
Vānaprastha-vṛtti and the Transition toward the Fourth Āśrama (वानप्रस्थवृत्तिः चतुर्थाश्रमोपक्रमश्च)
Upa-parva: Āśrama-Dharma and Vānaprastha–Saṃnyāsa Instruction (Śānti-parva didactic unit)
This chapter continues the āśrama-dharma exposition by detailing the “third” life-stage, vānaprastha. Bhīṣma introduces the topic to Yudhiṣṭhira, and the discourse (with an embedded attribution to Vyāsa) specifies when a householder should withdraw—upon perceiving age and the presence of grandchildren—entering the forest as a disciplined practitioner. The text outlines a regulated regimen: residing in vānaprastha for a designated portion of life, maintaining sacred fires and sacrificial obligations with controlled intake, and offering forest-available oblations. It enumerates multiple subsistence patterns (immediate-gathering vs. monthly/annual storage for hospitality and ritual needs), seasonal austerities (exposure to elements, water reliance, five-fire practice), and bodily disciplines (standing, limited postures, measured eating, grain preparations by fortnight). It notes vow-variants (roots, fruits, flowers) aligned with Vaikhānasa norms and frames these as “dīkṣā” options for the wise. The chapter then pivots to the “fourth,” Upaniṣadic, and more universal dharma, listing exemplars among seers and forest ascetics. Finally, it prescribes relinquishing vānaprastha in advanced age/illness, performing a concluding rite, internalizing ritual fires, abandoning possessions, offering fearlessness to beings, and adopting equanimity—thereby preparing for the highest āśrama and liberation-oriented conduct.
Chapter Arc: शांतिपर्व के उपदेश-वन में ऋषि-स्वर यह उद्घोष करता है कि केवल वही धीर पुरुष दूसरों को पार लगा सकते हैं जिनकी प्रज्ञा ने तत्त्व का निश्चय कर लिया है—अज्ञानी न स्वयं तरते हैं, न किसी और को तारते। → योग-साधना को ‘सहायक’ बनाने वाले अनुशासन सामने आते हैं: दोष-च्छेदन, देश-काल-आचरण की शुद्धि, कर्म-रुचि का संयम, और मन-वाणी-कर्म—इन तीनों दण्डों का निवर्तन। साथ ही यह भी कहा जाता है कि चाहे मनुष्य अत्यन्त दारुण दशा में हो, क्लेशों से घिरा हो, या विद्या-वैदुष्य से युक्त हो—यदि साधना का क्रम ठीक हो तो वह जरा-मरण के दुर्गम सागर को पार कर सकता है। → तत्त्व-चिन्तन का शिखर तब आता है जब ‘विपरीत मत’ और ‘अव्यक्त’ का विवेचन करते हुए वेद-सिद्धान्तों में कहे गए ‘दो आत्माओं’ (क्षेत्रज्ञ/परमात्म-प्रकार) की चर्चा उठती है—और साधक को यह दिखाया जाता है कि ज्ञान (सांख्य) और एकाग्र-ध्यान (योग) एक ही सत्य की ओर दो मार्ग हैं। → अन्त में समत्व-लक्षण स्थापित होता है: जो ममता-अहंकार त्यागकर शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वों को समान भाव से सहता है, संशय काट देता है, और सर्वभूत-समता में स्थित होता है—वह ब्रह्म की ओर उन्नत होता है। योग के फल रूप में तत्त्व-सिद्धियों (वायु/आकाश आदि) का संकेत भी आता है, पर उनका उद्देश्य प्रदर्शन नहीं, वैराग्य-युक्त स्थिरता है। → सिद्धियों का वर्णन (वायु-तत्त्व से पृथ्वी-कम्पन, आकाश-तत्त्व से सर्वव्याप्ति/अन्तर्धान) यह प्रश्न छोड़ देता है कि साधक इन शक्तियों को साधन माने या बन्धन—और आगे की शिक्षा उसी विवेक को माँगती है।
Verse 1
ऑपन--माजल छा असल षट्त्रिशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: ध्यानके सहायक योग, उनके फल और सात प्रकारकी धारणाओंका वर्णन तथा सांख्य एवं योगके अनुसार ज्ञानद्वारा मोक्षकी प्राप्ति व्यास उवाच अथ चेदू रोचयेदेतदुह्मेत स्रोतसा यथा । उन्मज्जंश्न॒ निमज्जंश्व ज्ञानवान् प्लववान् भवेत्,व्यासजी कहते हैं--वत्स! मनुष्य जिस प्रकार डूबता-उतराता हुआ जलके प्रवाहमें बहता रहता है और यदि संयोगवश कोई नौका मिल गयी तो उसकी सहायतासे पार लग जाता है, उसी प्रकार संसार-सागरमें डूबता-उतराता हुआ मानव यदि इस संकटसे मुक्त होना चाहे तो उसे ज्ञानरूपी नौकाका आश्रय लेना चाहिये
व्यासजी कहते हैं—वत्स! जैसे मनुष्य जल के प्रवाह में कभी ऊपर उठता, कभी डूबता हुआ बहता रहता है और संयोगवश यदि उसे कोई नौका मिल जाए तो उसी के सहारे पार लग जाता है; वैसे ही संसार-प्रवाह में डूबता-उतराता मनुष्य यदि इस संकट से मुक्त होना चाहे, तो उसे ज्ञानरूपी नौका का आश्रय लेना चाहिए।
Verse 2
प्रज्ञया निश्चिता धीरास्तारयन्त्यबुधान् प्लवै: | नाबुधास्तारयन्त्यन्यानात्मानं वा कथंचन,जिन्हें बुद्धिद्वारा तत्त्वका पूर्ण निश्चय हो गया है, वे धीर पुरुष अपनी ज्ञाननौकाद्वारा दूसरे अज्ञानियोंको भी भवसागरसे पार कर देते हैं, परंतु जो अज्ञानी हैं वे न तो दूसरोंको तार सकते हैं और न अपना ही किसी प्रकार उद्धार कर पाते हैं
