
Abhimanyunidhana-prakāśaḥ — Vasudeva–Kṛṣṇa–Subhadrā–Kuntī śoka-saṃvāda (Disclosure and Consolation)
Upa-parva: Āśvamedhika-parva — Abhimanyu-nidhana-smṛti (Vasudeva–Subhadrā śoka-saṃvāda episode)
Vaiśaṃpāyana reports that Kṛṣṇa, while narrating the war before his father Vasudeva, deliberately passes over Abhimanyu’s death to prevent acute distress (1–3). Subhadrā, learning of her son’s fall in battle, collapses and urges Kṛṣṇa to state the truth; Vasudeva, seeing her, also faints from grief (4–6). Reviving, Vasudeva questions Kṛṣṇa: why the death was concealed, how Abhimanyu was killed, whether he was struck from behind, whether his face was disfigured, and what he said regarding Subhadrā and Vasudeva—framing Abhimanyu as spirited and proud in youthful valor (7–14). Kṛṣṇa replies with a corrective account: Abhimanyu did not retreat or act dishonorably; he fought intensely, slew large numbers, and was exhausted by major adversaries before falling into Duryodhana’s side’s control; he is portrayed as difficult to defeat in single combat and as attaining a heroic destination (16–23). The narrative then shifts to the women’s mourning: Subhadrā’s sister approaches Pṛthā (Kuntī) and Draupadī seeking the children; Kuntī consoles Subhadrā by invoking mortality, kṣatriya lineage, and the assurance of Uttarā’s pregnancy, and she arranges śrāddha-associated giving and donations (24–40). The chapter closes with renewed counsel to abandon consuming grief, framing Abhimanyu’s end as a time-governed event and his posthumous state as honorable (41).
Chapter Arc: वसुदेव कृष्ण से पूछते हैं कि जिसे लोग ‘अद्भुत’ कहते हैं, वह महाभारत-युद्ध वास्तव में कैसा था—और प्रत्यक्षदर्शी से यथातथ्य सुनाने का आग्रह करते हैं। → कृष्ण के सामने युद्ध का विराट विस्तार खुलता है: पाण्डवों का भीष्म, द्रोण, कर्ण, कृप और शल्य जैसे महारथियों से सामना; दिनों-दिन बढ़ती क्षति; धृष्टद्युम्न का सेनानायकत्व और भीम का रक्षक-रूप; फिर भी थकान, निरुत्साह और टूटते रथ-वाहन। → रात में शिबिर में निश्चिन्त सोई पाण्डव-सेना पर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा का धावा—पिता-वध का प्रतिशोध बनकर वह सोते हुए सैनिकों का संहार करता है। → कृष्ण युद्ध का समापन-चित्र देते हैं: अठारह दिनों तक चला लोमहर्षक संग्राम, जिसमें असंख्य पृथिवीपाल मारे गए और स्वर्गगामी हुए; कथा सुनते-सुनते वृष्णियों पर भी दुःख-शोक का भार उतर आता है। → युद्ध-वर्णन के बाद शोक की छाया बनी रहती है—आगे यह पीड़ा वृष्णि-समाज और उत्तरकथा में किस रूप में फूटेगी, इसका संकेत देकर अध्याय विराम लेता है।
Verse 1
वसुदेवजीने पूछा--वृष्णिनन्दन! मैं प्रतिदिन बातचीतके प्रसंगमें लोगोंके मुँहसे सुनता आ रहा हूँ कि महाभारत-युद्ध बड़ा अद्भुत हुआ था। इसलिये पूछता हूँ कि कौरवों और पाण्डवोंमें किस तरह युद्ध हुआ?
वसुदेव बोले— “वृष्णिनन्दन! मैं प्रतिदिन बातचीत के प्रसंग में लोगों के मुख से सुनता आया हूँ कि महाभारत का युद्ध बड़ा अद्भुत हुआ था। इसलिए मैं पूछता हूँ—कौरवों और पाण्डवों के बीच युद्ध किस प्रकार हुआ?”
