Adhyaya 166
Shanti ParvaAdhyaya 16687 Verses

Adhyaya 166

Adhyāya 166: Kṛtaghna-doṣa (कृतघ्नदोषः) — the fault of ingratitude and the limits of expiation

Upa-parva: Rājadharmānuśāsana (राजधर्मानुशासन) — didactic exempla on kingship and moral governance

Bhīṣma narrates an exemplum centered on violated trust. A powerful being (described as a brilliant fire with wind as its charioteer) is placed under protection nearby by the lord of birds; nevertheless, a malicious dvija, characterized as kṛtaghna, waits for an opportunity and kills the trusting protector with a burning brand. He then cooks the victim and departs with gold. When the absence is noticed, Virūpākṣa—portrayed as a ruler—suspects wrongdoing and dispatches his son with attendants to investigate. They find the remains and seize Gautama, presenting both evidence and offender to the king. The king orders execution, but the attendants and even other predatory groups refuse to consume or accept the offender, citing the distinctive gravity of ingratitude. The discourse culminates in a normative claim: expiations exist for grave sins such as brahma-hatyā, intoxication, theft, and broken vows, but for kṛtaghnatā (ingratitude/betrayal of benefaction) no expiation is acknowledged, because it undermines the foundational ethics of reciprocity and protection.

Chapter Arc: भीष्म शय्या पर से युधिष्ठिर को धर्म का सूक्ष्म द्वार दिखाते हैं—पाप के असंख्य रूप और उनके प्रायश्चित्त, ताकि राज्य-धर्म केवल दण्ड नहीं, शुद्धि भी बने। → विषय दान-धर्म से आरम्भ होकर धीरे-धीरे कठोर सामाजिक-नैतिक अपराधों तक पहुँचता है: योग्य ब्राह्मणों को दान, अयोग्य/अनधिकृत को सीमित दक्षिणा, दान न करने वालों की निन्दा और राजकीय उद्घोष; फिर ब्रह्महत्या, गर्भिणी-वध, व्यभिचार, प्राणिनिपात जैसे पापों के लिए क्रमशः अधिक तीव्र व्रत, दण्ड और तपस्याएँ। → ब्रह्महत्या और गर्भिणी-वध जैसे महापातकों के लिए दीर्घ, सार्वजनिक और देह-शोषक प्रायश्चित्त का विधान—‘खोपड़ी धारण कर पाप का उद्घोष’ और वर्षों की तपस्या—अध्याय का नैतिक शिखर बनता है, जहाँ अपराध का भार समाज और आत्मा—दोनों के सामने निर्वस्त्र होता है। → भीष्म अपराध-विशेष के अनुरूप दण्ड/व्रत का संतुलन स्थापित करते हैं: दान का विवेक, राजा का कर्तव्य कि कंजूस/अदातृ का दोष प्रकट करे, स्त्री-पुरुष के व्यभिचार पर दण्ड-व्यवस्था, और हिंसा/नास्तिकता आदि के लिए नियत प्रायश्चित्त—ताकि प्रजा में भय नहीं, धर्म-शुद्धि की व्यवस्था रहे। → युधिष्ठिर के सामने प्रश्न खुला रह जाता है—जब पापों की सूची अनन्त है, तो ‘न्याय’ का अंतिम माप क्या है: कर्म, भाव, या परिणाम?

Shlokas

Verse 1

पजञ्चषष्ट्यधिकशततमोड< ध्याय: नाना प्रकारके पापों और उनके प्रायद्षित्तोंका वर्णन भीष्म उवाच ह्वतार्थो यक्ष्यमाणश्च सर्ववेदान्तगश्न यः । आचार्यपितृकार्यार्थ स्वाध्यायार्थभथापि च,भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! सम्पूर्ण वेदों और उपनिषदोंका पारंगत विद्वान्‌ ब्राह्मण यदि यज्ञ करनेवाला हो तथा उसका धन चोर चुरा ले गये हों तो राजाका कर्तव्य है कि वह उसे आचार्यकी दक्षिणा देने, पितरोंका श्राद्ध करने तथा वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय करनेके लिये धन दे। भरतनन्दन! ये श्रेष्ठ ब्राह्मण प्राय: धर्मके लिये धनकी भिक्षा माँगते देखे गये हैं। इन्हें दान और विद्याध्ययनके लिये धन देना चाहिये

भीष्म बोले—राजन्! जो ब्राह्मण सम्पूर्ण वेदों और वेदान्त का पारंगत हो, यज्ञ करने को उद्यत हो, और जिसका धन चोरों ने हर लिया हो, उसे आचार्य-दक्षिणा, पितृ-श्राद्ध तथा वेद-शास्त्रों के स्वाध्याय के लिए साधन देना राजा का धर्म है। ऐसे श्रेष्ठ ब्राह्मण भोग के लिए नहीं, धर्म के लिए धन माँगते हैं; अतः दान और विद्याध्ययन के निमित्त उन्हें सहायता देनी चाहिए।

Verse 2

एते वै साधवो दृष्टा ब्राह्मणा धर्मभिक्षव: | निःस्वेभ्यो देयमेतेभ्यो दानं विद्या च भारत,भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! सम्पूर्ण वेदों और उपनिषदोंका पारंगत विद्वान्‌ ब्राह्मण यदि यज्ञ करनेवाला हो तथा उसका धन चोर चुरा ले गये हों तो राजाका कर्तव्य है कि वह उसे आचार्यकी दक्षिणा देने, पितरोंका श्राद्ध करने तथा वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय करनेके लिये धन दे। भरतनन्दन! ये श्रेष्ठ ब्राह्मण प्राय: धर्मके लिये धनकी भिक्षा माँगते देखे गये हैं। इन्हें दान और विद्याध्ययनके लिये धन देना चाहिये

भीष्म बोले—भरतनन्दन! ये ब्राह्मण वास्तव में साधु हैं; ये धर्म के लिए ही भिक्षा माँगते हैं। अतः जब ये निर्धन हों, तब इन्हें दान देना चाहिए, जिससे दान-धर्म भी सिद्ध हो और विद्या भी बनी रहे।

Verse 3

अन्यत्र दक्षिणादानं देयं भरतसत्तम । अन्येभ्योडपि बहिरवेदि चाकृतान्नं विधीयते,भरतगश्रेष्ठ) इससे भिन्न परिस्थितिमें ब्राह्मगको केवल दक्षिणा देनी चाहिये और ब्राह्मणेतर मनुष्योंको भी यज्ञवेदीसे बाहर कच्चा अन्न देनेका विधान है

भीष्म बोले—हे भरतश्रेष्ठ! इस विशेष स्थिति के अतिरिक्त ब्राह्मण को केवल दक्षिणा देनी चाहिए। और अन्य लोगों को भी यज्ञ-वेदी के बाहर कच्चा अन्न देने का विधान है।

Verse 4

सर्वरत्नानि राजा हि यथाईँ प्रतिपादयेत्‌ । ब्राह्मणा एव वेदाश्व यज्ञाश्व बहुदक्षिणा: । अन्योन्यं विभवाचारा यजन्ते गुणत: सदा,राजाको चाहिये कि वह ब्राह्मणोंको उनकी योग्यताके अनुसार सब प्रकारके रत्नोंका दान करे; क्योंकि ब्राह्मण ही वेद एवं बहुसंख्यक दक्षिणावाले यज्ञरूप हैं। अपनी सम्पत्तिके अनुसार समस्त कार्योंका आयोजन करनेवाले वे ब्राह्मण सदा आपसमें मिलकर गुणपयुक्त यज्ञका अनुष्ठान करते हैं

भीष्म बोले—राजा को चाहिए कि वह पात्रता के अनुसार ब्राह्मणों को सब प्रकार के रत्नादि प्रदान करे; क्योंकि ब्राह्मण ही वेद हैं और वे ही बहु-दक्षिणा वाले यज्ञ हैं। वे अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार आचरण करते हुए सदा परस्पर मिलकर गुणयुक्त यज्ञों का अनुष्ठान करते हैं।

Verse 5

यस्य त्रैवार्षिकं भक्त पर्याप्तं भृत्यवृत्तये । अधिकं चापि विद्येत स सोम॑ पातुमहति,जिस ब्राह्मणके पास अपने पालनीय कुट॒म्बी-जनोंके भरण-पोषणके लिये तीन वर्षतक उपभोगमें आने लायक पर्याप्त धन हो अथवा उससे भी अधिक वैभव विद्यमान हो, वही सोमपानका अधिकारी है--उसे ही सोमयागका अनुष्ठान करना चाहिये

भीष्म ने कहा—जिस ब्राह्मण के पास अपने आश्रितों के भरण-पोषण हेतु तीन वर्षों तक पर्याप्त अन्न-धन हो, और उससे भी अधिक वैभव विद्यमान हो, वही सोमपान का अधिकारी है। उसी को सोमयाग का अनुष्ठान करना चाहिए; क्योंकि यह कर्म सुरक्षित आजीविका और गृहस्थ-धर्म की दृढ़ नींव पर ही शोभता है, अभाव में नहीं।

Verse 6

यज्ञश्नेत्‌ प्रतिरुद्ध: स्यादंशेनैकेन यज्वनः । ब्राह्मणस्य विशेषेण धार्मिके सति राजनि,यदि धर्मात्मा राजाके रहते हुए किसी यज्ञकर्ताका, विशेषतः ब्राह्मणका यज्ञ धनके बिना अधूरा रह जाय--उसके एक अंशकी पूर्ति शेष रह जाय तो राजाको चाहिये कि उसके राज्यमें जो बहुत पशुओं तथा वैभवसे सम्पन्न वैश्य हो, यदि वह यज्ञ तथा सोमयागसे रहित हो तो उसके कुटुम्बसे उस धनको यज्ञके लिये ले ले

भीष्म ने कहा—धर्मात्मा राजा के रहते यदि किसी यजमान का यज्ञ रुक जाए और एक अंश की पूर्ति शेष रह जाए—विशेषतः ब्राह्मण के यज्ञ में—तो राजा को उसका पूर्ण कराना चाहिए। उसके राज्य में यदि बहुत पशु और वैभव से सम्पन्न कोई वैश्य यज्ञ-क्रिया से रहित हो, सोमयाग भी न करता हो, तो यज्ञ की सिद्धि के लिए राजा उसके कुटुम्ब से आवश्यक धन ले सकता है, ताकि पवित्र कर्म अधूरा न रहे।

