Adhyaya 231
Shanti ParvaAdhyaya 23134 Verses

Adhyaya 231

आत्मदर्शन-उपदेशः (Ātma-darśana Upadeśa) — Mind, Senses, and the All-pervading Self

Upa-parva: Mokṣa-dharma (Liberation Teachings) — Adhyāya 231 Context Unit

Bhīṣma introduces an embedded instruction and praises the ‘paramarṣi’ teaching oriented to mokṣadharma. Śuka asks how a person endowed with household and Vedic qualifications can reach Brahman, and requests a clear account whether by Sāṃkhya or Yoga. Vyāsa replies that realization is not attained without knowledge joined to tapas, indriya-nigraha, and sarva-saṃnyāsa (comprehensive relinquishment). He then presents an analytic map of embodiment: the mahābhūtas are said to be established in living bodies; specific functions and deities are correlated with bodily loci (e.g., sight with light, digestion with fire), and the five sense-gates present their objects (sound, touch, form, taste, smell) to the mind. The mind is described as the governor of the senses, while the bhūtātman, seated in the heart, governs the mind; prāṇa and apāna are named as constant factors in embodied life. The discourse turns to the visibility of the self: the mahān ātman is not grasped by ordinary senses but shines to a ‘kindled’ mind; it is characterized as beyond sound/touch/form/taste/smell, imperishable, and to be discerned as bodiless within the body. One who perceives the unmanifest within manifest beings becomes fit for brahma-bhūya. Ethical cognition follows: the wise are equal-seeing across social and species distinctions, since one great self pervades all beings; seeing self in all and all in self is presented as the condition of ‘becoming Brahman.’ The chapter further describes the subtlety and all-pervasiveness of the principle (beyond spatial capture, subtler than the subtle, greater than the great), introduces the kṣara/akṣara distinction, and uses the ‘nine-gated city’ and haṃsa imagery to indicate the sovereign, disciplined inner principle; knowing the kūṭastha akṣara, the knower relinquishes prāṇa-bound rebirth.

Chapter Arc: युधिष्ठिर, शान्ति-पर्व के मोक्षधर्म-प्रसंग में, लोक-तत्त्व और प्राणियों की गति-अगति का रहस्य जानने की तीव्र जिज्ञासा से प्रश्न उठाते हैं—यह सृष्टि-नाश और आवागमन किससे प्रवर्तित होता है? → भीष्म उत्तर देने के लिए एक पुरातन इतिहास का द्वार खोलते हैं: शुकदेव का व्यास से प्रश्न—काल, सृष्टि-प्रलय, और ब्राह्मण-धर्म के कर्तव्य का निश्चय। जिज्ञासा ‘किसने बनाया’ से आगे बढ़कर ‘काल कैसे चलाता है’ और ‘युग-धर्म कैसे घटता-बढ़ता है’ तक पहुँचती है। → युग-चक्र और ब्रह्मा के दिन-रात्रि का विराट मापन सामने आता है—कृत, त्रेता, द्वापर, कलि में धर्म का क्रमशः क्षय; और सहस्र-चतुर्युगों से ब्रह्मा का एक दिन, उतनी ही रात्रि—प्रलय में ईश्वर का ध्यान-निद्रा और फिर सृष्टि का पुनरुदय। काल का स्वरूप यहाँ ‘घड़ी’ नहीं, ‘सृष्टि की श्वास’ बनकर प्रकट होता है। → भीष्म, शुक-व्यास संवाद के माध्यम से यह स्थिर करते हैं कि लोक-तत्त्व, भूतों की गति, और युग-धर्म का परिवर्तन काल-नियम से बँधा है; जो ब्रह्मा के दिन-रात्रि को यथार्थ जानता है, वही काल-ज्ञान में स्थित होकर संसार-परिवर्तन को सम्यक् समझता है। → काल-चक्र का यह मापन आगे ‘जीव की मुक्ति-यात्रा’ और ‘कर्तव्य बनाम वैराग्य’ के सूक्ष्म निर्णयों की भूमि तैयार करता है—अब प्रश्न यह रह जाता है कि इस ज्ञान के प्रकाश में मनुष्य अपना आचरण कैसे स्थिर करे।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माज बछ। जि एकत्रिशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: शुकदेवजीका प्रश्न और व्यासजीका उनके प्रश्नोंका उत्तर देते हुए कालका स्वरूप बताना युधिछिर उवाच आद्यन्तं सर्वभूतानां ज्ञातुमिच्छामि कौरव । ध्यानं कर्म च काल॑ च तथैवायुर्युगे युगे,युधिष्ठिरने पूछा--कुरुनन्दन! अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति किससे होती है? उनका अन्त कहाँ होता है? परमार्थकी प्राप्तिके लिये किसका ध्यान और किस कर्मका अनुष्ठान करना चाहिये? कालका क्या स्वरूप है? तथा भिन्न-भिन्न युगोंमें मनुष्योंकी कितनी आयु होती है?

