Adhyaya 138
Shanti ParvaAdhyaya 13825 Verses

Adhyaya 138

आपद्धर्मे राज्ञः नीतिः — Bharadvāja’s Counsel on Crisis-Statecraft (Śānti Parva 138)

Upa-parva: Rājadharmānuśāsana Parva (राजधर्मानुशासन पर्व) — Āpaddharma-oriented counsel within royal instruction

Yudhiṣṭhira opens by asking how a ruler should remain steady when the age declines, dharma is depleted, and society is harassed by predatory forces. Bhīṣma answers by promising instruction on policy in calamity (āpatsu nīti) and introduces a ‘purātana itihāsa’: Bharadvāja’s dialogue with King Śatruṃtapa of Sauvīra. The king asks a fourfold administrative problem: how to obtain what is not yet gained, how to increase what is gained, how to protect what is increased, and how to deploy what is protected. Bharadvāja’s response emphasizes daṇḍa as foundational to political order, recommending constant readiness, detection of vulnerabilities in rivals while concealing one’s own, and decisive action against the ‘root’ of hostile power structures. The chapter outlines calibrated tactics: strategic conciliation without naïve trust, temporary burden-bearing of adversaries until timing shifts, and the use of intelligence (cāra) and social monitoring across public spaces. It stresses situational timing (deśa-kāla), risk management, and avoiding procrastination, while also warning that these measures describe adversarial practice and should be understood as defensive prudence rather than indiscriminate conduct. The exemplum concludes with the king’s compliance and resultant prosperity, reinforcing the didactic aim: stable governance requires vigilance, proportional coercion, and context-sensitive judgment under crisis conditions.

Chapter Arc: आपद्धर्म के उपदेश-क्रम में कथावाचक ‘अनागत संकट’ को पहचानने की विद्या पर श्रोता का ध्यान खींचता है और तीन मत्स्यों का दृष्टान्त सुनाने का प्रस्ताव करता है—दूरदर्शी, प्रत्युत्पन्नमति और दीर्घसूत्री। → एक उथले-से जलाशय में बहुत-सी मछलियों के बीच ये तीन मित्र रहते हैं। मनुष्य-जगत की तरह यहाँ भी ‘काल’ चुपचाप पास आता है—जाल, मछुआरे, या जल का सूखना—और तीनों की प्रवृत्तियाँ अलग-अलग दिशा में खिंचती हैं: एक पहले ही संकेत पकड़ता है, दूसरा अवसर आते ही उपाय गढ़ता है, तीसरा टालता रहता है। → प्रत्युत्पन्नमति, दूरदर्शी से कहता है कि ‘समय आ जाने पर’ कोई भी युक्ति-न्याय से परे नहीं; पर दीर्घसूत्री ठीक उसी क्षण ‘प्राप्त काल’ को न समझ पाने के मोह में फँसकर विनाश की ओर बढ़ता है—जैसे श्लोक कहता है, दीर्घसूत्री झष (मछली) शीघ्र नष्ट होता है। → दृष्टान्त का निष्कर्ष स्पष्ट किया जाता है: जो पुरुष देश-काल का परीक्षण करके, कार्य-अकार्य का निर्णय कर, सावधानी और युक्ति से चलता है वही फल पाता है; जो काल को अदृश्य मानकर टालता है, वह आपत्ति में टूट जाता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपनआ प्रात बछ। अर: सप्तत्रिशर्दाधिकशततमोब< ध्याय: आनेवाले संकटसे सावधान रहनेके लिये दूरदर्शी

भीष्मजी बोले—युधिष्ठिर! जो आनेवाले संकट से पहले ही बचाव का उपाय कर लेता है, वह ‘अनागतविधाता’ कहलाता है; और जिसकी बुद्धि तत्काल उपस्थित संकट में तुरंत उपाय सूझा देती है, वह ‘प्रत्युत्पन्नमति’ है। ये दोनों ही सुखपूर्वक उन्नति करते हैं; पर जो अनावश्यक विलम्ब करनेवाला दीर्घसूत्री है, वह नष्ट हो जाता है।

Verse 2

अन्रैव चेदमव्यग्र॑ शृणुष्वाख्यानमुत्तमम्‌ । दीर्घसूत्रमुपाश्रित्य कार्याकार्यविनिश्चये