जिन्हें बुद्धि द्वारा तत्त्व का पूर्ण निश्चय हो गया है, वे धीर पुरुष अपनी ज्ञान-नौका द्वारा दूसरे अज्ञानियों को भी भवसागर से पार कर देते हैं; पर जो अज्ञानी हैं, वे न तो दूसरों को तार सकते हैं और न अपना ही किसी प्रकार उद्धार कर पाते हैं।
Verse 3
छिन्नदोषो मुनिर्योगान् युक्तो युज्जीत द्वादश । देशकर्मानुरागार्थानुपायापायनिश्चयै:
व्यास ने कहा: जो मुनि दोषों को काट चुका हो और संयम में स्थित हो, वह बारह योग-साधनों का अभ्यास करे—देश और आचरण, आसक्ति और उसके प्रयोजन, तथा उपाय और अपाय (विघ्न) का यथार्थ निश्चय करके—ताकि उसकी साधना सुव्यवस्थित और धर्मसम्मत रहे।
Verse 4
यच्छेद् वाडुमनसी बुद्धया य इच्छेज्ज्ञानमुत्तमम्
व्यास ने कहा: जो परम ज्ञान की इच्छा रखता हो, वह विवेक-शक्ति से वाणी और मन को रोककर, उन्हें बुद्धि के अधीन कर दे।
Verse 5
एतेषां चेदनुद्रष्टा पुरुषोडपि सुदारुण:,मनुष्य अत्यन्त दारुण हो या सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञाता हो अथवा ब्राह्मण होकर भी वैदिक ज्ञानसे शून्य हो अथवा धर्मपरायण एवं यज्ञशील हो या घोर पापाचारी हो अथवा पुरुषोंमें सिंहके समान शूरवीर हो या बड़े कष्टसे जीवन धारण करता हो, वह यदि इन बारह योगोंका भलीभाँति साक्षात्कार अर्थात् ज्ञान कर ले तो जरा-मृत्युके परम दुर्गम समुद्रसे पार हो जाता है
व्यास ने कहा: मनुष्य चाहे अत्यन्त दारुण हो, या सम्पूर्ण वेदों का ज्ञाता हो; चाहे ब्राह्मण होकर भी वैदिक ज्ञान से शून्य हो; चाहे धर्मपरायण और यज्ञशील हो, या इसके विपरीत घोर पापाचारी हो; चाहे पुरुषों में सिंह के समान शूरवीर हो, या बड़े कष्ट से जीवन धारण करता हो—यदि वह इन बारह योगों का भलीभाँति साक्षात्कार, अर्थात् प्रत्यक्ष ज्ञान कर ले, तो वह जरा-मृत्यु के परम दुर्गम समुद्र से पार हो जाता है।
Verse 6
यदि वा सर्ववेदज्ञो यदि वाप्यनूचो द्विज: । यदि वा धार्मिको यज्वा यदि वा पापकृत्तम:,मनुष्य अत्यन्त दारुण हो या सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञाता हो अथवा ब्राह्मण होकर भी वैदिक ज्ञानसे शून्य हो अथवा धर्मपरायण एवं यज्ञशील हो या घोर पापाचारी हो अथवा पुरुषोंमें सिंहके समान शूरवीर हो या बड़े कष्टसे जीवन धारण करता हो, वह यदि इन बारह योगोंका भलीभाँति साक्षात्कार अर्थात् ज्ञान कर ले तो जरा-मृत्युके परम दुर्गम समुद्रसे पार हो जाता है
व्यास ने कहा: चाहे मनुष्य सर्ववेदज्ञ हो, या अनपढ़ द्विज हो; चाहे वह धर्मात्मा और यज्ञशील हो, या पापियों में भी परम पापी हो—यदि वह इन बारह योगों का साक्षात् ज्ञान कर ले, तो वह जरा-मृत्यु के अत्यन्त दुर्गम समुद्र से पार हो जाता है।
Verse 7
यदि वा पुरुषव्याप्रो यदि वा क्लेशधारित: । तरत्येवं महादुर्ग जरामरणसागरम्,मनुष्य अत्यन्त दारुण हो या सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञाता हो अथवा ब्राह्मण होकर भी वैदिक ज्ञानसे शून्य हो अथवा धर्मपरायण एवं यज्ञशील हो या घोर पापाचारी हो अथवा पुरुषोंमें सिंहके समान शूरवीर हो या बड़े कष्टसे जीवन धारण करता हो, वह यदि इन बारह योगोंका भलीभाँति साक्षात्कार अर्थात् ज्ञान कर ले तो जरा-मृत्युके परम दुर्गम समुद्रसे पार हो जाता है
व्यास ने कहा: चाहे वह पुरुषों में सिंह के समान पराक्रमी हो, या क्लेशों में जीवन धारण करता हो—यदि वह इस प्रकार (इन बारह योगों का) साक्षात् ज्ञान कर ले, तो वह जरा-मृत्यु के महादुर्गम समुद्र से पार हो जाता है।
Verse 8
एवं होतेन योगेन युज्जानो होवमन्ततः । अपि जिज्ञासमानो5पि शब्दब्रह्मातिवर्तते,इस प्रकार सिद्धिपर्यन्त इस योगका अभ्यास करनेवाला पुरुष यदि ब्रह्मका जिज्ञासु हो तो वेदोक्त सकाम कर्मोकी सीमाको लाँघ जाता है
इस प्रकार भली-भाँति साधे हुए योग से युक्त होकर, उसे अन्तिम सिद्धि तक ले जाने वाला पुरुष—यदि वह अभी केवल ब्रह्म का जिज्ञासु ही क्यों न हो—‘शब्द-ब्रह्म’ को, अर्थात् वेदविहित विधि-निषेध और सकाम कर्मों की सीमा को भी लाँघ जाता है।
Verse 9
धर्मोपस्थो हवीवरूथ उपायापायकूबर: । अपानाक्ष: प्राणयुग: प्रज्ञायुर्जीवबन्धन:,यह योग एक सुन्दर रथ है। धर्म ही इसका पिछला भाग या बैठक है। लज्जा आवरण है। पूर्वोक्त तपाय और अपाय इसका कूबर है। अपानवायु धुरा है। प्राणवायु जूआ हैं। बुद्धि आयु है। जीवन बन्धन है। चैतन्य बन्धुर है। सदाचार-ग्रहण इस रथकी नेमि हैं। नेत्र, त्वचा, प्राण और श्रवण इसके वाहन हैं। प्रज्ञा नाभि है। सम्पूर्ण शास्त्र चाबुक है। ज्ञान सारथि है। क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) इसपर रथी बनकर बैठा हुआ है। यह रथ धीरे-धीरे चलनेवाला है। श्रद्धा और इन्द्रिययमन इस रथके आगे-आगे चलनेवाले रक्षक हैं। त्यागरूपी सूक्ष्म गुण इसके अनुगामी (पृष्ठ-रक्षक) हैं। यह मंगलमय रथ ध्यानके पवित्र मार्गपर चलता है। इस प्रकार यह जीवयुक्त दिव्य रथ ब्रह्मलोकमें विराजमान होता है। अर्थात् इसके द्वारा जीवात्मा परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है