युधिष्ठिर ने कहा—हे कौरव! मैं समस्त भूतों का आदि और अन्त जानना चाहता हूँ। परम श्रेय के लिए किसका ध्यान करना चाहिए और किस कर्म का अनुष्ठान? काल का स्वरूप क्या है, तथा युग-युग में मनुष्यों की आयु कितनी होती है?

Verse 2

लोकतत्त्वं च कार्त्स्न्येन भूतानामागतिं गतिम्‌ । सर्गश्न निधनं चैव कुत एतत्‌ प्रवर्तते,मैं लोकका तत्त्व पूर्णरूपसे जानना चाहता हूँ। प्राणियोंक आवागमन और सृष्टि-प्रलय किससे होते हैं?

युधिष्ठिर ने कहा—मैं लोक-तत्त्व को पूर्ण रूप से जानना चाहता हूँ। प्राणियों का आवागमन और सृष्टि तथा प्रलय—यह सब किस स्रोत से उत्पन्न होकर प्रवृत्त होता है?

Verse 3

यदि तेअनुग्रहे बुद्धिरस्मास्विह सतां वर । एतदू भवन्तं पृच्छामि तद्‌ भवानू प्रब्रवीतु मे,सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पितामह! यदि आपका हमलोगोंपर अनुग्रह करनेका विचार है तो मैं यही बात आपसे पूछता हूँ। आप मुझे बताइये

युधिष्ठिर ने कहा—हे सत्पुरुषों में श्रेष्ठ पितामह! यदि हम पर अनुग्रह करने की आपकी बुद्धि है, तो मैं यही प्रश्न आपसे पूछता हूँ; कृपा करके इसका उत्तर मुझे बताइए।

Verse 4

पूर्व हि कथित श्रुत्वा भूगुभाषितमुत्तमम्‌ । भरद्वाजस्य विप्रर्षेस्ततो मे बुद्धिरुत्तमा,पहले ब्रह्मर्षि भरद्वाजके प्रति भूगुजीका जो उत्तम उपदेश हुआ था, उसे आपके मुँहसे सुनकर मुझे उत्तम बुद्धि प्राप्त हुई थी

युधिष्ठिर ने कहा—पहले ब्रह्मर्षि भरद्वाज के प्रति भृगुजी का जो उत्तम उपदेश आपने कहा था, उसे आपके मुख से सुनकर मेरी बुद्धि उत्तम और परिष्कृत हो गई थी।

Verse 5

जाता परमधर्मिष्ठा दिव्यसंस्थान संस्थिता । ततो भूयस्तु पृच्छामि तद्‌ भवान्‌ वक्तुमरहति,मेरी बुद्धि परम धर्मिष्ठ एवं दिव्य स्थितिमें स्थित हो गयी थी; इसीलिये फिर पूछता हूँ। आप इस विषयका वर्णन करनेकी कृपा करें