यदि तुम सचमुच सावधान और अव्यग्र हो, तो यह उत्तम आख्यान सुनो। कर्तव्य और अकर्तव्य के निर्णय में जो दीर्घसूत्री होकर विलम्ब करता है, उसी के प्रसंग से मैं यह सुन्दर दृष्टान्त सुनाता हूँ; तुम स्थिरचित्त होकर सुनो।

Verse 3

नातिगाधे जलाधारे सुहृदः कुशलास्त्रय: । प्रभूतमत्स्ये कौन्तेय बभूवु: सहचारिण:

कुन्तीनन्दन! कहते हैं—एक जलाशय था जो बहुत गहरा नहीं था, पर उसमें मछलियाँ बहुत थीं। उसी में तीन कार्यकुशल मत्स्य रहते थे, जो सदा साथ-साथ विचरते और परस्पर सुहृद् थे।

Verse 4

तत्रैको दीर्घकालज्ञ उत्पन्नप्रतिभो5पर: । दीर्घसूत्रश्न तत्रैकस्त्रयाणां सहचारिणाम्‌

उन तीन सहचारियों में एक दीर्घकालज्ञ था—जो दूरगामी परिणामों को पहले ही सोच लेता था। दूसरा प्रत्युत्पन्नमति था, जिसकी प्रतिभा ठीक समय पर काम आती थी। तीसरा दीर्घसूत्री था, जो हर काम में अनावश्यक विलम्ब करता था।

Verse 5

कदाचित्‌ तं जलस्थायं मत्स्यबन्धा: समन्ततः । निस्रावयामासुरथो निम्नेषु विविधैर्मुखै:

एक दिन मछुआरों ने उस जलाशय को चारों ओर से घेरकर नालियाँ काटीं और अनेक द्वारों से उसका पानी पास की नीची भूमि की ओर निकालना आरम्भ कर दिया।

Verse 6

प्रक्षीयमाण तं दृष्टवा जलस्थायं भयागमे । अब्रवीद्‌ दीर्घदर्शी तु तावुभौ सुहदौ तदा,जलाशयका पानी घटता देख भय आनेकी सम्भावना समझकर दूरतककी बातें सोचनेवाले उस मत्स्यने अपने उन दोनों सुहृदोंसे कहा--

जलाशय का पानी घटता देख और संकट के आने की सम्भावना समझकर, दूरदर्शी मत्स्य ने तब वहाँ रहने वाले अपने उन दोनों सुहृदों से कहा।

Verse 7

इयमापत्‌ समुत्पन्ना सर्वेषां सलिलौकसाम्‌ । शीघ्रमन्यत्र गच्छाम: पन्था यावन्न दुष्यति

“बंधुओ! प्रतीत होता है कि इस जलाशय में रहने वाले समस्त जलचरों पर संकट आ पड़ा है। इसलिए, जब तक हमारे निकलने का मार्ग दूषित न हो जाए, तब तक शीघ्र ही हमें यहाँ से अन्यत्र चले जाना चाहिए।”

Verse 8

अनागतमनर्थ हि सुनयैर्य: प्रबाधयेत्‌ । स न संशयमाप्रोति रोचतां भो व्रजामहे

“जो आने वाले अनर्थ को उसके आने से पहले ही सुनीति द्वारा दूर कर देता है, वह प्राणहानि के संशय में नहीं पड़ता। यदि आप लोगों को मेरी बात रुचिकर लगे, तो चलिए—किसी दूसरे जलाशय की ओर चलें।”

Verse 9

दीर्घसूत्रस्तु यस्तत्र सो5ब्रवीत्‌ सम्यगुच्यते । न तु कार्या त्वरा तावदिति मे निश्चिता मति:

वहाँ जो दीर्घसूत्री था, उसने कहा—“मित्र! तुम ठीक कहते हो; पर मेरा दृढ़ निश्चय है कि अभी हमें उतावली नहीं करनी चाहिए।”

Verse 10

अथ सम्प्रतिपत्तिज्ञ: प्राब्रवीद्‌ दीर्घदर्शिनम्‌ । प्राप्ते काले न मे किंचिन्न्यायत: परिहास्यते

तब प्रत्युत्पन्नमति ने दूरदर्शी से कहा—“मित्र! जब उचित समय आ जाता है, तब मेरी बुद्धि न्याय के अनुसार कोई भी उपाय खोजने में नहीं चूकती; जो धर्मसम्मत है, वह मुझसे छूटता नहीं।”

