ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
प्राजापत्ये तथा ब्राह्मे प्राकृते पौरुषे तथा क्षयसातिशयाद्यैस्तु दुःखैर्दुःखानि सुव्रताः
prājāpatye tathā brāhme prākṛte pauruṣe tathā kṣayasātiśayādyaistu duḥkhairduḥkhāni suvratāḥ
प्राजापत्य लोक में तथा ब्रह्म लोक में; प्राकृत (भौतिक) अवस्था में और पौरुष (व्यक्तिगत) स्थिति में भी—हे सुव्रत—क्षय, अतिशय आदि प्रकार के दुःखों से दुःख पर दुःख उत्पन्न होते हैं।
Suta Goswami (narrating Linga Purana teaching to the sages of Naimisharanya)