अविमुक्तक्षेत्रमाहात्म्य — काशी-वाराणसी में मोक्ष, लिङ्ग-तीर्थ-मानचित्र, और उपासना-विधि
पारावतध्वनिविकूजितचारुशृङ्गैर् अभ्रङ्कषैः सितमनोहरचारुरूपैः आकीर्णपुष्पनिकरप्रविभक्तहंसैर् विभ्राजितं त्रिदशदिव्यकुलैरनेकैः
pārāvatadhvanivikūjitacāruśṛṅgair abhraṅkaṣaiḥ sitamanoharacārurūpaiḥ ākīrṇapuṣpanikarapravibhaktahaṃsair vibhrājitaṃ tridaśadivyakulairanekaiḥ
वह दीप्तिमान था—कबूतरों की ध्वनि से गूँजते उसके सुंदर शिखर, मेघों को चूमते, श्वेत और मनोहर रूप से उज्ज्वल। पुष्प-निकरों से आच्छादित स्थलों में हंस अलग-अलग दलों में विचर रहे थे, और अनेक त्रिदश-देवकुलों की दिव्यता से वह और भी विभूषित था। ऐसे पवित्र लोक में पति शिव सर्वव्यापी प्रभु के रूप में अनुभूत होते हैं, जो अपने धाम की शुद्धि-व्यवस्था से पाशुओं को मुक्ति की ओर खींचते हैं।
Suta Goswami (narrating to the sages at Naimisharanya; internal scene-description inferred)