Verse 2
त्वंतु प्रत्यक्षदर्शी च रूपज्ञश्न महाभुज । तस्मात् प्रब्रृहि संग्रामं याथातथ्येन मेडनघ,महाबाहो! तुम तो उस युद्धके प्रत्यक्षदर्शी हो और उसके स्वरूपको भी भलीभाँति जानते हो: अत: अनघ! मुझसे उस युद्धका यथार्थ वर्णन करो
वासुदेव ने कहा—महाबाहो! तुम उस युद्ध के प्रत्यक्षदर्शी हो और उसके स्वरूप को भी भली-भाँति जानते हो। अतः अनघ! मुझसे उस युद्ध का यथार्थ वर्णन करो—जैसा वह घटित हुआ।
Verse 3
यथा तदभवद् युद्ध॑ पाण्डवानां महात्मनाम् । भीष्मकर्णकृपद्रोणशल्यादिभिरनुत्तमम्,महात्मा पाण्डवोंका भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य और शल्य आदिके साथ जो परम उत्तम युद्ध हुआ था, वह किस तरह हुआ?
वासुदेव ने कहा—महात्मा पाण्डवों का भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, शल्य आदि श्रेष्ठ वीरों के साथ जो परम उत्तम युद्ध हुआ था, वह किस प्रकार हुआ? वह किस रीति से घटित हुआ, मुझे बताओ।
Verse 4
अन््येषां क्षत्रियाणां च कृतास्त्राणामनेकश: । नानावेषाकृतिमतां नानादेशनिवासिनाम्,दूसरे-दूसरे देशोंमें निवास करनेवाले, भाँति-भाँतिकी वेशभूषा और आकृतिवाले जो अस्त्र-विद्यामें निपुण बहुसंख्यक क्षत्रिय वीर थे, उन्होंने भी किस प्रकार युद्ध किया था?
वासुदेव ने कहा—और वे अन्य असंख्य क्षत्रिय, जो अस्त्र-विद्या में निपुण थे, जो नाना देशों में रहते थे और जिनकी वेशभूषा तथा आकृतियाँ भिन्न-भिन्न थीं—उन्होंने भी किस प्रकार युद्ध किया?
Verse 5
वैशम्पायन उवाच इत्युक्त: पुण्डरीकाक्ष: पित्रा मातुस्तदन्तिके । शशंस कुरुवीराणां संग्रामे निधनं यथा,वैशम्पायनजी कहते हैं--माताके निकट पिताके इस प्रकार पूछनेपर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण कौरव वीरोंके संग्राममें मारे जानेका वह प्रसंग यथावत् रूपसे सुनाने लगे
वैशम्पायनजी कहते हैं—माता के निकट पिता ने इस प्रकार पूछने पर कमलनयन श्रीकृष्ण ने कौरव वीरों के संग्राम में मारे जाने का प्रसंग यथावत् रूप से सुनाना आरम्भ किया।
Verse 6
वासुदेव उवाच अत्यद्भुतानि कर्माणि क्षत्रियाणां महात्मनाम् | बहुलत्वान्न संख्यातुं शक््यान्यब्दशतैरपि,श्रीकृष्णने कहा--पिताजी! महाभारत-युद्धमें काममें आनेवाले मनस्वी क्षत्रिय वीरोंके कर्म बड़े अदभुत हैं। वे इतने अधिक हैं कि यदि विस्तारके साथ उनका वर्णन किया जाय तो सौ वर्षोमें भी उनकी समाप्ति नहीं हो सकती
श्रीकृष्ण ने कहा—पिताजी! महाभारत-युद्ध में प्रकट हुए महात्मा क्षत्रिय वीरों के कर्म अत्यन्त अद्भुत हैं। वे इतने अधिक हैं कि यदि विस्तार से उनका वर्णन किया जाए, तो सौ वर्षों में भी उनकी गणना पूरी नहीं हो सकती।
Verse 7
प्राधान्यतस्तु गदत: समासेनैव मे शृणु । कर्माणि पृथिवीशानां यथावदमरथद्ुते,अतः देवताओंके समान तेजस्वी तात! मैं मुख्य-मुख्य घटनाओंको ही संक्षेपसे सुना रहा हूँ, आप उन भूपतियोंके कर्म यथावत् रूपसे सुनिये
