्मों से संतुष्ट रहते हैं और त्रिकर्मों में निरत रहते हैं—उन्हें प्रणाम है।

Verse 107

आपके केश गंगाके तरंगोंसे अंकित तथा मुञ्जके समान हैं। आपको नमस्कार है। आप ब्राह्मणोंके छ: कर्म--अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन तथा दान और प्रतिग्रहसे संतुष्ट रहते हैं; स्वयं यजन, अध्ययन और दानरूप तीन कर्मोंमें ही तत्पर रहते हैं। आपको मेरा प्रणाम है ।। वर्णाश्रमाणां विधिवत्‌ पृथक्कर्मनिवर्तिनि । नमो घुष्याय घोषाय नम: कलकलाय च

जिनके केश गंगा की तरंगों से अंकित और मुञ्ज के समान हैं, उन्हें नमस्कार है। जो ब्राह्मणों के छः कर्म—अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन, दान-प्रतिग्रह—से संतुष्ट रहते हैं और स्वयं यजन, अध्ययन तथा दान—इन तीन कर्मों में ही निरत रहते हैं, उन्हें मेरा प्रणाम है। जो वर्ण और आश्रमों के लिए विधिपूर्वक पृथक्-पृथक् कर्मों की मर्यादा स्थापित करते हैं—उस पवित्र नाद, उस घोष और उस कलकल-ध्वनि को नमस्कार है।

Verse 108

आप वर्ण और आश्रमोंके भिन्न-भिन्न कर्मोंका विधिवत्‌ विभाग करनेवाले, जपनीय मन्त्ररूप, घोषस्वरूप तथा कोलाहलमय हैं। आपको बारंबार नमस्कार है ।। श्वेतपिड्नलनेत्राय कृष्णरक्तेक्षणाय च । प्राणभग्नाय दण्डाय स्फोटनाय कृशाय च,आपके नेत्र श्वेत पिड़लवर्णके हैं, काले और लाल रंगके हैं। आप प्राणवायु (श्वास)को जीतनेवाले, दण्ड (आयुध) रूप, ब्रह्माण्डरूपी घटको फोड़नेवाले तथा कृश-शरीरधारी हैं। आपको नमस्कार है

आप वर्ण और आश्रमों के भिन्न-भिन्न कर्मों का विधिपूर्वक विभाग करनेवाले, जपनीय मन्त्र-स्वरूप, घोष-स्वरूप तथा कोलाहलमय हैं। आपको बार-बार नमस्कार है। आपके नेत्र कहीं श्वेत-पिङ्गल, कहीं कृष्ण और कहीं रक्तवर्ण हैं। आप प्राणवायु को जीतनेवाले, दण्ड (आयुध) रूप, ब्रह्माण्डरूपी घट को फोड़ देनेवाले तथा कृश-शरीरधारी हैं। आपको नमस्कार है॥

Verse 109

धर्मकामार्थमोक्षाणां कथनीयकथाय च । सांख्याय सांख्यमुख्याय सांख्ययोगप्रवर्तिने,धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष देनेके विषयमें आपकी कीर्तिकथा वर्णन करनेके योग्य है। आप सांख्यस्वरूप, सांख्ययोगियोंमें प्रधान तथा सांख्यशास्त्रको प्रवृत्त करनेवाले हैं। आपको प्रणाम है

धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष देने के विषय में आपकी कीर्तिकथा वर्णन करने योग्य है। आप सांख्यस्वरूप, सांख्ययोगियों में प्रधान तथा सांख्ययोग (सांख्यशास्त्र) को प्रवृत्त करने वाले हैं। आपको प्रणाम है॥

Verse 110

नमो रथ्यविरथ्याय चतुष्पथरथाय च । कृष्णाजिनोत्तरीयाय व्यालयज्ञोपवीतिने,आप रथपर बैठकर तथा बिना रथके भी घूमनेवाले हैं। जल, अग्नि, वायु तथा आकाश --इन चारों मार्गोपर आपकी गति है। आप काले मृगचर्मको दुपट्टेकी भाँति ओढ़नेवाले तथा सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करनेवाले हैं। आपको प्रणाम है

आप रथ्य (राजमार्ग) पर भी और विरथ्य (मार्ग से परे) भी विचरने वाले हैं; चतुष्पथ-रथ (चारों दिशाओं के चौराहे) पर आरूढ़ हैं। आप कृष्णाजिन को उत्तरीय की भाँति ओढ़ते हैं और सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करते हैं। आपको प्रणाम है॥

Verse 111

ईशान वज्संघात हरिकेश नमो<स्तु ते । त्रयम्बकाम्बिकनाथाय व्यक्ताव्यक्त नमोस्तु ते,ईशान! आपका शरीर वज्रके समान कठोर है। हरिकेश! आपको नमस्कार है। व्यक्ताव्यक्तस्वरूप परमेश्वर! आप त्रिनेत्रधारी तथा अम्बिकाके स्वामी हैं। आपको नमस्कार है

ईशान! वज्र-संघात के समान कठोर देहवाले! हरिकेश! आपको नमस्कार है। व्यक्त-अव्यक्तस्वरूप परमेश्वर! त्रिनेत्रधारी, अम्बिका के नाथ! आपको नमस्कार है॥

Verse 112

काम कामद कामघ्न तृप्तातृप्तविचारिणे । सर्व सर्वद सर्वघ्न संध्याराग नमोस्तु ते

हे काम! काम देनेवाले, काम का नाश करनेवाले; तृप्ति और अतृप्ति का विचार करनेवाले; हे सर्व! सर्व देनेवाले, सर्व का संहार करनेवाले; हे संध्याराग! आपको नमस्कार है॥

Verse 113

आप कामस्वरूप, कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, कामदेवके नाशक, तृप्त और अतृप्तका विचार करनेवाले, सर्वस्वरूप, सब कुछ देनेवाले, सबके संहारक और संध्याकालके समान रंगवाले हैं। आपको प्रणाम है ।। महाबल महाबाहो महासत्त्व महाद्युते । महामेघचयप्रख्य महाकाल नमोस्तु ते,महाबल! महाबाहो! महासत्त्व! महाद्युते! आप महान्‌ मेघोंकी घटाके समान रंगवाले महाकालस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है

भीष्म बोले— आप कामस्वरूप हैं, समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाले और कामदेव का भी संहार करनेवाले हैं। आप तृप्ति और अतृप्ति का विवेक करनेवाले, सर्वस्वरूप, सब कुछ देनेवाले और सबका लय करनेवाले हैं। आपका वर्ण संध्याकाल के समान है—आपको प्रणाम है। हे महाबल! हे महाबाहो! हे महासत्त्व! हे महाद्युते! घनघोर मेघसमूह के समान श्याम महाकाल! आपको नमस्कार है।

Verse 114

स्थूल जीर्णाड़ जटिले वलल्‍्कलाजिनधारिणे । दीप्तसूर्याग्निजटिले वलकलाजिनवाससे । सहसतसूर्यप्रतिम तपोनित्य नमो<स्तु ते,आपका श्रीविग्रह स्थूल और जीर्ण है। आप जटाधारी हैं। वलकल और मृगचर्म धारण करते हैं। देदीप्यमान सूर्य और अग्निके समान ज्योतिर्मयी जटासे सुशोभित हैं। वल्कल और मृगचर्म ही आपके वस्त्र हैं। आप सहस्रों सूर्योके समान प्रकाशमान और सदा तपस्यामें संलग्न रहनेवाले हैं। आपको नमस्कार है

भीष्म बोले— आपका श्रीविग्रह स्थूल और जीर्ण है; आप जटाधारी हैं, वल्कल और मृगचर्म धारण करते हैं। आपकी जटाएँ सूर्य और अग्नि के समान दीप्तिमान हैं; वल्कल और मृगचर्म ही आपके वस्त्र हैं। आप सहस्र सूर्यों के समान प्रकाशमान और सदा तपस्या में रत हैं—आपको नमस्कार है।

Verse 115

उन्मादन शतावर्त गज्भातोयाद्रमूर्थज । चन्द्रावर्त युगावर्त मेघावर्त नमो<स्तु ते,आप जगत्‌को उन्माद (मोह)-में डालनेवाले हैं। आपके मस्तकपर गंगाजीकी सैकड़ों लहरें और भँवरें उठती रहती हैं। आपके केश सदा गंगाजलसे भीगे रहते हैं। आप चन्द्रमाको क्षय-वृद्धिके चक्‍करमें डालनेवाले हैं। आप ही युगोंकी पुनरावृत्ति करनेवाले और मेघोंके प्रवर्तक हैं। आपको नमस्कार है

भीष्म बोले— हे जगत् को उन्माद (मोह) में डालनेवाले! जिनके मस्तक पर गंगा की सैकड़ों तरंगें और भँवर उठते रहते हैं, जिनकी जटाएँ सदा उसके जल से भीगी रहती हैं; हे चन्द्रमा को क्षय-वृद्धि के चक्र में डालनेवाले, युगों की पुनरावृत्ति करानेवाले, और मेघों को प्रवर्तित करनेवाले—आपको नमस्कार है।

Verse 116

त्वमन्नमन्नभोक्ता च अन्नदोऊन्नभुगेव च | अन्नस्रष्टा च पक्ता च पक्‍वभुक्पवनोडनल:,आप ही अन्न, अन्नके भोक्ता, अन्नदाता, अन्नका पालन करनेवाले, अन्नस्रष्टा, पाचक, पक्‍्वान्नरभोजी, प्राणवायु तथा जठरानलरूप हैं

भीष्म बोले— आप ही अन्न हैं, अन्न के भोक्ता हैं; आप ही अन्नदाता हैं और अन्न का भोग करनेवाले भी। आप ही अन्न के स्रष्टा हैं, उसे पकानेवाले हैं, और पके हुए अन्न के भक्षक हैं; आप ही प्राणवायु और जठरानल हैं।

Verse 117

जरायुजाण्डजाश्रैव स्वेदजाश्व तथोद्धिजा: । त्वमेव देवदेवेश भूतग्रामश्चतुर्विध:

भीष्म बोले— हे देवदेवेश! जरायुज, अण्डज, स्वेदज तथा उद्भिज—ये चारों प्रकार के समस्त प्राणीसमूह वास्तव में आप ही हैं।

Verse 118

देवदेवेश्वर! जरायुज, अण्डज, स्वेदज तथा उद्धिज्ज--ये चार प्रकारके प्राणिसमूह आप ही हैं ।। चराचरस्य स्रष्टा त्वं प्रतिहर्ता तथैव च । त्वामाहुर्ब्रह्मविदुषो ब्रह्म ब्रह्मविदां वर,ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आप ही चराचर जीवोंकी सृष्टि तथा संहार करनेवाले हैं। ब्रह्मज्ञानी पुरुष आपहीको ब्रह्म कहते हैं

देवदेवेश्वर! जरायुज, अण्डज, स्वेदज तथा उद्भिज्ज—ये चारों प्रकार के प्राणीसमूह आप ही हैं। चराचर जगत् के स्रष्टा भी आप हैं और प्रलय में संहार करने वाले भी। ब्रह्मवेत्ता आपको ही ब्रह्म कहते हैं—हे ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ!