व्यासजी बोले—यह योग एक सुन्दर रथ है। धर्म इसका आसन है, लज्जा इसका आवरण है। उचित उपाय और अनुचित का परिहार इसके कूबर हैं। अपान इसकी धुरी है, प्राण इसका जूआ है। प्रज्ञा इसकी आयु है और देहधारी जीवन इसकी बन्धन-रज्जु है।
Verse 10
चेतनाबन्धुरश्वारुश्चाचारग्रहनेमिमान् । दर्शनस्पर्शनवहो प्राणभश्रवणवाहन:,यह योग एक सुन्दर रथ है। धर्म ही इसका पिछला भाग या बैठक है। लज्जा आवरण है। पूर्वोक्त तपाय और अपाय इसका कूबर है। अपानवायु धुरा है। प्राणवायु जूआ हैं। बुद्धि आयु है। जीवन बन्धन है। चैतन्य बन्धुर है। सदाचार-ग्रहण इस रथकी नेमि हैं। नेत्र, त्वचा, प्राण और श्रवण इसके वाहन हैं। प्रज्ञा नाभि है। सम्पूर्ण शास्त्र चाबुक है। ज्ञान सारथि है। क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) इसपर रथी बनकर बैठा हुआ है। यह रथ धीरे-धीरे चलनेवाला है। श्रद्धा और इन्द्रिययमन इस रथके आगे-आगे चलनेवाले रक्षक हैं। त्यागरूपी सूक्ष्म गुण इसके अनुगामी (पृष्ठ-रक्षक) हैं। यह मंगलमय रथ ध्यानके पवित्र मार्गपर चलता है। इस प्रकार यह जीवयुक्त दिव्य रथ ब्रह्मलोकमें विराजमान होता है। अर्थात् इसके द्वारा जीवात्मा परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है
चैतन्य इसका बन्धु है; सदाचार-ग्रहण इसकी नेमि है। दर्शन और स्पर्शन इसके वहन हैं; तथा प्राण और श्रवण इसके वाहन हैं।
Verse 11
प्रज्ञानाभि: सर्वतन्त्रप्रतोदो ज्ञानसारथि: । क्षेत्रज्ञाधिष्ठितो धीर: श्रद्धादमपुर:सर:,यह योग एक सुन्दर रथ है। धर्म ही इसका पिछला भाग या बैठक है। लज्जा आवरण है। पूर्वोक्त तपाय और अपाय इसका कूबर है। अपानवायु धुरा है। प्राणवायु जूआ हैं। बुद्धि आयु है। जीवन बन्धन है। चैतन्य बन्धुर है। सदाचार-ग्रहण इस रथकी नेमि हैं। नेत्र, त्वचा, प्राण और श्रवण इसके वाहन हैं। प्रज्ञा नाभि है। सम्पूर्ण शास्त्र चाबुक है। ज्ञान सारथि है। क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) इसपर रथी बनकर बैठा हुआ है। यह रथ धीरे-धीरे चलनेवाला है। श्रद्धा और इन्द्रिययमन इस रथके आगे-आगे चलनेवाले रक्षक हैं। त्यागरूपी सूक्ष्म गुण इसके अनुगामी (पृष्ठ-रक्षक) हैं। यह मंगलमय रथ ध्यानके पवित्र मार्गपर चलता है। इस प्रकार यह जीवयुक्त दिव्य रथ ब्रह्मलोकमें विराजमान होता है। अर्थात् इसके द्वारा जीवात्मा परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है
प्रज्ञा इसकी नाभि है; समस्त शास्त्र इसका प्रतोद (चाबुक) हैं; ज्ञान इसका सारथि है। इसमें क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) धीर होकर अधिष्ठित है, और श्रद्धा तथा इन्द्रिय-दम इसके आगे-आगे चलते हैं।
Verse 12
त्यागसूक्ष्मानुग: क्षेम्य: शौचगो ध्यानगोचर: । जीवयुक्तो रथो दिव्यो ब्रह्मलोके विराजते,यह योग एक सुन्दर रथ है। धर्म ही इसका पिछला भाग या बैठक है। लज्जा आवरण है। पूर्वोक्त तपाय और अपाय इसका कूबर है। अपानवायु धुरा है। प्राणवायु जूआ हैं। बुद्धि आयु है। जीवन बन्धन है। चैतन्य बन्धुर है। सदाचार-ग्रहण इस रथकी नेमि हैं। नेत्र, त्वचा, प्राण और श्रवण इसके वाहन हैं। प्रज्ञा नाभि है। सम्पूर्ण शास्त्र चाबुक है। ज्ञान सारथि है। क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) इसपर रथी बनकर बैठा हुआ है। यह रथ धीरे-धीरे चलनेवाला है। श्रद्धा और इन्द्रिययमन इस रथके आगे-आगे चलनेवाले रक्षक हैं। त्यागरूपी सूक्ष्म गुण इसके अनुगामी (पृष्ठ-रक्षक) हैं। यह मंगलमय रथ ध्यानके पवित्र मार्गपर चलता है। इस प्रकार यह जीवयुक्त दिव्य रथ ब्रह्मलोकमें विराजमान होता है। अर्थात् इसके द्वारा जीवात्मा परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है
त्यागरूपी सूक्ष्म गुण इसका अनुगामी है; यह क्षेमकारी है, शौच में चलता है और ध्यान के क्षेत्र में विचरता है। जीव से युक्त यह दिव्य रथ ब्रह्मलोक में शोभायमान होता है।
Verse 13
अथ संत्वरमाणस्य रथमेवं युयुक्षत: । अक्षरं गन्तुमनसो विधि वक्ष्यामि शीघ्रगम्
अब जो साधक शीघ्रता से इस प्रकार रथ को युक्त कर रहा है और जिसका मन अक्षर (अविनाशी) को प्राप्त करने में लगा है, उसके लिए मैं शीघ्रगामी—उचित विधि—कहता हूँ।
Verse 14
इस प्रकार योगरथपर आरूढ़ हो साधनकी इच्छा रखनेवाले तथा अविनाशी परब्रह्म परमात्माको तत्काल प्राप्त करनेकी कामनावाले साधकको जिस उपायसे शीघ्र सफलता मिलती है, वह उपाय मैं बता रहा हूँ ।। सप्त या धारणा: कृत्स्ना वाग्यत: प्रतिपद्यते । पृष्ठतः पार्श्वतश्चान्यास्तावत्यस्ता: प्रधारणा:
इस प्रकार योगरथ पर आरूढ़ होकर साधन की अभिलाषा रखनेवाला और अविनाशी परब्रह्म परमात्मा को तत्काल प्राप्त करने की कामना करनेवाला साधक जिस उपाय से शीघ्र सफलता पाता है, वह उपाय मैं बताता हूँ। वाणी का संयम करनेवाला साधक सात पूर्ण धारणाओं का आश्रय ले; और इनके अतिरिक्त पीछे तथा पार्श्व में स्थित अन्य प्रधान धारणाएँ भी उतनी ही हैं।
Verse 15