Verse 11

एवं श्र॒ुत्वा निराक्रम्य दीर्घदर्शी महामति: । जगाम स्रोतसा तेन गम्भीर॑ं सलिलाशयम्‌,यह सुनकर परम बुद्धिमान दीर्घदर्शी (अनागत-विधाता) वहाँसे निकलकर एक नालीके रास्तेसे दूसरे गहरे जलाशयमें चला गया

यह सुनकर परम बुद्धिमान दूरदर्शी वहाँ से हट गया और उसी जलधारा के मार्ग से दूसरे गहरे जलाशय में चला गया।

Verse 12

ततः प्रसृततोयं त॑ प्रसमीक्ष्य जलाशयम्‌ । बबन्धुर्विविधैयोगैर्मत्स्यान्‌ मत्स्योपजीविन:

तदनंतर मछुआरों ने जब देखा कि उस जलाशय का जल बहुत निकल चुका है, तब उन्होंने अनेक उपायों से वहाँ की मछलियों को बाँधकर फँसा लिया।

Verse 13

विलोड्यमाने तस्मिंस्तु खुततोये जलाशये । अगच्छद्‌ बन्धन तत्र दीर्घसूत्र: सहापरैः,जिसका पानी बाहर निकल चुका था, वह जलाशय जब मथा जाने लगा, तब दीर्घ॑सूत्री भी दूसरे मत्स्योंके साथ जालमें फँस गया

जिस जलाशय का पानी निकल चुका था, जब उसे मथा-झकझोरा जाने लगा, तब दीर्घसूत्री भी अन्य मछलियों के साथ वहीं जाल में फँसकर बंधन में पड़ गया।

Verse 14

उद्याने क्रियमाणे तु मत्स्यानां तत्र रज्जुभि: | प्रविश्यान्तरमेतेषां स्थित: सम्प्रतिपत्तिमान्‌

तालाब में जब मछुआरे रस्सियाँ खींचकर मछलियों से भरे जाल को ऊपर उठाने लगे, तब प्रत्युत्पन्नमति मत्स्य उन्हीं मछलियों के बीच घुस गया और जाल में बँधा हुआ-सा स्थिर हो गया।

Verse 15

गृह्मेव तदुद्यानं गृहीत्वा तं तथैव सः । सवनिव च तांस्तत्र ते विदुर्गथितानिति

वह उपाय जाल को मुख से पकड़ने योग्य था; इसलिए उसने जाल की ताँत को मुँह में दबा लिया और वह भी अन्य मछलियों की भाँति बँधा हुआ-सा प्रतीत होने लगा। अतः वहाँ मछुआरों ने उन सबको बँधा हुआ ही समझा।

Verse 16

ततः प्रक्षाल्यमानेषु मत्स्येषु विपुले जले । मुक्त्वा रज्जुं प्रमुक्तोडसौ शीघ्र सम्प्रतिपत्तिमान्‌

तदनन्तर जब वे मछुआरे जाल लेकर अगाध जल वाले दूसरे जलाशय के पास गए और मछलियों को धोने लगे, तभी वह प्रत्युत्पन्नमति मुख में पकड़ी रस्सी छोड़कर बन्धन से मुक्त हो गया और शीघ्र ही जल में समा गया।

Verse 17

दीर्घसूत्रस्तु मन्दात्मा हीनबुद्धिरचेतन: । मरणं प्राप्तवान्‌ मूढो यथैवोपहतेन्द्रियः

परंतु जो दीर्घसूत्री, मन्दबुद्धि और अचेत मूर्ख है, वह मृत्यु को प्राप्त होता है—जैसे इन्द्रियाँ नष्ट हो जाने पर प्राणी नष्ट हो जाता है।

Verse 18

एवं प्राप्ततमं काल॑ यो मोहान्नावबुद्धयते । स विनश्यति वै क्षिप्र॑ दीर्घसूत्रो यथा झष:

इसी प्रकार जो पुरुष मोहवश अपने सिर पर आ पहुँचे काल को नहीं समझ पाता, वह दीर्घसूत्री मत्स्य के समान शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।

Verse 19

आदी न कुरुते श्रेय: कुशलो<स्मीति यः पुमान्‌ | स संशयमवाप्रोति यथा सम्प्रतिपत्तिमान्‌

