Vānaprastha-vṛtti and the Transition toward the Fourth Āśrama (वानप्रस्थवृत्तिः चतुर्थाश्रमोपक्रमश्च)
प्रजापतिरिवाक्षो भ्य: शरीरात् सृजते प्रजा: । अड्गुल्यड्गुष्ठमात्रेण हस्तपादेन वा तथा
prajāpatir ivākṣobhyaḥ śarīrāt sṛjate prajāḥ | aṅguly-aṅguṣṭha-mātreṇa hasta-pādena vā tathā ||
जैसे प्रजापति, वैसे ही अचल परमात्मा अपने ही शरीर से प्रजाओं की सृष्टि करता है; और वह तो केवल उँगली या अँगूठे के परिमाण से, अथवा हाथ-पाँव से भी उसी प्रकार सृष्टि कर सकता है।
व्यास उवाच