साधक वाणीका संयम करके पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, बुद्धि और अहंकार-सम्बन्धी सात धारणाओंको सिद्ध करता है। इनके विषयों (गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द, अहंवृत्ति और निश्चय) से सम्बन्धित सात प्रधारणाएँ इनकी पार्श्ववर्तिनी एवं पृष्ठवर्तिनी हैं ।। क्रमश: पार्थिवं यच्च वायव्यं खं तथा पय: । ज्योतिषो यत् तदैश्वर्यमहड्कारस्य बुद्धित: । अव्यक्तस्य तथैश्वर्य क्रमश: प्रतिपद्यते,साधक क्रमशः पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, अहंकार और बुद्धिके ऐश्वर्यपर अधिकार कर लेता है। इसके बाद वह क्रमपूर्वक अव्यक्त ब्रह्मका ऐश्वर्य भी प्राप्त कर लेता है-
साधक वाणी का संयम करके पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, बुद्धि और अहंकार-सम्बन्धी सात धारणाओं को सिद्ध करता है। इनके विषय—गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द, अहंवृत्ति और निश्चय—से सम्बन्धित सात प्रधारणाएँ इनके पार्श्ववर्ती एवं पृष्ठवर्ती हैं। इस प्रकार साधक क्रमशः पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, अहंकार और बुद्धि के ऐश्वर्य पर अधिकार कर लेता है; और तत्पश्चात क्रमपूर्वक अव्यक्त ब्रह्म के ऐश्वर्य को भी प्राप्त करता है।
Verse 16
विक्रमाश्चापि यस्यैते तथा युक्तेषु योगत: । तथा योगस्य युक्तस्य सिद्धिमात्मनि पश्यत:,अब योगाभ्यासमें प्रवृत्त हुए योगियोंमेंसे जिस योगीको ये आगे बताये जानेवाले पृथ्वीजय आदि ऐश्वर्य जिस प्रकार प्राप्त होते हैं; वह बताता हूँ तथा धारणापूर्वक ध्यान करते समय ब्रह्म-प्राप्तिका अनुभव करनेवाले योगीको जो सिद्धि प्राप्त होती है, उसका भी वर्णन करता हूँ
अब योगाभ्यास में प्रवृत्त योगियों में से जिस योगी को ये आगे बताए जानेवाले पृथ्वीजय आदि ऐश्वर्य जिस प्रकार प्राप्त होते हैं, वह मैं बताता हूँ; तथा धारणापूर्वक ध्यान करते समय आत्मा में साक्षात् अनुभव करनेवाले एकाग्र योगी को जो सिद्धि प्राप्त होती है, उसका भी वर्णन करता हूँ।
Verse 17
निर्मुच्यमान: सूक्ष्मत्वाद् रूपाणीमानि पश्यत: । शैशिरस्तु यथा धूम: सूक्ष्म: संश्रयते नभ:,साधक जब स्थूल देहके अभिमानसे मुक्त होकर ध्यानमें स्थित होता है, उस समय सूक्ष्मदृष्टिसे युक्त होनेके कारण उसे कुछ इस तरहके रूप (चिह्न) दिखायी पड़ते हैं। प्रारम्भमें पृथ्वीकी धारणा करते समय मालूम होता है कि शिशिरकालीन कुहरेके समान कोई सूक्ष्म वस्तु सम्पूर्ण आकाशको आच्छादित कर रही है
साधक जब स्थूल देह के अभिमान से मुक्त होकर ध्यान में स्थित होता है, तब सूक्ष्मदृष्टि से युक्त होने के कारण उसे इस प्रकार के कुछ रूप-चिह्न दिखाई पड़ते हैं। आरम्भ में पृथ्वी की धारणा करते समय ऐसा प्रतीत होता है मानो शिशिरकालीन कुहरे के समान कोई सूक्ष्म वस्तु सम्पूर्ण आकाश को आच्छादित कर रही हो और उसमें लीन-सी हो।
Verse 18
तथा देहाद् विमुक्तस्य पूर्व रूपं भवत्युत । अथ धूमस्य विरमे द्वितीयं रूपदर्शनम्,इस प्रकार देहाभिमानसे मुक्त हुए योगीके अनुभवका यह पहला रूप है। जब कुहरा निवृत्त हो जाता है, तब दूसरे रूपका दर्शन होता है
व्यास ने कहा—जो योगी देहाभिमान से मुक्त हो गया है, उसके लिए यह अनुभव का प्रथम रूप है। फिर जब ‘धूम’—अन्तःकरण की मोह-धुन्ध—शान्त हो जाती है, तब दूसरे रूप का दर्शन होता है।
Verse 19
जलरूपमिवाकाशे तथैवात्मनि पश्यति । अपां व्यतिक्रमे चास्य वह्लिरूपं प्रकाशते,वह सम्पूर्ण आकाशमें जल-ही-जल-सा देखता है तथा आत्माको भी जलरूप अनुभव करता है (यह अनुभव जलतत्त्वकी धारणा करते समय होता है)। फिर जलका लय हो जानेपर अग्नितत्त्वकी धारणा करते समय उसे सर्वत्र अग्नि प्रकाशित दिखायी देती है
व्यास ने कहा—वह मानो समस्त आकाश को जल-ही-जल देखता है और उसी प्रकार आत्मा को भी जलरूप अनुभव करता है—यह जलतत्त्व की धारणा में होता है। फिर जब वह जलावस्था लीन हो जाती है, तब अग्नितत्त्व की धारणा में उसे सर्वत्र अग्नि ही प्रकाशित दिखायी देती है।
Verse 20
तस्मिन्नुपरते5जो5स्य पीतशब्त्र: प्रकाशते । ऊर्णारूपसवर्णस्य तस्य रूप॑ प्रकाशते,उसके भी लय हो जानेपर योगीको आकाशमें सर्वत्र फैले हुए वायुका ही अनुभव होता है। उस समय वृक्ष और पर्वत आदि अपने समस्त शस्त्रोंको पी जानेके कारण वायुकी “पीतशस्त्र' संज्ञा हो जाती है अर्थात् पृथ्वी, जल और तेजरूप समस्त पदार्थोकी निगलकर वायु केवल आकाशगमें ही आन्दोलित होता रहता है और साधक स्वयं भी ऊनके धागेके समान अत्यन्त छोटा और हलका होकर अपनेको निराधार आकाशगमें वायुके साथ ही स्थित मानता है
व्यास ने कहा—जब वह तेज भी लीन हो जाता है, तब ‘पीतशस्त्र’ नाम से वायु प्रकट होती है, मानो उसने अन्य सब शक्तियों को निगल लिया हो। तब योगी को खुले आकाश में सर्वत्र व्याप्त वायु की ही गति का अनुभव होता है। और उसका अपना रूप ऊन के तन्तु के समान अत्यन्त सूक्ष्म—हलका, अल्प, और मानो निराधार—दिखायी देता है; वह आकाश की विशालता में वायु के साथ ही स्थित जान पड़ता है।
Verse 21
अथ श्चैतां गतिं गत्वा वायव्यं सूक्ष्ममप्युत । अशुक्लं चेतस: सौक्ष्म्यमप्युक्तं ब्राह्मणस्य वै,तदनन्तर तेजका संहार और वायु-तत्त्वपर विजय प्राप्त होनेके पश्चात् वायुका सूक्ष्म रूप स्वच्छ आकाशगमें लीन हो जाता है और केवल नीलाकाशमात्र शेष रह जाता है। उस अवस्थामें ब्रह्मभावको प्राप्त होनेकी इच्छा रखनेवाले योगीका चित्त अत्यन्त सूक्ष्म हो जाता है, ऐसा बताया गया है। (उसे अपने स्थूल रूपका तनिक भी भान नहीं रहता। यही वायुका लय और आकाशतत्त्वपर विजय कहलाता है)