Verse 7

यो वैश्य: स्याद्‌ बहुपशुर्हीनक्रतुरसोमप: । कुट॒म्बात्‌ तस्य तद्‌ वित्तं यज्ञार्थ पार्थिवो हरेत्‌,यदि धर्मात्मा राजाके रहते हुए किसी यज्ञकर्ताका, विशेषतः ब्राह्मणका यज्ञ धनके बिना अधूरा रह जाय--उसके एक अंशकी पूर्ति शेष रह जाय तो राजाको चाहिये कि उसके राज्यमें जो बहुत पशुओं तथा वैभवसे सम्पन्न वैश्य हो, यदि वह यज्ञ तथा सोमयागसे रहित हो तो उसके कुटुम्बसे उस धनको यज्ञके लिये ले ले

भीष्म ने कहा—जो वैश्य बहुत पशुओं और धन-वैभव से सम्पन्न हो, पर यज्ञ-क्रिया में हीन हो और सोमयाग न करता हो, उसके कुटुम्ब से राजा यज्ञार्थ धन ले ले। विशेषतः जब किसी यजमान का—और खासकर ब्राह्मण का—यज्ञ धनाभाव से एक अंश में अपूर्ण रह जाए, तब धर्म की रक्षा हेतु ऐसा करना उचित है।

Verse 8

आहरेदथ नो किज्चित्‌ कामं॑ शूद्रस्य वेश्मन: । न हि यज्ञेषु शूद्रस्य किज्चिदस्ति परिग्रह:,किंतु राजा अपनी इच्छाके अनुसार शूद्रके घरसे थोड़ा-सा भी धन न ले आवे; क्योंकि यज्ञोंमें शूद्रका किंचिन्मात्र भी अधिकार नहीं है

भीष्म ने कहा—राजा अपनी इच्छा से शूद्र के घर से किंचित् भी धन न ले; क्योंकि यज्ञों में शूद्र का कोई परिग्रह अथवा अधिकार नहीं है।

Verse 9

योडनाहिताग्नि: शतगुरयज्वा च सहस्रगुः । तयोरपि कुट॒म्बा भ्यामाहरेदविचारयन्‌,जिस वैश्यके पास एक सौ गौएँ हों और वह अग्निहोत्र न करता हो, तथा जिसके पास एक हजार गौएँ हों और वह यज्ञ न करता हो, उन दोनोंके कुटुम्बोंसे राजा बिना विचारे ही धन उठा लावे

भीष्म ने कहा—जिस वैश्य के पास सौ गौएँ हों और वह अग्निहोत्र न करता हो, तथा जिसके पास हजार गौएँ हों और वह यज्ञ न करता हो—उन दोनों के कुटुम्बों से राजा बिना हिचक धन उठा ले।

Verse 10

अदातृभ्यो हरेद्‌ वित्तं विख्याप्य नृपति: सदा । तथैवाचरतो धर्मो नृपते: स्थादथाखिल:,जो धन रहते हुए उसका दान न करते हों, ऐसे लोगोंके इस दोषको विख्यात करके राजा सदा धर्मके लिये उनका धन ले ले, ऐसा आचरण करनेवाले राजाको सम्पूर्ण धर्मकी प्राप्ति होती है

जो लोग धनवान होकर भी दान नहीं करते, उनके इस दोष को प्रकट करके राजा सदा धर्म के लिए उनका धन ले ले। ऐसा करने वाले नृपति को सम्पूर्ण धर्म-फल प्राप्त होता है।

Verse 11

तथैव शृणु मे भक्त भक्तानि षडनश्रतः । अश्वस्तनविधानेन हर्तव्यं हीनकर्मण:,युधिष्ठिर! इसी प्रकार मैं अन्नके विषयमें जो बात बता रहा हूँ, उसे सुनो। यदि ब्राह्मण अन्नाभावके कारण लगातार छः: समयतक उपवास कर जाय तो उस अवस्थामें वह किसी निकृष्ट कर्म करनेवाले मनुष्यके घरसे उतने धनका अपहरण कर सकता है, जिससे उसके एक दिनका भोजन चल जाय और दूसरे दिनके लिये कुछ बाकी न रहे

युधिष्ठिर! अन्न के विषय में भी मेरी बात सुनो। यदि अन्नाभाव से कोई ब्राह्मण लगातार छह समय तक उपवास कर ले, तो उस दशा में वह किसी निकृष्ट कर्म करने वाले मनुष्य के घर से उतना ही धन ले सकता है जिससे एक दिन का भोजन हो जाए—और अगले दिन के लिए कुछ भी शेष न रहे।

Verse 12

खलात्‌ क्षेत्रात्‌ तथा रामाद्‌ यतो वाप्युपपद्यते | आखयातव्यं नृपस्यैतत्‌ पृच्छते5पृच्छतेडपि वा,खलिहानसे, खेतसे, बगीचेसे अथवा जहाँसे भी अन्न मिल सके, वहींसे वह भोजनमात्रके लिये अन्न उठा लावे और उसके बाद राजा पूछे या न पूछे उसके पास जाकर अपनी वह बात उसे कह दे

खलिहान से, खेत से, बगीचे से अथवा जहाँ से भी अन्न मिल सके, वहीं से वह केवल भोजनमात्र के लिए अन्न उठा ले। उसके बाद राजा पूछे या न पूछे, वह उसके पास जाकर यह बात उसे बता दे।

Verse 13

न तस्मै धारयेद्‌ दण्डं राजा धर्मेण धर्मवित्‌ । क्षत्रियस्य तु बालिश्याद्‌ ब्राह्मण: क्लिश्यते क्षुधा,उस दशामें धर्मज्ञ राजा धर्मके अनुसार उसे दण्ड न दे; क्‍योंकि क्षत्रिय राजाकी नादानीसे ही ब्राह्मणको भूखका कष्ट उठाना पड़ता है

उस दशा में धर्मज्ञ राजा धर्म के अनुसार भी उसे दण्ड न दे; क्योंकि क्षत्रिय राजा की नादानी और कुप्रशासन से ही ब्राह्मण को भूख का कष्ट उठाना पड़ता है।

Verse 14

श्रुतशीले समाज्ञाय वृत्तिमस्य प्रकल्पयेत्‌ । अथीैनं परिरक्षेत पिता पुत्रमिवौरसम्‌,राजा उसके शास्त्रज्ञान और स्वभावका परिचय प्राप्त करके उसके लिये उचित आजीविकाकी व्यवस्था करे और जैसे पिता अपने औरस पुत्रकी रक्षा करता है, उसी प्रकार वह उस ब्राह्मणकी रक्षा करे

राजा उसके शास्त्र-ज्ञान और शील का परिचय प्राप्त करके उसके लिए उचित आजीविका की व्यवस्था करे। फिर जैसे पिता अपने औरस पुत्र की रक्षा करता है, वैसे ही उस ब्राह्मण की रक्षा करे।

Verse 15

इष्टिं वैश्वानरीं नित्यं निर्वपेदब्दपर्यये । अनुकल्प: परो धर्मो धर्मवादैस्तु केवलम्‌,प्रतिवर्ष किये जानेवाले आग्रयण आदि यज्ञ यदि न किये जा सके हों तो उनके बदले प्रतिदिन वैश्वानरी इष्टि समर्पित करे। मुख्य कर्मके स्थानमें जो गौण कार्य किया जाता है, उसका नाम अनुकल्प है, धर्मज्ञ पुरुषोंद्वारा बताया गया अनुकल्प भी परम धर्म ही है

भीष्म ने कहा— यदि प्रतिवर्ष किए जाने वाले आग्रयण आदि नियत यज्ञ किसी कारण से न हो सकें, तो उनके स्थान पर प्रतिदिन वैश्वानरी इष्टि का निर्वपण (आहुति-समर्पण) करना चाहिए। मुख्य कर्तव्य के स्थान पर जो गौण कर्म किया जाता है, उसे ‘अनुकल्प’ कहते हैं; और धर्म के प्रामाणिक व्याख्याताओं द्वारा बताया गया यह अनुकल्प भी परम धर्म ही है।

Verse 16

विज्वैदेवैश्व साध्यैश्न ब्राह्मणैश्व महर्षिभि: । आपत्सु मरणाद्‌ भीतैर्विधि: प्रतिनिधीकृत:,क्योंकि विश्वेदेव, साध्य, ब्राह्णण और महर्षि--इन सब लोगोंने मृत्युसे डरकर आपत्कालके विषयमें प्रत्येक विधिका प्रतिनिधि नियत कर दिया है

भीष्म ने कहा— आपत्तिकाल में मृत्यु के भय से ग्रस्त विश्वेदेव, साध्य, ब्राह्मण और महर्षियों ने प्रत्येक विधि के लिए प्रतिनिधि—अर्थात् विकल्प—नियत कर दिया है, ताकि जब कठोर पालन असंभव हो जाए तब भी धर्म सुरक्षित रहे।

Verse 17

प्रभु: प्रथभकल्पस्य योडनुकल्पे न वर्तते । न साम्परायिकं तस्य दुर्मतेविद्यते फलम्‌,जो मुख्य विधिके अनुसार कर्म करनेमें समर्थ होकर भी गौण विधिसे काम चलाता है, उस दुर्बुद्धि मनुष्यको पारलौकिक फलकी प्राप्ति नहीं होती

भीष्म ने कहा— जो मनुष्य मुख्य विधि के अनुसार कर्म करने में समर्थ होकर भी अनुकल्प (गौण/विकल्प) में ही प्रवृत्त होता है, उस दुर्बुद्धि को पारलौकिक फल नहीं मिलता।

Verse 18

न ब्राह्मणो निवेदेत किंचिद्‌ राजनि वेदवित्‌ । स्ववीर्याद्‌ राजवीर्याच्च स्ववीर्य बलवत्तरम्‌,वेदज्ञ ब्राह्यणको चाहिये कि वह राजाके निकट अपनी आवश्यकता निवेदन न करे; क्योंकि ब्राह्मणकी अपनी शक्ति तथा राजाकी शक्तिमेंसे उसकी अपनी ही शक्ति प्रबल है