Verse 119

मनस: परमा योनि: खं वायुज्योतिषां निधि: । ऋक्सामानि तथोड्-कारमाहुस्त्वां ब्रह्मवादिन:,वेदवादी विद्वान्‌ आपको ही मनका परम कारण, आकाश, वायु, तेजकी निधि, ऋक्‌, साम तथा ३“कार बताते हैं

वेदवादी ब्रह्मज्ञानी आपको ही मन की परम योनि, आकाश, वायु और तेज का निधि कहते हैं। वे आपको ही ऋक्, साम और पवित्र ओंकार भी बताते हैं।

Verse 120

हायिहायिहुवाहायिहाबुहायि तथा5सकृत्‌ । गायन्ति त्वां सुरश्रेष्ठ सामगा ब्रह्म॒वादिन:,सुरश्रेष्ठ! सामगान करनेवाले वेदवेत्ता पुरुष “हा ३ यि, हा ३ यि, हू ३ वा, हा ३ यि, हा ३ वु, हा ३ यि' आदिका बारंबार उच्चारण करके निरन्तर आपकी ही महिमाका गान करते हैं

सुरश्रेष्ठ! सामगान करने वाले वेदवेत्ता ब्रह्मवादी ‘हा-यि हा-यि, हू-वा हा-यि, हा-बु हा-यि’ आदि ध्वनियों का बारंबार उच्चारण करके निरन्तर आपकी ही महिमा गाते हैं।

Verse 121

यजुर्मयो ऋड्मयश्न त्वमाहुतिमयस्तथा । पठ्यसे स्तुतिभिश्चिव वेदोपनिषदां गणै:,यजुर्वेद और ऋग्वेद आपके ही स्वरूप हैं। आप ही हविष्य हैं। वेदों और उपनिषदोंके समूह अपनी स्तुतियोंद्वारा आपकी ही महिमाका प्रतिपादन करते हैं

आप यजुर्वेदमय और ऋग्वेदमय हैं; आप ही आहुति के स्वरूप भी हैं। वेदों और उपनिषदों के समूह अपनी स्तुतियों द्वारा आपके ही यश का पाठ करते हैं।

Verse 122

ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्रा वर्णावराश्च ये त्वमेव मेघसंघाश्न विद्युत्स्तनितगर्जित:,ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्त्यज--ये आपके ही स्वरूप हैं। मेघोंकी घटा, बिजली, गर्जना और गड़गड़ाहट भी आप ही हैं

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा वर्णव्यवस्था से बाहर के लोग—ये सब आपके ही स्वरूप हैं। मेघों की घटा, बिजली, स्तनित और गर्जना भी आप ही हैं।

Verse 123

संवत्सरस्त्वमृतवों मासो मासार्धमेव च । युगं निमेषा: काष्ठास्त्वं नक्षत्राणि ग्रहा: कला:,संवत्सर, ऋतु, मास, पक्ष, युग, निमेष, काष्ठा, नक्षत्र, ग्रह और कला भी आप ही हैं

संवत्सर और ऋतुएँ आप ही हैं; मास और पक्ष भी आप ही हैं। युग, निमेष और काष्ठा आप ही हैं; नक्षत्र, ग्रह और कलाएँ भी आप ही हैं।

Verse 124

वृक्षाणां ककुदो5सि त्वं गिरीणां शिखराणि च । व्याप्रो मृगाणां पततां ताक्ष्योडनन्तश्न भोगिनाम्‌,वृक्षोंमें प्रधान वट-पीपल आदि, पर्वतोंमें उनके शिखर, वन-जन्तुओंमें व्याप्र, पक्षियोंमें गरुड़ तथा सर्पोमें अनन्त आप ही हैं

वृक्षों में आप ही प्रधान (वट-पीपल आदि) हैं और पर्वतों में आप ही उनके शिखर हैं। मृगों में आप व्याघ्र हैं; पक्षियों में ताक्ष्य (गरुड़) और सर्पों में अनन्त आप ही हैं।

Verse 125

क्षीरोदो हुदधीनां च यन्त्राणां धनुरेव च । वज्र: प्रहरणानां च व्रतानां सत्यमेव च,समुद्रोंमें क्षीरसागर, यन्त्रों (अस्त्रों)-में धनुष, चलाये जानेवाले आयुधोंमें वज्र और व्रतोंमें सत्य भी आप ही हैं

समुद्रों में आप क्षीरसागर हैं; यन्त्रों और अस्त्रों में आप धनुष हैं। प्रहार करनेवाले आयुधों में आप वज्र हैं; और व्रतों में आप सत्य ही हैं।

Verse 126

त्वमेव द्वेष इच्छा च रागो मोह: क्षमाक्षमे । व्यवसायो धृतिलोंभ: कामक्रोधौ जयाजयौ

द्वेष और इच्छा आप ही हैं; राग और मोह भी आप ही हैं; क्षमा और अक्षमा भी आप ही हैं। व्यवसाय, धृति और लोभ आप ही हैं; काम और क्रोध, तथा जय और पराजय भी आप ही हैं।

Verse 127

आप ही द्वेष, इच्छा, राग, मोह, क्षमा, अक्षमा, व्यवसाय, धैर्य, लोभ, काम, क्रोध, जय तथा पराजय हैं ।। त्वं गदी त्वं शरी चापी खट्वाजी झर्झरी तथा । छेत्ता भेत्ता प्रहर्ता त्वं नेता मन्ता पिता मत:,आप गदा, बाण, धनुष, खाटका अंग तथा झर्झर नामक अस्त्र धारण करनेवाले हैं। आप छेदन, भेदन और प्रहार करनेवाले हैं। सत्पथपर ले जानेवाले, शुभका मनन करनेवाले तथा पिता माने गये हैं

आप गदा हैं, आप ही बाण और धनुष हैं; आप खट्वाङ्ग और झर्झरी भी धारण करनेवाले हैं। आप छेदन, भेदन और प्रहार करनेवाले हैं; आप सत्पथ पर ले जानेवाले नेता, शुभ का मनन करनेवाले मन्त्रा, और पिता माने गये हैं।

Verse 128

दशलक्षणसंयुक्तो धर्मोडर्थ: काम एव च | गड्जा समुद्रा: सरित: पल्‍्चलानि सरांसि च,दस लक्षणोंवाला धर्म तथा अर्थ और काम भी आप ही हैं। गंगा, समुद्र, नदियाँ, गड़हे, तालाब, लता, वल्ली, तृण, ओषधि, पशु, मृग, पक्षी, द्रव्य और कर्मोके आरम्भ तथा फूल और फल देनेवाला काल भी आप ही हैं

दस लक्षणों से युक्त धर्म, अर्थ और काम भी आप ही हैं। गंगा, समुद्र, नदियाँ, गड्ढे, तालाब और सरोवर भी आप ही हैं।

Verse 129

लता वल्यस्तृणौषध्य: पशवो मृगपक्षिण: । द्रव्यकर्मसमारम्भ: काल: पुष्पफलप्रद:,दस लक्षणोंवाला धर्म तथा अर्थ और काम भी आप ही हैं। गंगा, समुद्र, नदियाँ, गड़हे, तालाब, लता, वल्ली, तृण, ओषधि, पशु, मृग, पक्षी, द्रव्य और कर्मोके आरम्भ तथा फूल और फल देनेवाला काल भी आप ही हैं

लता, वल्ली, तृण और औषधियाँ; पशु, मृग और पक्षी—ये सब आप ही हैं। द्रव्य और कर्म के आरम्भ तथा पुष्प-फल देनेवाला काल भी आप ही हैं।

Verse 130

आदिद्नान्तश्न देवानां गायत्रयोंकार एव च | हरितो रोहितो नील: कृष्णो रक्तस्तथारुण: । कद्रुश्न कपिलश्चैव कपोतो मेचकस्तथा,आप देवताओंके आदि और अन्त हैं। गायत्री-मन्त्र और ३>कार भी आप ही हैं। हरित, लोहित, नील, कृष्ण, रक्त, अरुण, कद्रु, कपिल, कबूतरके समान तथा मेचक (श्याम मेघके समान)--ये दस प्रकारके रंग भी आपके ही स्वरूप हैं

आप देवताओं के आदि और अन्त हैं। गायत्री-मन्त्र और पवित्र ॐकार भी आप ही हैं। हरित, लोहित, नील, कृष्ण, रक्त, अरुण, कद्रु, कपिल, कपोत-सम तथा मेचक—ये दस प्रकार के वर्ण भी आपके ही रूप हैं।

Verse 131

अवर्णश्न सुवर्णश्र॒ वर्णकारो घनोपम: । सुवर्णनामा च तथा सुवर्णप्रिय एव च,आप वर्णरहित होनेके कारण अवर्ण और अच्छे वर्णवाले होनेसे सुवर्ण कहलाते हैं। आप वर्णोके निर्माता और मेघके समान हैं। आपके नाममें सुन्दर वर्णों (अक्षरों)-का उपयोग हुआ है, इसलिये आप सुवर्णनामा हैं तथा आपको श्रेष्ठ वर्ण प्रिय है

आप वर्णरहित होने से ‘अवर्ण’ और श्रेष्ठ होने से ‘सुवर्ण’ कहलाते हैं। आप वर्णों के कर्ता हैं और घन के समान हैं। सुन्दर अक्षरों से युक्त नाम होने के कारण आप ‘सुवर्णनामा’ हैं और आपको श्रेष्ठ वर्ण प्रिय हैं।

Verse 132

त्वमिन्द्रश्न यमश्नैव वरुणो धनदो5नल: । उपप्लवश्षित्रभानु: स्वर्भानुर्भानुरेव च,आप ही इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर, अग्नि, सूर्य-चन्द्रका ग्रहण, चित्रभानु (सूर्य), राहु और भानु हैं

आप ही इन्द्र और यम हैं; वरुण, धनद कुबेर और अनल अग्नि भी आप ही हैं। उपप्लव (ग्रहण), चित्रभानु (सूर्य), स्वर्भानु (राहु) और भानु भी आप ही हैं।

Verse 133

होत्रं होता च होम्यं च हुतं चैव तथा प्रभु: । त्रिसौपर्ण तथा ब्रह्म यजुषां शतरुद्रियम्‌,होत्र (खुवा), होता, हवनीय पदार्थ, हवन-क्रिया तथा (उसके फल देनेवाले) परमेश्वर भी आप ही हैं। वेदकी त्रिसौपर्ण नामक श्रुतियोंमें तथा यजुर्वेदके शतरुद्रिय-प्रकरणमें जो बहुत-से वैदिक नाम हैं, वे सब आपहीके नाम हैं

भीष्म ने कहा—होत्र, होता, हवनीय पदार्थ, हवन-क्रिया और अग्नि में अर्पित आहुति—ये सब आप ही हैं; और उस यज्ञ का फल देने वाले प्रभु भी आप ही हैं। त्रिसौपर्ण श्रुतियों में तथा यजुर्वेद के शतरुद्रिय-प्रकरण में जो-जो वैदिक नाम कहे गए हैं, वे सब अंततः आपके ही नाम हैं।

Verse 134

पवित्र च पवित्राणां मड़लानां च मड्जलम्‌ | गिरिको हिंडुको वृक्षो जीव: पुद्गल एव च,आप पवित्रोंके भी पवित्र और मंगलोंके भी मंगल हैं। आप ही गिरिक (अचेतनको भी चेतन करनेवाले), हिंडुक (गमनागमन करनेवाले), संसार-वृक्ष, जीव, शरीर, प्राण, सत्त्व, रज, तम, अप्रमद (स्त्रीरहित--ऊर्ध्वरेता), प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, उन्मेष, निमेष (आँखोंका खोलना-मींचना), छींकना और जँभाई लेना आदि चेष्टाएँ भी आप ही हैं। आपकी अग्निमयी लाल रंगकी दृष्टि भीतर छिपी हुई है। आपके मुख और उदर महान्‌ हैं