युधिष्ठिर ने कहा—मेरी बुद्धि परम धर्म में दृढ़ होकर दिव्य स्थिति में स्थित हो गई थी; इसलिए मैं फिर पूछता हूँ। कृपा करके आप इस विषय का और वर्णन करें।

Verse 6

भीष्म उवाच अत्र ते वर्तयिष्येडहमितिहासं पुरातनम्‌ । जगौ यद्‌ भगवान्‌ व्यास: पुत्राय परिपृच्छते,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! इस विषयमें भगवान्‌ व्यासने अपने पुत्रके पूछनेपर जो उपदेश दिया था, वही प्राचीन इतिहास मैं दुहराऊँगा

भीष्म ने कहा—युधिष्ठिर! इस विषय में भगवान् व्यास ने अपने पुत्र के पूछने पर जो उपदेश दिया था, वही प्राचीन इतिहास मैं तुम्हें सुनाऊँगा।

Verse 7

अधीत्य वेदानखिलान्‌ साड्रोपनिषदस्तथा । अन्विच्छन्नैष्ठिकं कर्म धर्मनैपुणदर्शनात्‌,अंगों और उपनिषदोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करके व्यासपुत्र शुकदेवने नैष्ठिक कर्मको जाननेकी इच्छासे अपने पिता श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासकी धर्मज्ञानविषयक निपुणता देखकर उनसे अपने मनका संदेह पूछा। उन्हें यह विश्वास था कि पिताजीके उपदेशसे मेरा धर्म और अर्थविषयक सारा संशय दूर हो जायगा

अंगों और उपनिषदों सहित सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन करके व्यासपुत्र शुकदेव नैष्ठिक कर्म के तत्त्व को जानने की इच्छा से, धर्म-विवेक में निपुण अपने पिता श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास के पास गए। उनके धर्म-निर्णय की प्रवीणता देखकर उन्होंने अपने मन का संदेह पूछा, यह निश्चय करके कि पिताजी के उपदेश से धर्म और अर्थ संबंधी समस्त संशय दूर हो जाएगा।

Verse 8

कृष्णद्वैपायन व्यासं पुत्रो वैयासकि: शुक:ः । पप्रच्छ संदेहमिमं छिन्नधर्मार्थसंशयम्‌,अंगों और उपनिषदोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करके व्यासपुत्र शुकदेवने नैष्ठिक कर्मको जाननेकी इच्छासे अपने पिता श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासकी धर्मज्ञानविषयक निपुणता देखकर उनसे अपने मनका संदेह पूछा। उन्हें यह विश्वास था कि पिताजीके उपदेशसे मेरा धर्म और अर्थविषयक सारा संशय दूर हो जायगा

वैयासकि शुक—जो व्यास (कृष्णद्वैपायन) के पुत्र थे—अपने पिता के पास जाकर यह संदेह पूछने लगे, ताकि धर्म और अर्थ संबंधी संशय का निश्चयपूर्वक निवारण हो। अंगों और उपनिषदों सहित वेदों का अध्ययन कर वे नैष्ठिक कर्म को जानना चाहते थे और उन्हें विश्वास था कि पिताजी के उपदेश से उनका संशय कट जाएगा।

Verse 9

श्रीशुक उवाच भूतग्रामस्य कर्तारें कालज्ञाने च निश्चयम्‌ । ब्राह्मणस्य च यत्‌ कृत्यं तद्‌ भवान्‌ वक्तुमहति,श्रीशुकदेवजी बोले--पिताजी! समस्त प्राणि-समुदायको उत्पन्न करनेवाला कौन है? कालके ज्ञानके विषयमें आपका क्‍या निश्चय है? और ब्राह्मणका क्‍या कर्तव्य है? ये सब बातें आप बतानेकी कृपा करें

श्रीशुकदेव बोले—पिताजी! समस्त प्राणि-समुदाय का कर्ता कौन है? काल-ज्ञान के विषय में आपका निश्चय क्या है? और ब्राह्मण का कर्तव्य क्या है? कृपा करके ये सब बातें आप बताइए।