व्यास ने कहा—फिर उस मार्ग पर आगे बढ़कर वह सूक्ष्म वायव्य तत्त्व तक पहुँचता है और उसे भी पार कर जाता है। ब्रह्म-प्राप्ति की अभिलाषा रखने वाले ब्राह्मण-साधक के लिए कहा गया है कि उसका चित्त अत्यन्त सूक्ष्म और ‘अशुक्ल’ हो जाता है—अर्थात् सामान्य प्रकट गुण-चिह्नों से रहित—जो स्थूल अहंभाव के भीतर-भीतर विलय का संकेत है।
Verse 22
एतेष्वपि हि जातेषु फलजातानि मे शृणु । जातस्य पार्थिविश्वर्य: सृष्टिरत्र विधीयते,इन सब लक्षणोंके प्रकट हो जानेपर योगीको जो-जो फल प्राप्त होते हैं, उन्हें मुझसे सुनो। पार्थिव ऐश्वर्यकी सिद्धि हो जानेपर योगीमें सृष्टि करनेकी शक्ति आ जाती है
व्यास ने कहा—इन लक्षणों के प्रकट हो जाने पर जो-जो फल उत्पन्न होते हैं, उन्हें मुझसे सुनो। जब पार्थिव ऐश्वर्य की सिद्धि हो जाती है, तब यहाँ साधक को सृष्टि-शक्ति प्रदान की जाती है—अर्थात् परिणामों को उत्पन्न करने और व्यवस्थित करने की सामर्थ्य।
Verse 23
प्रजापतिरिवाक्षो भ्य: शरीरात् सृजते प्रजा: । अड्गुल्यड्गुष्ठमात्रेण हस्तपादेन वा तथा
जैसे प्रजापति, वैसे ही अचल परमात्मा अपने ही शरीर से प्रजाओं की सृष्टि करता है; और वह तो केवल उँगली या अँगूठे के परिमाण से, अथवा हाथ-पाँव से भी उसी प्रकार सृष्टि कर सकता है।
Verse 24
आकाशभूतश्चाकाशे सवर्णत्वात् प्रकाशते
जो आकाश-स्वरूप हो गया है, वह आकाश में ही प्रकट होता है, क्योंकि वह उसी के समान स्वभाव वाला है।
Verse 25
न चास्य तेजसा रूप॑ दृश्यते शाम्यते तथा । अहड्कारे5स्य विजिते पज्चैते स्युर्वशानुगा:,अग्नितत्त्वको सिद्ध कर लेनेपर वह अपने शरीरको इतना तेजस्वी बना लेता है कि कोई उसकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकता और न उसके तेजको बुझा ही सकता है। अहंकारको जीत लेनेपर पाँचों भूत योगीके वशमें हो जाते हैं
उसके तेज से उसका रूप देखा नहीं जाता और न ही उसका तेज शांत किया जा सकता। और जब उसका अहंकार जीत लिया जाता है, तब ये पाँचों महाभूत उसके वश में होकर उसके अनुगामी हो जाते हैं।
Verse 26
षण्णामात्मनि बुद्धौ च जितायां प्रभवत्यथ । निर्दोषप्रतिभा होनं॑ कृत्स्ना समभिवर्तते,पञ्चभूत और अहंकार--इन छ: तत्त्वोंका आत्मा है बुद्धि। उसको जीत लेनेपर सम्पूर्ण ऐश्वर्योंकी प्राप्ति हो जाती है तथा उस योगीको निर्दोष प्रतिभा (विशुद्ध तत्त्वज्ञान) पूर्ण रूपसे प्राप्त हो जाती है
जब आत्मा में स्थित—इन छह तत्त्वों से संबद्ध—बुद्धि भी जीत ली जाती है, तब सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्रकट हो उठते हैं; और उस योगी को निर्दोष प्रतिभा, अर्थात् विशुद्ध तत्त्वज्ञान, पूर्ण रूप से प्राप्त हो जाता है।
Verse 27
तथैव व्यक्तमात्मानमव्यक्तं प्रतिपद्यते । यतो निःसरते लोको भवति व्यक्तसंज्ञक:,उपर्युक्त सप्त पदार्थोंका कार्यभूत व्यक्त जगत् अव्यक्त परमात्मामें ही विलीन हो जाता है, क्योंकि उन्हीं परमात्मासे यह जगत् उत्पन्न होता है और व्यक्त नाम धारण करता है
उसी प्रकार व्यक्त जगत् अव्यक्त परमात्मा में ही प्रविष्ट हो जाता है; क्योंकि उसी परमात्मा से यह लोक निकलता है और ‘व्यक्त’ नाम धारण करता है।
Verse 28
तत्राव्यक्तमयीं विद्यां शृणु त्वं विस्तरेण मे । तथा व्यक्तमयं चैव सांख्ये पूर्व निबोध मे,वत्स! तुम सांख्यदर्शनमें वर्णित अव्यक्तविद्याका विस्तारपूर्वक मुझसे श्रवण करो। सर्वप्रथम सांख्यशास्त्रमें कथित व्यक्तविद्याको मुझसे समझो
व्यासजी बोले—अब तुम मुझसे अव्यक्त-विद्या का विस्तारपूर्वक श्रवण करो। और हे वत्स! पहले सांख्य में प्रतिपादित व्यक्त-विद्या को मुझसे भलीभाँति समझो।
Verse 29
पज्चविंशति तत्त्वानि तुल्यान्युभयत: समम् | योगे सांख्येडपि च तथा विशेषं तत्र मे शूणु,सांख्य और पातञ्जलयोग--इन दोनों दर्शनोंमें समानभावसे पचीस तत्त्वोंका प्रतिपादन किया गया है-। इस विषयमें जो विशेष बात है, वह मुझसे सुनो
व्यासजी बोले—योग और सांख्य—इन दोनों में समान रूप से पचीस तत्त्वों का प्रतिपादन किया गया है। अब इसमें जो विशेष बात समझने योग्य है, वह मुझसे सुनो।
Verse 30
प्रोक्त तद् व्यक्तमित्येव जायते वर्धते च यत् । जीर्यते प्रियते चैव चतुर्भिलक्षणैर्युतम्,जन्म, वृद्धि, जरा और मरण--इन चार लक्षणोंसे युक्त जो तत्त्व है, उसीको व्यक्त कहते हैं
व्यासजी बोले—जिस तत्त्व में जन्म होता है, वृद्धि होती है, जरा आती है और अंत में मरण होता है—इन चार लक्षणों से युक्त उसी को ‘व्यक्त’ कहा गया है।
Verse 31
विपरीतमतो यत् तु तदव्यक्तमुदाह्मतम् । द्वावात्मानौ च वेदेषु सिद्धान्तेष्वप्युदाहृतो,जो तत्त्व इसके विपरीत हैं अर्थात् जिसमें जन्म आदि चारों विकार नहीं हैं, उसे अव्यक्त कहा गया है। वेदों और सिद्धान्तप्रतिपादक शास्त्रोंमें उस अव्यक्तके दो भेद बताये गये हैं--जीवात्मा और परमात्मा