हे अमरदूत! अब तुम मुझसे संक्षेप में, पर मुख्य बातों को चुनकर, सुनो। हे तात, देवताओं के समान तेजस्वी! मैं प्रधान-प्रधान घटनाएँ ही कह रहा हूँ; तुम उन पृथ्वीपतियों के कर्मों को यथाक्रम और यथारूप सुनो।
Verse 8
भीष्म: सेनापतिरभूदेकादशचमूपति: । कौरव्य: कौरवेन्द्राणां देवानामिव वासव:,जैसे इन्द्र देवताओंकी सेनाके स्वामी हैं, उसी प्रकार कुरुकुलतिलक भीष्म भी श्रेष्ठ कौरववीरोंके सेनापति बनाये गये थे। वे ग्यारह अक्षौहिणी सेनाके संरक्षक थे
भीष्म सेनापति बने—ग्यारह अक्षौहिणी सेनाओं के अधिपति। कौरव-नरेशों में वे ऐसे थे जैसे देवताओं में वासव (इन्द्र)—कौरव-सेना के अग्रणी रक्षक और नेता।
Verse 9
शिखण्डी पाण्डुपुत्राणां नेता सप्तचमूपति: । बभूव रक्षितो धीमान् श्रीमता सव्यसाचिना,पाण्डवोंके सेनानायक शिखण्डी थे, जो सात अक्षौहिणी सेनाओंका संचालन करते थे। बुद्धिमान शिखण्डी श्रीमान् सव्यसाची अर्जुनके द्वारा सुरक्षित थे
पाण्डुपुत्रों के सेनानायक शिखण्डी बने—सात अक्षौहिणी सेनाओं के अधिपति। वह बुद्धिमान वीर श्रीमान् सव्यसाची अर्जुन द्वारा सुरक्षित रखे गए।
Verse 10
तेषां तदभवद् युद्ध दशाहानि महात्मनाम् | कुरूणां पाण्डवानां च सुमहल्लोमहर्षणम्,उन महामनस्वी कौरवों और पाण्डवोंमें दस दिनोंतक महान् रोमांचकारी युद्ध हुआ
उन महात्मा कौरवों और पाण्डवों के बीच दस दिनों तक वह युद्ध हुआ—अत्यन्त विशाल, रोमांचकारी और भयावह।
Verse 11
ततः शिखण्डी गाड़ेयं युध्यमानं महाहवे । जघान बहुभिर्बाणै: सह गाण्डीवधन्चना,फिर दसवें दिन शिखण्डीने महासमरमें जूझते हुए गंगानन्दन भीष्मको गाण्डीवधारी अर्जुनकी सहायतासे बहुसंख्यक बाणोंद्वारा बहुत घायल कर दिया
तब शिखण्डी ने उस महासमर में युद्ध करते हुए गाङ्गेय भीष्म को—गाण्डीवधारी अर्जुन के साथ—अनेक बाणों से विद्ध कर दिया।
Verse 12
अकरोत् स ततः काल॑ शरतल्पगतो मुनि: । अयनं दक्षिण हित्वा सम्प्राप्ते चोत्तरायणे,तत्पश्चात् भीष्मजी बाणशय्यापर पड़ गये। जबतक दक्षिणायन रहा है, वे मुनिव्रतका पालन करते हुए शरशय्यापर सोते रहे हैं। दक्षिणायन समाप्त होकर उत्तरायणके आनेपर ही उन्होंने मृत्यु स्वीकार की है
वासुदेव बोले—तब शरशय्या पर पड़े उस मुनि ने अपने प्राणत्याग का समय स्वयं निश्चित किया। सूर्य के दक्षिणायन रहते हुए उन्होंने देह नहीं छोड़ा; जब वह काल बीत गया और उत्तरायण आया, तभी उन्होंने मृत्यु स्वीकार की—व्रत-निष्ठा और काल पर संयम का परिचय देते हुए।
Verse 13
ततः सेनापतिरभूद् द्रोणो<स्त्रविदुषां वर: । प्रवीर: कौरवेन्द्रस्य काव्यो दैत्यपतेरिव,तदनन्तर अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आचार्य द्रोण कौरवपक्षके सेनापति बनाये गये। वे कौरवराजकी सेनाके प्रमुख वीर थे, मानो दैत्यराज बलिकी सेनाके प्रधान संरक्षक शुक्राचार्य हों
तदनंतर अस्त्रविद्या में श्रेष्ठ द्रोणाचार्य सेनापति बने। वे कौरव-राज के प्रधान वीर थे, जैसे दैत्यराज के लिए काव्य (शुक्राचार्य) अग्रणी रक्षक-आचार्य हों।
Verse 14
