
अध्याय ३३ — धृतराष्ट्रस्य कुशलप्रश्नाः तथा विदुरस्य योगसमाधिः (Chapter 33: Dhṛtarāṣṭra’s Welfare-Inquiries and Vidura’s Yogic Absorption)
Upa-parva: Vidura–Yudhiṣṭhira Saṃvāda and Vidura’s Yogic Dissolution (Vidura-episode within Āśramavāsika Parva)
Dhṛtarāṣṭra addresses Yudhiṣṭhira with a structured series of ‘kaccit’ inquiries that function as a governance audit: the king’s personal well-being; the health of dependents, ministers, servants, and teachers; adherence to ancient royal conduct; uninterrupted revenue and replenished treasury; proportionate dealings with enemies, neutrals, and allies; proper patronage of Brahmins; and the satisfaction of citizens, staff, and kin. He further asks about sacrificial observances, ancestral and divine rites, and hospitality, extending the welfare lens to social orders (vipra, kṣatriya, vaiśya, śūdra) and to vulnerable groups—women, children, and the elderly—along with respect shown to in-laws within the household. Vaiśaṃpāyana notes Yudhiṣṭhira’s apt reply, after which Yudhiṣṭhira questions Dhṛtarāṣṭra regarding the austerities of the elders and the whereabouts of Vidura and Saṃjaya. Dhṛtarāṣṭra reports Vidura’s severe asceticism. Vidura is then seen in the forest in an emaciated, unadorned, dust-covered state; Yudhiṣṭhira follows and identifies him. In a secluded spot, Vidura fixes his gaze and, through yogic power, is described as merging bodily and vital faculties into Yudhiṣṭhira, leaving his own body inert against a tree. When Yudhiṣṭhira considers funerary rites, a disembodied injunction prohibits cremation, asserting this is the eternal rule for one who has attained yati-dharma and is therefore not an object of grief. Yudhiṣṭhira returns and reports the event; the group reacts with astonishment. Dhṛtarāṣṭra offers forest fare (water, roots, fruits) as hospitality, and the party spends the night at the tree-roots subsisting on simple ascetic provisions.
Chapter Arc: जनमेजय की जिज्ञासा उठती है—जो पुरुष देह त्याग चुके, वे उसी पूर्व-शरीर और रूप में फिर कैसे दिखाई दे सकते हैं? पुनरागमन का यह रहस्य उसे चकित करता है। → वैशम्पायन, व्यास-शिष्य और वक्ताओं में श्रेष्ठ, प्रश्न को कर्म-सिद्धान्त की कठोर भूमि पर रख देते हैं: कर्म का ‘अविप्रणाश’ है; कर्मजन्य शरीर और आकृतियाँ नियम से फलित होती हैं। फिर भी श्रोता के मन में संशय बना रहता है—यदि आत्मा असंग है, तो रूप-प्रत्यावर्तन कैसे? → वैशम्पायन निर्णायक रूप से बताते हैं कि जीव जिस-जिस शरीर से कर्म करता है, उसी-उसी शरीर-रूप का फल उसे अवश्य उपासित/भोगित करना पड़ता है; भूत-इन्द्रिय आदि अनेक तत्त्व शरीर में एकत्व पाकर भी पृथक्-भाव जानने वालों के लिए भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं—यही ‘रूप-दर्शन’ की संगति है। → अश्वमेध के श्रुति-संदर्भ और प्राण-देह के लोकान्तर-गमन की चर्चा से यह स्पष्ट किया जाता है कि देह-रूप का प्राकट्य/अप्राकट्य नियमबद्ध है; मुक्त पुरुष अव्यक्त से प्रकट होकर पुनः अव्यक्त में लीन हो सकता है—अतः ‘दर्शन’ असंभव नहीं, वह कर्म-नियम और तत्त्व-व्यवस्था के भीतर घटित होता है। → पुत्रदर्शन-प्रसंग की पृष्ठभूमि में यह सिद्धान्त-स्थापन आगे आने वाले प्रत्यक्ष ‘दर्शन’ की ओर संकेत करता है, जहाँ सिद्धान्त अनुभव का रूप लेगा।
Verse 1
है ० बक। ] अति: चतुस्त्रिंशो 5 ध्याय: मरे हुए पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुन: दर्शन देना सम्भव है
सौति बोले—अपने समस्त पितामहों के इस प्रकार परलोक से आने और जाने का वृत्तान्त सुनकर विद्वान् राजा जनमेजय अत्यन्त प्रसन्न हुए।
Verse 2
अब्रवीच्च मुदा युक्त: पुनरागमन प्रति । कथं नु त्यक्तदेहानां पुनस्तद्रूपदर्शनम्
प्रसन्न होकर, पुनरागमन के विषय में संदेह करते हुए उन्होंने कहा—“भला, जिन्होंने अपने शरीर का परित्याग कर दिया है, उन पुरुषों का उसी रूप में दर्शन कैसे हो सकता है?”