Verse 10

भीष्म उवाच तस्मै प्रोवाच तत्‌ सर्व पिता पुत्राय पृच्छते । अतीतानागते विद्वान सर्वज्ञ: सर्वधर्मवित्‌,भीष्मजी कहते हैं-राजन! भूत और भविष्यके ज्ञाता तथा सम्पूर्ण धर्मोंको जाननेवाले सर्वज्ञ विद्वान्‌ पिता व्यासने अपने पुत्रके पूछनेपर उसे उन सब बातोंका इस प्रकार उपदेश किया

भीष्म बोले—राजन्! अतीत और भविष्य के ज्ञाता, सर्वज्ञ तथा समस्त धर्मों के वेत्ता पिता व्यास ने पुत्र के पूछने पर उसे उन सब बातों का उपदेश दिया।

Verse 11

व्यास उवाच अनाद्यन्तमजं दिव्यमजरं ध्रुवमव्ययम्‌ । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं ब्रह्माग्रे सम्प्रवर्तते,व्यासजी बोले--बेटा! सृष्टिके आरम्भमें अनादि, अनन्त, अजन्मा, दिव्य, अजर- अमर, ध्रुव, अविकारी, अतर्क्य और ज्ञानातीत ब्रह्म ही रहता है

व्यास बोले—बेटा! सृष्टि के आरम्भ में केवल ब्रह्म ही रहता है—जो अनादि-अनन्त, अजन्मा, दिव्य, अजर, ध्रुव, अव्यय, तर्कातीत और सामान्य ज्ञान से अगोचर है।

Verse 12

काष्ठा निमेषा दश पञ्च चैव त्रिंशत्तु काष्ठा गणयेत्‌ कलां ताम्‌ | त्रिंशत्कलक्षापि भवेन्मुहूर्तो भाग: कलाया दशमश्न यः स्यात्‌,(अब कालका विभाग इस प्रकार समझना चाहिये) पंद्रह निमेषकी एक काष्ठा और तीस काष्ठाकी एक कला गिननी चाहिये। तीस कलाका एक मुहूर्त होता है। उसके साथ कलाका दसवाँ भाग और सम्मिलित होता है अर्थात्‌ तीस कला और तीन काष्ठाका एक मुहूर्त होता है

व्यासजी समय-गणना का विधान बताते हैं—पंद्रह निमेष मिलकर एक काष्ठा होते हैं और तीस काष्ठाओं से एक कला मानी जाती है। तीस कलाओं का एक मुहूर्त होता है; और उसमें कला का दसवाँ भाग भी जोड़ा जाता है—अर्थात् एक मुहूर्त तीस कला और तीन काष्ठा का समझा जाता है।

Verse 13

त्रिंशन्मुहूर्त तु भवेदहश्न रात्रिश्न संख्या मुनिभि: प्रणीता । मास: स्मृतो रात््यहनी च त्रिंशत्‌ संवत्सरो द्वादशमास उक्तः,तीस मुहूर्तका एक दिन-रात होता है। महर्षियोंने दिन और रात्रिके मुहूर्तोंकी संख्या उतनी ही बतायी है। तीस रात-दिनका एक मास और बारह मासोंका एक संवत्सर बताया गया है

व्यासजी बोले—तीस मुहूर्तों से एक अहोरात्र (दिन-रात) बनता है; यही संख्या मुनियों ने निश्चित की है। ऐसे तीस अहोरात्रों का एक मास स्मरण किया गया है और बारह मासों का एक संवत्सर (वर्ष) कहा गया है।

Verse 14

संवत्सरं द्वे त्वयने वदन्ति संख्याविदो दक्षिणमुत्तरं च,विद्वान पुरुष दो अयनोंको मिलाकर एक संवत्सर कहते हैं। वे दो अयन हैं--उत्तरायण और दक्षिणायन