भीष्म ने कहा— वेद को जानने वाले ब्राह्मण को राजा के पास अपनी कोई आवश्यकता निवेदित नहीं करनी चाहिए; क्योंकि ब्राह्मण की अपनी शक्ति और राजा की शक्ति—इन दोनों में ब्राह्मण की आत्मबल-सम्पन्न शक्ति ही अधिक प्रबल है।

Verse 19

तस्माद्‌ राज्ञ: सदा तेजो दुःसहं ब्रह्म॒वादिनाम्‌ । कर्ता शास्ता विधाता च ब्राह्मणो देव उच्यते,अतः ब्रह्मवादियोंका तेज राजाके लिये सदा दुःसह है। ब्राह्मण इस जगत्‌का कर्ता, शासक, धारण-पोषण करनेवाला और देवता कहलाता है

भीष्म ने कहा— इसलिए राजा के लिए ब्रह्म का वचन बोलने और उसे धारण करने वाले ब्रह्मवादियों का तेज सदा असह्य होता है। ब्राह्मण ‘देव’ कहलाता है—वह कर्ता, शास्ता (दण्डदाता/नियन्ता) और विधाता (व्यवस्था-स्थापक तथा धारण-पोषण करने वाला) माना जाता है।

Verse 20

तस्मिन्नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कामीरयेद्‌ गिरम्‌ । क्षत्रियो बाहुवीयेंण तरेदापदमात्मन:

ऐसी स्थिति में हितकर वचन ही कहे, शुष्क और निष्फल बातें न बोले। क्षत्रिय को अपने बाहुबल और पराक्रम से अपनी आपदा को पार करना चाहिए।

Verse 21

नैव कन्या न युवतिर्नामन्त्रज्ञो न बालिश:

भीष्म बोले— न तो केवल कन्या, न युवती, न मंत्रों का ज्ञान न रखने वाला, और न ही मूर्ख—इनमें से किसी को भी (विश्वास या परामर्श के योग्य) न माने।

Verse 22

नरकं निपतन्त्येते जुह्नाना: स च यस्य तत्‌ | तस्माद्‌ वैतानकुशलो होता स्याद्‌ वेदपारग:,यदि ये हवन करते हैं तो स्वयं तो नरकमें पड़ते ही हैं, जिसका वह यज्ञ है, वह भी नरकमें गरिता है। अत: जो यज्ञकर्ममें कुशल और वेदोंका पारछ्त विद्वान्‌ हो, वही होता हो सकता है

भीष्म बोले— जो अयोग्य होकर हवन करते हैं, वे नरक में गिरते हैं; और जिसके लिए वह यज्ञ होता है, वह भी नरकगामी होता है। इसलिए वैतानिक यज्ञ-विधि में कुशल और वेदों का पारंगत विद्वान ही होता (होटृ) बने।

Verse 23

प्राजापत्यमदत्त्वाश्चमग्न्याधेयस्य दक्षिणाम्‌ । अनाहिताग्निरिति स प्रोच्यते धर्मदर्शिभि:,जो अग्निहोत्र आरम्भ करके प्रजापति देवताके लिये अश्वरूप दक्षिणाका दान नहीं करता, धर्मदर्शी पुरुष उसे अनाहिताग्नि कहते- हैं

भीष्म बोले— जो अग्न्याधान का आरम्भ करके प्रजापति के लिए नियत दक्षिणा (अश्व-रूप दक्षिणा) नहीं देता, उसे धर्मदर्शी पुरुष ‘अनाहिताग्नि’ कहते हैं।

Verse 24

पुण्यानि यानि कुर्वीत श्रद्दधधानो जितेन्द्रिय: । अनाप्तदक्षिणैर्यज्जैन यजेत कथठ्चन,मनुष्य जो भी पुण्यकर्म करे उसे श्रद्धापूर्वक और जितेन्द्रिय भावसे करे। पर्याप्त दक्षिणा दिये बिना किसी तरह यज्ञ न करे

भीष्म बोले— मनुष्य जो भी पुण्यकर्म करे, उसे श्रद्धा से और इन्द्रियों को वश में रखकर करे। और पर्याप्त दक्षिणा दिए बिना किसी प्रकार भी यज्ञ न करे।

Verse 25

प्रजा: पशुंश्व स्वर्ग च हन्ति यज्ञो हादक्षिण: । इन्द्रियाणि यश: कीर्तिमायुश्नाप्पवकृन्तति,बिना दक्षिणाका यज्ञ प्रजा और पशुका नाश करता है; और स्वर्गकी प्राप्तिमें भी विघ्न डाल देता है। इतना ही नहीं वह इन्द्रिय, यश, कीर्ति तथा आयुको भी क्षीण करता है

भीष्म ने कहा—दक्षिणा के बिना किया गया यज्ञ प्रजा और पशुओं का नाश करता है तथा स्वर्ग-प्राप्ति में भी बाधा डालता है। इतना ही नहीं, वह इन्द्रियों का बल, यश, कीर्ति और आयु तक को क्षीण कर देता है।

Verse 26

उदक्यामासते ये च द्विजा: केचिदनग्नय: । होम॑ चाश्रोत्रियं येषां ते सर्वे पापकर्मिण:,जो ब्राह्मण रजस्वला स्त्रीके साथ समागम करते हैं, जिन्होंने घरमें अग्निकी स्थापना नहीं की है; तथा जो अवैदिक रीतिसे हवन करते हैं, वे सभी पापाचारी हैं

भीष्म ने कहा—जो ब्राह्मण रजस्वला स्त्री के साथ समागम करते हैं, जिनके घर में अग्नि की स्थापना नहीं है, और जो अवैदिक रीति से हवन करते हैं—वे सभी पापाचारी हैं।

Verse 27

उदपानोदके ग्रामे ब्राह्मणो वृषलीपति: । उषित्वा द्वादश समा: शूद्रकर्मेव गच्छति,जिस गाँवमें एक ही कुएँका पानी सब लोग पीते हैं, वहाँ बारह वर्षोतक निवास करनेसे तथा शूद्रजातिकी स्त्रीके साथ विवाह कर लेनेसे ब्राह्मण भी शूद्र हो जाता है

भीष्म ने कहा—जिस गाँव में सब लोग एक ही कुएँ का पानी पीते हैं, वहाँ शूद्र-स्त्री का पति बनकर और बारह वर्ष निवास करने से ब्राह्मण भी शूद्र के कर्म-आचरण में प्रवृत्त माना जाता है।

Verse 28

अभार्या शयने बिश्रच्छूद्रं वृद्धं च वै द्विज: । अब्राह्माणं मन्‍्यमानस्तृणेष्वासीत पृष्ठत: । तथा संशुध्यते राजन्‌ शृणु चात्र वचो मम,यदि ब्राह्मण अपनी पत्नीके सिवा दूसरी स्त्रीको शय्यापर बिठा ले अथवा बड़े-बूढ़े शूद्रको या ब्राह्मणेतर--क्षत्रिय या वैश्यको सम्मान देता हुआ ऊँचे आसनपर बैठाकर स्वयं चटाईपर बैठे तो वह ब्राह्मणत्वसे गिर जाता है। राजन! उसकी शुद्धि जिस प्रकार होती है, वह मुझसे सुनो

भीष्म ने कहा—यदि कोई द्विज अपनी पत्नी के सिवा दूसरी स्त्री को शय्या पर बिठाए, या वृद्ध शूद्र को, अथवा किसी अब्राह्मण (जैसे क्षत्रिय या वैश्य) को विशेष मान देकर ऊँचे आसन पर बैठाए और स्वयं पीछे तृण की चटाई पर बैठे, तो वह ब्राह्मणत्व से गिर जाता है। राजन्, उसकी शुद्धि जैसे होती है, वह मेरा वचन सुनो।

Verse 29

यदेकरात्रेण करोति पाप॑ निकृष्टवर्ण ब्राह्मण: सेवमान: । स्थानासनाभ्यां विहरन्‌ व्रती स त्रिभिर्वर्ष: शमयेदात्मपापम्‌,यदि ब्राह्मण एक रात भी किसी नीच वर्णके मनुष्यकी सेवा करे अथवा उसके साथ एक जगह रहे या एक आसनपर बैठे तो इससे जो पाप लगता है, उसको वह तीन वर्षों तक व्रतका पालन करते हुए पृथ्वीपर विचरनेसे दूर कर सकता है

भीष्म ने कहा—यदि ब्राह्मण एक रात भी किसी निकृष्ट वर्ण वाले की सेवा करे, या उसके साथ एक ही स्थान में रहे अथवा एक ही आसन पर बैठे, तो उससे जो पाप लगता है, उसे वह व्रत-पालन करते हुए पृथ्वी पर विचरकर तीन वर्षों में शांत कर सकता है।

Verse 30

न नर्मयुक्तमनृतं हिनस्ति न स्त्रीषु राजन्‌ न विवाहकाले | न गुर्वर्थ नात्मनो जीवितार्थे पज्चानृतान्याहुरपातकानि,राजन! परिहासमें, स्त्रीके पास, विवाहके अवसर-पर, गुरुके हितके लिये अथवा अपने प्राण बचानेके उद्देश्यसे बोला गया असत्य हानिकारक नहीं होता। इन पाँच अवसरोंपर असत्य बोलना पाप नहीं बताया गया है

भीष्म ने कहा—हे राजन्! परिहास में बोला गया असत्य हानिकारक नहीं होता; न स्त्रियों के पास, न विवाह के अवसर पर। इसी प्रकार गुरु के हित के लिए अथवा अपने प्राण बचाने के लिए कहा गया असत्य भी दोष नहीं माना जाता। हे राजन्! ये पाँच अवसर ऐसे कहे गए हैं जिनमें असत्य बोलना पाप नहीं गिना जाता।

Verse 31

श्रद्दधान: शुभां विद्यां हीनादपि समाप्रुयात्‌ । सुवर्णमपि चामेध्यादाददीताविचारयन्‌,नीच वर्णके पुरुषके पास भी उत्तम विद्या हो तो उसे श्रद्धापूर्वक ग्रहण करनी चाहिये और सोना अपवित्र स्थानमें भी पड़ा हो तो उसे बिना हिच-किचाहटके उठा लेना चाहिये

