ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
तानि भाग्यान्यशुद्धानि संत्यजेच्च धनानि च तस्मादष्टगुणं भोगं तथा षोडशधा स्थितम्
tāni bhāgyānyaśuddhāni saṃtyajecca dhanāni ca tasmādaṣṭaguṇaṃ bhogaṃ tathā ṣoḍaśadhā sthitam
अतः उन अशुद्ध भाग्यों और उनसे उत्पन्न धन का त्याग करना चाहिए। तब (शुद्ध आचार से) भोग आठ गुणों वाला होता है और सोलह प्रकार की अवस्थाओं में सुव्यवस्थित होता है—जो पशु को पाश से हटाकर पति शिव की ओर ले जाता है।
Suta Goswami (narrating the teaching within the Linga Purana’s discourse on dharma and the fruits of action)