भीष्म ने कहा—आप पवित्रों में भी परम पवित्र और मंगलों में भी परम मंगल हैं। आप ही ‘गिरिक’ हैं—जो जड़ में भी चेतना जगाते हैं; आप ही ‘हिंडुक’ हैं—जो गमनागमन करने वाले हैं; आप ही संसार-वृक्ष, जीव और देहधारी पुरुष हैं।

Verse 135

प्राण: सत्त्वं रजश्नैव तमश्नाप्रमदस्तथा । प्राणो5पान: समानश्च उदानो व्यान एव च,आप पवित्रोंके भी पवित्र और मंगलोंके भी मंगल हैं। आप ही गिरिक (अचेतनको भी चेतन करनेवाले), हिंडुक (गमनागमन करनेवाले), संसार-वृक्ष, जीव, शरीर, प्राण, सत्त्व, रज, तम, अप्रमद (स्त्रीरहित--ऊर्ध्वरेता), प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, उन्मेष, निमेष (आँखोंका खोलना-मींचना), छींकना और जँभाई लेना आदि चेष्टाएँ भी आप ही हैं। आपकी अग्निमयी लाल रंगकी दृष्टि भीतर छिपी हुई है। आपके मुख और उदर महान्‌ हैं

भीष्म ने कहा—आप ही प्राण हैं; आप ही प्रकृति के गुण—सत्त्व, रज और तम—हैं; और आप ही अप्रमाद, अर्थात् सतत जागरूक संयम हैं। देह के भीतर प्रवहमान प्राण-धाराएँ भी आप ही हैं—प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान।

Verse 136

उन्मेषश्व निमेषश्च क्षुतं जृम्भितमेव च । लोहितान्तर्गता दृष्टिमहावक्त्रो महोदर:,आप पवित्रोंके भी पवित्र और मंगलोंके भी मंगल हैं। आप ही गिरिक (अचेतनको भी चेतन करनेवाले), हिंडुक (गमनागमन करनेवाले), संसार-वृक्ष, जीव, शरीर, प्राण, सत्त्व, रज, तम, अप्रमद (स्त्रीरहित--ऊर्ध्वरेता), प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, उन्मेष, निमेष (आँखोंका खोलना-मींचना), छींकना और जँभाई लेना आदि चेष्टाएँ भी आप ही हैं। आपकी अग्निमयी लाल रंगकी दृष्टि भीतर छिपी हुई है। आपके मुख और उदर महान्‌ हैं

भीष्म ने कहा—आँखों का खुलना और मींचना, छींकना और जँभाई लेना—ये क्रियाएँ भी आप ही हैं। आपकी अग्निमयी, लाल-आभा वाली दृष्टि भीतर छिपी रहती है; आपका मुख विशाल है और आपका उदर भी विशाल है।

Verse 137

सूचीरोमा हरिश्मश्रुरूर्ध्वकेशश्वलाचल: । गीतवादित्रतत्त्वज्ञो गीतवादनकप्रिय:,रोएँ सूईके समान हैं। दाढ़ी-मूछ काली है। सिरके बाल ऊपरकी ओर उठे हुए हैं। आप चराचर-स्वरूप हैं। गाने-बजानेके तत्त्वको जाननेवाले हैं। गाना-बजाना आपको अधिक प्रिय है

भीष्म ने कहा—आपके रोएँ सूई के समान हैं; आपकी दाढ़ी-मूँछ काली है; सिर के बाल ऊपर की ओर उठे हुए हैं। आप चर और अचर—दोनों के स्वरूप हैं। आप गीत और वाद्य के तत्त्व को जानने वाले हैं, और गाना-बजाना आपको विशेष प्रिय है।

Verse 138

मत्स्यो जलचरो जाल्यो5कल: केलिकल: कलि: । अकालकश्चातिकाल श्र दुष्काल: काल एव च,आप मत्स्य, जलचर और जालधारी घड़ियाल हैं। फिर भी अकल (बन्धनसे परे) हैं। आप केलिकलासे युक्त और कलहरूप हैं। आपही अकाल, अतिकाल, दुष्काल तथा काल हैं

भीष्म ने कहा— आप ही मत्स्य हैं, जलचर हैं और जालधारी घड़ियाल भी; फिर भी आप ‘अकाल’ हैं—बंधन और सीमा से परे। आप क्रीड़ा-स्वरूप हैं और आप ही कलि भी हैं। आप ही अकाल, अतिकाल, दुष्काल तथा स्वयं काल हैं।

Verse 139

मृत्यु: क्षुरश्व॒ कृत्यश्व पक्षोडपक्षक्षयंकर: । मेघकालो महादंष्ट: संवर्तकबलाहक:

भीष्म ने कहा— मृत्यु आप ही हैं—क्षुरधार-तुल्य अश्व, कर्तव्य-प्रेरित भयावह अश्व; पंख वाले और पंख-रहित—सबका क्षय करने वाले। आप मेघ-समय के समान श्याम, महादंष्ट्र, और प्रलयकालीन संवर्तक मेघ के तुल्य हैं।

Verse 140

मृत्यु, क्षुर॒ .छेदन करनेका शस्त्र), कृत्य (छेदन करने योग्य), पक्ष (मित्र) तथा अपक्ष- क्षयंकर (शत्रुपक्षका नाश करनेवाले) भी आप ही हैं। आप मेघके समान काले, बड़ी-बड़ी दाढ़ोंवाले और प्रलयकालीन मेघ हैं ।। घण्टोडघण्टो घटी घण्टी चरुचेली मिलीमिली । ब्रह्मकायिकमग्नीनां दण्डी मुण्डस्त्रिदण्डधूक्‌ू,घण्ट (प्रकाशवान), अघण्ट (अव्यक्त प्रकाशवाले), घटी (कर्मफलसे युक्त करनेवाले), घण्टी (घण्टावाले), चरुचेली (जीवोंके साथ क्रीडा करनेवाले) तथा मिली-मिली (कारणरूपसे सबमें व्याप्त)--ये सब आप ही हैं। आप ही ब्रह्म, अग्नियोंके स्वरूप, दण्डी, मुण्ड तथा त्रिदण्डधारी हैं

भीष्म ने कहा— मृत्यु आप ही हैं; आप ही क्षुर—छेदन करने वाला शस्त्र, आप ही कृत्य और छेद्य भी। आप ही पक्ष (मित्र) और अपक्ष-क्षयकर (शत्रुपक्ष का नाश करने वाले) हैं। आप मेघ-श्याम, महादंष्ट्र, और प्रलयकालीन मेघ के समान हैं। ‘घण्ट’, ‘अघण्ट’, ‘घटी’, ‘घण्टी’, ‘चरुचेली’ और ‘मिली-मिली’—ये सब भी आप ही हैं; जो प्रकट और अप्रकट करते, कर्मफल से बाँधते, लोकों में निनाद करते, जीवों से क्रीड़ा करते और कारणरूप से सर्वत्र व्याप्त रहते हैं। आप ही ब्रह्म हैं; आप ही अग्नियों के स्वरूप; आप ही दण्डी, मुण्ड और त्रिदण्डधारी हैं।

Verse 141

चतुर्युगश्चतुर्वेदश्नातुहोत्रप्रवर्तक: । चातुराश्रम्यनेता च चातुर्व्ण्यकरश्न यः,चार युग और चार वेद आपके ही स्वरूप हैं तथा चार प्रकारके होतृ-कर्मोंके प्रवर्तक आप ही हैं। आप चारों आश्रमोंके नेता तथा चारों वर्णोकी सृष्टि करनेवाले हैं

भीष्म ने कहा— चार युग और चार वेद आपके ही स्वरूप हैं। चार प्रकार के होतृ-कर्मों के प्रवर्तक आप ही हैं। आप चारों आश्रमों के नेता हैं और चारों वर्णों की सृष्टि व व्यवस्था करने वाले भी आप ही हैं।

Verse 142

सदा चारक्षप्रियो धूर्तो गणाध्यक्षो गणाधिप: । रक्तमाल्याम्बरधरो गिरिशो गिरिकप्रिय:,आप ही अक्षप्रिय, धूर्त, गणाध्यक्ष और गणाधिप आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं। आप रक्त वस्त्र तथा लाल फूलोंकी माला पहनते हैं, पर्वतपर शयन करते और गेरुए वस्त्रसे प्रेम रखते हैं

भीष्म ने कहा— आप सदा चौसर (अक्ष) के प्रिय, धूर्त, गणाध्यक्ष और गणाधिप के नाम से प्रसिद्ध हैं। आप रक्त वस्त्र और लाल पुष्पों की माला धारण करते हैं; आप गिरिश—पर्वतों के स्वामी हैं और पर्वतों को प्रिय मानते हैं।

Verse 143

शिल्पिक: शिसल्पिनां श्रेष्ठ: सर्वशिल्पप्रवर्तक: । भगनेत्राड्कुशश्वण्ड: पूष्णो दन्‍तविनाशन:

भीष्म बोले— आप शिल्पियों में परम श्रेष्ठ शिल्पी हैं, समस्त शिल्पों के प्रवर्तक और प्रवर्धक हैं। आप ही वह हैं जिन्होंने भगदेवता की आँख फोड़ी; आप ही ने पूषा के दाँत तोड़े। अंकुश और दण्ड धारण करने वाले, चण्ड—दोष का दमन कर व्यवस्था स्थापित करने वाले—आप ही स्मरणीय हैं।

Verse 144

आप ही शिसल्पियोंमें सर्वश्रेष्ठ शिल्पी (कारीगर) तथा सब प्रकारकी शिल्पकलाके प्रवर्तवक हैं। आप भगदेवताकी आँख फोड़नेके लिये अंकुश, चण्ड (अत्यन्त कोप करनेवाले) और पूषाके दाँत नष्ट करनेवाले हैं ।। स्वाहा स्वथा वषट्कारो नमस्कारो नमो नमः । गूढव्रतो गुह्दतपास्तारकस्तारकामय:,स्वाहा, स्वधा, वषट्‌ू-नमस्कार और नमो नम: आदि पद आपके ही नाम हैं। आप गूढ़ व्रतधारी, गुप्त तपस्या करनेवाले, तारकमन्त्र और ताराओंसे भरे हुए आकाश हैं

भीष्म बोले— आप ही शिल्पियों में सर्वश्रेष्ठ हैं और समस्त शिल्पकलाओं के प्रवर्तक हैं। आप ही अंकुश हैं जिसने भग की आँख फोड़ी; आप चण्ड हैं; आप ही पूषा के दाँत नष्ट करने वाली शक्ति हैं। ‘स्वाहा’, ‘स्वधा’, ‘वषट्’, ‘नमस्कार’ और ‘नमो नमः’—ये यज्ञोच्चार भी आपके नाम हैं। आप गूढ़ व्रतधारी, गुप्त तप करने वाले, तारक-मन्त्र और ताराओं से भरा आकाश हैं।

Verse 145

धाता विधाता संधाता विधाता धारणोडधर: । ब्रह्मा तपश्च सत्यं च ब्रह्म॒चर्यमथार्जवम्‌,धाता (धारण करनेवाले), विधाता (सृष्टि करनेवाले), संधाता (जोड़नेवाले), विधाता, धारण और अधर (आधाररहित) भी आपहीके नाम हैं। आप ब्रह्मा, तप, सत्य, ब्रह्मचर्य आर्जव (सरलता), भूतात्मा (प्राणियोंके आत्मा), भूतोंकी सृष्टि करनेवाले, भूत (नित्यसिद्ध), भूत, भविष्य और वर्तमानकी उत्पत्तिके कारण, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, ध्रुव (स्थिर), दान्त (दमनशील) और महेश्वर हैं