भीष्म ने कहा—श्रद्धावान पुरुष को उत्तम विद्या हीन कुल/नीच स्थिति वाले से भी प्राप्त हो तो उसे आदरपूर्वक ग्रहण कर लेना चाहिए। और यदि अपवित्र स्थान में भी सोना पड़ा हो, तो बिना संकोच उठा लेना चाहिए।

Verse 32

स्त्रीर॒त्नं दुष्कुलाच्चापि विषादप्यमृतं पिबेत्‌ । अदृष्या हि स्त्रियो रत्नमाप इत्येव धर्मतः,नीच कुलसे भी उत्तम स्त्रीको ग्रहण कर ले, विषके स्थानसे भी अमृत मिले तो उसे पी ले; क्योंकि स्त्रियाँ, रतन और जल--ये धर्मतः दूषणीय नहीं होते हैं

भीष्म ने कहा—नीच कुल से भी उत्तम स्त्री मिले तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए; और विष के स्थान में भी यदि अमृत मिले तो उसे पी लेना चाहिए। क्योंकि धर्म के अनुसार स्त्रियाँ, रत्न और जल—ये दूषणीय नहीं माने जाते।

Verse 33

गोब्राह्मणहितार्थ च वर्णानां संकरेषु च | वैश्यो गृह्नीत शस्त्राणि परित्राणार्थमात्मन:,गौ और ब्राह्मणोंका हित, वर्णसंकरताका निवारण तथा अपनी रक्षा करनेके लिये वैश्य भी हथियार उठा सकता है

भीष्म ने कहा—गौ और ब्राह्मणों के हित के लिए, वर्णों के संकर को रोकने के लिए, तथा अपनी रक्षा के लिए वैश्य भी शस्त्र उठा सकता है।

Verse 34

सुरापान ब्रह्म॒हत्या गुरुतल्पमथापि वा । अनिर्देश्यानि मन्यन्ते प्राणान्‍्तमिति धारणा,मदिरापान, ब्रह्महत्या तथा गुरुपत्नीगमन--इन महापापोंसे छूटनेके लिये कोई प्रायक्षित्त नहीं बताया गया है। किसी भी उपायसे अपने प्राणोंका अन्त कर देना ही उन पापोंका प्रायश्षित्त होगा, ऐसी विद्वानोंकी धारणा है

भीष्म ने कहा—मदिरापान, ब्रह्महत्या और गुरुपत्नीगमन—इन पापों के लिए कोई साधारण प्रायश्चित्त निर्धारित नहीं माना गया है। विद्वानों की धारणा है कि इनका प्रायश्चित्त केवल प्राणान्त, अर्थात् किसी उपाय से अपने जीवन का अंत करना ही है।

Verse 35

सुवर्णहरणं स्तैन्यं विप्रस्व॑ चेति पातकम्‌ । विहरन्‌ मद्यपानाच्च अगम्यागमनादपि,सुवर्णकी चोरी, अन्य वस्तुओंकी चोरी तथा ब्राह्मणका धन छीन लेना--यह महान्‌ पाप है। महाराज! मदिरापान और अगम्या स्त्रीके साथ गमन करनेसे, पतितोंके साथ सम्पर्क रखनेसे तथा ब्राह्मणेतर होकर ब्राह्मणीके साथ समागम करनेसे स्वेच्छाचारी पुरुष शीघ्र ही पतित हो जाता है

भीष्म ने कहा—सुवर्ण की चोरी, अन्य वस्तुओं की चोरी और ब्राह्मण का धन छीन लेना—ये घोर पाप हैं। जो मनुष्य मदिरापान करता है, अगम्या स्त्री के पास जाता है, पतितों की संगति रखता है, और ब्राह्मणेतर होकर ब्राह्मणी से समागम करता है, वह शीघ्र ही धर्ममार्ग से गिरकर पतित हो जाता है।

Verse 36

पतितै: सम्प्रयोगाच्च ब्राह्णीयोनितस्तथा । अचिरेण महाराज पतितो वै भवत्युत,सुवर्णकी चोरी, अन्य वस्तुओंकी चोरी तथा ब्राह्मणका धन छीन लेना--यह महान्‌ पाप है। महाराज! मदिरापान और अगम्या स्त्रीके साथ गमन करनेसे, पतितोंके साथ सम्पर्क रखनेसे तथा ब्राह्मणेतर होकर ब्राह्मणीके साथ समागम करनेसे स्वेच्छाचारी पुरुष शीघ्र ही पतित हो जाता है

हे महाराज! पतितों के साथ संसर्ग करने से, और ब्राह्मणेतर होकर ब्राह्मणी के साथ मैथुन करने से मनुष्य शीघ्र ही पतित हो जाता है।

Verse 37

संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन्‌ | याजनाध्यापनाद यौनान्न तु यानासनाशनात्‌,पतितके साथ रहनेसे, उसका यज्ञ करानेसे और उसे पढ़ानेसे मनुष्य एक वर्षमें पतित हो जाता है; परंतु उसकी संतानके साथ अपनी संतानका विवाह करनेसे, एक सवारी या एक आसन पर बैठनेसे तथा उसके साथमें भोजन करनेसे वह एक वर्षमें नहीं, किंतु तत्काल पतित हो जाता है

पतित के साथ रहकर आचरण करने से, उसके लिए यज्ञ कराने से और उसे पढ़ाने से मनुष्य एक वर्ष में पतित हो जाता है; परंतु उसके साथ एक ही सवारी, एक ही आसन और एक ही भोजन साझा करने से पतन एक वर्ष में नहीं—तत्काल हो जाता है।

Verse 38

एतानि हित्वातो<न्यानि निर्देश्यानीति भारत । निर्देश्यानेन विधिना कालेनाव्यसनी भवेत्‌,भरतनन्दन! उपर्युक्त पाप अनिर्देश्य (प्रायश्चित्त-रहित) कहे गये हैं। इन्हें छोड़कर और जितने पाप हैं, वे निर्देश्य हैं--शास्त्रमें उनका प्रायश्चित्त बताया गया है। उसके अनुसार प्रायक्षित्त करके पापका व्यसन छोड़ देना चाहिये

हे भरतनन्दन! इन पापों को छोड़कर, जिन्हें अनिर्देश्य (अप्रायश्चित्त) कहा गया है, अन्य सब पाप निर्देश्य हैं—शास्त्र में उनके प्रायश्चित्त बताए गए हैं। उन विधानों के अनुसार प्रायश्चित्त करके, समय के साथ मनुष्य को पाप-व्यसन से मुक्त हो जाना चाहिए।

Verse 39

अन्न वीर्य ग्रहीतव्यं प्रेतकर्मण्यपातिते । त्रिषु त्वेतेषु पूर्वेषु न कुर्वीत विचारणाम्‌,पूर्वोक्त (शराबी, ब्रह्महत्यारा और गुरुपत्नीगामी) तीन पापियोंके मरनेपर उनकी दाहादिक क्रिया किये बिना ही कुटुम्बीजनोंको उनके अन्न और धनपर अधिकार कर लेना चाहिये। इसमें कुछ अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है

जब प्रेतकर्म (दाहादि) न किया गया हो, तब भी कुटुम्बीजनों को मृतक के अन्न और धन का अधिकार ग्रहण कर लेना चाहिए। और पूर्वोक्त तीन पापियों—मद्यप, ब्रह्महन्ता और गुरुपत्नीगामी—के विषय में तो इसमें कोई विचार-विमर्श ही न किया जाए।

Verse 40

अमात्यान्‌ वा गुरून्‌ वापि जह्याद्‌ धर्मेण धार्मिक: । प्रायक्षित्तमकुर्वाणैनैतैरहीति संविदम्‌,धार्मिक राजा अपने मन्त्री और गुरुजनोंको भी पतित हो जानेपर धर्मानुसार त्याग दे और जबतक ये अपने पापोंका प्रायश्चित्त न कर लें, तबतक इनके साथ बातचीत न करे

भीष्म ने कहा—धर्मात्मा राजा धर्म के अनुसार, यदि उसके मन्त्री या गुरुजन अधर्म में गिर जाएँ तो उन्हें भी त्याग दे। और जब तक वे अपने पाप का प्रायश्चित्त न कर लें, तब तक उनसे मेल-जोल या बातचीत न करे।

Verse 41

अधर्मकारी धर्मेण तपसा हन्ति किल्बिषम्‌ | ब्रुवन्‌ स्तेन इति स्तेनं तावत्‌ प्राप्नोति किल्बिषम्‌,पापाचारी मनुष्य यदि धर्माचरण और तपस्या करे तो अपने पापको नष्ट कर देता है। चोरको “यह चोर है” ऐसा कह देनेमात्रसे चोरके बराबर पापका भागी होना पड़ता है

भीष्म ने कहा—जो मनुष्य अधर्म कर बैठा हो, वह धर्माचरण और तपस्या से अपने पाप-कलुष को नष्ट कर सकता है। परन्तु किसी के विषय में केवल ‘यह चोर है’ ऐसा कह देने से भी, उतनी ही मात्रा में, चोर के समान पाप का कलंक लग जाता है।

Verse 42

अस्तेन॑ स्तेन इत्युक्त्वा द्विगुणं पापमाप्नुयात्‌ त्रिभागं ब्रह्महत्याया: कन्या प्राप्रोति दुष्पती,जो चोर नहीं है, उसको चोर कह देनेसे मनुष्यको चोरसे दूना पाप लगता है। कुमारी कन्या यदि अपनी इच्छासे चरित्रभ्रष्ट हो जाय तो उसे ब्रह्महत्याका तीन चौथाई पाप भोगना पड़ता है

भीष्म ने कहा—जो चोर नहीं है, उसे ‘चोर’ कह देने से मनुष्य चोरी के पाप से दूना पाप का भागी होता है। और कुमारी कन्या यदि अपनी इच्छा से पतित आचरण में गिर जाए, तो वह ब्रह्महत्या के पाप का एक अंश भोगती है।

Verse 43

यस्तु दूषयिता तस्या: शेषं प्राप्रोति पाप्मन: । ब्राह्मणानवगह्ठोह स्पृष्टवा गुरुतरं भवेत्‌,और जो उसे कलंकित करनेवाला पुरुष है, वह शेष एक चौथाई पापका भागी होता है। इस जगतमें ब्राह्मणोंको गाली देकर या उन्हें तिरस्कारपूर्वक धक्के देकर हटानेसे मनुष्यको बड़ा भारी पाप लगता है

