
Book 2 operationalizes the Vijigīṣu’s power by turning sovereignty into routines: measurement, classification, custody, audit, and enforcement. Chapter 2.6 is a technical spine for kośa-governance—defining what counts as income (āya), what counts as expenditure (vyaya), and how to treat residual balances (śeṣa) and doubtful items through praśodhana (verification/clearing). By partitioning flows into current (vartamāna), lapsed (paryuṣita), and ‘other-sourced’/exceptional (anyajāta), Kauṭilya makes revenue legible across day, fortnight, month, and year; this legibility is itself daṇḍa’s precondition, because punishment without accounts becomes arbitrary while accounts without punishment become ornamental. The chapter also links market operations (price increase, metrology differentials, interest, gains in trade) to state accounting categories, integrating commercial artha into administrative dharma. In the saptāṅga organism, kośa is the nutritive blood: these sutras specify how it is purified, replenished, and protected so that army, fort, and diplomacy can be sustained without internal decay.
Sutra 1
समाहर्ता दुर्गं राष्ट्रं खनिं सेतुं वनं व्रजं वणिक्पथं चावेक्षेत ॥ कZ_०२.६.०१ ॥
समाहर्ता को दुर्ग, राष्ट्र/जनपद, खान, सेतु/बंध, वन, व्रज (पशु-स्थल/चरागाह), और वणिक्पथ (व्यापारी मार्ग) का निरीक्षण करना चाहिए।
Sutra 2
शुल्कं दण्डः पौतवं नागरिको लक्षणाध्यक्षो मुद्राध्यक्षः सुरा सूना सूत्रं तैलं घृतं क्षारः सौवर्णिकः पण्यसंस्था वेश्या द्यूतं वास्तुकं कारुशिल्पिगणो देवताध्यक्षो द्वारबहिरिकादेयं च दुर्गम् ॥ कZ_०२.६.०२ ॥
दुर्ग (नगर) की आय-आधार में ये शामिल हैं—शुल्क, दण्ड, नौ-परिवहन/फेरी-कर (पौतव), नागरिक-कर, लक्षणाध्यक्ष (मानक/चिह्न) से प्राप्त आय, मुद्राध्यक्ष (टकसाल) की आय, सुरा-आय, सूना (वधशाला) की आय, सूत्र (सूत्र/वस्त्र) की आय, तैल, घृत, क्षार, सौवर्णिक (स्वर्णकार) की आय, पण्यसंस्था (नियंत्रित बाजार) की आय, वेश्या-आय, द्यूत (जुआ) की आय, वास्तुक (निर्माण) की आय, कारु-शिल्पिगण (कारीगर-शिल्पी संघ) की आय, देवताध्यक्ष (देवालय/तीर्थ-प्रशासन) की आय, तथा द्वार और द्वार-बाह्य चौकियों पर वसूली।
Sutra 3
सीता भागो बलिः करो वणिक् नदीपालस्तरो नावः पत्तनं विविचितं वर्तनी रज्जुश्चोररज्जुश्च राष्ट्रम् ॥ कZ_०२.६.०३ ॥