व्यासजी बोले—जो तत्त्व व्यक्त के विपरीत है, अर्थात् जिसमें जन्म आदि चार विकार नहीं हैं, उसे ‘अव्यक्त’ कहा गया है। वेदों तथा सिद्धान्त-प्रतिपादक शास्त्रों में यह अव्यक्त दो प्रकार का बताया गया है—जीवात्मा और परमात्मा।
Verse 32
चतुर्लक्षणजं त्वाद्य॑ चतुर्वर्ग प्रचक्षते । व्यक्तमव्यक्तजं चैव तथा बुद्धमथेतरत् । सच्चं क्षेत्रज्ञ इत्येतद् द्वयमप्यनुदर्शितम्,अव्यक्त होते हुए भी जीवात्मा व्यक्तके सम्पर्कसे जन्म, वृद्धि, जरा और मृत्यु--इन चार लक्षणोंसे युक्त तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष--इन चार पुरुषार्थोंसे सम्बन्धित कहा जाता है। दूसरा अव्यक्त परमात्मा ज्ञानस्वरूप है। व्यक्त (जडवर्ग) की उत्पत्ति उसी अव्यक्त (परमात्मा) से होती है। व्यक्तको सत्त्व (जडवर्ग--श्षेत्र) तथा अव्यक्त जीवात्माको क्षेत्रज्ञ कहा जाता है। इस प्रकार इन दोनोंहीका वर्णन किया गया है। वेदोंमें भी पूर्वोक्त दो आत्मा बताये गये हैं। विषयोंमें आसक्त हुआ जीवात्मा जब आसक्तिरहित होकर विषयोंसे निवृत्त हो जाता है, तब वह मुक्त कहलाता है। सांख्यवादियोंके मतमें यही मोक्षका लक्षण है
व्यासजी बोले—आदि आत्मा (जीव) अव्यक्त होते हुए भी व्यक्त के संसर्ग से जन्म, वृद्धि, जरा और मृत्यु—इन चार लक्षणों से युक्त तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—इन चार पुरुषार्थों से सम्बद्ध कहा जाता है। दूसरा अव्यक्त परमात्मा बुद्धि-स्वरूप, ज्ञानमय है; उसी अव्यक्त से यह व्यक्त-जगत् उत्पन्न होता है। ‘सत्’ को क्षेत्र (जड़-समष्टि) और जीवात्मा को क्षेत्रज्ञ कहा गया है—इस प्रकार इन दोनों का निरूपण किया गया है।
Verse 33
द्वावात्मानौ च वेदेषु विषयेष्वनुरज्यत: । विषयात् प्रतिसंहार: सांख्यानां सिद्धि लक्षणम्,अव्यक्त होते हुए भी जीवात्मा व्यक्तके सम्पर्कसे जन्म, वृद्धि, जरा और मृत्यु--इन चार लक्षणोंसे युक्त तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष--इन चार पुरुषार्थोंसे सम्बन्धित कहा जाता है। दूसरा अव्यक्त परमात्मा ज्ञानस्वरूप है। व्यक्त (जडवर्ग) की उत्पत्ति उसी अव्यक्त (परमात्मा) से होती है। व्यक्तको सत्त्व (जडवर्ग--श्षेत्र) तथा अव्यक्त जीवात्माको क्षेत्रज्ञ कहा जाता है। इस प्रकार इन दोनोंहीका वर्णन किया गया है। वेदोंमें भी पूर्वोक्त दो आत्मा बताये गये हैं। विषयोंमें आसक्त हुआ जीवात्मा जब आसक्तिरहित होकर विषयोंसे निवृत्त हो जाता है, तब वह मुक्त कहलाता है। सांख्यवादियोंके मतमें यही मोक्षका लक्षण है
व्यास ने कहा—वेदों में दो आत्माओं का वर्णन है। जब जीवात्मा विषयों में आसक्त होता है तब बन्धन होता है; और जब वह उन विषयों से संहार करके लौट आता है, तब वही सांख्य के अनुसार सिद्धि—अर्थात् मोक्ष—का लक्षण है।
Verse 34
निर्ममश्चनानहड्कारो निर्टन्डश्छिन्नसंशय: । नैव क्रुद्धय॑ति न द्वेष्टि नानृता भाषते गिर:,सम: सर्वेषु भूतेषु ब्रह्माणमभिवर्तते । जिसने ममता और अहंकारका त्याग कर दिया है, जो शीत, उष्ण आदि द््दोंको समानभावसे सहता है, जिसके संशय दूर हो गये हैं, जो कभी क्रोध और द्वेष नहीं करता, झूठ नहीं बोलता, किसीकी गाली सुनकर और मार खाकर भी उसका अहित नहीं सोचता, सबपर मित्रभाव ही रखता है, जो मन, वाणी और कर्मसे किसी जीवको कष्ट नहीं पहुँचाता और समस्त प्राणियोंपर समानभाव रखता है, वही योगी ब्रह्मभावको प्राप्त होता है
व्यास ने कहा—जो ममता और अहंकार से रहित है, दण्ड देने की प्रवृत्ति से दूर है, जिसके संशय कट गये हैं, जो न क्रोध करता है न द्वेष, और जिसकी वाणी असत्य नहीं बोलती—वह सब प्राणियों के प्रति समभाव रखकर ब्रह्म को प्राप्त होता है।
Verse 35
आक्रुष्टस्ताडितश्वैव मैत्रेण ध्याति नाशुभम् । वाग्दण्डकर्ममनसां त्रयाणां च निवर्तक:
गाली सुनकर और मार खाकर भी जो मैत्रीभाव से अशुभ का चिन्तन नहीं करता, वही वाणी, दण्ड (कर्म) और मन—इन तीनों को पाप से रोककर निवृत्त करता है।
Verse 36
चक्षुराहारसंहारैर्मनसा दर्शनेन च । समाहितचित्त मुनिको चाहिये कि वह हृदयके राग आदि दोषोंको नष्ट करके योगमें सहायता पहुँचानेवाले देश, कर्म, अनुराग, अर्थ, उपाय, अपाय, निश्चय, चक्षुष, आहार, संहार, मन और दर्शन--इन बारह योगोंका आश्रय ले ध्यानयोगका अभ्यास करे",नैवेच्छति न चानिच्छो यात्रामात्रव्यवस्थित: जो किसी वस्तुकी न तो इच्छा करता है, न अनिच्छा ही करता है, जीवन- निर्वाहमात्रके लिये जो कुछ मिल जाता है, उसीपर संतोष करता है, जो निर्लोभ, व्यथारहित और जितेन्द्रिय है, जिसको न तो कुछ करनेसे प्रयोजन है और न कुछ न करनेसे ही, जिसकी इन्द्रियाँ और मन कभी चंचल नहीं होते, जिसका मनोरथ पूर्ण हो गया है, जो समस्त प्राणियोंपर समान दृष्टि और मैत्रीभाव रखता है, मिट्टीके ढेले, पत्थर और स्वर्णको एक-सा समझता है, जिसकी दृष्टिमें प्रिय और अप्रियका भेद नहीं है, जो धीर है और अपनी निन्दा तथा स्तुतिमें सम रहता है, जो सम्पूर्ण भोगोंमें स्पृहारहित है, जो दृढ़तापूर्वक ब्रह्मचर्य-व्रतमें स्थित है तथा जो सब प्राणियोंमें हिंसाभावसे रहित है, ऐसा सांख्ययोगी (ज्ञानी) संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है