भीष्म बोले— आप धाता हैं, विधाता हैं, संधाता हैं, नियन्ता हैं; आप ही धारण करने वाले हैं और आप ही वह हैं जो किसी आधार पर आश्रित नहीं। आप ब्रह्मा हैं; आप तप हैं और सत्य हैं; आप ब्रह्मचर्य और आर्जव—सरलता व निष्कपटता—हैं।

Verse 146

भूतात्मा भूतकृद्धूतो भूतभव्यभवोद्धव: । भूर्भुव: स्वरितश्वैव ध्रुवो दान्तो महेश्वर:,धाता (धारण करनेवाले), विधाता (सृष्टि करनेवाले), संधाता (जोड़नेवाले), विधाता, धारण और अधर (आधाररहित) भी आपहीके नाम हैं। आप ब्रह्मा, तप, सत्य, ब्रह्मचर्य आर्जव (सरलता), भूतात्मा (प्राणियोंके आत्मा), भूतोंकी सृष्टि करनेवाले, भूत (नित्यसिद्ध), भूत, भविष्य और वर्तमानकी उत्पत्तिके कारण, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, ध्रुव (स्थिर), दान्त (दमनशील) और महेश्वर हैं

भीष्म बोले— आप समस्त प्राणियों के अन्तरात्मा हैं और प्राणियों के स्रष्टा हैं; आप शुद्ध, अचल सत्ता हैं; भूत, भविष्य और वर्तमान की उत्पत्ति का मूल आप ही हैं। आप ही ‘भूः’, ‘भुवः’, ‘स्वः’—तीनों लोक हैं; आप ध्रुव—अटल—हैं; आप दान्त—संयमी—हैं; और आप महेश्वर हैं।

Verse 147

दीक्षितो<दीक्षित: क्षान्तो दुर्दान्तो5दान्तनाशन: । चन्द्रावर्तों युगावर्त: संवर्त: सम्प्रवर्तक:,दीक्षित (यज्ञकी दीक्षा लेनेवाले), अदीक्षित, क्षमावान्‌, दुर्दान्त, उद्दण्ड प्राणियोंका नाश करनेवाले, चन्द्रमाकी आवृत्ति करनेवाले (मास), युगोंकी आवृत्ति करनेवाले (कल्प), संवर्त (प्रलय) तथा सम्प्रवर्तक (पुन: सृष्टि-संचालन करनेवाले) भी आप ही हैं

भीष्म बोले— आप दीक्षित भी हैं और अदीक्षित भी; आप क्षान्त—क्षमाशील—हैं; आप दुर्दान्तों का दमन करने वाले, उद्दण्ड और असंयमी का नाश करने वाले हैं। आप चन्द्र की आवृत्ति—मास-चक्र—हैं; आप युगों की आवृत्ति—युग-चक्र—हैं; आप संवर्त—प्रलय—हैं; और आप ही सम्प्रवर्तक—पुनः सृष्टि को चलाने वाले—हैं।

Verse 148

कामो बिन्दुरणु: स्थूल: कर्णिकारख््रजप्रिय: । नन्दीमुखो भीममुख: सुमुखो दुर्मुखो5मुख:,आप ही काम, बिन्दु, अणु (सूक्ष्म) और स्थूलरूप हैं। आप कनेरके फूलकी माला अधिक पसंद करते हैं। आप ही नन्दीमुख, भीममुख (भयंकर मुखवाले), सुमुख, दुर्मुख, अमुख (मुखरहित), चतुर्मुख, बहुमुख तथा युद्धके समय शत्रुका संहार करनेके कारण अग्निमुख (अग्निके समान मुखवाले) हैं। हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), शकुनि (पक्षीके समान असंग), महान्‌ सर्पोंके स्वामी (शेषनाग) और विराट भी आप ही हैं

भीष्म बोले— आप ही काम हैं—बिन्दु भी, अणु भी और स्थूल, प्रकट रूप भी। आपको कर्णिकार (कनेर) के पुष्पों की माला प्रिय है। आप नन्दीमुख, भीममुख, सुमुख, दुर्मुख और अमुख भी कहलाते हैं।

Verse 149

चतुर्मुखो बहुमुखो रणेष्वग्निमुखस्तथा । हिरण्यगर्भ: शकुनिर्महोरगपतिर्विराट्‌,आप ही काम, बिन्दु, अणु (सूक्ष्म) और स्थूलरूप हैं। आप कनेरके फूलकी माला अधिक पसंद करते हैं। आप ही नन्दीमुख, भीममुख (भयंकर मुखवाले), सुमुख, दुर्मुख, अमुख (मुखरहित), चतुर्मुख, बहुमुख तथा युद्धके समय शत्रुका संहार करनेके कारण अग्निमुख (अग्निके समान मुखवाले) हैं। हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), शकुनि (पक्षीके समान असंग), महान्‌ सर्पोंके स्वामी (शेषनाग) और विराट भी आप ही हैं

भीष्म बोले— आप चतुर्मुख और बहुमुख हैं; रणभूमि में शत्रु का भक्षण करने वाले ‘अग्निमुख’ हैं। आप हिरण्यगर्भ, शकुनि, महोरगपति और विराट् भी आप ही हैं।

Verse 150

अधर्महा महापार्श्चक्षण्डधारो गणाधिप: । गोनर्दो गोप्रतारश्न॒ गोवृषेश्चवरवाहन:,आप अधर्मके नाशक, महापार्श्च, चण्डधार, गणाधिप, गोनर्द, गौओंको आपत्तिसे बचानेवाले, नन्‍न्दीकी सवारी करनेवाले, त्रैलोक्यरक्षक, गोविन्द (श्रीकृष्णरूप), गोमार्ग (इन्द्रियोंके संचालक), अमार्ग (इन्द्रियोंके अगोचर), श्रेष्ठ, स्थिर, स्थाणु, निष्कम्प, कम्प, दुर्वरण (जिनका सामना करना कठिन है, ऐसे), दुर्विषह (असहा वेगवाले), दुःसह, दुर्लडघ्य, दुर्द्धर्ष, दुष्प्र कम्प, दुर्विष, दुर्जय, जय, शश (शीघ्रगामी), शशांक (चन्द्रमा) तथा शमन (यमराज) हैं। सर्दी-गर्मी, क्षुधा, वृद्धावस्था तथा मानसिक चिन्ताको दूर करनेवाले भी आप ही हैं। आप ही आधि-व्याधि तथा उसे दूर करनेवाले हैं

भीष्म बोले— आप अधर्म का नाश करने वाले, महापार्श्व, चण्डधार, गणाधिप हैं। आप गोनर्द हैं; संकट में गौओं के रक्षक हैं; गोवृष हैं और श्रेष्ठ वाहन पर आरूढ़ हैं।

Verse 151

त्रैलोक्यगोप्ता गोविन्दो गोमार्गोडमार्ग एव च | श्रेष्ठ: स्थिरश्न स्थाणुश्न निष्कम्प: कम्प एव च,आप अधर्मके नाशक, महापार्श्च, चण्डधार, गणाधिप, गोनर्द, गौओंको आपत्तिसे बचानेवाले, नन्‍न्दीकी सवारी करनेवाले, त्रैलोक्यरक्षक, गोविन्द (श्रीकृष्णरूप), गोमार्ग (इन्द्रियोंके संचालक), अमार्ग (इन्द्रियोंके अगोचर), श्रेष्ठ, स्थिर, स्थाणु, निष्कम्प, कम्प, दुर्वरण (जिनका सामना करना कठिन है, ऐसे), दुर्विषह (असहा वेगवाले), दुःसह, दुर्लडघ्य, दुर्द्धर्ष, दुष्प्र कम्प, दुर्विष, दुर्जय, जय, शश (शीघ्रगामी), शशांक (चन्द्रमा) तथा शमन (यमराज) हैं। सर्दी-गर्मी, क्षुधा, वृद्धावस्था तथा मानसिक चिन्ताको दूर करनेवाले भी आप ही हैं। आप ही आधि-व्याधि तथा उसे दूर करनेवाले हैं

भीष्म बोले— आप त्रैलोक्य के रक्षक गोविन्द हैं। आप इन्द्रियों के लिए ‘मार्ग’ भी हैं और इन्द्रियातीत ‘अमार्ग’ भी। आप श्रेष्ठ, स्थिर, स्थाणु; निष्कम्प भी और कम्प (गति का तत्त्व) भी हैं।

Verse 152

दुर्वारणो दुर्विषहो दुःसहो दुरतिक्रम: । दुर्घर्षो दुष्प्र कम्पश्च दुर्विषो दुर्जयो जय:,आप अधर्मके नाशक, महापार्श्च, चण्डधार, गणाधिप, गोनर्द, गौओंको आपत्तिसे बचानेवाले, नन्‍न्दीकी सवारी करनेवाले, त्रैलोक्यरक्षक, गोविन्द (श्रीकृष्णरूप), गोमार्ग (इन्द्रियोंके संचालक), अमार्ग (इन्द्रियोंके अगोचर), श्रेष्ठ, स्थिर, स्थाणु, निष्कम्प, कम्प, दुर्वरण (जिनका सामना करना कठिन है, ऐसे), दुर्विषह (असहा वेगवाले), दुःसह, दुर्लडघ्य, दुर्द्धर्ष, दुष्प्र कम्प, दुर्विष, दुर्जय, जय, शश (शीघ्रगामी), शशांक (चन्द्रमा) तथा शमन (यमराज) हैं। सर्दी-गर्मी, क्षुधा, वृद्धावस्था तथा मानसिक चिन्ताको दूर करनेवाले भी आप ही हैं। आप ही आधि-व्याधि तथा उसे दूर करनेवाले हैं

आप दुर्वारण, दुर्विषह, दुःसह, दुरतिक्रम हैं; दुर्धर्ष, दुष्प्रकम्प, दुर्विष, दुर्जय—और स्वयं जय हैं।

Verse 153

शश: शशाड्क: शमन: शीतोष्णक्षुज्जराधिकृत्‌ । आधयो व्याधयश्रैव व्याधिहा व्याधिरेव च,आप अधर्मके नाशक, महापार्श्च, चण्डधार, गणाधिप, गोनर्द, गौओंको आपत्तिसे बचानेवाले, नन्‍न्दीकी सवारी करनेवाले, त्रैलोक्यरक्षक, गोविन्द (श्रीकृष्णरूप), गोमार्ग (इन्द्रियोंके संचालक), अमार्ग (इन्द्रियोंके अगोचर), श्रेष्ठ, स्थिर, स्थाणु, निष्कम्प, कम्प, दुर्वरण (जिनका सामना करना कठिन है, ऐसे), दुर्विषह (असहा वेगवाले), दुःसह, दुर्लडघ्य, दुर्द्धर्ष, दुष्प्र कम्प, दुर्विष, दुर्जय, जय, शश (शीघ्रगामी), शशांक (चन्द्रमा) तथा शमन (यमराज) हैं। सर्दी-गर्मी, क्षुधा, वृद्धावस्था तथा मानसिक चिन्ताको दूर करनेवाले भी आप ही हैं। आप ही आधि-व्याधि तथा उसे दूर करनेवाले हैं

भीष्म बोले— हे प्रभो! आप ही शश, शशांक (चन्द्रमा) और शमन (यम) हैं। शीत-उष्ण, क्षुधा और जरा को उत्पन्न करनेवाले भी आप ही हैं और उन्हें हरनेवाले भी आप ही। आप ही आधि-व्याधि हैं और आप ही व्याधि का नाश करनेवाले वैद्य; आप ही रोग हैं और आप ही उसका औषध।