संख्या-विद्या में निपुण विद्वान कहते हैं कि एक संवत्सर दो अयनों से बनता है—दक्षिणायन और उत्तरायण।

Verse 15

अहोरात्रे विभजते सूर्यो मानुषलौकिके । रात्रि: स्वप्लाय भूतानां चेष्टायै कर्मणामह:,मनुष्यलोकके दिन-रातका विभाग सूर्यदेव करते हैं। रात प्राणियोंके सोनेके लिये है और दिन काम करनेके लिये

व्यासजी बोले—मनुष्यलोक में सूर्य ही दिन और रात का विभाग करता है। रात्रि प्राणियों के सोने के लिये है और दिन कर्म-चेष्टा तथा कार्य-सम्पादन के लिये।

Verse 16

पित्र्ये राग्यहनी मास: प्रविभागस्तयो: पुनः । शुक्लो5ह: कर्मचेष्टायां कृष्ण: स्पप्नाय शर्वरी,मनुष्योंके एक मासमें पितरोंका एक दिन-रात होता है। शुक्लपक्ष उनके काम-काज करनेके लिये दिन है और कृष्णपक्ष उनके विश्रामके लिये रात है

व्यासजी बताते हैं—पितृलोक में मनुष्यों का एक मास एक दिन-रात के बराबर होता है। वहाँ शुक्लपक्ष उनका दिन है—कर्मचेष्टा के लिये; और कृष्णपक्ष उनकी रात्रि है—विश्राम और निद्रा के लिये।

Verse 17

दैवे रात्यहनी वर्ष प्रविभागस्तयो: पुनः । अहस्तत्रोदगयन रात्रि: स्याद्‌ दक्षिणायनम्‌,मनुष्योंका एक वर्ष देवताओंके एक दिन-रातके बराबर है, उनके दिन-रातका विभाग इस प्रकार है। उत्तरायण उनका दिन है और दक्षिणायन उनकी रात्रि

व्यास बोले—मनुष्यों का एक वर्ष देवताओं के लिए एक दिन-रात के बराबर होता है। उनके दिन-रात का विभाग इस प्रकार है—उत्तरायण उनका दिन है और दक्षिणायन उनकी रात्रि।

Verse 18

ये ते रात्यहनी पूर्व कीर्तिते जीवलौकिके । तयो: संख्याय वर्षग्रं ब्राह्मे वक्ष्याम्पह:क्षपे,पहले मनुष्योंके जो दिन-रात बताये गये हैं, उन्हींकी संख्याके हिसाबसे अब मैं ब्रह्माके दिन-रातका मान बताता हूँ। साथ ही सत्ययुग, त्रेता, द्वापए और कलियुग--इन चारों युगोंकी वर्ष-संख्या भी अलग-अलग बता रहा हूँ

व्यास बोले—मनुष्यलोक के संबंध में जो दिन-रात पहले बताए गए हैं, उन्हीं की गणना को प्रमाण मानकर अब मैं ब्रह्मा के दिन और रात्रि की अवधि बताऊँगा।

Verse 19

पृथक्‌ संवत्सराग्राणि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वश: । कृते त्रेतायुगे चैव द्वापरे च कलौ तथा,पहले मनुष्योंके जो दिन-रात बताये गये हैं, उन्हींकी संख्याके हिसाबसे अब मैं ब्रह्माके दिन-रातका मान बताता हूँ। साथ ही सत्ययुग, त्रेता, द्वापए और कलियुग--इन चारों युगोंकी वर्ष-संख्या भी अलग-अलग बता रहा हूँ

व्यास बोले—मैं क्रमशः अलग-अलग वर्षों के मान बताऊँगा; कृत (सत्य), त्रेता, द्वापर और कलि—इन युगों की वर्ष-संख्या भी पृथक्-पृथक् कहूँगा।