अक्षौहिणीभ्रि: शिष्टाभिननवभिरद्द्धिजसत्तम: । संवृत: समरश्लाघी गुप्त: कृपवृषादिभि:,उस समय मरनेसे बची हुई नौ अक्षौहिणी सेना उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़ी थी। वे स्वयं तो युद्धका हौसला रखते ही थे, कृपाचार्य और कर्ण भी सदा उनकी रक्षा करते रहते थे
उस समय शेष बची हुई नौ अक्षौहिणी सेनाएँ उसे चारों ओर से घेरे खड़ी थीं। वह स्वयं युद्ध में गर्व रखने वाला था, और कृपाचार्य तथा वृष (कर्ण) आदि निरंतर उसकी रक्षा करते थे।
Verse 15
धृष्टय्युम्नस्त्वभून्नेता पाण्डवानां महास्त्रवित् । गुप्तो भीमेन मेधावी मित्रेण वरुणो यथा,इधर महान् अस्त्रवेत्ता धृष्टद्युम्न पाण्डवसेनाके अधिनायक हुए। जैसे मित्र वरुणकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार भीमसेन मेधावी धृष्टद्युम्नकी रक्षा करने लगे
पाण्डवों के सेनानायक महास्त्रवेत्ता धृष्टद्युम्न बने। जैसे मित्र वरुण की रक्षा करते हैं, वैसे ही मेधावी धृष्टद्युम्न की रक्षा भीमसेन करने लगे।
Verse 16
स च सेनापरिवृतो द्रोणप्रेप्सुर्महामना: । पितुर्निकारान् संस्मृत्य रणे कर्माकरोन्महत्,पाण्डवसेनासे घिरे हुए महामनस्वी वीर धृष्टद्युम्नने द्रोणके द्वारा अपने पिताके अपमानका स्मरण करके उन्हें मार डालनेके लिये युद्धमें बड़ा भारी पराक्रम दिखाया
अपनी सेना से घिरे महामनस्वी धृष्टद्युम्न द्रोण तक पहुँचने को उद्यत थे। पिता के अपमान का स्मरण करके उन्होंने रण में महान् पराक्रमपूर्ण कर्म किया।
Verse 17
तस्मिंस्ते पृथिवीपाला द्रोणपार्षतसंगरे । नानादिगागता वीरा: प्रायशो निधनं गता:,धृष्टद्युम्न और द्रोणके उस भीषण संग्राममें नाना दिशाओंसे आये हुए भूपाल अधिक संख्यामें मारे गये
उस द्रोण और पार्षतपुत्र धृष्टद्युम्न के भीषण संग्राम में नाना दिशाओं से आए हुए अनेक वीर भूपाल प्रायः बड़ी संख्या में मारे गए।
Verse 18
दिनानि पज्च तद् युद्धमभूत् परमदारुणम् | ततो द्रोण: परिश्रान्तो धृष्टद्युम्नवशं गत:,उन दोनोंका वह परम दारुण युद्ध पाँच दिनोंतक चलता रहा। अन्तमें द्रोणाचार्य बहुत थक गये और धृष्टद्युम्नके वशमें पड़कर मारे गये
उन दोनों का वह परम दारुण युद्ध पाँच दिनों तक चलता रहा। फिर द्रोणाचार्य अत्यन्त परिश्रान्त होकर धृष्टद्युम्न के वश में आ गए और मारे गए।
Verse 19
ततः सेनापतिरभूत् कर्णो दौर्योधने बले । अक्षौहिणीभ्रि: शिष्टाभिवृत: पञचभिराहवे,तत्पश्चात् दुर्योधनकी सेनामें कर्णको सेनापति बनाया गया, जो मरनेसे बची हुए पाँच अक्षौहिणी सेनाओंसे घिरकर युद्धके मैदानमें खड़ा था
तत्पश्चात् दुर्योधन की सेना में कर्ण को सेनापति बनाया गया। वह युद्धभूमि में शेष बची पाँच अक्षौहिणी सेनाओं से घिरा हुआ खड़ा था।
Verse 20
तिस्रस्तु पाण्डुपुत्राणां चम्वो बीभत्सुपालिता: । हतप्रवीरभूयिष्ठा बभूवु: समवस्थिता:,उस समय पाण्डवोंके पास तीन अक्षौहिणी सेनाएँ शेष थीं, जिनकी रक्षा अर्जुन कर रहे थे। उनमें बहुत-से प्रमुख वीर मारे गये थे; फिर भी वे युद्धके लिये डटी हुई थीं
