अध्याय ३३ — धृतराष्ट्रस्य कुशलप्रश्नाः तथा विदुरस्य योगसमाधिः
Chapter 33: Dhṛtarāṣṭra’s Welfare-Inquiries and Vidura’s Yogic Absorption
अश्वमेधे श्रुतिश्वेयमश्व॒संज्ञपनं प्रति । लोकान्तरगता नित्यं प्राणा नित्यं शरीरिणाम्
aśvamedhe śrutiś ceyam aśvasaṃjñapanaṃ prati | lokāntaragātā nityaṃ prāṇā nityaṃ śarīriṇām ||
अश्वमेध में अश्व के संज्ञापन-वध के प्रसंग में यह श्रुति प्रसिद्ध है—‘तुम्हारा नेत्र सूर्य को, तुम्हारा प्राण वायु को प्राप्त हो’ इत्यादि। इससे यह सूचित होता है कि देहधारियों के प्राण और इन्द्रियाँ नित्य ही लोकान्तर में अपने-अपने स्थानों में स्थित रहते हैं; वे देह के साथ नष्ट नहीं हो जाते।
वैशम्पायन उवाच