Verse 154

मम यज्ञमृगव्याधो व्याधीनामागमो गम: । शिखण्डी पुण्डरीकाक्ष: पुण्डरीकवनालय:,मेरे यज्ञरूपी मृगके वधिक तथा व्याधियोंको लाने और मिटानेवाले भी आप ही हैं। (कृष्णरूपमें) मस्तकपर शिखण्ड (मोरपंख) धारण करनेके कारण आप शिखण्डी हैं। आप कमलके समान नेत्रोंवाले, कमलके वनमें निवास करनेवाले, दण्ड धारण करनेवाले, त्र्म्बक, उग्रदण्ड और ब्रह्माण्डके संहारक हैं। विषाग्निको पी जानेवाले, देवश्रेष्ठ, सोमरसका पान करनेवाले और मरुद्‌गणोंके स्वामी हैं

भीष्म बोले— मेरे यज्ञरूपी मृग के वधिक आप ही हैं; व्याधियों का आगमन और उनका गमन (नाश) भी आप ही हैं। आप शिखण्डी हैं; कमल-नेत्र हैं; और कमलों के वन में निवास करनेवाले हैं।

Verse 155

दण्डधारस्त्र्यम्बकश्ष उग्रदण्डो5ण्डनाशन: । विषाग्निपा: सुरश्रेष्ठ: सोमपास्त्वं मरुत्पति:,मेरे यज्ञरूपी मृगके वधिक तथा व्याधियोंको लाने और मिटानेवाले भी आप ही हैं। (कृष्णरूपमें) मस्तकपर शिखण्ड (मोरपंख) धारण करनेके कारण आप शिखण्डी हैं। आप कमलके समान नेत्रोंवाले, कमलके वनमें निवास करनेवाले, दण्ड धारण करनेवाले, त्र्म्बक, उग्रदण्ड और ब्रह्माण्डके संहारक हैं। विषाग्निको पी जानेवाले, देवश्रेष्ठ, सोमरसका पान करनेवाले और मरुद्‌गणोंके स्वामी हैं

भीष्म बोले— आप दण्डधारी, त्र्यम्बक, उग्रदण्ड और ब्रह्माण्ड के संहारक हैं। आप विष और अग्नि को पी जानेवाले, देवश्रेष्ठ, सोमपान करनेवाले तथा मरुद्गणों के स्वामी हैं।

Verse 156

अमृतपास्त्वं जगन्नाथ देवदेव गणेश्वर: । विषाग्निपा मृत्युपाश्च क्षीरपा: सोमपास्तथा । मधुधश्न्युतानामग्रपास्त्वमेव तुषिताद्यपा:,देवाधिदेव! जगन्नाथ! आप अमृत पान करनेवाले और गणोंके स्वामी हैं। विषाग्नि तथा मृत्युसे रक्षा करनेवाले और दूध एवं सोमरसका पान करनेवाले हैं। आप सुखसे भ्रष्ट हुए जीवोंके प्रधान रक्षक तथा तुषितनामक देवताओंके आदिभूत ब्रह्माजीका भी पालन करनेवाले हैं

भीष्म बोले— हे जगन्नाथ, देवदेव, गणेश्वर! आप अमृतपान करनेवाले हैं। आप विष, अग्नि और मृत्यु से रक्षा करनेवाले हैं; आप क्षीर और सोम का भी पान करते हैं। सुख से भ्रष्ट हुए जीवों के लिए आप ही अग्रगण्य आश्रय हैं; और तुषित आदि देवताओं तथा आदिप्रजापति (ब्रह्मा) का भी आप ही पालन करते हैं।

Verse 157

हिरण्यरेता: पुरुषस्त्वमेव त्वं स्त्री पुमांस्त्वं च नपुंसकं च । बालो युवा स्थविरो जीर्णदिष्ट- स्त्वं नागेन्द्र शक्रस्त्वं विश्वकृद्धिश्चकर्ता,आप ही हिरण्यरेता (अग्नि), पुरुष (अन्तर्यामी) तथा आप ही स्त्री, पुरुष और नपुंसक हैं। बालक-युवा और वृद्ध भी आप ही हैं। नागेश्वर! आप जीर्ण दाढ़ोंवाले और इन्द्र हैं। आप विश्वकृत्‌ (जगत्‌के संहारक), विश्वकर्ता (प्रजापति), विश्वकृत्‌ (ब्रह्माजी), विश्वकी रचना करनेवाले प्रजापतियोंमें श्रेष्ठ, विश्वका भार वहन करनेवाले, विश्वरूप, तेजस्वी और सब ओर मुखवाले हैं। चन्द्रमा और सूर्य आपके नेत्र तथा पितामह ब्रह्मा आपके हृदय हैं

भीष्म बोले— आप ही हिरण्यरेता और अन्तर्यामी पुरुष हैं; आप ही स्त्री, पुरुष और नपुंसक हैं। बालक, युवा और वृद्ध भी आप ही हैं। हे नागेन्द्र! आप ही जीर्णदंष्ट्र और आप ही शक्र (इन्द्र) हैं। आप ही विश्व के कर्ता और संहर्ता हैं।

Verse 158

विश्वकृद्‌ विश्वकृतां वरेण्यस्त्वं विश्ववाहो विश्वरूपस्तेजस्वी विश्वतोमुख: । चन्द्रादित्यौ चक्षुषी ते हृदयं च पितामह:,आप ही हिरण्यरेता (अग्नि), पुरुष (अन्तर्यामी) तथा आप ही स्त्री, पुरुष और नपुंसक हैं। बालक-युवा और वृद्ध भी आप ही हैं। नागेश्वर! आप जीर्ण दाढ़ोंवाले और इन्द्र हैं। आप विश्वकृत्‌ (जगत्‌के संहारक), विश्वकर्ता (प्रजापति), विश्वकृत्‌ (ब्रह्माजी), विश्वकी रचना करनेवाले प्रजापतियोंमें श्रेष्ठ, विश्वका भार वहन करनेवाले, विश्वरूप, तेजस्वी और सब ओर मुखवाले हैं। चन्द्रमा और सूर्य आपके नेत्र तथा पितामह ब्रह्मा आपके हृदय हैं

भीष्म बोले— आप जगत् के कर्ता हैं और सृष्टि-रचयिताओं में श्रेष्ठ हैं। आप विश्व का भार धारण करने वाले, विश्वरूप, तेजस्वी और सर्वतोमुख हैं। चन्द्रमा और सूर्य आपके नेत्र हैं तथा पितामह ब्रह्मा आपका हृदय हैं।

Verse 159

महोदधि: सरस्वती वागू बलमनलो- 5निल:अहोरात्र निमेषोन्मेषकर्म,आप ही समुद्र हैं, सरस्वती आपकी वाणी हैं, अग्नि और वायु बल हैं तथा आपके नेत्रोंका खुलना और बंद होना ही दिन और रात्रि है

भीष्म बोले— आप ही महासागर हैं; सरस्वती आपकी वाणी हैं। अग्नि और वायु आपका बल हैं, और आपके नेत्रों का खुलना-बंद होना ही दिन और रात्रि है।

Verse 160

न ब्रह्मा न च गोविन्द: पौराणा ऋषयो न ते । माहात्म्यं वेदितुं शक्ता याथातथ्येन ते शिव,शिव! आपके माहात्म्यको ठीक-ठीक जाननेमें ब्रह्मा, विष्णु तथा प्राचीन ऋषि भी समर्थ नहीं हैं

भीष्म बोले— हे शिव! ब्रह्मा, गोविन्द (विष्णु) और प्राचीन ऋषि भी आपके माहात्म्य को यथार्थ रूप से जानने में समर्थ नहीं हैं।

Verse 161

या मूर्तय: सुसूक्ष्मास्ते न महां यान्ति दर्शनम्‌ । त्राहि मां सततं रक्ष पिता पुत्रमिवौरसम्‌,आपके जो सूक्ष्म रूप हैं वे हमलोगोंकी दृष्टिमें नहीं आते। भगवन्‌! जैसे पिता अपने औरस पुत्रकी रक्षा करता है, उसी तरह आप सर्वदा मेरी रक्षा करें

भीष्म बोले— आपके जो अत्यन्त सूक्ष्म रूप हैं, वे हमारी दृष्टि में नहीं आते। भगवन्! जैसे पिता अपने औरस पुत्र की रक्षा करता है, वैसे ही आप सदा मेरी रक्षा करें।

Verse 162

रक्ष मां रक्षणीयो5हं तवानघ नमोउस्तु ते । भक्तानुकम्पी भगवान्‌ भक्तश्नाहं सदा त्वयि,अनघ! मैं आपके द्वारा रक्षित होने योग्य हूँ, आप अवश्य मेरी रक्षा करें, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप भक्तोंपर दया करनेवाले भगवान्‌ हैं और मैं सदाके लिये आपका भक्त हूँ

भीष्म बोले— हे अनघ! मैं आपके द्वारा रक्षित होने योग्य हूँ; आप अवश्य मेरी रक्षा करें। आपको नमस्कार है। आप भक्तों पर अनुकम्पा करने वाले भगवान् हैं और मैं सदा आपका भक्त हूँ।

Verse 163

यः: सहस्राण्यनेकानि पुंसामावृत्य दुर्देश: । तिष्ठत्येक: समुद्रान्ते स मे गोप्तास्तु नित्यश:,जो हजारों मनुष्योंपर मायाका परदा डालकर सबके लिये दुर्बोध हो रहे हैं, अद्वितीय हैं तथा समुद्रके समान कामनाओंका अन्त होनेपर प्रकाशमें आते हैं, वे परमेश्वर नित्य मेरी रक्षा करें

जो असंख्य मनुष्यों की बुद्धि पर आवरण डालकर सबके लिए दुर्दर्श्य हो जाते हैं, जो एकाकी और अद्वितीय हैं, और जिनका साक्षात्कार कामनाओं के अन्त पर—समुद्र के परे तट की भाँति—होता है, वे परमेश्वर नित्य मेरी रक्षा करें।

Verse 164

यं विनिद्रा जितश्वासा: सत्त्वस्था: संयतेन्द्रिया: । ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नम:,जो निद्राके वशीभूत न होकर प्राणोंपर विजय पा चुके हैं और इन्द्रियोंको जीतकर सत्त्वगुणमें स्थित हैं, ऐसे योगीलोग ध्यानमें जिस ज्योतिर्मय तत्त्वका साक्षात्कार करते हैं, उस योगात्मा परमेश्वरको नमस्कार है

जो निद्रा से अभिभूत नहीं होते, प्राणों पर विजय पा चुके हैं, इन्द्रियों को संयमित कर सत्त्वगुण में स्थित हैं—ऐसे ध्यानरत योगी जिस ज्योतिर्मय तत्त्व का दर्शन करते हैं, उस योगात्मा परमेश्वर को नमस्कार है।

Verse 165

जटिले दण्डिने नित्यं लम्बोदरशरीरिणे । कमण्डलुनिषज्जाय तस्मै ब्रह्मात्मने नम:,जो सदा जटा और दण्ड धारण किये रहते हैं, जिनका उदर और शरीर विशाल है तथा कमण्डलु ही जिनके लिये तरकसका काम देता है, ऐसे ब्रह्माजीके रूपमें विराजमान भगवान्‌ शिवको प्रणाम है