राज्य (जनपद) की आय का आधार है—सीता (राजकीय खेती की भूमि), भाग (उत्पादन का राज्यांश), बलि (धार्मिक/उपहार-कर), कर (कर), वणिक-शुल्क, नदीपाल व नदी-शुल्क, तर (नदी-उतार/घाट-शुल्क), नाव (नौका/फेरी-शुल्क), पत्तन (नगर/बंदरगाह-शुल्क), विविचित (विविध/अनियमित वसूली), वर्तनी (मार्ग-आय), रज्जु (रस्सी/टोल-शुल्क), चोररज्जु (चोर-नियंत्रण/बरामदगी से संबंधित वसूली), तथा राष्ट्र (अन्य राजस्व-क्षेत्र)।
Sutra 4
सुवर्णरजतवज्रमणिमुक्ताप्रवालशङ्खलोहलवणभूमिप्रस्तररसधातवः खनिः ॥ कZ_०२.६.०४ ॥
खनि (खानें) से आय होती है—सोना, चाँदी, हीरा, मणि, मोती, प्रवाल, शंख, धातुएँ, नमक, मिट्टी/भूमि-तत्त्व, पत्थर, खनिज-रस, और अयस्क।
Sutra 5
पुष्पफलवाटषण्डकेदारमूलवापाः सेतुः ॥ कZ_०२.६.०५ ॥
सेतु (सिंचाई व तटबंध विभाग) से आय—फूल-फल के बाग, वाट/उपवन-खंड, खेत (केदार), कंद-मूल, और वापी (तालाब/जलाशय/सिंचाई-कार्य)।
Sutra 6
पशुमृगद्रव्यहस्तिवनपरिग्रहो वनम् ॥ कZ_०२.६.०६ ॥
वन (वन-विभाग) में—पशु, मृग (वन्य पशु), वन-द्रव्य/उत्पाद, और हस्ति-वन (हाथी-आरक्षित वन) का नियंत्रित संग्रह/पकड़ शामिल है।
Sutra 7
गोमहिषमजाविकं खरोष्त्रमश्वाश्वतरं च व्रजः ॥ कZ_०२.६.०७ ॥
व्रज (राजकीय पशु-झुंड) में—गाय, भैंस, बकरी और भेड़, गधा और ऊँट, तथा घोड़ा और खच्चर शामिल हैं।
Sutra 8
स्थलपथो वारिपथश्च वणिक्पथः ॥ कZ_०२.६.०८ ॥
व्यापारियों के मार्ग (वणिक्पथ) दो हैं—स्थलमार्ग और जलमार्ग।
Sutra 9
इत्यायशरीरम् ॥ कZ_०२.६.०९ ॥
इस प्रकार ‘आय-शरीर’ (राजस्व-शरीर/राजस्व-शीर्षों का ढाँचा) समाप्त होता है।
Sutra 10
मूल्यं भागो व्याजी परिघः कॢप्तम् (क्लृप्तम्) रूपिकमत्ययश्चायमुखम् ॥ कZ_०२.६.१० ॥
‘आय-मार्ग’ (आयमुख) ये हैं—मूल्य; भाग; व्याजी; परिघ; कॢप्त/क्लृप्त; रूपिक; तथा अत्यय।
Sutra 11
देवपितृपूजादानार्थं स्वस्तिवाचनमन्तःपुरं महानसम् दूतप्रावर्तिमं कोष्ठागारमायुधागारम् पण्यगृहं कुप्यगृहं कर्मान्तो विष्टिः पत्त्यश्वरथद्विपपरिग्रहो गोमण्डलम् पशुमृगपक्षिव्यालवाटाः काष्ठतृणवाटाश्चेति व्ययशरीरम् ॥ कZ_०२.६.११ ॥
‘व्यय-शरीर’ में ये व्यय आते हैं—देव-पितृ-पूजा और दान; स्वस्तिवाचन; अन्तःपुर; महानस (राज-रसोई); दूत-प्रावर्तिम (दूतकार्य/कूरियर व्यवस्था); कोष्ठागार; आयुधागार; पण्यगृह; कुप्यगृह; कर्मान्त (राज्य-कार्यशालाएँ); विष्टि (बेगार); पैदल, घोड़े, रथ और हाथियों का परिग्रह (पालन-पोषण); गोमण्डल; पशु, मृग, पक्षी और व्यालों के बाड़े; तथा काष्ठ और तृण के भण्डार।
Sutra 12
राजवर्षं मासः पक्षो दिवसश्च व्युष्टम् वर्षाहेमन्तग्रीष्माणां तृतीयसप्तमा दिवसोनाः पक्षाः शेषाः पूर्णाः पृथगधिमासकः इति कालः ॥ कZ_०२.६.१२ ॥
राजकीय लेखा के लिए काल-गणना इस प्रकार है: राजवर्ष, मास, पक्ष, दिवस और व्युष्ट (बीता हुआ दिन)। वर्षा, हेमन्त और ग्रीष्म ऋतुओं में कुछ पक्ष तृतीय या सप्तम दिन से कम होते हैं; शेष पक्ष पूर्ण होते हैं। अधिमास अलग से गिना जाता है। यही काल-मानक है।
