Vānaprastha-vṛtti and the Transition toward the Fourth Āśrama (वानप्रस्थवृत्तिः चतुर्थाश्रमोपक्रमश्च)
तथैव व्यक्तमात्मानमव्यक्तं प्रतिपद्यते । यतो निःसरते लोको भवति व्यक्तसंज्ञक:
उसी प्रकार व्यक्त जगत् अव्यक्त परमात्मा में ही प्रविष्ट हो जाता है; क्योंकि उसी परमात्मा से यह लोक निकलता है और ‘व्यक्त’ नाम धारण करता है।
व्यास उवाच