Verse 20

चत्वार्याहु: सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम्‌ । तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशक्ष तथाविध:,देवताओंके चार हजार वर्षोका एक सत्ययुग होता है। सत्ययुगमें चार सौ दिव्य वर्षोंकी संध्या होती है और उतने ही वर्षोका एक संध्यांश भी होता है (इस प्रकार सत्ययुग अड़तालीस सौ दिव्य वर्षोंका होता है)

व्यास बोले—बुद्धिमान कहते हैं कि कृत (सत्य) युग चार हजार वर्षों का होता है। उसकी संध्या चार सौ वर्षों की होती है और उतने ही वर्षों का संध्यांश भी होता है; इस प्रकार उसका युग-मान निश्चित होता है।

Verse 21

संध्या और संध्यांशोंसहित अन्य तीन युगोंमें यह (चार हजार आठ सौ वर्षोकी) संख्या क्रमश: एक-एक चौथाई घटती जाती है-

व्यास बोले—संध्या और संध्यांश सहित यही युग-मान अन्य तीन युगों में क्रमशः प्रत्येक बार एक-एक चौथाई घटता जाता है।

Verse 22

एतानि शाश्वताँललोकान्‌ धारयन्ति सनातनान्‌ | एतद्‌ ब्रह्माविदां तात विदितं ब्रह्म शाश्वतम्‌,ये चारों युग प्रवाहरूपसे सदा रहनेवाले सनातन लोकोंको धारण करते हैं। तात! यह युगात्मक काल ब्रह्मवेत्ताओंके सनातन ब्रह्मका ही स्वरूप है

ये (युग-प्रवाहरूप) कालचक्र सनातन और शाश्वत लोकों को धारण करते हैं। तात! ब्रह्मवेत्ताओं के लिए यह विदित है कि युगों की परम्परा से युक्त यह काल स्वयं उसी अविनाशी ब्रह्म का स्वरूप है।

Verse 23

इतरेषु ससंध्येषु संध्यांशेषु ततस्त्रिषु । एक पादेन हीयन्ते सहस्राणि शतानि च,चतुष्पात्‌ सकलो धर्म: सत्यं चैव कृते युगे । नाधर्मेणागम: कश्चित्‌ परस्तस्य प्रवर्तते सत्ययुगमें सत्य और धर्मके चारों चरण मौजूद रहते हैं--उस समय सत्य और धर्मका पूरा-पूरा पालन होता है उस समय कोई भी धर्मशास्त्र अधर्मसे संयुक्त नहीं होता; उसका उत्तम रीतिसे पालन होता है

अन्य तीन युगों के संधि-भागों में (काल-मान) प्रत्येक बार एक-एक पाद से घटता है—हजारों और सैकड़ों की कमी होती जाती है। कृतयुग में धर्म चारों चरणों पर पूर्ण रहता है और सत्य भी उसी प्रकार प्रतिष्ठित होता है। उस युग में कोई भी शास्त्रीय विधान अधर्म से मिश्रित नहीं होता; वह उत्तम रीति से प्रवृत्त और आचरित होता है।

Verse 24

इतरेष्वागमाद्‌ धर्म: पादशस्त्ववरोप्यते । चौर्यकानृतमायाभिर धर्म श्वोपचीयते

उत्तरवर्ती युगों में आगम (शास्त्र-परम्परा) के अनुसार धर्म पाद-पाद करके घटाया जाता है, मानो उसके चौथाई-चौथाई भाग हर बार छिन जाते हों। चोरी, असत्य और माया-छल से धर्म कुत्ते के समान हीन दशा में पहुँचता है—जैसे अपमानित रूप में ही उसका पालन-पोषण हो।

Verse 25

अन्य युगोंमें शास्त्रोक्त धर्मका क्रमश: एक-एक चरण क्षीण होता जाता है और चोरी, असत्य तथा छल-कपट आदिके द्वारा अधर्मकी वृद्धि होने लगती है ।। अरोगा: सर्वसिद्धार्थ श्चितुर्वर्षशतायुष: । कृते त्रेतायुगे त्वेषां पादशो हसते वय:,सत्ययुगके मनुष्य नीरोग होते हैं। उनकी सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध होती हैं तथा वे चार सौ वर्षोकी आयुवाले होते हैं। त्रेतायुग आनेपर उनकी आयु एक चौथाई घटकर तीन सौ वर्षोकी रह जाती है। इसी प्रकार द्वापरमें दो सौ और कलियुगमें सौ वर्षोकी आयु होती है