व्यास ने कहा—समाहितचित्त मुनि को पहले राग आदि अन्तर्दोषों का नाश करके ध्यानयोग का अभ्यास करना चाहिए और योग में सहायक बारह आश्रयों—उचित देश, उचित कर्म, संयमित अनुराग, यथार्थ प्रयोजन, कुशल उपाय, अपाय-बोध, दृढ़ निश्चय, नेत्र-निग्रह, आहार-नियम, संहार (संयम), मनोनिग्रह और सम्यक् दर्शन—का आश्रय लेना चाहिए। ऐसा ज्ञानी न किसी वस्तु की इच्छा करता है, न द्वेषवश अनिच्छा; जीवन-निर्वाह मात्र के लिए जो मिल जाए उसी में संतुष्ट रहता है।
Verse 37
अलोलुपो&व्यथो दान्तो न कृती न निराकृति: । नास्येन्द्रियमनेकाग्रं न विक्षिप्तमनोरथ:,जो किसी वस्तुकी न तो इच्छा करता है, न अनिच्छा ही करता है, जीवन- निर्वाहमात्रके लिये जो कुछ मिल जाता है, उसीपर संतोष करता है, जो निर्लोभ, व्यथारहित और जितेन्द्रिय है, जिसको न तो कुछ करनेसे प्रयोजन है और न कुछ न करनेसे ही, जिसकी इन्द्रियाँ और मन कभी चंचल नहीं होते, जिसका मनोरथ पूर्ण हो गया है, जो समस्त प्राणियोंपर समान दृष्टि और मैत्रीभाव रखता है, मिट्टीके ढेले, पत्थर और स्वर्णको एक-सा समझता है, जिसकी दृष्टिमें प्रिय और अप्रियका भेद नहीं है, जो धीर है और अपनी निन्दा तथा स्तुतिमें सम रहता है, जो सम्पूर्ण भोगोंमें स्पृहारहित है, जो दृढ़तापूर्वक ब्रह्मचर्य-व्रतमें स्थित है तथा जो सब प्राणियोंमें हिंसाभावसे रहित है, ऐसा सांख्ययोगी (ज्ञानी) संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है
व्यास ने कहा—वह लोभ से रहित, व्यथा से रहित और दान्त है; न तो वह कर्म-उन्माद से चलाया जाता है, न बाह्य आडम्बर से पहचाना जाता है। उसकी इन्द्रियाँ अनेक दिशाओं में बिखरी नहीं रहतीं और उसके मनोरथ चंचल इच्छाओं से विक्षिप्त नहीं होते।
Verse 38
सर्वभूतसदृड्मैत्र: समलोष्टाश्मकाउ्चन: । तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति:,जो किसी वस्तुकी न तो इच्छा करता है, न अनिच्छा ही करता है, जीवन- निर्वाहमात्रके लिये जो कुछ मिल जाता है, उसीपर संतोष करता है, जो निर्लोभ, व्यथारहित और जितेन्द्रिय है, जिसको न तो कुछ करनेसे प्रयोजन है और न कुछ न करनेसे ही, जिसकी इन्द्रियाँ और मन कभी चंचल नहीं होते, जिसका मनोरथ पूर्ण हो गया है, जो समस्त प्राणियोंपर समान दृष्टि और मैत्रीभाव रखता है, मिट्टीके ढेले, पत्थर और स्वर्णको एक-सा समझता है, जिसकी दृष्टिमें प्रिय और अप्रियका भेद नहीं है, जो धीर है और अपनी निन्दा तथा स्तुतिमें सम रहता है, जो सम्पूर्ण भोगोंमें स्पृहारहित है, जो दृढ़तापूर्वक ब्रह्मचर्य-व्रतमें स्थित है तथा जो सब प्राणियोंमें हिंसाभावसे रहित है, ऐसा सांख्ययोगी (ज्ञानी) संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है
व्यास ने कहा—जिसकी मैत्री सब प्राणियों के प्रति दृढ़ और समान है, जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और स्वर्ण को एक-सा समझता है, जिसे प्रिय-अप्रिय में भेद नहीं, जो धीर है और निन्दा-स्तुति में सम रहता है—वही सांख्ययोगी है। ऐसा पुरुष स्पृहारहित, अंतःक्षोभरहित, जीवन-निर्वाह मात्र के लिए जो मिल जाए उसी में संतुष्ट, इन्द्रिय-निग्रही और समचित्त होकर संसार-बन्धन से मुक्त हो जाता है।
Verse 39
अस्पृह: सर्वकामेभ्यो ब्रह्म॒चर्यदृढव्रत: । अहिंख: सर्वभूतानामीदृक् सांख्यो विमुच्यते,जो किसी वस्तुकी न तो इच्छा करता है, न अनिच्छा ही करता है, जीवन- निर्वाहमात्रके लिये जो कुछ मिल जाता है, उसीपर संतोष करता है, जो निर्लोभ, व्यथारहित और जितेन्द्रिय है, जिसको न तो कुछ करनेसे प्रयोजन है और न कुछ न करनेसे ही, जिसकी इन्द्रियाँ और मन कभी चंचल नहीं होते, जिसका मनोरथ पूर्ण हो गया है, जो समस्त प्राणियोंपर समान दृष्टि और मैत्रीभाव रखता है, मिट्टीके ढेले, पत्थर और स्वर्णको एक-सा समझता है, जिसकी दृष्टिमें प्रिय और अप्रियका भेद नहीं है, जो धीर है और अपनी निन्दा तथा स्तुतिमें सम रहता है, जो सम्पूर्ण भोगोंमें स्पृहारहित है, जो दृढ़तापूर्वक ब्रह्मचर्य-व्रतमें स्थित है तथा जो सब प्राणियोंमें हिंसाभावसे रहित है, ऐसा सांख्ययोगी (ज्ञानी) संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है
व्यास ने कहा—जो समस्त काम्य-विषयों के प्रति स्पृहारहित है, जो ब्रह्मचर्य के दृढ़ व्रत में स्थिर है, और जो सभी प्राणियों के प्रति अहिंसक है—ऐसा सांख्य (विवेकनिष्ठ ज्ञानी) संसार-बन्धन से मुक्त हो जाता है।
Verse 40
यथा योगाद् विमुच्यन्ते कारणैर्यर्निबोध तत् । योगैश्वर्यमतिक्रान्तो यो निष्क्रामति मुच्यते,योगी जिस प्रकार और जिन कारणोंसे योगके फल-स्वरूप मोक्ष लाभ करते हैं, अब उन्हें बताता हूँ सुनो। जो परवैराग्यके बलसे योगजनित ऐश्वर्यको लाँघकर उसकी सीमासे बाहर निकल जाता है, वही मुक्त होता है
व्यास ने कहा—योग के द्वारा किस प्रकार और किन कारणों से मुक्ति होती है, उसे मुझसे समझो। जो योग से उत्पन्न ऐश्वर्यों को परवैराग्य के बल से लाँघकर उनकी सीमा के पार निकल जाता है, वही वास्तव में मुक्त होता है।
Verse 41