जो सदा जटा और दण्ड धारण करते हैं, जिनका उदर और शरीर विशाल है, और जिनके साथ कमण्डलु सदा लगा रहता है—उस ब्रह्मात्मा भगवान् शिव को नमस्कार है।

Verse 166

यस्य केशेषु जीमूता नद्यः सर्वाड्डसंधिषु । कुक्षौ समुद्राश्चत्वारस्तस्मै तोयात्मने नम:,जिनके केशोंमें बादल, शरीरकी संधियोंमें नदियाँ और उदरमें चारों समुद्र हैं, उन जलस्वरूप परमात्माको नमस्कार है

जिनके केशों में मेघ हैं, जिनके शरीर की संधियों में नदियाँ प्रवाहित हैं, और जिनके उदर में चारों समुद्र हैं—उस जलस्वरूप परमात्मा को नमस्कार है।

Verse 167

सम्भक्ष्य सर्वभूतानि युगान्ते पर्युपस्थिते । यः शेते जलमध्यस्थस्तं प्रपद्ये3म्बुशायिनम्‌,जो प्रलयकाल उपस्थित होनेपर सब प्राणियोंका संहार करके एकार्णवके जलमें शयन करते हैं, उन जलशायी भगवान्‌की मैं शरण लेता हूँ

युगान्त उपस्थित होने पर जो समस्त भूतों का संहार कर एकार्णव के जल में शयन करते हैं, उन जलशायी भगवान् की मैं शरण लेता हूँ।

Verse 168

प्रविश्य वदनं राहोर्य: सोम॑ पिबते निशि । ग्रसत्यर्क च स्वर्भानुर्भूत्वा मां सोडभिरक्षतु

जो रात्रि में राहु के मुख में प्रवेश करके सोम का पान करता है और जो सूर्य को भी ग्रस लेता है—वही षड्दंष्ट्रधारी स्वर्भानु मेरी रक्षा करे।

Verse 169

जो रातमें राहुके मुखमें प्रवेश करके स्वयं चन्द्रमाके अमृतका पान करते हैं; तथा स्वयं ही राहु बनकर सूर्यपर ग्रहण लगाते हैं, वे परमात्मा मेरी रक्षा करें ।। ये चानुपतिता गर्भा यथा भागानुपासते । नमस्तेभ्य: स्वधा स्वाहा प्राप्रुवन्तु मुदन्तु ते,ब्रह्माजीके बाद उत्पन्न होनेवाले जो देवता और पितर बालककी भाँति यज्ञमें अपने- अपने भाग ग्रहण करते हैं, उन्हें नमस्कार है। वे 'स्वाहा और स्वथा' के द्वारा अपने भाग प्राप्त करके प्रसन्न हों

जो रात्रि में राहु के मुख में प्रवेश करके स्वयं चन्द्रमा के अमृत का पान करते हैं, और जो स्वयं राहु बनकर सूर्य पर ग्रहण लगाते हैं—वे परम शक्तियाँ मेरी रक्षा करें। ब्रह्मा के बाद उत्पन्न हुए जो देवता और पितर बालकों की भाँति यज्ञ में अपने-अपने भाग के निकट जाते हैं, उन्हें नमस्कार है। वे ‘स्वाहा’ और ‘स्वधा’ के द्वारा अपने भाग प्राप्त करके तृप्त और प्रसन्न हों।

Verse 170

येड्ड्गुष्ठमात्रा: पुरुषा देहस्था: सर्वदेहिनाम्‌ | रक्षन्तु ते हि मां नित्यं नित्यं चाप्पाययन्तु माम्‌ू

समस्त देहधारियों के शरीर में स्थित वे अंगुष्ठमात्र पुरुष सदा मेरी रक्षा करें और निरन्तर मुझे पुष्ट व तृप्त करें।

Verse 171

जो अंगुष्ठमात्र जीवके रूपमें सम्पूर्ण देहधारियोंके भीतर विराजमान हैं, वे सदा मेरी रक्षा और वृद्धि करें ।। ये न रोदन्ति देहस्था देहिनो रोदयन्ति च । हर्षयन्ति न हृष्यन्ति नमस्तेभ्यो5स्तु नित्यश:,जो देहके भीतर रहते हुए स्वयं न रोकर देहधारियोंको ही रलाते हैं, स्वयं हर्षित न होकर उन्हें ही हर्षित करते हैं, उन सब रुद्रोंको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ

जो अंगुष्ठमात्र जीव-तत्त्व समस्त देहधारियों के भीतर स्थित है, वह सदा मेरी रक्षा और वृद्धि करे। जो देह के भीतर रहकर स्वयं नहीं रोते, पर देहधारियों को रुलाते हैं; स्वयं हर्षित नहीं होते, पर उन्हें हर्षित करते हैं—उन सब रुद्रों को मैं नित्य नमस्कार करता हूँ।

Verse 172

ये नदीषु समुद्रेषु पर्वतेषु गुहासु च । वृक्षमूलेषु गोछ्ठेषु कान्तारे गहनेषु च,नदी, समुद्र, पर्वत, गुहा, वृक्षोंकी जड़, गोशाला, दुर्गण पथ, वन, चौराहे, सड़क, चौतरे, किनारे, हस्तिशाला, अश्वशाला, रथशाला, पुराने बगीचे, जीर्ण गृह, पञ्चभूत, दिशा, विदिशा, चन्द्रमा, सूर्य तथा उन-उनकी किरणोंमें, रसातलमें और उससे भित्न स्थानोंमें भी जो अधिष्ठातृ देवताके रूपमें व्याप्त हैं, उन सबको सदा नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है

जो अधिष्ठातृ देवता नदियों, समुद्रों, पर्वतों और गुहाओं में; वृक्षों की जड़ों में, गोशालाओं में तथा निर्जन, घने कान्तारों में व्याप्त हैं—उन सबको सदा नमस्कार, नमस्कार।

Verse 173

चतुष्पथेषु रथ्यासु चत्वरेषु तटेषु च । हस्त्यश्वरथशालासु जीर्णोद्यानालयेषु च,नदी, समुद्र, पर्वत, गुहा, वृक्षोंकी जड़, गोशाला, दुर्गण पथ, वन, चौराहे, सड़क, चौतरे, किनारे, हस्तिशाला, अश्वशाला, रथशाला, पुराने बगीचे, जीर्ण गृह, पञ्चभूत, दिशा, विदिशा, चन्द्रमा, सूर्य तथा उन-उनकी किरणोंमें, रसातलमें और उससे भित्न स्थानोंमें भी जो अधिष्ठातृ देवताके रूपमें व्याप्त हैं, उन सबको सदा नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है

चौराहों, गलियों, चौक-चबूतरों और किनारों पर; हाथी-शालाओं, अश्व-शालाओं और रथ-शालाओं में; पुराने उपवनों और जीर्ण गृहों में; नदियों, समुद्रों, पर्वतों, गुहाओं, वृक्षों की जड़ों, गोशालाओं, दुर्गम पथों और वनों में— तथा पंचभूतों में, दिशाओं-विदिशाओं में, चन्द्र-सूर्य और उनकी किरणों में—जहाँ-जहाँ अधिष्ठातृ देवता व्याप्त हैं, उन सबको बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है।

Verse 174

येषु पञ्चसु भूतेषु दिशासु विदिशासु च । चन्द्रार्कयोर्मध्यगता ये च चन्द्रार्करश्मिषु,नदी, समुद्र, पर्वत, गुहा, वृक्षोंकी जड़, गोशाला, दुर्गण पथ, वन, चौराहे, सड़क, चौतरे, किनारे, हस्तिशाला, अश्वशाला, रथशाला, पुराने बगीचे, जीर्ण गृह, पञ्चभूत, दिशा, विदिशा, चन्द्रमा, सूर्य तथा उन-उनकी किरणोंमें, रसातलमें और उससे भित्न स्थानोंमें भी जो अधिष्ठातृ देवताके रूपमें व्याप्त हैं, उन सबको सदा नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है

जो पंचभूतों में, दिशाओं और विदिशाओं में व्याप्त हैं; जो चन्द्र और सूर्य के मध्य के आकाश में स्थित हैं; और जो चन्द्र-सूर्य की किरणों में निवास करते हैं— उन समस्त अधिष्ठातृ देवताओं को बार-बार नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है।

Verse 175

रसातलगता ये च ये च तस्मै परं गता: । नमस्तेभ्यो नमस्ते भ्यो नमस्तेभ्यो<5स्तु नित्यश:,नदी, समुद्र, पर्वत, गुहा, वृक्षोंकी जड़, गोशाला, दुर्गण पथ, वन, चौराहे, सड़क, चौतरे, किनारे, हस्तिशाला, अश्वशाला, रथशाला, पुराने बगीचे, जीर्ण गृह, पञ्चभूत, दिशा, विदिशा, चन्द्रमा, सूर्य तथा उन-उनकी किरणोंमें, रसातलमें और उससे भित्न स्थानोंमें भी जो अधिष्ठातृ देवताके रूपमें व्याप्त हैं, उन सबको सदा नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है

जो रसातल में स्थित हैं और जो उससे परे उच्च लोकों को गए हैं—उन सबको नमस्कार, नमस्कार; उन्हें सदा नमस्कार हो।

Verse 176

येषां न विद्यते संख्या प्रमाणं रूपमेव च । असंख्येयगुणा रुद्रा नमस्तेभ्यो<5स्तु नित्यश:,जिनकी संख्या, प्रमाण और रूपकी सीमा नहीं है, जिनके गुणोंकी गिनती नहीं हो सकती, उन रुद्रोंको मैं सदा नमस्कार करता हूँ

जिनकी संख्या नहीं, जिनका प्रमाण नहीं, जिनके रूप की भी सीमा नहीं; जिन रुद्रों के गुण अगणित हैं—उन सबको मेरा नित्य नमस्कार है।

Verse 177

सर्वभूतकरो यस्मात्‌ सर्वभूतपति्हर: । सर्वभूतान्तरात्मा च तेन त्वं न निमन्त्रित:,आप सम्पूर्ण भूतोंके जन्मदाता, सबके पालक और संहारक हैं; तथा आप ही समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा हैं। इसीलिये मैंने आपको पृथक्‌ निमन्त्रण नहीं दिया

क्योंकि आप ही समस्त भूतों के कर्ता हैं, आप ही सबके स्वामी और हर (संहारक) हैं; और आप ही समस्त प्राणियों के अन्तरात्मा हैं—इसीलिए मैंने आपको अलग से निमन्त्रण नहीं दिया।

Verse 178

त्वमेव हीज्यसे यस्माद्‌ यज्ैविविधदक्षिणै: । त्वमेव कर्ता सर्वस्य तेन त्वं न निमन्त्रित:

विविध प्रकार की दक्षिणाओं से युक्त यज्ञों द्वारा वास्तव में आपकी ही पूजा होती है। आप ही सबके कर्ता हैं, इसलिए आपको अलग से निमंत्रित नहीं किया गया।

Verse 179

नाना प्रकारकी दक्षिणाओं वाले यज्ञोंद्वारा आपहीका यजन किया जाता है और आप ही सबके कर्ता हैं, इसीलिये मैंने आपको अलग निमन्त्रण नहीं दिया ।। अथवा मायया देव सूक्ष्मया तव मोहित: । एतस्मात्‌ कारणाद्‌ वापि तेन त्वं न निमन्त्रित:,अथवा देव! आपकी सूक्ष्म मायासे मैं मोहमें पड़ गया था, इस कारणसे भी मैंने आपको निमन्त्रण नहीं दिया