उस समय पाण्डुपुत्रों के पास तीन अक्षौहिणी सेनाएँ शेष थीं, जिनकी रक्षा बीभत्सु अर्जुन कर रहे थे। उनमें बहुत-से प्रमुख वीर मारे जा चुके थे, फिर भी वे युद्ध के लिए सुसज्जित होकर डटी हुई थीं।
Verse 21
ततः पार्थ समासाद्य पतड़ इव पावकम् | पजञ्चत्वमगमत् सौतिर्द्धितीयेडहनि दारुण:,कर्ण दो दिनतक युद्ध करता रहा। वह बड़े क्रूर स्वभावका था। जैसे पतंग जलती आगमें कूदकर जल मरता है, उसी प्रकार वह दूसरे दिनके युद्धमें अर्जुनसे भिड़कर मारा गया
तत्पश्चात्, हे पार्थ! क्रूर स्वभाव वाला सूतपुत्र कर्ण तुमसे भिड़ा और दूसरे दिन ही पतंग की भाँति ज्वलित अग्नि में कूदकर नष्ट होने जैसा, युद्ध में मारा गया।
Verse 22
हते कर्णे तु कौरव्या निरुत्साहा हतौजस: । अक्षौहिणीभिस्तिसूभिमरद्रेशं पर्यवारयन्,कर्णके मारे जानेपर कौरव हतोत्साह होकर अपनी शक्ति खो बैठे और मद्रराज शल्यको सेनापति बनाकर उन्हें तीन अक्षौहिणी सेनाओंसे सुरक्षित रखकर उन्होंने युद्ध आरम्भ किया
कर्ण के मारे जाने पर कौरवों का उत्साह टूट गया और उनका बल क्षीण हो गया। तब मद्रराज शल्य को सेनापति बनाकर, तीन अक्षौहिणी सेनाओं से उसे चारों ओर सुरक्षित रखकर, उन्होंने फिर से युद्ध आरम्भ किया।
Verse 23
हतवाहनभूयिष्ठा: पाण्डवा5पि युधिष्ठटिरम् । अक्षौहिण्या निरुत्साहा: शिष्टया पर्यवारयन्,पाण्डवोंके भी बहुत-से वाहन नष्ट हो गये थे। उनमें भी अब युद्धविषयक उत्साह नहीं रह गया था तो भी वे शेष बची हुई एक अक्षौहिणी सेनासे घिरे हुए युधिष्ठिरको आगे करके शल्यका सामना करनेके लिये बढ़े
पाण्डवों के भी बहुत-से वाहन नष्ट हो चुके थे। युद्ध का उत्साह उनमें भी शिथिल पड़ गया था; फिर भी शेष बची हुई एक अक्षौहिणी सेना से घिरे हुए युधिष्ठिर को आगे रखकर वे शल्य का सामना करने के लिए बढ़े।
Verse 24
अवधीन्मद्रराजानं कुरुराजो युधिष्ठिर: । तस्मिंस्तदार्धदिवसे कृत्वा कर्म सुदुष्करम्,कुरुराज युधिष्ठिरने अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करके दोपहर होते-होते मद्रराज शल्यको मार गिराया
कुरुराज युधिष्ठिर ने अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करके दोपहर होते-होते मद्रराज शल्य को मार गिराया।
Verse 25
हते शल्ये तु शकुनिं सहदेवो महामना: । आहर्तारें कलेस्तस्य जघानामितविक्रम:,शल्यके मारे जानेपर अमित पराक्रमी महामना सहदेवने कलहकी नींव डालनेवाले शकुनिको मार दिया
शल्य के मारे जाने पर अमित पराक्रमी महामना सहदेव ने कलह की नींव डालने वाले शकुनि को मार डाला।
Verse 26
निहते शकुनौ राजा धार॑राष्ट्र: सुदुर्मना: । अपाक्रामद् गदापाणिहत भूयिष्ठसैनिक:,शकुनिकी मृत्यु हो जानेपर राजा दुर्योधनके मनमें बड़ा दुःख हुआ। उसके बहुत-से सैनिक युद्धमें मार डाले गये थे। इसलिये वह अकेला ही हाथमें गदा लेकर रणभूमिसे भाग निकला
शकुनि की मृत्यु हो जाने पर राजा धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन के मन में बड़ा दुःख हुआ। उसके बहुत-से सैनिक मारे जा चुके थे; इसलिए वह हाथ में गदा लेकर अकेला ही रणभूमि से हट गया।