अन्य युगों में शास्त्रोक्त धर्म क्रमशः एक-एक चरण से क्षीण होता जाता है; और चोरी, असत्य तथा छल-कपट के कारण अधर्म की वृद्धि होने लगती है। कृत (सत्य) युग में मनुष्य नीरोग होते हैं, उनके सभी प्रयोजन सिद्ध होते हैं और वे चार सौ वर्ष जीते हैं; त्रेता के आने पर उनकी आयु एक चौथाई घट जाती है—और आगे के युगों में इसी प्रकार घटती चली जाती है।

Verse 26

वेदवादाश्वानुयुगं हसन्तीतीह न: श्रुतम्‌ । आयूंषि चाशिषश्चैव वेदस्यैव च यत्फलम्‌,त्रेता आदि युगोंमें वेदोंका स्वाध्याय और मनुष्योंकी आयु घटने लगती है, ऐसा सुना गया है। उनकी कामनाओंकी सिद्धिमें भी बाधा पड़ती है और वेदाध्ययनके फलमें भी न्यूनता आ जाती है

हमने सुना है कि युग-युग के प्रवाह में वेदवाणी उपहास का विषय बन जाती है। मनुष्यों की आयु घटती है; आशीषें और अभिलाषित सिद्धियाँ बाधित होती हैं; और वेदाध्ययन तथा अनुष्ठान का फल भी क्षीण हो जाता है।

Verse 27

अन्ये कृतयुगे धर्मास्त्रितायां द्वापरेडपरे । अन्ये कलियुगे नृणां युगहासानुरूपत:,युगोंके हासके अनुसार सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुगमें मनुष्योंके धर्म भी भिन्न- भिन्न प्रकारके हो जाते हैं

कृतयुग में धर्म के कुछ और रूप होते हैं, त्रेता और द्वापर में कुछ और; और कलियुग में मनुष्यों के लिए भिन्न ही कर्तव्य होते हैं—जो उस-उस युग के स्वभाव और क्षीणता के अनुसार ठहरते हैं।

Verse 28

तप: परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुत्तमम्‌ । द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेक॑ कलौ युगे,सत्ययुगमें तपस्याको ही सबसे बड़ा धर्म माना गया है। त्रेतामें ज्ञानको ही उत्तम बताया गया है। द्वापरमें यज्ञ और कलियुगमें एकमात्र दान ही श्रेष्ठ कहा गया है

कृतयुग में तप ही परम कहा गया है, त्रेता में ज्ञान को उत्तम बताया गया है; द्वापर में यज्ञ को ही प्रधान कहा गया है, और कलियुग में एकमात्र दान को श्रेष्ठ कहा गया है।

Verse 29

एतां द्वादशसाहसत्रीं युगाख्यां कवयो विदु: । सहस्रपरिवर्त तद्‌ ब्राह्मं दिवसमुच्यते,इस प्रकार देवताओंके बारह हजार वर्षोका एक चतुर्युग होता है; यह विद्वानोंकी मान्यता है। एक सहस्र चतुर्युगको ब्रह्माका एक दिन बताया जाता है

विद्वान कहते हैं कि देवताओं के बारह हजार वर्षों का यह ‘युग’ कहलाता है; और ऐसे (चतुर्युग-चक्र के) एक हजार आवर्तनों को ब्रह्मा का एक दिन कहा गया है।