इत्येषा भावजा बुद्धि: कथिता ते न संशय: । एवं भवति निर्द॑न्द्वो ब्रह्माणं चाधिगच्छति,बेटा! यह तुम्हारे निकट मैंने भावशुद्धिसे प्राप्त होनेवाली बुद्धिका वर्णन किया है। जो उपर्युक्तरूपसे साधना करके द्वन्द्"ोंसे रहित हो जाता है, वही ब्रह्मभावको प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं है
व्यास ने कहा—इस प्रकार मैंने तुम्हें भावशुद्धि और सम्यक् प्रवृत्ति से उत्पन्न होने वाली बुद्धि का वर्णन किया; इसमें संशय नहीं। जो इस प्रकार साधना करके द्वन्द्वों से रहित हो जाता है, वही ब्रह्म को प्राप्त होता है—इसमें कोई अनिश्चितता नहीं।
Verse 43
ज्ञानेन यच्छेदात्मानं य इच्छेच्छान्तिमात्मन: । जो उत्तम ज्ञान प्राप्त करना चाहता हो, उसे बुद्धिके द्वारा मन और वाणीको जीतना चाहिये तथा जो अपने लिये शान्ति चाहे, उसे ज्ञानद्वारा बुद्धिको परमात्मामें नियन्त्रित करना चाहिये
व्यास ने कहा—मनुष्य को ज्ञान के द्वारा अपने-आप को संयमित करना चाहिए। जो अपने लिए शान्ति चाहता है, वह सत्य-बोध के बल से बुद्धि को परमात्मा के अधीन करे—और इस प्रकार मन तथा वाणी को वश में रखकर अंतःकरण को शान्ति में स्थिर करे।
Verse 235
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ पैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में शुकदेव के अनुप्रश्न-विषयक दो सौ पैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 236
पृथिवीं कम्पयत्येको गुणो वायोरिति श्रुति: । वह प्रजापतिके समान क्षोभरहित होकर अपने शरीरसे प्रजाकी सृष्टि कर सकता है। जिसको वायुतत्त्व सिद्ध हो जाता है, वह बिना किसीकी सहायताके हाथ-पैर, अँगूठे अथवा अंगुलिमात्रसे दबाकर पृथ्वीको कम्पित कर सकता है-- ऐसा सुननेमें आया है,इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने षट्त्रिंशदधिकद्धिशततमो< ध्याय: इस प्रकार श्रीमह्ााभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
श्रुति में सुना गया है कि वायु का एक गुण भी पृथ्वी को कम्पित कर देता है। जिसे वायुतत्त्व सिद्ध हो जाता है, वह क्षोभरहित होकर अपने ही शरीर से प्रजा की सृष्टि कर सकता है; और बिना किसी सहायता के हाथ, पैर, अँगूठे अथवा केवल अंगुलिमात्र से दबाकर भी पृथ्वी को कम्पित कर सकता है—ऐसा कहा गया है। इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में शुकानुप्रश्न-विषयक दो सौ छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 246
वर्णतो गुह्ते चापि कामात् पिबति चाशयान् | आकाशको सिद्ध करनेवाला पुरुष आकाशमें आकाशके ही समान सर्वव्यापी हो जाता है। वह अपने शरीरको अन्तर्धान करनेकी शक्ति प्राप्त कर लेता है। जिसका जलतत्त्वपर अधिकार होता है, वह इच्छा करते ही बड़े-बड़े जलाशयोंको पी जाता है
आकाश को सिद्ध करनेवाला पुरुष आकाश के ही समान सर्वव्यापी हो जाता है और अपने शरीर को अन्तर्धान करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है। जिसका जलतत्त्व पर अधिकार होता है, वह इच्छा करते ही बड़े-बड़े जलाशयों को पी जाता है।
Verse 356
सम: सर्वेषु भूतेषु ब्रह्माणमभिवर्तते । जिसने ममता और अहंकारका त्याग कर दिया है, जो शीत, उष्ण आदि द््दोंको समानभावसे सहता है, जिसके संशय दूर हो गये हैं, जो कभी क्रोध और द्वेष नहीं करता, झूठ नहीं बोलता, किसीकी गाली सुनकर और मार खाकर भी उसका अहित नहीं सोचता, सबपर मित्रभाव ही रखता है, जो मन, वाणी और कर्मसे किसी जीवको कष्ट नहीं पहुँचाता और समस्त प्राणियोंपर समानभाव रखता है, वही योगी ब्रह्मभावको प्राप्त होता है
जो सब प्राणियों के प्रति समभाव रखता है, वही ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है। जिसने ममता और अहंकार का त्याग कर दिया है, जो शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वों को समानभाव से सहता है, जिसके संशय दूर हो गये हैं, जो कभी क्रोध और द्वेष नहीं करता, झूठ नहीं बोलता, गाली सुनकर और मार खाकर भी किसी का अहित नहीं सोचता, सबके प्रति मित्रभाव ही रखता है; जो मन, वाणी और कर्म से किसी जीव को कष्ट नहीं पहुँचाता और समस्त प्राणियों पर समान दृष्टि रखता है—वही योगी ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है।
The text marks the transition by signs of aging (e.g., wrinkles/gray hair) and generational continuity (children having children), after which one withdraws to the forest while maintaining disciplined duties.
Ritual responsibility is progressively refined: external sacrificial maintenance is upheld in vānaprastha, then redirected inward by ‘placing the fires in the self,’ aligning practice with self-mastery, non-attachment, and liberation-oriented equanimity.
Yes: it links disciplined forest practice and fearlessness toward beings with purified passage between āśramas and luminous post-mortem destinations, while emphasizing that the highest trajectory depends on self-knowledge and restraint rather than mere external performance.