Verse 27
तमन्वधावत् संक्रुद्धो भीमसेन: प्रतापवान् । हदे द्वैपायने चापि सलिलस्थं ददर्श तम्,इधरसे अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए प्रतापी भीमसेनने उसका पीछा किया और द्वैपायन नामक सरोवरमें पानीके भीतर छिपे हुए दुर्योधनका पता लगा लिया
अत्यन्त क्रोध से भरे प्रतापी भीमसेन ने उसका पीछा किया और द्वैपायन नामक सरोवर में जल के भीतर छिपे हुए दुर्योधन को भी देख लिया।
Verse 28
हतशिष्टेन सैन्येन समन्तात् परिवार्य तम् । अथोपविविशुर्द्वश हृदस्थं पञच पाण्डवा:,तदनन्तर हर्षमें भरे हुए पाँचों पाण्डव मरनेसे बची हुई सेनाके द्वारा उसपर चारों ओरसे घेरा डालकर तालाबमें बैठे हुए दुर्योधनके पास जा पहुँचे
तदनन्तर हर्ष से भरे हुए पाँचों पाण्डव, मरने से बची हुई सेना के द्वारा उसे चारों ओर से घेरकर, तालाब में बैठे हुए दुर्योधन के पास जा पहुँचे।
Verse 29
विगाहा सलिल त्वाशु वाग्बाणैर्भुशविक्षत: । उत्थाय स गदापाणिरयुद्धाय समुपस्थित:,उस समय भीमसेनके वाग्बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर दुर्योधन तुरंत पानीसे बाहर निकला और हाथमें गदा ले युद्धके लिये उद्यत हो पाण्डवोंके पास आ गया
उस समय भीमसेन के वाग्बाणों से अत्यन्त घायल होकर दुर्योधन तुरंत पानी से बाहर निकला और हाथ में गदा लेकर युद्ध के लिये उद्यत हो पाण्डवों के पास आ गया।
Verse 30
ततः स निहतो राजा धार्तराष्ट्रो महारणे | भीमसेनेन विक्रम्य पश्यतां पृथिवीक्षिताम्,तत्पश्चात् उस महासमरमें सब राजाओंके देखते-देखते भीमसेनने पराक्रम करके धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधनको मार डाला
तत्पश्चात् उस महासमर में सब राजाओं के देखते-देखते भीमसेन ने पराक्रम करके धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन को मार डाला।
Verse 31
ततस्तत् पाण्डवं सैन्यं प्रसुप्तं शिबिरे निशि । निहतं द्रोणपुत्रेण पितुर्वधममृष्यता,इसके बाद रातके समय जब पाण्डवोंकी सेना अपनी छावनीमें निश्चिन्त सो रही थी, उसी समय द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने अपने पिताके वधको न सह सकनेके कारण आक्रमण किया और सबको मार गिराया
इसके बाद रात के समय जब पाण्डवों की सेना अपनी छावनी में निश्चिन्त सो रही थी, उसी समय द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने अपने पिता के वध को न सह सकने के कारण आक्रमण करके सबको मार गिराया।
Verse 32
हतपुत्रा हतबला हतमित्रा मया सह । युयुधानसहायेन पज्च शिष्टास्तु पाण्डवा:,उस समय पाण्डवोंके पुत्र, मित्र और सैनिक सब मारे गये। केवल मेरे और सात्यकिके साथ पाँचों पाण्डव शेष रह गये हैं
उनके पुत्र मारे गए, बल टूट गया, मित्र नष्ट हो गए। मेरे साथ और युयुधान (सात्यकि) के सहायक होने पर केवल पाँचों पाण्डव ही शेष रह गए हैं।
Verse 33