भीष्म ने कहा—और जो पुरुष उसे कलंकित करता है, वह शेष पाप का भागी होता है। फिर इस लोक में ब्राह्मणों को गाली देना या तिरस्कारपूर्वक उन्हें धक्का देकर हटाना—यह अत्यन्त भारी दोष है।

Verse 44

वर्षाणां हि शतं तावत्‌ प्रतिष्ठा नाधिगच्छति । सहसंरं चैव वर्षाणां निपत्य नरकं वसेत्‌,सौ वर्षोतक तो उसे प्रेतकी भाँति भटकना पड़ता है, कहीं भी ठहरनेके लिये ठौर नहीं मिलता। फिर एक हजार वर्षोतक उसे नरकमें गिरकर रहना पड़ता है

भीष्म ने कहा—ऐसा मनुष्य सौ वर्षों तक कहीं प्रतिष्ठा या ठिकाना नहीं पाता; वह प्रेत की भाँति भटकता रहता है। फिर एक हजार वर्षों तक नरक में गिरकर वहीं वास करता है।

Verse 45

तस्मान्नैवावगहोॉत नैव जातु निपातयेत्‌ । शोणितं यावत: पांसून्‌ संगृह्नीयाद्‌ द्विजक्षतात्‌

भीष्म ने कहा—इसलिए उसमें न तो उतरना चाहिए और न कभी उसे गिरने देना चाहिए। ब्राह्मण के घाव से निकले रक्त ने जितनी धूल को छुआ हो, उतनी धूल सहित उस रक्त को समेट लेना चाहिए, ताकि आगे अपवित्रता या हानि न फैले।

Verse 46

भ्रूगहा55हवमध्ये तु शुद्ध्यते शस्त्रपातत:

भीष्म ने कहा—भयंकर संग्राम के ठीक मध्य में भी, शस्त्रों के प्रहार (धर्मानुसार युद्ध-कर्तव्य का निर्वाह) से मनुष्य शुद्ध हो जाता है—यदि वह कपट और अधर्म-बुद्धि से रहित हो।

Verse 47

सुरापो वारुणीमुष्णां पीत्वा पापाद्‌ विमुच्यते,मदिरा पीनेवाला पुरुष यदि मदिराको खूब गरम करके पी ले तो पापसे छुटकारा पा जाता है, अथवा उससे शरीर जल जानेके कारण उसकी मृत्यु हो जाय तो वह शुद्ध हो जाता है। इस प्रकार शुद्ध हो जानेपर ही वह ब्राह्मण शुद्ध लोकोंको प्राप्त कर सकता है, अन्यथा नहीं

भीष्म ने कहा—जो सुरापान के दोष से युक्त हो, वह उष्ण (अत्यन्त गरम) वारुणी पीकर पाप से मुक्त माना जाता है। भाव यह है कि उस तीव्र दाहजन्य पीड़ा—या उससे होने वाली मृत्यु—को प्रायश्चित्त कहा गया है; ऐसी शुद्धि के बाद ही वह शुद्ध लोकों का अधिकारी होता है, अन्यथा नहीं।

Verse 48

तया स काये निर्दग्धे मृत्युं वा प्राप्प शुद्धयति । लोकांश्व लभते विप्रो नान्‍न्यथा लभते हि सः,मदिरा पीनेवाला पुरुष यदि मदिराको खूब गरम करके पी ले तो पापसे छुटकारा पा जाता है, अथवा उससे शरीर जल जानेके कारण उसकी मृत्यु हो जाय तो वह शुद्ध हो जाता है। इस प्रकार शुद्ध हो जानेपर ही वह ब्राह्मण शुद्ध लोकोंको प्राप्त कर सकता है, अन्यथा नहीं

भीष्म ने कहा—उस (उष्ण वारुणी) से यदि उसका शरीर जल जाए, तो—चाहे उससे उसकी मृत्यु हो या वह जीवित रहे—वह शुद्ध हो जाता है। ऐसी शुद्धि के बाद ही वह ब्राह्मण शुद्ध लोकों को प्राप्त करता है; अन्यथा वह उन्हें नहीं पाता।

Verse 49

गुरुतल्पमधिष्ठाय दुरात्मा पापचेतन: । स्त्रयाकारां प्रतिमां लिंग्य मृत्युना सोडभिशुद्धयति,पापपूर्ण विचार रखनेवाला दुरात्मा पुरुष यदि गुरुपत्नीगगमनका पाप कर बैठे तो वह लोहेकी गरम की हुई नारी-प्रतिमाका आलिड्नन करके प्राण दे देनेपर ही उस पापसे शुद्ध होता है

भीष्म ने कहा—गुरुपत्नीगमन का पाप करने वाला, पापबुद्धि दुरात्मा पुरुष, स्त्री-आकार की तप्त लोहे की प्रतिमा का आलिङ्गन करके और उसी से प्राण त्याग करके ही उस पाप से शुद्ध होता है।

Verse 50

अथवा शिश्रवृषणावादायाञ्जलिना स्वयम्‌,अथवा अपने शिश्न और अण्डकोषको स्वयं ही काटकर अगज्जलिमें लेकर सीधे नैरऋत्य-दिशाकी ओर जाता हुआ गिर पड़े या ब्राह्मणके लिये प्राणोंका परित्याग कर दे तो शुद्ध हो जाता है

भीष्म ने कहा—या तो वह अपने शिश्न और अण्डकोष को अपनी ही अंजलि में लेकर, अथवा उन्हें स्वयं काटकर अंजलि में धारण कर, नैरऋत्य दिशा की ओर सीधा चलता हुआ जहाँ गिर पड़े वहाँ तक जाए; या फिर ब्राह्मण के हित के लिए अपने प्राणों का परित्याग कर दे—ऐसा करने से वह शुद्ध हो जाता है।

Verse 51

नैर्कतीं दिशमास्थाय निपतेत्‌ स त्वजिह्मृग: । ब्राह्मणार्थेडपि वा प्राणान्‌ संत्यजेत्‌ तेन शुद्धयति,अथवा अपने शिश्न और अण्डकोषको स्वयं ही काटकर अगज्जलिमें लेकर सीधे नैरऋत्य-दिशाकी ओर जाता हुआ गिर पड़े या ब्राह्मणके लिये प्राणोंका परित्याग कर दे तो शुद्ध हो जाता है

नैरऋत्य दिशा की ओर जाकर यदि वह कपट छोड़कर सीधा होकर वहाँ गिर पड़े, अथवा ब्राह्मण के लिए प्राण भी त्याग दे—तो उससे वह शुद्ध हो जाता है।

Verse 52

अश्वमेधेन वापीष्टठवा अथवा गोसवेन वा । अग्निष्टोमेन वा सम्यगिह प्रेत्य च पूज्यते,अथवा अभश्वमेधयज्ञ, गोसव नामक यज्ञ या अग्निष्टोम यज्ञके द्वारा भलीभाँति यजन करके वह इहलोक तथा परलोकमें पूजित होता है

अश्वमेध यज्ञ से, अथवा गोसव यज्ञ से, या विधिपूर्वक अग्निष्टोम यज्ञ से यजन करके वह यजमान इस लोक में भी और परलोक में भी पूजित होता है।

Verse 53

तथैव द्वादशसमा: कपाली ब्रह्महा भवेत्‌ । ब्रह्मचारी भवेन्नित्यं स्वकर्म ख्यापयन्‌ मुनि:

उसी प्रकार वह बारह वर्षों तक कपालधारी तपस्वी की भाँति रहे; उसे ब्रह्महत्या का पापी माना जाए। वह सदा ब्रह्मचारी रहे और मुनि होकर अपने किए हुए कर्म (और प्रायश्चित्त) को प्रकट रूप से स्वीकार कर लोगों को बताए।

Verse 54

एवं तु समभिज्ञातामात्रेयीं वा निपातयेत्‌

इस प्रकार जब वह स्पष्ट रूप से ‘मात्रेयी’ के रूप में पहचान ली जाए, तब उसे गिरा देना (दण्डित/वश में करना) चाहिए।

Verse 55

द्विगुणा ब्रह्म॒हत्या वै आत्रेयीनिधने भवेत्‌ । इसी तरह जो जान-बूझकर गर्भेणी स्त्रीकी हत्या करता है; उसे उस गर्भिणी-वधके कारण दो ब्रह्महत्याओंका पाप लगता है ।। ५४ $ ।। सुरापो नियताहारो ब्रह्मचारी क्षितीशय:,मदिरा पीनेवाला मनुष्य मिताहारी और ब्रह्मचारी होकर पृथ्वीपर शयन करे। इस तरह तीन वर्षोतक रहनेके बाद “अग्निष्टोम' यज्ञ करे। तत्पश्चात्‌ एक हजार बैल या इतनी ही गौएँ ब्राह्मणोंको दान दे तो वह शुद्ध हो जाता है

भीष्म ने कहा—आत्रेय वंश की गर्भिणी स्त्री की हत्या में ब्रह्महत्या का पाप दो गुना हो जाता है। इसलिए जिसने मदिरा पी हो, वह संयम से रहे—मिताहार करे, ब्रह्मचर्य का पालन करे और भूमि पर शयन करे। इस नियम को तीन वर्ष तक निभाकर वह ‘अग्निष्टोम’ यज्ञ करे; फिर एक हजार बैल या उतनी ही गौएँ ब्राह्मणों को दान दे—तब वह शुद्ध होता है।

Verse 56

ऊर्ध्व त्रिभ्योडपि वर्षेभ्यो यजेताग्निष्ठता परम्‌ । ऋषभेैकसहसंर वा गा दत्त्वा शौचमाप्नुयात्‌,मदिरा पीनेवाला मनुष्य मिताहारी और ब्रह्मचारी होकर पृथ्वीपर शयन करे। इस तरह तीन वर्षोतक रहनेके बाद “अग्निष्टोम' यज्ञ करे। तत्पश्चात्‌ एक हजार बैल या इतनी ही गौएँ ब्राह्मणोंको दान दे तो वह शुद्ध हो जाता है