Sutra 13
करणीयं सिद्धं शेषमायव्ययौ नीवी च ॥ कZ_०२.६.१३ ॥
लेख में दर्ज की जाने वाली बातें हैं—करणीय (जो करना शेष/लंबित है), सिद्ध (जो पूरा हो चुका है), शेष/बाकी, आय और व्यय, तथा नीवी (नकद-भंडार/कार्यशील पूँजी)।
Sutra 14
संस्थानं प्रचारः शरीरावस्थापनमादानं सर्वसमुदयपिण्डः संजातं एतत्करणीयम् ॥ कZ_०२.६.१४ ॥
‘करणीय’ (लंबित) में गिने जाते हैं—संस्थान (व्यवस्था/इकाइयों की स्थापना), प्रचार (कार्य-प्रवर्तन/आवागमन), शरीरावस्थापन (कर्मचारियों/स्थापना का निर्वाह), आदान (वसूलियाँ/लेने योग्य संग्रह), तथा संजात सर्वसमुदयपिण्ड (आकलित/उत्पन्न समस्त अपेक्षित आय का कुल योग)—ये सब करने योग्य शेष कार्य हैं।
Sutra 15
कोशार्पितं राजहारः पुरव्ययश्च प्रविष्टं परमसंवत्सरानुवृत्तं शासनमुक्तं मुखाज्ञप्तं चापातनीयं एतत्सिद्धम् ॥ कZ_०२.६.१५ ॥
‘सिद्ध/निपट’ में गिने जाते हैं—कोष में जमा किया हुआ; राजहार (राज-देय/कर); पुरव्यय (नगर/दुर्ग व्यय) जो प्रविष्ट/दर्ज हो चुका; पूर्ववर्ष के निपट नियम के अनुसार आगे बढ़ाया गया; लिखित शासन से आदेशित; मौखिक आज्ञा से आदेशित; तथा जो अपातनीय (माफ/घटाया जाने योग्य) है—ये सब निपट माने जाते हैं।
Sutra 16
सिद्धिकर्मयोगः दण्डशेषमाहरणीयं बलात्कृतप्रतिष्टब्धमवमृष्टं च प्रशोध्यं एतच्छेषमसारमल्पसारं च ॥ कZ_०२.६.१६ ॥
‘शेष/अवशेष’ में—सिद्ध कार्यों का शुद्ध परिणाम; दण्डशेष (बाकी दण्ड/जुर्माने) जो अभी वसूलने हैं; आहरणीय (वसूल योग्य) राशियाँ; बलात् कृत-प्रतिष्टब्ध (जबरन रोकी/अटकाई गई) रकम; तथा अवमृष्ट (गबन/हड़पी गई) राशि जिसे जाँच कर शुद्ध/वसूल करना है—ये सब आते हैं। ऐसा शेष असार (अवसूल) या अल्पसार (आंशिक रूप से वसूल) हो सकता है।
Sutra 17
वर्तमानः पर्युषितोऽन्यजातश्चायः ॥ कZ_०२.६.१७ ॥
आय (प्राप्तियाँ) तीन प्रकार की है—वर्तमान (चालू), पर्युषित (पुरानी/पिछली से चली आ रही), और अन्यजात (अन्य स्रोतों से नई उत्पन्न)।
Sutra 18
दिवसानुवृत्तो वर्तमानः ॥ कZ_०२.६.१८ ॥
‘वर्तमान’ आय वह है जो दिन-प्रतिदिन प्राप्त होती है और उसी क्रम में दर्ज की जाती है।
Sutra 19
परमसांवत्सरिकः परप्रचारसंक्रान्तो वा पर्युषितः ॥ कZ_०२.६.१९ ॥
‘पर्युषित/पुरानी (कैरी-ओवर)’ आय वह है जो पिछले वार्षिक काल से संबंधित हो, या जो किसी अन्य कार्यालय/कार्य-प्रणाली (परप्रचार) से स्थानांतरित होकर वर्तमान में आ गई हो।
Sutra 20
नष्टप्रस्मृतमायुक्तदण्डः पार्श्वं पारिहीणिकमौपायनिकं डमरगतकस्वमपुत्रकं निधिश्चान्यजातः ॥ कZ_०२.६.२० ॥
‘अन्यजात/नवोत्पन्न’ आय में शामिल हैं: खोई हुई और बाद में स्मरण/पुनःप्राप्त संपत्ति; अधिकारियों (आयुक्तों) पर लगाए गए दंड; पार्श्व/सहायक प्राप्तियाँ; पारिहीणिक (जब्ती/परित्यक्त संपत्ति); औपायनिक (उपहार/कर-भेंट); विद्रोह/डमर-गमन करने वाले का धन; अपुत्रक (वारिस-रहित) की संपत्ति; तथा प्राप्त/खोजा गया निधि (खजाना)।