Verse 30

रात्रिमेतावतीं चैव तदादौ विश्वमी श्वर: । प्रलये ध्यानमाविश्य सुप्त्वा सो<न्ते विबुद्धयते,इतने ही युगोंकी उनकी एक रात्रि भी होती है। भगवान्‌ ब्रह्मा अपने दिनके आरम्भमें संसारकी सृष्टि करते हैं और रातमें जब प्रलयका समय होता है, तब सबको अपनेमें लीन करके योगनिद्राका आश्रय ले सो जाते हैं; फिर प्रलयका अन्त होने अर्थात्‌ रात बीतनेपर वे जाग उठते हैं

इतने ही युगों की उसकी एक रात्रि भी होती है। उस दिन के आरम्भ में ईश्वर विश्व की सृष्टि करते हैं; और प्रलय आने पर सबको अपने में लीन करके ध्यान में प्रविष्ट हो शयन करते हैं; प्रलय के अन्त में—रात्रि बीतने पर—वे फिर जाग उठते हैं।

Verse 31

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्म॒णो विदु: । रात्रि युगसहस्रान्तां तेडहोरात्रविदो जना:

जो लोग अहोरात्र का यथार्थ मान जानते हैं, वे कहते हैं कि ब्रह्मा का दिन एक सहस्र युगों तक रहता है और उसकी रात्रि भी एक सहस्र युगों के अन्त तक होती है।

Verse 32

एक हजार चतुर्युगका जो ब्रह्माका एक दिन बताया गया है और उतनी ही बड़ी जो उनकी रात्रि कही गयी है, उसको जो लोग ठीक-ठीक जानते हैं, वे ही दिन और रात अर्थात्‌ कालतत्त्वको जाननेवाले हैं ।। प्रतिबुद्धों विकुरुते ब्रह्माक्षय्यं क्षपाक्षये सृजते च पर | तस्माद्‌ व्यक्तात्मकं मन:,रात्रि समाप्त जाग्रत्‌ हुए ब्रह्माजी पहले अपने अक्षय स्वरूपको मायासे विकारयुक्त बनाते हैं फिर महत्तत्त्वको उत्पन्न करते हैं। तत्पश्चात्‌ उससे स्थूल जगत्‌को धारण करनेवाले मनकी उत्पत्ति होती है

व्यास ने कहा—जो लोग ठीक-ठीक जानते हैं कि ब्रह्मा का एक दिन सहस्र चतुर्युगों के बराबर है और उतनी ही विशाल उनकी रात्रि है, वही दिन-रात अर्थात् काल-तत्त्व के ज्ञाता हैं। रात्रि के क्षय पर ब्रह्मा जाग्रत होकर पहले माया के द्वारा अपने अक्षय स्वरूप को व्यक्त होने और विकार ग्रहण करने योग्य बनाते हैं; फिर महत्तत्त्व की सृष्टि करते हैं। उसके बाद महत् से व्यक्तात्मक मन उत्पन्न होता है, जो स्थूल जगत् को धारण और व्यवस्थित करता है।

Verse 230

इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्वमें श्रीकृष्ण और उग्रसेनका संवादविषयक दो सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्व में श्रीकृष्ण और उग्रसेन के संवादविषयक दो सौ तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 231

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने एकत्रिशदधिकद्विशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोौक्षधर्मपर्वमें शुकका अनुप्रश्नविषयक दो सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में शुक के अनुप्रश्नविषयक दो सौ इकतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

Śuka asks how a person with Vedic learning, ritual standing, maturity, and non-envious character can attain Brahman, and requests the practical means—whether articulated through Sāṃkhya analysis or Yogic discipline.

Liberation is presented as dependent on disciplined cognition: restraining the senses, stabilizing the mind, and discerning the imperceptible ātman that pervades all beings; equal vision (sama-darśana) is treated as a cognitive-ethical marker of that realization.

Yes in doctrinal form: it states that the one who perceives the unmanifest within the manifest becomes fit for brahma-bhūya, and that the knower of the kūṭastha akṣara relinquishes prāṇa-bound rebirth (i.e., is oriented to amṛtatva).