भीष्म ने कहा—तीन पूर्ण वर्ष कठोर नियम से बिताकर परम प्रायश्चित्त के रूप में ‘अग्निष्टोम’ यज्ञ करना चाहिए। उसके बाद एक हजार बैल या उतनी ही गौएँ ब्राह्मणों को दान देने से मनुष्य शुद्धि प्राप्त करता है।

Verse 57

वैश्यं हत्वा तु वर्षे द्वे ऋषभैकशतं च गा: । शूद्रं हत्वाब्दमेवेकमृषभं च शतं च गा:,यदि वैश्यकी हत्या कर दे तो दो वर्षोतक पूर्वोक्त नियमसे रहनेके बाद एक सौ बैल और एक सौ गौओंका दान करे, तथा शूद्रकी हत्या कर देनेपर हत्यारेको एक वर्षतक पूर्वोक्त नियमसे रहकर एक बैल और सौ गौओंका दान करना चाहिये

भीष्म ने कहा—वैश्य की हत्या करने पर दो वर्ष तक पूर्वोक्त नियम से रहकर एक सौ बैल और एक सौ गौओं का दान करना चाहिए। और शूद्र की हत्या करने पर एक वर्ष तक उसी नियम से रहकर एक बैल और एक सौ गौओं का दान करना चाहिए।

Verse 58

श्वृवराहखरान्‌ हत्वा शौद्रमेव व्रतं चरेत्‌ मार्जारचाषमण्डूकान्‌ काकं व्यालं च मूषिकम्‌

भीष्म ने कहा—सूकर, वराह और गधे को मार देने पर शूद्र के व्रत का ही आचरण करना चाहिए। इसी प्रकार बिल्ली, चाष-पक्षी, मेंढक, कौआ, सर्प और चूहे को मार देने पर भी (उसी प्रकार का) प्रायश्चित्त करना चाहिए।

Verse 59

प्रायक्षित्तान्यथान्यानि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वश:

भीष्म ने कहा—अब मैं अन्य- अन्य प्रायश्चित्तों को भी क्रमशः बताऊँगा।

Verse 60

अल्पे वाप्यथ शोचेत पृथक्‌ संवत्सरं चरेत्‌ । त्रीणि श्रोत्रियभार्यायां परदारे च द्वे स्मृते

भीष्म ने कहा—अल्प दोष हो जाने पर भी मनुष्य को पश्चात्ताप करना चाहिए और प्रायश्चित्तार्थ एक वर्ष तक पृथक् रहकर व्रतचर्या करनी चाहिए। श्रोत्रिय ब्राह्मण की पत्नी के पास जाने पर तीन वर्ष और परस्त्रीगमन में दो वर्ष का प्रायश्चित्त स्मृतियों में कहा गया है।

Verse 61

काले चतुर्थे भुठ्जानो ब्रह्मचारी व्रती भवेत्‌ । स्थानासनाभ्यां विहरेत त्रिरह्वाभ्युपयन्नप: । एवमेव निराकर्ता यश्षाग्नीनपविध्यति

भीष्म ने कहा—दिन के चौथे पहर में ही भोजन करे, ब्रह्मचारी और व्रती रहे। खड़े रहने और बैठने मात्र से समय बिताए, और दिन में तीन बार शुद्धि हेतु जल के पास जाकर आचमन-स्नान करे। जो पवित्र अग्नियों का परित्याग/उपेक्षा करता है, उसके लिए भी यही प्रायश्चित्त है।

Verse 62

अब दूसरे प्रायश्षित्तोंका भी क्रमश: वर्णन करता हूँ। अनजानमें कीड़ों-मकोड़ोंका वध आदि छोटा पाप हो जाय तो उसके लिये पश्चात्ताप करे। इतनेहीसे उसकी शुद्धि हो जाती है। गोवधके सिवा अन्य जितने उपपातक हैं उनमेंसे प्रत्येकके लिये एक-एक वर्षतक व्रतका आचरण करे। श्रोत्रियकी पत्नीसे व्यभिचार करनेपर तीन वर्षतक और अन्य परस्त्रियोंसे समागम करनेपर दो वर्षोतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए दिनके चौथे पहरमें एक बार भोजन करे। अपने लिये पृथक्‌ स्थान और आसनकी व्यवस्था रखते हुए घूमता रहे। दिनमें तीन बार जलसे स्नान करे। ऐसा करनेसे ही वह अपने उपर्युक्त पापोंका निवारण कर सकता है। जो अग्निको भ्रष्ट करता है, उसके लिये भी यही प्रायश्रित्त है ।। ५९ ज:5३ || त्यजत्यकारणे यश्न पितरं मातरं गुरुम्‌ । पतित: स्यात्स कौरव्य यथा धर्मेषु निश्चय:

भीष्म ने कहा—हे कौरव्य! जो बिना कारण यज्ञ का परित्याग करता है और पिता, माता अथवा गुरु को छोड़ देता है, वह पतित हो जाता है—धर्म के विषय में यही निश्चय है।

Verse 63

ग्रासाच्छादनमात्र तु दद्यादिति निदर्शनम्‌ । (ब्रह्मचारी द्विजेभ्यश्व दत्त्वा पापात्‌ प्रमुच्यते ।) कुरुनन्दन! जो अकारण ही पिता, माता और गुरुका परित्याग करता है, वह पतित हो जाता है। उसे केवल अन्न और वस्त्र दे और पैतृकसम्पत्तिसे वंचित कर दे। वह ब्रह्मचर्य- व्रतका पालन करते हुए ब्राह्मणोंको दान दे (और पिता-माता आदिका पूर्ववत्‌ आदर करने लगे) तो उस पापसे मुक्त हो जाता है, यही धर्मशास्त्रोंका निर्णय है ।। ६२ $ ।। भारयायां व्यभिचारिण्यां निरुद्धायां विशेषतः । यत्‌ पुंस: परदारेषु तदेनां चारयेद्‌ ब्रतम,यदि पत्नीने व्यभिचार किया हो और विशेषत: इस कार्यमें पकड़ ली गयी हो तो परायी सत्रीसे व्यभिचार करनेवाले पुरुषके लिये जो प्रायश्नित्तरूप व्रत बताया गया है, वही उससे भी करावे

भीष्म ने कहा—दृष्टान्त यह है कि उसे केवल अन्न और वस्त्र ही दिए जाएँ। हे कुरुनन्दन! जो अकारण पिता, माता और गुरु का परित्याग करता है, वह पतित हो जाता है। उसे केवल निर्वाह-भोजन और वस्त्र देकर पैतृक सम्पत्ति से वंचित कर देना चाहिए। यदि वह ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करते हुए ब्राह्मणों को दान दे और पिता-माता-गुरु का पूर्ववत् आदर करने लगे, तो वह उस पाप से मुक्त हो जाता है—धर्मशास्त्रों का यही निश्चय है। इसी प्रकार, यदि पत्नी ने व्यभिचार किया हो—विशेषतः पकड़ी जाकर निरुद्ध की गई हो—तो परस्त्रीगामी पुरुष के लिए जो प्रायश्चित्त-व्रत बताया गया है, वही उससे भी कराना चाहिए।

Verse 64

श्रेयांसं शयनं हित्वा या<न्‍्यं पापं॑ निगच्छति । श्वभिस्तामर्दयेद्‌ राजा संस्थाने बहुविस्तरे,जो अपने श्रेष्ठ पतिको छोड़कर अन्य पापीकी शय्यापर जाती है, उस कुलटाको अत्यन्त विस्तृत मैदानमें खड़ी करके राजा कुत्तोंसे नोचवा डाले

भीष्म ने कहा—जो स्त्री श्रेष्ठ (धर्मसम्मत) पति की शय्या छोड़कर अन्य पापी पुरुष की शय्या पर जाती है, उस कुलटा को राजा अत्यन्त विस्तृत मैदान में खड़ा कराकर कुत्तों से नोचवा डाले।

Verse 65

पुमांसमुन्नयेत्‌ प्राज्ञ: शयने तप्त आयसे । अप्यादधीत दारूणि तत्र दहोत पापकृत्‌,इसी तरह व्यभिचारी पुरुषको बुद्धिमान्‌ राजा लोहेकी तपायी हुई खाटपर सुलाकर ऊपरसे लकड़ी रख दे और आग लगा दे, जिससे वह पापी उसीमें जलकर भस्म हो जाय। महाराज! पतिकी अवहेलना करके परपुरुषोंसे व्यभिचार करनेवाली स्त्रियोंके लिये भी यही दण्ड है, उपर्युक्त कहे हुएमें जिन दुष्टोंके लिये प्रायश्चित्त बताया है, उनके लिये यह भी विधान है कि एक वर्षके भीतर प्रायश्चित्त न करनेपर दुष्ट पुरुषको दूना दण्ड प्राप्त होना चाहिये। जो मनुष्य दो, तीन, चार या पाँच वर्षोतक उस पतित पुरुषके संसर्गमें रहे, वह मुनिजनोचित व्रत धारण करके उतने ही वर्षोतक पृथ्वीपर घूमता हुआ भिक्षावृत्तिसे जीवन- निर्वाह करे

भीष्म बोले— बुद्धिमान राजा को चाहिए कि व्यभिचारी पुरुष को तप्त लोहे की खाट पर लिटाकर उस पर लकड़ियाँ रख दे और आग लगा दे, जिससे वह पापी वहीं जलकर भस्म हो जाए। इसी प्रकार जो स्त्रियाँ पति की अवहेलना करके परपुरुषों से व्यभिचार करती हैं, उनके लिए भी यही दण्ड कहा गया है। और जिन दुष्टों के लिए प्रायश्चित्त बताया गया है, उनके विषय में यह भी विधान है कि यदि वे एक वर्ष के भीतर प्रायश्चित्त न करें तो उन्हें दूना दण्ड मिले। जो मनुष्य उस पतित के संसर्ग में दो, तीन, चार या पाँच वर्ष तक रहे, वह मुनिजन-सम व्रत धारण करके उतने ही वर्षों तक पृथ्वी पर भ्रमण करता हुआ भिक्षावृत्ति से जीवन निर्वाह करे।