Sutra 21
विक्षेपव्याधितान्तरारम्भशेषं च व्ययप्रत्यायः ॥ कZ_०२.६.२१ ॥
व्यय-प्रत्याय (खर्च-समायोजन/प्रतिपूर्ति) में शामिल हैं: विक्षेप (विचलन/व्यवधान), व्याधि (रोग/असमर्थता), अन्तर (अवरोध/विराम), या आरम्भ-शेष (अधूरा/आंशिक आरम्भ) के कारण शेष रह गई राशियाँ।
Sutra 22
विक्रिये पण्यानामर्घवृद्धिरुपजा मानोन्मानविशेषो व्याजी क्रयसंघर्षे वार्धवृद्धिः इत्यायः ॥ कZ_०२.६.२२ ॥
आय (राजस्व) में ये शामिल हैं: (1) उपजा—विक्रय में वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि; (2) व्याजी—मान और उन्मान (मानक माप व धारिता-माप) के भेद से होने वाला लाभ; (3) क्रय-प्रतिस्पर्धा/बोली में मूल्य-वृद्धि से होने वाला लाभ।
Sutra 23
नित्यो नित्योत्पादिको लाभो लाभोत्पादिक इति व्ययः ॥ कZ_०२.६.२३ ॥
आय दो प्रकार का है—(1) नित्य—नियमित/बार-बार होने वाला; और (2) नित्योत्पादिक—जो नित्य आय उत्पन्न करे। व्यय वह है जो लाभ उत्पन्न करे (लाभोत्पादिक)।
Sutra 24
दिवसानुवृत्तो नित्यः ॥ कZ_०२.६.२४ ॥
जो दिन-प्रतिदिन चलता रहे, वही नित्य (आवर्ती) आय है।
Sutra 25
पक्षमाससंवत्सरलाभो लाभः ॥ कZ_०२.६.२५ ॥
पखवाड़े, महीने या वर्ष में जो प्राप्ति हो, वही लाभ है।
Sutra 26
तयोरुत्पन्नो नित्योत्पादिको लाभोत्पादिक इति व्ययः ॥ कZ_०२.६.२६ ॥
इन दोनों (नित्य आय और लाभ) से जो उत्पन्न हो, वह नित्योत्पादिक कहलाता है; और व्यय वह है जो लाभ उत्पन्न करे (लाभोत्पादिक)।
Sutra 27
संजातादायव्ययविशुद्धा नीवी प्राप्ता चानुवृत्ता च ॥ कZ_०२.६.२७ ॥
आय और व्यय का हिसाब करने के बाद जो शुद्ध शेष बचता है, वही नीवी (कोष की आरक्षित/कार्यशील पूँजी) है; वह प्राप्त भी होती है और आगे के लिए वहन/चलाई भी जाती है।
Sutra 28
ह्रासं व्ययस्य च प्राज्ञः साधयेच्च विपर्ययम् ॥ कZ_०२.६.२८च्द् ॥
और बुद्धिमान प्रशासक को व्यय में कमी करानी चाहिए तथा इसके विपरीत (आय का घटाव और खर्च का बढ़ाव) रोकना चाहिए।
Stable kośa through auditable revenue and controlled expenditure: arrears are recoverable, doubtful items are verified rather than arbitrarily seized, and net reserve (nīvī) is clarified—enabling predictable provisioning of fort/army and reducing corruption-driven scarcity.
Daṇḍa is implied via ‘daṇḍaśeṣa’ and ‘āyuktadaṇḍa’: officials who conceal, misclassify, or fail to remit recoverable balances are subject to fines/penalties proportionate to loss and culpability, alongside recovery (āharaṇa) of the enforceable remainder after verification (praśodhana).