भीष्म ने कहा—जो पुरुष यह सोचकर कि “मैं बड़ा कार्यकुशल हूँ”, आरम्भ में ही अपने कल्याण का उपाय नहीं करता, वह प्रत्युत्पन्नमति मत्स्य के समान प्राण-संशय और संकट में पड़ जाता है। इसलिए केवल आत्मविश्वास या अंतिम क्षण की चतुराई पर न टिककर, अपना हित पहले ही सुरक्षित करना चाहिए।

Verse 20

अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिश्न यः । द्वावेव सुखमेधेते दीर्घसूत्रो विनश्यति

भीष्म ने कहा—जो संकट आने से पहले ही बचाव का उपाय कर लेता है, वह ‘अनागतविधाता’ है; और जिसे संकट के क्षण में ही आत्मरक्षा का उपाय सूझ जाता है, वह ‘प्रत्युत्पन्नमति’ है—ये दोनों सुखपूर्वक उन्नति करते हैं। पर जो अनावश्यक विलम्ब करता रहता है, वह ‘दीर्घसूत्री’ नष्ट हो जाता है।

Verse 21

काष्ठा: कला मुहूर्ताश्न दिवा रात्रिस्तथा लवा: । मासा: पक्षा: षड़ ऋतव: कल्प: संवत्सरास्तथा

भीष्म ने कहा—काष्ठा, कला, मुहूर्त, दिन-रात और लव; मास, पक्ष, छः ऋतु, संवत्सर तथा कल्प—इन सबको ‘काल’ कहते हैं और पृथ्वी को ‘देश’ कहा जाता है। देश तो प्रत्यक्ष दिखता है, पर काल दिखाई नहीं देता। इसलिए अभीष्ट उद्देश्य की सिद्धि के लिए जिस देश और काल को उपयोगी समझकर विचार किया जाए, उसे ठीक-ठीक पहचानकर ग्रहण करना चाहिए।

Verse 22

पृथिवी देश इत्युक्त: काल: स च न दृश्यते । अभिप्रेतार्थसिद्धयर्थ ध्यायते यच्च तत्तथा

भीष्म ने कहा—पृथ्वी को ‘देश’ कहा गया है और ‘काल’ ऐसा नाम है, पर वह दिखाई नहीं देता। काष्ठा, कला, मुहूर्त, दिन-रात, लव, मास, पक्ष, छः ऋतु, संवत्सर और कल्प—ये सब ‘काल’ कहलाते हैं। देश प्रत्यक्ष है, काल अप्रत्यक्ष। इसलिए अभीष्ट कार्य की सिद्धि के लिए जो देश और काल विचार करने पर उपयुक्त ठहरें, उन्हें यथार्थ रूप से ग्रहण करना चाहिए।

Verse 23

एतौ धर्मार्थशास्त्रेषु मोक्षशास्त्रेषु चर्षिभि: । प्रधानाविति निर्दिष्टी कामे चाभिमतौ नृणाम्‌

भीष्म ने कहा—धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा मोक्षशास्त्र में ऋषियों ने इन दोनों—देश और काल—को प्रधान बताया है। मनुष्यों की कामना-सिद्धि में भी यही दोनों मुख्य साधन माने गए हैं।

Verse 24

परीक्ष्यकारी युक्तश्न स सम्यगुपपादयेत्‌ । देशकालावभिप्रेतो ताभ्यां फलमवाप्नुयात्‌

जो पुरुष सोच-समझकर, संयमित आचरण के साथ और निरन्तर सावधान रहकर कार्य करता है, वह अभीष्ट देश और काल का ठीक-ठीक उपयोग करता है और उनके सहारे इच्छित फल प्राप्त कर लेता है।

Verse 137

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि शाकुलोपाख्याने सप्तत्रिंशदधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें शाकुलोपाख्यानविषयक एक सौ सैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत आपद्धर्मपर्व में शाकुलोपाख्यान-विषयक एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

The dilemma is how a ruler can preserve public order when normal dharmic conditions are degraded—balancing compassion and restraint against the need for deterrence, surveillance, and decisive coercive measures in emergencies.

Dharma in governance is operational and contextual: stability depends on disciplined vigilance, proportional daṇḍa, and deśa-kāla judgment, with trust treated as conditional and repeatedly tested rather than presumed.

A functional meta-commentary appears in the closing outcome statement: the king follows the counsel and attains prosperity with his kin, presenting pragmatic ‘result-validation’ of the teaching rather than a ritualized phalaśruti formula.