Verse 66

एष दण्डो महाराज स्त्रीणां भर्तृष्वतिक्रमात्‌ । संवत्सराभिशस्तस्य दुष्टस्य द्विगुणो भवेत्‌,इसी तरह व्यभिचारी पुरुषको बुद्धिमान्‌ राजा लोहेकी तपायी हुई खाटपर सुलाकर ऊपरसे लकड़ी रख दे और आग लगा दे, जिससे वह पापी उसीमें जलकर भस्म हो जाय। महाराज! पतिकी अवहेलना करके परपुरुषोंसे व्यभिचार करनेवाली स्त्रियोंके लिये भी यही दण्ड है, उपर्युक्त कहे हुएमें जिन दुष्टोंके लिये प्रायश्चित्त बताया है, उनके लिये यह भी विधान है कि एक वर्षके भीतर प्रायश्चित्त न करनेपर दुष्ट पुरुषको दूना दण्ड प्राप्त होना चाहिये। जो मनुष्य दो, तीन, चार या पाँच वर्षोतक उस पतित पुरुषके संसर्गमें रहे, वह मुनिजनोचित व्रत धारण करके उतने ही वर्षोतक पृथ्वीपर घूमता हुआ भिक्षावृत्तिसे जीवन- निर्वाह करे

भीष्म बोले— महाराज! पतियों का अतिक्रमण करने वाली स्त्रियों के लिए यही दण्ड है। और जो दुष्ट एक वर्ष तक निन्दित रहकर भी (अर्थात् एक वर्ष के भीतर) प्रायश्चित्त न करे, उसका दण्ड दूना हो जाना चाहिए।

Verse 67

द्वे तस्य त्रीणि वर्षाणि चत्वारि सहसेविनि । कुचर: पज्चवर्षाणि चरेद्‌ भैक्ष्यं मुनिव्रत:,इसी तरह व्यभिचारी पुरुषको बुद्धिमान्‌ राजा लोहेकी तपायी हुई खाटपर सुलाकर ऊपरसे लकड़ी रख दे और आग लगा दे, जिससे वह पापी उसीमें जलकर भस्म हो जाय। महाराज! पतिकी अवहेलना करके परपुरुषोंसे व्यभिचार करनेवाली स्त्रियोंके लिये भी यही दण्ड है, उपर्युक्त कहे हुएमें जिन दुष्टोंके लिये प्रायश्चित्त बताया है, उनके लिये यह भी विधान है कि एक वर्षके भीतर प्रायश्चित्त न करनेपर दुष्ट पुरुषको दूना दण्ड प्राप्त होना चाहिये। जो मनुष्य दो, तीन, चार या पाँच वर्षोतक उस पतित पुरुषके संसर्गमें रहे, वह मुनिजनोचित व्रत धारण करके उतने ही वर्षोतक पृथ्वीपर घूमता हुआ भिक्षावृत्तिसे जीवन- निर्वाह करे

यदि कोई उस पतित के साथ दो, तीन या चार वर्ष तक संगति में रहा हो, तो मुनिजन-सम व्रत धारण करके उतने ही वर्षों तक भिक्षावृत्ति से जीवन निर्वाह करता हुआ पृथ्वी पर भ्रमण करे। और जो पाँच वर्ष तक उसके साथ रहा हो, वह भी पाँच वर्षों तक उसी प्रकार भिक्षुक-जीवन का आचरण करे।

Verse 68

परिवित्ति: परिवेत्ता या चैव परिविद्यते । पाणिग्रहास्त्वधर्मेण सर्वे ते पतिता: स्मृता:,ज्येष्ठ भाईका विवाह होनेसे पहले ही यदि छोटा भाई अधर्मपूर्वक विवाह कर ले तो ज्येष्ठको “परिवित्ति” कहते हैं; छोटे भाईको “परिवेत्ता' हैं और उसकी पत्नीको जिसका परिवेदन (ग्रहण) किया जाता है, परिवेदनीया कहते हैं-ये सब-के-सब पतित माने गये हैं

भीष्म बोले— जब ज्येष्ठ भाई के विवाह से पहले ही कनिष्ठ भाई अधर्मपूर्वक विवाह कर ले, तो ज्येष्ठ को ‘परिवित्ति’, कनिष्ठ को ‘परिवेत्ता’ और जिस स्त्री का इस प्रकार पाणिग्रहण किया जाता है उसे ‘परिविद्यते’ कहा जाता है। ऐसे अधर्मजन्य विवाह में सम्मिलित ये सभी लोग पतित माने गए हैं।

Verse 69

चरेयु: सर्व एवैते वीरहा यद्‌ व्रतं चरेत्‌ । चान्द्रायणं चरेन्मासं कृच्छूं वा पापशुद्धये,इन तीनोंको पृथक्‌ू-पृथक्‌ अपनी शुद्धिके लिये उसी व्रतका आचरण करना चाहिये जो यज्ञहीन ब्राह्मणके लिये बताया गया है। अथवा एक मासतक चान्द्रायण या कृच्छुचान्द्रायण व्रत करे

इन सबको अपनी शुद्धि के लिए वही व्रत करना चाहिए जो ‘वीरहा’ (वीर-हन्ता) के लिए बताया गया है। अथवा पाप-शुद्धि के लिए एक मास तक चान्द्रायण या कृच्छ्र-व्रत का आचरण करे।

Verse 70

परिवेत्ता प्रयच्छेत तां स्नुषां परिवित्तये । ज्येछेन त्वभ्यनुज्ञातो यवीयानप्यनन्तरम्‌ । एवं च मोक्षमाप्रोति तौ च सा चैव धर्मत:,परिवेत्ता पुरुष उस नववधूको पतोहूके रूपमें ज्येष्ठ भाईको सौंप दे और ज्येष्ठ भाईकी आज्ञा मिलनेपर छोटा भाई उसे पत्नीरूपमें ग्रहण करे। ऐसा करनेपर वे तीनों धर्मके अनुसार पापसे छुटकारा पाते हैं

भीष्म ने कहा—जो छोटा भाई ज्येष्ठ के रहते पहले विवाह कर बैठा हो (परिवेत्ता), वह उस वधू को पतोहू के रूप में उस ज्येष्ठ भाई (परिवित्त) को सौंप दे। फिर ज्येष्ठ की आज्ञा मिलने पर छोटा भाई बाद में उसे पत्नी रूप में ग्रहण करे। ऐसा करने से वे दोनों भाई और वह स्त्री—तीनों—धर्म के अनुसार दोष से मुक्त हो जाते हैं।

Verse 71

अमानुषीषु गोवर्ज्यमनावृष्टिन दुष्पति । अधिष्ठात्रवमन्तारं पशूनां पुरुषं विदु:,पशु जातियोंमें गौओंको छोड़कर अन्य किसीकी अनजानमें हिंसा हो जाय तो वह दोषावह नहीं मानी जाती; क्योंकि मनुष्यको पशुओंका अधिष्ठाता एवं पालक माना गया है

भीष्म ने कहा—मनुष्येतर प्राणियों के विषय में, गौ को छोड़कर, यदि अनजाने में हिंसा हो जाए तो उसे दोष नहीं माना जाता; क्योंकि परंपरा में मनुष्य को पशुओं का अधिष्ठाता और पालक माना गया है—और गौ को विशेष संरक्षण प्राप्त है।

Verse 72

परिधायोर्ध्ववालं तु पात्रमादाय मृन्मयम्‌ । चरेत्‌ सप्तगृहा न्नित्यं स्वकर्म परिकीर्तयन्‌,गोवध करनेवाला पापी उस गायकी एूँछको इस प्रकार धारण करे कि उसका बाल ऊपरकी ओर रहे। फिर मिट्टीका पात्र हाथमें लेकर प्रतिदिन सात घरोंमें भिक्षा माँगे और अपने पापकर्मकी बात कहकर लोगोंको सुनाता रहे। उन्हीं सात घरोंकी भिक्षामें जो अन्न मिल जाय, वही खाकर रहे। ऐसा करनेसे वह बारह दिनोंमें शुद्ध हो जाता है। यदि पाप अधिक हो तो एक वर्षतक उस व्रतका अनुष्ठान करे, जिससे वह अपने पापको नष्ट कर देता है

भीष्म ने कहा—जो पापी गौ का वध कर बैठा हो, वह गौ की पूँछ के बाल इस प्रकार धारण करे कि वे ऊपर की ओर रहें। फिर मिट्टी का पात्र हाथ में लेकर प्रतिदिन सात घरों में भिक्षा माँगे और अपने पापकर्म को स्पष्ट कहकर सुनाता रहे। उन्हीं सात घरों से जो अन्न मिले, उसी पर जीवन निर्वाह करे।

Verse 73

तत्रैव लब्धभोजी स्याद्‌ द्वादशाहात्स शुद्धयति । चरेत्‌ संवत्सरं चापि तद्‌ व्रतं येन कृन्तति,गोवध करनेवाला पापी उस गायकी एूँछको इस प्रकार धारण करे कि उसका बाल ऊपरकी ओर रहे। फिर मिट्टीका पात्र हाथमें लेकर प्रतिदिन सात घरोंमें भिक्षा माँगे और अपने पापकर्मकी बात कहकर लोगोंको सुनाता रहे। उन्हीं सात घरोंकी भिक्षामें जो अन्न मिल जाय, वही खाकर रहे। ऐसा करनेसे वह बारह दिनोंमें शुद्ध हो जाता है। यदि पाप अधिक हो तो एक वर्षतक उस व्रतका अनुष्ठान करे, जिससे वह अपने पापको नष्ट कर देता है

वहीं से प्राप्त अन्न पर ही वह जीवित रहे; बारह दिनों में वह शुद्ध हो जाता है। और यदि पाप अधिक भारी हो, तो वही व्रत पूरे एक वर्ष तक भी करे—जिससे वह अपने अपराध का कलंक काटकर नष्ट कर देता है।

Verse 74

भवेत्तु मानुषेष्वेवं प्रायश्ित्तमनुत्तमम्‌ । दानं वा दानशक्तिषु सर्वमेतत्‌ प्रकल्पयेत्‌,इस प्रकार मनुष्योंके लिये परम उत्तम प्रायश्चित्तका विधान है। उनमें जो दान करनेमें समर्थ हों, उनके लिये दानकी भी विधि है। यह सब प्रायश्चित्त विचारपूर्वक करना चाहिये

मनुष्यों के लिए इस प्रकार परम उत्तम प्रायश्चित्त का विधान है। और जो दान देने में समर्थ हों, उनके लिए दान का विधान भी है। यह सब प्रायश्चित्त विचारपूर्वक नियत करना चाहिए।

