Adhyāya 166: Kṛtaghna-doṣa (कृतघ्नदोषः) — the fault of ingratitude and the limits of expiation
चरेयु: सर्व एवैते वीरहा यद् व्रतं चरेत् । चान्द्रायणं चरेन्मासं कृच्छूं वा पापशुद्धये
इन सबको अपनी शुद्धि के लिए वही व्रत करना चाहिए जो ‘वीरहा’ (वीर-हन्ता) के लिए बताया गया है। अथवा पाप-शुद्धि के लिए एक मास तक चान्द्रायण या कृच्छ्र-व्रत का आचरण करे।
भीष्म उवाच