सहैव कृपभोजाभ्यां द्रौणिर्युद्धादमुच्यत । युयुत्सुश्चापि कौरव्यो मुक्त:पाण्डवसंश्रयात्,कौरवोंके पक्षमें कृपाचार्य और कृतवर्माके साथ द्रोणपुत्र अश्वत्थामा युद्धसे जीवित बचा है। कुरुवंशी युयुत्सु भी पाण्डवोंका आश्रय लेनेके कारण बच गये हैं
कृपाचार्य और भोज (कृतवर्मा) के साथ द्रोणपुत्र अश्वत्थामा युद्ध से जीवित बच निकला। और कुरुवंशी युयुत्सु भी पाण्डवों का आश्रय लेने के कारण बच गया।
Verse 34
निहते कौरवेन्द्रे तु सानुबन्धे सुयोधने । विदुर: संजयश्चैव धर्मराजमुपस्थितौ,बन्धु-बान्धवोंसहित कौरवराज दुर्योधनके मारे जानेपर विदुर और संजय धर्मराज युधिष्ठिरके आश्रयमें आ गये हैं
बन्धु-बान्धवों सहित कौरवाधिपति सुयोधन (दुर्योधन) के मारे जाने पर विदुर और संजय धर्मराज युधिष्ठिर के पास आकर शरण में रहे।
Verse 35
एवं तदभवद् युद्धमहान्यष्टादश प्रभो । यत्र ते पृथिवीपाला निहता: स्वर्गमावसन्,प्रभो! इस प्रकार अठारह दिनोंतक वह युद्ध हुआ है। उसमें जो राजा मारे गये हैं, वे स्वर्गलोकमें जा बसे हैं
प्रभो! इस प्रकार वह महान युद्ध अठारह दिनों तक हुआ; और उसमें जो पृथ्वीपाल राजा मारे गए, वे स्वर्गलोक में जा बसे।
Verse 36
वैशम्पायन उवाच शृण्वतां तु महाराज कथां तां लोमहर्षणाम् । दुःखशोकपरिकक््लेशा वृष्णीनामभवंस्तदा,वैशम्पायनजी कहते हैं--महाराज! रोंगटे खड़े कर देनेवाली उस युद्ध-वार्ताको सुनकर वृष्णिवंशी लोग दुःख-शोकसे व्याकुल हो गये
वैशम्पायन बोले—महाराज! उस लोमहर्षक कथा को सुनते ही वृष्णिवंशी लोग दुःख, शोक और क्लेश से व्याकुल हो उठे।
Verse 60
इति श्रीमहा भारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि वासुदेववाक्ये षष्टितमो5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपवके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्णद्वारा युद्धवृत्तानतका कथनविषयक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के आश्वमेधिक पर्व के अंतर्गत अनुगीता-पर्व में वासुदेव (श्रीकृष्ण) के वचनरूप साठवाँ अध्याय समाप्त हुआ। यहाँ श्रीकृष्ण द्वारा युद्ध-वृत्तान्त का कथन, उत्तर-युद्ध के धर्म-आध्यात्मिक संदर्भ में उपदेशरूप से, पूर्ण होता है।
Whether it is ethically permissible to delay painful truth to prevent immediate harm: Kṛṣṇa omits Abhimanyu’s death to protect Vasudeva, but the household’s grief dynamics require timely, accurate disclosure and accountability in narration.
The chapter teaches disciplined grief: acknowledging loss without collapsing into rage or paralysis, interpreting death within kṣatriya duty and kāla, and translating sorrow into socially constructive rites and generosity.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is practical and ethical—modeling how truthful narration, consolation, and śrāddha-linked giving stabilize community life after catastrophic events.