Verse 75

अनास्तिकेषु गोमात्र दानमेकं प्रचक्षते । श्ववराहमनुष्याणां कुक्कुटस्य खरस्य च

भीष्म बोले—नास्तिकों के लिए दान का केवल एक ही प्रकार उचित कहा गया है—गौमात्र (अत्यल्प, नाममात्र) दान; और यही विधान कुत्ते, वराह, नीचाचारी मनुष्य, मुर्गे तथा गधे के विषय में भी कहा गया है।

Verse 76

ब्राह्मणस्तु सुरापस्य गन्धमादाय सोमप:,सोमपान करनेवाला ब्राह्मण यदि किसी शराबीकी गन्ध भी सूँघ ले तो वह तीन दिनोंतक गरम जल पीकर रहे, फिर तीन दिन गरम दूध पीये। तीन दिन गरम दूध पीनेके बाद तीन दिनतक केवल वायु पीकर रहे। इससे वह शुद्ध हो जाता है

भीष्म बोले—सोमपान करने वाला ब्राह्मण यदि किसी सुरापी की गन्ध भी ग्रहण कर ले (सूँघ ले), तो वह शुद्धि के लिए प्रायश्चित्त करे: तीन दिन तक गरम जल पीकर रहे; फिर तीन दिन तक गरम दूध पीए; और उन तीन दिनों के बाद तीन दिन तक केवल वायु पर रहे (पूर्ण उपवास करे)। इस तप से वह शुद्ध हो जाता है।

Verse 77

अपसरभत्र्यहं पिबेदुष्णं ःयहमुष्णं पय: पिबेत्‌ । त्रयहमुष्णं पय: पीत्वा वायुभक्षो भवेत्‌ तयहम्‌,सोमपान करनेवाला ब्राह्मण यदि किसी शराबीकी गन्ध भी सूँघ ले तो वह तीन दिनोंतक गरम जल पीकर रहे, फिर तीन दिन गरम दूध पीये। तीन दिन गरम दूध पीनेके बाद तीन दिनतक केवल वायु पीकर रहे। इससे वह शुद्ध हो जाता है

तीन दिन तक गरम जल पीए; तीन दिन तक गरम दूध पीए; और तीन दिन गरम दूध पीकर फिर तीन दिन तक केवल वायु पर रहे। इस प्रायश्चित्त से वह शुद्ध हो जाता है।

Verse 78

एवमेतत्‌ समुद्दिष्टं प्रायश्षित्तं सनातनम्‌ । ब्राह्मणस्य विशेषण यदज्ञानेन सम्भवेत्‌,इस प्रकार यह सनातन प्रायश्रित्त सबके लिये बताया गया है। ब्राह्मणके लिये इसका विशेषरूपसे विधान है। अनजानमें जो पाप बन जाय, उसीके लिये प्रायश्चित्त है

भीष्म बोले—इस प्रकार यह सनातन प्रायश्चित्त बताया गया है। ब्राह्मण के लिए इसका विशेष रूप से विधान है; क्योंकि प्रायश्चित्त उसी पाप के लिए है जो अज्ञानवश, अनजाने में हो जाए।

Verse 164

इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें नशंयका वर्णनविषयक एक सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत आपद्धर्मपर्व में ‘नशंया’ के वर्णन-विषयक एक सौ चौंसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 165

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि प्रायद्षित्तीये पज्चषष्ट्यधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें पापोंके प्रायक्षेत्तकी विधिविषयक एक सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत आपद्धर्मपर्व में पापों के प्रायश्चित्त-विधान विषयक एक सौ पैंसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 203

धनैर्वेश्यश्व शूद्रश्न मन्त्रैहोमि श्व वै द्विज: । अत: उसके प्रति अमड्लसूचक बात न कहे। रूखे वचन न बोले। क्षत्रिय अपने बाहुबलसे, वैश्य और शूद्र धनके बलसे तथा ब्राह्मण मन्त्र एवं हवनकी शक्तिसे अपनी विपत्तिसे पार हो सकता है

भीष्म ने कहा—वैश्य और शूद्र धन के बल से, तथा द्विज (ब्राह्मण) मन्त्र और हवन के बल से विपत्ति को पार कर सकते हैं। इसलिए किसी के दोष बताने वाली बात न कहे और रूखे वचन न बोले। क्षत्रिय बाहुबल से, वैश्य-शूद्र धनबल से और ब्राह्मण मन्त्र-होम की शक्ति से—इनके द्वारा मनुष्य अपनी विपत्ति से पार हो सकता है।

Verse 216

परिवेष्टाग्निहोत्रस्य भवेन्नासंस्कृतस्तथा । न कन्या, न युवती, न मन्त्र न जाननेवाला, न मूर्ख और न संस्कारहीन पुरुष ही अग्निमें हवन करनेका अधिकारी है

भीष्म ने कहा—अग्निहोत्र और उससे सम्बद्ध कर्मों में असंस्कृत (दीक्षित-रहित) व्यक्ति का अधिकार नहीं है। न कन्या, न अविवाहिता युवती, न मन्त्र न जानने वाला, न मूर्ख और न संस्कारहीन पुरुष—अग्नि में हवन करने का अधिकारी है।

Verse 456

तावती: स समा राजन्‌ नरके प्रतिपद्यते । अतः न ब्राह्मणको गाली दे और न उसे कभी धरती पर गिरावे। राजन! ब्राह्मणके शरीरमें घाव हो जानेपर उससे निकला हुआ रक्त धूलके जितने कणोंको भिगोता है, उसे चोट पहुँचानेवाला मनुष्य उतने ही वर्षोतक नरकमें पड़ा रहता है

भीष्म ने कहा—राजन्! उतने ही वर्षों तक वह नरक में पड़ता है। इसलिए ब्राह्मण को कभी गाली न दे और न उसे धरती पर गिराए। राजन्! ब्राह्मण के शरीर में घाव होने पर उससे निकला रक्त धूल के जितने कणों को भिगोता है, उसे चोट पहुँचाने वाला मनुष्य उतने ही वर्षों तक नरक में पड़ा रहता है।

Verse 463

आत्मानं जुहुयादग्नौ समिद्धे तेन शुद्धयते । गर्भके बच्चेकी हत्या करनेवाला यदि युद्धमें शस्त्रोंके आधातसे मर जाय तो उसकी शुद्धि हो जाती है अथवा प्रज्वलित अग्निमें कूदकर अपने आपको होम दे तो वह शुद्ध हो जाता है

प्रज्वलित अग्नि में अपने आपको होम दे—उससे शुद्धि होती है। गर्भस्थ शिशु की हत्या करने वाला यदि युद्ध में शस्त्राघात से मर जाए, अथवा धधकती अग्नि में कूदकर अपने को होम कर दे, तो वह शुद्ध हो जाता है।

Verse 533

एवं वा तपसा युक्तो ब्रह्मृहा सवनी भवेत्‌ | ब्रह्महत्या करनेवाला मनुष्य उस मरे हुए ब्राह्मगकी खोपड़ी लेकर अपना पापकर्म लोगोंको सुनाता रहे और बारह वर्षोतक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए सबेरे, शाम तथा दोपहर तीनों समय स्नान करे। इस प्रकार वह तपस्यामें संलग्न रहे। इससे उसकी शुद्धि हो जाती है

भीष्म बोले— अथवा ब्राह्मण-वध करने वाला तपस्या के द्वारा शुद्ध हो सकता है। मरे हुए ब्राह्मण की खोपड़ी को अपने कर्म का चिह्न बनाकर वह लोगों के सामने अपने पाप का खुला स्वीकार करे, बारह वर्ष तक कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करे और प्रातः, मध्याह्न तथा सायंकाल—तीनों समय स्नान करे। इस प्रकार तप में स्थिर रहकर वह ब्रह्महत्या के महापाप से शुद्ध हो जाता है।

Verse 583

उक्त: पशुसमो दोषो राजन्‌ प्राणिनिपातनात्‌ । कुत्ते, सूअर और गदहोंकी हत्या करके मनुष्य शूद्रवध-सम्बधी व्रतका ही आचरण करे। राजन! बिल्ली, नीलकण्ठ, मेढक, कौआ, साँप और चूहा आदि प्राणियोंको मारनेसे भी उक्त पशुवधके ही समान पाप बताया गया है

भीष्म बोले— राजन्! प्राणियों का वध करने से जो दोष लगता है, वह पशुवध के समान बताया गया है। कुत्ते, सूअर और गदहे की हत्या करने पर मनुष्य को शूद्र-वध के लिए विहित प्रायश्चित्त-व्रत का ही आचरण करना चाहिए। राजन्! बिल्ली, नीलकण्ठ, मेढक, कौआ, साँप और चूहे आदि को मारने से भी वही पशुवध के समान पाप कहा गया है।

Verse 753

मांसं मूत्रं पुरीषं च प्राश्य संस्कारमर्हति । अनास्तिक पुरुषोंके लिये एक गोदानमात्र ही प्रायश्चित्त बतलाया गया है। कुत्ते, सूअर, मनुष्य, मुर्गे और गदहेके मांस और मल-मूत्र खा लेनेपर द्विजका पुनः संस्कार होना चाहिये

भीष्म बोले— मांस, मूत्र और पुरीष का सेवन कर लेने पर द्विज को पुनः संस्कार (शुद्धि-विधि) का अधिकारी माना गया है। नास्तिक पुरुष के लिए एक गोदान मात्र ही प्रायश्चित्त बताया गया है। कुत्ते, सूअर, मनुष्य, मुर्गे और गदहे के मांस तथा मल-मूत्र का भक्षण कर लेने पर द्विज का पुनः संस्कार होना चाहिए।

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns how governance should respond when a person betrays a benefactor and violates protection-based trust: whether such an offender can be reintegrated through expiation or must be sanctioned as a threat to social coherence.

Reciprocity and gratitude are treated as structural virtues sustaining society; betrayal of benefaction is framed as uniquely destructive because it discourages protection, alliance, and ethical obligation—thereby weakening dharma’s practical operation.

Yes. It asserts that while expiations are prescribed for several major transgressions, kṛtaghnatā is presented as lacking niṣkṛti, marking it as a boundary case where moral repair is depicted as unavailable due to the act’s trust-destroying nature.