नाना प्रकार की दक्षिणाओं से युक्त यज्ञों द्वारा आपकी ही आराधना होती है और आप ही सबके कर्ता हैं; इसलिए मैंने आपको अलग से निमंत्रण नहीं दिया। अथवा, हे देव! आपकी सूक्ष्म माया से मैं मोहित हो गया था; इस कारण से भी आपको निमंत्रित नहीं कर सका।

Verse 180

प्रसीद मम भद्रें ते भव भावगतस्य मे । त्वयि मे हृदयं देव त्वयि बुद्धिर्मनस्त्वयि,भगवन्‌ भव! आपका भला हो, मैं भक्तिभावके साथ आपकी शरणमें आया हूँ, इसलिये अब मुझपर प्रसन्न होइये। मेरा हृदय, मेरी बुद्धि और मेरा मन सब आपमें समर्पित हैं

मुझ पर प्रसन्न होइए; आपका कल्याण हो। मैं भक्ति-भाव से आपकी शरण में आया हूँ, इसलिए कृपा कीजिए। हे देव! मेरा हृदय आपमें है, मेरी बुद्धि आपमें है, मेरा मन भी आपमें ही है।

Verse 181

स्तुत्वैवं स महादेवं विरराम प्रजापति: । भगवानपि सुप्रीत: पुनर्दक्षमभाषत,इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करके प्रजापति दक्ष चुप हो गये। तब भगवान्‌ शिवने भी बहुत प्रसन्न होकर दक्षसे कहा--

इस प्रकार महादेव की स्तुति करके प्रजापति दक्ष मौन हो गए। तब भगवान् शिव भी अत्यन्त प्रसन्न होकर फिर दक्ष से बोले।

Verse 182

परितुष्टो5स्मि ते दक्ष स्तवेनानेन सुव्रत । बहुनात्र किमुक्तेन मत्समीपे भविष्यसि,“उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दक्ष! तुम्हारे द्वारा की हुई इस स्तुतिसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ। यहाँ अधिक क्या कहूँ, तुम मेरे निकट निवास करोगे

हे उत्तम व्रत का पालन करने वाले दक्ष! तुम्हारे इस स्तोत्र से मैं पूर्णतः संतुष्ट हूँ। यहाँ अधिक क्या कहूँ—तुम मेरे समीप निवास करोगे।

Verse 183

अश्वमेधसहस्रस्य वाजपेयशतस्य च । प्रजापते मत्प्रसादात्‌ू फलभागी भविष्यसि,'प्रजापते! मेरे प्रसादसे तुम्हें एक हजार अश्वमेध तथा एक सौ वाजपेय यज्ञका फल मिलेगा”

हे प्रजापते! मेरे प्रसाद से तुम्हें एक हजार अश्वमेध और एक सौ वाजपेय यज्ञों के फल का भाग प्राप्त होगा।

Verse 184

अथैनमब्रवीद्‌ वाक्‍्यं लोकस्याधिपतिर्भव: । आश्वासनकरं वाक्यं वाक्यविद्वाक्य सम्मतम्‌,तदनन्तर वाक्यविशारद, लोकनाथ भगवान्‌ शिवने प्रजापतिको सान्त्वना देनेवाला युक्तियुक्त एवं उत्तम वचन कहा--

तदनन्तर लोकाधिपति भगवान् भव (शिव) ने प्रजापति से वाक्यविशारदों को मान्य, युक्तियुक्त और सान्त्वना देने वाला उत्तम वचन कहा।

Verse 185

दक्ष दक्ष न कर्तव्यो मन्युर्विघ्नमिमं प्रति । अहं यज्ञहरस्तुभ्यं दृष्टमेतत्‌ पुरातनम्‌,“दक्ष! दक्ष! इस यज्ञमें जो विघ्न डाला गया है, इसके लिये तुम खेद न करना। मैंने पहले कल्पमें भी तुम्हारे यज्ञका विध्वंस किया था। यह घटना भी पूर्वकल्पके अनुसार ही हुई है

दक्ष! दक्ष! इस यज्ञ में जो विघ्न पड़ा है, उसके लिए तुम क्रोध न करो। मैं तुम्हारा यज्ञहर हूँ; यह पुरातन से ही देखा-सुना हुआ है।

Verse 186

भूयश्न ते वरं दद्मि त॑ त्वं गृह्लीष्व सुव्रत । प्रसन्नचदनो भूत्वा तदिहैकमना: शृणु,'सुव्रत! मैं पुनः तुम्हें वरदान देता हूँ, तुम इसे स्वीकार करो और प्रसन्नरवदन तथा एकाग्रचित्त होकर यहाँ मेरी यह बात सुनो

हे सुव्रत! मैं फिर तुम्हें वर देता हूँ; तुम उसे स्वीकार करो। प्रसन्न मुख और एकाग्रचित्त होकर यहाँ मेरी यह बात सुनो।

Verse 187

वेदात्‌ षडज्भादुद्धृत्य सांख्ययोगाच्च युक्तित: । तप: सुतप्तं विपुलं॑ दुश्चरं देवदानवै:,'पूर्वकालमें षडड़ वेद, सांख्ययोग और तर्कसे निश्चित करके देवताओं और दानवोंने जिस विशाल एवं दुष्कर तपका अनुष्ठान किया था (उससे भी उत्तम व्रत मैं तुम्हें बता रहा हूँ)

वेद के षडङ्गों से उद्धृत करके, सांख्य-योग और युक्ति से सुनिश्चित होकर, देवताओं और दानवों ने प्राचीन काल में जो विशाल और दुश्चर तप किया था—

Verse 188

अपूर्व सर्वतोभद्रं सर्वतोमुखमव्ययम्‌ | अब्दैर्दशाहसंयुक्तं गूढमप्राज्ञनिन्दितम्‌,“दक्ष! मैंने पूर्वकालमें एक शुभकारक पाशुपत नामक व्रतको प्रकट किया था, जो अपूर्व है। साधन और सिद्धि सभी अवस्थाओंमें सब प्रकारसे कल्याणकारी, सर्वतोमुखी (सभी वर्णों और आश्रमोंके अनुकूल) तथा मोक्षका साधक होनेके कारण अविनाशी है। वर्षोतक पुण्यकर्म करने और यम-नियम नामक दस साधनोंको अभ्यासमें लानेसे उसकी उपलब्धि होती है। वह गूढ़ है। मूर्ख मनुष्य उसकी निन्दा करते हैं। वह समस्त वर्णधर्म और आश्रम-धर्मके अनुकूल, सम और किसी-किसी अंशमें विपरीत भी है। जिन्हें सिद्धान्तका ज्ञान है उन्होंने इसे अपनानेका पूर्ण निश्चय कर लिया है। यह व्रत सभी आश्रमोंसे बढ़कर है। इसके अनुष्ठानसे उत्तम एवं प्रचुर फलकी प्राप्ति होती है। महाभाग! उस पाशुपत व्रतके अनुष्ठानका फल तुम्हें प्राप्त हो। अब तुम अपनी मानसिक चिन्ताका परित्याग कर दो”

Bhīṣma said: “I once revealed in former times a sacred observance called the Pāśupata vow—unprecedented in its kind. In means and in attainment, in every condition, it is wholly beneficent; it is ‘facing all directions,’ fit for all classes and stages of life, and, as a discipline leading toward liberation, it is imperishable. It is gained through sustained meritorious practice over time and by cultivating the tenfold disciplines of restraint and observance. It is profound and hidden in its depth; the unwise disparage it.”

Verse 189

वर्णाश्रमकृतैर्धर्मविपरीतं क्वचित्समम्‌ | गतान्तैरध्यवसितमत्याश्रममिदं व्रतम्‌,“दक्ष! मैंने पूर्वकालमें एक शुभकारक पाशुपत नामक व्रतको प्रकट किया था, जो अपूर्व है। साधन और सिद्धि सभी अवस्थाओंमें सब प्रकारसे कल्याणकारी, सर्वतोमुखी (सभी वर्णों और आश्रमोंके अनुकूल) तथा मोक्षका साधक होनेके कारण अविनाशी है। वर्षोतक पुण्यकर्म करने और यम-नियम नामक दस साधनोंको अभ्यासमें लानेसे उसकी उपलब्धि होती है। वह गूढ़ है। मूर्ख मनुष्य उसकी निन्दा करते हैं। वह समस्त वर्णधर्म और आश्रम-धर्मके अनुकूल, सम और किसी-किसी अंशमें विपरीत भी है। जिन्हें सिद्धान्तका ज्ञान है उन्होंने इसे अपनानेका पूर्ण निश्चय कर लिया है। यह व्रत सभी आश्रमोंसे बढ़कर है। इसके अनुष्ठानसे उत्तम एवं प्रचुर फलकी प्राप्ति होती है। महाभाग! उस पाशुपत व्रतके अनुष्ठानका फल तुम्हें प्राप्त हो। अब तुम अपनी मानसिक चिन्ताका परित्याग कर दो”

Bhīṣma said: “This observance is, in some respects, contrary to the dharmas shaped by the system of social classes and life-stages, and in some respects in harmony with them. Those who have reached the end of the path—who know the settled conclusions—have firmly resolved upon it. This vow stands beyond (and above) the ordinary āśramas.”

Verse 190

मया पाशुपतं दक्ष शुभमुत्पादितं पुरा । तस्य चीर्णस्य तत्‌ सम्यक्‌ फलं भवति पुष्कलम्‌ | तच्चास्तु ते महाभाग त्यज्यतां मानसो ज्वर:,“दक्ष! मैंने पूर्वकालमें एक शुभकारक पाशुपत नामक व्रतको प्रकट किया था, जो अपूर्व है। साधन और सिद्धि सभी अवस्थाओंमें सब प्रकारसे कल्याणकारी, सर्वतोमुखी (सभी वर्णों और आश्रमोंके अनुकूल) तथा मोक्षका साधक होनेके कारण अविनाशी है। वर्षोतक पुण्यकर्म करने और यम-नियम नामक दस साधनोंको अभ्यासमें लानेसे उसकी उपलब्धि होती है। वह गूढ़ है। मूर्ख मनुष्य उसकी निन्दा करते हैं। वह समस्त वर्णधर्म और आश्रम-धर्मके अनुकूल, सम और किसी-किसी अंशमें विपरीत भी है। जिन्हें सिद्धान्तका ज्ञान है उन्होंने इसे अपनानेका पूर्ण निश्चय कर लिया है। यह व्रत सभी आश्रमोंसे बढ़कर है। इसके अनुष्ठानसे उत्तम एवं प्रचुर फलकी प्राप्ति होती है। महाभाग! उस पाशुपत व्रतके अनुष्ठानका फल तुम्हें प्राप्त हो। अब तुम अपनी मानसिक चिन्ताका परित्याग कर दो”

Bhīṣma said: “O Dakṣa, long ago I brought forth an auspicious observance called the Pāśupata vow. When it is properly undertaken and lived out, its fruit becomes abundant and complete. May that very fruit come to you, O noble one; cast off the fever of anxiety in your mind.”

Verse 191

एवमुक्त्वा महादेव: सपत्नीक: सहानुग: । अदर्शनमनुप्राप्तो दक्षस्पामितविक्रम:

Having spoken thus, Mahādeva—accompanied by his consort and followed by his attendants—vanished from sight, after displaying his immeasurable might in the Dakṣa-sacrifice episode. The narrative underscores that divine power is not merely force but a moral authority that withdraws once its purpose—restoring order and checking arrogance—has been fulfilled.