Verse 3
इत्युक्त: स द्विजश्रेष्ठो व्यासशिष्य: प्रतापवान् | प्रोवाच वदतां श्रेष्ठस्तं नृूपं जनमेजयम्,उनके ऐसा कहनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ प्रतापी व्यासशिष्य विप्रवर वैशम्पायनने उन राजा जनमेजयसे कहा
ऐसा कहे जाने पर वक्ताओं में श्रेष्ठ, प्रतापी व्यास-शिष्य द्विजवर वैशम्पायन ने राजा जनमेजय से कहा।
Verse 4
वैशम्पायन उवाच अविप्रणाश: सर्वेषां कर्मणामिति निश्चय: । कर्मजानि शरीराणि तथैवाकृतयो नृप
वैशम्पायन बोले—नरेश्वर! यह निश्चय है कि समस्त कर्म अपने फल को भोगे बिना नष्ट नहीं होते। हे नृप! प्राणियों को जो शरीर और नाना प्रकार की आकृतियाँ प्राप्त होती हैं, वे सब कर्मजन्य हैं।
Verse 5
महाभूतानि नित्यानि भूताधिपतिसंश्रयात् । तेषां च नित्यसंवासो न विनाशो वियुज्यताम्
भूतों के अधिपति भगवान् के आश्रय से पंचमहाभूत नित्य हैं। उनका संयोग निरन्तर रहता है; और जब वियोग होता है, तब वह केवल पृथक् होना है—विनाश नहीं।
Verse 6
अनायासकृतं कर्म सत्य: श्रेष्ठ फलागम: । आत्मा चैशि: समायुक्त: सुखदुःखमुपाश्षुते
जो कर्म बिना अहंकार के और अनायास किया जाता है, उसका फल सत्य और श्रेष्ठ होता है—अर्थात् मुक्तिदायक। परन्तु कर्तृत्व-अभिमान से युक्त जीवात्मा सुख-दुःख का भोग करता है।
Verse 7
अविनाश्यस्तथायुक्तः क्षेत्रज्ञ इति निश्चय: । भूतानामात्मको भावो यथासौ न वियुज्यते
यह निश्चय है कि क्षेत्रज्ञ (चेतन आत्मा) कर्मों से संयुक्त प्रतीत होकर भी वास्तव में अविनाशी है। परन्तु भूतों के साथ तादात्म्य-भाव स्वीकार कर लेने से वह ज्ञान के बिना उनसे पृथक् नहीं हो पाता।
Verse 8
यावन्न क्षीयते कर्म तावत् तस्य स्वरूपता । क्षीणकर्मा नरो लोके रूपान्यत्वं नियच्छति
जब तक प्रारब्ध-कर्म का क्षय नहीं होता, तब तक जीव की उसी देह से एकरूपता बनी रहती है। और जब कर्म क्षीण हो जाते हैं, तब मनुष्य इस लोक में दूसरे रूप-स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।
Verse 9
नानाभावास्तथैकत्वं शरीर प्राप्प संहता: । भवन्ति ते तथा नित्या: पृथग्भावं विजानताम्
भूत, इन्द्रिय आदि नाना तत्त्व देह को पाकर एक संघात-रूप होकर एकत्व-सा प्रतीत होते हैं। पर जो योगी आत्मा को देह और उसके घटकों से पृथक् जानते हैं, उनके लिए ये सब तत्त्व अपने यथार्थ स्वरूप में—आत्मा से भिन्न—प्रकट होते हैं।
Verse 10
अश्वमेधे श्रुतिश्वेयमश्व॒संज्ञपनं प्रति । लोकान्तरगता नित्यं प्राणा नित्यं शरीरिणाम्
अश्वमेध में अश्व के संज्ञापन-वध के प्रसंग में यह श्रुति प्रसिद्ध है—‘तुम्हारा नेत्र सूर्य को, तुम्हारा प्राण वायु को प्राप्त हो’ इत्यादि। इससे यह सूचित होता है कि देहधारियों के प्राण और इन्द्रियाँ नित्य ही लोकान्तर में अपने-अपने स्थानों में स्थित रहते हैं; वे देह के साथ नष्ट नहीं हो जाते।
Verse 11
अहं हितं वदाम्येतत् प्रियं चेत् तव पार्थिव । देवयाना हि पन्थान: श्रुतास्ते यज्ञसंस्तरे
हे पार्थिव! यदि तुम्हें प्रिय हो, तो मैं तुम्हारे हित की बात कहूँ। यज्ञ के आरम्भ में तुमने देवयान-मार्गों का जो श्रवण किया था, वही मार्ग तुम्हारे लिए उपयुक्त हैं।
Verse 12
आह्तो यत्र यज्ञस्ते तत्र देवा हितास्तव । यदा समन्विता देवा: पशूनां गमनेश्वचरा:
जहाँ-जहाँ तुम्हारा यज्ञ विधिपूर्वक आरम्भ हुआ, वहाँ-वहाँ देवता तुम्हारे हितैषी हो गये। और जब देवता इस प्रकार मित्रभाव से संयुक्त होते हैं, तब वे जीवों के गमन में—लोकान्तर-प्राप्ति में—समर्थ होकर अनुग्रह करते हैं और उन्हें अभीष्ट लोकों की प्राप्ति करा देते हैं।
Verse 13