Verse 192

दक्षसे ऐसा कहकर पत्नी और पार्षदोंसहित अमित पराक्रमी महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये ।। दक्षप्रोक्ते स्‍तवमिमं कीर्तयेद्‌ यः शूणोति वा । नाशुमं प्राप्तुयात्‌ किंचिद्‌ दीर्घमायुरवाप्रुयात्‌,जो मनुष्य दक्षके द्वारा कहे हुए इस स्तोत्रका कीर्तन अथवा श्रवण करेगा, उसे कोई अमंगल नहीं प्राप्त होगा। वह दीर्घ आयु प्राप्त करता है

Bhishma said: Having spoken thus to Daksha, the immensely valorous Mahadeva vanished on the very spot, accompanied by his consort and attendants. Whoever recites this hymn spoken by Daksha—or even listens to it—incurs no inauspiciousness at all and attains long life. The passage underscores the protective and purifying power attributed to devotional praise when received with reverence.

Verse 193

यथा सर्वेषु देवेषु वरिष्ठो भगवान्‌ शिव: । तथा स्तवो वरिष्ठो5यं स्तवानां ब्रह्मसम्मित:

भीष्म बोले—जैसे समस्त देवताओं में भगवान् शिव श्रेष्ठ हैं, वैसे ही यह स्तोत्र भी समस्त स्तुतियों में श्रेष्ठ है—ब्रह्म के तुल्य मान्य।

Verse 194

जैसे भगवान्‌ शिव सब देवताओंमें श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार यह वेदतुल्य स्तोत्र सभी स्तुतियोंमें श्रेष्ठ है ।। यशोराज्यसुखैश्वर्यकामार्थधनकांक्षिभि: | श्रोतव्यो भक्तिमास्थाय विद्याकामैश्ष यत्नतः

भीष्म बोले—जैसे भगवान् शिव सब देवताओं में श्रेष्ठ माने जाते हैं, वैसे ही यह वेदतुल्य पवित्र स्तोत्र सभी स्तुतियों में श्रेष्ठ है। अतः जो यश, राज्य, सुख, ऐश्वर्य, काम्य-फल, अर्थ और धन की इच्छा रखते हैं, तथा जो विद्या चाहते हैं, वे भक्ति धारण कर यत्नपूर्वक इसका श्रवण करें।

Verse 195

यश, राज्य, सुख, ऐश्वर्य, काम, अर्थ, धन और विद्याकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको भक्तिभावका आश्रय लेकर यत्नपूर्वक इस स्तोत्रका श्रवण करना चाहिये ।। व्याधितो दुःखितो दीनश्लोरग्रस्तो भयार्दित: । राजकार्याभियुक्तो वा मुच्यते महतो भयात्‌,रोगी, दुखी, दीन, चोरके हाथमें पड़ा हुआ, भयभीत तथा राजकार्यका अपराधी मनुष्य भी इस स्तोत्रका पाठ करनेसे महान्‌ भयसे छुटकारा पा जाता है

भीष्म बोले—यश, राज्य, सुख, ऐश्वर्य, काम्य-फल, अर्थ, धन और विद्या की इच्छा रखने वाले पुरुष भक्ति का आश्रय लेकर यत्नपूर्वक इस स्तोत्र का श्रवण करें। रोगी, दुखी, दीन, चोरों के वश में पड़ा, भय से व्याकुल तथा राजकार्य में अभियुक्त मनुष्य भी इस स्तोत्र के पाठ से महान् भय से मुक्त हो जाता है।

Verse 196

अनेनैव तु देहेन गणानां समतां व्रजेत्‌ । तेजसा यशसा चैव युक्तो भवति निर्मल:,इतना ही नहीं, वह इसी शरीरसे भगवान्‌ शिवके गणोंकी समानता प्राप्त कर लेता है तथा तेज और यशसे सम्पन्न होकर निर्मल हो जाता है

भीष्म बोले—इस स्तोत्र के प्रभाव से मनुष्य इसी शरीर से भगवान् शिव के गणों की समानता प्राप्त कर लेता है; तेज और यश से युक्त होकर वह निर्मल और निष्कलंक हो जाता है।

Verse 197

न राक्षसा: पिशाचा वा न भूता न विनायका: । विघ्नं कुर्युर्गहे तस्य यत्रायं पठ्यते स्तवः,जिसके यहाँ इस स्तोत्रका पाठ होता है, उसके घरमें राक्षस, पिशाच, भूत और विनायक कभी कोई विष्न नहीं करते हैं

भीष्म बोले—जिस घर में इस स्तोत्र का पाठ होता है, वहाँ न राक्षस, न पिशाच, न भूत और न विनायक—कोई भी विघ्न नहीं कर सकते।

Verse 198

शृणुयाच्चैव या नारी तद्धक्ता ब्रह्मचारिणी । पितृपक्षे भर्त॒पक्षे पूज्या भवति देववत्‌,जो नारी भगवान्‌ शंकरमें भक्तिभाव रखकर ब्रह्मचर्यका पालन करती हुई इस स्तोत्रको सुनती है, वह पितृकुल और पतिकुलमें देवताके समान आदरणीय होती है

भीष्म ने कहा—जो नारी भगवान् शंकर में भक्तिभाव रखकर ब्रह्मचर्य का पालन करती हुई इस स्तोत्र को सुनती है, वह पितृकुल और पतिकुल—दोनों में देवता के समान पूज्य होती है।

Verse 199

शृणुयाद्‌ यः स्तवं कृत्स्नं कीर्तयेद्‌ वा समाहित: । तस्य सर्वाणि कर्माणि सिद्धि गच्छन्त्यभीक्षणश:,जो एकाग्रचित्त होकर इस सम्पूर्ण स्तोत्रको सुनता अथवा पढ़ता है, उसके सारे कार्य सदा ही सिद्ध होते रहते हैं

भीष्म ने कहा—जो एकाग्रचित्त होकर इस सम्पूर्ण स्तोत्र को सुनता अथवा उसका कीर्तन करता है, उसके समस्त कार्य बार-बार सिद्धि को प्राप्त होते हैं।

Verse 200

मनसा चिन्तितं यच्च यच्च वाचानुकीर्तितम्‌ | सर्व सम्पद्यते तस्य स्तवस्यास्यानुकीर्तनात्‌,वह मनसे जिस वस्तुके लिये चिन्तन करता है अथवा वाणीसे जिस मनोरथकी याचना करता है, उसका वह सारा अभीष्ट इस स्तोत्रके बार-बार पाठसे सिद्ध हो जाता है

भीष्म ने कहा—मन से जो कुछ वह चिन्तन करता है और वाणी से जिस मनोरथ का उच्चारण करता है, इस स्तोत्र के बार-बार पाठ से उसका वह सब अभीष्ट सिद्ध हो जाता है।

Verse 201

देवस्य च गुहस्यापि देव्या नन्दी श्वरस्य च । बलिं सुविहितं कृत्वा दमेन नियमेन च

भीष्म ने कहा—देव गुह को भी, देवी को और नन्दीश्वर को भी विधिपूर्वक बलि अर्पित करके, फिर दम (इन्द्रियनिग्रह) और नियम (अनुशासन) के साथ आचरण करे।

Verse 202

ततस्तु युक्तो गृह्नीयान्नामान्याशु यथाक्रमम्‌ । ईप्सितान्‌ लभते सो<र्थान्‌ भोगान्‌ कामांश्न मानव:

फिर वह संयमयुक्त होकर शीघ्र ही क्रमशः उन नामों को ग्रहण करे (पाठ/स्मरण करे)। ऐसा मनुष्य इच्छित अर्थ, भोग और कामनाओं को प्राप्त करता है।

Verse 203

मृतश्न स्वर्गमाप्नोति तिर्यक्षु च न जायते । इत्याह भगवान्‌ व्यास: पराशरसुत: प्रभु:

भीष्म बोले—जो पुरुष पहले अर्पण करके (स्वार्थरहित होकर) भोजन करता है, वह स्वर्ग को प्राप्त होता है और तिर्यक्-योनियों में जन्म नहीं लेता। ऐसा पराशरनन्दन, प्रभु भगवान् व्यास ने कहा है।

Verse 284

मनुष्यको चाहिये कि वह इन्द्रियोंको संयममें रखकर शौच-संतोष आदि नियमोंका पालन करते हुए महादेवजी, कार्तिकेय, पार्वतीदेवी और नन्दिकेश्वरको विधिपूर्वक पूजोपहार समर्पित करे, फिर एकाग्रचित्त होकर क्रमश: इन सहस््र नामोंका पाठ करे। ऐसा करनेसे मनुष्य शीघ्र ही मनोवाञ्छित पदार्थों, भोगों और कामनाओंको प्राप्त कर लेता है तथा मृत्युके पश्चात्‌ स्वर्गमें जाता है। उसे पशु-पक्षी आदिकी योनिमें जन्म नहीं लेना पड़ता है। इस प्रकार सर्वसमर्थ पराशरनन्दन भगवान्‌ व्यासजीने इस स्तोत्रका माहात्म्य बतलाया है।। इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि दक्षप्रोक्तशिवसहस्रनामस्तवे चतुरशीत्यधिकद्वधिशततमो<5ध्याय:

भीष्म बोले—मनुष्य को चाहिए कि इन्द्रियों को संयम में रखकर, शौच-संतोष आदि नियमों का पालन करते हुए, महादेव, कार्तिकेय, पार्वतीदेवी और नन्दिकेश्वर की विधिपूर्वक पूजा करके पूजोपहार अर्पित करे। फिर एकाग्रचित्त होकर क्रमशः इन सहस्र नामों का पाठ करे। ऐसा करने से वह शीघ्र ही मनोवाञ्छित पदार्थ, भोग और कामनाएँ प्राप्त करता है तथा मृत्यु के पश्चात् स्वर्ग को जाता है; उसे पशु-पक्षी आदि योनियों में जन्म नहीं लेना पड़ता। इस प्रकार सर्वसमर्थ पराशरनन्दन भगवान् व्यास ने इस स्तोत्र का माहात्म्य बताया है।

Verse 713

गजेन्द्रकर्ण गोकर्ण पाणिकर्ण नमोस्तु ते । आपके कान भी सब ओरे हैं। संसारमें जो कुछ है, सबको व्याप्त करके आप स्थित हैं। शंकुकर्ण, महाकर्ण, कुम्भकर्ण, अर्गवालय, गजेन्द्रकर्ण, गोकर्ण और पाणिकर्ण--ये सात पार्षद्‌ आपके ही स्वरूप हैं। इन सबके रूपमें आपको नमस्कार है

गजेन्द्रकर्ण, गोकर्ण, पाणिकर्ण—आपको नमस्कार है। आपके कान सर्वत्र हैं; संसार में जो कुछ है, उसे व्याप्त करके आप स्थित हैं। शंकुकर्ण, महाकर्ण, कुम्भकर्ण, अर्गवालय, गजेन्द्रकर्ण, गोकर्ण और पाणिकर्ण—ये सात पार्षद आपके ही स्वरूप हैं; उन सब रूपों में आपको प्रणाम है।

Frequently Asked Questions

The dilemma is how a householder can fulfill social duties while avoiding attachment-driven ethical compromise—especially when greed for wealth and status pushes actions one knows to be improper.

Observe the mind’s progression from attachment to craving and aversion; cultivate disenchantment and discrimination, and adopt tapas with sense-restraint so that duty is performed without being dominated by pleasure-seeking.

Rather than a formal phalaśruti, the chapter provides causal claims about outcomes: tapas is portrayed as a source of excellence and higher states, while greed and dissatisfaction are shown to degrade judgment and lead to ruin.