गतिमन्तकश्न तेनेष्टवा नानन््ये नित्या भवत्न्युत | नित्येडस्मिन् पञ्चके वर्गे नित्ये चात्मनि पूरुष:
वैशम्पायन बोले—यज्ञ करके देवताओं की आराधना से प्राणी लोकान्तर में जाने की शक्ति पाते हैं; जो यज्ञ नहीं करते, वे वैसी गति नहीं पाते। यह पंचभौतिक समूह प्रवाह से नित्य है और पुरुष के भीतर स्थित आत्मा भी नित्य है। इसलिए जो अनेक प्रकार के देहों के संयोग—जिनके जन्म और विनाश देखे जाते हैं—के कारण आत्मा का भी जन्म और नाश मानता है, उसकी बुद्धि व्यर्थ है। इसी प्रकार वियोग होने पर जो अत्यन्त शोक करता है, वह मेरे मत में बालक ही है।
Verse 14
अस्य नानासमायोगं य: पश्यति वृथामति: । वियोगे शोचते>त्यर्थ स बाल इति मे मति:
वैशम्पायन बोले—जो आत्मा का देहों के साथ अनेक प्रकार का संयोग सत्यतः मानता है, उसकी बुद्धि व्यर्थ है। और वियोग होने पर जो अत्यन्त शोक करता है, वह मेरे मत में बालक ही है।
Verse 15
वियोगे दोषदर्शी य: संयोगं स विसर्जयेत् । असड़े सड़मो नास्ति दुःखं भूवि वियोगजम्
वैशम्पायन बोले—जो वियोग में दोष ही देखता रहता है, उसे संयोग के आसक्त भाव का ही त्याग कर देना चाहिए। क्योंकि सच्चे असंग में न कोई बन्ध है, न कोई संयोग। जो असंग आत्मा पर संयोग का आरोप करता है, उसी को इस पृथ्वी पर वियोगजन्य दुःख सहना पड़ता है।
Verse 16
परापरज्ञस्त्वपरो नाभिमानादुदीरित: । अपरक्ञ: परां बुद्धि ज्ञात्वा मोहाद् विमुच्यते
वैशम्पायन बोले—जो ‘मेरा-पराया’ के ज्ञान में ही उलझा रहता है, वह अभिमान से ऊपर नहीं उठ पाता। पर जो उस परम को जानता है, जो किसी के लिए ‘पराया’ नहीं है, वह परम बुद्धि पाकर मोह से मुक्त हो जाता है।
Verse 17
अदर्शनादापतित: पुनश्चादर्शनं गत: । नाहं तं वेशझि नासौ मां न च मे5स्ति विरागता
वैशम्पायन बोले—वह अदृश्य से प्रकट हुआ था और फिर अदृश्य में ही चला गया। न मैं उसे वास्तव में जानता हूँ, न वह मुझे; और मुझमें वैराग्य नहीं है।
Verse 18
येन येन शरीरेण करोत्ययमनीभश्वर: । तेन तेन शरीरेण तदवश्यमुपाश्चुते । मानसं मनसा<5प्रोति शरीरं च शरीरवान्
यह पराधीन, अस्वतंत्र जीव जिस-जिस शरीर के द्वारा जैसा कर्म करता है, उसी-उसी शरीर के द्वारा उसका फल अवश्य भोगता है। मानसिक कर्म का फल मन में ही मिलता है और शारीरिक कर्म का फल देह धारण करके उसी देह में सहकर भोगना पड़ता है।
Verse 34
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि पुत्रदर्शनपर्वणि जनमेजयं प्रति वैशम्पायनवाक्ये चतुस्त्रिंशो&ध्याय:
इस प्रकार श्रीमहाभारत के आश्रमवासिक पर्व के ‘पुत्रदर्शन’ नामक उपपर्व में, राजा जनमेजय के प्रति वैशम्पायन के कथन में चौंतीसवाँ अध्याय समाप्त होता है।
The tension between royal obligation and ascetic law: Yudhiṣṭhira’s impulse to perform standard funerary rites conflicts with an injunction grounded in yati-dharma, requiring the king to restrain customary action in deference to ascetic attainment.
Ideal governance is measured by the well-being of dependents and social groups, while spiritual maturity includes recognizing legitimate renunciant norms—suggesting that dharma is context-sensitive across āśramas (life-stages) and roles.
A direct normative statement functions as meta-guidance: the body of one established in yati-dharma is ‘not to be cremated’ and ‘not to be grieved for,’ positioning ascetic attainment as a criterion that alters customary ritual expectations.